Sunday, 2 August 2026

तोर बर...!

 तोर बर...!

                         चन्द्रहास साहू 

             मो न 8120578897


रेलगाड़ी अब एक उरेर के अउ लम्बा सिटी मारिस अउ हलु -हलु आगू कोती रेंगे लागिस। सइमो-सइमो करत स्टेशन, गमकत प्लेटफार्म  सब छुटत हाबे अब । अउ छुटना ही जुड़ाव के आस आवय। इही  जम्मो आस अउ विश्वास ले  ट्रेन हा अपन मंजिल ले अमरके फेर लहुट आथे। ......रोजिना इही क्रम चलथे- सरलग। इही सरलगपन ले नवा ऊर्जा अउ उछाह मिलथे यात्री मन ला। काखरो गुजर-बसर के जरिया बनथे तब काखरो अगोरा सिराथे। अब अपन स्पीड पकड़ ले रिहिस रेलगाड़ी हा। यात्री मन अपन सीट ला पोगरा डारे हाबे अउ कतको झन मन भटकत घला हाबे। कतको झन मन अपन अपन जिनिस ला तिरियावत हाबे अउ हियाव घला करत हाबे। भलुक जम्मो उम्मर के यात्री मन सफर करत हाबे फेर सब ले जादा उछाह मा हाबे तौन पढ़इयां मन के टोली आवय। जम्मो कोई एकेच उम्मर-जौजर। कोनो कालेज के आवय अउ अपन नौकरी बर परीक्षा देवाए ला जावत हाबे। परीक्षा के आखर सुनके सब गंभीर हो जाथे फेर येकर मन के बरन मा कोनो गंभीरता नइ दिखत हाबे। स्लीपर कोच के लोवर मा तीन झन टूरी अउ ऊप्पर मा दू झन टूरा बइठे हाबे। अइसना दूनो कोती हाबे अउ आर ए सी मा एक झन टूरा बइठे हाबे। भलुक जम्मो कोई मेछरावत हाबे फेर ये टूरा हा गंभीर हाबे। अइसन केंवरी उम्मर मा कोनो गंभीर होथे का  ? नहीं फेर  कभु-कभु परिस्थिति हा उम्मर ले जादा बड़का बना देथे। .... अउ बाप के बीते ले लइका हा तुरतेच बड़का हो जाथे। केंवची उम्मर मा पीरा सहे ला जान डारथे, घर चलाये बर सीख जाथे अउ विद्या के महत्तम ला घला समझथे पढ़ाई जीवन मा सुख पाबे तब जीवन भर दुख झेलबे अउ पढाई जीवन मा दुख उठाबे तब जीवन भर सुख मिलही। मेंहा आर ए सी वाला सीट मा बइठे राकेश के गोठ करत हावंव। रेलगाड़ी मा बइठे पढ़े के उदिम करत हे फेर रेणुका, मोहनी, रमेश अउ पवन कहां ले पढ़े ला दिही....?   ये जम्मो जौजर मन राच्छस बनके राकेश के पढ़ाई लिखाई यज्ञ मा बिघन बाधा उत्पन्न करत हाबे।

"अरे ! देख भाई डोंगरगढ़ के पहाड़ी ला, कतका सुघ्घर लागत हाबे।''

रेणुका किहिस।

राकेश मुड़ी उठा के देखिस। खिड़की के वो पार मैकाल पर्वत माला के अनंत छोर......! अहा...! अब्बड़ सुग्घर, अब्बड़ मनभावन, अगास ला अमरत पहाड़ के फुनगी, दाई के अचरा कस लहर-लहर लहरावत  फुनगी मा धजा-पताका, धजा पताका मा सौंहत देबी दाई के प्रतिकृति अउ दाई के ये बरन ले बरसत मया दुलार अउ आसीस। सिरतोन जौन देखथे तौने मनखे के अंतस हरिया जाथे। नवा ऊर्जा के संचार ले मन गमके लागथे। जम्मो कोई अपन मनोरथ सिद्ध होये कहिके अर्जी कर लेथे जगतारण देबी माॅं डोंगरगढ़ बमलाई ले। 

