Sunday, 2 August 2026

लघुकथा ) सुधार

 (लघुकथा )



सुधार

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जाति-बिरादरी के बइठक मा लोगन सकलाय हें। समाजिक भवन के हाल खचाखच भरे हे। आज पंदरा ठो आवेदन लगे हे जेमा तेरा ठो हा तलाक के हावय। सबो मा प्रायः पति के दारू पी के मारपीट करना तेकर सेती पत्नी के मइके मा बइठे के हावय। दू प्रकरण हा गुला-झाँझरी के तको हे।

  ये दरी बने नवजवान मुखिया चुनाये हे जेकर कंधा मा समाजिक सुधार लाये के जिम्मेदारी हे। बाँकी पदाधिकारी मन तको ठीक-ठाक हें। 

पहिली प्रकरण के सुनवाई शुरु करत महामंत्री हा अवाज दीस-- ''तेज राम अउ प्रमिला खड़े हो जावव।"

महामंत्री के आदेश ला सुनके दूनों झन खड़ा होगें।

" ये तलाक बर आवेदन ला तैं लगाये हस नोनी। का होगे तेमा "--महामंत्री कहिस।

"ये हा मोला दारू पी के अबड़ मारथे। मैं उहाँ नइ राहँव। मोला तलाक चाही"--प्रमिला कहिस।

अतका ला सुनके मुखिया हा थोकुन गुसियावत कहिस- "अच्छा तोरे कहे भर मा तलाक हो जही। हमन इहाँ समझा बुझाके परिवार ला जोंड़े बर बइठे हावन तोड़े बर नहीं। समाज मा सुधार लाना हमर प्रण हे।" अतका कहिके तेज राम ला हड़कावत कहिस--"क्यों तुम शराब पीकर मारपीट करते हो? "

" नहीं मुखिया जी कसम से मैं दारू ला हाथ नइ लगाववँ। एला नइ रहना हे तेकर सेती फोकट के आरोप लगावत हे। "--तीज राम कहिस।

"कइसे वो प्रमिला, ये तो नइ पियँव काहत हे। झूठ मत बोलबे, सही-सही बता।"--एक झन सियान कहिस।

" पीथे--पीथे--पीथे। अभी चार दिन पहिली टुन्न पीके मोर मइके मा आके दंगा-दासी करत रहिसे"।

"कोनो गवाही साखी हे?"--मुखिया कहिस।

"हाँ। ये दे परोस के कका वो मेर रहिसे। ले तैं बता दे कका।"--प्रमिला कहिस।

अतका मा एक झन  हा खड़ा होके कहिस--" हव, ओ दिन तीजू हा फूल पीके आये रहिसे अउ गाली-गलौच करत रहिसे। "

"नहीं --ये झूठ बोलत हे। मैं उहाँ गेयेच नइ अँव। येला खवा-पिया के सेट करके गवाही दे बर लाये हें "--तीजू कहिस।

अतका ला सुनके मुखियाहा कड़क अवाज मा कहिस--" अरे चुप रा तैं हा। तोर दारू पीना हा प्रमाणित होगे। दारू पीना बहुत बड़े समाजिक अपराध ये। हमर जात मा प्रतिबंधित हे।तोला दस हजार रुपिया दंडित करे जाथे। प्रमिला ला तलाक नइ मिलय। तैं हा लिखित मा देबे के अब ले दारू नइ पियवँ। ये प्रकरण के इही फाइनल निर्णय हे। आगू आवेदन के सुनवाई शुरु करे जाय। "

     बाँचे आवेदन मन के सुनवाई करत रात के आठ बजगे। बइठक समाप्त होइस तहाँ ले सब घर चल दिन। पदाधिकारी मन बस डाँड़- बोड़ी मा सकलाये पइसा मन के हिसाब-किताब मिलावत बइठे हें।

अचानक एक झन बड़का पदाधिकारी हा कहिस-- " मुखिया जी आज तो नियाव करत-करत मूंड-कान पिरागे। सब झन थकगे हावन। कुछु व्यवस्था हो जय भई। "

"वोहो तैं तो मोर मुँह के बात छीन लेयेच। होजय---"-मुखिया कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

तोर बर...!

 तोर बर...!

                         चन्द्रहास साहू 

             मो न 8120578897


रेलगाड़ी अब एक उरेर के अउ लम्बा सिटी मारिस अउ हलु -हलु आगू कोती रेंगे लागिस। सइमो-सइमो करत स्टेशन, गमकत प्लेटफार्म  सब छुटत हाबे अब । अउ छुटना ही जुड़ाव के आस आवय। इही  जम्मो आस अउ विश्वास ले  ट्रेन हा अपन मंजिल ले अमरके फेर लहुट आथे। ......रोजिना इही क्रम चलथे- सरलग। इही सरलगपन ले नवा ऊर्जा अउ उछाह मिलथे यात्री मन ला। काखरो गुजर-बसर के जरिया बनथे तब काखरो अगोरा सिराथे। अब अपन स्पीड पकड़ ले रिहिस रेलगाड़ी हा। यात्री मन अपन सीट ला पोगरा डारे हाबे अउ कतको झन मन भटकत घला हाबे। कतको झन मन अपन अपन जिनिस ला तिरियावत हाबे अउ हियाव घला करत हाबे। भलुक जम्मो उम्मर के यात्री मन सफर करत हाबे फेर सब ले जादा उछाह मा हाबे तौन पढ़इयां मन के टोली आवय। जम्मो कोई एकेच उम्मर-जौजर। कोनो कालेज के आवय अउ अपन नौकरी बर परीक्षा देवाए ला जावत हाबे। परीक्षा के आखर सुनके सब गंभीर हो जाथे फेर येकर मन के बरन मा कोनो गंभीरता नइ दिखत हाबे। स्लीपर कोच के लोवर मा तीन झन टूरी अउ ऊप्पर मा दू झन टूरा बइठे हाबे। अइसना दूनो कोती हाबे अउ आर ए सी मा एक झन टूरा बइठे हाबे। भलुक जम्मो कोई मेछरावत हाबे फेर ये टूरा हा गंभीर हाबे। अइसन केंवरी उम्मर मा कोनो गंभीर होथे का  ? नहीं फेर  कभु-कभु परिस्थिति हा उम्मर ले जादा बड़का बना देथे। .... अउ बाप के बीते ले लइका हा तुरतेच बड़का हो जाथे। केंवची उम्मर मा पीरा सहे ला जान डारथे, घर चलाये बर सीख जाथे अउ विद्या के महत्तम ला घला समझथे पढ़ाई जीवन मा सुख पाबे तब जीवन भर दुख झेलबे अउ पढाई जीवन मा दुख उठाबे तब जीवन भर सुख मिलही। मेंहा आर ए सी वाला सीट मा बइठे राकेश के गोठ करत हावंव। रेलगाड़ी मा बइठे पढ़े के उदिम करत हे फेर रेणुका, मोहनी, रमेश अउ पवन कहां ले पढ़े ला दिही....?   ये जम्मो जौजर मन राच्छस बनके राकेश के पढ़ाई लिखाई यज्ञ मा बिघन बाधा उत्पन्न करत हाबे।

"अरे ! देख भाई डोंगरगढ़ के पहाड़ी ला, कतका सुघ्घर लागत हाबे।''

रेणुका किहिस।

राकेश मुड़ी उठा के देखिस। खिड़की के वो पार मैकाल पर्वत माला के अनंत छोर......! अहा...! अब्बड़ सुग्घर, अब्बड़ मनभावन, अगास ला अमरत पहाड़ के फुनगी, दाई के अचरा कस लहर-लहर लहरावत  फुनगी मा धजा-पताका, धजा पताका मा सौंहत देबी दाई के प्रतिकृति अउ दाई के ये बरन ले बरसत मया दुलार अउ आसीस। सिरतोन जौन देखथे तौने मनखे के अंतस हरिया जाथे। नवा ऊर्जा के संचार ले मन गमके लागथे। जम्मो कोई अपन मनोरथ सिद्ध होये कहिके अर्जी कर लेथे जगतारण देबी माॅं डोंगरगढ़ बमलाई ले। 

"मोरो बिनती सुन ले महतारी ! एसो के नवराति मा तोर अंगना मा घींव के जोत बारहूं अउ नौ दिन ले उपास रहूं।''

मोहनी भलुक फुसफुसावत किहिस फेर राकेश तो सुन डारिस वोकर गोठ ला। 

"ये सुग्घर जीवन देये बर देबी-देवता ला धन्यवाद दे मोहनी ! अउ जोत जलाहूं कहिके माता रानी ला घूस झन दे। मेहनत कर, पढ़ अउ घेरी-बेरी पढ़, सरलग पढ़ तब सब याद हो जाही वोकरे सेती करत करत अभ्यास के..... कहिथे।''

राकेश के गोठ सुनके मोहनी अकबका गे। सन्न खा गे। अउ जम्मो जहुरियां मन ठठाके हाॅंस डारिन। 

मोहनी लजागे अउ लजाये के संगे-संग अब रोसियाये लागिस।

"तुमन मोर आस्था ला खिल्ली झन उड़ावव।''

मोहनी के गोरिया बरन अब लाल होगे, आँखी फरिहागे। अउ  फुनफुनाये लागिस। फुनगी नाक जादा लाल होगे अउ वोमा नान्हे मोती के बूंद चमके लागिस। ससन भर देखत हाबे राकेश हा।

"येहां आस्था नोहे मोहनी ! अंधविश्वास आवय। जोत के भरोसा ले बिना पढ़े कोनो परीक्षा मा पास नइ हो सकय।''

राकेश किहिस।

"आस्था के मतलब विद्यार्थी मन बर एकाग्रता आवय मोहनी ! .. आस्था हा प्रश्न ले परे होथे।''

अब पवन घला पंदोली दिस अउ राकेश वोला फरिहा के किहिस।

"अपन कर्म मा आस्था राख कि मोर मिहनत हा फलित होवय। सौ प्रतिशत मिहनत अउ सौ प्रतिशत भरोसा ही आस्था के मूल आवय। मन ला एकाग्र कर अउ पढ़ नोनी !''

