सुरता
"अच्छा! बबला ए..."
अइसन सुने ल मिले रहिस मोर ममा मन के खेती किसानी के कबीर धाम कवर्धा जिला के गॉंव महली सुरुजपुरा म उंखर अधियरा के मुॅंह ले। अपन ममेरा भाई के सॅंग लगभग तीन कोरी बछर बाद गे रहॅंव वो गॉंव।
मोर ऑंखी आघू झूले लगिस वो एक एक ठन दृश्य; कइसे अपन ममादाई (मोर महतारिच रहिन उन, घर के जम्मो झन उन ला "दीदी" कहन अउ नना ल "बाबू" ) सॅंग ओ गॉंव गे रहॅंव। एकदमे छोटे रहॅंव, स्कूल जाय के लाइक घलो नइ होय रहॅंव। धान मिंजाई के समय रहय। ओ गॉंव म माटी के भितिया वाले, खपरा के छान्ही वाले नानकुन मकान जेमा धान रखे बर कोठी घलो बने रहय। उहें रुके रहन।
कोजनि बिजली आय रहिस के नइ आय रहिस सुरता नइ आवत हे, फेर हम अपन घर म कंडिल चिमनी बार के अंजोर करन घर ल। कटकट ले जाड़ के महीना। भुॅंइया म दसना दसा के सोना।
फेर जाड़ के मारे कतको ओढ़ना लेगे रहन बिन मोटहा बिस्तर के कहॉं जाड़ बुताना हे। एकरो बर उपाय खोजेन। सबले सस्ता अउ सुंदर उपाय इही रहिस के पैरा ल भुॅंइया म बगरा अउ सबले पहिली ओकर ऊपर बारदाना बिछा फेर ओकर ऊपर दरी चद्दर बिछा के कथरी ल ओढ़ अउ बने बेफिकर होके सो। ओइसने हम अउ ममादाई सो जात रेहेन। घर ले कोठार लगभग दू तीन फर्लांग दुरिहा रहिस होही।
धान कटा के कोठार म आ गेहे। खरही गॅंजाए हे।
दॅंउरी फॉंदे बर हे। बइला भॅंइसा के बेवस्था म लगे हें अधियारा। अउ जइसे बेवस्था होइस, भिनसरहा ले मिंजाई शुरू। अधियारा के लइका मन सॅंग हमू दॅंउरी हॅंकाले बर लग जावत रहन। हॅंकालना कम। मस्ती जादा। फेर अधियारा मन चिल्लावॅंय, हमर ममादाई ल कहॅंय देख गॅंउटनिन अपन नाती ल सम्हाल कहूॅं एक्को ठन जानवर छटारी मार दिस, हुबेल दिस त हमला झन दोष देबे। कोंटा म भुर्री अलग बारे रहॅंय। तापौ भुर्री, बुतावव जाड़।
कमइया मन "कलारी", कलारिच त कथें काय, के मदद ले पैरा ल अलग करत जॉंय। फेर धान के सूपा म धर के ओसाई। एकर बर हवा चाही। प्रकृति मेहरबान रहय जी। काबर नइ रहितिस। आज असन थोरे कंक्रीट के जंगल रहिस। चारो मुड़ा लीम बर पीपर अउ कई किसम के पेड़ के छॅंइहा। नदिया नरवा तरैया.........पीये के पानी बर जघा जघा कुॅंआ खोदाए...चारों मुड़ा हरियाली... सर सर हवा चलय। कातिक अग्घन के महीना। हॉं! कभू घप्प घलो मार दय। एकदम ले हवा बंद हो जात रहिस। पेड़ के पाना हाले बर बंद कर दय। त अगोरे लगॅंय। सुरता नइ आवत हे; ओ समे लोहा के पंखा के इजाद होय रहिस के नहीं।जेकर मदद से ओसाय बर सुविधा होय। धान ओसा गय तहॉं बढ़िया ओकर ढेर बना के ओकर बगल मा नापे के पंसेरिया काठा, पइली मड़ा के पहिली पूजा। अउ पॉंच पइली या पॉंच काठा धान का के सेती अलग करॅंय ओकर सुरता नइ आवत हे।फेर नाप नाप के बोरा म पेकिंग। गाड़ा म बोरा के जमाई अउ घर लेज के कोठी म भर दे जात रहिस। उपज के आधा अधियरा के, आधा खेत मालिक के।
ओ घटना ल कइसे भुलाए सकिहौं जब दीदी मोला घरे म छोड़ के खेत कती चल दिस। उनला का मालूम रहिस के मॅंहू निकल जाहूॅं कहिके। निकल गेंव मैं। चारो मुड़ा देखेंव। दीदी (ममा दाई) नइ दिखिन। दे बोम फार के रोवाई। गली गली म इही कहत घुमाई। तुहॅंर पाॅंव परत हौं मोर दीदी कहॉं गॅंवा गे हे ओला खोज के लान दव कहिके। खेत कती जाके कोनो बताइन होहीं दीदी ल मोर रोवाई के खबर। दॅंउड़त भागत आके दीदी मोला पोटार लिस। खूब मया करिस। ले दे के सिसक इ बंद होइस।
उही बात के सुरता करके अधियरा आज हॅंसत रहय।
सुरता के ओ दुनिया ले लहुटेंव। भाई अधियरा ल कहत हे; हव बबला भइया ताय। पहिली के रीति रिवाज देखव। बाहिरे म बात चलते रहिस के थोकिन देर बाद अधियरा के नतनिन लोटा म पानी धर के लानिस गोड़ धोए बर। फेर सुरता आगे मोला ओ कोरोना काल के। कहॅंय नहीं; पहिली हाथ पैर धो के सेनेटाइज करके अंदर घुसव। त ए परंपरा हमर इहॉं जमाना ले चलत आत हे। पॅंहुना ल गोड़ धोवाए बिना भीतर लेजे के प्रथा नइ रहिस। गोड़ धोएन दूनों भाई। अंदर गेन। बने बइठारिन। उहॉं जउन अपनत्व दिखिस ओइसन आज हम घर म घलो नइ पावन। जहॉं तक अपन खुद म झॉंकथॅंव त लगथे मैं खुद दूसर बर ओइसन अपनत्व नइ दे पावॅंव।
सूर्यकांत गुप्ता जुनवानी भिलाई छत्तीसगढ़
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