संस्मरण -
दुख के रतिहा काट संगी, सूख बिहनिया आही रे ...
- डुमन लाल ध्रुव
छत्तीसगढ़ के लोकजीवन मा गीत-संगीत सिरिफ मनोरंजन के साधन नई होवय ये मन जिनगी के दुख-सुख, संघर्ष अऊ आस के सच्चा गवाही घलो देवय। गांव के माटी, खेत-खार, नदी-नाला, मेला-ठेला अऊ लोकपरंपरा ले उपजे ये गीत मन सीधा मन ला छू लेथे। जब कोनो लोकगायक अपन सजीव स्वर मा ये गीत मन ला गाथे त वो सिरिफ सब्द नई रहय एक जीते-जागते अनुभव बन जाथे। अइसने अनुभव के धनी रिहिन छत्तीसगढ़ी लोकगीत के अमर गायक-गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया जी , जेन के गीत मन मा छत्तीसगढ़ के माटी के सुवास अऊ लोकजीवन के गहिर संवेदना साफ झलकथे।
सन् 2003 के वो रात आज घलो मोर स्मृति मा उज्जर होके चमकत हवय। जगह रिहिस धमतरी जिला के ग्राम मुजगहन। उहां साहित्य संगीत सांस्कृतिक मंच मुजगहन के अगुवाई मा “सुरता नारायण लाल परमार” केन्द्रित एक खास सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन करे गे रिहिस। ये आयोजन सिरिफ एक कार्यक्रम नई रहिस छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ संस्कृति बर प्रेम अऊ सम्मान के एक बड़का उत्सव जइसने लगत रिहिस।
कार्यक्रम के तैयारी गांव मा कई दिन पहिली ले शुरु होगे रिहिस। गांव के लोगन बड़े उत्साह अऊ लगन ले ये आयोजन के बाट जोहत रिहिन। मंच ला बढ़िया ढंग ले सजाय गे रिहिस, चारों कोती रोशनी के इंतजाम रिहिस अऊ दूर-दराज ले आवत साहित्यकार अऊ कलाकार मन के स्वागत बर गांव के लोगन के मन मा भारी उत्सुकता रिहिस।
ओ बखत छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत के माहौल घलो बहुत जीवंत रिहिस। नवा-नवा कवि उभरत रिहिन अऊ पुरखा साहित्यकार मन के परंपरा ला आगू बढ़ाय के कोशिश होवत रिहिस। इही संदर्भ मा “सुरता नारायण लाल परमार” केन्द्रित ये कार्यक्रम एक तरह ले साहित्यिक सुरता अऊ सांस्कृतिक संगम के रुप ले दिखाय देत रिहिस।
छत्तीसगढ़ के कई नामी-गिरामी कवि अऊ साहित्यकार ओ कार्यक्रम मा भाग लेय बर मुजगहन पहुंचिन। मंच मा जब कवि सम्मेलन शुरु होइस त श्रोता मन के भीड़ उत्साह ले
भरगे रिहिस। एक-एक कर कवि मन मंच मा आके अपन रचना सुनावत रिहिन। हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार अऊ समाजिक विषय मन ऊपर आधारित कविता सुनके श्रोता मन कभी मुस्कुरावत रिहिन, त कभी गम्भीर होके सुनत रिहिन।
रात धीरे-धीरे गहरावत जात रिहिस फेर कार्यक्रम के उत्साह कम होय के नाम नई लेत रिहिस। पूरा गांव के माहौल साहित्य अऊ संगीत के सुर मा सराबोर होगे रिहिस। इही बीच मंच मा जब छत्तीसगढ़ी लोकगीत के अमर गायक-गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया जी के आगमन होइस, त पूरा वातावरण एक अलग किसिम के भाव ले भरगे।
उनकर व्यक्तित्व बहुत सादा अऊ सहज रहिस फेर उंखर आवाज मा एक अद्भुत आकर्षण रिहिस। जइसे वो माइक पकड़िन श्रोता मन मा एक अलग किसिम के उत्सुकता देखाय देय लगिस। कतको लोगन मन उनला सही ढंग ले देखे अऊ सुने बर खड़े होगे रिहिन।
कुछ ही पल बाद वो बिना कोनो औपचारिकता के अपन प्रसिद्ध गीत के पंक्ति ला गुनगुनाय लगिन -
“दुख के रतिहा काट संगी,
सूख बिहनिया आयी रे…
रो के गा के पढ़,
एके अरथ बताही रे…”
