Saturday, 14 February 2026

छत्तीसगढ़ी लोककथा कुकरी के लइका वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी लोककथा

कुकरी के लइका

वीरेन्द्र ‘सरल‘

हमर छत्तीससगढ़ म अनादि काल ले सवनाही बरोय के परम्परा चले आवत हे। सवनाही म कुकरी के अंडा नहीं ते चियां बरोय के नियम हावे। 

    एक समे के बात आय। सवनाही म कोन्हों गांव के सियान मन ला  कुकरी के अंडा य चिंया नइ मिलिन तब ओमन कुकरीच ला बरो दिन। कोनजनी भगवान के काय मरजी रिहिस कि ये बखत के कुकरी ह मरिस नहीं। कुकुर-माकर अउ कोलिहा ले अपन आप ल बचा डारिस  अउ गांव लें निर्जन जंगल कोती भागगे। कुकरी ह गाभिन घला रहय। 

        समय आइस तहन कुकरी ह चार ठन अंडा दिस अउ ओला सेंय लगिस। कुछेक दिन बीते ले चारो अंडा ल फोड़िस। चारो अंडा ले चार किसम के जीव निकलिस। एक अंडा ले बइला, दूसर ले बघनीन, तीसर ले राक्षसीन अउ चौथा ले मनखे। येमन ला देख के कुकरी बक खागे। फेर अपन कोख ले उपजाय जीव बर सब महतारी ल घातेच मया होथे। ओ कुकरी ह चारो झन ला अपन लइका समझ के उखर पालन-पोषण करे लगिस। अइसने-अइसने बहुत समय बीतगे। 

    कुकरी ह डोकरी होगे अउ लइका मन जवान। एक दिन कुकरी अपन चारो लइका मन ल समझवात किहिस-‘‘देखव बेटी-बेटा हो! अब मैंहा सियान हो गे हवं। तुम चारो झन मोरे कोख ले जन्में हव फेर चारो के रहनी-खानी अलग-अलग आय। बइला अव मनखे ह गांव-शहर के रहवइय्या जीव आय अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल के जीव आय। तुमन आपस म एक दूसर के बोली-भाखा ला घला समझ लेथव। एके संग खेलत-खावत, छोटे ले बड़े होय हव। अब तुमन अपन-अपन रहिनी-खानी के ठउर म चल देव, फेर जिनगी भर मया के डोरी म बंधाय रहे के किरिया खा लेव। एक-दूसर के सुख-दुख के बेरा म सहयोग घला करहू अउ बने मजा ले अपन जिनगी जीहूं। अतका समूझा के कुकरी ह मरगे।

       सबो भई-बहिनी मिलके कुकरी के क्रियाकरम ला करिन। सब झन अपन कुकरी दाई के गोठ ला अपन हिरदे के अछरा म गठिया के राख लिन। अब मनखे अउ बइला ह गांव डहर आगे अउ बघनीन अउ राक्षसीन ह जंगल कोती चल दिस।

रेंगत-रेंगत बइला अउ मनखे ह जंगल ले बहुत दूरिहा कोन्हों गांव के तीर म पहुँचिस अउ थोकिन सुस्ताय बर एक पेड़ के छइहां म बइठगे। दूनो भाई आपस म गोठ बात करे लगिन। रद्दा म अवइय्या-जवइय्या मन बइला अउ मनखे ला बातचीत करत देख के अचरज म पड़ जाय। कोनहों ह पूछे तब मनखे ह बइला ल अपन सगे बड़े भैया आय कहिके बतावय।

    धीरे-धीरे ये बात ह ओ गांव के गौटिंया के कान म पहुँचिस। पेड़ के खाल्हें म गौटिंया के संगे-संग गांव भर के मनखे जुरियागे। कोन्हो ला ओ मनखे के बात उप्पर विश्वास नइ होवय तभो ले गौंटिया ह मनखे ला किहिस-‘‘अच्छा बात आय भाई! ये बइला ह तोर सगे भाई आय फेर तैंहा परदेशी मनखे न तो गांव में घर हे अउ न खार म खेत। तोर मन होही तब तैहा मोर घर नौकरी कर ले।

