*रिसता परगे सिट्ठा*
छत्तीसगढ़ हा खाली नाँव के छत्तीसगढ़ नोहय येहर अपन भाव ल मनखे मा झलकाथे। फेर जेन किसम के आजकल मइनसे के आदत बेवहार ल देखथन ओमा पहिली के अउ अबके मा गजब अंतर आवत -जावत हे। इहाँ मया -पिरा, सुख -दुख के आमा,अमली हा कभु जोत्था -जोत्था फरय- फुलय अउ ममहावय, गुरतुर कोइली कस भाखा - बोली अंतस ल मंदरस कस जनावय ।
अब जतेर के मनखे मेरन सुख सुबिधा संसाधन बाढ़त जावत हे वतरे के मया अँखरा के पतरावत हे। जइसे पेट हा बोजाथे अउ दलिदरी भगाथे , तहाँ रंग रंग के गोठियाथें। मसीन के सिलाए कपड़ा ल नाप जोंख के बनाय जाथे, जेन हर गजब दिन ले टिकथे। अब रेडिमेंट उठवा के जमाना छा गेहे जउँन ला जइसन जमथे बिसा लेथें। उठवा जिनीस जलदी पटपटाथे अउ चिराथे घलोक , काबर कि ओकर सिलना मजबूत नइ रहाय। उठवा कपड़ा के उठवा मोल, फ्राक, कुरता, पेंट, कंटोप। अब भइगे आज के मया परेम उठवा कपड़ा - लत्ता कस बनके रहिगे हे, बजार म मिल जथे। चरदिनिया... नवा - नवा मा बकबकासी लगथे।
पहिली नून, तेल, हरदी, मिरचा ल सइघो नाप तउँल के लेवँय अउ सील लोड़हा मा पिसय। अब पाकेट मा बँद मिलत हे। लिखाय रइथे _पहले स्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। कोनो दिन नत्ता -रिसता सिमट जाहि ता गड्डी नइ ते पैकेट मा मिलही।
वातावरन,परिवेस हर नाता- रिसता ल बनाथे अउ बिगाड़थे। आज कोनो ला काकरो संसो फिकर नइ हे। अब जाइदा रोटी, कपड़ा, मकान के कोनो ल कमी नइ होवत हे, रोजी- रोटी , मंजूरी घरे तीर मा मिलत हे। कोनो ल जाँगर टोर कमाय के जरूरत नइ हे। ना कोनो ल काकरो मेरन हाथ लमाय के जरूरत पड़त हे, बस इही अहंकार मनसे ला मनसे ले धुरियावत हे। आदमी दू - चार पइसा काय नइ कमइस अपन ल भूलागे।
सगा- पहुना बर सनमान के भाव मा एक लोटा पानी, गरम चाहा एक मुठा भात अउ मीठ - मीठ गोठबात बने सनबन्ध के गाँठ जोरे के नियम रिहिस हे। आज चाहा ह स्वाहा होगे...ओकर रंग फरियाके मतउला होगे हे।
सगा - सोदर मन आके दु - चार दिन रहिके एक दुसर के सुख - दुख ल जानँय । छोटे बड़े रिसता के मुताबिक आसीरबाद देवय जुग - जुग जियव, दुदे खाव दूधे अँचोव , तुहर पाँव मा काँटा झन गड़य। चुवा लेके ऊँचा उठे के रसता बतावँय । अब अहू नंदागे...। वो दिन परोसी तको पुछय तुँहर घर सगा काय रोटी लाय हे। अब तो सगा रोटी के जघा ल बजरहा खजानी मिठई हर लेलिस । वो समे गजब धुर - धुरके सगा संबंधी तक ल सोरिया लेवयँ । अब तो रिसता टूटे के कगार बनथे। वो बेखत गजब दिन के आय -जाय सगा हर बिताय दिन के सुरता करत हँसय ता दुख के सुरता म रोवय घलोक जेकर ले रिसता खासम खास बन जावय। अब तो तुरते आवत - जावत हें ।
आज छोटे - छोटे बात ल धरके रिसा के नाता टोरे बर देर नइ करय। कुछ दिन तो माइलोगिन मन बीता भरके चेंदरी बर तको झगरा कर लेवय अउ नहीं ता मुँहु ल ओथार के घर ले निकलय।
बीच मा टीवी हा गाँव, पारा, मोहल्ला के रिसता ल खतम करिस ओकर ले चार गुना मोबाईल हर दंदोरत हे। अब काल बदल गेहे _ पहिली वर्तमान, भूत, भविष्यकाल होवय अब _ कॉल, मिस कॉल, वीडियो कॉल के जमाना हे। ये सब्बो काल ल लील के मोबाईल हर महाकाल बनके जिनगी ल जंजाल बना देहे । बेरा कुबेरा नइ लगे दुख के आँसू ल नाख के भार बोहावत हे। साँच, लबारी के दरसन नइ हे। मोबाईल के आय ले जोहार भेंट कही देबे केहे के जमाना खतम। टुरी - टूरा ल बिना नेंग, लगिन -भाँवर के पल्ला भगा देथे। अब तो सियान के नियाव के घलोक कदर नइ हे।
बात केवल सगा सोदर के नइ हे इहाँ सग्गे नत्ता -रिसता के तेवर बदल गेहे। अपन हा बैरी परोसी मितान होवत हे। त कभु घर के मेन कार्यक्रम ल ओकर कका, ददा , बबा, भाई - भौजी, फूफा - फूफी, दीदी - भाटो तक नइ जानय ओकर नइ रेहे ले तको नेंग - दस्तूर के काम बुता ल दुसर मन निपटा देथें। बाँटें भाई परोसी के कहावत ल सिद्ध करत हें। अपन - अपन ल पुछव दुसर के काय जरूरत हे। अब तो नेवता अइसे देथयँ आयल भाही ता आय नइ ते मजा उड़ाय , ओकर बिना काम थोरीक अटक जाहि । अब नत्ता रोवय के गावय..! ना समधी के भेंट ना बहु के जेठ, होगे बिन टंगिया के बेंठ। खँड़े रिसता, परे डरे रिसता। अब रिसता बोलय नही मुक्का होवत हे, टूटत रिसता ल जोरे राखे बर तुरपाई करेल परही।
प्रश्न जनमथे _ जाइदा सुख सुविधा लोगन ला भरमा के दुविधा पइदा तो नइ करत हे..? सबो मइनसे अपनेच जइसन ल संगवारी बनाही ता एक दुसर मा समानता कइसे आही..?
रिसता न टूटे हे न जुरे हे बस रही - रही के खियावत हे। आज कोनो ह कोनो ल नइ सरेखत हे। भई गे नत्ता के कटोरा परत हे जुछ्छा, रिसता परगे सिट्ठा ।
मदन मंडावी
ढारा, डोंगरगढ़ छ. ग.
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