Thursday, 28 May 2026

मन दीयाँर होथे

 मन दीयाँर होथे


      ​   सुरता मन पाछू नई छोड़य, बेरा तो गुजर जथे फेर सुरता जस के तस माड़े रहिथे। जीवन में जे मनखे मन अपन मनके रेंगथे, ओकर जिनगी ला मन के दीयाँर हा चुन चुनके खा देथे। बृजभूषण हमर गॉंव के बड़का कलाकार रीहिस जेन हा देश बिदेश में अपन कला के डंका बजावत रीहिस। जब भी बृजभूषण घर आवय ओकर घर 'कला कुंज' में कलाकार मन के मण्डली के रास माड़ जाय। अवैया कार्यक्रम के तैयारी में ओकर घर सिगबिग-सिगबिग करे, मोटर गाड़ी के रेला लगे राहय। कोनो चाय नाश्ता बनात बॉंटथे, कोनो गावत बजाथे, सबके अलग-अलग काम बँटाय राहय। कलाकार के चहल-पहल ले बृजभूषण के घर अब्बड़ सुग्घर लागे। महतारी रोहणी देवी तो अब आरामी कुर्सी के शोभा बनके रहिगे रीहिस, ओकर सेवा करैया मन के कोनो कमी नई रीहिस। सात साल के बेटा जगमोहन अउ चार साल के बेटी मुनमुन चंदा सुरुज बरोबर घर में अंजोर बगरावत रीहिस। बृजभूषण अउ ओकर बाई माधवी के जोड़ी कोनो मुड़ा ले मेल नइ खावय, ऊँकर मन के खाप कभू नइ माड़िस। माधवी रसायन शास्त्र में एम एस सी करे के बाद नेट के संग जीआरएफ पास करके कालेज में रसायन शास्त्र के विभागाध्यक्ष बनगे रीहिस। वो बहुँत होनहार रसायनशास्त्री रीहिस, कालेज में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर बने के सपना पूरा करे के बाद ओकर घर दू भाग में बँटा गे रीहिस, एक डाहन कला ला समर्पित बृजभूषण ला सिरिफ कला ही दीखय तो दूसर कोती माधवी ला सिरिफ अपन रसायन शास्त्र के नवा प्रयोग । दूनो झन के बीच आठ- आठ, दस-दस दिन तक भी कोनो बातचीत मेल मिलाप नइ राहय, दूनो के दूनो अपन काम में व्यस्त रहिके जीवन चक्र ला झेलत रीहिन। लइका मन के कोनो देखैया नइ रीहिस, आया के भरोसा पलत लइका मन एक दूसर के आँसू ला पोंछे ला सीख गे रीहिस। न कोनो बृजभूषण के रोकैया रीहिस, न कोनो माधवी के टोकैया। दूनो के दूनो अपन मर्जी के मालिक बन के सिरिफ अपन फैसला सुना देवय, जिहॉं जाना हे चल देवय। बिन नियम कायदा कानून अनुशासन के तो देश नइ चले, त घर कहॉं ले चल पातिस। संगत बने रहिथे त सद् गति जल्दी मिल जही, कुसंगति में पड़ जथे त दुर्गति होवत देरी नइ लगे। संगति बने मनखे के संग हो जथे त राक्षस हा तक देवालय जावत-जावत देवता बन जथे अउ कुसंगति में पड़के देवता तक राक्षस बन जथे। बीड़ी पियैया के संग रहैया मनखे आठ पंदरा दिन तो बीड़ी के धुंगिया सूँघत रहिथे ताहन खुदे बीड़ी धुंके ला धर लेथे। जइसन -जइसन संगति रहिथे तइसन-तइसन असर जरूर पड़थे। 


      बृजभूषण के कलाकार संगवारी मन सब के सब मंचीय अनुशासन के पालन करे फेर ओकर घर में अनुशासन नाम के कोनो चीज नइ रीहिस, जेला जतका पैसा लगथे सब अपन मन के मालिक रीहिस। ये मन हा भोंगर्रा होथे जी मनखे ला भटका देथे, मन हा दींयार बरोबर तको होथे  जे हा जिनगी के पटरी ला चुन-चुनके खा देथे। एकरे सेती साधू संत मन, मन ला बस में करे के उदिम जीवन भर करथे। 