मनखे किहिस-‘‘मैंहा तो तोर बात ला मानहूँ फेर आपो मन ल मोर एक शर्त ला मानना पड़हीं। मोर बड़े भाई बइला ह जतका बेरा ले काम करे के मन होही वतकेच  बेर ले कमाही। उपरहा कमाही कहिके कोन्हों येला मारही-पीटही य डराही-धमकाही तब मैंहा तुरते नौकरी ला छोड़ दुहूं। येहा मोरे संग रही अउ येखरो खाय-पिये के चारा-पानी ला आप मन ला दे बर पड़ही।"

         गौटिया ह तैयार होगे। मनखे घला उखर घर नौेकर लगे बर तैयार होगे। अब ओमन गौटिया के घर चल दिन। पहिली दिन रहय, गौंटिया ह उखर मन केे बने आव-भगत करिस। बिहान दिन ले बइला अउ मनखे केे काम शुरू होगे। ओमन बहुत मिहनत करिन। उखरे मिहनत के परसादे गौंटिया के धन ह दिन दूनी रात चौगुणी बाढ़े लगिस अउ गौंटिया ह अतराप भर ले जादा मंडल होगे।

       धन बाढ़िस तहन गौंटिया के गरब घला बाढ़गे। अब ओहा मनखे अउ बइला ला दुख-दंड दे बर लगिस। दुनो झन ले कस के काम तो लेवय फेर खाय-पिये के जीनिस दे बर कंजूसी करय। एक दिन दुनो भाई मन म विचार करिन अउ ओ गौंटिया घर के नौकरी ला छोड़ दिन।

      नौकरी छोड़ के ओमन रेंगत-रेंगत एक अइसे राज म पहुँचगे जिहां के राजकुूमारी ह परण करे रहय कि जउन मनखे ह माड़ी भर चिखला म रेंग के आही अउ एक कोसा पानी भर में अपन गोड़ के चिखला ला खलखल ले धो डारही तेखरे संग मैंहा बिहाव करहूँ। ये परण के सेती राजकुमारी के उमर बाढ़गे रिहिस। राजा गजब चिन्तित रहय।

   राजकुमारी के परण ला सुनके मनखे अपन भाई बइला ला पुछिस-‘‘भैया माड़ी भर सनाय चिखला ला एक कोसा पानी म कइसे धोय जा सेकथे?

 मन के  बात गड़रिया जाने सही बइला किहिस-‘‘राजकुमारी संग बिहाव करे के सउख हे तब सुन, माड़ी भर चिखला म रेंग के जा। कुछ समे सुस्ताय के समे मांग, पहिली ले एक ठन पत्ती बरोबर पातर लिकड़ी काड़ी ला राखे रह। चिखला सुखाही तहन सब ल रमंज के निकाल दे। अउ बांचे-खोंचे ला पातर लिकड़ी म रखोड़ दे तहन कोसा भर पानी ला तेल असन चुपड़ के धो डार। येमें कोन बड़े बात आय।"

         मनखे ह राजा के दरबार म जा के राजकुमारी के शर्त ला पूरा करे केे दावा कर दिस। बिहान दिन ओ मनखे के परीक्षा ले गिस। बइला के बताय अक्कल मुताबिक मनखे ह शर्त ला जीत डारिस अउ राजकुमारी संग ओखर बिहाव घला होगे। मनखे ह अपन सुआरी ला समझादिस, ये बइला नोहे मोर सगे बड़े भाई आय। जतका जेठ ला आदर सत्कार दे जाथे वतेकच आदर सत्कार येला देना हे। सुआरी घला अपन गोसान के बात ला गठिया के राख लिस। 

       अब राजकुमारी ह बइला ल अपन जेठ समझे अउ बइला ह राजकुमारी ल अपन भाई बहू। ओमन अब दु ले तीन होगे रिहिन। अउ ओ राज ले दूरिहा निकल के दूसर राज म एक गौटिया के घर नौेकर लगगे।

              गौटिया ह रोजी-पानी तो बने देवय फेर रिहिस नीयतखोर। ओखर नीयत ह राजकुमारी बर गड़गे। ओहा मने-मन सोचय, ये बइला चरवाहा संग अतेेक सुन्दर राजकुमारी ह नइ फबय। येला तो मोर अंगना के शोभा होना चाही, मोर सुआरी बनना चाही। मोर गौटनीन तो एखर एड़ी के धोवन के पुरतन घला नइहे। 

