Thursday, 28 May 2026

भरम

 भरम  

             चार जबर मजबूत खंभा के उप्पर टिके रहय ……. एकठिन बडे जिनीस छत । ओखर खाल्हे म जम्मो मनखे अपन जिनगी ल ...... सुख से बितावत रहय । उही छत ल अपन आश्रयदाता मान के ....... ओखर ऊप्पर बिश्वास करके ... ओकर पूजा करय .... । संगे संग चारों ठिन खंभा के भरोसा करके ...... इंखरो पूजा कर लेवय मौका मौका म । पहिली खंभा हा ....... जम्मो झिन के अगुवा रहय । कइसे रहना जीना खाना हे .... अउ काये करना हे ..... तेखर बर नियम बनावय । दूसर खंभा हा सरी काम काज करत ..... देख–रेख करय । तीसर खंभा हा देखय के .... काकरो संग अन्याव झिन होवय । चौथा खंभा हा ...... बने काम के प्रशंसा करय अउ गलती ला उजागर करय । जम्मो खंभा के आपस म बनेच दोस्ती घला रहय । चारो ल इही बात के अभिमान रहय .... के उहीच मन अतका बड छत ल तान के राखे हाबय ।

                     एक दिन .. धन दौलत ..... मान सम्मान के बडोरा अइस । चारों खंभा डगमगाये लागिस । बडोरा के कचरा काडी मन ...... खंभा म चटक के दाग लगाये बर सुरू कर दीस । पहिली खंभा हा ..... बडोरा ला सहे नइ सकिस ..... वो कमजोर होके फोंगला होए लागिस । धीरे धीरे बेईमानी के चारा ...... चोरी के तोप ...... घोटाला के शेयर म ...... कोयला के आगी सचरगे । स्पेक्ट्रम के बस्सावत हावा ...... आगी ल अतका भड़काइस के ..... पहिली खंभा खोरवा होगे । छत ले एकर संग साथ छूटगे । मनखे मन डर्रागे ...... छत झिन गिर जाय कहिके ...... । दूसर खंभा अइसने कमजोर रिहीस ...... एकर वइसने कोन्हो जब्बर अधार नइ रिहीस ...... उप्पर ले गरब के जहर अउ अकर्मन्यता के पाप हा एकर हाथ ला टोर दीस । अभू एकरो संग छूटगे छत ले । सरलग ले दू ठिन खंभा के डगमगाये ले चारों डहर रोआ राही मातगे । फेर छत नइ गिरीस । तीसर खंभा डहर आसा ले ...... टकटकी लगाए देखे लगिस जम्मो । उहू ल भय अउ लालच के अमरबेल अइसे धरिस के वोहा ..... उबर नइ सकिस अउ अपन दिमाग गवां डरिस । एहा तो अतका तक भुलागे कि काला धरके ठाढ़े हे ...... एकरो हाथ ले छत के पेंदी छुटगे । अभू चौथा खंभा उप्पर भरोसा करे के अलावा कोन्हो चारा नइ बांचिस । करीन घला ...... फेर उहू ला प्रलोभन के केंसर अउ कायरता के एड्स धर लिस । अभू एकर न आंखी दिखय न कान सुनावय ....... छत के पेंदी कतका बेर दूरिहागे ...... गम नइ पाइस । भगवान ल सुमिरे के अलावा कहींच नइ बांचिस ..... मनखे करा । 

                      छत गिरे ले ...... कतका नकसानी होही अउ ओखर पूरती कइसे होही ....... तेकरे बिचार सुरू होगे । छत उदुपले गिर जही ....... सोंच सोंच के जम्मो मनखे मन दुबराए लगिन । दिन ..... महिना ....... अउ कतको बच्छर नहाकगे ....... छत जेंव के तेंव अपन ठउर म स्थिर रहय । कोन जनी छत घला हाबे के निये ......... मनखे के मन म शंका उपजगे । खोजा खोज माचगे । पता चलिस ..... छत त हाबे ...... तभे एमन सुरछित हे । फेर ये छत काय माटी के बने हाबय ....... कइसे बने हाबे ....... कतका चेम्मर हे ....... बिगन कोन्हो अधार के कइसे फइले अऊ तने हाबे ...... बिगन धुरी के कइसे लटके हाबे .... इही हा सोंच के बिषय बनगे । 

               सोध उप्पर सोध चलिस । आखिरी म पता लगिस के ..... जइसे हमर धरती हा ..... अपन अउ सुरूज देवता के बीच ...... गुरूत्वाकर्षण बल म लटके हाबय ...... तइसने ये छत हा एक कोती हमर पुरखा मन के बिचार ..... आसीरवाद ……, नियम....... अनुशासन अउ संरछन के बल म ...... त दूसर कोती जनता के बिश्वास ..... प्रेम ...... भाईचारा ..... मेहनतकश के पछीना अऊ ईमानदारी के बल म ...... बिन लौकिक सहारा के लटके हे । 

              ये छत अउ कोन्हो नोहे भइया ....... हमर लोकतंत्र आए ..... जेला तान के राखे के ठेका लेवइया जम्मो खंभा अऊ मेयार मन ....... घुना खावत फोंगला ....... बीमार परे ...... सरत हे ..... बस्सावत हे । अउ छत अभू घला ...... छाती तान के जम्मो मनखे ल सुरक्षा देवत हे । खंभा अऊ मेयार के तिड़ीबिड़ी होये ले ...... मनखे के भरम  घला भकरस ले टूटगे के ...... हमर लोकतंत्र ..... ककरो सहारा म खड़े हे ।

 हरिशंकर गजानंद देवांगन छुरा

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