"मोरो बिनती सुन ले महतारी ! एसो के नवराति मा तोर अंगना मा घींव के जोत बारहूं अउ नौ दिन ले उपास रहूं।''

मोहनी भलुक फुसफुसावत किहिस फेर राकेश तो सुन डारिस वोकर गोठ ला। 

"ये सुग्घर जीवन देये बर देबी-देवता ला धन्यवाद दे मोहनी ! अउ जोत जलाहूं कहिके माता रानी ला घूस झन दे। मेहनत कर, पढ़ अउ घेरी-बेरी पढ़, सरलग पढ़ तब सब याद हो जाही वोकरे सेती करत करत अभ्यास के..... कहिथे।''

राकेश के गोठ सुनके मोहनी अकबका गे। सन्न खा गे। अउ जम्मो जहुरियां मन ठठाके हाॅंस डारिन। 

मोहनी लजागे अउ लजाये के संगे-संग अब रोसियाये लागिस।

"तुमन मोर आस्था ला खिल्ली झन उड़ावव।''

मोहनी के गोरिया बरन अब लाल होगे, आँखी फरिहागे। अउ  फुनफुनाये लागिस। फुनगी नाक जादा लाल होगे अउ वोमा नान्हे मोती के बूंद चमके लागिस। ससन भर देखत हाबे राकेश हा।

"येहां आस्था नोहे मोहनी ! अंधविश्वास आवय। जोत के भरोसा ले बिना पढ़े कोनो परीक्षा मा पास नइ हो सकय।''

राकेश किहिस।

"आस्था के मतलब विद्यार्थी मन बर एकाग्रता आवय मोहनी ! .. आस्था हा प्रश्न ले परे होथे।''

अब पवन घला पंदोली दिस अउ राकेश वोला फरिहा के किहिस।

"अपन कर्म मा आस्था राख कि मोर मिहनत हा फलित होवय। सौ प्रतिशत मिहनत अउ सौ प्रतिशत भरोसा ही आस्था के मूल आवय। मन ला एकाग्र कर अउ पढ़ नोनी !''

राकेश  समझाईस तब थोकिन शांत होइस मोहनी हा।

"भगवान के नाव मा दे ददा, दीदी  भाई बहिनी हो !''

भीखमंगइया आगे रिहिन। 

"हूं..''

सरिता मुँहू मुरकेटे लागिस। वो भिखारी के बरन ला देख के। 

"भलुक मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरे हाबे फेर  दिखे मा सांगर-मोंगर हे। गोड़ भर एक कन अपंगहा तो हाबे, खोरवा हाबे।''

सरिता फेर फुसफुसाये लागिस।

"खोरवा होगे ते का होइस। कोनो सुग्घर बुता कर सकथे। हमर गाँव के लोकवा वाला मनराखन बबा हा चना फुटेना के दुकान  खोल के सुग्घर बुता करत हाबे। ..... मोला अइसन मंगइया मन थोरको बने नइ लागे, अइसन घोरवा लुलवा सदा उपई , छानी मा चढ़के होरा भूंजई।''

अब मोहनी फुनफुनाये लागिस। वोकर मुँहू करू हो गे रिहिस। 

"दे दे बहिनी मंगइया आवंव।''

मंगइया किहिस अउ मोहनी भभके लागिस। 

"बुता के डर मा मंगइया बन गे हावस जांगर चोट्टा हो। मंगइया नो हरो तुमन, तुमन कोढ़िया आवव।''

छिन भर बर मंगइया हा छटाक भर होगे, वोकर मुँहू नानचुन होगे। चेहरा मा उदासी छागे। नानचुन टूरी अउ बोली मा अब्बड़ झार।

"का करबो बहिनी ! गाँव मा कोनो बुता करे बर बलाये नही अउ ... कोनो धंधा-पानी करबे तब अब्बड़ पइसा घला लागथे ....कोन दिही ? हमू मन ला कोनो साध नइ हाबे वो भीख माॅंगे बर फेर जीए बर तो बीख ला पीये ला परही ? का होइस ये हिनमान के बीख हमर भाग मा बदे हाबे ते। पी लेथन भगवान भोलेनाथ बरोबर अइसन बीख ला। एकरे भरोसी हमर लोग-लइका मन ला अमृत पियाथन, वोकर पेट के आगी ला बुता लेथन। .. का करबो जौन ला हाँसना हे हाँसे, थूकना हाबे थूके।''