       ओहा राजकुमारी ला किसम-किसम के लालच दे के अपन सुवारी बनाय बर उदिम करय। फेर राजकुमारी ह पतिव्रता नारी रहय बपरी ह। ओखर लालच म आना तो छोड़ ओखर कोती ला हिरख के घला नइ देखय।

अब गौटिया ह ओला पाय बर छल के सहारा ले के विचार करिस अउ ओखर गोसान ला जान सहित मरवाय के उपाय सोचे लगिस। 

     ओहा अपन भेदिया संगवारी ला एकर उपाय पूछिस। भेदिया ह किहिस-‘‘ गौटिया ओहा तो आपके नौकर आय। ओला अइसन बुता तियारो जेमे मरेच के बुता रहय। बुता काम करत-करत कहूं मर जही तब कोन्हों आपके उपर शक घला नइ करय। मने सांप घला मर जही अउ लउठी घला नइ टूटे। " भेदिया ह गौटिया के कान म फुसुर-फुसुर उपाय बताय लगिस।

      बिहान दिन गौटिया ह अपन ओ नौकर ला बला के कहिस-‘‘ मोर गौंटनीन के आँखी आय हे। बैद्य ह कहे हे कि गौटनीन के आँखी म राक्षसीन के दूध ला लगाय बिना ओहा ठीक होबे नइ करय। जा रे भई! तैहा कइसनो करके राक्षसीन के दूध के बेवस्था कर तब बनही। मोर गौटनीन के आंखी के सवाल हे। कहूँ अंधरी-कानी झन हो जाय रे ददा।‘‘

     नौकर के मन निचट उदास होगे। ओहा घर आइस अउ बिना खाय-पिये कलेचुप सुतगे। 

      अपन भाई के दशा देख के बइला ला चिन्ता होगे। ओहा पूछिस-‘‘काय बात आय भाई। आज तैहा निचट मनटूटहा दिखत हस।‘‘ 

      नौकर ह सबो बात ला अपन बड़े भाई बइला ला बता दिस। तब बइला किहिस-‘‘ अरे निचट लेड़गा अस रे भाई। येमे कौन बड़े बात आय। भुलागेस ननपन के बात ला। आखिर हमर बहिनी राक्षसीन ह कब काम आही?"

      नौकर ह बिहान दिन जंगल चल दिस अउ घनघोर जंगल म पहुंच के अपन बहिनी ला गोहारे लगिस। जंगल म चिरई चांव करे न कौआ कांव। मनखे के गोहार सुन के कोन जनी कोन डहर ले राक्षस के दु झन पिला मन निकलगे अउ मनखे ला खाबो कहिके ओखरे डहर दौड़े लगिस। मनखे डर्रागे। ओहा तुरते हाथ जोड़ के पांव परत हवं भांचा, पांव परत हवं कहिके चिचिया लगिस। येला सुनके राक्षस के पिला मन सोचे लगिन येतो हमन ला भांचा कहत हे मतलब ये हमर ममा आय। लइका मन ओला मार के खाय के विचार ला छोड़ दिन अउ अपन घर म लेगके ओखर सुवागत-सत्कार करे लगिन।

      थोड़िकेच बेर म राक्षसीन घला पहुँचगे। मनखे तुरते ओखर पांव म घोलंड के पांव परत हवं दीदी कहिस अउ अपन कुकरी दाई के सुरता कराइस। राक्षसीन अपन भाई ला देख के गदगद होगे। दुनो भाई-बहिनी एक-दूसर के हालचाल जानिन। सुख-दुख के गोठ गोठियाइन। मनखे अपन इहां जंगल म आय के कारण ला बता दिस।

    बिहान दिन राक्षसीन ह किहिस-‘‘ भैया। गजब दिन होगे ननपन के बिछड़े बड़े भैया संग घला भेट नइ होय हे। तोर संग म महुं जाके बड़े भाई के दर्शन कर लेतेंव अउ उहींचे गौटिया के आघू म दूध निकाल के दे देतेंव।"

