Sunday, 2 August 2026

अरजदूज (रथयात्रा)* (बाल कहानी)

 *अरजदूज (रथयात्रा)*

                          (बाल कहानी)

बहुत दिन के बात आय, जनकपुर गाँव मा शिवा नाम के एकझन लइका रहत रहिस। शिवा बहुतेच चुलबुला अउ सीधा-साधा रहिस। वोकर मन मा भगवान जगन्नाथ बर अटूट मया रहिस।

      हर बछर जब अषाढ़ महीना के अंजोरी  पाख के दुतिया तिथि आवय, त गाँव मा अरजदूज के बड़ धूम-धाम रहय। शिवा हा सियान मन ले सुने रहिस कि उड़ीसा के पुरी मा भगवान जगन्नाथ, वोकर भइया बलभद्र अउ बहिनी सुभद्रा हा बड़का-बड़का लकड़ी के रथ मा बइठ के नगर मा घुमे बर निकलथें। उही बात ल सुन के शिवा के मन मा रथ बनाय के भाव जागिस। वहू हा अपन भगवान बर रथ बनाय के तइयारी करिस। वोकर कतको संगवारी मन ओकर खिल्ली उड़ाइन- "तैं कइसे रथ बनाबे शिवा? तोर तीर तो बड़का लकड़ी नइ हे। रथ तो रथ चक्का घलो नइ हे।"

फेर शिवा अपन संगवारी मन के बात मा धियान नइ दिस। वो हा अपन घर के बारी मा पड़े एक ठन जुन्ना गत्ता के डिब्बा ल लानिस। वोला सुग्घर रंग-बिरंगी कागज ले सजाइस।  शिवा के रथ के ऊपर ढाँचा हा तो बनगे फेर चक्का नइ बन पावत रहिस। शिवा के मिहनत अउ लगन ल देख के वोकर ददा हा वोला नान्हे-नान्हे चार ठन चक्का बना के दिस। शिवा हा अपन हाथ ले माटी के तीन ठन नान्हे-नान्हे मूर्ति बनइस। जेमा भगवान जगन्नाथ, जेकर बड़का-बड़का गोल-गोल आँखी रहिस। भइया बलभद्र अउ बहिनी सुभद्रा।

     शिवा हा मूर्ति मन ल रथ मा बइठारिस अउ वोला रंग-बिरंग के  फूल माला ले सजाइस। वोकर रथ ल देख के वोकर संगवारी मन बड़ खुश होइन अउ शिवा के संग काम मा हाथ बटाइन। शिवा के बनाय रथ बड़ सुग्घर दिखत रहिस।

   जब अरजदूज के दिन अइस तब जनकपुर गाँव मा 'जय जगन्नाथ' के जयकारा गूंजत रहिस। सब सियान-जवान मन बड़का-बड़का रथ ल खींचत रहिन। शिवा घलो अपन नान्हे  रथ ल एक ठन रस्सी मा बाँध के खींचे लगिस। शिवा अउ वोकर संगवारी मन गावत रहिन -

“जगन्नाथ  भगवान, लइका  मन  के   शान।

जगन्नाथ के रथ भारी, आवव खींचव ओरी-पारी।”

बोलो, जय जगन्नाथ, जय बलराम, जय सुभद्रा।


इही बीच अचानक जोरलगहा पानी गिरे लगिस। सब लोगन मन अपन-अपन रथ ल छोड़ के छुपे बर भागे लगिन। शिवा घलो डर्रागे कि वोकर माटी के भगवान अउ कागज के रथ हा पानी मा भीग जाही। वो हा रोवत-रोवत अपन रथ ल एक ठन बड़का पीपर पेड़ के खाल्हे मा ले गिस अउ अपन दूनों हाथ ले रथ ल ढाँक के ठाढ़ होगे। वोकर संगी-साथी मन सब अपन-अपन घर भागगें। शिवा हा अकेल्ला पीपर पेड़ कर खड़े-खड़े तीनों मूर्ति ल देखत, भगवान ल सुमरत रहिस कि- “हे भगवान! मोर मूर्ति के भगवानमन भीगय झन एला बचा ले।” 


          तभे एक चमत्कार होइस। शिवा ल महसूस होइस कि वोला कोनो छुवत हे। वो हा आँखी खोल के देखिस त वोकर तीर मा एकझन करिया, एकझन सादा अउ एकझन पींयर रंग के ओन्हा (कपड़ा) पहिरे तीन लइका मन ठाढ़ (खड़े) रहिन। वोमन शिवा ल देख के मुसकाइन अउ कहिन- "शिवा, तोला जाड़ लगत होही। भूख घलो लगत होही। चल हमन ल जगन्नाथ जी के गजामूंग के प्रसाद खवा।"

शिवा  उँकर बात ल सुन के अकचकागे। वो हा अपन झोला ले अपन महतारी के बनाय गजामूंग के प्रसाद ल निकालिस अउ वो मन ल दे दिस। वोमन  मिल के बड़ मया ले प्रसाद ल खाइन। वोकर बाद वोमन शिवा के रथ के रस्सी ल धर के खींचे बर लागिन। देखते-देखत पानी गिरना बंद होगे अउ अगास मा सुग्घर इंद्रधनुष निकल गे। शिवा हा अब्बड़ खुश होगे। थोरिक देर बाद जब शिवा हा पाछू मुड़ के देखिस तब वो तीनों लइका मन उँहा नइ रहिन। शिवा, तीनोंझन ल कहाँगे? कहाँगे?  कहिके एती-ओती खोजे लगिन? वोमन नइ मिलिन फेर वोकर नान्हे  रथ मा रखे माटी के मूरत मन मा एक गजब के चमक रहिस, अउ अइसन लगत रहिस जइसे भगवान जगन्नाथ हा वोला देख के मुसकावत हें।

    शिवा ये समझ गे कि भगवान जगन्नाथ हा वोकर सच्चई अउ मया ल देख के वोकर संग खेले बर आय रहिन। वो दिन के बाद ले गाँव के सब लइका मन शिवा के संग मिल के अरजदूज (रथयात्रा) मनाय लगिन।


कहानीकार

डॉ पद्‌मा साहू 

खैरागढ़ छत्तीसगढ़

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