Thursday, 5 March 2026

116 वें जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ी के ठेठ देहाती कवि-कोदूराम दलित

 116 वें जयंती के अवसर पर


छत्तीसगढ़ी के ठेठ देहाती कवि

-------------------------------------

श्री कोदूराम दलित अऊ उंकर सियानी गोठ

-----------------------------------------------------

डाँ.बलदेव:-


     लइका पढ़ई के सुघ्घर करत हवँव मैं काम

     कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम 

     मोर गंवइहा नाम भुंलाहू, झन गा भइय्या 

     जनहित खातिर गढ़े हवॅव कुण्डलियां 

     सउक महू ला घलो हवय कविता गढ़ई के 

    .करथँव काम दुरूग मा मैं लइका पढ़ई के


         ए कुंडलियां हर दलित जी के व्यक्तित्व अऊ कृतित्व ल समझे कुंजी आय। ए नानकन मुक्तक म बहुत अकन गूढ़ संकेत है। भले ही उप्परे उप्पर एहर बड़ सरल रचना दिखत हे। सबले पहिली परिचय- लइका पढ़ई के काम वोहू म एक ठन बिसेषण लगा दिए गय हे सुग्घर अपन काम के अतेक गरब के वोकर फेर दुबारा कथन करथँव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के। काम के बाद नाम कोदूराम उपनाम दलित । ए ठेठ गॅवइहा नाम के परिचय देत बखत न संकोच के भाव अऊ न हीनता के बोध। अपन पाठक से जुड़े बर कवि के हिरदे म कतका कुलुक भुलाहू झन गा भइय्या । बिना उद्देश्य के साहित्य लेखन अर्रा आय, कवि लेखन के प्रति बड़ सावचेत हे। उन जन हित खातिर कुण्डलिया गढ़थें। कविताई के अतेक सउक के एकर पीछू खवई, पिवई सुतई सब बिसुर जाथे, एला आसक्ति कहे जाय के अनुरक्ति ? अभिघा सक्ति अउ प्रसाद गुन के ताना-बाना म बुनाय काव्य भाषा । ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग के बात चले म दलित जी के संगे संग उंकर जवरिहा अऊ आगू-पीछू के कवि पं. सुन्दरलाल शर्मा, पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय, बिप्र जी, श्यामलाल चतुर्वेदी जइसन दो चार अऊ रचनाकर मन परथम पंक्ति में खड़े हो जायें, फेर छत्तीसगढ़ी कुंडलिया के बात निकलथे त उंकर मुंहरन म अऊ कोनो देखाऊ नई दयं ।.... मूड़ म उज्जर गांधी टोपी खफाय, खादीच के दग उज्जर धोती कुरता म देंह तोपाय, जवाहिर बंडी अऊ सर्वोदयी चप्पल के अलग रौब .... दुरिहा ले शास्त्री जी के भोरहा हो जाही। सुरता आवत हे सन् 1966 म भाठापारा म होय छत्तीसगढ़ी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के जिहां कवि- सम्मेलन के मंच म उनला शास्त्री जी के नाम से ही पुकारे गय रहिस... कद काठी ल देखके, ठेठ मसखरी म के श्रद्धा बस... लेकिन श्रोतामन के ताली के गड़गड़ाहट के बीच उंकर मंच म जोरदार सुआगत हो रहिस। हिन्दी के सताधिक साहित्यकार मन के बीच दलित जी के बिल्कुल अलग धज हिन्दी छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन बर बड़ गरब के विषय आय ।


      कोदूराम जी दलित ल छत्तीसगढ़िया, उंकर बोली, उंकर रहन- सहन खान-पान पहिनावा सब्बेच बर बड़ गरब रहिस। छत्तीसगढ़ी बोली के परसंग म उंकर सियानी गोठ हे “हमर छत्तीसगढ़ी बोली हर ब्रजभाषा साहीच सरल अऊ हाना मनन विसिष्ट अर्थ रखथें । " जे समय कोदूराम जी लिखे के सुरुवात करीन वोकर पहिलीच ले छत्तीसगढ़ी रचना के पेडगरी निकल चुके रहिस... छत्तीसगढ़ी दानलीला, भूल-भुलैय्या / कामेडी आफ एरर्स के आधार म लिखे गये खंडकाव्य अऊ हीरू के कहिनीं जइसन ऐतिहासिक महत्व के किताब मन छप गय रहिन, छत्तीसगढ़ी एक अइसन बोली आय जेकर भाषा के विकास अवस्था म ही बियाकरन लिखा गय रहिस। खड़ी बोली के छत्तीसगढ़ी खंभा मन के बाहिर घलोक म प्रतिष्ठा हो चुके रहिस... सिक्षा अऊ राजनीति के कमान हम इहां के धाकड़ नेता अऊ समाज सुधारक मन के हाथ म आ गय रहिस। पूर्ण स्वराज के मांग सुरु हो गय रहिस। गांधी जी भारत के राजनीतिक चेतना के प्रतीक बन चुके रहिन । हिन्दी म स्वच्छन्दवादी काव्य धारा के रोमानी स्वर के एही छत्तीसगढ़ी म छायावाद शीर्षक से नामकरन हो चुके रहिस। ए सबके वैचारिक जीवाणु मन दलित जी के दिलो-दिमाग में कुलबुलात रहिन होहय सवाल रहिस अपन कसकत दुर्दम अनुभूति अऊ विचार ल उन कउन भाषा में व्यक्त करें। महतारी के गोरस जइसे मीठ, सबल अऊ सुपाच्य छत्तीसगढ़ी बोली के मरम ल उन समझिन अऊ वोहीच बोली म लिखे लगिन, एकर बाद भी राष्ट्रभाषा ल उन कभू अनदेखा नई करीन, उंकर विचार अनुकरणनीय हे ये हर राष्ट्र-भाषा ल अड़बड़ सहयोग दे सकत है। वो समय हिन्दी भाषा भाषी क्षेत्र म आचार्य महावीर द्विवेदी के अउ मध्यप्रदेश म आचार्य भानु के अनुसासन रहिस। कोनो साहित्यकार मन ये आचार्य मन के अवहेलना नई कर सकत रहिन। हिन्दी म मुक्त छन्द के अतिसय आग्रह के बाद भी छंद के आग्रह छत्तीसगढ़िया कवि मन म जउन देखाऊ देथे, वोहर पिंगलाचार्य भानु के प्रभाव आय।  


          कोदूराम जी दलित के रचना-विधान ल समझे बर ये प्रसंग म उंकर बिचार घलो ह सहायक हो सकत हे "ये बोली मां खासकर के छन्द- बद्धता के अभाव असन हाबय । इहां कवि मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करयं। स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देंवे।" ये बात ल दलित जी खुदे अपन लेखन म चरितार्थ करथें ।


अपन बोली म लिखे के जोखिम उठाना हर कउनो अंचल विशेष मुक्ति आंदोलन ले कम महत्व के नोहय, बल्कि वोहर तो ए दिसा म सुरूआत आय। छत्तीसगढ़ी बोली ल भाषा के दर्जा दिलाय म दलित जी के लेखन के अहम् भूमिका आय, राष्ट्रीय ऐतिहासिक संदर्भ म ए हिस्सा ल काट के देखना हर आधा-अधूरा दृष्टि आय।


दलित जी छत्तीसगढ़ी के लोक जीवन अऊ संस्कृति के बड़ भारी पुजेरी ऑय । देखा दू डांड म उन इहां के सब्बोच महिमा के बखान कर डारे हैं-


   छत्तीसगढ़ पैदा करय, अब्बड़ चाऊर दार 

   हवॅय लोगमन इहां के सिधवा अउर उदार


              एतकेच नहीं इहां के अनलेख बन संपदा, किसिम किसिम के रतन के खदान घलोक बर उनला बड़ अभिमान है, लोहा जेहर कोनो भी राष्ट्र के रीढ़ के हड्डी होथे, इहेंच ढलथे इंहेच के लोग रोज आगी संग खेलथे लोहा ढलाई के दुख ला हंस हंस के झेलथें ।


भेलाई अऊ कोरबा बर कोन छत्तीसगढ़िया ल गरब गुमान नई होही । दलित जी के भिलाई शीर्षक कविता ह राष्ट्रीय एकता के दृष्टि ले एक महत्वपूर्ण रचना आय । दलित जी के हिरदे म जांगर टोरइया कमिया किसान के प्रति बड़ मया पीरा हे । उंकर श्रम के प्रति उनला बड़ घमंड हे । कमिया के तुलना सूरज से करके उन मेहनत के मान ल बहुत बढ़ा दे हावै -


    दिन भर कर काम कमिया टूटत ले कनिहा

    सूरूज साही सूतयं रात भर उठय बिहनिया


      'पांव' शीर्षक कविता म अकाट्य तर्क देके दलित जी एही निम्र वर्ग से आय कमिया मन के पूजा करे के सलाह देथें । दलित जी ला इहां के रोटी - पीठा, पहिनावा वर भी बड़ गुमान हें। उंकर बिचार म छत्तीसगढ़ के बासी म गजब के गुन भराय हे, उंकर सीख धियान देहे लाइक हे-


        कठिया भर पसिया पियो

          अऊ सौ बच्छर जिओ


           छत्तीसगढ़िया मनखे खुदे बासी खाथे अऊ आन ल तात्तात भात खवाथे। उंकर पहुनाई अऊ सिघाई घलोक हर छत्तीसगढ़ के गरीबी के कारन अऊ जी के काल आय। बंचकमन के तिहार लहुटे हे, अत्तेक धन- धान, दान-पुन के बाद भी छत्तीसगढ़िया धान के खाली कटोरा धरके भीख मांगे बर खड़े हे। अकाल अऊ सुरसा जइसे महंगाई एकरो ऊपर बंचकमन के चतुराई, हमन ल भिखारी अऊ ओमन ला मतवार बना देथे फूटहा लोटा म सोषक वर्ग के ऊपर तीखा व्यंग है। फूटहा लोटा ए बंचक मन ले देखते देखत लखपतिया बना देथे अऊ उन हमला हमर जमीन से बेदखल घलोक कर देथें.... सोचथौँ कभू दलित जी आज जिन्दा होतिन त ए अरबपति जउन मन अपन उद्योग-धंधा मढ़ाय बर हमर घर खेत गावं के गांव ल गटागट लीलत हैं, तेला देख के कइसन कविता लिखतीन.... । दलित जी हिरदे म भारी पीरा लेके ए धरती ले बिदा होइन होहयं । काबर उंकर एक पंक्ति म चेतावनी ले जादा तो पीरा हर ही झलक मारत है।


    धरती ला हथियाव झन धरती सबके आय 

    सिरजे हे भगवान सब्बों खातिर धरती ल


        एकर बाद भी दलित जी के उदारता के कोई जवाब नहीं, उंकर म कहीं संकीर्ण क्षेत्रीयतावाद के बदबू नइये। दलित जी सही मायने म गांधीवादी विचारधारा के कवि आयं, भूदान आंदोलन से भी उन जुड़े रहिन । सत्य अहिंसा अऊ चरखा उंकर हिसाब म सुराज अऊ स्वावलम्बन के अइसन मियार आय जेमा हमर ए लोकतंत्र हर टिके हे। एकरे बल म गांधी ब्रिटिश हुकूमत के मुरवा मड़ोर के ओला बिदारे म सफल होथें। गांधी जी के बलिदान ले दलित जी अवाक हे, मुस्किल से एतकेच कहि सकथें-


    रहिस जरूरत तोर आज चिटिको नहि अगोरे 

    अमर लोक जाके दुनिया ला दुख सागर मा बोरे


           देश जब सुतंत्र होइस त दलित जी मगन होके एक से बढ़ के एक जागरन गीत लिखिन । आजादी के सुवागत म उन मोटियारी नोनी मन ल ओरी ओरी दिया बारे बर कथे । काबर के एही हर उंकर बर सुरहुत्ती देवारी आय ।


चारों मुड़ा गांव म, घर म, गली-खोर म उजाला खुसियाली ही खुसियाली, दिसा-द्वार हांसे-कुलके लगथे- नोनी के दाई जुगुर - जुगुर दिया बात है, सुत उठके बड़े बिहनिया भउजी तिरंगा झंडा फहरावत हे, गलीखोर बन्दनवार अऊ धजा ले सज गय हैं। भारत माँ के पूजा होवत हे, जन गन मन के फाग चलत हे । अरुणकुमार दूध पी के किलकारी मारत है। मंजुलाकुमारी हांस - हांस के जय हिन्द करत है। चारों तरफ मंगल वर्षा होवत हे। इहां अरुण कुमार अऊ मंजुलाकुमारी व्यक्ति के सिवाय भाव के भी बोध करावत हे । लोकतंत्र के तिहार शीर्षक रचना हमर इन्द्रिय मन ला जगाय बर काफी हे- बड़ लोभ- लोभावन दृश्य हे देखा-


  हमर सास हर ठेठरी खुरमी भजिया बरा पकावय     

  लमगोड़वा भउजी के  भाई चोरा  चोरा के खावय


           वोती नाचा सुरू हो गय हे, घर अंगना म कहूं ल सल नई परत हे, भेद नई खुलही सोच समधिन छिनरिया वोही कोती सुटुर सुटुर रेंगत हे फेर भगवानी भांचा के कारन पोल-पट्टी खुल गइस-


   सुदुर सुटुर सटकिस समधिन हर देखे बर नाचा

   रोवत ओकर पिछलग्गा भागिस भगवानी भांचा


    छत्तीसगढ़ के कई अंचल म कई जात म भांजा बर कन्यादान के रिवाज हे, एकरे बर समधिन के लइका बर इहां भांचा शब्द के प्रयोग होय हे, फेर सटकिस हर बिलमे के अर्थ-बोध कराथे रेंगे के नहीं । अनुप्रास के चक्कर म दलित जी लोक चक्कर खा गय हैं। सुनो जी मितान म डंडा गीत के धुन के सुन्दर प्रयोग होय है-


    नारि नारि नाना हरि नाना गोसाई 

    आपस के झगरा होथे दुख-दाई 


       सुधार अऊ नव-निर्माण के गीत हर देसभक्ति के सच्चा परिचायक आय। दलित जी महान स्वप्न-द्रष्टा पं. नेहरू के सपना ल साकार होत देखिन अउ उमंग म वोकर फोटोग्राफी भी कर दीन-


       ये कतको बांध खना डारिस 

       कतको ठन नहर बना डारिस 

       पड़ती जमीन ला टोर टोर

       पानी मा करके सराबोर

       ये गजब अन्न उपजाव त हे 

       भूखमरी भगावत जावत हे


       बांध खना डारिस के जगा बांध-बंधा डारिस करे म ए चलन हर निर्दोष हो जातिस । दलित जी भविष्य द्रष्टा कवि आय, उन कभू लिखे रहिन- 


           एक दिन मनवा के लोहा ला 

           आजाद कराही गोवाला


       आगे चल के उंकर भविष्यबानी सच निकलीस। पंचायत के बारे म भी उंकर मन म सुखद कल्पना रहिस। सोंच म पड़ जाथों, पंचायत राज के वर्तमान अवस्था देख के उंकर आत्मा कइसे करत होहय.... पंचवर्षीय, अल्प बचत, परिवार नियोजन, सहकारिता, गोरक्षा, भूदान जइसन कल्याणकारी योजना अऊ आंदोलन मन सब्द के दुनिया में बड़ नीरस विषय आय, लेकिन निषेध के जगा विधान पक्ष ल लेके दलित जी एक से बढ़ के एक सुग्घर अऊ सरस गीत लिखे है, जेकर ले उंकर समसामयिक चेतना, समाजिक दायित्व अऊ रचना धर्मिता के प्रमान मिलथे। वस्तुवादी या उपयोगितावादी साहित्य हर प्रचार अऊ प्रसार के सुविधा के बिना भी एतेक लोकप्रिय हो सकत है, ए बात के सबूत दलित जी के ए रचना मन हवय । उंकर कविता के विषय म तुलसीदास के ये पंक्ति हर चरितार्थ होथे- 'निरस विसद गुनमय फल जासू'। दलित जी के रचना म जऊन ताप जऊन उष्मा हे वोकर भेद उंकर करनी अऊ कथनी के एका म छुपे हवय । उंकर ए आहवान हर हरेक जुग म नौजबान मन ल प्रेरना देत रही-


   मांगे स्वदेस श्रमदान तोर संपदा तोर विज्ञान तोर     

   जब तोर पसीना आ जाही ये पुण्यभूमि हरिया जाही


              दलित जी प्रगतिसील धारा के वाहक आय वैज्ञानिक प्रगति म उंकर आस्था हवय। उन अणु सूक्ष्म अऊ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व ल दर्सन ले जोड़थे, जीवन ल सुन्दर बनाम बर विज्ञान के प्रयोग होना चाही। वोकर विनासक या निषेध पक्ष से उन ला सख्त नफरत हवय । दू डॉड एमेर देखे लाईक हे -


     बौराइन बमबाज मन बम ला करयं तैयार

     बमबाजी कर निठुर मन करथें नर-संहार

     उंकर प्रार्थना हे बम ला नष्ट करो हे

      बम लाई ए बम संकर ।


                     .विज्ञान के निषेध पक्ष ले आज समूचा वातावरन दूषित हो गय हे, एकर समन बर पेड़ लगाना ही सर्वोत्तम उपाय आय ।


    भाई अब सब ठउर मा अइसन पेड़ लगाव

    खाये खातिर फल मिलय, सुरता बर छांव


        दलित जी ए छांव अऊ फल के रक्षा घलोक बर सचेत हे... उंकर हिसाब म पेड़ लोड़ी भी देथे जेकर ले दुष्टन मन के सुधार किए जा सकत हे। बेंदरा बिनास करवइया मन बर दलित जी जंग रथें, उनला सुरता भर आना चाहिए दुष्टन के कहां तक कहे जाय- बिहाव म कन्या के चुनाव तक उनला दुष्टन के बराबर ख्याल रहथे। सभ्य समाज म जिये बर, गुंडा मन ला ठीक करना भी जरूरी हे दलित जी के मांग है-


   खटला खोजो मोर बर ददा बबा सब झन 

   खेखरीं सही नहीं बधनीन सही लाव

   गुण्डा के मुंह मा चप्पल मारय फट ला 

   खोजा ददां-बबा तू मजा के अइसन खटला


      छत्तीसगढ़ मूलतः कृषि प्रधान राज आय दलित जी वोकरे बर गाय ल लक्ष्मी मान के उंकर सेवा के सिक्षा देथे, वोकर से पिये बर दूध, खातू बर गोबर, नांगर-गाड़ी खीचे बर बइला मिलथे । गोबर जइसे तुच्छ जिनिस बर उंकर विज्ञानिक दृष्टि हवय । छेना थापे के जगा उन खातू बनाय ल जादा लाभकारी बताथों राख जइसे चीज के उन उपयोग ल समझथें । एकर से उंकर गांधीवादी वृत्ति के पता लगथे। गांधी जी छोटे-छोटे बात पर भी ध्यान देवय। कोदूराम दलित जी मूलतः कृषि-संस्कृति अऊ प्रकृति के कल्यान रूप के सफल चितेरा आय। चद्रमास सीर्षक उंकर लम्बा रचना एकठन छंद देखा-