राकेश  समझाईस तब थोकिन शांत होइस मोहनी हा।

"भगवान के नाव मा दे ददा, दीदी  भाई बहिनी हो !''

भीखमंगइया आगे रिहिन। 

"हूं..''

सरिता मुँहू मुरकेटे लागिस। वो भिखारी के बरन ला देख के। 

"भलुक मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरे हाबे फेर  दिखे मा सांगर-मोंगर हे। गोड़ भर एक कन अपंगहा तो हाबे, खोरवा हाबे।''

सरिता फेर फुसफुसाये लागिस।

"खोरवा होगे ते का होइस। कोनो सुग्घर बुता कर सकथे। हमर गाँव के लोकवा वाला मनराखन बबा हा चना फुटेना के दुकान  खोल के सुग्घर बुता करत हाबे। ..... मोला अइसन मंगइया मन थोरको बने नइ लागे, अइसन घोरवा लुलवा सदा उपई , छानी मा चढ़के होरा भूंजई।''

अब मोहनी फुनफुनाये लागिस। वोकर मुँहू करू हो गे रिहिस। 

"दे दे बहिनी मंगइया आवंव।''

मंगइया किहिस अउ मोहनी भभके लागिस। 

"बुता के डर मा मंगइया बन गे हावस जांगर चोट्टा हो। मंगइया नो हरो तुमन, तुमन कोढ़िया आवव।''

छिन भर बर मंगइया हा छटाक भर होगे, वोकर मुँहू नानचुन होगे। चेहरा मा उदासी छागे। नानचुन टूरी अउ बोली मा अब्बड़ झार।

"का करबो बहिनी ! गाँव मा कोनो बुता करे बर बलाये नही अउ ... कोनो धंधा-पानी करबे तब अब्बड़ पइसा घला लागथे ....कोन दिही ? हमू मन ला कोनो साध नइ हाबे वो भीख माॅंगे बर फेर जीए बर तो बीख ला पीये ला परही ? का होइस ये हिनमान के बीख हमर भाग मा बदे हाबे ते। पी लेथन भगवान भोलेनाथ बरोबर अइसन बीख ला। एकरे भरोसी हमर लोग-लइका मन ला अमृत पियाथन, वोकर पेट के आगी ला बुता लेथन। .. का करबो जौन ला हाँसना हे हाँसे, थूकना हाबे थूके।''

मंगइया किहिस अउ मोंहनी तो वोकर मुँहू ला देखते रहिगे। उदुप ले राकेश हा अपन बैग ले सेवफल ला निकालिस अउ मंगइया ला दे दिस।

"बने सुग्घर रहो भाई ! दूधे खावव दूधे अचोवव। भगवान कुटुंब परिवार ला सुख अउ उछाह मा राखे।'' 

ससन भर आसीस दे डारिस मंगइया हा अउ अब आगू कोती चल दिस।

"अब अपन मूड ला बने कर ना यार मोहनी !''

वोकर जम्मो संगी संगवारी घलो मना डारिन फेर मोहनी तो अभिन घला शांत नइ होवत हाबे।

"अब सफर के मजा ला किरकिरा झन कर ना मोहनी ! देख, अब बिलासपुर जंक्शन अमर गे हावन। चल ताते तात चाहा पीके आथन। स्टेशन मा अभिन ट्रेन हा दस मिनट तक ठाढ़े रही।''

राकेश किहिस अउ हाथ ला धरके तीरे लागिस फेर मोहनी तो टस ले मस नइ होइस।

"देख मोहनी ! गरीब मनखे ईलाज बर लुलुवाथे, जेवन बर तरसथे अउ अपन अधिकार पाये बर खुरचथे। ... अउ सेठ साहूकार मन भलुक प्याज खाये बर छोड़ दिन फेर मनमाने ब्याज खाये ला धर लिन, मानवता ला बिसराके गरीब मनखे के तेल निकालत हाबे अउ अपन बर सरग निसेनी बनावत हाबे। देश के जम्मो मंदिर मा सोना के भंडार हाबे। अउ उही मोहाटी मा मंगइया के रेला हाबे। अतका असमानता हाबे हमर देश मा तब देश कइसे आगू बाढ़ही ? येखरे सेती मंदिर मस्जिद मा दान दक्षिना करे बर मोर मन नइ खंधे। अउ मेंहा थोकिन कठोर हो गे हँव।''

राकेश फेर समझाये लगिन।

मोहनी अब सिरतोन गुने लगिस अउ राकेश संग उतरगे। अब जम्मो संगी जहुरिया मन प्लटफार्म मा चहा के सुट्टा मारे लागिन।

"अपन साइंस सब्जेक्ट के प्रश्न ला समझ जाथो फेर गणित ला नइ समझ पावंव।''

प्रियंका हा संसो करत किहिस। अब जम्मो कोई गोठ बात करत हाबे।

"मोला तो करेंट अफेयर हा थर्रा देथे। सिरतोन करेंट मारथे वोहा।''

रमेश किहिस।

हो .... हो ... जम्मो कोई हाँस डारिन रमेश के गोठ ला सुनके। 

"प्रियंका तेंहा करेंट अफेयर सीख ले अउ तेंहा वोला गणित समझा दे।''

राकेश किहिस।

हँव बने तो कहत हाबे। एक दूसर के पंदोली दे देव। इही ला तो साइंस में सिंबायोसिस कहिथे।

"मोला तो गणित हा बने लागथे फेर केमिस्ट्री के समीकरण हा मोर समीकरण ला घाल देथे।''

केमिस्ट्री के समीकरण ला मेंहा बता दुहूं।

राकेश किहिस नरेश के गोठ ला सुनके।

"भाई ! मोला छत्तीसगढ़ के बारे मा बता ? अब्बड़ कन्फ्यूज रहिथों।''

छत्तीसगढ़ मा रहिके छत्तीसगढ़ ला नइ जानव, का बतावंव ?

विश्व के श्रेष्ठ आयरन ओर बैलाड़िला मा मिलथे। विश्व के पहेला संगीत विश्विद्यालय इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ मा हाबे। दुनियाँ मा सबले जादा धान के जर्मप्लाज्म इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर मा हाबे। उच्च गुणवत्ता वाला सुग्घर कोइला इहिच मिलथे। अतका सुग्घर अउ पोठ हाबे हमर छत्तीसगढ़ हा।''

राकेश गरब-गुमान करत किहिस। 

"दे दे राम...., देवा दे राम.....!''

उदुप ले एक झन मंगइया फेर आगे। गोड़ लड़बड़ावत हाबे। एक हाथ मा पाऊ धरे हाबे अब्बड़ मुसकिल ले अपन आप ला सम्हालत हाबे। अब्बड़ सामरथ ले रेंगे के उदिम करत हाबे। अब आगू मा स्लिपर कोच मा बइठे सुटेड बुटेड सभ्य कहवइया मनखे मन अपन मुँहू ला करू करे लागिन। 

इही हरे पोठ छत्तीसगढ़ भुइयां के गरीब मनखे। 

"मोला बने करे राम अंधरा बनाये....!''

अब कोनो बाबूलाल के गाना घला सुनाये लागिस।

राकेश गुने लगिस। बाबूलाल हा तो अंधरा हाबे फेर इहाँ के जवनहा मन कब जागही  ? मूल निवासी कब अपन अधिकार बर आगू आही ? थारी-लोटा धरके अवइया परदेसिया करा का जिनिस के कमती हाबे- स्कूल कॉलेज अस्पताल कारखाना अउ शासन मा उच्चा ओहदा तक हाबे। ......अउ हमन मूल निवासी करा का हाबे ? छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा। इही नारा मा भरमाए हाबे। गुनव कतका सुग्घर हाबे छत्तीसगढ़िया मन। राकेश के मन मा मथनी चलत हाबे। छटपटाए लागिस वोहा। मन बियाकुल होगे जम्मो ला गुनिस तब। 

उदुप ले मोहनी के कर्रस आरो ला सुनिस अउ अपन मन के मथनी ले बाहिर निकलिस राकेश हा। 

"........फेर आ गेस मोला माँगे बर। खोरवा लुलवा ले मोला सक्त नफरत हाबे। एक भिखारी ला कुछु देके पठोये नइ रहिबे अउ दूसर मन के रेला आ जाथे।''

तमकत किहिस मोहनी हा।

"कोनो जान सुनके खोरवा नइ होवय मोहनी ! कोनो न कोनो मजबूरी रहिथे। ....अउ का होइस  मंगइया मन माँग लेथे ते ? चोरी डकैती लूट पाट तो नइ करत हाबे।''

"का भरोसा ? कब काला चोरा लिही तेनला कोन जानही ?''

