लघुकथा -
" भूलऊ राम भुलागे "
सबो बात सब जघा सुरता नइ आवय l सुरता आही त ओ बेरा नइ रहय l भूलऊ राम घलो सुरुज भूल्हा ताय l
मिलगे बिहनिया ले भूलऊ मुखारी धरे तरिया कोती जात l
पूँछ परेंव -" काली के गोठ ला नइ बताएस गो? "
"का बात ला?"
"गंगा जल के कसम खवाये रहेस ओला!"
"हाँ, हाँ ओला भुलागेँव बताये बर फेर बताना घलो उचित नइ समझेंव l
"काबर गो?"
मोरो टुरा उही कोचिंयाई गिरी म लगे हे l चार पइसा कमावत हे l भुला जा अब l
"बने बेराआवत हे कइसे भुला जबो? हमन अब पियन खान दन बारी बखरी दैहान म l
कमांडो तही चलावत रहेस ना भूलऊ l तोला सुरता हम देवाबो l "
सुखऊ के गोठ ला सुनत भूलऊ भूलवारे धर लीस
"अरे भाई तोला लेगहूँ, तैयार रहिबे अच्छा जघा लेघहूँ अब सुरता नइ भुलावय बने आदमी बन के आबे l"
सुखऊ जान डरिस राजधानी
धुरिहा नइ हे l कभू कभू नाम घलो काम बना देथे l
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