    धाम दिन गइस, आइस बरखा के दिन 

    सनन सनन चलै पवन लहरिया 

    छाये रथे अकास म चारों खूट धुआं साही 

    बरसा के बाद निच्चट मिम्म करिया 

    चमकय बिजली गरजे घन घेरी बेरी 

    बरसे मूसलाधार पानी छर छरिया 

    भरगे खाई - खोंधरा कुंआ डोली डांगर ओ 

    टिपटिप ले भरगे नदी-नरवा


    युग्म सब्द के मोह म एमेर दलित जी खोंधरा अऊ डांगर घलोक म पानी भरो दे हावैं अइसन प्रयोग से बचना चाहिए। चउमास दलित जी के प्रतिनिधि रचना आय एमा मत्तगयंद अऊ किरीट सवैया के प्रयोग होय हे । मरत हाथी के चाल अऊ परबत श्रेणी मन के ऊपर जइसे छाये बादर के सादृस्य विधान एमेर अनूठा हवय। एक जगह दलित जी संस्कृति के इतिवृत्तात्मक सैली म किसिम किसम के रुखराई, चार- चिरौंजी, जरी-बूटी, जीव-जन्तु के बिस्तार ले गिन्ती कर डारे हे, एकर से कविता बड़ कमजोर अऊ नीरस हो गय हे, अइसन वर्णन पं. लोचन प्रसाद पांडेय के रचना म भी देखे बर मिलथे, एत्तेक सचेत कवि मन के अइसन कोरा वर्णन के पीछे का कारन हो सकत हे। संभवत: छत्तीसगढ़ के बन-बैभव संपदा अऊ खांटी शब्द मन के सरक्षण के चिंता एकर एक कारन हो सकत हे ।


       कोदूराम दलित जी के गीत, 'हमर गांव पढ़के' प्यारे लाल गुप्त के लिखे हमर कतका सुग्घर गांव, जइसे लक्ष्मी जी के पांव के सुरता आ जाना सुभाविक आय। मूल संवेदना एक होय के बाद भी दूनों रचना म सूक्ष्मता अऊ स्थूलता, संक्षिप्तता अऊ विस्तार के अंतर हवय । गुप्तजी के रचना म चिकनाई अपेक्षाकृत जादा हें धान कटाई, जोताई, जइसन मेहनत के काम म भी सुधराई खोज लेना दलित जी बर सहज आय । चन्देनी गीत म ए गीत के सैकड़ों बार मंचन हो चुके हे अऊर एकर, प्रसिद्धि गांव-गंवई तक पहुंच गय हे। ध्वनि, प्रकास अऊ रूप रंग के मनभावन दृश्य वाला ए रचना म अर्थ व्यक्ति या डायरेक्टनेश के वर्णन चातुरी अद्भूत हे 16+12- 28 मात्रा के हरिगीतिका अऊ सार के छंद-विधान देखे लाइक हे-


   छन्नर छन्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी 

   हांसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहीन टूरी 

   काट काट के धान मढ़ावय ओरी ओरी करपा

   देखत मा बड़ नीक लागय सुंदर चरपा के चरपा    

   लकर-धकर बपुरी लइकोरी समधिन के घर जावय          

   चुकुर चुकुर नान्हें बांबू ला दूदू पिया के आवय 

   दिदी लुवय धान खबा खब भाठों बांधय भारा    

   अऊहाँ शकँहा बोहि महि के लेजय भउजी व्यारा


          काम म हाथ बंटाय बर दीदी भांठो लइकोरही समधिन घलोक आ गय है। पूरा कुटुम काम-धाम म भिड़े हे। भरदराय काम म समूह के ताकत, सिंगार बीर अऊ वात्सल्य के तिरबेनी, द्विरुक्ति, अऊ सब्दमैत्री के सरल प्रवाह, बिल्कुल धमनी के हाट जइसन सब्द चयन। साफ-सुथरा अऊ मनमोहक ए रचना म अनुप्रास के लरी मन संगीत पैदा कर देथे संस्कृत भाषा के भातृ सब्द हर कै सौ बरिस के जात्रा करिस होहय छत्तीसगढ़ी म तो परूष-ध्वनि के बाद भी कहत सुनत म बड़ नीक लागथे' भांटों' जे कोण ले देखा ए हीरा के कटाव ह प्रकास के परावर्तन / अर्थ-बोध / के साथ चमक चमक उठथे। " भांटो"


          आज के जटिल अनुभव, उग्रविचार जीवन के कटुता विसंगति अऊ दिसाहीनता के कारन कविता के परंपरागत ढांचा मन चरमरा के कुटकुट्टा हो गय हे अऊ पद्य के जगा गद्य हर ले ले हावै। तभो ले दलित जी के एन रचना मन हमला आस्वत करथे के आजो भी छंद के महत्ता हावै । एकर से रचना में स्थिरता, अऊ सम्प्रेषणीयता के गुन आपे आप आ जाये। दलित जी अपन दीर्घ काव्ययात्रा म रोला, दोहा, उल्लाला, हरिगीतिका, चौपाई, पद्धति, मांत्रिक छंद, म जइसन सिद्धि मिले हे, वोहर आने जगा दुर्लभ आय । दलित जी के कुंडलिया मन नीति अऊ सिक्षा हवॅय, लेकिन हास्य- व्यंग्य के पाग से बड़ चटकारे दार बन गय है। दलित जी के कुंडलिया मन जीवन अऊ जगत, व्यक्ति अक समाज, दर्सन विज्ञान अऊ राजनीति सत्तालोलुपता अक मेहनत याने समग्र जन जीवन के दर्पन आय दलित जी के हास्य-व्यंग्य मन काफी पैना है, जेकर ऊपर चोट पड़थे वो तिलमिलाय के बाद भी खलखला के हांस डारथे, यही हर हास्य-व्यंग्य के आदर्स आय मापदण्ड आय ।


          हरही के संग कपिला के बिनास बहुत पुराना मुहावरा आय, "लेकिन दलित जी के कलम म निथर के ओही धारदार हो गय है। कुसंगति के परिनाम सुनो-


   बिगड़े कपिला गाय खाय के सब के चीज बसला

   जउने पाय ठठाय अऊर टोरय नस नस ला


स्वार्थी अऊ अवसरवादी के पटन्तर एक ठन कुंडलिया म दलित जी टेटका से दे हावे देखा कतका सही दृष्टांत हावे-


    मूड़ी हलावय टेटका अपन टेटकी संग 

    जइसन देखय समय ला तइसन बदलय रंग 

    तइसन बदलय रंग बचाय अपन वो चोला 

    लिलय गटागट जतका किरवा पाय सबो ला 

    भरय पेट जब पान पतेरा मां छिप जावय 

    ककरो जावय जीव टेटका मूड़ी हलावय


         राजनीति के क्षेत्र म दंवधतिया अऊ पन पेटया म जादा तपथें । सत्ताधारी के पांव चाट के उन समाज बर बड़ घातक बन जाथे, उन अपन औकात भुलाके सबे के मूड़ म चढ़े खोश थे अइसन मन बड़ा मन के तुलना दलित जी पतंग से करथे अऊ कड़क बोली म चेतावनी देथे-


        गिर जाबे तैं धागा कटही तउने पल मा

   बचा नहीं सकिही उन उड़थस जिनकर बल मा


      अखबार लोकतंत्र के चउथा खंभा आय, लेकिन पीत पत्रकारिता के बढ़त ल देख के उन कउवा जाथे। स्वास्थ बस पेपर ला झन पिस्तौल बनाओ, जइसन कथन हर समझइया मन बर भारी फटकार आय। पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय जइसन दलित जी अपन पेसा (मास्टरी) के प्रति ईमानदार रहीन वो मन बच्चा मन के बड़ हितैषी आयं । एकरे बर भारी मात्रा म सरल पदावली म बाल-साहित्य के रचना करे हबय। माता-पिता गुरु पोथी के सेवा, सपूत अउ कपूत, कायर अऊर बीर, सिंह अऊर सियार जइसन परस्पर विरोधी गुण के पात्र ल आमने सामने रख के लइकन मन के चरित्र-निर्माण के दिसा म एक कवि मन बड़ योगदान करे हैं। कविता म कॉनट्रास्ट या विरोधाभास पैदा करना कवि के निजी विसेषता आय । खटारा साइकिल ऊपर ले हास्य पैदा करथे लेकिन भीतरे भीतरे अध्यात्म के दुनिया घलोक म ले जाथे। गृहस्थ जीवन के मन ल छू लेने वाला चित्र, निरमोही धनी के दर्सन, बिरहीन के बिनती दलित जी के भावुक हृदय के प्रतिबिम्ब आय । एमेर उंकर हृदय के विदग्धता के दरसन होथे ।


              कोदूराम जी दलित के कविता-संसार बड़ व्यापक है, वोकर कई ठन विसेषता हवय । पहिली तो विषय के विविधता, दूसर चटकदार मुहावरा मनके प्रयोग तीसर हास्य-व्यंग्य के तेजधार चौथा छंद मन के कसाव, खासकर कुंडलिया के नाग-मोरी कसाय, आखर थोरे अरथ अति वाला ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग जेकर से डंकर कविता म बड़ कड़कपन आ गय

हे । एकठन अऊ बड़े अउ अंतिम विसेषता के उंकर रचना म कोनो काल या स्थान विसेष के व्यामोह नइये, एकर बर हर समय उंकर प्रासंगिकता बने रहही ।


            वोइसे तो समय के तेज बहाय म कोन कहां किनारे लग जाही, कोनो ला पता नइये । त फेर कोनो रचनाकार के कोनो रचना बर कोन. किसिम के भविष्य बानी करना अर्रा आय। सार बात तो एतकेच आय कि कोन रचनाकार हर अपन समय अऊ समाज के संग कतका दूरिहा तक चल सकिस, कतका मनला प्रभावित कर सकिस अऊ कतका उंकर से प्रभावित होइस। आज के जमाना मा राजनीति के आघू साहित्य के का बिसात वोकर आघू हर दीन-हीन अऊ निरतेज हो गय है। आज के दिसाहीन धुरीहीन समाज म जब बड़े-बड़े साहित्य मनीषी के अस्तित्व खतरा म पड़ गय हे त हम साधारन छत्तीसगढ़ी रचनाकार मन के का बिसात? आज तो पूंजीपति अऊ सत्ताधारी मन के दलाल तथा कथित जनरलिस्ट मन के ही पूछ पुछारी हे, तभ्भो ले हमरो बीच कुछ अइसन ईमानदार, सुआभिमानी साहित्यकार मन यसः काय शरीर म जिंदा रथे जेमन बताथे के स्वस्थ समाज अऊ बेहतर दुनिया के निर्मान म आजो भी उंकर दरकार है, अइसन साहित्यकार मन म एक नाम कोदूराम दलित जी के भी हवय ।

                  ***********

('छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि" समीक्षा ग्रंथ  भाग एक से साभार)

लेखक डाँ. बलदेव के किताब से

प्रस्तुति:-बसन्त राघव

पंचवटी नगर,मकान नं. 30

कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,

छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396


लोकाक्षर जून-2000, छत्तीसगढ़ी से वक अगस्त 20002 अंकों में

Sunday, 1 March 2026

लघुकथा ) आफत

 (लघुकथा )


आफत

---------

ट्रेन ला अगोरत स्टेशन मा बइठे-बइठे अपन मोबाइल मा वाट्सऐप, फेसबुक मन ला कोंचकत रहेंव। वोतके बेर एकझन अधेड़ महिला हा आके कहिच--

"ये बाबू थोकुन मोबाइल ला देबे का?"

"काबर वो?"--मैं पूछेंव।

"मोबाइल ला घर मा भुलागेंव हा बाबू। चरडबिया मा आवत हँव कहिके बेटा ला लेगे बर स्टेशन आ जबे कहिके फोन करहूँ?"

नारी परानी के सहायता करना चाही सोचके वोला मोबाइल ला दे देंव।

वोहा थोकुन दूरिहा मा बइठे बीस-पचिस बछर के एक झन नोनी ला थमा दिच। वोहा नम्बर लगा के लम्बा चौड़ा पाँच-छै मिनट ले गोठियाये ला धरलिच। मजबूरी मा मोबाइल ला माँगे ला परगे।

गाड़ी आइच तहाँ ले बइठगेंव। वोमन कती गेइन तेला नइ देख पायेंव। गाड़ी हा स्टेशन ले निकले बस पाये रहिसे एक ठो अनजान नंबर ले कड़क अवाज में फोन अइस- " हलो --हलो--हलो --"

"हलो हलो --तैं कोन अच भइया?"

"अरे तुम कौन हो पहले बताओ? जादा सयाना मत बनो। इसी नम्बर से कुछ देर पहले मेरी पत्नी का फोन आया था? कहाँ है वो। घर से झगड़ के भागी है?"

मोर माथा झंनागे। मन हा कहे ला धरलिच के आज तैं आफत मा परगेच। अउ भलमनसी देखाबे?

मैंहा वो फोन करइया ला कहेंव- "मैं कुछु नइ जानवँ आदरणीय। भल ला भल जानेंव।कुछु परेशानी मा होही कहिके मांगिस ता फोन ला दे परेंव।फेर एक झन अधेड़ महिला हा रायपुर स्टेशन मा माँगे रहिसे। वोमन कती गेइन तेला नइ जानवँ। "

मैं चुपचाप लकर-धकर स्विच आफ करेंव।

जइसे घर पहुँचेंव। सब ले पहिली थाना जाके ये घटना ला लिखवायेंव।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

लघुकथा) -------------- *संस्कृति बदलत हे*

 (लघुकथा)

--------------


*संस्कृति बदलत हे*


          हमर छत्तीसगढ़ मा अपन माटी, अपन संस्कृति,अपन पुरखा अउ सियान मन के सम्मान करे के रिवाज सदियों ले चले आवत हे। अगहन महीना मा दाई अन्नपूर्णा के कृपा हा साक्षात् बरसथे, जब हमर धनहा डोली मा उपजे फसल हा लुआ टोराके कोठार मा आ जथे, माटी महतारी अउ गाँव के देवी देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे के ये बहुत बढ़िहा मौका होथे।

        

             अउ तब फेर सिलसिला चालू होथे मड़ई मेला के, गाँव-गाँव मा उछाव होथे,चार महीना के चौमासा ले थके हारे मन, अपन प्रियजन ला पाके गदगद हो जाथे अउ जिनगी ला नवाँ ढंग नवाँ उमंग ले जीये बर प्रेरणा देथे।


                फेर आज हमर संस्कृति ऊपर घलो शराब के संस्कृति हावी होवत जात हे जउन हमर विरासत ला लीले के जबर ओखी बन गेहे।


         अइसने एकठन गाँव मा मड़ई के आयोजन होइस, सब लोग बाग खुशी मा नाचत गावत राहँय, बाजा-रूंजी संग गाँव के जम्मो लइका, जवान, सियान मन माता देवाला, ठाकुरदेव ला मनावत गुड़ीपारा के चौक मा सकलाय हे, ओतके बेरा मंच ले उद्घोषक हा कहिथे...........!!!


        आप जम्मो ग्रामवासी अउ तीर तखार ले आय पहुना मन के पैलगी करत हँव...... आप सबके हार्दिक स्वागत हे, अभिनंदन हे। गाँव के जम्मो देवी देवता के पूजा अर्चना के बाद अब सबो सियान मन के सम्मान करे जाही। 


         ततकेच बेरा एक झन दरुहा लड़बिड़- लड़बिड़ करत मंच मा चढ़के चिल्लाय बर धर लिस, ओला मंच ले उतारे बर सब हाँव-हाँव करे बर धर लिन, भरभर-भरभर एती-ओती लोगन मन भागत हे,लइका मन के रोवाराही परगे,झूमाझटकी मा सब तितर-बितर होगे,माइक घलो टूटगे,भीड़ हा बगियागे।हमर संस्कृति कोन डहर जात हे,सोंच के मोर मति छरियागे।




🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

लघुकथा एक दृष्टि*

 *लघुकथा एक दृष्टि*

       कथा साहित्य मं तीन कथा उपन्यास, कहानी अउ लघुकथा शामिल करे जाथे। ए तीनों कथा ला आकार के दृष्टि ले क्रिकेट के भाषा मं टेस्ट, वनडे अउ टी-20 क्रिकेट के जइसे देखे जा सकत हे। फेर शिल्प (बुनावट/बनकट) मं अइसन नि होवय। तीनों मं कथानक, पात्र/चरित्र, संवाद अउ देश-काल या वातावरण चार तत्व मूल रूप ले पाए जाथे। साहित्य के कोनो विधा होवय, ओकर लेखन के अपन एक उद्देश्य होबे च करथे। एहा कथा साहित्य बर घलो लागू होथे। जउन ल कथा साहित्य के पचवइया तत्व माने जाथे।

      हर विधा के अपन एक शिल्प होथे। जेकर ले वो विधा मं लिखे गे जिनिस ला साहित्य के कसौटी मं कसे जाथे। परखे जाथे। बिल्डिंग कतको बनथें, फेर जरुरत के पूर्ति संग आने-आने नाव दिए जाथे। स्कूल, ऑफिस, मंदिर, घर...।

       कथा साहित्य मं सिरिफ लघुकथा हा एक अइसे विधा होथे जेन मं लेखक के प्रवेश मना रहिथे। जउन ल लेखकीय प्रवेश कहे जाथे। जेन मं लेखक अपन गोठ/विचार ला पात्र ले नइ कहवा के खुदे कहि देथे। लेखक कहूॅं लघुकथा मं एक पात्र हे तौ वोला लेखकीय प्रवेश नइ माने जाय। कहानी मं लेखकीय प्रवेश के गुंजाइश पूरा-पूरा रहिथे। लघुकथा टी-20 क्रिकेट जइसे फटाफट चलथे। एके घटना होथे। इही लघुता हा लघुकथा के खासियत आय। कहानी अउ उपन्यास मं उपकथा शामिल हो सकथे। एकर कथानक/घटना क्षण विशेष के होना चाही। लघुकथा मं कालांतर एकदम नाम मात्र के रहिथे। लघुकथा अउ टी-20 क्रिकेट मं अंतर ए रहिथे कि क्रिकेट मं जीत-हार के रूप मं रिजल्ट तय रहिथे। फेर लघुकथा मं बहुत अकन पाठक बर छोड़ दिए जाथे। एक पंच लाइन के संग पूरा करे के प्रयास होथे। जउन ह खासकर संवाद के रूप मं होथे। 

