Thursday, 30 April 2026

चम्पा के महक - डुमन लाल ध्रुव

 चम्पा के महक

                    - डुमन लाल ध्रुव 

सहर के बिहान धीरे-धीरे खुलत रिहिस। रात भर के ठंडक अभी हवा मा बाकी रिहिस। सड़क किनारे पेड़ के पत्ता हा हल्का हल्का सरसरावत रिहिन। दुकान के शटर उठत रिहिन, चाय के ठेला मा केतली खदबदात रिहिस  अऊ लोगन मन अपन-अपन जिनगी के दउड़ मा निकलत रिहिन।

इही रोज के हलचल मा एक आवाज रोज गूंजत रिहिस -

“पांच के दस… पांच के दस… दीदी, बस दू फूल ले लो…”

मोड़ के किनारे खड़े रिहिस एक झन लइका।

दुबला-पतला, काला-कलूटा रंग, फटा-पुराना पैंट। ओखर हाथ मा एक नानचुन डलिया रिहिस। डलिया मा पीयर-पीयर चम्पा के फूल सजे रिहिन। ऊपर गीला कपड़ा ढंकाय रिहिस  फेर फूल के महक अइसन के जेन मनखे हा तीर ले गुजरे ओ एक पल बर ठहर जात रिहिस।

ओ लइका के नाव रिहिस मुरहा।

मुरहा के चेहरा साधारण नइ रिहिस। ओखर होंठ जनम ले थोड़ा कटे फटे रिहिस। बोलत बखत शब्द मन साफ नइ निकलत रिहिन। फेर ओखर आंख मा अइसन चमक रिहिस जइसे जिनगी के दुख-तकलीफ के बावजूद ओ हारना नइ जानत होवय।

सुमीता रोज उही रद्दा ले ऑफिस जावत रिहिस।

जइसे वोहर मोड़ मा पहुंचत हे ।  

 मुरहा दौड़ के ओखर लुगरा के अंछरा ला पकड़ लेथे -

“दीदी… बस दू फूल…”

पहिली-पहिली सुमीता झुंझला जावत रिहिस।

“अरे, कितनी बार कहा है… मत पकड़ा करो।”

फेर मुरहा हर बार मुस्कुरा देथे।

अऊ आखिरकार सुमीता हार जाथे।

चलते-चलत फूल ले लेथे अऊ एक रुपिया ओखर हथेली मा धरा देथे।

धीरे-धीरे ए सिलसिला रोज के होगे।

अब हालत ये होगे के अगर एक दिन मुरहा नइ दिखय त सुमीता ला खुद कुछ अधूरा-सा लगय।

कभू-कभू ओखर तीर छुट्टा पइसा नइ रहितिस तब भी मुरहा हा फूल दे देत रिहिस।

“कोनो बात नइ दीदी… कल दे देबे।”

सुमीता सोचय -

गरीबी मा रहिके भरोसा करना…

ए काम तो बड़े-बड़े अमीर मन भी नइ कर पावत हे।

मुरहा के जिनगी मा कोनो ठिकाना नइ रिहिस।

दिन भर बजार मा घूमना, फूल बेचना अऊ रात मा जिहां जगह मिल जावय वहीं सो जाना।

कभू दुकान के आगू, कभू सीढ़ी,

कभू फुटपाथ।

बरसात मा भीगना, गरमी मा तपना सब ओखर जिनगी के हिस्सा रिहिस।

फेर ओ हंसना नइ छोड़िस।

कभू सड़क किनारे चरईया भंइस के पीठ मा चढ़ जाथे अऊ फिल्मी गाना गाथे।

लोगन हांस देवे।

फेर ओला कोनो फरक नइ पड़त रिहिस।

जइसे जिनगी ओखर बर अभी भी खेल हवय।

एक दिन बजार मा अलग रौनक रिहिस।

ईद के दिन रिहिस।

दुकान मा भीड़, मिठाई के खुशबू, नवा कपड़ा पहिरे लोगन मन के रेलम पेल।

सुमीता सामान लेके घर लहुटत रिहिस।

तभी सामने एक लड़का दिखिस - नया पैंट, नई कमीज।

पहिली नजर मा सुमीता पहचान नइ पाइस।

फेर ओ हांसत किहिस -

“दीदी… देखो हमर नया कपड़ा!”

सुमीता चौंकगे -

“अरे… मुरहा !”

मुरहा खुशी ले बताइस -

“आज हमको ईदी मिला हे… देखो पइसा भी हे।”

सुमीता अपन पर्स ले सौ रुपिया निकालिस।

“ये मेरी तरफ से ईदी।”

मुरहा के आंखी चमक उठिस।

अतके मा कपड़ा दुकान के सेठ दउड़त आइस।

ओ झपट के मुरहा ला पकड़ लिस अऊ थप्पड़ जड़ दिस।

“चोर! मेरे पैसे चुरा ले गया!”

भीड़ जमा होगे।

मुरहा रोवत किहिस -

“नइ दीदी… हम नइ लेहेन…”

सुमीता आगे बढ़िस -

“पहले देख तो लीजिए।”

इतने मा सेठ के भतीजा दउड़त आइस - 

“मामू! आपने तो घर में अभी मुझे पांच सौ रुपये ईदी दिए थे।”

सेठ के चेहरा उतरगे।

भीड़ मा सन्नाटा छागे।

मुरहा के आंखी मा आंसू भरगे।

ओ धीरे-धीरे अपन नई कमीज उतारिस अऊ सेठ के मुंह मा फेंक दिस -

“ले लो… हम नइ मांगत हन तोर कपड़ा… कल कहिबे के ये भी चुरा लिया…”

ओखर आवाज कांपत रिहिस।

गरीबी ओखर जिनगी ला छोट जरुर कर दे रिहिस, फेर ओखर आत्मसम्मान अभी भी जिंदा रिहिस।

सुमीता के मन भीतरी तक 

भीगगे।

ओ मुरहा के हाथ पकड़ के सामने दुकान ले एक नई कमीज खरीद के दिस।

मुरहाइ के चेहरा खिल उठिस।

जइसे बरसात के बाद धूप निकल जाथे।

फेर ओ अपन जेब ले एक पांच रुपिया के सिक्का निकालिस अऊ सुमीता के हथेली मा धरा दिस -

“दीदी… ये हमर तरफ से ईदी।”

मीता के आंखी भरगे।

ओ सिक्का ला अपन होठ ले छू के रख लीस।

सामने आइसक्रीम वाला आवाज लगावत रिहिस।

सुमीता पूछिस -

“ मुरहा… आइसक्रीम खाबे?”

मुरहा हंस के सिर हिला दिस।

दूनों सड़क किनारे खड़े-खड़े आइसक्रीम के मजा लेवत रिहिन।

मुरहा हांसत किहिस -

“दीदी… आज चम्पा के फूल नइ मिलिस…”

सुमीता मुस्कुराइस -

“कोनो बात नइ… कल ले आना।”

संझा के हवा मा अइसन लगत रिहिस जइसे चम्पा के फूल के महक सचमुच फइलगे हवय।

सुमीता मने  मन सोचत रिहिस-

 ये दुनिया मा

जिहां लोग हजारों रुपिया के पीछे भागथे,

ओही दुनिया मा एक गरीब 

लइका पांच रुपिया के सिक्का ले इंसानियत के सबसे कीमती तोहफा दे देथे।

शायद सच्चा अमीर ओही होथे

जेखर दिल मा अभी भी सम्मान अऊ अपनापन जिंदा रहिथे।

         - डुमन लाल ध्रुव 

      मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

          पिन - 493773

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