छत्तीसगढ़ी कहानी -- *भउजी के मया*
हमर घर में भैया सबसे बड़े रीहिस, बड़े दीदी चन्द्रप्रभा अउ अरुण लता के बिहाव होगे रीहिस, ये दूनो बिहाव के बखत भैया के बिहाव के बात घर में चले, त भैया बात ला टार दे, भैया के बिहाव के इरादा नई रीहिस लेकिन जब मनगटा वाले भतीजा टेकराम के बिहाव में गेन त उहॉं हमन ला पैरी के बड़हर किसान के बेटी के पता चलिस जेन हा हमर परिवार के लाइक संस्कारी हवे। त हमन सबे कोई भैया ला बिहाव बर तैयार कर लेन त भैया एक शर्त राखिस "ओकर नाम तृप्ति होना चाही।" ये शर्त ला हमन मान लेन, ले ठीक हे भैया, ओकर नाम कहीं राहय, हमन लड़की के नाम बदल देबो। फेर तय समय में हमन पैरी के पता लेके उहॉं भाभी ला देखे बर चलदेन। हमन ला पसंद आईस त वहू मन घर देखे बर आईन, बात आगू बढ़िस अउ सगाई के बाद भैया के बिहाव के तैयारी चालू होगे, हमन भारी जोश में बरात जाय के तैयारी करत रेहेन। बरात हमर गॉंव कोहंगाटोला के प्रायमरी स्कूल के परछी ले पैरी राजनॉंदगॉंव जायबर रीहिसे। मोटर गाड़ी के काफिला स्कूल के आगू सड़क के तीरे तीर खड़े हो गे रीहिस । बाबूजी गुलाबी साफा गुलाबी बंगाली अउ झक्क धोती पहिरके तैयार घर के बैठक खोली में नेंग जोंग के इंतजार करत रीहिस, गॉंड़ा बाजा में मौर सौंपे के संदेशा जावत रीहिस। घर अंगना हरदी के महक में मार महर महर करत रीहिस। सगा सोदर में घर सिगबिग-सिगबिग करत रीहिस, बरात जायबर सब नवॉं-नवॉं कपड़ा पहिरे तैयार होगे रीहिन। भैया के राजकुमार बरोबर सजावट देखनौट रीहिस।
बिहनिया नौ बजे गाड़ी मोटर के रेला पैरी गॉंव बर निकलगे। एक घंटा में राजनांदगाँव पहुँच के मानव मंदिर होटल में चाय नाश्ता पानी पीयेन, ताहने काफिला फेर आगू बढ़गे, बीस मिनट में अर्जुनी अउ पॉंच मिनट में पैरी, कइसे पहुँचगेन पता नइ चलिस। बरात स्वागत सुरता करे के लाईक होइस, पूरा गली घुमावत सिक्का के बौछार करत भैया के खुशी देखके मोर मन गरब ले भरगे रीहिस। भीखम दाऊ के छोटे बेटी कैलाश जेन ला हमर घर में सबे झन मन तृप्ति काहय, हमर घर के बहू अउ मोर भाभी बनगे।
बिहाव के रसम-रिवाज निपटगे रीहिस। भउजी बर कोहंगाटोला नवा रीहिस, फेर ओकर व्यवहार ले अइसन कभू नई लागिस कि ओहा पराया घर आए हवय। पहली दिन ले ही ओहा बाबूजी के दवई गोली अउ घरू बुता में मॉं के हाथ बटाए में जुटगे। भाभी के गुन के बखान पूरा गॉंव करत रीहिस। हमर बर ओहा भउजी कम, अउ बड़े दीदी या दाई समान जादा रीहिस। मोर बर तो ओहा ढाल बनगे रीहिस, जब कभू बाबूजी या भैया मोला कोनो बात में डाँटय, त भउजी बीच में दीवार बन के आ जावय अउ कहय- "अभी तो लइका हवे, का बात हे बताव में कर दुहूँ। एकर मन नईय त एला थोरिक सुस्तावन देव।" ओकर हाथ के रांधे सबे साग मन में गजब के सुवाद राहय, फेर जेन दिन अदौरी बरी या जिमी कांदा के साग होय, सबके खुराक चार कॉंवरा बाढ़ जाय। मोर छोटे बहिनी गुडिया मुन्नी अउ सुमति लुपेश बर ओहा सहेली बनगे रीहिस। राजनांदगाँव असन संस्कारधानी सहर तीर ले आय रीहिस त नवा तरीका के चोटी गुंथई होवय या लुगरा पहिरे के ढंग, भाभी सबे बात ला बड़ मया ले सिखावय। ओकर कोठी अउ पेटी ले हमेशा हमर मन बर कुछ न कुछ उपहार निकलत रहय।
भाभी एक महीना में घर ला ऐसे सजाईस कि हमर घर स्वर्ग बनने रीहिस। मुहॉंटी खिड़की में परदा, छत में झूमर टंगागे, पूजा खोली में झालर त रेंगान परछी में चकाचक लाईट लगगे। संझा बिहनिया घर के मुहॉंटी, तुलसी चॉंवरा, कोठा, अउ भगवान मन में दीया जला के मॉं बाबूजी भैया अउ हम सबे मन के पॉंव परके सबे ले आशीष लेवय। शुरू-शुरू में जब भी भाभी मोर पॉंव परे त मैं हमेशा रोकँव, तब मॉं काहय, हमर छत्तीसगढ़ में ननंद देवर के भउजी ह पॉंव परथे गा, इही हमर संस्कृति आय। भाभी के चहक के गोठियई अउ लपकके पॉंव परई मोला आज भी सुरता आथे। कोठा के गाय बछरू मन के वो हा ऐसन धियान रखे कि सबे मन छल-छल, छल-छल दीखे। ओहा कहय- "इही कोहंगाटोला अब मोर करम के भुइँया आय, अउ इहाँ के हर मनखे मोर परिवार।"