आगियावत मोहनी के गोठ सुनके राकेश समझाये लागिस।

"कतका ला चोरा लिही ?  खाये बर फलफलहरी, रोटी अउ बहुतेच होही तब हजार पाँच सौ ला । सादा कुरता वाला असली चोर तो करोड़ों ला चोरा के बिदेश मा घर बसा लिन। ... अउ कोनो पकड़इया घला नइ हाबे। इहाँ के एक रोटी के चोरी करइया ला दंदरत ले कुचर देथे। पाँच सौ रूपिया के चोरहा जीवन भर जेल मा धंधाये हाबे। येहा कइसन न्याय आवय।... बता ?''

राकेश आगियाये लागिस अब।

"ट्रिन.... ट्रिन.......!''

मोहनी के मोबाइल के घंटी बाजिस। मोहनी अकचका गे। "ये दरी दाई के फोन ?''

"हलो माँ !''

"हलों बेटी ! कहाँ अमरेस बेटी  ?''

"अभिन नागपुर अमरे हँव माँ !''

"बने बने जावत हव न बेटी ?''

"हँव माँ  ! हमन जम्मो कोई बने हावन। भोपाल अमरते साठ फोन करके बताहूं  ।''

"बेटी ......!''

"हाँ माँ !''

"का गोठ आय माँ ! बता।''

मोहनी के दाई के मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"ऊ....ऊ....!''

उदुप ले बबा जात के आरो आय लागिस अब।

"पाँव परत हँव पापा !''

"के दिन लागही टूरी तुमन ला लहुटे बर ?''

"काली परीक्षा होही ताहन लहुट जाबो जम्मो कोई। प...प...परनदिन आ जाबो ।''

"हूँ....!''

पापा हुंकारू दिस।

"पापा एक दिन बर.... मोसी गाँव  जाहूँ ...का ? राकेश घला उही गाँव के आवय मोला लेग जाही ....। मोसी के बेटी दिव्या बहिनी ले घला मिल लुहूँ ....। अब्बड़ दिन होगे भेंट-मुलाकात घला नइ होवय हे।''

मोहनी ढोढ़कत किहिस। 

ददा के रिस तरवा मा चढ़ गे। 

"तोला परीक्षा देये बर पठोये हँव, कोनो गाँव किंजरे बर नहीं। .... अउ राकेश ले दुरिया रहिबे। मनराखन के टूरा आवय ना !''

"हँव पापा !''

"वो टूरा ले दुरिहा रहिबे कोनो भी उच्च नीच होही ते तोर गोड़ ला टोर के खोरी बइठार दुहूॅं।''

गरजत किहिस ददा हा।

"अउ सुन ।''

मोहनी सावचेती होगे। कान मा असली परमाणु बम तो अब गिरही। ....अउ बेटी बर कोनो परमाणु बम तो आवय येहा।

"परीक्षा अतका जरूरी नइ हाबे ते तुरते घर लहुट जा। .... अउ जरूरत घला काबर रही ? तेंहा दाऊ के एकलौती बेटी आवस। पन्द्रा हजार के नौकरी बर आँखी ला फोर के झन पढ़। एकर ले जादा वेतन तो हमर घर के नौकर ला दे देथन। आजा लहुटके, बेटा राजा ला स्टेशन पठो दुहूं तोला लाने बर।''

ददा के गोठ घरघस लागिस मोहनी ला। सुकुरदुम होगे।

"विधायक हा अपन एकलौता बेटा बर  तोला देखे बर अवइया हाबे।  बड़का पद, बड़का प्रतिष्ठा, नेता अउ अभिन के विधायक संग मा अतराब के दाऊ- चार सौ पचास एकड़ के जोतनदार  वो भी डबल फसल वाला। वोकर बेटा संग बिहाव हो जाही तोर तब मेंहा गंगा नहा डारहूं। झप ले आ  जा बेटी !''

ददा छाती फुलोवत गोठियावत हाबे अउ बेटी हा तो सन्न खा गेहे। आखर के बीख कान मा परत हाबे अउ बेसुध होवत हाबे मोहनी हा। वोकर सपना टूटत हाबे । अगास ला छूके अवइया  पड़की चिरई बरोबर। ......एक- एक पाॅंख झरे बरोबर लागत हाबे।

"सुनत हस ना !''

कर्रस ले फेर आरो आइस ददा के।

"..... ह.. हव पापा !''

"ले बताबे तब। कब लहुटबे तौन ला ?''

"हूँ....!''

मोहनी हुँकारू दिस अउ मुड़ी गड़ियाके बइठगे। आँखी कईच्चा होगे। तरतर- तरतर आँसू बोहाये लागिस। 

"का होगे मोहनी ? का किहिस पापा जी हा।''

मया के गोठ सुनिस अउ अब गोहार पार के रो डारिस- हिचके लागिस, दंदरे लागिस मोहनी हा। 

"झन रो मोहनी ! दाई- ददा के गोठ मा रिस नइ करे।''

"हव, रिस  तो नइ करे के। फेर, मोर बाप हा तो पितृ सत्ता के अगुवा आवय। नारी के मन अउ देह मा अपन अधिकार समझथे, नारी ला अपन दास मानथे। आज विश्व हा इक्कीसवीं सदी मा रेंगत हाबे तब घला जौन करना हे तौंन ददा के मन से होथे। नारी ला खेलउना बना ले हे ये पुरूष प्रधान सोच के अगुवा मन हा। का पहिरना हाबे, का ओढ़ना हे। कहाँ जाना हे, कहाँ आना हे इहाँ तक का खाना हे तौनो ला .......  पुरुष हा बताथे। गरीब घर के बेटी ला जौन स्वतंत्रता हाबे तौंन हमर दाऊ बेड़ा मा नइ हाबे राकेश ! बिहाव के पहिली सपना के अगास देखाये रहिथे अउ बहुरिया हा अगास मा उड़ियाए ला धरथे तब वोकर पाँख ला कतर देथे। बिन पाँखी के चिरई के का अस्तित्व ?  बेटी तो चिरई आवय अपन फुदकना ले सबके मन ला हर्षा  डारथे ।  ... अउ इही बेटी हा अपन बर कोनो  सुग्घर जोड़ी चुन लिस तब ? ऑनर किलिंग हो जाथे। खाप पंचायत ला कोन नइ जाने। अइसना हाबे हमर झुठल्‍ला दाऊ अउ झुठल्ला दाऊ बेड़ा हा। आज मेंहा परीक्षा देवाए बर जावत हावंव तौंन हा दाई के बल मा जावत रेहेंव। ददा तो शिक्षा ले जादा सुंदरता ला देखथे । जतका सुंदर रहिबे ओतकी सुग्घर रिश्ता आही अइसे कहिथे ददा हा।.... अउ आगे विधायक हा अपन बेटा बर  रिश्ता धर के ।''

मोहनी फुनफुनावत रिहिस। चेहरा तमतमाए लागिस। पुरुष सत्तात्मक सोच बर घिन आये लागिस। उदुप ले राकेश ला ससन भर देखिस मोहनी हा । वोकर मन मा गरेरा चलत हाबे। ट्रेन चलत हाबे अपन रफ्तार ले अउ मोहनी के धड़कन घला। 

"राकेश !''

"हा, बोल ना मोहनी का बात आय।''

बॅाटल के पानी ला देवत किहिस राकेश हा। 

"कइसे लागत हाबे। तबियत तो ठीक हे न मोहनी तोर।''

मोहनी के मन बियाकुल होगे। वोकर मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"बोल न, का बतावत हावस ते ?''

मया के पंदोली पाये ले मोहनी ला बल मिलिस अउ अब्बड़ सामरथ करके किहिस।

"राकेश ! मेंहा तोर संग अब्बड़ मया करथो। मोर संग बिहाव करबे का ?''

नेह के बंधना मा तो पहिलिच ले बंधा गे रिहिस राकेश हा फेर अपनेच अंतस में राखे रहिस। ... फेर राकेश तो समझदार आवय। दिल अउ दिमाग के संतुलन बनाके फैसला लेथे। 

"नहीं मोहनी ! तोर पापा हा नइ मानही। ... अउ गोठ गोठ मा धमकी घला देवत रहिथे। ... ये  समाज तो घला कहाँ अपनाही। तेंहा दाऊ के बेटी अउ मेंहा बनिहार के लइका ........।''

राकेश उदास होवत किहिस। 

"समाज ला तो मांदी भात चाहिये राकेश ! काकरो बिगड़े कि बने, वोमन ला कुछु मतलब नइ राहय। चल भाग जाबो त फेर...... ये समाज ये शहर ले दूर बाहिर कोनो बिरान शहर मा !''

"अपन छइयां भुइयां ला छोड़ के कहाँ जाबो मोहनी !  कोनो उड़हरिया भागे टूरी टूरा ला समाज हा सुग्घर नजरिया ले नइ देखे। ....... अउ उड़हरिया भागे ले दाई ददा के नाक नइ कटा जाही ? बेटी के जनम धरते साठ दाई ददा मन हा वोकर बिहाव के जोरा-जारी करे ला धर लेथे अइसन मा मेंहा अपन मन ला मार दुहूं फेर तोर अउ मोर कुटुंब ला आँच नइ आवन देवंव।''

राकेश गंभीर होवत किहिस। मोहनी अब्बड़ समझाईस फेर राकेश तो टस ले मस नइ होइस।

"मेंहा जीवन भर तोर अगोरा करहूँ फेर कोनो आने के नइ होवंव।''

मोहनी किरिया खा डारिस.... भीष्म किरिया। 

"आनी बानी के गोठ झन गोठिया मोहनी अभिन पीरा होवत हाबे फेर बेरा के मरहम ले सब घांव भरा जाही। अपन पढ़ई मा धियान दे। तोर बर मोरले सुग्घर जहुंरिया मिल जाही।''

मोहनी अकचकागे। कतको टूरा मन वोला अपन बनाये बर किरिया खाथे, कतको झन मन अब्बड़ उदिम करथे मोहनी के दिल जीते के। ... अउ राकेश ? 

