लोक-जीवन ले लोक-भाखा सँग लोक-ग्यान नँदावत जात हे
"बात-बात मा बात बाढ़े, पानी मा बाढ़े धान।
तेल-फूल मा लइका बाढ़े, फोही मा कान।" सच कहे जाय तब आज छोट-छोट बात मा मनखे कतिक उलझ जात हे। "बात के काला धरबे, न मुड़ न कान।"
हमर डोकरी दाई हर अइसने गजब हाना कहिके अपन बात ल लखाय। कोन जानी ओ हर कहाँ-कहाँ ले हाना लाया। एक दिन ओहर कहिस-" डार के झुके बेंदरा, पाग के झुके किसान।"
जब डोकरी दाई हर ये हाना ल काहय तब ओ समे मा हमला समझ मा कूछू नइ आय। सब मुड़ी के उप्पर ले निकल जाय। अब जब गुनतथन तब अरथ हर समझ मा आथे। कतका गुड़ार्थ राहय ओकर हाना मा।
सही कहा जाय तब हाना हर लोक के अनुभव आय। कोनो समे मा मनखे हर अपन जिनगी मा सुख अउ दुख अनुभूत करिस होही, तब सोझे ओकर मुहू ले अइसने शब्द निकल गिस होही। अउ आगू जा के लोक मा प्रचारित हो गीस होही। बहुत अकन हाना आज हमला सोचे बिबस करथे।
"रिस खाय बुध ल अउ बुध खाय परान ला।" कतका बड़का बात आय, जेला लोक हर सहज कही दे गेहे। आजो मनखे जब गुस्सा जाथे तब ओहर खुद परान दे देथे या दूसर के परान ले लेथे। आज अखबार मन मा रोज ये तरह के समाचार पढ़े बर मिल जाथे। अइसना लोक-निंदा करना आज कतका सहज होगे। ख़ासकर राजनीति मा तो ये हर बहुते सहज हो गेहे। तब लोक कही देथे- "हड़िया के मुहू मा परइ ल ढाँकबे, मनखे के मुहू मा काला ढाँकबे।"
लोक के बात मा जउन लोक-शिक्षा हे, ओहर आज नँदावत जात हे। जइसे-जइसे शिक्षा के प्रचार-प्रसार होत हे वइसे-वइसे लोक-शिक्षा मनखे भुलावत जात हे। आज हाना के बउरइया मनखे नइ दिखय। आज लोक-जीवन ले लोक-भाखा सँग लोक-ग्यान नँदावत जात हे।
सही कहा जाय तब येला संजो के जब तक येला संजो के नइ राखे जाही तब तक लोक-ग्यान ले अवइया पीढ़ी हर येकर ले वंचित रहही।
बलदाऊ राम साहू
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