हम सबे मोर अउ सबे बहिनी के जबान में भाभी, बाबूजी के मुहूँ में बहू त मॉं अउ भैया के जबान में तृप्ति-तृप्ति ही समाय रीहिस । घर के सबे जिनिस ला सकेले अउ सबे मनखे ला सम्हाले के जिम्मेदारी सिर्फ भाभी के ही रीहिस। बाबूजी के सबे कपड़ा जैकेट कोट अउ ओकर गुलाबी साफा ला सहेज के रखना अउ ओकर बेरा-बेरा में दवाई-पानी के धियान रखना ओकर पहली काम रीहिस।
भउजी ह पूरा रसोई के जिम्मेदारी अइसन सँभालिस कि हमर घर के अंगना फेर ले चहके लगिस।
नत्ता-गोत्ता या गाँव के कोनो भी लइका सियान या घर खेत के कमैय्या मन घर आतिस, त भाभी ओकर अइसन मान-गोन करय कि आदर पवैया मन आशीर्वाद देवत नई थकय।
जब भी भैया या में हा कोनो काम से बालोद जावँव त भाभी ह मुस्कुरावत झोरा संग समान के लिस्ट दे के काहय- "एमा के कोनो समान नइ छूटना चाही, सबे समान ल लाना जरूरी हे, समान के सुचि में बहिनी मनके खाय पीये के फरमाइश के लिस्ट तको समाय राहय।
सहिच्च में 'भउजी के मया' ह हमर घर बर ओ अमृत समान रीहिस, जेकर छाँव में हमर पूरा परिवार एक सूत्र में बंधगे। कोहंगाटोला के तब के हमर घर में काम करैया मनखे मन आज घलो भाभी के सुग्घर सुभाव के गवाही देथे।
भउजी के शालीनता के गोठ गाँव भर में रीहिस, फेर एक बेर अइसन घटना घटिस जेकर ले हमर घर अउ कोहंगाटोला के मनखे मन जान गे कि भउजी सिरिफ सुग्घर नई, बल्कि भारी हिम्मत वाली घलो हवय।
ओ अषाढ़ के शुरुआती महीना रीहिस, बादर अइसन घपटके गरजत रीहिस कि कान के परदा फाट जावय। भैया कउनो काम ले दुरुग गे रीहिस अउ घर में मैं, मोर छोटे बहिनी गुडिया, मुन्नी,सुमति, लुपेश, मॉं अउ बाबूजी रेहेन। मंझनिया के बखत अचानक बाबूजी के पेट में भारी पीरा उठीस ओहा दरद के मारे छटपटाए लगिस, मॉं तो रो-रो के बेहाल होगे, मोर घलो हाथ-गोड़ फूलगे कि एतका झड़ी में डॉक्टर करा कइसे जाबो?
तभे भउजी भीतर खोली ले निकलिस, ओकर चेहरा में डर नई, बल्कि एक संकल्प रीहिस। ओहा कीहिस-
"मॉं, तैं झन डर्रा, बाबूजी ला कुछू नई होय। मोर भैया मन कहिथें कि हिम्मत हारे ले रद्दा नई मिलय।"
भउजी ह तुरंत घर के परछी में रखे फटफटी ला मोला निकाले ला कीहिस "चल, हमन ला अभी बलौद के हमर परिवारिक डॉक्टर बी.के क्लाडियस के अस्पताल जाना हे।" मैं हचकचा गेव— "भउजी, अत्तक झोर झोर के पानी में?" फेर ओकर आँख़ी के चमक देख के मैं चुपचाप गाड़ी में चढ़गेंव। बाबूजी ला गाड़ी में बैठारके के भाभी पाछू में बैठगे। रद्दा भर भउजी ह बाबूजी के हियाव करत ओकर हिम्मत बढ़ावत रीहिस। कोहंगाटोला जुंगेरा के बीच रद्दा में नरवा उफनत रीहिस, गिट्टी सड़क, खड़बड़-खड़बड़ चलत चक्का सड़क पाई के एक ठन बड़ेजन पखरा में फँसगे।
त भउजी संकोच नई करिस, ओहा गाड़ी ले उतरिस अउ मोर संग मिलके पहिया ले पथरा ला टारे में जोर लगा के सहयोग करिस। ओकर नवा लुगरा चिक्कन माटी मुरुम में लथपथ होगे, ओकर मेंहदी वाले हाथ गोड़ माटी-माटी होगे, फेर ओकर धियान सिरिफ बाबूजी के उखड़त सॉंस कोती रीहिस।
अस्पताल पहुँचेन त डॉक्टर कीहिस- "थोरिक अउ देरी होय रहितिस त अनर्थ हो जातिस। भगवान ला धन्यवाद देव जेहा एतका जल्दी इहाँ ले आनिस।" जब बाबूजी नीक होके घर लहुटिन, त ओमन भाभी के मुड़ में हाथ मड़ा के रो डारिन। बाबूजी कहिन— "बेटी, तैं मोर बहू नई, तैं तो मोर बेटा बनके मोर परान बचाय हस।" भउजी ह मुस्कुरावत कहिस— "बाबूजी, ससुरार ह सिरिफ पति के घर नई होवय, एहा तो एक बेटी के नवा जनम होथे। अउ बेटी अपन दाई-ददा ला का अइसन तकलीफ में देख सकथे?"