"तेंहा मोर संग मया नइ करस का राकेश ?''

मोहनी कलपत किहिस।

"हँव, नइ करंव।''

रट्ट ले किहिस राकेश हा। 

"मेंहा केहेंव न पढ़ई मा धियान लगा अइसे अउ तेंहा आनी बानी के गोठ गोठियावत हस।''

राकेश खिसियावत किहिस। मोहनी कलेचुप होगे। भलुक कलेचुप होगे फेर तरी-तरी अब्बड़ दंदरत हाबे, भंवर उमड़े हे, विचार हा मथनी कस मथत हाबे अंतस ला। 

अब  जम्मो कोती कलेचुप होगे। कोनो आरो आवत हाबे ते ट्रेन के पटरी के खटर-पटर के आरो। खिड़की ले बाहिर कोती ला देखिस। बड़का बोर्ड अउ बोर्ड मा सुग्घर आखर मा लिखाए राजा भोज के नगरी भोपाल मा भारतीय रेल जम्मो यात्री मन के स्वागत करत रिहिस। उदुप ले ट्रेन हा लम्बी सीटी बजाइस अउ स्टेशन मा ठाड़े होगे। कोनो उतरत हाबे तब कोनो चढ़त हाबे। चाय नाश्ता जुस अउ पानी बेचइया मन के चिल्लम पो....। 

राकेश मोहनी अउ संगी- संगवारी मन घला उतरे लागिन अब।  अब फ्रेश होही अउ अपन अपन परीक्षा सेंटर मा जाके परीक्षा देवाही।

            ... अउ नारी जात के जिनगी मा अब्बड़ परीक्षा रहिथे। बिन गलती के माता जानकी ला अगिन परीक्षा देवाय ला परिस वहू ला राम राज मा, तब तो येहां कलजुग आवय। कदम कदम मा परीक्षा देवाए ला परथे। भलुक मोहनी के हाथ हाबे फेर करम के डाड़ तो वोकर ददा के हथेली मा छपाये हाबे। जइसन करम तइसन भुगतना। कतको चतुरई करले फेर करम के डाड़ नइ मेटाई रे भाई ! 

               कनवा आँखी मा घला नइ सुहावय तइसन राकेश के आगू मा गरबी ददा हा ठाड़े हाबे मुड़ी नवा के आज। इही तो समय आवय। ... अउ येहा बेरा के ताकत घला आवय, ... अउ परीक्षा घला आवय। आज पांच बच्छर पाछू राकेश ला ये दिन देखे ला परही अइसन कभू नइ गुने रहिस राकेश हा। 

                            राकेश बैंक मैनेजर बनगे हाबे अउ आज मोहनी के घर ला कुर्की करे बर आये हाबे अपन मातहत मन संग। मोहनी के गरबी ददा हा लोन मा ट्रेक्टर लेये रिहिन अउ किश्त नइ पटा सके हाबे। बैंक तो नीति नियम अउ कानून ले चलथे। फेर बेरा हा झुका देथे घमंड करइया ला। 

"वन टाइम सेटलमेंट के योजना घला हाबे बाबू जी ! पचास प्रतिशत राशि ला जमा कर दे हफ्ता  दिन मा ताहन कुर्की  नइ होवय।''

बैंक मैनेजर राकेश मोहनी के ददा ला समझाये लागिस। कहाँ ले लानहूं अतका पईसा। ददा मने मन गुने लागिस अउ नीरस होवत किहिस।

"हँव ! कोनो उदिम करहूँ। कोनो सगा संबंधी ले माँगहूं...!''

संसो करत किहिस ददा हा। 

"बाबू जी ! मोहनी कहाँ हे ? .... अउ का करथे आजकल ?  

"मोहनी...?''

कुछू नइ गोठिया सकिस ददा हा अउ बड़का घर के कोंटा वाली कुरिया कोती ला देखावत किहिस।

"वो दे वोती हाबे अभागिन हा।''

"धक्क ले लागिस जी हा राकेश के। कच्च ले लागिस करेजा हा अउ गोड़ गरू लागे कस लागिस। गरू गोड़ ला उसालत जावत हे। वोकर आने स्टाफ मन उही मेर थिरागे।  कुरिया के कपाट उघरा हाबे। 

''खिड़- खिड़ खिड़- खिड़ ''

 कपाट के सांकल ला हला के बजाए लागिस राकेश हा। 

"कोन ? आवत हावंव।''

मोहनी के गुरतुर गोठ राकेश के कान मा परिस। राकेश अधीर होवत हाबे मोहनी ले मिले बर । ....फेर मोहनी ला तो बिलम होवत हाबे। एक घड़ी घला अब्बड़ बेरा लगत हाबे।.... कइसे बिलम नइ होही। अपंगही बर तो जम्मो बुता धिरन लागथे। .....अउ जब निकलिस बाहिर तब तो सुकुरदुम होगे दूनों कोई। मोहनी थरथराये लागिस। एक गोड़ मा कतका दम ? उदुप ले पाउ गिरगे इही हड़बड़ाहट मा। राकेश झटकुन सम्हाल लिस। ससन भर देखिस राकेश हा मोहनी ला। कुमलाये चेहरा, सुन्ना आँखी अउ हफरत मोहनी। 

आँखी उघरा दूनों के, न हूंकत हे न भूंकत हे। चुप... कलेचुप। सुई... सुई .... पंखा के डेना के किंजरे के आरो आवत हाबे। ...आरो आवत हाबे धड़कन के धड़क... धड़क । .....बेरा थिरागे अब। ....फेर कब तक बेरा थिराए रही। मौन टुटीस । अउ दुनो कोई अपन आप ला सम्हाले के उदिम करिन। राकेश पंदोली दिस। एक दूसर के आँखीं टकराइस। दूनों के आँखी ले अरपा पैरी बोहावत हाबे। 

"ये का होगे.....?''

राकेश के आँखी गोठियाये लागिस। 

भोपाल ले आवत रेहेंव।...... जम्मो यात्रा सुघ्घर रिहिस अउ गाँव के सियार मा अमरेंव तभेच केचबिल लगे ट्रेक्टर मा एक्सीडेंट होगे। मेंहा तो बेसुध हो गेंव अउ जब सुध आइस तब एक गोड़ वाली होगे रेहेंव। 

"मेंहा तो विधायक के बेटा संग बिहाव होगे होही काहत रेहेंव मोहनी ! कभू फोन घला नइ करेस ? 

"नहीं, कोनो खोरी ला कोन गोसाइन बनाथे राकेश ! तहूं तो मोला फोन नइ करेस ?''

"हँव, मेंहा तो करे रेहेंव फेर  रिजेक्ट कॉल में डाल दे रिहिस मोर नंबर ला।

"जब मोबाइल नइ रिहिस तब अब्बड़ सुख दुख के संगी संगवारी रिहिस, अब्बड़ गोठियइया रिहिन फेर मोबाइल आगे तब कोनो गोठियाइया  नइ होइस। का करहूं....? 

रोज अगोरा करत रेहेंव तोर ...! कभू घर आबे अइसे फेर.....!''

आये हँव न आज।  

"अच्छा ते सुना...?  तोर होगे बिहाव ? के झन लोग लईका हाबे ?''

मोहनी नकली मुचकावत किहिस।

"न..... नहीं.... नइ होए हाबे।''

"काबर नइ करेस बिहाव ! अब तो नौकरी घला लगगे हाबे। कोनो घला मिल जाही...! काबर नइ करेस बिहाव ?''

तोर बर.... नइ करेंव बिहाव। फेर तोर आगू आए के सामरथ नइ होइस।

सिरतोन 

तोर किरिया।

तहूँ ला कर लेना रिहिस। काबर नइ करेस बिहाव ?

तोर बर ......!