मंगइया किहिस अउ मोंहनी तो वोकर मुँहू ला देखते रहिगे। उदुप ले राकेश हा अपन बैग ले सेवफल ला निकालिस अउ मंगइया ला दे दिस।

"बने सुग्घर रहो भाई ! दूधे खावव दूधे अचोवव। भगवान कुटुंब परिवार ला सुख अउ उछाह मा राखे।'' 

ससन भर आसीस दे डारिस मंगइया हा अउ अब आगू कोती चल दिस।

"अब अपन मूड ला बने कर ना यार मोहनी !''

वोकर जम्मो संगी संगवारी घलो मना डारिन फेर मोहनी तो अभिन घला शांत नइ होवत हाबे।

"अब सफर के मजा ला किरकिरा झन कर ना मोहनी ! देख, अब बिलासपुर जंक्शन अमर गे हावन। चल ताते तात चाहा पीके आथन। स्टेशन मा अभिन ट्रेन हा दस मिनट तक ठाढ़े रही।''

राकेश किहिस अउ हाथ ला धरके तीरे लागिस फेर मोहनी तो टस ले मस नइ होइस।

"देख मोहनी ! गरीब मनखे ईलाज बर लुलुवाथे, जेवन बर तरसथे अउ अपन अधिकार पाये बर खुरचथे। ... अउ सेठ साहूकार मन भलुक प्याज खाये बर छोड़ दिन फेर मनमाने ब्याज खाये ला धर लिन, मानवता ला बिसराके गरीब मनखे के तेल निकालत हाबे अउ अपन बर सरग निसेनी बनावत हाबे। देश के जम्मो मंदिर मा सोना के भंडार हाबे। अउ उही मोहाटी मा मंगइया के रेला हाबे। अतका असमानता हाबे हमर देश मा तब देश कइसे आगू बाढ़ही ? येखरे सेती मंदिर मस्जिद मा दान दक्षिना करे बर मोर मन नइ खंधे। अउ मेंहा थोकिन कठोर हो गे हँव।''

राकेश फेर समझाये लगिन।

मोहनी अब सिरतोन गुने लगिस अउ राकेश संग उतरगे। अब जम्मो संगी जहुरिया मन प्लटफार्म मा चहा के सुट्टा मारे लागिन।

"अपन साइंस सब्जेक्ट के प्रश्न ला समझ जाथो फेर गणित ला नइ समझ पावंव।''

प्रियंका हा संसो करत किहिस। अब जम्मो कोई गोठ बात करत हाबे।

"मोला तो करेंट अफेयर हा थर्रा देथे। सिरतोन करेंट मारथे वोहा।''

रमेश किहिस।

हो .... हो ... जम्मो कोई हाँस डारिन रमेश के गोठ ला सुनके। 

"प्रियंका तेंहा करेंट अफेयर सीख ले अउ तेंहा वोला गणित समझा दे।''

राकेश किहिस।

हँव बने तो कहत हाबे। एक दूसर के पंदोली दे देव। इही ला तो साइंस में सिंबायोसिस कहिथे।

"मोला तो गणित हा बने लागथे फेर केमिस्ट्री के समीकरण हा मोर समीकरण ला घाल देथे।''

केमिस्ट्री के समीकरण ला मेंहा बता दुहूं।

राकेश किहिस नरेश के गोठ ला सुनके।

"भाई ! मोला छत्तीसगढ़ के बारे मा बता ? अब्बड़ कन्फ्यूज रहिथों।''

छत्तीसगढ़ मा रहिके छत्तीसगढ़ ला नइ जानव, का बतावंव ?

विश्व के श्रेष्ठ आयरन ओर बैलाड़िला मा मिलथे। विश्व के पहेला संगीत विश्विद्यालय इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ मा हाबे। दुनियाँ मा सबले जादा धान के जर्मप्लाज्म इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर मा हाबे। उच्च गुणवत्ता वाला सुग्घर कोइला इहिच मिलथे। अतका सुग्घर अउ पोठ हाबे हमर छत्तीसगढ़ हा।''

राकेश गरब-गुमान करत किहिस। 

"दे दे राम...., देवा दे राम.....!''