        बहुत झन मन छोटे आकार के कहानी ला लघुकथा समझ  या मान लेथें। कहानी पूरा होय ऊप्पर ले पाठक बर कोनो सवाल नि छोड़े। ओकर उद्देश्य भले कतको सवाल खड़ा करथे।फेर लघुकथा अइसे खत्म करे जाथे कि पाठक के मन मं कई ठन सवाल छोड़ दै। 

       आखिर मं इही कहिहूॅं कि लघुकथा (विधा) अउ लघु कथा (कथा के छोटे रूप) दू अलग-अलग बात आय।

०००

पोखन लाल जायसवाल

भेंड़ा अउ बेन्दरा वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा


भेंड़ा अउ बेन्दरा


वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक जंगल में एक भेड़ा अउ बेन्दरा ह अलग-अलग ठउर में रहय। अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। एकदिन उदुप ले दुनो झन के एक ठउर में भेट होगे। दुनो झन एक-दूसर के परिचे जानिन अउ मितान बधगे। अब दुनो झन एके संग खाय-पिये अउ किंजरे। जंगल में  चार-तेन्दू असन किसम-किसम के फर ला देख के बेन्दरा ह पेड़ में चढ़े अउ तोड़-तोड़ के खाल्हे में गिरावत जाय, भेड़ा ह सबला सकेल के राखे, बेन्दरा ह पेड़ ले उतरे तहन दुनो मितान मन के अघात ले खाय। अइसने-अइसने अड़बड़ दिन बीतगे। 

एक दिन के बात आय, दुनो मितान जंगल में किंजरे बर गे रहय। बेन्दरा ह चिरई जाम के पेड़ में चढ़के फर ला तोड़त रहय। उही बेरा ओला भेड़ा संग ठट्ठा मढ़ाय के शउख लागिस। 

ओहा भेड़ा ला किहिस-‘‘ मितान फर ला सकेले में आप मन ला गजब बेरा लागथे, फर हा धुर्रा-माटी में सना घला जथे तेखर ला आप मन अपन मुँहू ला उला के मोर कोती ला देखत रहव। मैंहा बने तुक के फर ला आपके मुँहू में फेकहूं तहन आप मन बने गप ले खा लेहू।"

 भेड़ा ह भल - ला - भल जानिस अउ हव कहिके अपन आँखी ला मूंद के अउ मुँहू ला बने खोल के पेड़ उप्पर चढ़े बेन्दरा कोती ला देखे लगिस। मौका पाके बेन्दरा ह भेड़ा के मुँहू में खखार के थूक दिस। 

भेड़ा ह थू-थू करत जंगल कोती भागिस। भेड़ा ह भागत-भागत घनघोर जंगल में पहुँचगे । ओहा निचट थकगे रहय। थोड़किन सुस्ता लेथव कहिके ओहा एक ठन पेड़ के खाल्हे में बइठगे। थकासी के मारे ओखर नींद ह पड़गे। नींद उमचिस तब ओहा देखथे के दिन ह बुड़गे रहय। जंगल ह सांय-सांय करत रहय। अब डर के मारे भेड़ा के जीव ह पोट-पोट करे लगिस।

भेड़ा ह मने-मन गुनत रहय-‘‘हे भगवान! मैंहा तो अलकरहा आफत में फंसगे हवं। रतिहा होही तहन बघवा भालू, हुर्ड़ा-चितवा मन अपन-अपन माढ़ा ले निकल के किंजरही? कहूं उखर नजर मोर उपर पड़ जाही तब तो मोर जीव नइ बांचे, अब मैहा काय करवं?"

डर के मारे भेड़ा ह अपन जीव बचाय बर अउ रतिहा पोहाय बर येती-ओती चारो कोती ठउर खोजे लगिस। तभे ओला जंगल भीतरी बने ढुरी रक्सीन के घर ह दिखगे। ओहा उनिस न गुनिस अउ सोझे उहींचे खुसरगे।

 वतका बेरा ढुरी रक्सीन ह जंगल में किजरे बर निकले रहय। घर ह निच्चट सुन्ना रहय। भेड़ा ह बने हरहिन्छा घर ला चारो कोती किंजर-किंजर के देखिस। उहाँ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस माढ़े रहय। भेड़ा ह खुश होगे। ओहा पहिली हकन के बने पेटभरहा उहाँ माढ़े मेवा-मिष्ठान ला झड़किस अउ आराम से बइठ के सोचे लगिस। ये ठउर ह तो मोर बर गजब सुघ्घर हे फेर ढुरी रक्सीन ह आके हाँक पारही तब काय कहूं। ढुरी रक्सीन ले बाँचे बर भेड़ा ह एक उपाय सोचिस।

रतिहा होईस तहन ढुरी रक्सीन किंजर के अपन घर पहुँचिस। कपाट ह भीतरी कोती ले बंद रहय। ढुरी रक्सीन ला बड़ा अचरज होईस। ओहा मने मन म गुनिस, अई! मैंहा तो कपाट ला बाहिर ले बंद करके गे रहेव। कोन बैरी मोर घर में खुसरगे हावे दई। 

ओहा गुसिया के चिचियाइस-‘‘अरे! मोर घर में कोन बैरी ह खुसरे हव रे।‘‘

ढुरी रक्सीन के के आरो पाके भेड़ा ह सुकुरदुम होगे। जीव में धुकधुकी समागे। फेर ओहा उप्पर छावा हिम्मत करके किहिस-‘‘अरे! कोन आय रे, मोर नाव नई सुने हावे का? भेड़ा-भेड़ा भेड़-भेड़ाकिन, सांप के आरी बनावव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बन भंइसा ला नागर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बधुवा ला तीन थप्पड़ लगावव।‘‘

अनचिन्हार जिनावर के अइसन अवाज ला सुनके ढुरी रक्सीन के सिट्टी-पिट्टी गुम होगे। डर के मारे ओहा ठाढ़े-ठाढ़ सुखागे। ओहा सोचिस, ये ददा! लागथे कि मोर घर में कोन्हो बड़ा भारी जिनावर ह आके अपन माढ़ा बना डारे हावे। जीव बचाना हे तब इहाँ ले भागे ला पड़ही नई ते पराण नइ बांचे तइसे लागथे। ओहा तुरते उहाँ ले पल्ला भागिस।

रद्दा म ओखर भेट बघवा संग होगिस। बघुआ ह ओला देख के पूछिस-‘‘काय बात आय ढुरी रक्सीन बहिनी! अइसन काबर भागत हस?‘‘

ढुरी रक्सीन रोवत-रोवत किहिस-‘‘ काय बात ला बतावव बघुआ भइया! कोन जनी कोन जिनावर मोर घर में अपन माढ़ा बनाय हावे, हाँक पारथावं तब सांप के आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनाव , बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला भुंज के खावव अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगाववं कहिके मुही ला धमकी देथे।‘‘

 येला सुनके बघुआ ह खखवागे ओहा भड़क के किहिस-‘‘ अरे! ओखर अतेक हिम्मत, मैहा ये जंगल के राजा अवं अउ ओहा मोला तीन थप्पड़ लगाव कहिथे, चल तो भला मैहा देखथवं।‘‘

बघुआ के पाछू-पाछू ढुरी रक्सीन फेर अपन माढ़ा में पहुंँचिस। ये पइत बघुआ ह हाँक पारिस। बघुआ के दहाड़ ला सुनके भेड़ा के होश उड़ागे। ओहा आधा डर आधा बल करके फेर अपन मंतर ला पढ़ दिस। 

   अब तो बघुआ के हिम्मत घला पस्त होगे उहू अपन जीव बचाय बर उहाँ ले भागिस। अइसने-अइसने सांप बिच्छी, बनभंइसा संग रद्दा में ढुरी रक्सीन के भेंट होइस। सबो झन हिम्मत करके ढुरी रक्सीन के घर में जाय अउ भेड़ा के मंतर ला सुनके डर के मारे लहुट जाय। कोन्हो के हिम्मत घर में खुसरके वो अंजान जिनावर ला देखे के नई होय। अब ओ घर में ढुरी रक्सीन ह आय-जाय बर छोड़ दिस अउ भेड़ा ह हरहिन्छा अपन माढ़ा बनाके उहां रहय।    धीरे-धीरे उहाँ के खाय-पिये के सब समान सिरागे। भेड़ा ह ढुरी रक्सीन के घर के बने -बने जिनिस ला खा-पी के बने मोटागे रहय। अब ओहा गुनिस अब इहाँ रहना ठीक नइहे। कभु कहूँ मोर भेद ह खुल जाही तब इहाँ के जिनावर मन मोर पराण ला ले बिना नइ छोड़े। एक दिन झिमझाम देखके भेड़ा उहाँ ले कलेचुप भगागे।

अब भेड़ा ह अपन मितान बेन्दरा के घर पहुँचिस। ओला देख के बेन्दरा ला अपन करनी बर बहुत पछतावा होइस। ओहा लजा के अपन मुड़ी ला नवा के बइठगे। 

भेड़ा ह ओला कहिस-‘‘मितान अब लजाय के कोन्हों बात नइ हे जउन होना रिहिस तउन होगे।‘‘ 

भेड़ा के गोठ सुन के बेन्दरा के हिम्मत बाढ़िस। ओहा भेड़ा ला पूछिस-‘‘कइसे मितान! अतेक दिन ले कहाँ रहेव? बने मोटागे हावव, लागथे मनमाने माल पुआ झड़के हव।‘‘

भेड़ा ह अपन सब हाल - चाल ला साफ-साफ बतादिस। बेन्दरा ललचाके कहिस-‘‘ मितान! महू ला ढुरी रकसीन के घर के पता बता देतेव तो कुछ दिन महू उहां ले मालपुआ झड़क के आ जातेंव अब तो इहां जंगल के सब फल - फलहरी मन झरगे हावे खाय-पिये के कुछु नइ बांचे हे। देखव ना, मैहा कइसे भूख पियास में निच्चट दूबर-पातर होगे हवं।‘‘

भेंड़ा के जीव ह तो भीतरे- भीतर जरत रहय। ओला बने बदला ले के मउका मिलगे। ओहा बेन्दरा ला जंगल में ले जाके ढुरी रक्सीन के घर के पता ला बता दिस अउ ओला समझा के कहिस-‘‘देख मितान! ये घनघोर जंगल में हमेशा बघुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा के डर बने रहिथे। तुमन भीतरी में खुसर के कपाट ला बंद कर देव अउ कोन्हो आके हाँक पारही तब मैं बतावत हवं उही मंतर ला भीतरीच ले पढ़हू। भेड़ा ह उही सांप ला आरी बनाव, बिच्छी के तुतारी बनावव, बनभंइसा ला नांगर फांदव, ढुरी रक्सीन ला मार के खावं अउ बघुआ ला तीन थप्पड़ लगावव वाला मंतर ला बता के उहाँ ले कलेचुप लहुटगे।

   बेन्दरा ह भीतरी में खुसर के कपाट के संकरी ला लगा दिस अउ भेड़ा के छोड़े जूठा-काठा जिनिस मन ला आरूग समझके खावत-पियत रहे लगिस।

येती बहुत दिन बाद ढुरी रक्सीन ला अपन घर के सुरता आइस। ओहा सोचिस, बहुत दिन तो बितगे हावे। मोर घर में जउन जिनावर ह कब्जा जमाय रिहिस ओहा अब भागगे होही। अइसे सोच के ओहा अपन जुन्ना घर में धमक दिस। 

     ढुरी रक्सीन ह फेर अपन घर के मोहाटी तीर जाके चिचया के कहिस-‘‘अरे! ढुरी रक्सीन के घर में कोन खुसरे हव रे?‘‘ 

बेन्दरा ह डर के मारे भेड़ा के बताय मंतर ला भुलागे अउ हुप-हुप करके येती-ओती उछले-कूदे लगिस। उछले-कूदे के अवाज ला सुनके ढुरी रकसीन ला शंका होगे ओहा कपाट तीर में जाके सेंध डहर ले देखिस, तब उहाँ बेन्दरा ह कूदत रहय। बेन्दरा ला देख के ढुरी रक्सीन के एड़ी के रिस तरवा में चढ़गे। 

     ओहा मने मन किहिस-‘‘रहा ले ले रे बेन्दरा! तोर सेती मैंहा गजब दुख भोगे हवं अब तोर मजा ला बतावत हवं।‘‘      अइसे सोच के ओहा उल्टा पाँव उहाँ ले लहुटगे अउ जंगल  में जाके ये बात ला बघुुआ-भालू, हुर्ड़ा-चितवा,सांप-बिच्छी सब ला बता दिस। सब के जी तो खखुवाय रहय। ओमन सब तुरते बेन्दरा ला मारो-मारो कहिके दौड़िन। सब झन मिल के ढुरी रक्सीन घर के कपाट ला तोड़ दिन अउ बेन्दरा ला पकड़ के वहा मार मारिन कि बेन्दरा मार के मारे दंदरगे।

मार के मारे बेन्दरा सिहरगे रहय। ओहा हाथ जोड़ के सबले माफी मांगत किहिस-‘‘ एक बेर मोर जीव ला बचा देव ददा हो ! आज मैंहा अपने करनी के फल ला भोगत हवं। मैहा अपन मितान भेड़ा के मुँहू में हाँसी-ठट्ठा करत हवं कहिके  थूंक पारे रहेव। हाँसी-हाँसी ह मोर टोटा के फाँसी होगे। आज भगवान ह मोर मुँहू में थूक दिस। मोला मोर करनी के फल मिलगे। इही पाय के कहे जाथे, जइसे करनी तइसे फल, आज नहीं ते मिलही कल।


बोड़रा ( मगरलोड)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे

 विश्व महतारी भाँखा दिवस के अवसर मा...


महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे


                    छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ला बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय। यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय। ता काबर फोकट अपन पहिचान ले मुंह मोड़ना? भला छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए, जे भारतीय भाषा मा अर्धमागधी अपभ्रंश ले उपजे पूर्वी हिंदी के अंतर्गत आथे। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उतपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना? अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। आज हम सब कतको काल्पनिक अउ मनगढ़त फिल्मी बोली भाँखा के नकल करई ला शान समझथन फेर जउन भाँखा हमर अंचल के पहिचान आय ओखर ले भागथन, ये कहाँ तक सही हे?


                      कखरो भी मुख ले निकले कोनो शब्द तब तक भाँखा नइ कहिलाये जब तक कि वो कोनो ला समझ मा नइ आ जाय, नही ते मनखे के आलावा चिरई- चिरगुन, कुकुर- बिलई, कीट- पतंगा आदि जीव जिनावर मनके बोली घलो भाँखा कहिलातिस। कोनो भी भाँखा बोली कागज पाथर मा कतको लिखा जाये, यदि बोलइया समझया नइ रही ता, प्राचीन काल के कतको भाँखा- बोली अउ लिपि कस कोनो संग्राहालय मा माड़े रहि जाही या फेर बिरथा हो जही। मनखे अपन मन के भाव ला भाँखा मा उतारथे, जेला समझ के आन मनखे ओखर संग जुड़थे। भाँखा मनखे ला जीव जानवर ले अलगाथे,भाँखा बिन मनखे, मनखे मनले नइ मिल सके। भाँखा भाव, भजन, भ्रमण सबे बर जरूरी हे। मनखे भले सुख मा दाई, ददा ला नइ सोरियाही, फेर आफत मा ए ददा, ए दाई कहिबेच करथे। कहे के मतलब महतारी अन्तस् मा रचे बसे रहिथे, वइसनेच आय महतारी भाँखा । यदि कोई  छत्तीसगढिया छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू तू रे कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु-मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिबे ता समझके तीर मा आ जथे, छेरी घलो हर्रो के बोली ला समझते।  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान देवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। भले देखावा मा मनखे महतारी अउ महतारी भाँखा ला बिसार देथन, फेर आचार, विचार अउ संस्कृति संस्कार के दाता उही आय। महतारी भाँखा के संग मनखे के दया-मया, संस्कृति अउ संस्कार जुड़े होथे। महतारी भाँखा ले दुरिहाना मतलब अपन संस्कृति अउ संस्कार ला तजना हे। आज अपन भाँखा बोली के बढ़वार बर खुदे ला महिनत करे के जरूरत हे। कोनो भी चीज ला बनावत बड़ बेर लगथे, फेर उझारत छिन भर। अइसन मा चलत कोनो भाँखा बन्द हो जाय, दुर्भाग्य के बात हे। जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, वइसने भाँखा घलो सरल कोती भागथे। अपन जुन्ना बोली बचन अउ माटी के सुवाद मा नवा जमाना के शब्दकोश ला शामिल करत, कठिन ले सरल के रथ मा सवार होके, उदार भाव ले सबला स्वीकारत, आज कोनो भी भाँखा बोली के अस्तित्व ला बचाये के उदिम करना चाही,तभे नवा जमाना संग जुन्ना बोली भाँखा टिक पाही। छत्तीसगढ़ी सवांगा पहिर के फ़ोटो खींचाय ले कुछु नइ होह, अन्तस् मा निर्मल भाव अउ समर्पण जरूरी हे, नही ते देखावा रूपी सुरसा के मुँह मा कतको चीज समागे। 


                    ये दुनिया बड़ अजब गजब हे। आज नवा जमाना मा मनखे सबे देश राज संग जुड़ के चलत हे। गाँव, शहर ले, शहर, महानगर अउ देश-विदेश ले जुड़े हे। सियान मन हाना मारत कहिथे कि, कोश कोश मा पानी बदले अउ  चार कोश मा बानी।  माने दुनिया मा बड़ अकन भाँखा  हे, जेखर पार पाना मुश्किल हे। आज मनखे सबे संग कदम ले कदम मिलाके चलत हे, अइसन मा एक सम्पर्क भाँखा जरूरत बन जाथे। मनखे ला महतारी भाँखा के संगे संग अपन देश अउ विश्व भर मा प्रचलित मुख्य भाँखा ला बोलना अउ समझना चाही। पहली संचार अउ सोसल मीडिया के अतिक व्यापकता नइ रिहिस, ना सबे मनखे के विश्वभर मा जाना आना, ते पाय के वो समय मनखे मन एक या दुये भाँखा जाने, पर आज अपन अस्तित्व बर महतारी भाँखा के संगे संग सम्पर्क भाँखा ला जानना जरूरी हे। भारत मा आज हिंदी सबे कोती बोले समझे जावत हे। संगे संग व्यापारिक भाषा के रूप मा अंग्रेजी जम्मो देश मा पाँव पसारत हे। मनखे मन ला अपन महतारी भाँखा के संग हिंदी, अउ अंग्रेजी के ज्ञान घलो होना चाही। आज के लइका मानसिक रूप ले ये सब बर तियार हे, कोनो लइका मन  ऊपर  एक ले अधिक भाषा ला बोले सीखे बर कहना, थोपना नही, बल्कि आज के जरूरत के रूप मा, बहुभाषी बनना कहे जाथे। एक भाषा ला धरके चलना आज सम्भव नइ हे, काबर कि मनखे जुड़ चुके हे, सरी दुनिया संग। आज भाषा जमाना के  नवा रूप के संग, सोसल मीडिया मा घलो जघा बनावत जावत हे। सब ला अपन महतारी भाँखा ला नवा दशा दिशा देना चाही, ओखर प्रसिद्धि अउ बढ़वार बर सोचना चाही। अनुवादिक एप, गूगल, टाइपिंग जैसे आज के जरूरी एप मा महतारी भाँखा छत्तीसगढ़ी दिखे, एखर बर आज के बुधियार लइका सियान मन ला बूता करना चाही, ताकि भाषा संस्कृति- संस्कार,साहित्य-समाज संग सोसल मीडिया मा घलो जिंदा रहे अउ सबला सहज समझ आये, तभे भाँखा के उमर बाढ़ही। 