ओ दिन ले कोहंगाटोला में भउजी के मान अउ बढ़गे। सबो जानगे कि भउजी के मया सिरिफ मीठ-मीठ गोठियाए में नई, बल्कि विपत के बेरा में पहाड़ बनके ठाढ़े होय में हवय।
तीजा के तिहार हा छत्तीसगढ़ में दाई माईं मन के विशेष तिहार होथे, ये तिहार ले दूनों के अटूट नाता हवय। जब भादो के महीना आइस, बादर हर करियाए लागिस, त भाभी के आँखी में अपन मायके जायके थोरिक आस जगे लागिस।
एक दिन संझा के बखत घर के मुहॉंटी में मोटर साइकिल के हार्न बाजिस। देखेन त भाभी के ददा अउ ओकर बड़े भैया ओंकार पहुँचे रीहिन। भाभी के चेहरा अइसन खिलगे मानो कउनों करिया बादर के बीच ले सुरुज निकल गे होवय। ओहा दउड़ के अपन ददा अउ भइया के पॉंव परिस।
मॉं बाबूजी घलो सगा मन के खूब खातिरदारी करिन। रातकुन जेवन के बाद घर परिवार खेती किसानी के गोठ-बात चलीस अउ बिहनिया तीजा जायबर जल्दी तैयारी के फरमान जारी होगे। भउजी के मन मगन रीहिस, फेर जइसन-जइसन ओहा घर कोती देखिस, ओकर चेहरा में चिंता के लकीर उभर आइस। ओहा रसोई में गीस त देखिस , दाई के गोड़ के पीरा बाढ़ गे हवय, ओकर ले जादा काम नई होवय। बाहर देखिस त बाबूजी के चश्मा टूट गे हवय अउ ओमन ला पेपर पढ़े में तकलीफ होथे। फेर ओकर नजर मोर छोटे बहिनी मन ऊपर गीस।
फेर का भाभी सोंच में पड़गे "मैं ह चल दूहूँ त अतका बड़े परिवार ला कोन सँभालही ? बाबूजी के बेरा-बेरा के चहा, दाई के दवाई अउ देवर-ननंद के खाय-पीये के धियान कौन राखही ?"
बिहनिया जब जाय के बखत आइस, ओंकार ह पोटली सँभालिस, फेर भाभी अपन परछी में ठाढ़े होगे। ओकर आँखी में आँसू रीहिस, अउ मन में दृढ़ निश्चय। ओहा अपन ददा करा गीस अउ हाथ जोड़ के कहिस— "ददा, मोला छमा कर देबे। ए साल मैं तीजा जाय बर असमर्थ हौं।"
सबो झन अकचकागे। ओंकार कहिस— "काबर बहिनी ? पहिली तीजा आय, सबो मनखे तोर रस्ता देखत हें।"
भाभी ह मुस्कुरावत बड़े मया ले कहिस:
"भैया, बिहाव के बाद बेटी के दू ठन घर हो जाथे। एक घर जेहा ओला जनम दीस, अउ दूसर घर जेहा ओला सरबस मान के अपन लीस। अभी मोर ये घर ला मोर जादा जरूरत हवय। दाई के तबीेयत ठीक नइ हे, बाबूजी ला धुंधला दिखत हवय। अगर मैं अपन सुख बर ये मन ला छोड़ के चल दुहूँ त मोर मन उहाँ मायके में कइसे लागही?"