दूनों के हाथ एक दूसर मा धराए हाबे सात जनम तक साथ निभाए बर अब...। 

                    चन्द्रहास साहू 

                       धमतरी

अरजदूज (रथयात्रा)* (बाल कहानी)

 *अरजदूज (रथयात्रा)*

                          (बाल कहानी)

बहुत दिन के बात आय, जनकपुर गाँव मा शिवा नाम के एकझन लइका रहत रहिस। शिवा बहुतेच चुलबुला अउ सीधा-साधा रहिस। वोकर मन मा भगवान जगन्नाथ बर अटूट मया रहिस।

      हर बछर जब अषाढ़ महीना के अंजोरी  पाख के दुतिया तिथि आवय, त गाँव मा अरजदूज के बड़ धूम-धाम रहय। शिवा हा सियान मन ले सुने रहिस कि उड़ीसा के पुरी मा भगवान जगन्नाथ, वोकर भइया बलभद्र अउ बहिनी सुभद्रा हा बड़का-बड़का लकड़ी के रथ मा बइठ के नगर मा घुमे बर निकलथें। उही बात ल सुन के शिवा के मन मा रथ बनाय के भाव जागिस। वहू हा अपन भगवान बर रथ बनाय के तइयारी करिस। वोकर कतको संगवारी मन ओकर खिल्ली उड़ाइन- "तैं कइसे रथ बनाबे शिवा? तोर तीर तो बड़का लकड़ी नइ हे। रथ तो रथ चक्का घलो नइ हे।"

फेर शिवा अपन संगवारी मन के बात मा धियान नइ दिस। वो हा अपन घर के बारी मा पड़े एक ठन जुन्ना गत्ता के डिब्बा ल लानिस। वोला सुग्घर रंग-बिरंगी कागज ले सजाइस।  शिवा के रथ के ऊपर ढाँचा हा तो बनगे फेर चक्का नइ बन पावत रहिस। शिवा के मिहनत अउ लगन ल देख के वोकर ददा हा वोला नान्हे-नान्हे चार ठन चक्का बना के दिस। शिवा हा अपन हाथ ले माटी के तीन ठन नान्हे-नान्हे मूर्ति बनइस। जेमा भगवान जगन्नाथ, जेकर बड़का-बड़का गोल-गोल आँखी रहिस। भइया बलभद्र अउ बहिनी सुभद्रा।

     शिवा हा मूर्ति मन ल रथ मा बइठारिस अउ वोला रंग-बिरंग के  फूल माला ले सजाइस। वोकर रथ ल देख के वोकर संगवारी मन बड़ खुश होइन अउ शिवा के संग काम मा हाथ बटाइन। शिवा के बनाय रथ बड़ सुग्घर दिखत रहिस।

   जब अरजदूज के दिन अइस तब जनकपुर गाँव मा 'जय जगन्नाथ' के जयकारा गूंजत रहिस। सब सियान-जवान मन बड़का-बड़का रथ ल खींचत रहिन। शिवा घलो अपन नान्हे  रथ ल एक ठन रस्सी मा बाँध के खींचे लगिस। शिवा अउ वोकर संगवारी मन गावत रहिन -

“जगन्नाथ  भगवान, लइका  मन  के   शान।

जगन्नाथ के रथ भारी, आवव खींचव ओरी-पारी।”

बोलो, जय जगन्नाथ, जय बलराम, जय सुभद्रा।


इही बीच अचानक जोरलगहा पानी गिरे लगिस। सब लोगन मन अपन-अपन रथ ल छोड़ के छुपे बर भागे लगिन। शिवा घलो डर्रागे कि वोकर माटी के भगवान अउ कागज के रथ हा पानी मा भीग जाही। वो हा रोवत-रोवत अपन रथ ल एक ठन बड़का पीपर पेड़ के खाल्हे मा ले गिस अउ अपन दूनों हाथ ले रथ ल ढाँक के ठाढ़ होगे। वोकर संगी-साथी मन सब अपन-अपन घर भागगें। शिवा हा अकेल्ला पीपर पेड़ कर खड़े-खड़े तीनों मूर्ति ल देखत, भगवान ल सुमरत रहिस कि- “हे भगवान! मोर मूर्ति के भगवानमन भीगय झन एला बचा ले।” 


          तभे एक चमत्कार होइस। शिवा ल महसूस होइस कि वोला कोनो छुवत हे। वो हा आँखी खोल के देखिस त वोकर तीर मा एकझन करिया, एकझन सादा अउ एकझन पींयर रंग के ओन्हा (कपड़ा) पहिरे तीन लइका मन ठाढ़ (खड़े) रहिन। वोमन शिवा ल देख के मुसकाइन अउ कहिन- "शिवा, तोला जाड़ लगत होही। भूख घलो लगत होही। चल हमन ल जगन्नाथ जी के गजामूंग के प्रसाद खवा।"

शिवा  उँकर बात ल सुन के अकचकागे। वो हा अपन झोला ले अपन महतारी के बनाय गजामूंग के प्रसाद ल निकालिस अउ वो मन ल दे दिस। वोमन  मिल के बड़ मया ले प्रसाद ल खाइन। वोकर बाद वोमन शिवा के रथ के रस्सी ल धर के खींचे बर लागिन। देखते-देखत पानी गिरना बंद होगे अउ अगास मा सुग्घर इंद्रधनुष निकल गे। शिवा हा अब्बड़ खुश होगे। थोरिक देर बाद जब शिवा हा पाछू मुड़ के देखिस तब वो तीनों लइका मन उँहा नइ रहिन। शिवा, तीनोंझन ल कहाँगे? कहाँगे?  कहिके एती-ओती खोजे लगिन? वोमन नइ मिलिन फेर वोकर नान्हे  रथ मा रखे माटी के मूरत मन मा एक गजब के चमक रहिस, अउ अइसन लगत रहिस जइसे भगवान जगन्नाथ हा वोला देख के मुसकावत हें।

    शिवा ये समझ गे कि भगवान जगन्नाथ हा वोकर सच्चई अउ मया ल देख के वोकर संग खेले बर आय रहिन। वो दिन के बाद ले गाँव के सब लइका मन शिवा के संग मिल के अरजदूज (रथयात्रा) मनाय लगिन।


कहानीकार

डॉ पद्‌मा साहू 

खैरागढ़ छत्तीसगढ़

टेचरही*

 *टेचरही* 

      *सोना ----हे।।*

लेड़गा कहिथे कइसे उसनिंधा- उसनिंधा दिखत हस जी।मे कहेंव हव रे लेड़गा सुने रेहेंव सोना मना हे।तेखरे सेती रात मे लिख पढ़ के जागे के उदिम करत हंव।हमर देश के सैनिक मन रात दिन देश बर पहरा दे सकत हे,त थोकिन हमू मन सहयोग कर सकत हन।लेड़गा कहिथे मोर तो नामे लेड़गा हे तैं तो मोरो ले बड़े वाला हस।मे कहेंव काय होगे जी।वईसन  बात नोहे जी सरकार  कहिस 

कम से कम एक बछर तक सोना बिसई ल बंद कर देव।देश के हालत (अर्थव्यवस्था)म सुधार आ जही।हमन हाल कमईया हाल खवईया कहां सोना ले सकबो जी?हमर टेकनी तो खुदे ओकर फोकट के पैंतीस किलो चांऊर म टेके हे।हप्ता म तीन चार दिन कमाथन।थोड़िक साग भाजी बर हो जथे बांकी शोले स्पेशल छत्तीसगढ़ के काम आथे।उही बहाना हमू मन अर्थव्यवस्था म सहयोग करथन।भले दान म सोना नी चढ़हा सकन।वईसे हमर राज ह शेरा म पहिली नम्बर हे।

             सरकार दे खाय बर त कोन जाय कमाय बर।अब एक ठन राज्य सरकार ह एक ग्राम सोना देके योजना घलो बनाय हे।नवा बईला के नवा सिंग चल रे बईला टिंगे टिंग।

              फेर गुनथों रे लेड़गा आलू ले सोना बनाय वाला मशीन मिल जतिस त ये सोना वाले झंझट खतम‌। एक डहर ले आलू डालो दूसर डहर ले सोना -सोना। बने होतिस सरकार ह घर पाछू एक एक ठन मशीन बांट देतिस। फेर धारमिक जगा मे भक्कम सोना चड़होत्री होतिस।अऊ कोनो ल चढ़ावा ल भसकाय ल घलो नी पड़तीस।भईया वईसन झन सोंच मौसम बिगड़े के बाद घलो रडार पकड़ लेथे।इहां सब कुछ मुमकिन हे।अऊ अईसन होतिस त सबके भाव बड़ जतिस जईसे सोना के।कईमया मन ल घलो रोज आरती उतार के ढोल मंजिरा धरके परघाय ल पड़तिस।जईसे भागवत पढ़हईया मन ल रोज परघा के गद्दी म बईठारथन।

           हे भगवान महूं ल कोनो जगा चंदा गिने के काम मिल जतिस दरसन के दरसन मन रहितिस परसन।

         लेड़गा पेट ल दबा के हांसत- हांसत कहिथे चल भईया सोना हे।

         फकीर प्रसाद 

         साहू फक्कड़ 

           सुरगी 🙏

बिजली*

 *बिजली*

           बिजली के नाम सुनके दिल अऊ दिमाग हाल जथे।वईसे लेड़गा बतात रिहीस वोकर लेड़गा होय के पाछू बिजली के हांथ हे। बिजली आनी -बानी के सपना देखाइस संगे जीबो संगे मरबो कहिके किरिया खवाइस। ओकर रंग रूप म अइसे मोहागेंव के चारों मुड़ा बिजली आंखी म झूले लगिस।जईसे सावन म कोनो जोड़ा मन झुलना म झुलथे। सबके अपन -अपन दिन बादर होथे।जइसे कोनो ल भूत परेत धरेके बाद ओकर आंखी म उहीच -उहीच मन झुलथे।हम सबके आदत घलो पड़ जाय रहिथे नवा नवा कोनो जिनिस आय रहिथे त पुचपुचाय के।नवा नवा दमाद मन ल घलो बड़ पुचपुचाय के सऊंक रहिथे।हाय मोर सारा,हाय मोर सारी,हाय मोर ससुर।फेर जादा मया करबे त अइसने घलो हो जथे जइसे एक ठन गाना म कहिथे नीला दुपट्टा कुरती के रंग लाल जादा मया झन करबे हो जही जी के काल होईरे होईरे।

