Thursday, 28 May 2026

लघुकथा - " चार धाम यात्रा "

 लघुकथा -

" चार धाम यात्रा " 

   - मुरारी लाल साव 

बस्ती म इही चर्चा फ़ैल गे l चार धाम के यात्रा बर सब जावत हे l अपन अपन ले तैयारी करत हे l आगी लगथे त अतका चिहोर नइ परय जतका चार धाम के चर्चा फैले हे l 

"कहाँ हस गो भइय्या?" चिल्लावत गणेश आगे घर म l

महेश बैठारिस l गणेश कहिथे -" चलना गो चार धाम जाबो "

महेश के अलग बिचार,अलग रस्ता सबले अलग किसिम के मैनखे  हरे l तभो ले जाने बर गणेश के मन ल राखे बर पूछिस -" कोन कोन जात हे तेमा? "

"सब झन जात हे गो, महूँ जाहूँ 

नइ छोड़ँव भइया l"

"जा जा अइसन मौका तोला मिले हे l "

"तहूँ चल ना भउजी घलो जाही l " 

"जा तोर भउजी ला ले जा l "

"वाह तोर बिना कइसे जाही?"

आखिर म महेश कहिस -" 

चार धाम के यात्रा ले चार फल मिलथे वो मोला घर बइठे मिलगे l" आँखी ला छत्कारत, गणेश पूछिस -वो कइसे? "

" चार धाम नइ जाना हे त पूछ? नइ ते जा अब घूंच l"

गणेश जान डरिस भइय्या के सुर आन तान होवत हे l चल दिस उहाँ ले l

महेश फेर गुनिस मैनखे ला तुतारी अउ मुखारी के जरूरत पड़थे l मन अउ बिश्वास,

धरम अउ करम जेकर श्रेष्ठ हे वोला का जरूरत हे चार धाम जाये के? कबीर साहेब के बानी  फोकट  नोहय " तीरथ गये दू झन चित्त चंचल मन चोर l एको पाप न उतरिया लाये दस मन और l" 

गंगोत्री म नहाये के सुख घर में हे घलो हे l 

 पाप धोके आथे उही मन तहाँ उही लद्दी म  म बुड़े रहिथे l

का पुन अउ का तरना? सबो जस के तस l

अमर नइ हो जाय l 

घिलर घिलर के नइ मरही त 

तड़फ तड़फ के मरही l  जेकर करनी करम सुधरय नहीं l 

उही बेरा चाय लेके गंगा आगे l 

महेश कहिथे -" जाना तहूँ चार धाम म l"

गंगा कहिस " तै इंहा रहिबे भोला नाथ  असन l कइसे गंगा तोला छोड़ के जाही l  संग मा रहिबो l तहीं हमर चार धाम तहीं हमर तीरथ l लक्ष्मण मस्तुरिया कवि बने कहे हे  " कहाँ जाबे बड़ दूर हे गंगा पापी मन इहें तरव रे!" महेश फेर उही बानी ल तुक के सुनाथे 

-" तीरथ गये दोई झन चित चंचल मन चोर l एको पाप ना उतरिया दस मन लाये और l"

महेश अउ गंगा दूनो  चार धाम जवइया मन ला देखत  रहिथे l 

मोटर म सबक

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