ओहा अपन ददा ले कहिस "ददा, इहॉं के स्थिति बड़ा बिपरीत हे, मॉं के माड़ी पीराथे, बाबूजी को पोट, स्थिति तीजा मनाय ल जाय के ल इक नइ हे। मैं इहें रहिके उपवास करहूँ अउ तुम सब के सुखी जीवन बर महादेव ले अरजी लगाहूँ।"
भाभी के ये बात सुन के ओकर ददा के ऑंखी भर आइस। ओमन कीहिन— "बेटी, तैं हमर खानदान के नाम उजागर कर देस वो, ससुरार ला अइसन मान देवया लइका भाग ले मिलथे।"
ओ दिन कोहंगाटोला के मनखे मन देखिन कि **भउजी के मया'सिरिफ मायके जाय के जल्दी में नई, बल्कि अपन ससुरार के सेवा ला ही तीजा के असली 'नेंग' माने में हवय। बड़े भैया ओंकार अउ ओकर ददा भारी मन ले फेर गर्व के साथ पैरी लहुटगे। भाभी ह अपन आँसू पोंछिस अउ दाई बर काढ़ा बनाए बर रसोई में खुसरगे।
भादो के अँधियारी रात बीत गे अउ तीजा के वो सुग्घर बिहनिया आईस, जेकर रस्ता छत्तीसगढ़ के हर बेटी देखथे। भउजी ह अपन मन ला त मार ले रीहिस, फेर जब घर में मोर बड़े बहिनी परभा ह तीजा मनाए बर पहुँचिस त माहौल हर अउ भावुक होगे।
तीजा के एक दिन पहिली 'करूभात' खाय के रसम चलत रीहिस। परभा दीदी ह मइके आके गदगद रीहिस, फेर जब ओहा भाभी के चेहरा ला देखिस, त ओला समझ आगे कि ओकर मन भीतर ले कतका रोत होही। भउजी ह परभा अउ अरुन दीदी बर ठेठरी खुरमी चौसेला, बरा , भजिया अउ सुहारी खीर बनाय के तैयारी करत, रीहिस, फेर ओकर सुरता अपन मइके के गली, सहेली मन संग नंदिया अउ अपन नान-नान भतीजा-भतीजी मन के तोतली बोली में अटक गे रीहिस। जब सबो झन संग बइठ के करूभात खाय बर बइठिन, त भाभी के आँखी ले टपटप आँसू चुरुवा धार ओकर थारी में गिरे लागिस। ओहा आँसू ला लुकाय के कतको कोशिश करय, फेर मइके के मया के खिंचाव अइसन रीहिस कि ओकर सुध-बुध हरागे। भैया ह चुपचाप ये सब तमाशा देखत रीहिस। ओला एहसास होगे कि जउन भउजी ह पूरा घर बर अपन खुशी ला त्याग दीस, आज ओकर मन अपन मइके बर कतका तड़पत हवय।
करूभात खाय के बाद, भैया ह मोला बलाइस अउ सबके आगू में कहिस-
"अशोक, काली बिहनिया गाड़ी तैयार रखबे। परभा, अरुण आगे हवय, त अब तृप्ति के मइके जाय के रस्ता में कउनो बाधा नई होना चाही। दाई के सेवा परभा कर लेही, तैं अपन भउजी ला ओकर मइके अमराय बर जाबे।"
मोर खुसी के ठिकाना नई रीहिस, भैया के मुँह ले ये हुकुम सुनके भाभी के चेहरा अइसन दमकिस, मानो मुरझाए फूल में कोनो पानी डार दे होही। ओकर आँसू ढरकत आँखी में अब झिलमिल खुशी नाचत रीहिस। ओहा लजावत मुस्कुराहट के साथ भैया कोती देखिस अउ ओकर मन अइसन हल्का होगे कि ओहा दउड़ के अपन पोटली सँभाले बर चले गे।
बिहनिया जब मैं भउजी ला गाड़ी में बइठा के ओकर कोहंगाटोला ले विदा करे बर निकलेव, त ओहा रस्ता भर अपन भतीजा-भतीजी मन बर बिसाए खिलौना अउ मइके बर राँधे रोटी पीठा के गोठ गोठियात रीहिस। ओकर चहकन देख के अइसन लागिस कि मानो कोनो चिरई ला पिंजरा ले उड़ाय के आजादी मिल गे हवय।
रस्ता भर भाभी हा अपन मइके, नान्हे नान्हे भतीजी भतीजा अउ सहेली के गोठ करत रीहिस। जब हमन ओकर गाँव पहुँचेन, त भउजी के खुशी देखके मोर घलो मन भर आइस। अइसन लगिस कि मया ह सिरिफ सेवा करे में नई, बल्कि एक-दूसर के भावना ला समझे में घलो हवय।
तीजा के बिहान दिन देखेन गॉंव पैरी के रंग-ढंग ही बदल गे रीहिस। गॉंव के गली-खोर मन छिहिल-छिहिल, सिगबिग-सिगबिग करत रीहिस। कोनो कोती लइका मन के शोर, त कोनो कोती सहेली मन के ससुरार के गोठ-बात। सुरुज के पहिली किरन के संग ही घर-घर में चहल-पहल सुरू होगे रीहिस।
मैं भाभी ला पैरी अमराके घर लहुटगेंव त एती तेवर मंझनी मंझना भोथली वाले बड़े जीजा के आगमन हो गे रीहिसे। जीजा के चेहरा में थोरिक हड़बड़ी रीहिस। खाना खायबर बइठत खनी , ओमन कहिन— "ए समे बस तीजा के नेंग निभाय बर आ गे हे मॉं ! खेत में रोपा के तैयारी जोरों में हे अउ धान नींदाई के बुता घलो मुँह बाए ठाढ़े हवय। सावन के पानी ह अइसन झड़ी लगाय हवय कि थोरिक घलो ढील देवन त नींदई-कोड़ई पिछड़ जाही।"