         मनखे कहिस-‘‘ये तो अड़बड़ खुशी के बात आय दीदी! चल न भांचा मन ला घला ले जथन।‘‘ 

     राक्षसीन ह अपन दुनो झन पिला मन ला लेके अपन मनखे भाई संग ओखर गांव डहर रेंगे लगिस। जब ओमन गांव तीर म पहुँचिन तब राक्षसीन अउ ओखर पिला मन ला देख के गांव वाले मन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। ये बात ला सुन के तो गोटिया-गौटिनीन अउ ओखर भेदिया के जीव सन्न होगे। ओमन अपन पराण बंचाय के उपाय सोचे लगिन। गौटियां ह डर के मारे गांव के सियान मन संग  गांव के सियार म पहुँचके मनखे अउ राक्षसीन के पांव म गिरगे अउ किहिस-‘‘अब मय कभू तोर भाई ला कोन्हों किसम के खतरा वाले काम नइ तियारंव। एक बेर मोला माफी दे देव बहिनी। तुम अपन बसेरा म लहुट जाव।‘‘ 

       राक्षसीन मने मन मुस्काइस अउ मनखे संग ओखर घर आके अपन बड़े भाई बइला संग भेट करिस। सुख-दुख के गोठ गोठियास अउ चार पहर रात ला बिताके अपन बसेरा कोती लहुटगे। राक्षसीन अउ ओखर पिला मन अपन घर डहर लहुटिन तभेच गौटिया अउ गांव वाले मन के जीव हाय लागिस।

      कुछेक दिन बीतिस तहन भेदिया ह गौटिया ला फेर मनखे ला मारे के उपाय बताइस। अब गौटिया ह अपन नौकर मनखेेेे ला किहिस-‘‘ ये पइत वैद्य ह बघनीन के दांत मंगाय हे।‘‘

    मनखे फेर संशो म पड़गे तब बइला ह समझाइस-" अरे भकला ! फेर तोर सुरता भुलागे। जंगल म तो हमर छोटे बहिनी बघनीन रहिथे। तैहा जा अउ अपन समस्या ला बता। बघनीन बहिनी घला राक्षसीन दीदी असन भांचा मन ला धरके गांव म आही तब ये गौटियां ला पता चलही। हमर परिवार कइसन हे?"

         मनखे ह फेर बिहान दिन घनघोर जंगल म जाके बघनीन दीदी, बघनीन दीदी कहिके गोहार पारे लगिस। बिहनिया के गोहारत जब संझा होगे तब एक गुफा के भीतरी ल बधनीन निकल के मनखे ला गुर्री-गुर्री देखे लगिस। मनखे तुरते बधनीन के पांव म गिरके पायलगी करिस अउ बचपन के गोठ ला गोठियाय लगिस। बघनीन ला घला अपन कुकरी दाई के कहे गोठ के सुरता आगे। ओहा मनखे ला अशिष दिस अउ घनघोर जंगल म आय के कारण पूछिस। 

        मनखे ह सब बात ला साफ-साफ बतादिस। बघनीन गुर्रावत किहिस-‘‘ अच्छा, तब तोर गौटिया ला मोर दाँत चाही। चल भैया मैहा अपन पिला मन संग तोर गांव जाहूँ अउ ओ रोगहा गौटियां के आघू म खडे होके कहूं चल कतना दांत चाही तोड़ ले।‘‘ 

      बघनीन अपन पिला मन संग मनखे के संगे-संग रेंगे लगिस। रात भर रेंगिन तब बिहनिया होवत मनखे के गांव पहुँचिन। गांव वाला मन बघनीन अउ ओखर पिला मन ला देखिन तब ठाड़ सुखागे। डर के मारे  घर के कपाट-बेड़ी ला लगाके सब अपन-अपन घर म खुसरगे। गौटिया अउ ओखर भेदिया ला पता चलिस तब तो ओमन डर के मारे थर-थर कांपे लगिन। मनखे जब बघनीन के संग गौटिया के घर के मोहाटी म पहुँचिस तब गौटियां ह घर के भीतरेच ले चिल्ला-चिल्ला के माफी मांगे लगिस अउ बघनीन ला जंगल म लहुटे के अर्जी-विनती करे लगिस।