उदुप ले एक झन मंगइया फेर आगे। गोड़ लड़बड़ावत हाबे। एक हाथ मा पाऊ धरे हाबे अब्बड़ मुसकिल ले अपन आप ला सम्हालत हाबे। अब्बड़ सामरथ ले रेंगे के उदिम करत हाबे। अब आगू मा स्लिपर कोच मा बइठे सुटेड बुटेड सभ्य कहवइया मनखे मन अपन मुँहू ला करू करे लागिन। 

इही हरे पोठ छत्तीसगढ़ भुइयां के गरीब मनखे। 

"मोला बने करे राम अंधरा बनाये....!''

अब कोनो बाबूलाल के गाना घला सुनाये लागिस।

राकेश गुने लगिस। बाबूलाल हा तो अंधरा हाबे फेर इहाँ के जवनहा मन कब जागही  ? मूल निवासी कब अपन अधिकार बर आगू आही ? थारी-लोटा धरके अवइया परदेसिया करा का जिनिस के कमती हाबे- स्कूल कॉलेज अस्पताल कारखाना अउ शासन मा उच्चा ओहदा तक हाबे। ......अउ हमन मूल निवासी करा का हाबे ? छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा। इही नारा मा भरमाए हाबे। गुनव कतका सुग्घर हाबे छत्तीसगढ़िया मन। राकेश के मन मा मथनी चलत हाबे। छटपटाए लागिस वोहा। मन बियाकुल होगे जम्मो ला गुनिस तब। 

उदुप ले मोहनी के कर्रस आरो ला सुनिस अउ अपन मन के मथनी ले बाहिर निकलिस राकेश हा। 

"........फेर आ गेस मोला माँगे बर। खोरवा लुलवा ले मोला सक्त नफरत हाबे। एक भिखारी ला कुछु देके पठोये नइ रहिबे अउ दूसर मन के रेला आ जाथे।''

तमकत किहिस मोहनी हा।

"कोनो जान सुनके खोरवा नइ होवय मोहनी ! कोनो न कोनो मजबूरी रहिथे। ....अउ का होइस  मंगइया मन माँग लेथे ते ? चोरी डकैती लूट पाट तो नइ करत हाबे।''

"का भरोसा ? कब काला चोरा लिही तेनला कोन जानही ?''

आगियावत मोहनी के गोठ सुनके राकेश समझाये लागिस।

"कतका ला चोरा लिही ?  खाये बर फलफलहरी, रोटी अउ बहुतेच होही तब हजार पाँच सौ ला । सादा कुरता वाला असली चोर तो करोड़ों ला चोरा के बिदेश मा घर बसा लिन। ... अउ कोनो पकड़इया घला नइ हाबे। इहाँ के एक रोटी के चोरी करइया ला दंदरत ले कुचर देथे। पाँच सौ रूपिया के चोरहा जीवन भर जेल मा धंधाये हाबे। येहा कइसन न्याय आवय।... बता ?''

राकेश आगियाये लागिस अब।

"ट्रिन.... ट्रिन.......!''

मोहनी के मोबाइल के घंटी बाजिस। मोहनी अकचका गे। "ये दरी दाई के फोन ?''

"हलो माँ !''

"हलों बेटी ! कहाँ अमरेस बेटी  ?''

"अभिन नागपुर अमरे हँव माँ !''

"बने बने जावत हव न बेटी ?''

"हँव माँ  ! हमन जम्मो कोई बने हावन। भोपाल अमरते साठ फोन करके बताहूं  ।''

"बेटी ......!''

"हाँ माँ !''

"का गोठ आय माँ ! बता।''

मोहनी के दाई के मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"ऊ....ऊ....!''

उदुप ले बबा जात के आरो आय लागिस अब।

"पाँव परत हँव पापा !''

"के दिन लागही टूरी तुमन ला लहुटे बर ?''

"काली परीक्षा होही ताहन लहुट जाबो जम्मो कोई। प...प...परनदिन आ जाबो ।''

"हूँ....!''