                   लेड़गा हम तोर दुख पीरा ल समझ सकथन।जस तोर हाल तस हमर हाल।लेड़गा पूछिस कईसे भईया? पहिली हमन चिमनी,कंडील,गोरी दिया ल जला के रही जात रेहेन।फेर जब ले बिजली ह आइस हमर दिमाग के बत्ती गोल होगे ।हमन एकर रंग रुप म मोहागेन। पहिली चालिस,साठ,सौ,वाट ल घलो झेलत रेहेन।कहिथे नवा बईला के नवा सिंग चल रे बईला टिंगे टिंग।सऊंके सऊंक म मीटर बर पईसा घलो देन अउ आज ले घलो देवत हावन। ये हर सरकार बर दान के दान अउ ईनाम के ईनाम वाला किस्सा आय।सबले पहिली हमन ल समझना चाहि बिजली करेंट ले चलथे अउ झटका घलो देथे। सरकार ह बिल म बिजली दिल म।थोकिन गरेरा चलिस बिजली बंद, पानी गिरिस बिजली बंद, गंदी बात।अतिक झटका दे बाद घलो मनखे मन नई सुधरे।जईसे कोनो सुवारी मन मनखे के कोनो नस ल टमड़के गुदेलथे,तईसे सरकार ह हमर नस ल टमड़के गुदेलथे। पहली चकरी वाले मीटर चलत रिहीस, फेर इलेक्ट्रॉनिक मीटर आईस, अब रिचार्ज के नंबर आगे। रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम,जतका(जितना) पईसा ओतका(उतना) काम।

                 बिजली बचाओ के नारा ननपन ले सुनत आवत हन जईसे गरिबी भगाओ के नारा। पहिली के झोलझोलह चड्डी के नारा नंदागे फेर------।मे हर एक झन गुरुजी ल पुछेंव पहिली के चालिस ,साठ ले अबके पांच सात वाट के बिल आधा छुट के बाद घलो काबर जादा आथे जी,त गुरुजी बताईस इही विकसित,नवा भारत आय जी जे हर घर मे घुंस के मारथे।


        *फकीर प्रसाद साहू*

               *फक्कड़*

           *सुरगी राजनांदगांव*

ठेलहा*(बेरोजगार )

 *ठेलहा*(बेरोजगार )

              लेड़गा मुंह ल ओथराय मुड़ धरके बईठे रिहिस।मे पुछेंव काय होगे जी?लेड़गा कहिथे (ठेलहा) बेरोजगार मनखे काय बतांव भईया सरकार वेकेन्सी फेकेन्सी घलो नी निकाले। रोजगार के संसो धर लेहे।मे पूछ परेंव काय पढ़ें हस जी।लेड़गा ठसन (अकड़त)मारत कहिथे बारहवीं पास हों, अस्सी परसेंट, अव्वल आय हो।मे मनेमन भुनभुनात कहेंव इहां नीनानबे वाले मन ले देके डांकघर मे लगत हे अऊ कहां ये।मे बात ल सलटावत कहेंव तैं तो मंडल आदमी तोला का नौकरी के जरुरत? कोनों बिजनेस -विजनेश करतेस। हेल्दी हस, (तंदरुस्त हट्ठा -कट्ठा) स्मार्ट हस।लेड़गा मोर दिमाग के गरी म फंसगे।कहिथे दू,चार ठन बिजनेस के बारे में बतातेस भईया। मे कहेंव मोर बात ल ध्यान लगा के सुन । एक तो तै स्कूल खोल ले भले ते बारहवीं पास हस। पांच छै झन बने पढ़े लिखे मन ल गुरुजी बनादे।कहिदे वेतन (पगार)चार अंक म।वहू मन खुश कम से कम सागभाजी अऊ जेब खरचा चलही।भले कुंवारा मन बर बिहाव बर ऐंड़ी रगड़े ल पड़े।बाजू म एक ठन एटूजेड दुकान खोल ले।जिहां तोरेच स्कूल के डरेस , मोज़ा,जुता,टाई,कापी किताब मिले।अऊ बड़े -बड़े पोस्टर छपवा देबे। हमर इंहां केजी वन ले फलाना -फलाना तक स्मार्ट तरीका ले पढ़हाय जथे।जईसे जंतर-मंतर में। फेर लईका मन के एडमिशन फीस तोर एनवल फंसंन के पईसा तोर, परिक्षा फीस तोर, दुकान के कपड़ा लत्ता के पईसा तोर, स्कूल गाड़ी के पईसा तोर।लेड़गा गदगद् होगे।मन में पहली लड्डू फूटा।लेड़गा कहिथे अऊ दूसर बता न भईया।मे कहेंव दूसर म हस्पताल खोल ले। बने बने डाक्टर मन ल सेटिंग करले।अभीनेच मऊका बढ़िया हे जंतर-मंतर के भावी डाक्टर ल पूछ ले अऊ नर्सीग करके ठेलहा बइठईया मन नर्स।सादा सादा पहिरे हे परेतिन के   बाना घेरी -बेरी आना सुजी लगाना,बाटल ल चढ़ाना।बगल म मेडिकल खोल ले।अऊ बड़े- बड़े बैनर म लिखवा दे हमर इंहां आधुनिक तरिका ले ईलाज करे जाथे।जान हे त जहांन हे।मनेमन कहेंव भले बीमारी ल तूही ल पूछ लिही अऊ खीसा भर दवई लिख दिही। नहीं ते सीधा भर्ती।जईसे चौकीदार के।लेड़गा कहिथे कतनो मन जांच बर भटकथे भईया ।अभीकुन एक ठन जचकी के रतिहा रिपोर्ट ल दिन के बारा बजे दिस ओकर बिना ईलाज नी होईस लईका गुजरगे।लेड़गा जब अतिक समझदारी हे त अस्पताल मे लैब घलो खोल लेबे। फेर मरिज के पईसा तोर, जांच के पईसा तोर, मेडिकल के पईसा तोर पईसच पईसा।मन मे दूसरा लड्डू फूटा।

            लेड़गा कहिथे एकात ठन अऊ बताते भईया।मे कहेंव अब ते खोल अंडा रोल।सस्ताहा लगे न बड़काह हो गेहे सब खबड़ाहा।ओपन नही ते क्लोज।ऐकर आगू म सब्जी पसरा फेल।पईसच पईसा।लेड़गा बेसुध (बेहोश)।

         

               फकीर प्रसाद 

                साहू फक्कड़ 

                   सुरगी ✍️🙏

दूवारी के बाहिर (छत्तीसगढ़ी कहिनी)

 दूवारी के बाहिर (छत्तीसगढ़ी कहिनी)

रामहिन घर बूता म लगे रहिस हे। कमल ह खेत डाहर गे रहिस हे। असो मानसून आये म देरी होवत रहिस हे त सब ल चिंता होवत रहिस है। एक रस जोताई कब होही इही चिंता म सब लगे रहिन हें। 

चाय बनाये बर रामहिन ह कमल ल जोहत रहिस हे। तभे लखन अउ लीला आ जथें। रामहिन ह बने बइठक म बहिठारथे। चाय बनाये बर पानी ल चघा देथे।

लखन ह पूछथे"कमल कहाँ गे हावय?"

"खेत डाहर गे हावय"

"मानसून ह तो बस्तर म घूमत हावय, उंहा के हरियाली भा गे हावय, ये डाहर आते नइये। एक बेर पानी गिरही तब तो ट्रेक्टर ल चलाबो।"

तभे कमल आ जथे, "हव भाई पानी गिरही तभे तो खेत जोतबो। खेत के पीरा ल देखे बर गे रहेंव। दर्री छांड़ दे हावय। मोला देखके खेत रोवत हावय मैं ओला देख के रो डारेंव।"

लखन कहिथे "खेत ह कइसे रोही?अलकरहा गोठियाथस जी। ओ कोनो जीव आये तेन रोही, तहूं बड़ दार्शनिक बनथस जी। तोर गोठ ल सुनबे त बड़ अचरज होथे।"

रामहिन चाय लान के देथे, संग म ठेठरी रहिथे। 

लीला कहिथे "अभी ठेठरी बनाये हस रामहिन, ये तो सीता जही।"

"ये दे दू दिन म सिरा जही, खाये के मन लाग रहिस हे। सांझ कन खाये बर कुछु तो होना।"

"हाँ ,बने काहत हस, हमर घर तो खाली चाय पीथे। मन होही त समोसा भजिया लानथे, गाँव के होटल ले।"

"हाँ उंहा के समोसा अउ मुंगौड़ी बढ़िया रहिथे।"

चाय सिरा जथे, रामहिन सौंफ लान के देथे त लीला कहिथे "तहू ह सौंफ दे के सगा बना देथस रामहिन।"


रामहिन कहिथे चाय के मीठ के बाद काला खाबे? सौंफ बने हे सुपारी ह गला म फंसथे।"

"हाँ सही ताये, आजकल तो सब तम्बाकू म लगे हावंय, घरो म खाये बर देथे बहिनी।"

"तोर बेटा ह तो बेंगलोर गे हावय का लीला?"

"हाँ छः महिना होगे हावय, पढ़ाई करे बर गे हावय।"

"रायपुर म तो बने बने कालेज हावय त इंहा काबर नइ पढ़ायेस?"

