Wednesday, 8 July 2026

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा ग़ज़ल के ग़* पोखन लाल जायसवाल

 *छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा ग़ज़ल के ग़*

पोखन लाल जायसवाल 

छत्तीसगढ़ी साहित्य मं साहित्य के जम्मो विधा मन मं लिखई-पढ़ई चलत हे। गीत, कहनी ले आगू निबंध, संस्मरण, व्यंग्य सबेच मं कखरो न कखरो कलम चलत हावय। नवा पीढ़ी के लिखइया मन के रुझान छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल डाहन थोरकन जादती दिखे ल मिलत हे। लिखई के पहिली विधा के जानबा होना खच्चित जरूरी बात आय। बिकट झन मन विधा अउ छत्तीसगढ़ी व्याकरण ल थोरकन चेत नइ करत हें, अइसे लगथे।  लिखई च मं लगे हावॅंय। ए बने बात आय, फेर लेखन मं विधा के शिल्प अउ भाषाई शुद्धता घलाव होना चाही। कुछ सुजानिक अउ बुधियार मन घलव एकर सुध नइ लेवत हें। जउन ह छत्तीसगढ़ी बर नकसान के बात आय। संसो के बात घलाव।

   

ए दूनो डाहन चेत करत एक किताब आय हे - ग़ज़ल के ग़। अरुण कुमार निगम के लिखे 'ग़ज़ल के ग़' ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा माने जा सकत हे। सजोर थरहा के रोपा लगे ले फसल पोठ होथे। कहूॅं मउसम संग देथे त सोला आना सुम्मत होथे। ए किताब के पहलइया खंड मं ग़ज़ल के शिल्प अउ बारीकी मन ऊपर गहिर ले चर्चा करे गे हे। जउन ह छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल बर थरहा सहीं हे। ग़ज़ल अउ छंद के तुलनात्मक चर्चा ग़ज़ल के बारीकी मन ल समझे मं सरल हे। मार्गदर्शी भी।

      

ग़ज़ल ल एकर शिल्प अउ कहन शैली ले बड़ कठिन विधा माने जाथे। कारण आय, ग़ज़ल लिखई ह गागर मं सागर ल भरई ए। ग़ज़ल के हर एक शेर अपन आप मं मुकम्मल एक कविता होथे। एक शेर माने दू लाइन मं लिखे बर कम से कम शब्द बउरना अउ भाव ल समोना एला कठिन बनाथे। ग़ज़ल के बह्र मन के जानबा घलो संग्रह मं ज़रूरत के मुताबिक सरल ढंग ले बताय गे हे। 

      

ए किताब ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के थरहा कहना कुछ झन के नरी मं नइ उतरही। काबर कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल तइहा ले लिखे जावत हे। रामेश्वर शर्मा मन अपन संपादन मं छपे 'छत्तीसगढ़ी काव्य एक विहंगम दृष्टि' मं छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल जघा दे हावॅंय। जेन मं पुरखा साहित्यकार मन के संग नवा पीढ़ी के रचनाकार मन के ग़ज़ल शामिल करे गे हें। एकर अलावा कई ठन ग़ज़ल संग्रह घलो 'ग़ज़ल के ग़' के पहिली छप चुके हें। फेर उन मं शामिल ग़ज़ल मन बह्र सम्मत् नइ दिखें। विधा विशेष के गोठ करत खानी ओकर शिल्प ल ताक मं रखे नइ जा सके। शिल्प या बुनावट या स्वरूप ले ही विधा के नाम दिये जाथे। अइसन मं शिल्प मं समझौता ठीक बात नोहय। रचना ल शिल्प के कसौटी मं खरा उतरना च चाही। 

      

'ग़ज़ल के ग़' संग्रह ला खुद अरुण कुमार निगम एक मार्गदर्शिका बताॅंय हवॅंय। उहें डॉ. साकेत रंजन प्रवीर मन अपन भूमिका मं ए संग्रह ल छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के अरुणोदय बताय हें। एकरे संग दूसर भूमिका मं लिखत सूफी हाज़ी डॉ. इसराइल 'शाद' लिखथें - 'केवल ग़ अभी ज़ अउ ल बाकी हे...' ए दूनो भूमिका बताथें कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के शुरुआत भर होय हे। एला अभी लम्बा सफ़र तय करना हे। 

      

दूसर खंड मं, अरुण कुमार निगम मन अपन लिखे ग़ज़ल मन के तक्तीअ करत हुए ग़ज़ल ल बह्र मं लिखे के अभ्यास बर सुग्घर मार्गदर्शन करे हें। बिना बह्र के ग़ज़ल हो नइ सकय। छंद के माध्यम ले ग़ज़ल लेखन मं हाथ अजमइया मन ल एक बात के पक्का धियान राखे के हावे कि दूनो के कहन एके नइ हे। फरक हे। कोनो भी एक छंद एक कविता होथे। फेर ग़ज़ल के एक-एक शेर माने दू मिसरा एक कविता ए। 

     