पापा हुंकारू दिस।

"पापा एक दिन बर.... मोसी गाँव  जाहूँ ...का ? राकेश घला उही गाँव के आवय मोला लेग जाही ....। मोसी के बेटी दिव्या बहिनी ले घला मिल लुहूँ ....। अब्बड़ दिन होगे भेंट-मुलाकात घला नइ होवय हे।''

मोहनी ढोढ़कत किहिस। 

ददा के रिस तरवा मा चढ़ गे। 

"तोला परीक्षा देये बर पठोये हँव, कोनो गाँव किंजरे बर नहीं। .... अउ राकेश ले दुरिया रहिबे। मनराखन के टूरा आवय ना !''

"हँव पापा !''

"वो टूरा ले दुरिहा रहिबे कोनो भी उच्च नीच होही ते तोर गोड़ ला टोर के खोरी बइठार दुहूॅं।''

गरजत किहिस ददा हा।

"अउ सुन ।''

मोहनी सावचेती होगे। कान मा असली परमाणु बम तो अब गिरही। ....अउ बेटी बर कोनो परमाणु बम तो आवय येहा।

"परीक्षा अतका जरूरी नइ हाबे ते तुरते घर लहुट जा। .... अउ जरूरत घला काबर रही ? तेंहा दाऊ के एकलौती बेटी आवस। पन्द्रा हजार के नौकरी बर आँखी ला फोर के झन पढ़। एकर ले जादा वेतन तो हमर घर के नौकर ला दे देथन। आजा लहुटके, बेटा राजा ला स्टेशन पठो दुहूं तोला लाने बर।''

ददा के गोठ घरघस लागिस मोहनी ला। सुकुरदुम होगे।

"विधायक हा अपन एकलौता बेटा बर  तोला देखे बर अवइया हाबे।  बड़का पद, बड़का प्रतिष्ठा, नेता अउ अभिन के विधायक संग मा अतराब के दाऊ- चार सौ पचास एकड़ के जोतनदार  वो भी डबल फसल वाला। वोकर बेटा संग बिहाव हो जाही तोर तब मेंहा गंगा नहा डारहूं। झप ले आ  जा बेटी !''

ददा छाती फुलोवत गोठियावत हाबे अउ बेटी हा तो सन्न खा गेहे। आखर के बीख कान मा परत हाबे अउ बेसुध होवत हाबे मोहनी हा। वोकर सपना टूटत हाबे । अगास ला छूके अवइया  पड़की चिरई बरोबर। ......एक- एक पाॅंख झरे बरोबर लागत हाबे।

"सुनत हस ना !''

कर्रस ले फेर आरो आइस ददा के।

"..... ह.. हव पापा !''

"ले बताबे तब। कब लहुटबे तौन ला ?''

"हूँ....!''

मोहनी हुँकारू दिस अउ मुड़ी गड़ियाके बइठगे। आँखी कईच्चा होगे। तरतर- तरतर आँसू बोहाये लागिस। 

"का होगे मोहनी ? का किहिस पापा जी हा।''

मया के गोठ सुनिस अउ अब गोहार पार के रो डारिस- हिचके लागिस, दंदरे लागिस मोहनी हा। 

"झन रो मोहनी ! दाई- ददा के गोठ मा रिस नइ करे।''