बाबूजी घलो किसान मनखे, ओमन बात ला समझिन अउ कहिन— "बेटा, खेती-किसानी के बुता पहिली आय, प्रभा ला झटपट तैयार करो।"
दीदी के ससुरार जाय के तैयारी चलत रीहिस, मॉं ह प्रभा दीदी के पोटली में ठेठरी,खुरमी, बरा सुहॉंरी तिखूर जोर दीस अउ कहिस-"बुता के मारे हड़बड़ाव झन, धीरलगहा जाहू, जाहूँ त थोरिक आराम घलो कर लुहू, चाहने कमई लबो जिनगी भर हे। अउ ये चिवड़ा-शक्कर धरलेव, खेत जाय के बेरा काम आही।"
जब जीजा ह प्रभा दीदी ला लेगे बर ठाढ़े होइस, त मॉं के ऑंखी भर आइस। सोंचत रीहिस, जाते भार मोर बेटी हा झौंहा बासी धरके खेत जाही सँभाले ला पड़ही। अइसन लागिस मानों भउजी बर 'मया' के मतलब सिरिफ अपन सुख नई, बल्कि सबके दुख-सुख ला अपन मान लेना आय।
जैसे ही हमर गाड़ी भउजी के गॉंव के सरहद में परवेस करिस, भउजी के चेहरा अइसन दमक उठे लागिस मानो कतको बछर के पियासी भुइँया ला पहिली बदरा मिल गे होवय। कोहंगाटोला ले निकले के बेरा जउन भउजी गंभीर अउ फिकिर में डूबे रीहिस, अपन मइके के माटी ला देखत खने ओहा फेर ले ओही 'नवा-नवेली' बेटी बन गे।
भतीजा-भतीजी मन के सोर
गाड़ी के अवाज सुनके भउजी के भतीजा-भतीजी -रोहित, नीरू, चुम्मन, मीनू, बीना -दउड़त आइन। "दीदी आगे! बुआ आगे!" कहिके ओमन भउजी ले अइसन लिपट गे कि भउजी अपन झोरा घलो भुइँया में डार दीस। ओहा सबो ला कोरा में उठाइस, चुम्मा लीस अउ ओकर आँखी ले खुशी के आँसू बोहाए लागिस।
ओही परछी, ओही मया
मइके के डेहरी, देखते भार भाभी ह अपन दाई के गोड़ ला धरीस अउ रोई डारिस। दाई ह ओकर मुड़ अउ गाल ला सहलावत कहिस— "बेटी, तीजा के रस्ता देखत-देखत मोर आँखी पाक गे रीहिस, पर जानत रेहेंव कि तैं जरूर आबे।"
ससुरार में भउजी जउन सलीका अउ गंभीरता ले रहय, उहॉं ओहा चिरई कस एकदम चंचल होगे। अपन सहेली मन ला देखके ओकर संग 'फुगड़ी' खेले के गोठियाय लागिस। ससुरार ले जउन रोटी पीठा, ठेठरी खुरमी ले गे रीहिस, ओला सबो ला बाँटिस। फेर अपन दाई के हाथ के राँधे 'अंगाकर रोटी अउ बंगाला के चटनी' खाके ओहा कहिस-"दाई, ये सवाद बर त मैं तरस गे रेहेंव।" ओहा अपन सहेली मन संग नंदिया कोती चल दीन , जिहाँ बचपन में ओमन खेल खेलके बाढ़े रीहिस। गॉंव के गली-खोर में सबो सियान मन के पॉंव परत दुलार बटोरत रीहिस।
मइके में भउजी बर कोनो 'बुता' नई रीहिस। ओकर भैया ओंकार कहय- "तैं इहॉं मेहमान हस, बस आराम कर।" फेर भउजी कहाँ मानय? ओहा अपन दाई के हाथ ले बाहरी छीन लेवय, रसोई में घुस के अपन पसंद के साग राँधय अउ भतीजा मन ला कहानी सुनावय।
भउजी के चेहरा में ओ सुकून दिखत रीहिस, जउन सिरिफ अपन 'महतारी के अँचरा' के नीचे मिलथे। कोहंगाटोला के बहू 'तृप्ति' आज फेर ले अपन गॉंव के 'कैलाश' बन गे रीहिस। ओकर हँसई अउ खेलई देख के अइसन लागिस कि मानो समय ह उहें रुक गे हवय।
भउजी के मइके जाय के खुसी ह अइसन लागिस मानो दू दिन में हवा कस उड़ गे। अभी त मइके के माटी के महक ओकर लुगरा ले गे घलो नई रीहिस कि भउजी ह अपन ससुरार कोहंगाटोला वापस आ गे। फेरि वापस आते भार भाभी के सुभाव अउ तबियत थोरिक बदले-बदले लागे लागिस।
बिहनिया के बखत भउजी ला अचानक जोर के उल्टी सुरू होगे। ओकर चेहरा पीला पर गे रीहिस। मैं अकबका गेंव, मोला लागिस कि रस्ता के थकावट या बासी-तिरासी खाए ले भउजी के पेट गड़बड़ागे हवय। मैं दउड़ के बाबूजी के दवई पेटी ला निकालेंव अउ ओकर ले उल्टी के एक ठन गोली निकाल के भाभी करा ले गेंव।
मैं केहिंव— "भाभी, ये ले गोली खा ले, मन ह शांत हो जाही।"
गोली ला देखके मोर कोती देखत भाभी के आँखी में एक अजीब से चमक अउ लज्जा आ गे। ओहा मोर गाल में धीरे ले एक ठन थपकी मारिस अउ मुस्कुरावत कहिस
"चल पगला गे हस का? अइसन बेरा में अइसन गोली नई खाय जाय।"
एतका कहिके भउजी ह अपन लुगरा के पल्ला ले अपन मुँह ला तोप (ढक) लिस अउ लजावत भीतर खोली कोती भाग गे। मैं त अवाक रह गेंव, मोला समझ नई आइस कि भला उल्टी होवत हवय त दवई काबर नई खाना हवय?