ग़ज़ल ल ओकर कहन शैली ह छंद ले बिल्कुल अलगेच खड़ा करथे। प्रचलित 32 बह्र मं अरुण कुमार निगम के लिखे ग़ज़ल मन प्रभावित करथें। युग के संग ग़ज़ल के तेवर बदल गे हावे। अब केवल रूमानी अंदाज के ग़ज़ल नइ लिखे जावत हे। यहू चीज़ ये संग्रह मं देखब मं आथे। कुल मिला के ए खंड के ग़ज़ल मन नवा लिखइया मन बर मील के पथरा साबित होहीं। 


एक ठन ग़ज़ल के मतला अउ एक शेर देखव -


हमर ननपन के कहानी नॅंदागे।

दया सॅंग मया अउ मितानी नॅंदागे।


बिदेसी हवा मा उड़त हें जवानी 

शरम लाज ऑंखी के पानी नॅंदागे। (पृष्ठ 66)


    कहावत अउ मुहावरा मन ल ग़ज़ल मं समो लेना अरुण कुमार निगम के खासियत हे। गहिर बात समाय घलव हे। एकर ले भाव सौंदर्य मं बढ़ोतरी घला दिखथे।


जात के भेद भाव बिसराके 

चैन के बंसरी बजाना हे। (पृष्ठ 57)


तॅंय बोल धीरे से 'अरुण'

दीवार मा भी कान हे।  (पृष्ठ 78)


सुराजी के मजा ला जान पाही का कभू बइला

फॅंदाय हे जे घानी मा बॅंधे खूॅंटा किंजरना हे। (पृष्ठ 109)

    

संग्रह के तीसर खंड मं ऑनलाइन ग़ज़ल के ग़ के साधक मन के ग़ज़ल शामिल करे गे हें। जेन बताथे कि अवइया बेरा मं  छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी साहित्य मं अपन दमदार हाज़िरी दिही। बशर्ते कि साधक मन ग़ज़ल ला सजोर करे मं सरलग लगे राहॅंय। मिहनत करॅंय।  


मनी राम साहू 'मितान' बड़े बह्र मं बड़े रदीफ संग सुग्घर ग़ज़ल लिखे हें, ग़ज़ल के मतला संग एक शेर पेश हे - 


नवा अब बिहान आही गियाॅं थोरकिन सबर कर।

करू रात हा पहाही गियाॅं थोरकिन सबर कर।।


कला जानथस चिखे के कहे गोठ ला सबन के,

कसा मीठ कस जनाही गियाॅं थोरकिन सबर कर। (पृष्ठ 137)


मिलन मलरिहा के एक मतला अउ शेर प्रस्तुत हे -


एक चिनहा अपन बनाले तैं।

गाॅंव मा जस धरम कमाले तैं।


काम जादा बड़े तो नोहै जी,

पेड़ हर घर गली लगाले तैं। (पृष्ठ 114)


मोहन लाल वर्मा बड़का बात बड़ सहज ढंग ले लिखथें-


आदमी ला गरब अउ भरम होगे हे

बेंच मरजाद ला बेसरम होगे हे। (पृष्ठ 121)


ए संग्रह के कई ठन ग़ज़ल जउन आने-आने रचनाकार के हे, छंद के प्रभाव ले मुक्त नइ हें। ग़ज़ल के कहन/शैली मं कमसल लागत हें। अपन पुरखा मन के लिखे साहित्य के भाव अउ ग़ज़ल के शिल्प मं तालमेल बिठावत ग़ज़ल लिखे जाही त छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल निश्चित रूप ले अपन नवा मुकाम हासिल करही। नवा उॅंचास देके के जिम्मा नवा पीढ़ी के कंधा मं हे। 

 

अभी हिंदी ग़ज़ल मन के तुलना मं छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल मं बहुत कुछ करना बाकी हे। फेर ए कहे जा सकत हे कि छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के भविष्य सुनहर दिखत हावे। 'ग़ज़ल के ग' के थरहा रोपे ले ग़ज़ल के फसल अउ गहादही, लहलहाही, एमा कोनो शक-सुबा नइ हे।


टंकन मं कुछ जघा त्रुटि हावे, जउन ल अवइया संस्करण मं सुधार किए जा सकत हे। चैन हा सब जघा 'चौन' होगे हावय। ग़ज़ल भीतरी पेज़ मं गजल होगे हे। बनाले/सजाले/बलाले....मं  'ले' अलग होना चाही। तभे संयुक्त क्रिया रूप मं भाव स्पष्ट होही। छपाई अउ काग़ज़ के क्वालिटी बढ़िया हे। मुख पृष्ठ आकर्षक हे। डोंगरी पहार संग छत्तीसगढ़ के सुघरई के पहचान झलकत हे।

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल नवा दिशा दे के उदिम मं अरुण कुमार निगम के ये उदिम अउ कोशिश अतुलनीय हे। स्तुत्य हे। अभिनंदनीय हे।

अरुण कुमार निगम जी ला हार्दिक बधाई अउ शुभकामना।

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संग्रह:  ग़ज़ल के ग़ 

रचनाकार: अरुण कुमार निगम 

प्रकाशन: वैभव प्रकाशन रायपुर 

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पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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