Thursday, 28 May 2026

लघुकथा ) घर के उजार

 (लघुकथा )


घर के उजार

-------------

वसुंधरा हा रोवत दूधमूँहा नोनी ला पाये बिहनिया बर्तन माँजे-धोये ला बइठे हे।आज चाय बनाके तको नइ पिये हे। हाथ हा चलत नइये। मनमाड़े फूले हे। वोकर गोसइया बल्लू हा नशा मा धुत्त सुते हे। रतिहा मारपीट करे हे। अस्सी-पचयासी साल उमर के सियनहिन सास हा हालत ला समझके कइसनो करके अँगना-परछी ला बाहरत हे।

  वसुधा के आँखी टप-टप चूहत हे।बेचारी हा गुनत हे-- दाई ददा मन पाँच साल पहिली कतका सोच-विचार के, मोर बेटी रानी बरोबर रइही कहिके,खुशी-खुशी वोकर बिहाव बल्लू संग करे रहिन हे। एके झन बेटा, पाँच एकड़ खेत, बढ़िया चलत किराना दुकान। महूँ हा कतका जादा खुश रहेंव।

 फेर तीन बछर पहिली सियान ससुर हा जइसे परलोक सिधारिस, बल्लू हा पियक्कड़ मन के संगति मा परके बर्बाद होगे। दुकान तको बंद होगे। रात-दिन गाली गलौच अउ मारपीट--घर मा कलह समागे।जिनगी मा दुख के पहाड़ गिरगे।

 वसुंधरा हा अचानक उठिस अउ खोली मा आके एक ठन बेग मा कपड़ा-लत्ता ला जोर के बाहिर निकलच अउ परछी मा बइठे अपन सास के पाँव परिस। सियनहिन सास हा आशीर्वाद देवत कहिस-- " घर ला तियाग के जावत हस बेटी-- ले जा, आज नइ रोकँव। महूँ नारी अँव, तोर दुख ला समझत हँव। मोर का हे आज जियत हँव-काली सिरा जहूँ। दे तो नोनी ला चूमन दे। "

वसुधा हा वोकर कोरा मा बइठार दिस। सियनहिन हा मया करके वापस देवत कहिस -- ले जावव बेटी। सुखी रइहव।

वसुधा घर ले निकलगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

No comments:

Post a Comment