मोर 'लइका बुधि' ला देखके मॉं ह दउड़ के आइस अउ भउजी के चेहरा ला देखके ही सब जान डारिस। मॉं के चेहरा अइसन खिल गे मानो ओकर तीजा के सबले बड़े असीस मिल गे होवय। मॉं ह मोला घूर के देखिस अउ कहिस— "अशोक, तैं अभी नई समझबे रे, एहा बीमारी नई, एहा तो महादेव अउ संतोषी माता के किरपा आय।"
बस, फेर का रीहिस! घर भर में खबर फैल गे। बाबूजी जे चश्मा के बिना धुंधला देखत रीहिन, ओकरो आँखी में नवॉं चमक आ गे। मॉं ह तुरंत भाभी बर 'अमली के कुरमा' ले आनिस अउ साग बना के सुहॉंरी-भजिया संग खवाय ला सुरू कर दीस।
कोहंगाटोला के हमर घर में अब नवाँ मेहमान के अगोरा सुरू होगे। भाभी के मया जउन अभी तक हमर बर रीहिस, अब ओहा एक 'महतारी' के ममता में बदले बर तैयार रीहिस।
भैया ह सहर ले अब भउजी बर फल-फूल अब जादा लाने दूध दही घी तोघर मे निमगा राहयेच।
दाई ह पुराना लुगरा मन ला सहेज के 'कथरी' सीये के गोठियाय लागिस।
मैं अउ मोर बहिनी मन 'भतीजा' होही कि 'भतीजी' एकर गोठ रोज करत राहन।
भउजी के 'मया' अब हमर घर के कोना-कोना में गूँजत रीहिस। ओकर ओ लजाना अउ मोर गाल में थपकी मारना, मोला आज घलो सुरता आथे। अइसन लागिस कि तीजा के उपवास अउ भउजी के त्याग के फल महादेव ह 'खुसखबरी' के रूप में हमर झोली में डारे हवय।
कोहंगाटोला के हमर घर में खुसी के अइसन दीया बरिस कि घर के कोना-कोना अंजोर होगे। जब दाई ह भीतर खोली ले निकल के बताइस कि— "बहू ह बेटी जने हवय!" त बाबूजी के सीना गरब ले चौड़ा होगे। गॉंड़ा बाजा त नई बाजीस, फेर हमर मन के भीतर मया के शहनाई बाजे लागिस।
नवा मेहमान के आए के कुछ दिन बाद, जब नामकरण (छट्टी) के बेरा आइस, त सबो झन बइठ के विचार करे लागिन। कोनो कहय 'राधा' त कोनो कहय 'रुक्मणी' राखबो, त कोनो कछू अउ। तब भैया ह सबला चुप कराइस अउ मोर कोती देख के कहिस— "अशोक ह साहित्यकार हवय पढ़ई-लिखई में तेज हवय, अउ अपन भाभी के सबले लाडला देवर आय, त नाम धरे के जिम्मेदारी एही ला दे जात हवय।"
मैं त अइसन मगन होगेंव कि मानों मोला कउनो राज-पाट मिल गे हवे। मैं दउड़ के भउजी करा गेंव। भउजी ह अपन कोरा में ओ नान-मुन लइका ला सुताय रीहिस। नोनी के रंग थोरिक सॉंवली रीहिस, फेर ओकर आँखी मन अइसन चमकत रीहिन मानो रात के अकास में तारा मन जगमगावत हें।
मैं उत्साह में ओकर कोमल हाथ ला धरेंव अउ जोर ले केहेव:
"भैया, मैं ह नाम सोच डरे हौं... हमर ये नानकन चिरई के नाम 'कोयल' होही!"
