Sunday, 2 August 2026

लघुकथा ) सुधार

 (लघुकथा )



सुधार

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जाति-बिरादरी के बइठक मा लोगन सकलाय हें। समाजिक भवन के हाल खचाखच भरे हे। आज पंदरा ठो आवेदन लगे हे जेमा तेरा ठो हा तलाक के हावय। सबो मा प्रायः पति के दारू पी के मारपीट करना तेकर सेती पत्नी के मइके मा बइठे के हावय। दू प्रकरण हा गुला-झाँझरी के तको हे।

  ये दरी बने नवजवान मुखिया चुनाये हे जेकर कंधा मा समाजिक सुधार लाये के जिम्मेदारी हे। बाँकी पदाधिकारी मन तको ठीक-ठाक हें। 

पहिली प्रकरण के सुनवाई शुरु करत महामंत्री हा अवाज दीस-- ''तेज राम अउ प्रमिला खड़े हो जावव।"

महामंत्री के आदेश ला सुनके दूनों झन खड़ा होगें।

" ये तलाक बर आवेदन ला तैं लगाये हस नोनी। का होगे तेमा "--महामंत्री कहिस।

"ये हा मोला दारू पी के अबड़ मारथे। मैं उहाँ नइ राहँव। मोला तलाक चाही"--प्रमिला कहिस।

अतका ला सुनके मुखिया हा थोकुन गुसियावत कहिस- "अच्छा तोरे कहे भर मा तलाक हो जही। हमन इहाँ समझा बुझाके परिवार ला जोंड़े बर बइठे हावन तोड़े बर नहीं। समाज मा सुधार लाना हमर प्रण हे।" अतका कहिके तेज राम ला हड़कावत कहिस--"क्यों तुम शराब पीकर मारपीट करते हो? "

" नहीं मुखिया जी कसम से मैं दारू ला हाथ नइ लगाववँ। एला नइ रहना हे तेकर सेती फोकट के आरोप लगावत हे। "--तीज राम कहिस।

"कइसे वो प्रमिला, ये तो नइ पियँव काहत हे। झूठ मत बोलबे, सही-सही बता।"--एक झन सियान कहिस।

" पीथे--पीथे--पीथे। अभी चार दिन पहिली टुन्न पीके मोर मइके मा आके दंगा-दासी करत रहिसे"।

"कोनो गवाही साखी हे?"--मुखिया कहिस।

"हाँ। ये दे परोस के कका वो मेर रहिसे। ले तैं बता दे कका।"--प्रमिला कहिस।

अतका मा एक झन  हा खड़ा होके कहिस--" हव, ओ दिन तीजू हा फूल पीके आये रहिसे अउ गाली-गलौच करत रहिसे। "

"नहीं --ये झूठ बोलत हे। मैं उहाँ गेयेच नइ अँव। येला खवा-पिया के सेट करके गवाही दे बर लाये हें "--तीजू कहिस।

अतका ला सुनके मुखियाहा कड़क अवाज मा कहिस--" अरे चुप रा तैं हा। तोर दारू पीना हा प्रमाणित होगे। दारू पीना बहुत बड़े समाजिक अपराध ये। हमर जात मा प्रतिबंधित हे।तोला दस हजार रुपिया दंडित करे जाथे। प्रमिला ला तलाक नइ मिलय। तैं हा लिखित मा देबे के अब ले दारू नइ पियवँ। ये प्रकरण के इही फाइनल निर्णय हे। आगू आवेदन के सुनवाई शुरु करे जाय। "

     बाँचे आवेदन मन के सुनवाई करत रात के आठ बजगे। बइठक समाप्त होइस तहाँ ले सब घर चल दिन। पदाधिकारी मन बस डाँड़- बोड़ी मा सकलाये पइसा मन के हिसाब-किताब मिलावत बइठे हें।

अचानक एक झन बड़का पदाधिकारी हा कहिस-- " मुखिया जी आज तो नियाव करत-करत मूंड-कान पिरागे। सब झन थकगे हावन। कुछु व्यवस्था हो जय भई। "

"वोहो तैं तो मोर मुँह के बात छीन लेयेच। होजय---"-मुखिया कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

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