Saturday, 14 February 2026

छत्तीसगढ़ी लोक कथा

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा


राजा वीर देव

 एक बेर राजा वीर देव ह अपन राज म विधि विधान ले सब देवता मन के पूजा-पाठ कराइस फेर शनिदेव के पूजा कराय बर भुलागे। शनिदेव ह रिसागे अउ राजा ले बदला ले बर प्रण ठान लिस।

   एक दिन राजा वीरदेव के राज म बाजार होईस। बाजार के सब साग-भाजी ला शनिदेव ह मनखे बनके आ के बिसा डारिस। जब राजा ह अपन मंत्री मन ला राजमहल के रसोई बर साग-भाजी ले बर भेजिस तब ओमन ला बाजार म कहींच साग-भाजी नइ मिलिस, ओमन जुच्छा हाथ बाजार ले लहुटिन अउ राजा ला सब बात ला बताइन। येला सुन के राजा ला बड़ा अचरज होगे। वोहा सोचिस मोर राज के अतेक बड़े बाजार अउ राजमहल बर साग-भाजी नइ मिलिस तब आम जनता के काय होही? मैहा अपन आप ला बड़े जान राजा समझ के गरब म फुले रहिथवं अउ मोर परजा मन ला साग भाजी तक नइ मिलत हे।

   एक दिन शनिदेव ह नारी बनके राजा संग छल करे बर राजमहल म पहुंचगे। अनचिन्हार नारी ला देख के राजा ह ओला ओखर परिचे पूछिस। तब नारी रूप धरे शनिदेव ह किहिस- "तोर राज के बाजू म हमर धोबनीन पारा हावे, मैंहा उही पारा के धोबनीन अवं।"

        तब गरब म फूले राजा वीरदेव ह अपन भारी बड़प्पन गोठियाय लगिस।

 राजा किहिस-"महूं कोन्हो नानमुन राजा नोहवं, मोर राज अतका बड़े ये दुनिया म अउ कोन्हो राज ह नइहे। मैहा संसार के सबले बड़े राजा अवं, मोर राज म परजा ह बहुत सुख भोगत हे।"

   नारी बने शनिदेव ह किहिस- "हाय रे मोर ठेंगवा। जादा लबारी झन मार राजा साहब। तोर राज ह तो हमर पारा के कोन्टा के पुरतिन घला नइहे। तुमन ला कहूं मोर बात म भरोसा नइ होवत होही तब कभु हमर पारा आके किंजर के देख लेव, तुंहर गरब ह टूट जाही। " ओ नारी- परानी के बात ला सुनके राजा ह बक खागे।

    राजा ला ओखर बात म भरोसा नइ होइस। ओ नारी ह राजा के गरब ला ललकार दे रिहिस अउ राजा ल अपन पारा ला किंजर के देखे के नेवता दे के राजमहल ले निकल गे रिहिस।

       शनिदेव के चाल म राजा ह फंसगे। शनिदेव ह राजा ला अपन जाल म फंसा के गजब खुश होगे। राजमहल ले निकलिस अउ छप होगे।

   बिहान दिन राजा ह अपन घोड़ा के संवागा करके ओमे सवार होइस अउ ओ नारी के बताय रस्ता म धोबनीन पारा ला किंजर के देखे बर निकलगे।

        शनिदेव के सेना मन किसम-किसम के नारी रूप धरके अपन माया जाल म अपन पारा बसालिन। राजा ह अपन घोड़ा म सवार हो के अड़बड़ दूरिहा आगे रिहिस। राजा ह कोनहो भी ठउर म जा के जब  कोन्हो ला ओ जगा के पता पूछे तब सब खाली धोबनीन पारा बतावय अउ राजा ह उंखर बात ला सही पतिया के अउ आघू बढ़त जावय। अइसने-अइसने महीना दिन बीतगे, बच्छर दिन बीतगे। फेर ओ धेबनीन पारा ह सिराबे नइ करय। राजा ह धोबनीन पारा ला घूमत हवं कहिके भोरहा म अपन राज ले गजब दूरिहा निकलगे अउ दूसरा राज म पहुंचगे।