अपन भाँखा के मान करव ,

दूसर भाँखा के सम्मान करव।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


विश्व महतारी भाँखा दिवस के आप सबो ला सादर बधाई,

विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी

 “विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी


घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध - तइहा के जमाना के हाना आय। अब हमन नँगत हुसियार हो गे हन, गाँव ला छोड़ के शहर आएन, शहर ला छोड़ के महानगर अउ महानगर ला छोड़ के बिदेस मा जा के ठियाँ खोजत हन। जउन मन बिदेस नइ जा सकिन तउन मन विदेसी संस्कृति ला अपनाए बर मरे जात हें। बिदेसी चैनल, बिदेसी अत्तर, बिदेसी पहिनावा, बिदेसी जिनिस अउ बिदेसी तिहार, बिदेसी दिवस वगैरा वगैरा। जउन मन न बिदेस जा पाइन, न बिदेसी झाँसा मा आइन तउन मन ला देहाती के दर्जा मिलगे।


हमन दू ठन दिवस ला जानत रहेन - स्वतंत्रता दिवस अउ गणतन्त्र दिवस। आज वेलेंटाइन दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, राजभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस अउ न जाने का का दिवस के नाम सुने मा आवत हे। ये सोच के हमू मन झपावत हन कि कोनो हम ला देहाती झन समझे। काबर मनावत हन ? कोन जानी, फेर सबो मनावत हें त हमू मनावत हन। बैनर बना के, फोटू खिंचा के फेसबुक अउ वाट्सएप मा डारबो तभे तो सभ्य, पढ़े लिखे अउ प्रगतिशील माने जाबो।


एक पढ़े लिखे संगवारी ला पूछ पारेंव कि विश्व मातृ दिवस का होथे ? एला दुनिया भर मा काबर मनाथें? वो हर कहिस - मोला पूछे त पूछे अउ कोनो मेर झन पूछ्बे, तोला देहाती कहीं। आज हमन ला जागरूक होना हे। जम्मो नवा नवा बात के जानकारी रखना हे। जमाना के संग चलना हे। लम्बा चौड़ा भाषण झाड़ दिस फेर ये नइ बताइस कि विश्व मातृ दिवस काबर मनाथे। फेर सोचेंव कि महूँ अपन नाम पढ़े लिखे मा दर्ज करा लेथंव।

फेसबुक अउ वाट्सएप मा कुछु काहीं लिख के डार देथंव। 


भाषा ला जिंदा रखे बर बोलने वाला चाही। खाली किताब अउ ग्रंथ मा छपे ले भाषा जिंदा नइ रहि सके। पथरा मा लिखे कतको लेख मन पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा हें फेर वो भाषा नँदा गेहे। पाली, प्राकृत अउ संस्कृत के कतको ग्रंथ मिल जाहीं फेर यहू भाषा मन आज नँदा गे हें  । माने किताब मा छपे ले भाषा जिन्दा नइ रहि सके, वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही।


भाषा नँदाए के बहुत अकन कारण हो सकथे। नवा पीढ़ी के मनखे अपन पुरखा के भाषा ला छोड़ के दूसर भाषा ला अपनाही तो भाषा नँदा सकथे। रोजी रोटी के चक्कर मा अपन गाँव छोड़ के दूसर प्रदेश जाए ले घलो भाषा के बोलइया मन कम होवत जाथें अउ भाषा नँदा सकथे। बिदेसी आक्रमण के कारण जब बिदेसी के राज होथे तभो भाषा नँदा सकथे। कारण कुछु हो, जब मनखे अपन भाषा के प्रयोग करना छोड़ देथे, भाषा नँदा जाथे। 


छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर घलो खतरा मंडरावत हे। समय रहत ले अगर नइ चेतबो त छत्तीसगढ़ी भाषा घलो नँदा सकथे। छत्तीसगढ़ी भाषा के बोलने वाला मन छत्तीसगढ़ मा हें, खास कर के गाँव वाले मन एला जिंदा रखिन हें। शहर मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के बोलबाला हे। शहर मा लोगन छत्तीसगढ़ी बोले बर झिझकथें कि कोनो कहूँ देहाती झन बोल दे। छत्तीसगढ़ी के संग देहाती के ठप्पा काबर लगे हे ? कोन ह लगाइस ? आने भाषा बोलइया मन तो छत्तीसगढ़ी भाषा ला नइ समझें, ओमन का ठप्पा लगाहीं ? कहूँ न कहूँ ये ठप्पा लगाए बर हमीं मन जिम्मेदार हवन। 


हम अपन महतारी भाषा गोठियाए मा गरब नइ करन। हमर छाती नइ फूलय। अपन भीतर हीनता ला पाल डारे हन। जब भाषा के अस्मिता के बात आथे तब तुरंत दूसर ला दोष दे देथन। सरकार के जवाबदारी बता के बुचक जाथन। सरकार ह काय करही ? ज्यादा से ज्यादा स्कूल के पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी लागू कर दिही। छत्तीसगढ़ी लइका मन के किताब मा आ जाही। मानकीकरण करा दिही। का अतके उदिम ले छत्तीसगढ़ी अमर हो जाही?


मँय पहिलिच बता चुके हँव कि किताब मा छपे ले कोनो भाषा जिंदा नइ रहि सके, भाषा ला जिन्दा रखे बर वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही। किताब के भाषा, ज्ञान बढ़ा सकथे, जानकारी दे सकथे, आनंद दे सकथे फेर भाषा ला जिन्दा नइ रख सके। मनखे मरे के बादे मुर्दा नइ होवय, जीयत जागत मा घलो मुर्दा बन जाथे। जेकर छाती मा अपन देश बर गौरव नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन गाँव के गरब नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन समाज बर सम्मान नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन भाषा बर मया नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर स्वाभिमान मर गेहे, तउन मनखे मुर्दा आय। 

जउन मन अपन छत्तीसगढ़िया होए के गरब करथें, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाए मा हीनता महसूस नइ करें तउने मन एला जिन्दा रख पाहीं। 


अइसनो बात नइये कि सरकार के कोनो जवाबदारी नइये। सरकार ला चाही कि छत्तीसगढ़ी ला अपन कामकाज के भाषा बनाए। स्कूली पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी भाषा ला अनिवार्य करे। अइसन करे ले छत्तीसगढ़ी बर एक वातावरण तैयार होही। शहर मा घलो हीनता के भाव खतम होही। छत्तीसगढ़ी ला रोजगार मूलक बनावय। रोजगार बर पलायन, भाषा के नँदाए के एक बहुत बड़े कारण आय। इहाँ के प्रतिभा ला इहें रोजगार मिल जाही तो वो दूसर देश या प्रदेश काबर जाही? छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार, लोक कलाकार ला उचित सम्मान देवय, उनकर आर्थिक विकास बर सार्थक योजना बनावय।


छत्तीसगढ़ी भाव-सम्प्रेषण बर बहुत सम्पन्न भाषा आय। हमन ला एला सँवारना चाही। अनगढ़ता, अस्मिता के पहचान नइ होवय। भाषा के रूप अलग-अलग होथे। बोलचाल के भाषा के रूप अलग होथे, सरकारी कामकाज के भाषा के रूप अलग होथे अउ साहित्य के भाषा के रूप अलग होथे। बोलचाल बर अउ साहित्यिक सिरजन बर मानकीकरण के जरूरत नइ पड़य, इहाँ भाषा स्वतंत्र रहिथे फेर सरकारी कामकाज बर भाषा के मानकीकरण अनिवार्य होथे। मानकीकरण के काम बर घलो ज्यादा विद्वता के जरूरत नइये, भाषा के जमीनी कार्यकर्ता, साहित्यकार मन घलो मानकीकरण करे बर सक्षम हें।


सरकार छत्तीसगढ़ी बर जो कुछ भी करही वो एक सहयोग रही लेकिन छत्तीसगढ़ी ला समृद्ध करे के अउ जिन्दा रखे के जवाबदारी असली मा छत्तीसगढ़िया मन के रही। यहू ला झन भुलावव कि जब भाषा मरथे तब भाषा के संगेसंग संस्कृति घलो मर जाथे।


“स्वाभिमान जगावव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियावव”


लेखक - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


चित्र मा मोर कल्पना ला साकार रूप देवइया छन्द के छ परिवार के छन्द साधक ईश्वर साहू "बन्धी"


🙏    🙏    🙏    🙏    🙏

दूधवाला के गोठ//*

 *//दूधवाला के गोठ//*

                  एकझन दूधवाला अपन साइकिल म रोज गांव ले शहर दूध लेके बेचे जावय।एक बार ओकर संग मोर भेंट होय रहिस।ओहा बतावत रहिस कि रोजेच सही एक दिन एकठन घर म दूध देवत रहेंव त ओतकेच बेर घर मालकिन कहिस कि ' आज पावडर वाला दूध देवथ हस का '...?तुरतेच मोर सुरता आ गिस कि दूध म पानी मिलाय बर भूलागे रहेंव। मोर मति मारे गे रहिस।रोज के पानी मिलावट वाला दूध देवत रहेंव अऊ ओ दिन बिना पानी मिलाय आरुग दूध दे पारेंव।

           आज के समे म जमाना उल्टा हे आरुग दूध देबे त पावडर वाला समझथें अऊ पानी मिलाके देबे त उही ल आरुग दूध समझथें काबर कि ओमन आरुग दूध देखे नि रहें।

नवा पीढ़ी बर प्रेरक व्यक्तित्व सुशील भोले*

 

*नवा पीढ़ी बर प्रेरक व्यक्तित्व सुशील भोले*


हमर अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुशील भोले जी ह अपन जीवन के कुछ समय नगरगाँव म तको बिताय रिहिस हे। मोर बड़ सौभाग्य रहिन कि भोले जी ल बड़ नजदीक से जाने अउ सुने बर मिलिन, काबर भोले जी के पैतृक गाँव ह मोरो गाँव ये। ओकर जीवन के आदर्श ह केवल कुर्मी समाज भर नहीं वरन पूरा जनमानस ल प्रभावित करे हे। साहित्य के प्रति ओकर अडिग आस्था ल देख के मँय नतमस्तक हो जथव।वइसे तो हमर गाँव ल साहित्यकार के गाँव तको कहि सकथव। डॉ. ध्रुवकुमार वर्मा, रंगू प्रसाद नामदेव जी ह माटी के मान बढ़ाइस।अउ अब श्री सुशील भोले जी ह कलम साधना ले माटी ल  महकावत रिहिन हे। नवा पीढ़ी मा संगीता वर्मा ह आगू आवत हे। मोर बर बड़ गौरव के बात हरे सुशील भोले जी के साथ अनेकों मंच मा काव्य पाठ सँघरा करे के मौका मिलिस हे। एक संवेदनशील, विचारवान अउ जागरूक साहित्यकार के साथ मंच साझा करइ गौरव के बात तो रहिबे करही। हिंदी होय या छत्तीसगढ़ी भाखा कोनो भी विधा मा ओकर कलम सरलग चलते रहय। श्रृंगार होय चाहे शोषण या श्रम होय, उँकर कलम ह लिखे मा नइ डरय। एक निर्भिक साहित्यकार भोले जी के श्रम गीत याद आथे-

*सुन सुन बोली कान पिरागे, आश्वासन के धार बोहागे।*

*घुड़ुर घाड़र लबरा बादर कस, अब तो तोरो दिन सिरागे।*

*हमला आँसू कस बूँद नहीं, अब महानदी कस धार चाही।*

*चिटिक खेत अउ भर्री नहीं, हम ला सफ्फो खार चाही।*

*हमर हाथ मा जबर कमइया, धरती सरी चतवार चाही।*

अइसन गीत के सिरजइया सुशील भोले जी के जन्म 02/07/1961 दू जुलाई उन्नीस सौ इकसठ मा भाटापारा मा होय रिहिस. उकर पिताजी ह उहें गुरुजी रिहिन फेर गाँव उकर मन के नगरगाँव ह आय । पिता स्व. रामचन्द्र वर्मा, माता- स्व. उर्मिला देवी वर्मा, माता पिता के बड़का संतान सुरेश वर्मा दूसरइया सुशील वर्मा मिथलेश वर्मा, कमलेश वर्मा चार भाई अउ दू झन बहिनी प्रभा अउ सरोज वर्मा

पिताजी स्व.राम चन्द्र वर्मा प्राथमिक शाला मा गुरुजी रहिन। उनके पिता जी द्वारा लिखित प्राथमिक हिंदी व्याकरण अउ रचना अनुपम प्रकाशन रायपुर  ले छप के  मध्य प्रदेश राज्य के समे कक्षा तीसरी चौथी पाँचवी के पाठ्य पुस्तक मा चलय। पिताजी के लेखन ले प्रेरणा लेके सुशील जी ह तको लेखन के क्षेत्र मा आइस। सुशील जी के परिवार मध्यम वर्गीय परिवार रिहिस हे।1994 ले 2008 के बीच मा आध्यात्मिक साधना काल मा 

अर्थोपार्जन के काम ले अलग रहे के कारन गरीबी के तको के सामना करे बर पड़े हे परिवार ल। उनकर पिता जी के नाँव नगरगाँव मा दू एकड़ के खेती एक कच्चा मकान अउ एक खलिहान रिहिस चारों भाई मन के बँटवारा होय ले खेती अउ सिकुड़गे।सुशील जी ल संजय नगर, रायपुर के मकान बस बँटवारा मा मिले रिहिस हे।

सुशील जी ह हायर सेकंडरी अउ आई टी आई करे के बाद रोजी रोटी बर प्रेस मा कम्पोजिटर के काम तको करिन, प्रेस मा काम करत आगू बढ़िस अउ दैनिक अग्रदूत साप्ताहिक पत्रिका म उँकर प्रतिभा ल देख के संपादकीय काम के जिम्मेदारी दिस। 1983-84 मा ओकर पहिली कविता के प्रकाशन होइस। प्रदेश के यशस्वी पत्रकार साहित्यकार प्रो. विनोद शंकर शुक्ल जी ह उँकर रचना मा संसोधन करके फेर छपवाइस तब ले सुशील जी के लेखनी ह सरपट दउँड़े बर लगगे। उही बीच मा दैनिक तरूण, दैनिक अमृत संदेश अउ दैनिक छत्तीसगढ़ मा सह संपादक के पद मा तको काम करिन।1988 से 2005 तक खुदे के व्यवसाय बर प्रिंटिंग प्रेस के संचालन अउ मासिक पत्रिका "मयारू माटी" के प्रकाशन संपादन अउ साथे मा आडियो कैसेट रिकार्डिंग स्टूडियो के संचालन तको करिन। 'मयारू माटी' ह छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली संपूर्ण मासिक पत्रिका आय।

सुशील जी के बिहाव श्रीमती बसंती देवी वर्मा से होइस जेकर से तीन बिटिया रत्न नेहा, वंदना, ममता के रूप मा मिलिस। तीनों बिटिया के शादी करके एक तरह से गंगा नहा डरे हे।

सुशील भोले जी के प्रकाशित कृतियाँ मा

*छितका कुरिया (काव्य संग्रह), दरस के साध (लंबी कविता), जिनगी के रंग (गीत अउ भजन* *संकलन), ढेंकी (कहानी संकलन), आखर अंजोर (छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति ल उजागर करत लेख मन के संकलन), भोले के गोले (व्यंग्य संग्रह), सब ओखरे संतान (चारगोड़िया मनके संकलन), सुरता के बादर (संस्मरण)*

कालम लेखन मा भोले जी ह तको अगुवा रिहिन-

तरकश अउ तीर दैनिक नव भास्कर 1990, आखर अंजोर दैनिक तरूण 2006-07, डहर चलती दैनिक अमृत संदेश 2009, गुड़ी के गोठ साप्ताहिक इतवारी अखबार 2010ले 2015, बेंदरा बिनास 1988-89, किस्सा कलयुगी हनुमान के 1988-89,

प्रदेश अउ राष्ट्रीय स्तर मा गंज अकन पत्र पत्रिकाओं मा कविता, कहिनी, समीक्षा, साक्षात्कार नियमित रूप ले प्रकाशन होत राहय।

लहर अउ फूलबगिया आडियो कैसेट मा उँनकर गीत लेखन अउ गायन के एक नवा अंदाज सुने देखे बर मिलथे। भजन गायन अउ गीत गावत तको कइ ठन सांस्कृतिक मंच मा भोले जी दिख जथे। गुजरात के राजधानी अहमदाबाद मा 8 अक्टूबर 2017 मा भारत सरकार के साहित्य अकादमी ह गुजराती अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य के आयोजन करे रिहिस जेन मा सुशील भोले जी ह तको कविता पाठ करे रिहिस हे उँकर साथ डा. केशरी लाल वर्मा, डॉ. परदेशी राम वर्मा, रामनाथ साहू अउ मीर अली मीर जी ह तको प्रतिभागी रिहिन हे।

सम्मान अउ पुरस्कार के बात करबो त भोले जी ल 2010 मा  छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ले आयोजित कार्यक्रम मा भाषा सम्मान ले सम्मानित करे जा चुके हावै। बहुत अकन सामाजिक संगठन साहित्यिक संगठन, सांस्कृतिक संगठन मा भोले जी सम्मानित होय हे।

सुशील भोले जी के रुझान ह बचपन ले अध्यात्म मा हावय तेकरे सेती अध्यात्म मा वोला कबीर दास बहुत पसंद हे।उँकर पसंदीदा लेखक राष्ट्रीय मा मुंशी प्रेमचंद, अंर्तराष्ट्रीय मा गोर्की अउ स्थानीय मा लोक जीवन अउ जन चेतना बगरइया जम्मो लेखक बहुते पसंद हे।

उकरे सेती वोहा छत्तीसगढ़ के मूल आदिधर्म अउ संस्कृति ल बिशेष रूप ले लिखथे, वाचन करथे, अउ प्रकाशन अउ जमीनी स्तर मा पुनस्र्थापित करे के काम करथे। इही कारन आय 1994 से 2008 तकरीब 14 साल तक साहित्य, संस्कृति, कला ला सिरजाय खातिर गृहस्थ जीवन ल अलग करके आध्यात्मिक साधना मा लीन होगे रिहिन। जब गाँव आइन त हमन देख के अकबका गेयेन हमन सोचन येहा साधु बनगे तइसे लागथे कहिके गोठियावन फेर पूछे के हिम्मत नइ जुटा पात रेहेन।