"हव, रिस  तो नइ करे के। फेर, मोर बाप हा तो पितृ सत्ता के अगुवा आवय। नारी के मन अउ देह मा अपन अधिकार समझथे, नारी ला अपन दास मानथे। आज विश्व हा इक्कीसवीं सदी मा रेंगत हाबे तब घला जौन करना हे तौंन ददा के मन से होथे। नारी ला खेलउना बना ले हे ये पुरूष प्रधान सोच के अगुवा मन हा। का पहिरना हाबे, का ओढ़ना हे। कहाँ जाना हे, कहाँ आना हे इहाँ तक का खाना हे तौनो ला .......  पुरुष हा बताथे। गरीब घर के बेटी ला जौन स्वतंत्रता हाबे तौंन हमर दाऊ बेड़ा मा नइ हाबे राकेश ! बिहाव के पहिली सपना के अगास देखाये रहिथे अउ बहुरिया हा अगास मा उड़ियाए ला धरथे तब वोकर पाँख ला कतर देथे। बिन पाँखी के चिरई के का अस्तित्व ?  बेटी तो चिरई आवय अपन फुदकना ले सबके मन ला हर्षा  डारथे ।  ... अउ इही बेटी हा अपन बर कोनो  सुग्घर जोड़ी चुन लिस तब ? ऑनर किलिंग हो जाथे। खाप पंचायत ला कोन नइ जाने। अइसना हाबे हमर झुठल्‍ला दाऊ अउ झुठल्ला दाऊ बेड़ा हा। आज मेंहा परीक्षा देवाए बर जावत हावंव तौंन हा दाई के बल मा जावत रेहेंव। ददा तो शिक्षा ले जादा सुंदरता ला देखथे । जतका सुंदर रहिबे ओतकी सुग्घर रिश्ता आही अइसे कहिथे ददा हा।.... अउ आगे विधायक हा अपन बेटा बर  रिश्ता धर के ।''

मोहनी फुनफुनावत रिहिस। चेहरा तमतमाए लागिस। पुरुष सत्तात्मक सोच बर घिन आये लागिस। उदुप ले राकेश ला ससन भर देखिस मोहनी हा । वोकर मन मा गरेरा चलत हाबे। ट्रेन चलत हाबे अपन रफ्तार ले अउ मोहनी के धड़कन घला। 

"राकेश !''

"हा, बोल ना मोहनी का बात आय।''

बॅाटल के पानी ला देवत किहिस राकेश हा। 

"कइसे लागत हाबे। तबियत तो ठीक हे न मोहनी तोर।''

मोहनी के मन बियाकुल होगे। वोकर मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"बोल न, का बतावत हावस ते ?''

मया के पंदोली पाये ले मोहनी ला बल मिलिस अउ अब्बड़ सामरथ करके किहिस।

"राकेश ! मेंहा तोर संग अब्बड़ मया करथो। मोर संग बिहाव करबे का ?''

नेह के बंधना मा तो पहिलिच ले बंधा गे रिहिस राकेश हा फेर अपनेच अंतस में राखे रहिस। ... फेर राकेश तो समझदार आवय। दिल अउ दिमाग के संतुलन बनाके फैसला लेथे। 

"नहीं मोहनी ! तोर पापा हा नइ मानही। ... अउ गोठ गोठ मा धमकी घला देवत रहिथे। ... ये  समाज तो घला कहाँ अपनाही। तेंहा दाऊ के बेटी अउ मेंहा बनिहार के लइका ........।''

राकेश उदास होवत किहिस। 

"समाज ला तो मांदी भात चाहिये राकेश ! काकरो बिगड़े कि बने, वोमन ला कुछु मतलब नइ राहय। चल भाग जाबो त फेर...... ये समाज ये शहर ले दूर बाहिर कोनो बिरान शहर मा !''

"अपन छइयां भुइयां ला छोड़ के कहाँ जाबो मोहनी !  कोनो उड़हरिया भागे टूरी टूरा ला समाज हा सुग्घर नजरिया ले नइ देखे। ....... अउ उड़हरिया भागे ले दाई ददा के नाक नइ कटा जाही ? बेटी के जनम धरते साठ दाई ददा मन हा वोकर बिहाव के जोरा-जारी करे ला धर लेथे अइसन मा मेंहा अपन मन ला मार दुहूं फेर तोर अउ मोर कुटुंब ला आँच नइ आवन देवंव।''

राकेश गंभीर होवत किहिस। मोहनी अब्बड़ समझाईस फेर राकेश तो टस ले मस नइ होइस।

"मेंहा जीवन भर तोर अगोरा करहूँ फेर कोनो आने के नइ होवंव।''

मोहनी किरिया खा डारिस.... भीष्म किरिया। 

"आनी बानी के गोठ झन गोठिया मोहनी अभिन पीरा होवत हाबे फेर बेरा के मरहम ले सब घांव भरा जाही। अपन पढ़ई मा धियान दे। तोर बर मोरले सुग्घर जहुंरिया मिल जाही।''

मोहनी अकचकागे। कतको टूरा मन वोला अपन बनाये बर किरिया खाथे, कतको झन मन अब्बड़ उदिम करथे मोहनी के दिल जीते के। ... अउ राकेश ? 

