कहिनी
*// पचरतन //*
- डोरेलाल कैवर्त
एकठन *सोनपान* गाँव जेन ह डोंगरी के खाल्हे म सुग्घर बसे रहिस।डोंगरी के सबो रुख राई ल काट डारे रहिन पूरा के पूरा चातर होगे रहय एकोठन खुटकुरी तको नि बांचे रहिस ते पाय के कतको झन मुंडा पहिरी घलो कहि देवंय। *सोनपान* गाँव के अलगेच चिन्हारी रहिस।गाँव भलेकुन छोटे रहिस फेर सुमता के डोरी जबर लम्बा लमे रहय।गाँव म खेती किसानी के संगे-संग बारी-बिरछा अऊ गाय गरुवा पोसे रहंय।गाँव म साग-भाजी के संगे-संग गोरस घलो हो जावय।घरो-घर दूध,दही घी अऊ पेउंस खाय-पीए बर मिल जावय।
गाँव के गरोसा ले लेके टीप खार सिवाना के छुवत ले धान उपजे।गाँव के खेत के माटी मटासी अऊ कन्हार रहय ते पाय के धान अऊ ओन्हारी भारी उपजे।खेत के मेड़ म राहेर अऊ तीली घलो उपजावत रहिन।गांँव के मनखे मन एक दूसर के काम ल जुरमिल के करंय अऊ एक दूसर ल अबड़ मया-दुलार घलो करंय।गाँव म सुमता के पीकी बाढ़े रहय अऊ उहाँ धरम-करम के काम घलो समे-समे म होबेच करय।जइसन गाँव रहिस ओइसन उहाँ के मनखे घलो रहिन।
*सोनपान* गाँव म करम सिंह जबर मयारुक किसान रहिस ओला गाँव के मनखे मन करमू कहंय।करमू करा पाँच खांड़ी के खेत रहय जेमा धान अऊ ओनहारी घलो उपजावय।ओहर बने चेत लगाके बूता करे कोनों किसिम के ओड़राही नि करे।कोन घाम कोन बरसा अऊ कोन जाड़ सबो समे म काम-बूता करतेच रहय।मंगइया-जचइया पौनी-पसारी मन ल देहे लेहे के पाछू खाय पीए बर पीग के पीग पूर जावत रहिस।
करमू जबर सीधवा के संगे संग सइताधारी रहिस।करमू अपन दाई-ददा के एकेझन बेटा रहय।करमू के महतारी घेरी-बेरी बीमार पर जावय त घर कोती के काम बूता नि हो पावय ते पाय के ओकर दाई-ददा मन बिहाव थोरिक जल्दी कर दे रहिन।करमू के गोसाईंन करमीन घलो सतवंतिन रहिस।दूबर-पातर गोल मुँहरन संवरेलही चुकचुक ले फभे रहय।ओहर मोटहा कोष्टहूं लुगरा पहिरे ओकर मूड़ कभू उघरा नि रहय।दूनोंझन जादा पढ़े लिखे नि रहिन फेर जिनगी जिए के सबो गुन कूट-कूट ले भराय रहिस।ओमन काकरो संग लड़ाई झगरा कभू नि जानिन।अपन काम ले काम दूसर चारी-चुगली म कभू नि रहंय।
बिहाव होय के एक बछर के पाछू भगवान ओला चिन्हिस।थोरिक दिन के पाछू ओहर आमा अमली खाय के सउंख करे लागिस।देखते-देखत म करमीन के कनिहा मोटाय धर लिस अऊ नौ महीना के पूरती दसवांँ के लगती म पीरा उसलगे करमू गाँव के सुइन दाई ल बला के लानिस अऊ फेर का घरेच म करमीन हरुगरु होगिस।पहलावंत सुग्घर नोनी के जनम होइस।गोल मुँहरन जोगनी कस दिखय अपन महतारी के मुँहरन म रहिस।
एक दिन रतिहा खाय पीए के पाछू सूते के बेरा खटिया म सुते-सुते दूनोंझन गोठबात करत रहिन।' हमर घर सुग्घर लक्ष्मी आए हावे जी!'......करमीन मुचमुचावत कहिस।' लक्ष्मी तो आय हावे ठीकेच कहत हावस फेर एकोझन नंगरिहा आ जातिस त मोरो नांगर धरे के थेभा हो जातिस!'.....करमू हुंकारु देवत कहिस।' नंगरिहा के अगोरा नि करन हमर इही लक्ष्मी आय अऊ लइका के सउंख नइ करतेन!'........करमीन फेरेच कहिस।' नंगरिहा आतिस त नांगर थेभे के संगे-संग हमर वंश घलो बाढ़तिस!'......करमू मुसकावत कहिस।
बछर दूइक गुजरे पाय रहिस कि करमीन फेरेच गरु देंहें होगिस।दस महीना के छांव छुवत म करमीन हरुगरु होइस त फेरेच पनिहारिन होइस।ओहू नोनी बड़ सुग्घर रहय अपन बहिनी के मुँहरन ल उतारे रहिस।नंगरिहा के अगोरा करत-करत करमू के घर सरलग चार झन नोनी होइस।चार झन नोनी के पाठ म एकझन बाबू होइस।नंगरिहा होइस कहिके करमू बड़ खुश होइस।पारा-परोस म मिठाई बंटवाइस।करमू के सबो लइका मन बड़ सुग्घर रहिन।
