समीक्षा -
हास्य और व्यंग्य का संतुलन छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह - झन्नाटा तुंहर द्वार
- डुमन लाल ध्रुव
छत्तीसगढ़ी साहित्य में लोकजीवन, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का चित्रण प्रमुख रुप से देखने को मिलता है। विशेष रुप से व्यंग्य साहित्य समाज की विसंगतियों, विरोधाभासों और विडंबनाओं को उजागर करने का एक सशक्त माध्यम रहा है। व्यंग्य के माध्यम से लेखक समाज की कमियों और समस्याओं को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि पाठक हंसते-हंसते गंभीर चिंतन करने के लिए प्रेरित हो जाता है।
इसी परंपरा में महेन्द्र बघेल का व्यंग्य-निबंध संग्रह “झन्नाटा तुंहर द्वार” एक महत्वपूर्ण कृति के रुप में सामने आता है। इस संग्रह में कुल 25 व्यंग्य निबंध संकलित हैं जिनमें लेखक ने सामाजिक जीवन की विविध स्थितियों और विसंगतियों को अत्यंत रोचक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
यह संग्रह केवल हास्य उत्पन्न करने तक सीमित नहीं है समाज की वास्तविक समस्याओं और मानवीय कमजोरियों को उजागर करता है। लेखक ने छत्तीसगढ़ी लोकभाषा की सहजता और लोकजीवन की गहरी समझ के साथ इन व्यंग्यों को प्रस्तुत किया है।
“झन्नाटा तुंहर द्वार” अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक है। ‘झन्नाटा’ शब्द तेज आवाज या अचानक उत्पन्न होने वाली हलचल का संकेत देता है।
लेखक मानो समाज के दरवाजे पर जोरदार दस्तक देते हुए उसकी कमियों और विसंगतियों को उजागर कर रहे हों। इस शीर्षक के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि इस संग्रह के व्यंग्य समाज को झकझोरने की क्षमता रखते हैं। यह पाठक के मन में उत्सुकता भी उत्पन्न करता है और यह संदेश देता है कि लेखक समाज की वास्तविकताओं को सामने लाने का साहस रखता है।
“झन्नाटा तुंहर द्वार” में संकलित सभी व्यंग्य निबंध अलग-अलग विषयों पर आधारित है लेकिन उनका मूल उद्देश्य समाज की विसंगतियों और समस्याओं को उजागर करना है। झन्नाटा तुहर द्वार, बेवस्था के चरणदास, बरेंडी म ईमानदारी, सपना के पंचनामा, अमृत चांटे के भरम, छांटत-छांटत अटल कुंवारी, पहाती के पांव, नेता चरित बखान, बछरु ढिलागे, बनौती बना दे, कुटनी चाल, कतका करंव बखान, सनपना म सवार गुटखा-सितार, हरियर आदेश म गुलाझांझरी, झपली ले झांक-झांक के झाऊ, कप-पलेट धोय के बेमझउवल विद्या, प्राशन-पाचन अउ पंचेड़ बुटी,
अल्प विराम के झोल म झुमरत समाज सेवा इन निबंधों में लेखक ने राजनीति, शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक दिखावा, अंधविश्वास और आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य किया है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसका सामाजिक यथार्थ है। लेखक ने समाज के उन पहलुओं को उजागर किया है जिन्हें सामान्यतः लोग अनदेखा कर देते रहे हैं। “बेवस्था के चरणदास” में प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियों और उससे लाभ उठाने वाले लोगों का चित्रण मिलता है। “बरेंडी म ईमानदारी” में ईमानदारी की गिरती स्थिति और अवसरवादी मानसिकता पर तीखा कटाक्ष किया गया है।
“नेता चरित बखान” में राजनीति के पाखंड और नेताओं के दोहरे चरित्र को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार “हरियर आदेश म गुलाझांझरी” में सरकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को उजागर किया गया है। इन व्यंग्यों के माध्यम से लेखक समाज के यथार्थ को पाठकों के सामने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें हास्य और व्यंग्य का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। लेखक ने समाज की विसंगतियों को कटु आलोचना के रुप में नहीं हास्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है। जब पाठक इन व्यंग्यों को पढ़ता है तो वह एक ओर हंसता है और दूसरी ओर समाज की वास्तविकताओं पर विचार करने के लिए भी प्रेरित होता है। यही व्यंग्य साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता होती है।
इस संग्रह में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन की झलक स्पष्ट रुप से दिखाई देती है। ग्रामीण समाज की सरलता, लोगों की मानसिकता, सामाजिक संबंधों की जटिलता और आधुनिकता के प्रभाव से उत्पन्न नई समस्याएं इन सबका चित्रण अत्यंत सजीव ढंग से किया गया है।
लेखक महेंद्र बघेल ने ग्रामीण जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को लेकर व्यापक सामाजिक अर्थ प्रस्तुत किए हैं। इस कारण यह संग्रह छत्तीसगढ़ी समाज का एक यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है।
“झन्नाटा तुंहर द्वार” की भाषा अत्यंत सहज और प्रभावशाली है। लेखक ने छत्तीसगढ़ी लोकभाषा का प्रयोग करते हुए व्यंग्यों को अत्यंत रोचक बना दिया है। लोक मुहावरों का प्रयोग, सहज और संवादात्मक शैली, हास्यपूर्ण कथन, ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग इन विशेषताओं के कारण यह संग्रह पाठकों के लिए अत्यंत रोचक बन जाता है।
हालांकि यह व्यंग्य-निबंध संग्रह है फिर भी इसमें कई ऐसे पात्र दिखाई देते हैं जो समाज की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। अवसरवादी नेता,
दिखावटी समाजसेवी,
व्यवस्था से लाभ उठाने वाले लोग, अंधविश्वास में फंसे व्यक्ति
आधुनिकता की दौड़ में भटकती युवा पीढ़ी ये पात्र केवल व्यक्ति नहीं समाज की मानसिकता के प्रतीक हैं। लेखक ने इन्हें अत्यंत जीवंत ढंग से प्रस्तुत किया है।
यह संग्रह वर्तमान समाज की अनेक समस्याओं को उजागर करता है। आज के समय में शिक्षा का व्यवसायीकरण, राजनीति का पतन, सामाजिक दिखावा,अंधविश्वास, उपभोक्तावाद इन सभी विषयों को लेखक ने अपने व्यंग्यों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
इस कारण यह संग्रह केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य में व्यंग्य-निबंधों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में यह संग्रह एक महत्वपूर्ण योगदान के रुप में सामने आता है।सामाजिक यथार्थ का प्रभावी चित्रण, छत्तीसगढ़ी भाषा का सशक्त प्रयोग, हास्य और व्यंग्य का संतुलन , लोकजीवन की गहरी समझ इन विशेषताओं के कारण यह संग्रह छत्तीसगढ़ी साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाता है। हालांकि यह संग्रह कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है फिर भी कुछ स्थानों पर व्यंग्य थोड़ा लंबा हो जाता है जिससे उसकी तीव्रता कुछ कम हो सकती है। इसके अतिरिक्त कुछ विषयों को और अधिक विस्तार से प्रस्तुत किया जा सकता था।
फिर भी समग्र रुप से यह संग्रह अत्यंत प्रभावशाली और पठनीय है।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
मोबाइल - 9424210208
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