आज उँकर इच्छा रिहिस छत्तीसगढ़ के मूल आदि धर्म अउ संस्कृति के मापदंड मा ही इहाँ के सांस्कृतिक- इतिहास के पुर्नलेखन होवय. उँकर कहना हावय अभी तक जेन भी लिखे हे, लिखाय हे उत्तर भारत ले आय ग्रन्थ के हिसाब ले लिखे हवै। येकरे सेती अइसन कोनों ग्रन्थ ल छत्तीसगढ़ के धर्म संस्कृति इतिहास के मानक नइ मान सकन आज जरूरत हावै छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ धर्म, इतिहास ल इहाँ के अपन मूल संदर्भ मा लिखा जाय। इही कहना रिहिस हे भोले जी के।

वर्तमान मा भोले जी 24 अक्टूबर 2018 से लकवा ले ग्रसित रिहिस, तभो ले घर मा रहिके साहित्य साधना अनवरत करत रहय। नवा पीढ़ी बर सीखे के एक सबक आय अतका दुख तकलीफ मा अइसन जीवटता वाले व्यक्ति ल मँय बचपन से देखत सुनत आवत रेहेंव।

दुख के पहाड़ टूट अँधियारी रात भोले जी के जीवन मा आइस, हम सब के पूरा बिश्वास रिहिस निराशा के बादर छटही अउ भोले जी के जिनगी मा सूरज नवा बिहान लेके आही। अइसन कामना करत श्री सुशील भोले जी बर भगवान ले आशीष माँगे रेहेन।जिनगी के गाड़ी बने चलत तको रिहिस अउ रोज बड़े बिहनिया ले सोशल मीडिया म सक्रिय होके अपन रचना ल पोस्ट तको करय। आखिरी दम तक भोले जी छत्तीसगढ़ के माटी के महक अउ स्वाभिमान ल लोगन के बीच रखत गिस हे। फेर आज दिनाँक 26/02/2026 गुरुवार अचानक असामयिक निधन के खबर मन ला झकझोर के रख दिस।उँकर असामयिक काल के गाल म जाना पूरा छत्तीसगढ़ अउ हम सब के लिए अपूर्णीय क्षति हरे।माटी के लाल भोले जी ल श्रद्धांजलि स्वरूप श्रद्धा के फूल अर्पित करत हँव। भगवान वोला अपन श्री चरणों म स्थान दय।

वर्तमान मा भोले जी के परिवार के पता हे-41-191 डॉ बघेल गली संजय नगर टिकरापारा रायपुर छत्तीसगढ़

मोबाइल 98269-92811

आलेख

-विजेंद्र वर्मा

ग्रा. पो. नगरगाँव (धरसींवा)

जिला -रायपुर (छत्तीसगढ़)

मोबा. नं.9424106787

इंटरव्यूह* (छत्तीसगढ़ी लघु कथा) - डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 .            *इंटरव्यूह* (छत्तीसगढ़ी लघु कथा)


                            - डाॅ विनोद कुमार  वर्मा 


        ' बच्चा मँय काली भक्त हँव। काली माता तोर कल्याण करही।'

       ' धन्यवाद महराज! '

     ' बच्चा सौ रूपये दे दे। मँय  तोर बर देवी माता ले मन्नत माँग लेहूँ! '

     ' बाबा, मोर करा देहे बर पइसा नि हे। इन्टरव्यूह देहे बर स्टेशन ले पैदल ही जावत हँव! '

     ' दान नि देबे त माता तोला इंटरव्यूह मा फेल करा देही। माता के प्रकोप ले डर! '

        ' माते तो जगत कल्याणी हे। ओकर अइसना निम्नस्तरीय सोच नि  हो सके! '

       ' बेवकूफ, जा गंदी नाली मा गिर! मोर श्राप हे!!'

    अमितेश के हाथ-पैर काँपे ला धर लीस फेर कोनो तरा वोहा संभल गे अउ इंटरव्यूह देहे पहुँचिच् गे। 

       थोरकुन दिन बाद रिजल्ट घोषित होइस। अमितेश नायब तहसीलदार सलेक्ट हो गे रहिस!

पतझड़ के पीरा

 पतझड़ के पीरा 




         “तीन  बड़का रितु हांवय - बरसात ,जाड़ अउ गर्मी । तीनों रितु के अपन अपन  विशेषता हावय। मनखे के जिनगी मा रितु  के अबड़ेच  प्रभाव पड़थे।बरसात मा पानी गिरे ले खेती होथे जेखर ले मनखे ला जीये खाये बर अन्न मिलथे। जाड़ के दिन मा तरह तरह के साग भाजी निकलथे। गर्मी मा झांझ के मारे घर ले  निकले बर मुश्किल हो जाथे ,नदियाँ -तरिया सुखा घलौ जाथे ,भाप बनके उड़ाय पानी हा बादर बनके बरसथे।रितु के बदले ले मनखे के जिनगी घलौ बदलथे जेमा खान पान ,रहन सहन शामिल हावय। तीनों रितु  मा लेखक, कवि मन के लेखनी  अबड़ेच चलथे जेमा रितु मन के महत्तम मा गीत, कविता कहानी लिखे जाथे।इन तीनों रितु मन के सिवाय अउ रितु घलौ होथे जेमन बड़का तो नो हयँ फेर उखरो अबड़ेच महत्तम हावय । जाड़ अउ  गर्मी के बीच मा पतझड़ अउ बसंत आथे। पतझड़ मा पेड़ मन के पाना गिर जाथे ,तहाँ ले बसंत मा नवा पाना उल्होथे। बसंत रितु बर घलौ अबड़े गीत लिखे गिस फेर पतझड़ के पीरा ला जादा नइ लिखे गिस । पतझड़ के रितु अपन संग उदासी लेके आथे ये हा हर बछर फरवरी के महीना के आस पास रहिथे ।

          पतझर के पीरा ला उही मनखे समझ सकथे जेहा अपन कोनों मयारुक ला  खोय होही । पतझर हा जिनगी के सच्चाई ला दिखाथे ।बसंत मा उल्होय कोवर कोवर  लाल गुलाबी पाना जेहा नवजीवन के संदेश देथे तुरते के होय लइका कस कोमल मासूम अउ निर्दोष रहिथे।धीरे धीरे पाना हा ललहुँ गुलाबी ले हरियर होय लागथे बाढ़त लइका सरीक।पाना अभियोच कोवर रहिथे ।अब पाना अउ बाढ़ जाथे तहाँ ले लहलहाय लगथे उल्लास उमंग के संग मा जइसन जवानी हिलोर मारथे मनखे के नस नस मा एक  विशेष अवस्था मा ।झूमरत गावत पेड़ फूले फरे लागथे अइसने तो मनखे के जिनगी घलौ होथे। अब पाना अनुभवी सियनहा कस हो जाथे, कलेचुप पतझर आ जाथे हरियर पाना पींयर पड़े लगथे ,सुखाय लगथे अउ एक दिन अपन डारा, अपन पेड़ ला छोड़ गिर जाथे अउ माटी मा मिल जाथे ।मनखे घलौ एक दिन अपन महल अटारी लाव लस्कर ला छोड़ रेंग देथे।अमीर गरीब, राजा प्रजा, सबला एक दिन जाएच बर हे।अब कोनो आघू कोनों पाछू भले जाय। फेर जाय बर परबेच करही।ये माटी के काया ला माटी मा मिल जाना हे ।पाना के झरे के  वैज्ञानिक कारण घलौ हावय जाड़ के दिन मा दिन छोटे होय ले तापमान कम हो जाथे तेपाय के क्लोरोफिल बनना कम हो जाय के कारण पोषण के कमी हो जाथे अउ पाना मन सूखा के गिरे लगथे।पाना मन के गिरे ले पानी अउ ऊर्जा दूनों के बचत होथे।

             पाना के गिरे ले पेड़ हा उजाड़ उदास खड़े रहिथे ,बेटी के बिदा के बाद के बिहतिया घर हा सुन्ना साँय साँय लगथे तइसन।अपार पीरा रहिथे पेड़ के मन मा ,फेर ये पीरा ला कोनों नी समझ सके ,ना पेड़ हा कखरो से कही सके।मनखे के कई ठन पीरा घलौ तो अव्यक्त रही जाथे।मन के पीरा ला  मन मा भरके पेड़ हा बाट जोहथे बसंत के।बसंत के आय ले पेड़ के मन मंजूर झूमरे लगथे।पतझड़ के पीरा हा 

प्रसव पीरा सही नवजीवन लेके आथे।इही जिनगी के सार घलौ आय। जन्म मरण ये  भुइयाँ जेला मत्युलोक कहे गय हे तेकर अकाट्य सच्चाई आय।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

Saturday, 14 February 2026

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा हाथी अउ कोलिहा वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा

हाथी अउ कोलिहा

वीरेन्द्र सरल

       एक जंगल म एक ठन हाथी अउ एक ठन कोलिहा रहय। कोलिहा ह बहुत चतुरा अउ मतलबिहा रिहिस अउ हाथी बपरा ह निचट सिधवा। दुनो झन जंगल म अलग-अलग किंजरे अउ खाय-पिये। अलग -अलग ठउर म रहय। एक दिन दुनो झन के भेंट होगे। हाथी अउ कोलिहा ह एक-दुसर के रहे बसे के ठउर -ठिकाना पूछिन अउ मितान बधगे।

        एक दिन के बात आय। कोलिहा किहिस-‘‘मितान अब तो ये मेर के सबो फल-फलहरी मन सिरागे हावे। थोड़किन जंगल भीतरी जाय ले ही भोजन-पानी के बेवस्था हो पाही तइसे लागथे। ये मेर  जादा दिन ले रहिबो तब तो भूख-पियास म पराण छूट जही।‘‘

             हाथी ह कोलिहा संग दूरिहा जंगल म जाय बर राजी होगे।

   बिहान दिन दुनो मितान किंजरत-किंजरत घनघोर जंगल म पहुंचगे। कोेलिहा ह हाथी के पीठ म बइठे रहय अउ सब पेड़ मन के फल-फलहरी ला मनमाने झड़के। हाथी बपरा ह कहुं-कहुं मेर बड़े पेड़ मन के हरियर पत्ता ला खावत जाय। कोलिहा ला काय जियान पड़तिस, ओहा तो हाथी के पीठ म बइठे रहय फेर बिहिनया ले संझा तक रेंगत-रेंगत हाथी के जांगर थकगे। ओहा लस खागे फेर मितान के मया म कलेचुप रेंगत रिहिस।

     जब चार-तेन्दू खावत-खावत कोलिहा ला पियास लागिस तब ओहा हाथी ला किहिस-‘‘मितान! पेट तो भरगे फेर अब तो मोला गजब पियास लागत हे। टोंटा ह सुखावत हे। मोर बर कांहचो ले पानी खोज तभे जीव ह बांचही।‘‘

     अब हाथी ह चारो मुड़ा पानी खोजे लगिस फेर कोन्हो मेर पानी के बूंद नइ दिखिस।

 हाथी ला एक उपाय सूझिस, ओहा कोलिहा ला किहिस-‘‘तैहा मोर पीठ ला छोड़ के सूड़ म बइठ जा। मैहा सूड़ ला उप्पर कोती टांगहूं। तहन तैहा  दूरिहा-दूरिहा ला देखबे, हो सकथे कहूं मेर पानी दिख जाय? तोला दिखही तब महू ला बताबे। तहन उहां लेगहूं।

    कोलिहा ह अइसनेच करिस फेर कहूं मेर पानी के बूंद नइ दिखिस। अब कोलिहा ह पानी बिना छटपटाय लगिस।

      हाथी किहिस-‘‘ मितान! अब तो तोर जीव ह पियास म छूटी जही तइसे लागथे। तोर जीव बंचाय के अब एकेच उपाय हे। तैहा मोर पेट भीतरी खुसर जा अउ मोर पेट मे जउन पानी भरे हे ओला पीके निकल जबे। शर्त बस इही हे कि तैहा मोर पेट भीतरी के उप्पर डहर भर ला झन देखबे।

     कोलिहा हाथी के पेट भीतरी खुसरगे अउ सोसन भर पानी पिस। पियास बुझाइस तहन हाथी के कहे बात ह सुरता अइस। ओहा सोचे लगिस कि मितान ह काबर मोला उप्पर कोती ल देखे बर मना करे हे?  लालच म ओहा उप्पर डहर ल देख दिस। हाथी के पेट म ओखर  लाल-लाल करेजा ह लफ-लफ करत रिहिस।

      कोलिहा मसखया जीव तो आय। अड़बड़ दिन ले ओला मांस खाय बर घला नइ मिले रिहिस। हाथी के करेजा ला देख के ओखर जीव ह ललचागे। ओहा हाथी के करेजा ला खाय ला धरलिस। हाथी ह पेट पीरा म तड़फेे लगिस फेर कोलिहा ल थोड़को दया नइ लागिस।

   पेट पीरा म हाथी के जीव छूटगे। ओहा उहीच मेर मरगे। ओखर मुंहू ह बंद होगे। अब कोलिहा ह हाथी के पेट भीतरी फंसगे। निकले ते निकले कइसे? कोलिहा ह हाथी के पेट भीतरी धंधाके हड़बड़ावत रहय।

    ठउका उहीच बेरा म महादेव-पारवती मन ये धरती ल किंजरे बर आय रिहिन अउ उही रद्दा ले गुजरत रिहिन। ओमन मरे हाथी ला देख के ओखर तीर म आइन। हाथी के पेट भीतरी कोलिहा ह हड़बड़ावय तब हाथी के पेट ह हाले। महादेव-पारवती ला शंका होइस। ओमन सोचिन, ये मरे हाथी के पेट म कोन खुसरे हे?

      महादेव ह ललकार के किहिस-‘‘ये मरहा हाथी के पेट भीतरी कोन जीव खुसरे हस रे?‘‘

पेट भीतरी ले कोलिहा किहिस-‘‘ये हाथी के पेट भीतरी कोन खुसरे हे तउन ला पूछने वाल तैहा कोन होथस?‘‘

      महादेव किहिस-‘‘ अरे! मैं संसार के सबले बड़े देवता महादेव अवं। अब तै बता तैहा कोन हरस?‘‘

 पहिली तो येला सुनके कोलिहा ह डर्रागे फेर आधा डर, आधा बल करके किहिस- ‘‘मैहा महादेव के बड़े भाई सहादेव अवं। तैहा कोन्हो सिरतोन के महादेव होबे तब मनमाने पानी बरसा के देखा।‘‘

     महादेव ह गुसियागे अउ मनमाने पानी गिरा दिस। पानी म भींग के मरहा हाथी के देहें ह फुलगे अउ ओखर मुहूं ह उलगे। मउका पाके कोलिहा ह उले मुंहूं कोती ले निकल के पल्ला भगिस।

     ओला पकड़हूं  कहिके महादेव ओला गजब कुदाइस फेर अमराबेच नइ करिस।

      महादेव ला अब कोलिहा ला पकड़े के जिद होगे। ओहा सोचिस, रहा ले ले रे कोलिहा! तैहा मोर मारे पानी बुड़े नइ बांचस। मैहा तो तोला पकड़ के हाथी के करेजा ला खा के मारे के सजा तो देबेच करहूं। 

महादेव ह कोलिहा के निगरानी करे लगिस तब पता चलिस कि कोलिहा ह जंगल के देवता तरिया म रोज बिहिनिया पानी पिये बर आथे।

    एक दिन महादेव ह उही तरिया के पानी भीतरी लुका के बइठे रिहिस। कोलिहा ह जब पानी पिये बर आइस अउ अपन गोड़ ला तरिया भीतरी डार के पानी पिये लगिस तब महादेव ह ओखर गोड़ ल चिमचिम ले धर लिस अउ किहिस-‘‘ ले अब कइसे भागबे रे कोलिहा।‘‘

    पहली तो कोलिहा ह डर्राइस फेर चालाकी करत किहिस-‘‘या! महादेव ह मोर गोड़ के भोरहा म तरिया पार के पीपरी पेड़ के जड़ ला जमा के धरे हावे अउ मोर गोड़ ला धरे हवं कहिके खुश होवत हे।‘‘

     महादेव ह कोलिहा के बात ला सिरतेान पतिया के ओखर गोड़ ला छोड़ दिस अउ पीपरी पेड़ के जड़ ला जमा के धरलिस। गोड़ ह छूटिस तहन कोलिहा फेर उहां ले पल्ला भागिस। जब कोलिहा के चतुराई ह महादेव ला समझ म आइस तब ओहा फेर कोलिहा ला कुदाइस फेर ओला अमराबेच नइ करिस।

      महादेव सोचिस, ये कोलिहा ह तो बड़ चतुरा हे। मुही ला चुतिया बना के भाग जथे फेर येला पकड़ना जरूरी हे। अब तो मोर इज्जत के सवाल हे।

     एक दिन महादेव ह मनखे के भेष धरके उही रद्दा म मरे असन पड़े रिहिस जउन रद्दा म कोलिहा ह रोज किंजरे बर जावय। मरहा मनखे ला देख के कोलिहा ह जान डारिस कि ये तो महादेव आय अउ मोला पकड़े बर फेर चाल चले हे।

      कोलिहा ह महादेव के तीर म जाके चिचियावत किहिस- ‘‘ये दई! कोन बपरा ह रद्दा म मरगे हावे फेर मैहा येखर मास ला नइ खाववं। मोर ददा ह कहे हे कि जब तक मरहा मनखे ह जम्हाई नइ लिही तब तक ओखर मास ला खाय ले पाप पड़थे।‘‘

       येला सुनके महादेव सोचिस, मैहा कोन्हो नइ जम्हाहूं तब तो येहा मोर मास ला खाय बर मोर तीर म नइ आवय अउ येहा तीर म नइ आही तब येला कइसे पकड़हूं? अइसे सोच के महादेव ह जम्हा पारिस। 

      महादेव ल जम्हावत देख के कोलिहा ह दूरिहा म भागगे अउ किहिस- ‘‘महादेव! तैहा तो अतका घला नइ जानस कि मरहा मनखे ह कोन्हो जम्हाही? मोला पकड़े बर तैहा चाल चले हस तेला तो मैहा पहिली ले जान डारे रहेंव तिही पाय के मैहा चाल चले हव।‘‘ अतका कहिके कोलिहा ह फेर उहां ले पल्ला भागिस। महादेव फेर ठगा गे।

    एक दिन महादेव फेर ओ कालिहा ला पकड़े बर चाल चलिस। ओहा जंगल के डुमर पेड़ तीर जा के अड़बड़ अकन डुमर ला सकेल के ओखर ढेंरी बना लिस अउ उही डुमर ढेंरी के भीतरी म खुसर के कलेचुप बइठगे।