समे गुजरत गिस देखते-देखत म लइका मन बाढ़त गिन सबो लइका मन स्कूल जाय बर धर लिन।सबो पढ़ाई-लिखाई म बने हुशियार रहिन।ओमन पढ़ाई के संगे-संग खेलकूद म घलो चिभिक रहिस ते पाय के राज्य अऊ राष्ट्रीय स्तर के खेलकूद म ओमन के चयन होत रहिस।एतकेच भर नि रहिस पढ़ाई के संग संगीत कोती रुझान रबेच करिस।पढ़ाई संग-संग घर के सबो बूता-काम घलो बने चिभिक लगा के करंय।ओकर बेटा अपन ददा के संग खेती के काम घलो धीरे-धीरे सीखत गिस।समे के अनुसार कलम के संग-संग नांगर घलो चलावत गिस।
बड़े नोनी के नांव सोमबती,मंझली के मंगली आंतर मंंझली के बुधवारा छोटे नोनी के गुरबारी अऊ बाबू के नांव इतवार धरे रहिन।बाबू छोटे रहिस ते पाय के सबो ओला जादा मया करंय।ओहर सबो के दुलरुआ रहय।इतवार घलो बड़ सुग्घर रहिस ओहर अपन ददा के पानी ल उतारे रहिस।सबो लइका देखते-देखत बाढ़त गिन।करमू के पाँचो लइका स्कूल पढ़े बर जावंय ओमन पढ़े-लिखे म हुशियार घलो रहिन।
कहे गे हावे कि मनखे के सुघराई ओकर चरित्र ले होथे।मूड़ ऊपर करके रेंगे बर चरित्र ल सुग्घर रखे बर परथे।मनखे के चित्र के नइ भलुक चरित्र के अभिनंदन होथे अऊ मनखे के नइ ओकर मनखत्व के पूजा करे जाथे।चाय अऊ चरित्र गिरथे त दाग लग जाथे ते पाय के सबले बड़का धन तो चरित्र हर आय।करमू के सबो लइका मन सुघराई के संगे-संग ओमन के चरित्र अऊ सुभाव ह घलो सुग्घर रहय।चाल अऊ चरित्र सुग्घर रहे म मनखे ल आघू बढ़े बर कोनों नि रोक सकें।करमू के लइका मन के सुभाव अऊ चरित्र के गोठ गाँव म होबेच करय।
' बाबू के अगोरा म परिवार बाढ़ गिस,देखव तुमन ल कहत रहेंव जी अब लोग-लइका के सउंख नइ करन! '......करमीन कहिस।' पाँच झन लइका हावे त का होइस? इही पाँचो झन हमर *पचरतन* आय! '..... समझावत करमू कहिस।' बाबू के देखत म हमर परिवार बाढ गिस ! '......करमीन फेरेच कहिस।' परिवार बाढ़ गिस त का होइस? सबोझन ल बने पढ़ाबो लिखाबो! '......करमू कहे लागिस।' लइका मन के गुरुजी बतावत रहिस कि हमर लइका मन पढ़े-लिखे म बने हुशियार हावें!'.......करमीन कहिस।' बने पढ़ लिख के कुछू न कछू नौकरी पाबेच करही!'......करमू कहिस।' हमर इतवार तो इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हावे!.....करमू खुशी मन ले कहिस।
बने-बने म समे कइसे पहा जाथे पता नि चले।देखते-देखत म ओकर पाँचो लइका बाढ़ गिन अऊ बने पढ़-लिख डारिन।समे कोन केरवटिया लिही कोनों नि जानय।फेर का एक-एक करके धीरे-धीरे ओकर पाँचो लइका सरकारी नौकरी पावत गिन।दूनों बड़े नोनी मन शिक्षाकर्मी एक अऊ दू होगिन।तीसरइया नोनी पटवारी अऊ चउंथइया नोनी नर्स होगिस।ओकर बेटा इतवार बिजली विभाग म इंजीनियर के नौकरी पाइस।
समे बलवान होथे सबो ल जनवा देथे। ' देख मैं तोला कहत रहेंव हमर लइका मन नौकरी पा जाही! '......करमू कहिस।' अपन बल-बूता म पाइन हावें ओमंन के मिहनत रंग लानिस!'....करमीन कहिस।' हमर डीही म दीया बरइया घलो हावे तोला कोनों संसो करे के जरुरत नइ हे!'......समझावत करमू कहिस।' लइका मन बाढ़ के अपन पांव म खड़े होगिन अब एमन के बर-बिहाव कर देतेंन!'...... करमीन कहिस।' ठीक कहत हावस!'....मुड़ डोलावत करमू कहिस।करमू लइका मन के बिहाव करे बर लड़का खोजे के शुरु करिस।
सबो लइका मन के ओसरी-पारी बिहाव करत गिन।नोनी मन जइसन रहिन ठीकेच ओइसन सुग्घर दमाद घलो मिलगिस।सबो नोनी मन के बिहाव करके ससुरार भेजिन अऊ अपन बेटा बर सुग्घर बहुरिया घलो पाइस।बहुरिया घलो बने बुतकरिन रहिस।जइसन बेटा वइसन बहुरिया।कहे गे हावे भगवान जेला देहे बर रहिथे तेन ल छप्पर फोर के देथे।ठीक वइसनेच करमू के करम लिखाय रहिस।करमू अऊ करमीन के पाँचो लइका सिरतोन उंकर " *पचरतन* " निकलिन संगे-संग *सोनपान* गाँव के नांव ल सुरुज के अँजोर कर बगराइन।
✍️ *डोरेलाल कैवर्त*
*(कवि, कहानीकार)*
*तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*
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