   बघनीन अउ मनखे एक-दूसर ल देख के मुस्काइन अउ लहुटके मनखे के घर आगे। बड़े भइया बइला के पांव पल्लगी करिस। सुख दुख गोठियाइन अउ संझाती जंगल कोती लहुटगे।

     अब मनखे अउ गौटिया के दुश्मनी ह अउ जादा बाढ़गे। गौटिया ह पहिली ये पता लगवाइस कि मनखे ल अतेक अक्कल कोन बताथे। तब ओला पता चलिस कि ये सब अक्कल ल ओखर बड़े भाई बइला ह देथे। अब  गौटिया ह सोचे लगिस , जब तक बइला नइ मरही तब तक मनखे ला मारना सम्भव नइ हे। ओहा अब पहिली बइला ला मरवाय के उदिम सोचे लगिस। गौटिया अपन भेदिया ला बला के पूछिस, बइला ला मरवाय के कहीं उदिम सोच। 

     भेदिया किहिस-‘‘ ये मे कोन बड़े बात आय गौटिया। तोर जब्बर गोल्लर संग ओखर लड़ई के मुकाबला करवा देथन। तोर गोल्लर ह बइला ला मार के जीत जही। कोन्हों ला तोर चाल के पता तक नइ लगही । सब झन इही सोचही कि खेल म जीत-हार तो लगेच रहिथे। गौटिया ल भेदिया के बात पसंद आइस।

        ओहा बिहान दिन अपन नौकर मनखे के घर जाके किहिस-‘‘ सुने हव तोर भाई बइला ह गजब बलवान हे। काली पोरा के तिहार घला हे। तोर भाई संग मोर गोल्लर के लड़ई बजवा के देख लेथन । तोर भाई कहूँ जीत जही तब मैंहा तोला थारी भर सोन के मोहर इनाम म देहूँ।"

                मनखे ह गौटिया के चाल ल समझगे अउ किहिस-‘‘भाई ! येला मैं अक्केला कइसे बता सकथंव। पहिली बड़े भैया ल पूछ लेथंव। ओखर सहमति होही तभे ये मुकाबला हो सकथे।"

गौटिया  ह फेर एक थारी सोन के मोहर के लालच देके कहिस-‘‘ बने सोच-समझ ले । अपन भाई ला घला पूछ ले अइसन मउका घेरी-बेरी नइ आवय।" अतका कहिके गौटिया ह अपन नौकर के घर ले निकलगे।

       मनख अब निचट मनटूटहा होगे। बइला ह अपन भाई ल निच्चट मनटूटहा देखके पूछिस-‘‘ तब ओहा सबो बात ला ओला सफा-सफा बता दिस अउ गोहार पार के रोय लगिस।"

  बइला किहिस- "देख भाई! अब रोय ले काम नइ चलय। ये संसार म जउन भी जनम लेथे सब ला एक दिन मरना पड़थे। अब मोर ये संसार ले बिदा होय के पारी आगे तइसे लागथे। भगवान के इही मर्जी हे। तब तै काय कर सकथस अउ मै काय कर सकहूँ। फेर तैहा थोड़को संशो-फिकर झन कर। मरे के पाछू घला मोर आत्मा तोर मदद करत रही। कोन्हों तोर बाल-बांका नइ कर सकय।"     अब तैहा मोर बात ल बने चेत लगा के सुन-‘‘ लड़ई म जब मोर पराण छूट जही तब तैहा मोर दुनो आंखी, मोर पूंछ अउ आघू के दुनो गोड़ ल काट के रख् लेबे।"

       पोरा के दिन गौटिया के गोल्लर अउ मनखे के बइला के लड़ई के ढिढोरा सुन के अतराप भर के मनखे लड़ई के मैदान म सकलागे। बइला अउ गोल्लर ल मैदान म उतारे गिस। बइला ह चारों मुड़ा किंजर-किंजर के सब सकलाय मनखे मन ला देखिस, अपन भई मनखे ला नजर भर के देखिस अउ हरि नाम के समिरन करत गोल्लर संग भिड़गे। कभु गोल्लर पटकाय अउ कभु बइला। अइसने-अइसने उवत के लड़ई ह बुड़त ले चलगे। आखिरी म बइला ह अइसे पटकाइस कि उठबे नइ करिस। ओखर पराण छुटगे रहिस।