        'कला कुंज' रोज संझा जगमग-जगमग करे फेर वो जगमगई में कोनो रस नइ रीहिस। देखैया मन ला कोन जनी का के सेती आय ते कुछू कमी लागे। एक सांझ घलो वो दुवारी में दीया बरत रहिस, फेर ओकर अंजोर मा खुशी नहीं आने दिन ले जादा किसम के सुन्नापन अऊ सन्नाटा छाय रीहिस। स्कूल बस ले चहकके घर पहुँचत सात साल के जगमोहन अपन हाथ मा 'रिजल्ट' धरे ठाढ़े रीहिस, जेमा सुग्घर अक्षर मा 'प्रथम' लिखे रहिस। ओ चाहत रीहिस कि अपन ये पहिली जीत ला अपन बापू बृजभूषण के गोड़ मा मड़ा देय, जेकर नाच-गाना अऊ कला के डंका जम्मो देस मा बाजत रहिथे। पर ओ दिन घर मा कोनो नई रहिस, न बापू के तबला के थाप रहिस, न महतारी माधवी के किताब मन ले आवे वाला रसायन शास्त्र के ओ गंध।

​      गरीब मनखे टूटथे त कोनो देखैया नइ राहय लेकिन जब बड़े मनखे मन टूटके बिखरथे तब सबे मनखे मन ऊँकर मनके टूटके बिखरे के विश्लेषण करत रहिथे। जब काकरो करम फूटथे तभे ऐसन दुर्गति होथे जैसन दुर्गति बृजभूषण अउ ओकर बाई के होय रीहिस। 

​बृजभूषण, कला के दुनिया के वो सुरुज रीहिस जेकर उवे ले चारों कोती ताली के गड़गड़ाहट गूंजत रहिस। फेर ये दारी वो 'प्रोग्राम' मा गिस त लहुटके नइ आइस। अफवा उड़िस कि ओहा कोनो नचइया टूरी के संग कहूँ दूरिहा अपन नवा संसार बसा लीस। अभी ये घाव ह भरे नइ रीहिस कि महतारी माधवी घलो अपन ममता के गला घोंट दीस। ओहा घलो अपन संगी मास्टर के संग घर-दुआर छोड़ के निकल गे।

​पाछू छूटगे तीन परानी- सियनहिन दादी, चार साल के नानचुन मुनमुन, सात साल के जगमोहन, कला कुंज के बड़का घर अउ लम्बा खेती बाड़ी। 

​"जग्गू भैया ददा, दाई कतका बखत मा आही? मोला भूख लागत हे," मुनमुन के ये गोठ ह सात साल के लइका ला रातों-रात सियान बनादीस।

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          जब अपने नत्ता रिश्तेदार मन अमानुस बेवहार करथे त नत्ता गोत्ता के सरी डोरी टूटके छिहीं-बिहीं हो जथे। ​दुख के पहाड़ अभी टूट के गिरे ही रीहिस कि जगमोहन के तीनो बुआ तारिणी, शुभमणि अऊ अंकिता जेमन बड़े-बड़े घर मा ब्याहे रीहिन, संवेदना जताय के बहाना आइन, ऊँकर हाथ में दुलार नहीं, कोर्ट के नोटिस रीहिस। ओ मन ला अपन भाई-भउजी अउ भतीजा भतीजी इहॉं तक दाई के मया ले कोनो मतलब नई रहिस, ओकर नजर तो 'कला कुंज' के जमीन अऊ जायदाद मा गड़े रीहिस।

​बुआ मन कोर्ट मा बटवारा के केस ठोक दीन। सात साल के लइका जेला अभी दुनियादारी के ज्ञान नई रीहिस, ओहा वकील अऊ कछेरी के चक्कर ला का जानतिस, फेर बखत के लबडेना जेन मनखे ला परथे पीरा ला उहिच हा जानथे। दादी के रोवई गिड़गड़ई के कोनो असर बुआ मन ला नइ पड़िस। ऊँकर आँखी में तो स्वार्थ के पट्टी बंधा गे रीहिस। ओ मन ला एक छोटे से कोठरी मा रेहे बर मजबूर कर दीन। जगमोहन ह अपन आँसू ला पी गे। ओहा कसम खाइस कि ये दुख ला ओहा अपन कमजोरी नहीं, ताकत बनाही । दिन में मंडी मा चहा पानी पियाके समोसा आलूगुंडा बेंच के , सांझ कुन होटल मा बरतन माँजे, बॉंचे समोसा आलूगुंडा अउ चहा धरके घर आवय अउ अपन दादी अउ नानचुन नोनी मुनमुन संग खा पी के सुत जावय। रतिहा कंडिल के अंजोर में अपन भविष्य लिखत जगमोहन हा बहिनी मुनमुन के पढ़ई लिखई के बनेच ध्यान रखय। जीवन के घटनाक्रम काकरो धरे बॉंधे नइ राहय। कोन जनी कब काकर संग का घटना हो जही कोनो नइ जानय। जब जगमोहन नौंवी पास होईस तब ओकर होटल के मालिक मालकिन मन एक्सीडेंट में गुजरगे। अब तो होटल के सबे भार जगमोहन ऊपर आगे। चौंक के टपरी के होटल ला चमकावत जगमोहन ला देरी नइ लागिस। दू साल के सफर में ओकर होटल के पूरा शहर में नाम होगे। धीरे से  जगमोहन ह अपन मेहनत ले सहर के सबसे बड़े 'बिजनेसमेन' बन गे। अब तो ओहा ओ 'कला कुंज' ला फेर खरीद ली, जेला ओकर बुआ मन बेच डारे रीहिन।