बस, इही वो पल रिहिस जब पूरा माहौल बदलगे। उनकर आवाज मा अइसने मिठास अऊ भाव रिहिस के जेन लोगन खड़े होके देखत रिहिन वो घलो धीरे-धीरे चुपचाप बइठ गइन। अइसे लगत रिहिस जइसे पूरा मुजगहन गांव ओ गीत के भाव मा डूबगे हवय।
ओ गीत मा सिरिफ सुर नई रिहिस जिनगी के एक गहिर संदेश घलो छिपे रिहिस। गीत के हर पंक्ति जइसे ये कहत रिहिस के जिनगी मा दुख के रात चाहे कतको लंबा काबर न होवय आखिरकार सुख के बिहनिया जरुर आवत हे।
उंखर आवाज मा लोकजीवन के पीरा घलो रिहिस अऊ उम्मीद के उजाला घलो। इही सेती श्रोता मन मंत्रमुग्ध होके सुनत रिहिन। कोनो शोर नई, कोनो बातचीत नई सबो मन मा सिरिफ गीत के गूंज रिहिस।
ओ रात मुजगहन के वो छोटे से मंच छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति के एक बड़े केन्द्र बनगे रिहिस। मंच मा गीत, कविता अऊ लोकभावना के अद्भुत संगम दिखाई देत रिहिस।
कवि सम्मेलन देर रात तक चलत रिहिस। एक-एक कर कवि मन मंच मा आवत रिहिन अऊ अपन रचना सुनावत रिहिन। श्रोता मन घलो रात भर बइठे रिहिन। थकान के कोनो नामोनिशान नई रिहिस। अइसे लगत रिहिस जइसे साहित्य अऊ संगीत के ऊर्जा सबो मन ला जागत रखे हे।
गांव के बूढ़ा-बुजुर्ग, जवान अऊ लइका सब्बो ये आयोजन के हिस्सा बनगे रिहिन। ये दृश्य अपन आप मा बहुत प्रेरणादायक रिहिस। ओ रात ये महसूस होइस के छत्तीसगढ़ के संस्कृति सिरिफ शहर तक सीमित नइहे गांव के माटी मा घलो ओतकेच गहिराई ले जिंदा हे।
खास करके जब लक्ष्मण मस्तुरिया जी के गीत के गूंज
फइलत रिहिस त अइसे लगत रिहिस जइसे पूरा वातावरण लोकभावना ले भरगे हवय। उनकर आवाज मा छत्तीसगढ़ के धरती के आत्मा बोलत रिहिस।
आज जब ओ कार्यक्रम के याद करथों त मन मा एक गहिर संतोष अऊ आनंद के भाव उमड़ परथे। वो सिरिफ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नई रिहिस छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत बर लोगन के प्रेम के जीते-जागते उदाहरण रिहिस।
समय बीतगे, कई कार्यक्रम आइन-गइन फेर मुजगहन के वो रात आज घलो मोर स्मृति मा ओहीच ताजगी ले बसे हवय। ओ रात के माहौल, कवि मन के रचना, श्रोता मन के उत्साह अऊ खास करके लक्ष्मण मस्तुरिया जी के वो गीत सब्बो आज घलो कान मा गूंजथे।
जब जिनगी मा घलो कठिनाई अऊ निराशा के घड़ी आवत हे त ओ गीत के पंक्ति अपने आप सुरता आ जाथे -
“दुख के रतिहा काट संगी,
सूख बिहनिया आही रे…”
ये गीत मा जिनगी के एक गहिर दर्शन छुपे हे । ये हमन ला भरोसा दिलाथे कि दुख अऊ संघर्ष के बाद उम्मीद अऊ सुख के बिहनिया जरुर आवत हे।
मुजगहन, धमतरी के वो सांस्कृतिक संझा ए सेती घलो खास रिहिस के ओ साबित कर दिस छत्तीसगढ़ के संस्कृति अऊ साहित्य आज घलो लोगन के मन मा ओतकेच मजबूती ले जिंदा हे जइसे पहिली रिहिस।
आज घलो जब ओ रात के स्मृति मन मा उभरथे त अइसे लगथे जइसे वो गीत फेर हवा मा गूंजत हवय अऊ पूरा सभा ओही भाव मा डूबे हवय -
“दुख के रतिहा काट संगी,
सूख बिहनिया आही रे…”
मुजगहन के वो सांस्कृतिक संध्या सचमुच छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत के एक अनमोल धरोहर बनके आज घलो स्मृति मा जिंदा हावय ।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
दिनांक - 07.4.2026 मंगलवार
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