"तेंहा मोर संग मया नइ करस का राकेश ?''

मोहनी कलपत किहिस।

"हँव, नइ करंव।''

रट्ट ले किहिस राकेश हा। 

"मेंहा केहेंव न पढ़ई मा धियान लगा अइसे अउ तेंहा आनी बानी के गोठ गोठियावत हस।''

राकेश खिसियावत किहिस। मोहनी कलेचुप होगे। भलुक कलेचुप होगे फेर तरी-तरी अब्बड़ दंदरत हाबे, भंवर उमड़े हे, विचार हा मथनी कस मथत हाबे अंतस ला। 

अब  जम्मो कोती कलेचुप होगे। कोनो आरो आवत हाबे ते ट्रेन के पटरी के खटर-पटर के आरो। खिड़की ले बाहिर कोती ला देखिस। बड़का बोर्ड अउ बोर्ड मा सुग्घर आखर मा लिखाए राजा भोज के नगरी भोपाल मा भारतीय रेल जम्मो यात्री मन के स्वागत करत रिहिस। उदुप ले ट्रेन हा लम्बी सीटी बजाइस अउ स्टेशन मा ठाड़े होगे। कोनो उतरत हाबे तब कोनो चढ़त हाबे। चाय नाश्ता जुस अउ पानी बेचइया मन के चिल्लम पो....। 

राकेश मोहनी अउ संगी- संगवारी मन घला उतरे लागिन अब।  अब फ्रेश होही अउ अपन अपन परीक्षा सेंटर मा जाके परीक्षा देवाही।

            ... अउ नारी जात के जिनगी मा अब्बड़ परीक्षा रहिथे। बिन गलती के माता जानकी ला अगिन परीक्षा देवाय ला परिस वहू ला राम राज मा, तब तो येहां कलजुग आवय। कदम कदम मा परीक्षा देवाए ला परथे। भलुक मोहनी के हाथ हाबे फेर करम के डाड़ तो वोकर ददा के हथेली मा छपाये हाबे। जइसन करम तइसन भुगतना। कतको चतुरई करले फेर करम के डाड़ नइ मेटाई रे भाई ! 

               कनवा आँखी मा घला नइ सुहावय तइसन राकेश के आगू मा गरबी ददा हा ठाड़े हाबे मुड़ी नवा के आज। इही तो समय आवय। ... अउ येहा बेरा के ताकत घला आवय, ... अउ परीक्षा घला आवय। आज पांच बच्छर पाछू राकेश ला ये दिन देखे ला परही अइसन कभू नइ गुने रहिस राकेश हा। 

                            राकेश बैंक मैनेजर बनगे हाबे अउ आज मोहनी के घर ला कुर्की करे बर आये हाबे अपन मातहत मन संग। मोहनी के गरबी ददा हा लोन मा ट्रेक्टर लेये रिहिन अउ किश्त नइ पटा सके हाबे। बैंक तो नीति नियम अउ कानून ले चलथे। फेर बेरा हा झुका देथे घमंड करइया ला। 

"वन टाइम सेटलमेंट के योजना घला हाबे बाबू जी ! पचास प्रतिशत राशि ला जमा कर दे हफ्ता  दिन मा ताहन कुर्की  नइ होवय।''

बैंक मैनेजर राकेश मोहनी के ददा ला समझाये लागिस। कहाँ ले लानहूं अतका पईसा। ददा मने मन गुने लागिस अउ नीरस होवत किहिस।

"हँव ! कोनो उदिम करहूँ। कोनो सगा संबंधी ले माँगहूं...!''

संसो करत किहिस ददा हा। 

"बाबू जी ! मोहनी कहाँ हे ? .... अउ का करथे आजकल ?  

"मोहनी...?''