    जेन मनखे मन अपन का दूसरा के भी घर ओदारे रहिथे, ओ पापी मन के अंत हो के रहिथे। एक दिन जगमोहन ला अपन बाबू अऊ दाई के खबर मिलिस। बाबू बृजभूषण, जेहा कला के घमंड मा अपन परिवार ला त्यागे रीहिस, ओकर अंत बड़े भयानक होइस। ओ नचइया टूरी ह ओकर जवानी भर के कमाई ल गठियाके जम्मो पैसा-कउड़ी ला लूट लीस अऊ जब बुढ़ापा मा ओकर हाथ-गोड़ चलना बंद होइस, त ओला कोढ़ी कह के सड़क मा छोड़ दीस। बृजभूषण के अंत एक अनाथालय मा बेसहारा हालत मा होइस।

​ओइसने ओकर दाई माधवी घलो सुख नई पा सकिस। जेन मास्टर संगवारी संग गुलछर्रा उड़ायबर अपन नान-नान लइका मन ला छोड़े रहिस, उही मनखे ह रसायन विभागाध्यक्ष माधवी ला खानगी में फँसा के नौकरी ले निकलवा दिस, ओकर चरित्र ऊपर लॉंछन लगाके ओला धोखा दे दीस, माधवी कोनो मेर मुहूँ देखायके लइक नइ रीहिस। वो हा पगलाय घूमत सड़क मा भीख मांगत-मांगत दम तोड़ दीस। जब जगमोहन ला ये पता चलिस, त ओकर करेजा फाटगे, फेर वक्त ह हाथ ले निकल चुके रहिस।


        ​एक दिन जगमोहन के बंगला मा तीन बुढ़िया मन आइन, लुगरा फटे रीहिस, आँखी मा आँसू अऊ देह मा कतको बीमारी। ये मन ओकर तीनो बुआ रीहिन। ओकर बेटा मन ओ मन ला घर ले निकाल दे रीहिन।

​"जग्गू ... हम ला छमा कर दे बेटा, हमन ह पापी अन, हम ला कहूँ मेर थोकिन जगा दे दे।" तारिणी बुआ मड़िया के कीहिस।

​जगमोहन ह ओ मन ला घर में राख लीस। ओकर मन में कोनो बदला के भाव नई रहिस।

    ​आज जगमोहन तीर सब कुछ हे। धन-दौलत, मान-सम्मान अऊ ओकर बहिनी मुनमुन घलो सुखी हे। पर आज घलो ओहा रात मा सुतथे त ओला सपना मा उही सात साल के लइका दिखथे, जेनहा 'रिजल्ट' धरे अपन दाई-ददा ला खोजत हे।

​ओला आज घलो ओ रसायण के गंध अऊ बापू के घूँघरू के आवाज ह डर्हुवाथे। इंसान गरीबी ले तो बाहिर निकल जथे, फेर बचपना के वो घाव ले कभू बाहिर नई निकल सके, जेला अपन मन दे रहिथे। बुआ मन ला ओहा सहारा तो दे दीस, फेर ओकर मन के कोना मा बइठे ओ लइका ह आज घलो सिसकत हे।

​सुरता मन पाछू नई छोड़य... ओ मन तो साया बन के संग चलथे।

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लेखक

डॉ.अशोक आकाश

कोहंगाटोला बालोद, छत्तीसगढ़

491226

मो.9755889199

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