     जब कोलिहा ह डुमर खाय बर ओ मेर आइस तब ढेंरी ल देख सब समझगे। ओहा जान डारिस कि ये ढेंरी के भीतरी म महादेव ह लुका के बइठे हावे अउ मोला पकड़े के अगोरा करत हे। 

कोलिहा ह फेर चाल चलिस अउ दूरिहा ले किहिस-‘‘कोन बिचारा गरीब ह डुमर ल एक ठउर म सकेल के गे हावे। पर के मिहनत के जिनिस ला खा के काबर फोकट काखरो सरापा-बखाना सुनना। ये ढेंरी ले कोन्हो अपने- अपन ढुल के दू चार ठन डुमर मन अलगा जही तब उही ला खा के अपन मन ला मढ़ा ले बो भैया। हम तो पर के कमई ला कभु खाय नइ हन तब आज खा के काबर पाप के भागी बनबो, नइ खावन ददा।‘‘

     कोलिहा के गोठ ला सुनके डुमर ढेंरी के भीतरी म लुकाय महादेव ह अपन अंगरी म कोचक के दू चार ठन डुमर ला ढेंरी ले गिराहूं कहिके कोचक पारिस। सबो डुमर ह ढेंरी ले ढुलके बगरगे। कोलिहा ल महादेव ह दिखगे। कोलिहा फेर उहां ले जी-पराण दे के भागिस। महादेव ह ओला गजब कुदाइस फेर ओहा पकड़ म आबे नइ करिस।

     कोलिहा के मारे महादेव के जीव ह हलाकान होगे रहय। अब महादेव ह ओला पकड़े बर एक ठन अउ उदिम सोचिस। ओहा लासा के एक झन डोकरी के मूर्ति बना दिस अउ ओखर हाथ म बरा-सोंहारी, बरी-बिजौरी, चिला-चौसेला, फरा-मुठिया धरा दिस अउ ओ मूर्ति ला उही तरिया पार म बइठार दिस जउन म कोलिहा ह पानी पिये बर आवय।

     जब कोलिहा ह पानी पिये बर आइस अउ रंग-रंग के खाय-पिये के जिनिस धरके डोकरी ला तरिया पार म बइठे देखिस तब ओखर मन ललचागे।

 ओहा डोकरी के तीर मे जाके किहिस-‘‘आज काय तिहार आय ममा दाई! अड़बड़ अकन रोटी-पीठा ला धरके ये तरिया पार म चुप्पे लुका के मुसुर-मुसुर एके झन झड़कत हस। तोर बरा सोहारी ला महूं ला देना ममा दाई।‘‘

     अब लासा के बने डोकरी के मूर्ति ह काय गोठियातिस? कोलिहा तीन-चार बेर ले मांगिस फेर डोकरी ह हूं हां कहींच नइ करिस। कोलिहा ह भड़कगे अउ ओखर हाथ के रोटी ला झटक के भागहूं कहिके तीर म जाके रोटी ला झटके लगिस। कोलिहा ह डोकरी ला हाथ लगाइस तहन लासा म ओखर हाथ ह चटक गे।

      कोलिहा ह अपन हाथ ला छोड़ाय बर डोकरी ल एक लात मारिस तब ओखर पांव घला चटकगे। अइसने-अइसने कोलिहा के दुनो हाथ अउ पांव ह लासा के बने डोकरी म चटकगे। 

     ये सब ला दूरिहा म लुका के महादेव ह देखत रिहिस। ओहा कोलिहा के तीर म आके किहिस- ‘‘आज मोर फांदा म फंसे हस रे कोलिहा! अब देख तोला कइसे मजा चखाहूं? गजब दिन ले मोला हलाकान करे हस। अब तो तोर ले सबे बदला ल लेहूं।‘‘

     महादेव ह कोलिहा के घेंच ल कस के डोरी म बांध दिस अउ ओला तिरत-तिरत अपन घर लानिस। एक ठन कुरिया म बांध के ओला धांध दिस। अब महादेव रोज बिहिनया उठे अउ सबले पहिली ओ चतुरा कोलिहा ला दू-चार डंडा मारे।

      रोज महादेव के मार के मारे कोलिहा ह दंदरगे। मार के मारे ओखर देहें पांव ह फूलगे। ओहा उहां ले भागे के उदिम लगावय फेर कहीं उदिम नइ मिलत रिहिस।

      एक दिन संझाती के बात आय। महादेव-पारवती मन ह किंजरे बर गे रिहिन। उही बेरा एक ठन दूसरा कोलिहा ह कोनजनी कहां ले घुमत-फिरत चतुरा कोलिहा के कुरिया मेर पहुंचगे अउ खिड़की कोती ले झांक के देखिस। 

भीतरी म बंधाय अपन संगवारी ला देख के कहिस- ‘‘कस सगा! तैहा महादेव के घर म काय करत हस? तैहा तो मार छिहिल-छिहिल दिखत हस। बने मोटा घला गे हस।‘‘ 

   चतुरा कोलिहा ल अब उहां ले भागे के उपाय मिलगे। ओहा नवा कोलिहा ला किहिस-‘‘काय करबे सगा! इहां महादेव-पारवती ह मोला रोज बिहिनिया मनमाने मेवा-मिष्ठान खवाथे। रंग-रंग के खाय बर देथे। मोर खाय के मन नइ रहय तभो गजब जोजिया के खवाथे। मैहा तो इहां के मेवा-मिष्ठान ला खा-खा के मर जहूं तइसे लागथे। मेवा-मिष्ठान खवई में मोर जी ह असकट लाग गे हावे।‘‘

  चतुरा कोलिहा के बात ला सुनके नवा कोलिहा के जीव ललचागे। मुंहूं ले लार टपके लगिस। ओहा किहिस- ‘‘तोर किसमत गजब ऊँचा हे भैया! तैहा इहां खा-खा के मरत हस अउ मैहा लांधन-भूखन मरत हवं। मोरो मन मेव- मिष्ठान खाय के होथे फेर मैहा तो करमछड़हा हवं। ले जावत हवं भैया, राम-राम।‘‘

     चतुरा कोलिहा किहिस- ‘‘अरे यार! तैहा तो मोर सगा भाई अस। तोर पीरा मोर पीरा आय। एक काम कर। ये खिड़की डहर ले बुलक के  मोर तीर आ अउ मोर घेंच के बंधना ला खोल दे। ये बधना ला मैहा तोर घेेंच म बांध देथव। हम दुनो के मुंहरन-गढ़न तो एकेच हावे। महादेव-पारवती मन ह चिन्हे ला तो सके नहीं। ओमन तोला, मोला आय कहिके गजब मेवा-मिष्ठान खवाही। खावत-खावत जब तोर जीव ह असकटा जही तब मोला बता देबे। मैहा इहां आके फेर तोर जगा म बंधा जहूं।‘‘

      लालच के मारे नवा कोलिहा ह चतुरा कोलिहा के जाल म फँसगे। ओहा खिड़की डहर ले बुलक के चतुरा कोलिहा मेर आइस अउ ओखर घेंच के बंधना ला खोल दिस। चतुरा कोलिहा ह अपना बंधना म नवा कोलिहा के घेंच ल बांध के मुस्कावत उहां ले छू लंबा होगे। चतुरा कोलिहा ह जंगल म भागत -भागत सोंचत रहय, महादेव के मार ले लटपट बांचे हवं ददा। अब ओ ललचहा कोलिहा ला मरन दे साले ल, मोला काय करना हे।

        बिहान दिन महादेव ह धंधाय कोलिहा के कुरिया म आइस अउ नवा कोलिहा ला चतुरा कोलिहा समझ के  भदाभद डंडा म मारे लगिस। नवा कोलिहा ह मार म दंदरगे। 

ओहा हाथ जोड़ के किहिस-‘‘मोला मत मार ददा! मैहा तोर घर के मेवा-मिष्ठान ह अइसने होथे कहिके जाने रहितेंव तब इंहा कभु नइ झपाय रहितेंव। मैंहा पहिली वाला कोलिहा नोहवं ददा। ओ लबरा ह लबारी मार के इहां मोला फंसाके भागगे हावे।‘‘

     महादेव पूछिस -‘‘तब तैहा कोन हरस? अउ इहां चतुरा कोलिहा  के फांदा म कइसे फंसगेस? 

नवा कोलिहा ह रोवत-कलपत सब बात ला बने फोरिया के महादेव ला बतादिस।

     चतुरा कोलिहा के चतुराई ला सुनके महादेव घला दंग रहिगे। ओहा किहिस-‘‘ तैहा लालच करके इहां फंसे हस। तोला तो लालच के फल मिलबेच करही। मैहा तो तोला छोड़ देवत हवं फेर तोला अब सदा दिन रतिहा ये संसार के पहरा देना पड़ही। रात भर म चार बेर हुंआ-हुंआ करके मनखे मन ला सवचेत करे बर पड़ही। पहिली संझाती हुंआ-हुंआ करबे। तहन सोवा पड़ती करबे ओखर बाद अधरतिहा करबे अउ फेर मुंधरहा करबे। ये काम मंजूर हे तब बोल, नहीें ते अउ पड़ही डंडा म।‘‘

    नवा कोलिहा मुड़ी नवा के हव किहिस अउ रतिहा  म संसार के चार बेर पहरा दे बर तैयार होगे। महादेव ह ओला छोड़ दिस। नवा कोलिहा हफटत- गिरत जंगल डहर भागिस। कहे जाथे उही दिन ले रतिहा बेरा कोलिहा मन चार बेर हुंआ-हुंआ करके आज तक पहरा देवत हे अउ जब तक संसार रही तब तक पहरा देतेच रही। मोर कहानी पूरगे, दार भात चुरगे।

 वीरेन्द्र सरल

बोड़रा ( मगरलोड )

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

दुख के कारन कहाँ हे?* व्यंग्य -द्वारिका वैष्णव

 *दुख के कारन कहाँ हे?*

व्यंग्य -द्वारिका वैष्णव 

दुख के कारन ये आय कि महूँ एक संवेदनशील मनखे अँव, भले शकल ले नई दिखँव। सुभाव मोर नीचट पेनपेनहा, रोनहा लईका के तरा हे। दूसर के दुख देखंव निहीं कि मोर भीतर के संवेदनशीलता हर जड़काला मा घाम मा राखे नरियर तेल के तरा टघले उपर टघले धरथे।


फेर ये दरी मोर संवेदनशीलता हर थोरकुन आहत कस होगे। कइसे? इही कहिनी ला एमेर आपके आघू राखत हंव। मोर नजर मा दुखी दिखत ये प्रानी ले अइसे तो न मोर कोनो नता-रिसता हे न जान-चिन्हार। बस सांझ के मोर घूमे जाय के समय ये डहर मा आत दिख जाथे। मैं जात रथंव वो आत रथे। वो एक सूरदास आय। बने ऊंच पूर, स्वस्थ, अच्छा पेंट कमीज पहिरे, काला चश्मा लगाय, अपन संगी के कांधा मा हाथ रखे बजार जात दिख जाथे। वोकर नाव नई जानँव ए पाय के मैं वोकर नांव सूरदास ही रख देत हंव। अइसे हम अंधा मन ला सूरदास ही कथन, भले ऊंकर नाम रेवालाल हो या हरि परसाद। वो डहर भर ऊंचा अवाज मा गोठियात दिखथे अउ वोकर संगी हाँ-हूँ कहत रथे। बस ! वोकर मोर अतकेच भेंट होथे। तबले मैं जे घंव वोला देखथों, हर बार वोकर अंधवा होय के दुख मा बुड़ जाथों। का करबे, संवेदनशीलता के कमजोरी ले अइसे हो जाथे। कपड़ा लत्ता, गोठ-बात ले वो भीख मांगत होही अइसे भी नई लगे। जइसे कि हम हर सूरदास के बारे मा सोंच लेथन। देख नई सके अतकेच कारन का पर्याप्त नइये कि वोकर जिनगी मा का कमी हे? मैं सोच मा पर जाथों" कइसे वो अतेक पहाड़ जइसे जिनगी ला बिताही? ये संगवारी वोकर कै दिन काम आही? लरे-परे मा कोन एकर सेवा जतन करही? कोन खाय-पीये बर कहीं? अगर जनम ले अंधरा होही ता बने करके रसगुल्ला काला कथें अउ बरा कइसे होथे, जानबे नई करत होही? हमर कस ये जंगल, नदी, पहाड़, मेला, तिहार, बरबिहाव, नाचगाना, प्रेम अउ प्रेमरोग ला घलो नई जानत होही?"


मोर हिरदे हर दुख मा पलपला गे अउ अतका सोंच के आंखी के कोन्टा हर भींज गे।

"बचपन मा ये न कभू तलाब मा कूद-कूद के नहाय होहीं न कभू छू-छूअउल, रेसटीप खेले होही। भौंरा, बाँटी, अउ रूख मा चढ़ के आमा बोईर टोरे ला भी नई जाने होही। पंगत के पतरी मा कहाँ मेर लड्डू अउ बालूसाही हे अउ कहाँ मेर बरा-पुड़ी कोन बतात होही? काबर मनखे ला अतेक दुख देथस भगवान! कोन एकर संग बिहाव करही? काकर लईका ल ये कोरा मा खेलाही? अंधवा बना के एकर तो जिनगी के सबो मजा ही छीन लेहे।"

भगवान ले मोर शिकायत बाढ़ते जात है। संवेदनशील मनखे एकर ले जादा कर का सकत है?

"अइसे दीन-हीन जिनगी ले तो एकर मर जाना अच्छा।"

मैं सीधा समस्या के आसान अउ अंतिम निदान मा आ जाथों। एती सूरदास कब के बाजार जा चुके है।

हमर सही छोटे अउ गरीब आम आदमी बर सुखी जिनगी के इही मतलब आय, जेकर ले सूरदास वंचित हो गय है। हमर जीवन के किताब मा सुख के मतलब अपार धन दौलत, गाड़ी मोटर, बंगला, बड़े-बड़े पद, कुरसी, विदेस भ्रमन अउ सुरा सुन्दरी जइसे पन्ना बिलकुल नइये। हम तो अतकेच मा खुस हन।

एक दिन सूरदास फेर दिखीस। आज वोकर हाथ मा एक ठन बड़े झोला रहिस। वो अपन साथी ले कहत रहिस "सुन ना चंदू! आज बने ताजा पइन्हा मछरी मिलही न! त आधा किलो ले लेबो, नई तो फेर चिकन तो मिलबेच करही। बड़ दिन होगे यार! एको पव्वा मारे।"

सुनके मोर संवेदनशील हिरदे ला थोरकुन चोट पहुँचिस। मैं एला जतेक दुखी समझथंव ओतका दुखी ये नई दिखे। फेर मैं सोचेंव "अरे एहू तो इंसान आय, एहू ला तो हर वो चीज खाय-पीये के अधिकार हे जेन हमन ला हे। एमा गलत का हे? "मोर मन मा वोकर तरफ के कोनो वोकिल कस अवाज उठिस।

"सोंच तो? ओकर जगह अगर तैं होते त का होतिस?" बस मोला वोकर दुख ला भोगे के कारन मिलगे। अब मैं डहर भर अपन ला अंधवा समझत चले जात रहेंव। मोर मुंह ले - "जाने वालों जरा मुड़ के देखो इधर, एक इंसान हूँ।" "दोस्ती" पिक्चर के गीत निकले लगिस। मोला उम्मीद रहीस, एको ठन गाड़ी मोर तीर आके रूकही अउ वोमा ले कोनो कहीं - "कहाँ जाबे बबा! आ बइठ गाड़ी मा मैं छोड़ देहूँ।" फेर अइसे नई होईस बल्कि एक ठन बाईक वाला भरपूर ब्रेक मारत आघू मा आगे कहिस "मरबे का डोकरा ? अंधवा अस का? अभी तो बोजा गे रहे।"

मैं होस मा आ गेंव। एकर ले जादा मोर ले अंधवा होय के एक्टिंग नई हो सके। फेर मोर सोचे के संवेदनशील घोड़ा दउड़ते रहिस "अगर मैं सचमुच अंधवा हो गेंव त का करहूँ? महाकवि सूरदास कस न मोर मन मा भगवान के भक्ति जागे हे न मैं महाकवि जॉन मिल्टन कस 'पैराडाईज लॉस्ट' लिख सकंव?" अब मोला अपन अतेक संवेदनशील होके सोंचे ऊपर गुस्सा आत रहिस।" घूमे निकले हस त बने प्रसन्न मन घूम, दुनिया के तमाम लफड़ा अपना मुड़ ऊपर काबर बोंह लेथस?" मन के भीतर ले ए दरी कोनो अउ वोकिल फटकारिस ।

ए बीच कतको दिन बीतगे। डहर मा सूरदास नई दिखीस। अउ मैं कोनो दुख भी नई देखेंव। ए पाय के मोर मुंह ले "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" अउ "बदन पे सितारे लपेटे हुए" जइसे बहुत से सियान मन ला नई सूट करने वाला गीत निकलिस। मोर  

संवेदनशीलता भोथरा झन जाय ये सोंच के मैं सूरदास के बारे मा सोचेंव भी - "कहाँ गे होही? काबर नई दिखत हे? काहीं वोकर संगी छोड़ के भाग तो नई गे?" तभे संजोग ले सूरदास डहर मा आवत दिखगे। फेर ये का? आज वोकर संग ओकर संगी निहीं, एक जवान, बने पहिरे ओढ़े, आंखी मा काजर, मुँह मा लाली, माथा मा सेन्दूर लगाय नवा दुल्हन कस स्त्री रहिस। सूरदास ओकर बांही धरे हमेसा के तरह गोठियात आवत रहिस। तब का सूरदास के बिहाव होगे? पुराना आदत अनुसार अभी मोर धियान सूरदास उपर नई होके वोकर बाई तरफ रहिस। "अतेक जवान टूरी अउ ये सूरदास?" देख के कोन जनि काबर बने नई लगिस।


तभे मन के भीतर ले ओकर डहर के वोकिल फेर खड़ा होगे, कहिस "अरे तहूँ तो चाहत रहे एकर जिनगी मा कोनो होतिस जेन एकर धियान राखतिस। अब का तकलीफ हे? सूरदास ला भी वो सब खुशी पाय के अधिकार हे जेन समान्य आदमी ल है। भगवान सब के साथ न्याय करथे अउ दुख काकरो जीवन मा सदा के लिये नई रहे।"

वोकिल के बात तो ठीक हे फेर मोर उही भगवान ले अब अतकेच बिनती हे कि बिहाव करे हर सूरदास के दुख पाय के दूसर कारन झन हो जाय। बाकी मोला कोई तकलीफ नइये। मैं अपन संवेदनशीलता के उपयोग कहूँ अउ कर लेहूँ।


अब भी मोला सूरदास बाजार आवत अपन बाई संग दिख जाथे फेर अब अंतर अतके दिखथे कि अब सूरदास चुप, सुनत दिखथे अउ बाई बोलत, बहुत बोलत दिखथे। अब कोनो बताहू, दुख के कारन कहाँ हे?सूरदास मा, ओकर बाई मा, या फेर मोरे मा?