भाभी ह मुस्कुराहट के साथ मोला देखिस अउ कहिस— "कोयल? बड़े सुग्घर नाम हवय छोटे। कोयल के बोली जइसन मीठ, वइसने हमर बेटी के सुभाव घलो होही।"
बाबूजी हा अगुवा के माधुरी नाम धर डरे रीहिस, वो हा माधुरी कहिके ही मया करे, फेर ओला घलो ये नाम भारी भाईस। ओमन कहिन- "छत्तीसगढ़ी माटी के असली पहिचान आय कोयल। ये हमर कोहंगाटोला के बगिया ला अपन बोली ले गुंजित रखही।"
बस, ओ दिन ले हमर घर के ओ नन्ही मुन्नी 'कोयल' चहके लागिस। भउजी के मया अब ओकर ममता में समा गे रीहिस। भउजी ह कोयल ला दूध पियावत कहय— "देख कोयल, तोर कका ह तोर नाम कतका सोच-समझ के राखे हवय, तैं घलो अपन कका कस बुद्धिमान बनबे।"
भाभी के ओ ममतामयी मया अउ कोयल के वो किलकारी हमर परिवार ला एक अइसन सूत्र में बाँध दीस, जेकर सुगंध आज घलो मोर मन में महर-महर करत हवय।
कोयल के छट्टी में अब्बड़ धूम मचिस, नाम रखेन लेखमनीषी, फेर जइसन-जइसन दिन बीतत गीस, ओकर रूप-रंग निखरत गीस। मैं ह सोंचे रहेंव कि सॉंवली होही, फेर कोयल तो अब्बड़ सुन्दर अउ छक्क गोरी निकलीस। ओकर गोरा बदन अइसन चमकय मानो कउनो ह सॉंचे में ढाल के लछमी के मूरत हवय। हमर घर में, जिहाँ कभू-कभू उदासी के करिया बादर छा जावय, अब कोयल के रूप में खुशी के अंजोर बगरगे रीहिस।
घर भर के दुलौरिन कोयल ला मॉं हा जब नहवा खोरा के, ओकर आँखी में काजर अउ माथा में करिया टीका लगावय, त अइसन लागय मानों चंदा ह धरती में सौंहत उतरके आगे हवय। ओकर गोरा रंग अउ ओकर आँखी के करिया काजर के मेल देखके मॉं ह हमेशा ओकर 'नजर' उतारय।
घर के माहौल एकदम बदल गे रीहिस। सबे मन अलग अलग रूप में ढल गे की रीहिन, बाबूजी घलो नवा रूप बदल दे रीहिस, जउन बाबूजी हमेशा गंभीर रहय, ओमन अब कोयल ला अपन कोरा में लेके हमेशा गुनगुनावत गावत राहय-
*'चलना गोरी रॉंपा गैती धर के जाबो खेत,*
*तहूँ धरबे झौंहाँ बासी, कर ले थोरिक चेत'*
*नहीं गोरी तोला मैं हा, नइ तो लेगँव खेत,*
*तें लइका पढ़ाय ला स्कूल धर के जाबे बेत।।*
गावत रहय, त नानचुन कोयल ओकर अंगरी ला चम-चम्म ले धर लेवय।बाबूजी के चश्मा के पीछेू ले ओकर आँखी मन कोयल के मुस्कुराहट देखके छलक जावय। देख के बाबूजी काहय -"या कोयल तो मास्टरिन बनहूँ काहथे।"
भाभी के आय ले घरू बुता के बोझा कम होय के सेती मॉं के गोड़ पीरा दुरिहागे, ओकर देह में नवॉं फूर्ति छा गे। ओहा दिन भर कोयल बर तेल-मालिश के तैयारी करय। भाभी तो साक्षात अन्नपूर्णा अउ ममता के मूरत बनगे रीहिस। ओहा कोयल ला निहारत-निहारत अइसन मगन हो जावय कि कभू-कभू रसोई के साग, दूध जर के कोइला हो जाय। फेर बाबूजी कभू नई खिझाय बल्कि मुस्कुरावत कहय- "आज साग नई, कोयल के मया ले ही पेट भर गे।" त भैया खेत ले लरघाय आही त का खाही कहिके फेर दूसर साग राधे।
मैं जब स्कूल या खेत ले घर आवँ, त सीधा कोयल करा दउड़ जावँ। मॉं चिल्लावत राहय, कहॉं-कहॉं ले घूमके आथस, चल पहिली हात गोड़ धो ले तहॉंले नोनी संग खेलबे। तबले बिना हाँत गोड़ धोय कोयल नोनी ला छूवई तो का तीर में तक नीं जॉंव। ओकर नान्हे-नान्हे गोरी उँगरी मन ला धर के मैं अपन सब थकान भुला जावँ। भाभी काहय— "देख छोटे, कोयल ह तोर रस्ता देखत रीहिस।" सुन के कोयल किलकारी मार के थूँक के बुलबुला निकालके मोर कोती झूल जाय।
सचमुच, कोयल के आए ले हमर 'भउजी के मया' वाले घर में नवा अध्याय महतारी के मया शुरू होगे। कोयल ह सिरिफ एक लइका नई रीहिस, ओहा हमर परिवार के ओ विश्वास रीहिस कि जहाँ मया अउ त्याग होथे, उहॉं भगवान खुद खुशी बनके अवतरित होथे।
इही बीच घर में जिहाँ कोयल के सुग्घर चहक रीहिस, अचानक पीरा के करिया बादर छागे। मोर तबीयत अइसन बिगड़िस कि सबो झन डर्रागे रीहिन। देह ह आगी कस तीपत रीहिस, बुखार ह उतरबे नई करय। शहर ले डॉक्टर बी.के.क्लाडियस ल बलाय गीस, सुई लगिस, कतकोन गोली-दवई खायेंव, फेर कउनो काम नई आइस। दिन रात बुखार के ताप ले देहें कमजोर होगे, चौबीसों घंटा बिस्तर में परे, मोर चेहरा पींयर परगे रीहिस, ऑंखी भीतरी खुसरके गोटारन असन दीखय, अउ हाथ-गोड़ अइसन ढीला पड़ गे मानों अब परान ह तन ला छोड़ के उड़ा जही।
