छत्तीसगढ़ी लोक कथा
परबुधिया
वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गाँव में एक झन डोकरी रहय। ओखर एक झन बेटा रहय। डोकरी ह निचट गरीब रहय। गांव मे कुटिया-पिसिया, रोजी-मजूरी करके अपन गुजर-बसर करत रहय। ओखर बेटा घला डोकरी के काम-बुता में सहयोग करय फेर ओखर अक्कल ह कमती रहय। गांव भर के मनखे ओला लेड़गा कहय। डोकरी ह लेड़गा के बिहाव ला ननपन में कर दे रहय। लेड़गा ह ये बात ला नइ जानत रहय। अपन संगी-जहुंरिया मन के बिहाव होवत देखे तब उहू ला अपन बिहाव कराय के साध लागे।
एक दिन वोहा डोकरी ला अपन बिहाव करे बर किहिस। डोकरी किहिस- "अरे बेटा! तोर बिहाव ला तो मैहा तोर ननपन में कर दे हवं। अब तैहा सज्ञान होगे हावस। मैहा तोर बर रोटी-पीठा रांध के जोर देथव। तैहा तोर ससुरार जाके बहू ला गौना कराके ले आ।"
दाई के गोठ ला सुनके लेड़गा गजब खुश होगे अउ ससुरार जाय बर तैयारी करे लगिस।
डोकरी ह रोटी-पीठा रांध के मोटरा में जोर दिस। लेड़गा एक मन के आगर अपन ससुरार वाले गांव डहर रेगें लगिस। बिहिनया के निकले लेड़गा ह रेंगत-रेंगत संझाती अपन ससुरार गांव में पहुचगे।
ओखर सास-ससुर मन दामाद आय हावे कहिके ओखर गजब सुवागत -सत्कार करिन। बिहान दिन अपन सगा-सोदर अउ गांव वाले मन ला नेवता दे के बलाइन अउ बने राजी-खुशी लेड़गा के संग अपन बेटी के बिदा कर दिन।
लेड़गा अपन बाई संग रेंगत-रेंगत अपन गांव आय बर निकलगे। लेड़गा के घर वाली बने चुक-चुक ले सोलह सिंगार करे रहय। कनिहा म करधन , पांव में पैरी बांही भर चुड़ी अउ मांग भर सेंदूर भरे रहय।
जेठ के महीना रहय अउ मझंनिया के बेरा। दुनो पराणी घाम में रद्दा रेंगत रिहिन। दुलिहिन के मांग के सेंदूर ह घाम में निकलत पछीना के सेती बोहा के माथ भर बगरगे रहय अउ मुहुं ह लाल-लाल दिखत रहय। पहिली तो लेड़गा ह ये बात ऊपर धियान नइ दे रिहिस। बने गोठ-बात करत रद्दा रेंगत रहिस।
तभे रद्दा में ओला एक झन बइला कोचिया मिलगे। कोचिया ह पहिली लेड़गा ला ओखर हाल-चाल पूछिस अउ किहिस- "कस रे लेड़गा! तैहा बिहाव करे हस तब बने देख-सुन के नइ करे रहितेस , अभी अपन बाई ला गौना करा के लेगत हस अउ देखत नइ हस एखर माथ ह फूटगे हावे। अइसन फूटहा माथ वाले बाई संग तैहा जिनगी बिता डारबे?"
कोचिया के बात सुनके लेड़गा अपन बाई के माथ कोती ला देखिस। सिरतोन में ओखर बाई के माथ ह लाल-लाल दिखत रहय। कोचिया के बात ला लेड़गा सिरतोन पतिया लिस अउ पूछिस- " गलती तो होगे हावे बबा ! अब मोला काय करना चाही तउने ला बता।" कोचिया ह लेडगा संग ठट्ठा-दिल्लगी मढ़ात किहिस - "काय करबे बे! अपन बाई ला मोर बइला संग बदल दे।" लेड़गा ह भल-ला-भल जानिस अउ कोचिया के बइला संग अपन बाई ला बदल दिस।
अब लेड़गा ह बइला के बागन ला धरके झींकत-झींकत अपन घर डहर रेंगिस। बस थोड़ेच कुन रेंगें रिहिस अउ रद्दा में एक झन पहिचान के छेरका अमरा लिस। राम-रमौआ करे के बाद छेरका ह पूछिस तब लेड़गा ह सब बात ला साफ-साफ छेरका ला बता दिस। उही बेरा में लेड़गा के बइला ह पिशाब करे लगिस। छेरका ला मउका मिलगे।
वोहा किहिस- "अरे निच्चट लेडगा हस रे। बदली करना रिहिस तब बने बइला संग करे रहितेस। देखत नइ हस बे , तोर बइला के पेट फूटगे हे । पेट के सब पानी भुइंया में बोहावत हावे?"
लेड़गा बइला के पेट डहर ला देखिस तब ओला छेरका के बात सिरतोन लागिस।
लेड़गा किहिस- "अब काय करव भैया?"