छत्तीसगढ़ी लोककथा कुकरी के लइका वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोककथा

कुकरी के लइका

वीरेन्द्र ‘सरल‘

हमर छत्तीससगढ़ म अनादि काल ले सवनाही बरोय के परम्परा चले आवत हे। सवनाही म कुकरी के अंडा नहीं ते चियां बरोय के नियम हावे। 

    एक समे के बात आय। सवनाही म कोन्हों गांव के सियान मन ला  कुकरी के अंडा य चिंया नइ मिलिन तब ओमन कुकरीच ला बरो दिन। कोनजनी भगवान के काय मरजी रिहिस कि ये बखत के कुकरी ह मरिस नहीं। कुकुर-माकर अउ कोलिहा ले अपन आप ल बचा डारिस  अउ गांव लें निर्जन जंगल कोती भागगे। कुकरी ह गाभिन घला रहय। 

        समय आइस तहन कुकरी ह चार ठन अंडा दिस अउ ओला सेंय लगिस। कुछेक दिन बीते ले चारो अंडा ल फोड़िस। चारो अंडा ले चार किसम के जीव निकलिस। एक अंडा ले बइला, दूसर ले बघनीन, तीसर ले राक्षसीन अउ चौथा ले मनखे। येमन ला देख के कुकरी बक खागे। फेर अपन कोख ले उपजाय जीव बर सब महतारी ल घातेच मया होथे। ओ कुकरी ह चारो झन ला अपन लइका समझ के उखर पालन-पोषण करे लगिस। अइसने-अइसने बहुत समय बीतगे। 

    कुकरी ह डोकरी होगे अउ लइका मन जवान। एक दिन कुकरी अपन चारो लइका मन ल समझवात किहिस-‘‘देखव बेटी-बेटा हो! अब मैंहा सियान हो गे हवं। तुम चारो झन मोरे कोख ले जन्में हव फेर चारो के रहनी-खानी अलग-अलग आय। बइला अव मनखे ह गांव-शहर के रहवइय्या जीव आय अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल के जीव आय। तुमन आपस म एक दूसर के बोली-भाखा ला घला समझ लेथव। एके संग खेलत-खावत, छोटे ले बड़े होय हव। अब तुमन अपन-अपन रहिनी-खानी के ठउर म चल देव, फेर जिनगी भर मया के डोरी म बंधाय रहे के किरिया खा लेव। एक-दूसर के सुख-दुख के बेरा म सहयोग घला करहू अउ बने मजा ले अपन जिनगी जीहूं। अतका समूझा के कुकरी ह मरगे।

       सबो भई-बहिनी मिलके कुकरी के क्रियाकरम ला करिन। सब झन अपन कुकरी दाई के गोठ ला अपन हिरदे के अछरा म गठिया के राख लिन। अब मनखे अउ बइला ह गांव डहर आगे अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल कोती चल दिस।

रेंगत-रेंगत बइला अउ मनखे ह जंगल ले बहुत दूरिहा कोन्हों गांव के तीर म पहुँचिस अउ थोकिन सुस्ताय बर एक पेड़ के छइहां म बइठगे। दूनो भाई आपस म गोठ बात करे लगिन। रद्दा म अवइय्या-जवइय्या मन बइला अउ मनखे ला बातचीत करत देख के अचरज म पड़ जाय। कोनहों ह पूछे तब मनखे ह बइला ल अपन सगे बड़े भैया आय कहिके बतावय।

    धीरे-धीरे ये बात ह ओ गांव के गौटिंया के कान म पहुँचिस। पेड़ के खाल्हें म गौटिंया के संगे-संग गांव भर के मनखे जुरियागे। कोन्हो ला ओ मनखे के बात उप्पर विश्वास नइ होवय तभो ले गौंटिया ह मनखे ला किहिस-‘‘अच्छा बात आय भाई! ये बइला ह तोर सगे भाई आय फेर तैंहा परदेशी मनखे न तो गांव में घर हे अउ न खार म खेत। तोर मन होही तब तैहा मोर घर नौकरी कर ले।

मनखे किहिस-‘‘मैंहा तो तोर बात ला मानहूँ फेर आपो मन ल मोर एक शर्त ला मानना पड़हीं। मोर बड़े भाई बइला ह जतका बेरा ले काम करे के मन होही वतकेच  बेर ले कमाही। उपरहा कमाही कहिके कोन्हों येला मारही-पीटही य डराही-धमकाही तब मैंहा तुरते नौकरी ला छोड़ दुहूं। येहा मोरे संग रही अउ येखरो खाय-पिये के चारा-पानी ला आप मन ला दे बर पड़ही।"

         गौटिया ह तैयार होगे। मनखे घला उखर घर नौेकर लगे बर तैयार होगे। अब ओमन गौटिया के घर चल दिन। पहिली दिन रहय, गौंटिया ह उखर मन केे बने आव-भगत करिस। बिहान दिन ले बइला अउ मनखे केे काम शुरू होगे। ओमन बहुत मिहनत करिन। उखरे मिहनत के परसादे गौंटिया के धन ह दिन दूनी रात चौगुणी बाढ़े लगिस अउ गौंटिया ह अतराप भर ले जादा मंडल होगे।

       धन बाढ़िस तहन गौंटिया के गरब घला बाढ़गे। अब ओहा मनखे अउ बइला ला दुख-दंड दे बर लगिस। दुनो झन ले कस के काम तो लेवय फेर खाय-पिये के जीनिस दे बर कंजूसी करय। एक दिन दुनो भाई मन म विचार करिन अउ ओ गौंटिया घर के नौकरी ला छोड़ दिन।

      नौकरी छोड़ के ओमन रेंगत-रेंगत एक अइसे राज म पहुँचगे जिहां के राजकुूमारी ह परण करे रहय कि जउन मनखे ह माड़ी भर चिखला म रेंग के आही अउ एक कोसा पानी भर में अपन गोड़ के चिखला ला खलखल ले धो डारही तेखरे संग मैंहा बिहाव करहूँ। ये परण के सेती राजकुमारी के उमर बाढ़गे रिहिस। राजा गजब चिन्तित रहय।

   राजकुमारी के परण ला सुनके मनखे अपन भाई बइला ला पुछिस-‘‘भैया माड़ी भर सनाय चिखला ला एक कोसा पानी म कइसे धोय जा सेकथे?

 मन के  बात गड़रिया जाने सही बइला किहिस-‘‘राजकुमारी संग बिहाव करे के सउख हे तब सुन, माड़ी भर चिखला म रेंग के जा। कुछ समे सुस्ताय के समे मांग, पहिली ले एक ठन पत्ती बरोबर पातर लिकड़ी काड़ी ला राखे रह। चिखला सुखाही तहन सब ल रमंज के निकाल दे। अउ बांचे-खोंचे ला पातर लिकड़ी म रखोड़ दे तहन कोसा भर पानी ला तेल असन चुपड़ के धो डार। येमें कोन बड़े बात आय।"

         मनखे ह राजा के दरबार म जा के राजकुमारी के शर्त ला पूरा करे केे दावा कर दिस। बिहान दिन ओ मनखे के परीक्षा ले गिस। बइला के बताय अक्कल मुताबिक मनखे ह शर्त ला जीत डारिस अउ राजकुमारी संग ओखर बिहाव घला होगे। मनखे ह अपन सुआरी ला समझादिस, ये बइला नोहे मोर सगे बड़े भाई आय। जतका जेठ ला आदर सत्कार दे जाथे वतेकच आदर सत्कार येला देना हे। सुआरी घला अपन गोसान के बात ला गठिया के राख लिस। 

       अब राजकुमारी ह बइला ल अपन जेठ समझे अउ बइला ह राजकुमारी ल अपन भाई बहू। ओमन अब दु ले तीन होगे रिहिन। अउ ओ राज ले दूरिहा निकल के दूसर राज म एक गौटिया के घर नौेकर लगगे।

              गौटिया ह रोजी-पानी तो बने देवय फेर रिहिस नीयतखोर। ओखर नीयत ह राजकुमारी बर गड़गे। ओहा मने-मन सोचय, ये बइला चरवाहा संग अतेेक सुन्दर राजकुमारी ह नइ फबय। येला तो मोर अंगना के शोभा होना चाही, मोर सुआरी बनना चाही। मोर गौटनीन तो एखर एड़ी के धोवन के पुरतन घला नइहे। 

       ओहा राजकुमारी ला किसम-किसम के लालच दे के अपन सुवारी बनाय बर उदिम करय। फेर राजकुमारी ह पतिव्रता नारी रहय बपरी ह। ओखर लालच म आना तो छोड़ ओखर कोती ला हिरख के घला नइ देखय।

अब गौटिया ह ओला पाय बर छल के सहारा ले के विचार करिस अउ ओखर गोसान ला जान सहित मरवाय के उपाय सोचे लगिस। 

     ओहा अपन भेदिया संगवारी ला एकर उपाय पूछिस। भेदिया ह किहिस-‘‘ गौटिया ओहा तो आपके नौकर आय। ओला अइसन बुता तियारो जेमे मरेच के बुता रहय। बुता काम करत-करत कहूं मर जही तब कोन्हों आपके उपर शक घला नइ करय। मने सांप घला मर जही अउ लउठी घला नइ टूटे। " भेदिया ह गौटिया के कान म फुसुर-फुसुर उपाय बताय लगिस।

      बिहान दिन गौटिया ह अपन ओ नौकर ला बला के कहिस-‘‘ मोर गौंटनीन के आँखी आय हे। बैद्य ह कहे हे कि गौटनीन के आँखी म राक्षसीन के दूध ला लगाय बिना ओहा ठीक होबे नइ करय। जा रे भई! तैहा कइसनो करके राक्षसीन के दूध के बेवस्था कर तब बनही। मोर गौटनीन के आंखी के सवाल हे। कहूँ अंधरी-कानी झन हो जाय रे ददा।‘‘

     नौकर के मन निचट उदास होगे। ओहा घर आइस अउ बिना खाय-पिये कलेचुप सुतगे। 

      अपन भाई के दशा देख के बइला ला चिन्ता होगे। ओहा पूछिस-‘‘काय बात आय भाई। आज तैहा निचट मनटूटहा दिखत हस।‘‘ 

      नौकर ह सबो बात ला अपन बड़े भाई बइला ला बता दिस। तब बइला किहिस-‘‘ अरे निचट लेड़गा अस रे भाई। येमे कौन बड़े बात आय। भुलागेस ननपन के बात ला। आखिर हमर बहिनी राक्षसीन ह कब काम आही?"

      नौकर ह बिहान दिन जंगल चल दिस अउ घनघोर जंगल म पहुंच के अपन बहिनी ला गोहारे लगिस। जंगल म चिरई चांव करे न कौआ कांव। मनखे के गोहार सुन के कोन जनी कोन डहर ले राक्षस के दु झन पिला मन निकलगे अउ मनखे ला खाबो कहिके ओखरे डहर दौड़े लगिस। मनखे डर्रागे। ओहा तुरते हाथ जोड़ के पांव परत हवं भांचा, पांव परत हवं कहिके चिचिया लगिस। येला सुनके राक्षस के पिला मन सोचे लगिन येतो हमन ला भांचा कहत हे मतलब ये हमर ममा आय। लइका मन ओला मार के खाय के विचार ला छोड़ दिन अउ अपन घर म लेगके ओखर सुवागत-सत्कार करे लगिन।

      थोड़िकेच बेर म राक्षसीन घला पहुँचगे। मनखे तुरते ओखर पांव म घोलंड के पांव परत हवं दीदी कहिस अउ अपन कुकरी दाई के सुरता कराइस। राक्षसीन अपन भाई ला देख के गदगद होगे। दुनो भाई-बहिनी एक-दूसर के हालचाल जानिन। सुख-दुख के गोठ गोठियाइन। मनखे अपन इहां जंगल म आय के कारण ला बता दिस।

    बिहान दिन राक्षसीन ह किहिस-‘‘ भैया। गजब दिन होगे ननपन के बिछड़े बड़े भैया संग घला भेट नइ होय हे। तोर संग म महुं जाके बड़े भाई के दर्शन कर लेतेंव अउ उहींचे गौटिया के आघू म दूध निकाल के दे देतेंव।"

         मनखे कहिस-‘‘ये तो अड़बड़ खुशी के बात आय दीदी! चल न भांचा मन ला घला ले जथन।‘‘ 

     राक्षसीन ह अपन दुनो झन पिला मन ला लेके अपन मनखे भाई संग ओखर गांव डहर रेंगे लगिस। जब ओमन गांव तीर म पहुँचिन तब राक्षसीन अउ ओखर पिला मन ला देख के गांव वाले मन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। ये बात ला सुन के तो गोटिया-गौटिनीन अउ ओखर भेदिया के जीव सन्न होगे। ओमन अपन पराण बंचाय के उपाय सोचे लगिन। गौटियां ह डर के मारे गांव के सियान मन संग  गांव के सियार म पहुँचके मनखे अउ राक्षसीन के पांव म गिरगे अउ किहिस-‘‘अब मय कभू तोर भाई ला कोन्हों किसम के खतरा वाले काम नइ तियारंव। एक बेर मोला माफी दे देव बहिनी। तुम अपन बसेरा म लहुट जाव।‘‘ 

       राक्षसीन मने मन मुस्काइस अउ मनखे संग ओखर घर आके अपन बड़े भाई बइला संग भेट करिस। सुख-दुख के गोठ गोठियास अउ चार पहर रात ला बिताके अपन बसेरा कोती लहुटगे। राक्षसीन अउ ओखर पिला मन अपन घर डहर लहुटिन तभेच गौटिया अउ गांव वाले मन के जीव हाय लागिस।

      कुछेक दिन बीतिस तहन भेदिया ह गौटिया ला फेर मनखे ला मारे के उपाय बताइस। अब गौटिया ह अपन नौकर मनखेेेे ला किहिस-‘‘ ये पइत वैद्य ह बघनीन के दांत मंगाय हे।‘‘

    मनखे फेर संशो म पड़गे तब बइला ह समझाइस-" अरे भकला ! फेर तोर सुरता भुलागे। जंगल म तो हमर छोटे बहिनी बघनीन रहिथे। तैहा जा अउ अपन समस्या ला बता। बघनीन बहिनी घला राक्षसीन दीदी असन भांचा मन ला धरके गांव म आही तब ये गौटियां ला पता चलही। हमर परिवार कइसन हे?"

         मनखे ह फेर बिहान दिन घनघोर जंगल म जाके बघनीन दीदी, बघनीन दीदी कहिके गोहार पारे लगिस। बिहनिया के गोहारत जब संझा होगे तब एक गुफा के भीतरी ल बधनीन निकल के मनखे ला गुर्री-गुर्री देखे लगिस। मनखे तुरते बधनीन के पांव म गिरके पायलगी करिस अउ बचपन के गोठ ला गोठियाय लगिस। बघनीन ला घला अपन कुकरी दाई के कहे गोठ के सुरता आगे। ओहा मनखे ला अशिष दिस अउ घनघोर जंगल म आय के कारण पूछिस। 

        मनखे ह सब बात ला साफ-साफ बतादिस। बघनीन गुर्रावत किहिस-‘‘ अच्छा, तब तोर गौटिया ला मोर दाँत चाही। चल भैया मैहा अपन पिला मन संग तोर गांव जाहूँ अउ ओ रोगहा गौटियां के आघू म खडे होके कहूं चल कतना दांत चाही तोड़ ले।‘‘ 

      बघनीन अपन पिला मन संग मनखे के संगे-संग रेंगे लगिस। रात भर रेंगिन तब बिहनिया होवत मनखे के गांव पहुँचिन। गांव वाला मन बघनीन अउ ओखर पिला मन ला देखिन तब ठाड़ सुखागे। डर के मारे  घर के कपाट-बेड़ी ला लगाके सब अपन-अपन घर म खुसरगे। गौटिया अउ ओखर भेदिया ला पता चलिस तब तो ओमन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। मनखे जब बघनीन के संग गौटिया के घर के मोहाटी म पहुँचिस तब गौटियां ह घर के भीतरेच ले चिल्ला-चिल्ला के माफी मांगे लगिस अउ बघनीन ला जंगल म लहुटे के अर्जी-विनती करे लगिस।

   बघनीन अउ मनखे एक-दूसर ल देख के मुस्काइन अउ लहुटके मनखे के घर आगे। बड़े भइया बइला के पांव पल्लगी करिस। सुख दुख गोठियाइन अउ संझाती जंगल कोती लहुटगे।

     अब मनखे अउ गौटिया के दुश्मनी ह अउ जादा बाढ़गे। गौटिया ह पहिली ये पता लगवाइस कि मनखे ल अतेक अक्कल कोन बताथे। तब ओला पता चलिस कि ये सब अक्कल ल ओखर बड़े भाई बइला ह देथे। अब  गौटिया ह सोचे लगिस , जब तक बइला नइ मरही तब तक मनखे ला मारना सम्भव नइ हे। ओहा अब पहिली बइला ला मरवाय के उदिम सोचे लगिस। गौटिया अपन भेदिया ला बला के पूछिस, बइला ला मरवाय के कहीं उदिम सोच। 

     भेदिया किहिस-‘‘ ये मे कोन बड़े बात आय गौटिया। तोर जब्बर गोल्लर संग ओखर लड़ई के मुकाबला करवा देथन। तोर गोल्लर ह बइला ला मार के जीत जही। कोन्हों ला तोर चाल के पता तक नइ लगही । सब झन इही सोचही कि खेल म जीत-हार तो लगेच रहिथे। गौटिया ल भेदिया के बात पसंद आइस।

        ओहा बिहान दिन अपन नौकर मनखे के घर जाके किहिस-‘‘ सुने हव तोर भाई बइला ह गजब बलवान हे। काली पोरा के तिहार घला हे। तोर भाई संग मोर गोल्लर के लड़ई बजवा के देख लेथन । तोर भाई कहूँ जीत जही तब मैंहा तोला थारी भर सोन के मोहर इनाम म देहूँ।"

                मनखे ह गौटिया के चाल ल समझगे अउ किहिस-‘‘भाई ! येला मैं अक्केला कइसे बता सकथंव। पहिली बड़े भैया ल पूछ लेथंव। ओखर सहमति होही तभे ये मुकाबला हो सकथे।"

गौटिया  ह फेर एक थारी सोन के मोहर के लालच देके कहिस-‘‘ बने सोच-समझ ले । अपन भाई ला घला पूछ ले अइसन मउका घेरी-बेरी नइ आवय।" अतका कहिके गौटिया ह अपन नौकर के घर ले निकलगे।

       मनख अब निचट मनटूटहा होगे। बइला ह अपन भाई ल निच्चट मनटूटहा देखके पूछिस-‘‘ तब ओहा सबो बात ला ओला सफा-सफा बता दिस अउ गोहार पार के रोय लगिस।"