"बेंगलोर म पढ़थे तेन मन ल उही डाहर बने नौकरी लग जथे अइसे कहिथें अउ अब्बड़ पइसा मिलथे।"

"तोर घर पइसा के कमी हावय का", बीस एकड़ खेत फेर बड़ेजन बाड़ी हावय जिंहा के साग ह तो धमतरी म बेचाये बर जाथे।"

"तभो ले कब तक गाँव म बइठे रहिबो, अब बाहिर जाये के जमाना आगे हावय। शिक्षा बाढ़त हावय दुनिया जुड़त हावय त लइका ह इंहा काये करही? गुटका खावत एती ओती निठल्ला घूमही। शहर म रहिही त किराया दे अउ तनख्वाह कमती त घर कइसे चलाही।"


"हाँ बने कहिथस लीला मोर बेटा अमर ह तो धमतरी कालेज म पढ़त हावय। आये दिन दोस्त मन संग घूमत रहिथे। बेटी जूही ल तो जमाना देख के पी जी म रख दे हावंव। जिंहा रहिथे तेन मन बने हावंय। ओखर बेटी संग दोस्ती कर ले हावय। एक भाई हावय।"


"बने करेस आज कल बेटी मन ल बहुत पढ़ाना चाही।"

येती कमल अउ  लखन के गोठ चलत रहिथे। गाँव के बदलत स्वरुप के चिंता करत रहिन हें।


कमल कहिथे"आज देख ले पूरा गाँव कइसे सीमेंट म बदलत हावय। रोड ह घलो सिमेंट के बन गे हावय। शहर गाँव बदलत हावय।"


"हाँ भाई कमल बोर होगे हावय अब दतुअन धर के तरिया जाना बंद होगे हावय। तरिया म चार झन मिलन त गोठ बात होवय वहू सिरागे। आगी माँगे के बहाना म घर के हाल चाल मिलय अब तो अलग ले बइठे बर जाये ले लगथे। बरवट के गोठ नंदागे।"


"हाँ अब कहाँ के नौकर चाकर? रोजी म बला ले, खेती के सबो काम तो ट्रेक्टर म होवत हावय। गाय कखरो कखरो घर म बाँचे हावय त पेंउस खाये बर मिल जथे नहीं त दूध दही सब देवभोग के आगे हावय।"लखन कहिथे।

"इही बहाना छत्तीसगढ़ के गाय के दूध पीये बर मिल जथे।"

"बादर करियावत हावय पानी गिरही तइसे लागत हे। चलत हन भाई। अउ बइठ जबो त खाये के बेरा हो जही।"

"ठीक हे खा के जावव, दूनो झन मिलके रांधलिही।

"रामहिन सुन तो"

"काये?"

"लखन लीला मन खा के जाहीं कुछु बने असन रांध लेवव।"

"आमा के अमरस अउ सोंहारी बनाथे। बने ढेंस के सब्जी बनाथे, जवाँफूल चावल बनथे त खूशबू ह अँगना तक पहुँच जथे।


" हमर खेत के चाउर कतका ममहावत हावय। उत्पादन तो नइ होवय फेर खाये बर ठीक हे। "

"तभे तो एखर बने कीमत मिलथे"

रामहिन ह पाटा लगा गे खाये बर बलाथे। दूनो झन हाथ धोके खाये बर बइठथें।

 लीला ह थारी म अमरस अउ सोहांरी लान के रखथे। भरवा अथान के एक फांकी रखे रहिथे। एक माली म डेंस अउ आलू के साग लानथे। गोंदली बने गोल गोल काट के देथे।

बने सुवाद लेके दूनों झन खाथे। भात ल परस के लीला अउ रामहिन खाये बर बइठ जथें। डेंस ह आरंग डाहर ले बेचाये बर आथे त मोठ रहिथे अउ फिसफिस ले चुर जथे। लखन ह डेंस खा के खुश हो जथे।

अब दूनों झन बिदा लेथें।

जावत जावत लीला कहिथे सुन तो रामहिन।

" काये लीला? " 

लीला आके कहिथे "एक ठक बात सुने हस?

"काये?"

"जग्गू के बेटी रायपुर म पढ़त रहिस हे तेन ह बिहाव कर लिस।"

"काखर संग लीला?"

" कोनजनी, कोनो कहिथे बस्तर डाहर के आये। इंहा नौकरी करत रहिस हे।अकेल्ला बेटी आये न देखिस होही बने खेतखार हावय कहिके।"

"आजकल तो इही चलत हावय, अपन मर्जी ले बिहाव करत हावंय। हमर लाइका के काय होही?"

"ओखरे सेति तो रामहिन, मैं ह पी जी म बेटी ल रख दे हावंव। आजकल के बेरा बने नइये।"

"तोरो बेटा तो काखर  संग म घूमथे सुने हंव।"

" नहीं रामहिन अइसे कइसे हो सकत हे। मैं तो ओखर संगवारी मन ल पूछत रहिथंव।"

"बने पूछबे, लड़की पुलिस हावय। बने देख ले। बने जात के आये पसंद करही त बिहाव कर देबे। आजकल सब चलत हावय।"

"तैं का सुना देस बहिनी रामहिन मोर दिल ह टूटगे।"

"दूसर काये करत हावंय येखरे खबर ल रखथस, अपनो घर ल देख। घर दूवारी म खड़े होके तोला रंग रंग के गोठ ह सुझथे। दूसर के घर ल काबर झांकना, ताक झांक करई बने नोहय। तैं बात निकालेस त मैं बतायेंव। मोला का मतलब रहिस हे लीला।"

"अइसे झन कह बहिनी, तैं मोर बड़े बहिनी अस अउ सहेली घलो आस। मोर लइकामन तोरो आये। तैं मोला नइ बतायेस त मोला बने नइ लागिस रामहिन।"लीला के आँसू निकलगे।

उही बेरा म लखन चिल्लाइस "लीला कतका गोठियाबे। घर भितरी गोठियाबे  फेर दूवारी मेर गोठियाये तोर मन नइ भरय। काबर? अइसे का बात होथे जेन ल माई लोगन मन दूवारीच्च म गोठियाथें। हर घर के इही हाल होथे"

लीला अपन आँसू पोछत चल देथे। जावत जावत रामहिन ल कहिथे "रामहिन तैं सही कहेस मैं हमेंशा दूसर घर ल  ही देखत रहिथंव। मोला अपन घर ल घलो देखना चाही। मोरो जवान बेटा अउ बेटी हावय।"

"काबर आँसू पोछत हस मोर बात ह तोला लगगे, जा अउ गोठिया ले। माई लोगन मन के दूवारी के गोठ ह समझ म नइ आवय।

सही कहेस भाई लखन येमन ऐती कहिहींं के बेरा नइये, अउ गोठियाते जाहीं। कोनो तीर म चल देस त बात बंद हो जथे।  बात ल पलट देथें। एक दिन लुगरा पहिर के मुड़ ल तोप के चुपचाप सुनना चाही।"

चारो झन हाँसत अपन अपन घर चल देथें।

समय  गुजरथे, सही म लीला लखन के बेटा ह एक दिन कोर्ट म बिहाव करके बहू ल धर के गाँव आ जथे। गाँव भर म हल्ला हो जथे। लीला ह रामहिन ल बताके सलाह लेथे। रामहिन कहिथे "गाँव के सामुदायिक भवन म आजे पंडित ल बला के भांवर परा देथन।"

"हव बिहाव करे बर परही रामहिन। दूसर ल बदनाम करत राहंव, आज मैं बदनाम हो गेंव। सबके दूवारी दूवारी म जाके लोगन मन रंग रंग के गोठ गोठियाहीं। आज मोर घर के गोठ ह घर घर के दूवारी म जाही।" अउ लीला रोये ले लग जथे।

रामहिन कहिथे "सब बात ल छोड़। अब पंडित ल बलावत हंव इहें बात करबो। पंडित ल फोन लगा के कहिथे के अभी सामुदायिक भवन म लीला के बेटा के बिहाव करना हे। सब पूजा के सामान धर के आ।"

पंडित ह सब सामान बर फोन लगाथे। दू घंटा म तोरन लग जथे मड़वा गड़ा देथे। अपन बेटा अमर ल कहिथे "चल तोर भाँवर परहि तभे बिहाव ल मानहुं, कोर्ट ल मैं नइ मानव। वैदिक बिहाव होना चाही।"


अमर चुपचाप बइठ के सुनथे अउ मुड़ ल हिला देथे। ओला अपन गल्ती के एहसास होथे अउ अमर लीला के पाँव परके माफी माँगथे। रामहिन कहिथे माफी मांगे ले बदनामी तो बदल नइ सकथ। गये इज्ज्त वापस नइ आवय। 


लड़की ह सुनत रहिस हे तीन घंटा ले चुपचाप बइठे रहिस हे। उठ के आथे अउ लीला रामहिन के पाँव परके माफी माँगथे


 "सही म गल्ती होगे हमन ल पहिली ले बात कर लेना रहिस हे। हमन सोचेन के सब झन मना कर दिही।"


रामहिन कहिस "मना कर देतेन त अलग अलग ही रहितेव। प्यार म शारिरिक सुख जरुरी नइ राहय। प्यार ह मन के मिलन आये। दूनो बिहाव झन करतेव। एक दिन तो माँ बाप मन मान जथें।"


"हाँ आपमन सही कहेंव। अभी भी आपमन साथ देहु त करबो नहीं त अपन अपन घर चल देबो।"

