Thursday, 30 April 2026

पुतरा पुतरी के बिहाव - 6 (संस्मरण)

 पुतरा पुतरी के बिहाव - 6 (संस्मरण)


 पचास बछर पहिली तक तो पुतरा पुतरी के बिहाव घर घर होवय। गाँव म अउ शहर के पारा मोहल्ला म होवत रहिस हे। घर के अँगना म या फेर घर के बाहिर दूवारी म बांस के मड़वा गड़ावंय। मड़वा म पुतरा पुतरी ल रख के आगू म पिंवरा चाउंर अउ रोचन पानी रख देवंय। लाइकामन घर घर नेवता देय बर जावंय। अब तो जेन घर ले दूसर घर.के पुतरा पुतरी ल टिके बर निकलय तेन 10-12 घर तो टिके बर जावय। कुछ घर म सम्मान के संग बइठा के नाश्ता करावंय, कखरो घर म खाना घलो राहय। अक्सर गुराम पुड़ी, साग भात,बड़ा, राहय। एक बछर मैं अपन गाँव पंदर पाटन गे रहेंव त देखेंव के मोर बड़े पिताजी अउ चाचा के बेटीमन पुतरा पुतरी के बिहाव रखे रहिन हें। पहिली दिन पर्रा बोह के तेलमाटी अउ चुलमाटी गे रहेंन। हल्दी लगा के हरदाही खेलेन। फेर दूसर दिन सांझ के भांवर परिस। कुछ घर म नेवता देय रहिन हें त ओमन शाम के हमर घर आगें। दरी बिछा के बइठारिन। टिकावन टिक के सबके नेवता होइस।


मोर ससुराल राजातालाब रहिस हे। मैं अपन पड़ोस के ठाकुर परिवार म देखेंव के पुतरा पुतरी के बिहाव के कार्ड छपवा के बांटे रहिस हे। हमन सांझ कन गेन त टिकावन टिकेन अउ बइठ के खाना खायेन। बाहिर म बाजा बजत रहीस हे। बने सुंदर सुंदर गाना चलत रहिस हे। पारा भर म नेवता गे रहिस हे। ये बिहाव ल तो लइकामन हर बछर करथें। कुछ मन मानता के कारण बिहाव रखथें।  लइका नइ होवत हावय त ,लइका होय के बाद खुशी म, लइकामन के बिहाव होय के बाद, कखरो घर म लइका नइ होवत हे तब रखथें।

 

ये बिहाव के पाछू एक लोक कथा हावय।एक राजा के लइका नइ रहिस हे। ओ ह एक पुतरी ल बहुत प्यार दुलार करय। एक दिन रानी ह राजा ले कहिथे के मोला पुतरी के बिहाव करना हे पुतरा खोज। राजा ह मंत्री ल पुतरा खोजे बर कहिथे। मंत्री अपन घर म बात करथे त ओखर घरवाली कहिथे के मोर पुतरा संग बिहाव कर देथन। मंत्री ये बात ल राजा ल बताथे। राजा रानी ल बताथे। रानी हाँ कहि देथे अब शादी के तैयारी शुरु हो जथे। पूरा राज्य के मन के खाना राजा डाहर ले रहिस हे। मंत्री ह अपन पुतरा ल धर के हाथी म बारात अइस। राजा ह बहुत दान दहेज दिस। रानी ह खुशी के आँसू बोहावत बेटी ल बिदा करिस। ये बिहाव ल कुछु मानता रखके या खुशी के आये ले रखथें।


मैं जब अपन नवा घर गीतांजली नगर आयेंव 1984 म त ये पूरा खेत रहिस हे। धीरे धीरे चार पांच घर हो गेन। एक घर म पाँच झन बेटी रहिस हे। जब ओमन अइन य मैं सोचेंव के मैं पुतरा पुतरी के बिहाव रख लेथंव। 1988 म मैं बिहाव रखेंव अउ सब झन ल गुराम पूड़ी आलू के साग खवायेंव। ओखर बाद बिहाव के बारहवाँ बछर म 1990 म मोर बेटा अपूर्व होइस। ओखर होय के बाद सन 2000 म बिहाव रखे रहेंव त अपूर्व के दोस्त के परिवार  मन ल बुलाये रहेंव। ओखर बिहाव के बाद 2017 म रखे रहेंव। फेर नातिन आद्या के होय के बाद 2023 म रखे रहेंव। आज पुतरा पुतरी के रुप बदल गे हावय। अब तो आदमी सरिख बनावत हावंय, ओला टिकाये बर नइ परय। अपन आप खड़े हो जथे। अब येला लेथे अउ पूजा के जगह म रख दथें अउ पूजा करथें। येखर बर मड़वा सजाना चाही। आम पत्ता के तोरन लगाना चाही। ओखर बाद जोड़ी  म रखके हल्दी लगाना चाही फेर टिकावन टिकना चाही ओखर बर रोचन पानी अउ पिंवरा चाउंर रखना चाही।


ये सब सुरता ये कारण ले अइस के डा. सत्यभामा आड़िल दीदी के घर ओखर पैतृक घर ले कारड अइस। पुतरा पुतरी के बिहाव के नेवता। चालीस बछर बाद मैं पुतरा पुतरी के बिहाव के नेवता कारड देखेंव। 18 के तेल,19 के मायन,20 के बारात निकलही।

लइकापन के पुतरा पुतरी के बिहाव के सुरता आगे। बात 1965-66 के बात आये। जब हमन ईदगाहभाठा म रहे बर गेन त अँगना म सुंदर बांस के मड़वा गड़ा के पुतरा पुतरी के बिहाव करेन। छोटे छोटे मटका म गोबर के डिजाइन बना के ओखर बीच म चावल ल हरा, पीला, लाल रंग म रंगके भरेन। आम पता लगा के करसा म दिया जलायेन। पहिली दर्जी घर ले नवा कपड़ा लान के पुतरा पुतरी ल पहिरावन। मड़वा म रखके रोचन पानी रखन। सब ल बलाये बर जावन। सब आके पूजा करके जावंय। पारा मोहल्ला म तो घर के बाहिर दूवारी म मड़वा गड़ावंय। अउ सब रद्दा चलत आके पूजा करके दस बीस रूपिया टिक के जावंय। 


ये अक्ति के रौनक अब नइ दिखय। शहर तो पूरा वैश्विक होगे हावय। छत्तीसगढ़ के तिहार अब लुप्त होवत हावय। येला बचाना बहुत जरुरी हे। कम से कम दू तीन परिवार मिलके  पुतरा पुतरी के बिहाव ल करके  हमर संस्कार ल बचावंय।

सुधा वर्मा 16/4/2026

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