  बइला किहिस- "देख भाई! अब रोय ले काम नइ चलय। ये संसार म जउन भी जनम लेथे सब ला एक दिन मरना पड़थे। अब मोर ये संसार ले बिदा होय के पारी आगे तइसे लागथे। भगवान के इही मर्जी हे। तब तै काय कर सकथस अउ मै काय कर सकहूँ। फेर तैहा थोड़को संशो-फिकर झन कर। मरे के पाछू घला मोर आत्मा तोर मदद करत रही। कोन्हों तोर बाल-बांका नइ कर सकय।"     अब तैहा मोर बात ल बने चेत लगा के सुन-‘‘ लड़ई म जब मोर पराण छूट जही तब तैहा मोर दुनो आंखी, मोर पूंछ अउ आघू के दुनो गोड़ ल काट के रख् लेबे।"

       पोरा के दिन गौटिया के गोल्लर अउ मनखे के बइला के लड़ई के ढिढोरा सुन के अतराप भर के मनखे लड़ई के मैदान म सकलागे। बइला अउ गोल्लर ल मैदान म उतारे गिस। बइला ह चारों मुड़ा किंजर-किंजर के सब सकलाय मनखे मन ला देखिस, अपन भई मनखे ला नजर भर के देखिस अउ हरि नाम के समिरन करत गोल्लर संग भिड़गे। कभु गोल्लर पटकाय अउ कभु बइला। अइसने-अइसने उवत के लड़ई ह बुड़त ले चलगे। आखिरी म बइला ह अइसे पटकाइस कि उठबे नइ करिस। ओखर पराण छुटगे रहिस।

    लड़ई देख के सब मनखे अपन -अपन घर चल दिन। जीते के खुशी के मारे गौटिया ह अपन गोल्लर ला फूल -माला पहिरा के गांव भर किंजारिस अउ अपन घर आगे।

 ओती लड़ई के सुन्ना मैदान म मनखे ह अपन भाई बइला के लाश ला पोटार के गोहार पार के -पार के रोय लगिस। आज ओहा निच्चट अनाथ होगे रहिस। बइला के रहत ले ओला कभु अपन दाई-ददा के सुरता नइ आय रिहिस फेर आज ओहा अपन आप ला मुरहा समझे लगिस। 

      ओहा रोवत-रोवत घर आय बार लहुटे लगिस तभे ओला अपन भाई बइला के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा तुरते मरे बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ आघू के गोड़ ला काट के रख लिस अउ बइला के किरियाकरम करके आँसू ढारत घर आगे। घर पहुँचके मनखे ह बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ गोड़ ला अपन पूजा-कुरिया म रख दिस।

             अब मनखे ह रोज बिहिनया उठ के स्नान ध्यान करके पहिली ओखर पूजा करय तभे अपन काम-बुता ला शुरू करय। अइसने-अइसने गजब दिन बीतगे।

    अब येती गौटिया ह सोचे लगिस मोर रद्दा के जब्बर कांटा बइला तो मरगे। अब मनखे ला कोन अक्कल बताही। अब तो मैहा ओखर घरवाली ला अपन घरवाली बना के रहूँ। एक दिन गौटिया ह मौका देख के सोवा पड़ती सुनसनहा रतिहा अपन गुंडा-बदमाश मन ला हाथ हथियार धराके मनखे के घरवाली के अपहरण करे बर भेजिस।

          गुंडा बदमाश मन मनखे के हाथ-पांव ला बांध के ओखर सुवारी ला लेगे लगिन। ओ बेरा मनखे के सहायता करे बर कोनहो नइ रिहिन। मनखे ला अपन भाई के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा अपन भाई बइला ला सुमरत किहिस-‘‘ अब तो मोर घर के मान-मर्यादा के रक्षा बस तिही कर सकत हस भैया।"

    मनखे के बस अतका कहना रिहिस कि बइला के पूंछ ह डोर बनके गौटिया सहित ओखर सब गंडा बदमाश मन ल कसके बांध दिस अउ ओखर गोड़ ह ठेंगा बनके सब के धुनई शुरू कर दिस। मार के मारे सब झन हाय-हाय कहिके दंदरत रहय अउ बचाव-बचाव के गोहार पारत रहय अउ बइला के दुनो आंखी ह भांवा मांछी बनके सब ला खखोल-खखोल के चाबे लगिस। 

        गौटियां अउ ओखर गुंडा-बदमाश मन के आंखी- कान फूलगे। डर के मारे ओमन सबके सब पल्ला भागिन।

 कइसनो करके दुख के कारी रतिहा बीतगे। बिहिनया जब गांव वाले मन गोहार ला सुनिन तब सब मनखे के घर सकलाइन अउ जब ओमन ल गौटियां के करनी के पता चलिन तब सब खखार-खखार के ओखर मुहूं म थूके लगिन।

     गांव म कटाकट बइठका होइस अउ गांव भर के मनखे मन गौटिया ले मनमाने डाड़  - बोड़ी ले के ओखर बहिस्कार कर दिन। सब झन मनखे बर सोग मरत अपन गांव म रहे के अउ सुख -दुख म काम आय के वचन दिन फेर मनखे ह अब ओ गांव ला छोड़ना उचित समझके उहां ले अपन सुवारी सहित निकलगे। मोर कहानी पुरगे, दार भात चुरगे।

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा , मगरलोड

जुला-धमतरी , छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा भाँचा के चतुराई अउ ममा के करलाई वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा

भाँचा के चतुराई अउ ममा के करलाई

वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक गाँव म एक झन लेड़गा रहय। लेड़गा निचट गरीब रहय। लेड़गा जवान होगे रिहिस फेर कभु अपन ममा घर ला नइ देखे रिहिस। एक दिन लेड़गा अपन दाई ला किहिस-‘‘दाई! मोर संगी-जहुंरिया मन सब अपन ममा घर के गोठ गोठियाथे फेर मय ह आज ले अपन ममा घर ला नइ देखे हवं। सुने हवं ओमन अड़बड़ मंडल हे।‘‘ 

           दाई किहिस-‘‘हव बेटा, सिरतोन बात आय। फेर मंडल म गरीब मनखे ला कहाँ चिन्हथे? तैहा जिद करथस तब काली चल देबे।‘‘

              बिहान दिन लेड़गा अपन ममा गांव जाय बर निकलगे। बिहनिया के रेंगत-रेंगत लेड़गा ह संझाती अपन ममा गाँव पहुँचिस। 

     ममा-मामी मन लेड़गा के जादा स्वागत-सतकार नइ करिन। फेर गरीबी के सेती  लेड़गा ह गजब दिन ले उहींचे रतियागे। बहुत दिन बाद जब ओला अपन दाई के सुरता आइस तब ओहा उहां ले घर जाय के मन करिस अउ अपन मन के बात ला ममा-मामी मन ला बताइस।

           लोकलाज के डर म बडे ममा किहिस-‘‘जाय बर तो जाबे भांचा फेर दीदी ह तोर ममा घर ले काय लाने हस कही तब काला बताबे? मोर बात मानथस ते हमर घर ले एक ठन भंइसी ला ले जा।"

      लेड़गा ह बने गाभिन भइंसी मिलही कहिके खुश होगे। फेर ओखर ममा ह ओला एक ठन मरही-खुरही बुड़गी भंइसी ला धरा दिस।

लेड़गा भंइसी ला धर के घर लानत रहय फेर भंइसी ह तो रस्ताच म मरगे। लेड़गा ह ओला माटी दे के उही मेरन बइठगे अउ सोचे लगिस दाई ह पुछही तब काय बताहुँ। थोड़िक देर म एक झन मोची ह आके मरे भंइस के खाल ला उतारे लगिस। लेड़गा ह मोहो के मारे मरे भइंस के आधा खाल ल मोची ला जिद करके मांग डारिस अउ ओला धरके घर आगे।

                घर म ओला देख के ओखर दाई ह अड़बड़ गारी-बखाना दिस अउ रिस म कहि दिस जा येला बेच के  मिले पइसा म जहर -महुरा खा के मर जा। 

       लेड़गा ह दाई के बात ला सिरतोन समझगे अउ गली -गली  भंइस के खाल ले लेव कहिके गोहार पारे लगिस। अब कोन ह भंइस के खाल ल लिही। सब झन लेड़गा ला मार गारी देके भगा देवय।

   लेड़गा भारी मुसीबत म फंसगे अब जाय ते जाय कहां घर म जाहूँ तब दाई गारी दिही अउ बेचहुं कहिथव तब पारा-मोहल्ला के मनखे मन गारी देथे।

     थक हार के लेड़गा ह अपन गाँव ले बाहिर खेतखार डहर आगे। अउ बघुवा-चितवा के डर म रात बिताय बर तरिया पार के एक जब्बर पीपर पेड़ म चढ़गे।

      अधरतिहा होइस तहन कोन जनी कहाँ ले चार झन चोर मन चोरी के माल धरके उही पेड़ के खाल्हे म सकलाइन अउ अपन माल के बटवारा करे लगिन। उखर गोठ-बात ला सुन के लेड़गा डर्रागे अउ डर के मारे ओखर हाथ ले भंइसा के खाल ह छूटगे। 

         खाल ह जझरंग ले उही चोरहा मन उपर गिरगे। चोरहा मन पेड़ म कोन्हो भूत-प्रेत हे कहि के डर के मारे चोरी के माल ला उही मेर छोड़ के भाग गे।

      जब रतिहा पोहाइस। अगास म सुकवा उइस अउ बेरा पंगपगाय लगिस तब लेड़गा आधा-डर, आधा बल करके पेड़ ले खाल्हे उतरिस अउ भइस के खाल ला टार के देखिस तब ओ मेरन सोन के अड़बड अकन मोहर, सोना-चांदी , हीरा- मोती पड़े रहय। लेड़गा ह सब ला सकेल के मोटरा डारिस अउ मुड़ म बोही के मुंढरहा ले अपन घर आगे।

    लेड़गा के दाई ह पूछिस तब कहिस-‘‘ भंइस के खाल ह बड़ मंहगी म बेचाय हे ये सब ओखरे कीम्मत आय।"   बिहान दिन लेड़गा अपन दाई ला अपन ममा घर भेज के उहीं ले एक ठन काठा मंगवाइस अउ नाप के एक काठा सोन के मोहर अपन ममा घर भेज दिस।

    ममा मन काठा भर सोन के मोहर ला देख के पूछिन तब डोकरी किहिस-‘‘ तुमन जउन भंइस दे रहेव उही भइंस के मरे के बाद येहा ओखर खाल के कीम्मत आय।"   ममा मन सोचिन-‘‘अरे! बुड़गी भइंसी के खाल के अतेक कीम्मत हे तब हमर घर तो सौ ठन भंइस हे, सब ला मार के उंखर खाल ला बेचबे तब तो हमन मालामाल हो जबो।

      डोकरी ह अपन घर लहुटिस तहन सब ममा मन मिलके अपन घर के सबो भंइसी ला मार डारिन अउ उंखर खाल ल निकाल के अपन गाड़ा म जोर के भइंस के खाल ले लेव कहिके चिचियाये लगिन।

  जउन सुने तउने ओमन ला मारे अउ गारी देवत भगा देवय। ममा मन ला अतका मार परिन कि ओमन मार के मारे ददंरगे अउ आखिर म सबो खाल ल गांव के बाहिर फेक के अपन घर लहुटिन।

  उखर घरवाली मन घर के गाय-भंइस के बारे म पूछिन तब ओमन सबो किस्सा ला सफा-सफा बता दिन। घर के मनखे मन घला अड़बड़ गारी बखाना दिन फेर काय करय गलती तो करे रहय सब के मार गारी खा के कले चुप रहे रिहिन।

    ममा मन सबो भाई सोचे लगिन ये लेड़गा भांचा के चक्कर म हमन अपन गाय-भंइस ला मार डारेन। अब येखर बदला चुकाय बर लेड़गा के घर ला आगी लगा देथन। दुनो महतारी बेटा भुंजा के मर जही तहन उंखर सबो चीज बस हमर हो जही।

   ओमन बिहान दिन अधरतिहा लेड़गा के घर ला आगी लगाय बर तियारी के संग पहुँचगे अउ सुनसनहा देख के आगी लगा के भागगे।

   येती उही बेरा लेड़गा अउ ओखर दाई के नींद उमंचगे। ओमन गोहार पारिन तहन गांव वाले मन सकलाके सब कोई मिल-जुल के उंखर चीज बस ला बाहिर निकालिन। लेड़गा अउ दाई के जीव तो बांचगे फेर उंखर घर ह जर बर के राख होगे। लेड़गा के दाई ह आगी लगाइय्या मन ला सरापा-बखाना देवत मुड़ धरके रोय लगिस। 

      तब लेड़गा ह समझवात किहिस-‘‘झन रो दाई! घुरवा के दिन बहुरथे कहिथे। जउन मन आगी लगाय हे एक दिन उंखरो घर ह जर बर के राख होही अउ हमर करम म रही  तो हमर ये जरहा घर ह महल-अटारी बन जही।"

      बिहान दिन लेड़गा ह अपन जरे घर के सब राख ला सकेल के बोरा म भर लिस अउ गांव-गांव किंजर के जरे घर के राख ले लेव कहिके गोहार पारे लगिस। गोहार ला सुनके सब झन ओला जकहा-भूतहा समझे अउ  गारी-बखाना देवय।

    कोन्हों लेवाल नइ मिलिस तब फेकहूं कहिके लेड़गा ह बोरा के राख ला घुरवा डहर लेगत रहिस। तब उही रस्ता म पता नहीं कोन राज के राजा-रानी मन भेष बदल के किंजरे बर निकले रहय अउ उखर रथ के चक्का ह बिगड़गे रहय। राजा-रानी मन ओला बनावत-बनावत थकगे रहय।

  राजा-रानी मन लेड़गा ला देख के सहायता मांगत किहिन-‘‘भैया! तैहा तोर बइला गाड़ी म हमन ला हमर राज म पहुँचा दे। हमर पाछू आके अपन रथ ला बना के लेगत रहिबो।"

    लेड़गा किहस-‘‘ले गे बर तो लेग दुहूँ फेर मोर गाड़ा म जोराय बोरा मन म सोन-चांदी, हीरा-मोती भराय हे। मोर गाड़ा म बइठहु तब तुमन ला जम्हई नइ लेना हे। मोला मोर गुरू महराज ह कहे हे कि तोर गाड़ा म बइठके कोन्हों ह जम्हाही, तब बोरा म भराय सोन -चांदी मन सब राख हो जही।"

  राजा-रानी मन बोरा म काय भरय हे तउन ला देखबे नइ करिन। जल्दी घर पहुँचे के हड़बड़ी म लेड़गा के शर्त ला मान के गाड़ा म बइठ गे अउ लेड़गा ह राजा के बताय रस्ता म गाड़ा खेदे लगिस। 

     संझाती के गाड़ा चलत-चलत रात पोहागे। बेर उगे अउ मंझनिया घला होगे। रात भर के उसनिंधा म राजा-रानी ल जम्हाई आगे। 

      लेड़गा गाड़ा ले उतर के रिसागे अउ किहिस-‘‘मय ह समझाय रहेंव तभो ले तुमन मोर बात ला नइ मानेव अब मोरा बोरा म भराय सबो सोन-चांदी मन राख होगे। तुंहर मन के सेती मय ह कंगला होंगेव।"

   लेड़गा के बात ला सुन के राजा-रानी मन सकपकागे। राजा ह एक ठन बोरा के मुहड़ा ला खोल के देखिस। सिरतोन म ओ बोरा म राख रहय। 

        राजा ह लेड़गा के चाल ला समझ नइ पाइस अउ ओखर बात ला सिरतोन समझ के किहिस-‘‘ मैंहा ये राज  के राजा अवं। मोर राजधानी के राजमहल म चल मैं तोरा  सबो बोरा के राख के बदला सब बोरा म सोन के मोहर भर के दुहूं। तैहा विपत्ति के बेरा म मोर संग दे हे हस।‘‘

          लेड़गा मने - मन खुश होइस अउ बनें एक मन के आगर गाड़ा ला खेदे लगिस। 

        संझाती लेड़गा ह राज-रानी के संग म उखर राज महल म पहुँचगे। राज करमचारी मन लेड़गा के अड़बड़ स्वागत-सत्कार करिन। अउ बिहान दिन राजा ह लेड़गा के सबो बोरा के राख ला फेंकवा के ओमे सोन के मोहर भरवा के ओखर गाड़ा म जोरवादिस।

   लेड़गा भारी खुश होके अपन घर पहुँचिस। ओखर दाई ह पुछिस तब लेड़गा ह किहिस-‘‘ दाई! ये सबो ह हमर जरे घर के राख के कीम्मत आय। जा, ममा घर जाके सबो किस्सा ल बताबे अउ काठा मांग के लानबे।"

    डोकरी ह काठा मांग के ले आनिस। लेड़गा ह ओमे एक काठा सोन के मोहर भर के पहुँचाय बर किहिस। डोकरी ह एक काठा सोन के मोहर ला अपन मइके म छोड़ के आगे।

    येती लेड़गा के ममा मन सोचे लगिन। लेड़गा के नानकुन झोपड़ी ल हमन आगी लगाय रहेन अउ उही झोपड़ी के राख के कीम्मत ह दस बोरा सोन के मोहर मिलगे। तब हमर घर कुरिया ह तो बड़े जान बाड़ा आय, ये ला आगी फूंक के एखर राख ला बेचबो तब तो सौ बोरा ले जादा सोन के मोहर मिलही।

   ममा मन अपन मन के बात ला अपन घरवाली मन ला बताइन। सब झन ओमन लेड़गा के देखी - सीखा अइसन काम करे बर मना करिन फेर ओमन मानबे नइ करिन अउ अपने मन खुदे अपन घर ला आगी लगा दिन। घर ह जर-बर के राख होगे।

      बिहान दिन उहू मन सब राख ला सकेल के बोरा म भरिन अउ गाड़ा म जोर के गली-गली राख ले लेव राख कहिके गोहार पारे लगिन। बिहनिया के चिचियात-’चिचियात संझा होगे फेर उखर राख ल कोन्हो ले बर तियार नइ होइन। जिही सुने उही ओमन ला गारी-बखाना देवय अउ मारपीट के भगा देवय।

   जब कोन्हो लेवाल नइ मिलिस तब ओमन आखिर म थक - हार के  सब राख ला फोकट म कुम्हार घर दे के आगे अउ मुड़ धर के रोय लगिन फेर अब पछताये ले काय होही। इही ला कहिथे, देखी-सीखा लागे बाय, चुम-चांट के सबो जाय।

  देखथे-देखथ झोपड़ी म रहवइय्या लेड़गा ह मंडल होगे अउ महल म रहवइय्या ओखर ममा मन कंगला हो के झोपड़ी म रहे लगिस। इही ला कहिथे, रोगहा ला छोड़ के बनाय रोगही, तोर करम के भोग ला कोन भोगही। अउ पर बर खांचा खने अपने झपाय।

  मोर कहिनी पुरगे, दार भत

वीरेन्द्र सरल