घर भर में सन्नाटा छाय राहय, मॉं-बाबूजी को तो रो-रो के बुरा हाल होगे रीहिस, फेर ओ कठिन बेरा में भाभी ह अपन ममता ला हथियार बनाइस।
भउजी ह हार नई मानिस। ओहा साक्षात धन्वंतरी के अवतार बनके मोर सिराहने ठाड़ होगे। कोयल ला ओहा परभा दीदी के कोरा में दे दीस अउ दिन-रात मोर सेवा में जुटगे। अँगरेजी दवई जब कोनो काम नई करिस, त भउजी ह हमर घरू बूता कमैया चॉंटी काकी करा गॉंव के बइगा ला बुलवाईस ओ हा तीन जुवार फूँकिस यहू कोनो काम नइ करिस त भउजी हा दूसर सियान मन ले पूछ के चिरायता, गिलोय अउ तुलसी के अइसन काढ़ा बनाइस जेहा मोर भीतर के जहर ला मारे लागिस। मुड़ में पानी के पट्टी, पतला खिचड़ी, बखत-बखत में दवई पानी देवत भउजी के आँखी पथराके बीमार दीखे लगिस। मॉं हा एक छन बर घलो मोर बाजू ले नई हटीस। जब मोर बेहोशी टूटे त ओहा मोर हाथ-गोड़ ला मलत रहय ताकि देह में गरमी बने रहे।
भउजी ह महादेव करा अरजी लगाइस-"हे भोले बाबा, मोर देवर के परान बचा ले, बदला में चाहे मोर कतको परीक्षा ले ले।"
एक रात अइसन आइस जब मोर साँस अटके लागिस, आँखी डगमग-डगमग होवत रीहिस। मोला लागिस कि "अब मैं मरिच जहूँ"। तभे भउजी ह मोर कान में धीरे ले कहिस- "छोटे, तैं हिम्मत झन हार। तोर कोयल तोला बलावत हे, तोर बिना ओकर नाम कोन पुकारही ?"
भउजी के ओ ममता भरे बोली अउ ओकर हाथ के छुअन में अइसन जादू रीहिस कि मोर भीतर जीये के आस फेर जगगे। गोली दवई काढ़ा टानिक तो चलते रीहिसे, धीरे-धीरे बुखार उतरे लागिस अउ मैं मौत के मुँह ले वापस आ गेंव।
जब मैं पहली बेर आँखी उघार के देखेंव, त मॉं मोर गोड़ करा बइठे-बइठे सुतगे रीहिस। ओकर चेहरा में थकान रीहिस, फेर एक जीत के संतोष घलो रीहिस। आज मैं जिन्दा हौं त सिरिफ 'भाभी के मया' अउ ओकर अटूट विश्वास के सेती। ओ दिन कोहंगाटोला जानगे कि भाभी सिरिफ घर नई सँभालय, ओ ह अपन नाजुक देह में परान बचाए के सक्ति घलो रखथे।
भाभी के सेवा अउ प्रार्थना ह काम करिस। धीरे-धीरे मोर देह में फेर ले सक्ति आए लागिस अउ पींयर परे चेहरा में लाली लहुट अइस। हमर घर, जेहा कुछ दिन पहिली सन्नाटा में बूड़े राहय फेर कोयल के किलकारी अउ हमर सब के हँसई-ठट्ठा ले गूँज उठिस।
जब मैं पहिली बेर उठ के अंगना में बइठेंव, त भउजी ह कोयल ला मोर कोरा में लाके डार दीस। कोयल ह अपन नान्हे-नान्हे गोरी उँगरी में मोर गाल ला छुइस, त अइसन लागिस मानों कतको जनम के पीरा हर गे हवय। भाभी ह परछी में ठाढ़े मुस्कुरावत कहिस- "देख छोटे, कोयल ह कतका खुश हवय, ओला मालूम रीहिस कि ओकर चाचा ह जल्दी बने हो जही।"
बाबूजी अपन गुलाबी साफा ला सँवारत बाहिर ले आइन अउ कहिन— "आज घर में उत्सव मनाबो, हमर बेटा ह नवा जनम लेके आए हवय।" त भैया कीहिस हमर मनौती ला हमर डिवहारिन दाई सुनलिस, अहो भाग्य हे। मॉं ह भाभी कोती देखके कहिस— "ये सब येकर पुन आय रे, बहू ह साक्षात लछमी बनके आए हवय अउ आज धन्वंतरी बनके घर ला बचा लीस।"
'भाभी के सुरता' सिरिफ एक गोठ नई , एहा हमर परिवार के ओ नींव रीहिस, जेकर भरोसा हमन कतको बड़े आंधी-तूफान ला झेल लेवन। कोहंगाटोला के ओ माटी आज घलो गवाही देथे कि जिहाँ भाभी कस मया करइया अउ देवर-ननंद कस मान रखइया मनखे रहिथें, उहॉं साक्षात परमेश्वर के वास होथे।
कोयल चहकत रीहिस, भाभी मुस्कुरावत रीहिस, अउ हमर परिवार मया के अटूट बंधन में बँधे, खुशी-खुशी अपन जिंदगी के नवा रद्दा में आगू बढ़गे।
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लेखक
डॉ.अशोक आकाश
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