      एक दिन के बात आय। राजा ह दूसरा राज म जाके थोड़ दिन सुस्ताहूं कहिके एक बड़े पेड़ के खाल्हे म अपन मोटरा ला मढ़ा के अपन डेरा जमाय रिहिस। उहीच रात म दुश्मन राजा ह ओ राज के राजा के बेटा ला मरवा के ओखर गहना- गुरिया ल झटक ले रिहिस अउ पकड़ाय के डर म सब गहना- गुरिया ला राजा वीरदेव जउन पेड़ के खाल्हे अपन डेरा जमाय रिहिस उहींचे पहुंचके राजा वीरेदेव के मोटरा म भरके ओखर मुड़सरिया म मढ़ा दे रिहिस। थके-मांदे राजा वीरदेव ह मनमाने नींद भांजत रिहिस। ओहा कहींच बात के गम नइ पाइस।

  रतिहा बीतिस तब ओ राज के राजा ह अपन बेटा के हत्यारा के पता लगवाइस फेर हत्यारा के कुछु पता नइ चलिस। अब राजकुमार के गहना-गुरिया के खोज -खबर ले गिस।

  ओ राज म जतका अनचिन्हार मनखे आय रिहिन अउ अलग-अलग ठउर म डेरा जमाय रहिन सबके मोटरा-चोटरा ल खोल के जाँच करे गिस। राजकुमार के गहना-गुरिया ह राजा वीरदेव के मोटरा ले निकलिस। तब सब सैना मन राजा वीरदेव ला ओ राज के राजकुमार के हत्यारा समझे लगिन अउ ओला पकड़ के राजदरबार मे पेश कर दिन।

     राजा वीरदेव ह अपन बचाव करे बर कतको सफाई दिस फेर सबूत तो ओखरे तीर मिले रिहिस। ओला हत्या के अपराधी करार दे गिस अउ उहां के राजा ह ओखर हाथ-पांव ला काटे के सजा घला सुना दिस। राजा वीरदेव ह अपन बचाव बर गजब उदिम करिस फेर उहां के राजा ह ओखर एको बात ला नइ सुनिस।

      जल्लाद मन राजा वीरदेव के हाथ-गोड़ ला काट दिन। पीरा म वीरदेव ह बियाकुल होगे। कटाय हाथ-गोड़ ले तरतर- तरतर लहु बोहाय लगिस। वीरदेव के कटाय हाथ-पांव म भनन-भनन मांछी झुमे लगिस।

       राजा वीरदेव ह घिल्लत-घिल्लत एक बाजार म पहुंचिस। बाजार म किसम-किसम के दुकान लगे रहय अउ मनमाने भीड़ रहय।

      बाजार म एक झन तेलिन ह तेल बेंचत रहय। ओखरे दुकान म पहुंच के वीरदेव ह चुप्पे कोंटा म जा के बइठगे। तेलिन ह तेल बेंचत रहय अउ बाजू म एक ठन तेल के टीपा माढ़े रहय। वीरदेव अपन कटे हाथ म भनभनात मांछी ले बांचे बर उही तेल के टीपा म अपन हाथ ला बोर दिस। तेलिन के नजर ओती पड़िस तब ओहा वीरदेव ला मनमाने गारी-बखाना दिस। गारी ला घला सुनके वीरदेव ह आंसू ढारत अउ अपन करम ला दोष देवत कलेचुप बइठे रिहिस। येती तेलिन ह फेर अपन तेल बेंचे लगिस।

       तेल ह तो एकेच टीपा रहिस फेर ओ दिन बाजार म ओहा कतको तेल बेचय फेर टीपा के तेल ह सिराबे नइ करय अउ जस के तस भरे रहय। तेलिन अचरज म पड़गे। तेलिन सोचे लगिस, आज काय बात आय जउन तेल ह मनमाने बेंचावत हे अउ टीपा के तेल ह सिरावत घला नइहे। ओहा सुरता करिस कि आज ये तेल टीपा म ये परदेशिया ठुठवा ह अपन हाथ ला बोरे हे। कहूं एखरे कमाल तो नोहय? ओहा येती -ओती देखिस तब कुछ दूरिहा म वीरेदव अपन मुड़ी नवा के मांछी मन ला भगाय बर अपन देहे ला झटकारत बइठे रहय।