कुछू नइ गोठिया सकिस ददा हा अउ बड़का घर के कोंटा वाली कुरिया कोती ला देखावत किहिस।

"वो दे वोती हाबे अभागिन हा।''

"धक्क ले लागिस जी हा राकेश के। कच्च ले लागिस करेजा हा अउ गोड़ गरू लागे कस लागिस। गरू गोड़ ला उसालत जावत हे। वोकर आने स्टाफ मन उही मेर थिरागे।  कुरिया के कपाट उघरा हाबे। 

''खिड़- खिड़ खिड़- खिड़ ''

 कपाट के सांकल ला हला के बजाए लागिस राकेश हा। 

"कोन ? आवत हावंव।''

मोहनी के गुरतुर गोठ राकेश के कान मा परिस। राकेश अधीर होवत हाबे मोहनी ले मिले बर । ....फेर मोहनी ला तो बिलम होवत हाबे। एक घड़ी घला अब्बड़ बेरा लगत हाबे।.... कइसे बिलम नइ होही। अपंगही बर तो जम्मो बुता धिरन लागथे। .....अउ जब निकलिस बाहिर तब तो सुकुरदुम होगे दूनों कोई। मोहनी थरथराये लागिस। एक गोड़ मा कतका दम ? उदुप ले पाउ गिरगे इही हड़बड़ाहट मा। राकेश झटकुन सम्हाल लिस। ससन भर देखिस राकेश हा मोहनी ला। कुमलाये चेहरा, सुन्ना आँखी अउ हफरत मोहनी। 

आँखी उघरा दूनों के, न हूंकत हे न भूंकत हे। चुप... कलेचुप। सुई... सुई .... पंखा के डेना के किंजरे के आरो आवत हाबे। ...आरो आवत हाबे धड़कन के धड़क... धड़क । .....बेरा थिरागे अब। ....फेर कब तक बेरा थिराए रही। मौन टुटीस । अउ दुनो कोई अपन आप ला सम्हाले के उदिम करिन। राकेश पंदोली दिस। एक दूसर के आँखीं टकराइस। दूनों के आँखी ले अरपा पैरी बोहावत हाबे। 

"ये का होगे.....?''

राकेश के आँखी गोठियाये लागिस। 

भोपाल ले आवत रेहेंव।...... जम्मो यात्रा सुघ्घर रिहिस अउ गाँव के सियार मा अमरेंव तभेच केचबिल लगे ट्रेक्टर मा एक्सीडेंट होगे। मेंहा तो बेसुध हो गेंव अउ जब सुध आइस तब एक गोड़ वाली होगे रेहेंव। 

"मेंहा तो विधायक के बेटा संग बिहाव होगे होही काहत रेहेंव मोहनी ! कभू फोन घला नइ करेस ? 

"नहीं, कोनो खोरी ला कोन गोसाइन बनाथे राकेश ! तहूं तो मोला फोन नइ करेस ?''

"हँव, मेंहा तो करे रेहेंव फेर  रिजेक्ट कॉल में डाल दे रिहिस मोर नंबर ला।

"जब मोबाइल नइ रिहिस तब अब्बड़ सुख दुख के संगी संगवारी रिहिस, अब्बड़ गोठियइया रिहिन फेर मोबाइल आगे तब कोनो गोठियाइया  नइ होइस। का करहूं....? 

रोज अगोरा करत रेहेंव तोर ...! कभू घर आबे अइसे फेर.....!''

आये हँव न आज।  

"अच्छा ते सुना...?  तोर होगे बिहाव ? के झन लोग लईका हाबे ?''

मोहनी नकली मुचकावत किहिस।

"न..... नहीं.... नइ होए हाबे।''

"काबर नइ करेस बिहाव ! अब तो नौकरी घला लगगे हाबे। कोनो घला मिल जाही...! काबर नइ करेस बिहाव ?''

तोर बर.... नइ करेंव बिहाव। फेर तोर आगू आए के सामरथ नइ होइस।

सिरतोन 

तोर किरिया।

तहूँ ला कर लेना रिहिस। काबर नइ करेस बिहाव ?

तोर बर ......!

दूनों के हाथ एक दूसर मा धराए हाबे सात जनम तक साथ निभाए बर अब...। 

                    चन्द्रहास साहू 

                       धमतरी

No comments:

Post a Comment