    लड़ई देख के सब मनखे अपन -अपन घर चल दिन। जीते के खुशी के मारे गौटिया ह अपन गोल्लर ला फूल -माला पहिरा के गांव भर किंजारिस अउ अपन घर आगे।

 ओती लड़ई के सुन्ना मैदान म मनखे ह अपन भाई बइला के लाश ला पोटार के गोहार पार के -पार के रोय लगिस। आज ओहा निच्चट अनाथ होगे रहिस। बइला के रहत ले ओला कभु अपन दाई-ददा के सुरता नइ आय रिहिस फेर आज ओहा अपन आप ला मुरहा समझे लगिस। 

      ओहा रोवत-रोवत घर आय बार लहुटे लगिस तभे ओला अपन भाई बइला के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा तुरते मरे बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ आघू के गोड़ ला काट के रख लिस अउ बइला के किरियाकरम करके आँसू ढारत घर आगे। घर पहुँचके मनखे ह बइला के दुनो आंखी, पूंछ अउ गोड़ ला अपन पूजा-कुरिया म रख दिस।

             अब मनखे ह रोज बिहिनया उठ के स्नान ध्यान करके पहिली ओखर पूजा करय तभे अपन काम-बुता ला शुरू करय। अइसने-अइसने गजब दिन बीतगे।

    अब येती गौटिया ह सोचे लगिस मोर रद्दा के जब्बर कांटा बइला तो मरगे। अब मनखे ला कोन अक्कल बताही। अब तो मैहा ओखर घरवाली ला अपन घरवाली बना के रहूँ। एक दिन गौटिया ह मौका देख के सोवा पड़ती सुनसनहा रतिहा अपन गुंडा-बदमाश मन ला हाथ हथियार धराके मनखे के घरवाली के अपहरण करे बर भेजिस।

          गुंडा बदमाश मन मनखे के हाथ-पांव ला बांध के ओखर सुवारी ला लेगे लगिन। ओ बेरा मनखे के सहायता करे बर कोनहो नइ रिहिन। मनखे ला अपन भाई के कहे बात ह सुरता आगे। ओहा अपन भाई बइला ला सुमरत किहिस-‘‘ अब तो मोर घर के मान-मर्यादा के रक्षा बस तिही कर सकत हस भैया।"

    मनखे के बस अतका कहना रिहिस कि बइला के पूंछ ह डोर बनके गौटिया सहित ओखर सब गंडा बदमाश मन ल कसके बांध दिस अउ ओखर गोड़ ह ठेंगा बनके सब के धुनई शुरू कर दिस। मार के मारे सब झन हाय-हाय कहिके दंदरत रहय अउ बचाव-बचाव के गोहार पारत रहय अउ बइला के दुनो आंखी ह भांवा मांछी बनके सब ला खखोल-खखोल के चाबे लगिस। 

        गौटियां अउ ओखर गुंडा-बदमाश मन के आंखी- कान फूलगे। डर के मारे ओमन सबके सब पल्ला भागिन।

 कइसनो करके दुख के कारी रतिहा बीतगे। बिहिनया जब गांव वाले मन गोहार ला सुनिन तब सब मनखे के घर सकलाइन अउ जब ओमन ल गौटियां के करनी के पता चलिन तब सब खखार-खखार के ओखर मुहूं म थूके लगिन।

     गांव म कटाकट बइठका होइस अउ गांव भर के मनखे मन गौटिया ले मनमाने डाड़  - बोड़ी ले के ओखर बहिस्कार कर दिन। सब झन मनखे बर सोग मरत अपन गांव म रहे के अउ सुख -दुख म काम आय के वचन दिन फेर मनखे ह अब ओ गांव ला छोड़ना उचित समझके उहां ले अपन सुवारी सहित निकलगे। मोर कहानी पुरगे, दार भात चुरगे।

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा , मगरलोड

जुला-धमतरी , छत्तीसगढ़

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