छेरका किहिस- " काय करबे, मोर छेरी संग तोर बइला ला बदल ले।"
लेड़गा तियार होगे अउ अपन बइला ला छेरी के बदला में छेरका ला दे दिस।
छेरका ह बइला ला धरके अपन रद्दा रेंग दिस अउ लेड़गा ह छेरी ला धरके अपन रद्दा रेंगे लगिस। फेर थोड़कुन आघू बढ़े रिहिस अउ एक झन भाजी-पाला बेचइया कोचिया संघरगे। कोचिया ह एक कांवर भाटा ला धरके बेचे बर बजार लेगत रहय।
वोहा लेड़गा ला देख के पूछिस- "तैहा ये छेरी ला धरके कहां ले आवत हस?"
लेड़गा फेर अपन कहानी ला साफ-साफ कोचिया ला बता दिस। कोचिया मने-मन गुनिस, ये ह तो निचट बइहा हे । सब झन येला मूरख बनात हे । महु बने के देखथव। कोचिया किहिस- "अरे लेड़गा! बदलना रिहिस तब बने छेरी संग बदले रहितेस।"
लेड़गा किहिस- "काय होगे हे मोर छेरी ला?"
कोचिया किहिस-अरे! देखत नइ हस , तोर छेरी ह तोला घेरी-बेरी बिजरात हे।"
लेड़गा लहुट के छेरी डहर ला देखिस। सिरतोन में छेरी ह दिन भर लिबिर-लिबिर अपन जीभ ला निकालत रहय। कोचिया के बात लेड़गा ला सिरतोन लागिस।
वोहा मुड़ धर के बइठगे अउ कोचिया ला पूछिस- "अब काय करव यार? "
कोचिया किहिस-"काय करना हे यार! तैहा ह अपन छेरी ला मोर एक कांवर भाटा संग बदल ले।"
लेड़गा तियार होगे। अपन छेरी ला कोचिया ला दे दिस अउ ओखर एक कांवर भाटा ला कांध में बोही के अपन गाँव डहर रेंगिस। गांव तीर में पहुंचत-पहुंचत निचट सांझ होगे रहय। रेंगई में लेड़गा ह थक घला गे रहय। फेर वोहा मन में गुनत रहय कि कांवर के सबो भाटा बने पोठ होही तब तो ठीक हे। कोन्हों एको ठन बोदरा निकल जही तब दाई मोला मनमाने गारी -बखाना दे डारही।
अइसने सोच के लेड़गा ह अपन गांव के सियार में पहुंचिस अउ एक ठन खेत के बने ऊँच असन मेंड़ में खड़े हो के सब भांटा ला ओसाय लगिस। सब भांटा ह मेंड़ ले ढुल-ढुल के खेत में जाके गिरगे। लटपट में मेंड़ में एकठन भांटा माढ़िस।
लेड़गा समझिस सब भांटा ह बोदरा हे , बस इही एकठन भांटा भर बने पोठ हे। बने होगे भैया इही मेरन ओसा के देख डारेंव ते ,नही ते घर में मनमाने गारी खाय रहितेंव।
लेड़गा मेंड़ में अरझे उही एक ठन भांटा ला धरके दिन बुड़ती बेरा अपन घर में पहुंचिस।
लेड़गा ल अकेल्ला आवत देख के ओखर दाई अचरज में पड़गे। वोहा बहू कहां हे कहिके पूछिस, तब लेड़गा ह सब बात ला साफ-साफ बतादिस।
डोकरी के एड़ी के रिस , तरवा में चढ़गे वोहा लेड़गा ला मनमाने ठठाइस अउ चल बहू ला खोजे बर जाबो कहिके घर ले निकलत रिहिन।
उही बेरा में बइला कोचिया डोकरा ह नेवन्नीन बहू संग घर में पहुंचिस अउ लेड़गा ला देख के खलाखला के हांसिस। कोचिया अउ अपन बाई ला देख के लेड़गा बक खागे । बहू ह बने टुप-टुप अपन सास के पांव-पल्लगी करिस। डोकरी ह बने एक लोटा पानी देके दुनो झन के सुवागत-सत्कार करिस अउ उखर बइठे बर पोता-पीढ़ा बिछाइस।
डोकरी के कुछु पूछे के पहिलीच डोकरा ह किहिस- "तोर बहू मोर बेटी नतनिन आय ओ सियान! मैहा एखर आजा बबा अवं। मैंहा जानत रहेंव ये लेड़गा बिया निचट परबुधिया हे , मोर नतनिन ला बने सोझबाय घर लेगे ला सकही धुन नइ सकही? तिही पाय के मैहा चाल चलेंव अउ तोर बहू ला अमराय बर आय हवं। ये दे, अब मोर नतनिन ला तोर घर में पहुचा दे हवं। आज ले येहा तोर धन आय। येखर जतन-भाव ला अब तुमन ला करना हे। अब मैहा मोर घर जात हवं। "
डोकरा ह अपन घर जाय बर निकलगे । डोकरी ह अपन बहू-बेटा संग खइस कमइस राज करिस। मोर कहनी पुरगे दार भात चुरगे।
बोड़रा, मगरलोड
जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़
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