लीला कहिथे " अब तोला हथकड़ी लगही, मोर बेटा ल फंसाये हस त हमन तोला बिहाव  के बंधन म फँसा के रखबो। समझे अब तोला ससुराल के जेल म रहना हे।"

"हाँ माँ जइसे आफमन कहिहु।"

सामुदायिक भवन ले बुलावा आ जथे। सब सामान आ जथे। गाँव तो सब मिल जये। सबके पइसा लीला ह तुरंत दे देथे। बने बिहाव हो जथे। गाँव भर लोगन मन बर रात के खाना लीला अमर डाहर ले सामुदायिक भवन में ही रख देथे। जूही ल बला लेथें। डाहर छेकउनी बर बहु ह अपन चेन ल जूही ल दे देथे। तब लीला ल सुरता आथे मैं तो गुस्सा म कांही नइ दे पायेंव।


अपन कुरिया म जाके अपन बिहाव के हार ल लेके आथे अउ बहू ल पहिरा देथे।

बहु आ जथे। सबके मन खुश  हो जथे। दूसर दिन लड़की के ड्यूटी रहिथे त येमन रात के ही लहुट जथें।  दूसर दिन तो लीला के घर के गोठ  हर घर म होवत रहिस हे। आज बुराई नहीं लीला के तारीफ होवत रहिस हे। 


 लीला के बेटी जूही ह डाक्टर बन जथे। लीला ओला कहिथे "तोला कोई लड़का पसंद हू त बता।"


 जूही कहिथे "मोला बिहाव नहीं करना हे। मैं सबके सेवा करना चाहत हंव।" 


रामहिन के बेटा एम बी ए करथे ओखर बाद बैंगलोर म नौकरी लग जथे। कुछ दिन के बाद अपन माँ ल लड़की देखे बर कहिथे। रामहिन के बेटा के बिहाव लग जथे। मैरिज ब्यूरो ले बिहाव तय करथें। बने इंजिनियर लड़की मिल जथे।


बिहाव घर ले ही करथें। लीला अउ ओखर बेटा बहु मन आये रहिन हें। सब खुश रहिथे।बड़े से बियारा रहिस हे उंहा रिसेप्शन रखथें। बफे म खाना होथे। कई तरह के खाना रहिथे। बिहाव के दू दिन के बाद अमर मन बैंगलोर चल देथें। जूही अपन काम म लग जथे फेर गरीब मन के सेवा ल भुलाये नइये।


अमर के जाये के बाद लीला आथे। रामहिन तीर लीला के मन के बात फेर निकलथे। ओ ह रामहिन ल कहिथे। " रामहिन मैं कतेक गोठ बात करंव आज फेर चार घर म जाके गोठियाये के मन लागत हे।"

" फेर तोर पुराना भूत ह निकलत हे, बने सोच ले।"

"नहीं रामहिन आज घर घर जाके तोर बेटा बेटी के बारे म गोठियाहुँ।"

"अउ काये गोठियाबे? अतेक होगे तभो ले बांचेच्च हावय।काये गोठियाबे?"

"रामहिन मोर लइकामन कतेक आगू बाढ़गे हावंय। बेटी सेवा म लगे हावय। अउ कतेक बढ़िया खाना रहिस हे। गाँव म पहिली बेर बफे म खायेन।"

दूनो झन एक दूसर ले गला लगके अब्बड़

 हाँसथे।

सुधा वर्मा, 3/7/2026

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ मोहम्मद रफी"*

 *"छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ मोहम्मद रफी"*


अजी ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा ? 

बड़ी दूर से आये हैं, प्यार का तोहफ़ा लाये हैं


आज सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफी के पुण्यतिथि हे। छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के संग उनकर मया के नाता रहिस। सन् 1965 मा मोहम्मद रफी के आवाज मा पहिली छत्तीसगढ़ी गीत - 


"झमकत नदिया बहिनी लागे परबत मोर मितान",  


फ़िल्म कहि देबे संदेश बर रिकॉर्ड होए रहिस। इही फ़िल्म मा रफी साहेब के आवाज मा दूसर गीत 


"तोर पैरी के झनर झनर, तोर चूरी के खनर खनर" 


रिकॉर्ड होए रहिस। कहि देबे संदेश फ़िल्म के निर्माता मनु नायक आँय। गीत ला लिखे रहिन हनुमन्त नायडू जी अउ संगीतकार रहिन मलय चक्रवर्ती। ये फ़िल्म 1965 मा रिलीज होइस अउ कहि देबे संदेश के गाना मन जम्मो छत्तीसगढ़ मा धूम मचाइन। 1965 के दौर मा मोहम्मद रफी, गायिकी के सुपर स्टार रहिन। उनकर रेट घलो ज्यादा रहिस। मनु नायक जी जब मलय चक्रवर्ती के संग छत्तीसगढ़ी गीत गाये के अनुरोध कर बर रफी साहेब से संपर्क करके बताइन कि कहि देबे संदेश, छत्तीसगढ़ी भाषा मा पहिली फ़िल्म बनत हे, बजट बहुत छोटकुन हे। अगर आप मोर फ़िल्म मा गाना गाहू त ये आंचलिक भाषा के फ़िल्म ला नवा रद्दा दिखाए खातिर कदम साबित होही। उदार हिरदे के मालिक मो. रफी हाँस के कहिन - आप मन रिकार्डिंग के तैयारी करव, मँय जरूर गाहूँ। स्वीकृति मिले के बाद पहिली गीत के रिकार्डिंग होइस। ये गीत मोहम्मद रफी के गाए पहिली छत्तीसगढ़ी गीत के संगेसंग पहिली छत्तीसगढ़ी फिल्मी गीत बन गिस। तेकर बाद दूसर गीत के रिकार्डिंग होइस। मनु नायक जी अपन बजट के मुताबिक नाम-मात्र राशि के चेक सौंपिन जेला रफी साहब सहर्ष स्वीकार कर लिन। रफी साहेब के कारण मन्नाडे, महेंद्र कपूर आदि गायक कलाकार मन ला घलो मनु नायक जी के बजट अनुसार पारिश्रमिक मा संतोष करना पड़िस। 


1965 मा कहि देबे संदेश के रिलीज होए के बाद घर-द्वार फ़िल्म के तैयारी चालू होइस जेमा मोहम्मद रफी के एक सोलो अउ दू ठन डुएट गीत के रिकार्डिंग होइस। गायिका रहिन सुमन कल्याणपुरी। ये फ़िल्म 1971 मा रिलीज होए रहिस। घर द्वार फ़िल्म के निर्माता विजय कुमार पांडेय रहिन। कवि, गीतकार हरि ठाकुर के लिखे गीत ला संगीत मा सँवारे रहिन संगीतकार जमाल सेन। घर द्वार मा रफी साहब के आवाज मा ये गीत मन रहिन। 


गोंदा फुलगे मोरे राजा

आज अधरतिहा मोर सून बगिया मा

सुन सुन मोर मया पीरा के सँगवारी रे


कहि देबे संदेश अउ घरद्वार फ़िल्म के गीत आकाशवाणी ले घलो सुने बर मिल जाथें। 


26 अप्रैल 1980 के दल्लीराजहरा के पं. जवाहरलाल नेहरू फुटबॉल स्टेडियम मा "शंकर जयकिशन नाइट" के आयोजन होए रहिस।  ये कार्यक्रम मा संगीतकार शंकर, गायक मोहम्मद रफी, मन्नाडे, गायिका शारदा अउ उषा तिमोथी आये रहिन। चरित्र अभिनेत्री सोनिया साहनी कार्यक्रम के एंकरिंग करे रहिन। कार्यक्रम के शुरुआत मा स्वागत भाषण के औपचारिकता भिलाई निवासी अउ भारतीय स्टेट बैंक के अधिकारी राकेश मोहन विरमानी जी हर निभाये रहिन। भारत के भुइयाँ मा मोहम्मद रफी के ये आखरी स्टेज शो रहिस। ये कार्यक्रम के बाद 18 मई 1980 के श्रीलंका मा उनकर एक स्टेज शो घलो होए रहिस जेन हर रफी साहब के जिनगी के अंतिम स्टेज शो रहिस। 


दल्लीराजहरा मा आयोजित "शंकर जयकिशन नाइट" देखे के सौभाग्य मोला मिले रहिस। ये कार्यक्रम मा उनकर गाए दू गीत के सुरता करथंव तब अइसे लगथे कि ए गीत मन मा अंतिम विदाई के संदेश छुपे रहिस। एक गाना रहिस - बड़ी दूर से आये हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं"। छत्तीसगढ़ के वासी मन बर मोहम्मद रफी ला साक्षात देखना अउ सुनना, कोनो अनमोल तोहफा ले कम नइ रहिस। दूसर गीत रहिस - अजी ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा, हमारे जैसा दिल कहाँ मिलेगा। ये गीत के बोल अटल सत्य बनगें। वइसन मौका फेर दल्लीराजहरा का, भारत के कोनो शहर मा नइ आइस अउ न मोहम्मद रफी के दिल असन कोनो दूसरा दिल मिल पाइस। दल्लीराजहरा के स्टेज शो, भारत के भुइयाँ मा रफी साहब के आखरी ओपन स्टेज शो बनके रहिगे। 31 जुलाई 1980 के ये महान गायक अपन पंचतत्व के काया ला पंचतत्व मा मिलाके रेंग दिस अउ दुनिया बर छोड़ दिस अपन अमर आवाज।  


*आलेख - अरुण कुमार निगम*