लघुकथा -
" चार धाम यात्रा "
- मुरारी लाल साव
बस्ती म इही चर्चा फ़ैल गे l चार धाम के यात्रा बर सब जावत हे l अपन अपन ले तैयारी करत हे l आगी लगथे त अतका चिहोर नइ परय जतका चार धाम के चर्चा फैले हे l
"कहाँ हस गो भइय्या?" चिल्लावत गणेश आगे घर म l
महेश बैठारिस l गणेश कहिथे -" चलना गो चार धाम जाबो "
महेश के अलग बिचार,अलग रस्ता सबले अलग किसिम के मैनखे हरे l तभो ले जाने बर गणेश के मन ल राखे बर पूछिस -" कोन कोन जात हे तेमा? "
"सब झन जात हे गो, महूँ जाहूँ
नइ छोड़ँव भइया l"
"जा जा अइसन मौका तोला मिले हे l "
"तहूँ चल ना भउजी घलो जाही l "
"जा तोर भउजी ला ले जा l "
"वाह तोर बिना कइसे जाही?"
आखिर म महेश कहिस -"
चार धाम के यात्रा ले चार फल मिलथे वो मोला घर बइठे मिलगे l" आँखी ला छत्कारत, गणेश पूछिस -वो कइसे? "
" चार धाम नइ जाना हे त पूछ? नइ ते जा अब घूंच l"
गणेश जान डरिस भइय्या के सुर आन तान होवत हे l चल दिस उहाँ ले l
महेश फेर गुनिस मैनखे ला तुतारी अउ मुखारी के जरूरत पड़थे l मन अउ बिश्वास,
धरम अउ करम जेकर श्रेष्ठ हे वोला का जरूरत हे चार धाम जाये के? कबीर साहेब के बानी फोकट नोहय " तीरथ गये दू झन चित्त चंचल मन चोर l एको पाप न उतरिया लाये दस मन और l"
गंगोत्री म नहाये के सुख घर में हे घलो हे l
पाप धोके आथे उही मन तहाँ उही लद्दी म म बुड़े रहिथे l
का पुन अउ का तरना? सबो जस के तस l
अमर नइ हो जाय l
घिलर घिलर के नइ मरही त
तड़फ तड़फ के मरही l जेकर करनी करम सुधरय नहीं l
उही बेरा चाय लेके गंगा आगे l
महेश कहिथे -" जाना तहूँ चार धाम म l"
गंगा कहिस " तै इंहा रहिबे भोला नाथ असन l कइसे गंगा तोला छोड़ के जाही l संग मा रहिबो l तहीं हमर चार धाम तहीं हमर तीरथ l लक्ष्मण मस्तुरिया कवि बने कहे हे " कहाँ जाबे बड़ दूर हे गंगा पापी मन इहें तरव रे!" महेश फेर उही बानी ल तुक के सुनाथे
-" तीरथ गये दोई झन चित चंचल मन चोर l एको पाप ना उतरिया दस मन लाये और l"
महेश अउ गंगा दूनो चार धाम जवइया मन ला देखत रहिथे l
मोटर म सबक
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