लघुकथा - " हलो भइय्या "
- मुरारी लाल साव
मोबाईल बाजिस तुरत उठाइस "हलो भइय्या.... I "
"हलो.. I
"लड़की देखत हव का भइय्या बिहाव करे बर "
"हव "! "कइसन लड़की देखत हव?" हमरो रिश्ता म एक लड़की हे पढ़े लिखे हे l "
"का करत हे तुंहर इहाँ के लड़का ह?"
" अभी अइसने ठलहा हे l "
"का उमर चलत हे?"
"35-36के होगे हे नौकरी देखतहे !"
" एहु लड़की के उमर ओइसने 34के होगे हे लड़का देखत l"
नौकरी करत हे अलवा जलवा l
"त.. आके देख लो l"
"नोनी बने हे पढ़े लिखे हे काम बूता म हुशियार हे l "
"ले बताबो l"
ठीक हे भैय्या l"
अइसने मोबाईल ले कतको रिश्ता खोजत खोजत थक गे बुधिया ह अपन बहिनी के लड़की बर l अचानक बहुत दिन के बाद मोबाइल आथे -"हलो
हाँ हलो भैय्या "
"तुंहर इहाँ लड़की हे बर बिहाव के लाइक l"
बुधिया कुछ नई कहि सकीस ए दफे l दुःखी मन ले कहिस -" भइय्या, लड़की ऊपर कोती चल दिस l कोनो लड़का देखे l नइ आइस l "
"ओहो!बड़ दुःख होइस l
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