      तेलिन ला ठुठवा वीरदेव बर दया आगे। तेलिन ह राजा वीरदेव ला कोन्हों ठुठवा भिखमंगा समझिस। ओहा पहिली वीरेदव ला भोजन कराइस, पानी पियाइस। तहन ओखर परिचय पूछत किहिस-"भैया! तैहा कोन देश के धरमी चोला आवस रे भाई? आज तो तोर किरपा ले मोर तेल ह मनमाने बेचावत हे अउ टीपा के तेल ह जस के तस माढ़े घला हे। मोर मेर गजब अकन पइसा घला सकलागे हावे। तैहा कोन्हो साधारण मनखे नोहस तइसे लागथे? तैहा मोला अपन बहिनी समझ के सब बात ला साफ-साफ बता।"

     तेलिन बहिनी के बात ल सुनके वीरदेव के आंखी ले झर-झर आंसू बहे लगिस। ओहा अपन राम कहानी ला बतावत गोहार पार के रो डारिस अउ किहिस-" मैंहा काय करव बहिनी! इहां परदेश म कोन्हों मोर बात ला पतियायव नही अउ मोर अइसन हाल कर दे हावे।

      तेलिन ह वीरदेव के दुख ल समझिस अउ किहिस-"झन रो भैया चल मोर संग मोर घर चल। तोर तो हाथ-पांव कटागे हावे, भले कहीं बुता नइ कर सकबे तब कोई बात नहीं बस मोर घर के घानी के तीर म बइठ के टोपा बंधाय बइला ला हांकत भर रहिबे। मैंहा तोर सेवा-जतन करहूं अउ तोर खाय-पिये के बेवस्था घला करहूं।"

       सांझ होइस तहन बाजार ह सिरागे अउ तेलीन ह अपन गाड़ी बइला म अपन समान ला जोर दिस । उही गाड़ी म बइठार के वीरदेव ला अपन घर ले आनिस।

      घर आके तेलिन ह वीरदेव के खा- पिये के अउ सुते-बसे के बेवस्था कर दिस। अब वीरदेव ह उहींचे तेलीन के घर रहे लगिस। तेलीन ह ओला बने बिहिनिया नहवा-धोवा के तेल-फूल चुपड़े , खवाय -पियाय अउ घानी तीर बइठार देवय। वीरदेव ह दिनभर घानी के बइला ला हांकत बइठे रहय। अइसने -अइसने वीरदेव के दिन कटे लगिस।

     एक दिन घपटे अंधियारी रात के समे रहय। बरसात के मौसम रहय। झोर-झोर के पानी गिरत रहय। चारो खुंट कुलुप अंधियार,  सब घर के दीया-बाती ह बुझागे रहय।

     तेलीन किहिस-"भैया ! आज के रात ह अड़बड़ जब्बर हे। नींद नइ आवत हे, तैहा कहीं कथा-कंथली जानत होबे तब सुना। कहानी सुनत-सुनावत ये बैरी रात ह बित जही।"

      राजा वीर देव ह दीपक सागर के कहानी कहे के शुरू करिस। कहानी सिराइस तहन सब घर के बुझाय दीया मन अपनेच-अपन बरगे। घर-घर ह देवारी असन जगजग ले अंजोर होगे। राज महल के दीया मन घला बरगे। दीया मन ला अपने अपन बरत देख के सब झन अचरज म पड़गे।

     राजकुमारी भर जानत रिहिस कि दीपक सागर के कहानी कहे ले दीया मन बर जथे फेर दीपक सागर कहानी ला ये संसार म राजा वीरदेव के छोड़ अउ कोनहो नइ जाने। राजकुमारी ह जान डारिस कि कोई न कोई भेष म राजा वीरदेव ह इही राज म हावे। 

      बिहान दिन राजकुमारी के स्वयंबर रहय। स्वयंवर म भाग ले बर देश-विदेश के बड़े-बड़े राजा म सकलाय रिहिन। राजमहल के आघू के बड़े राज मैदान म बड़े जब्बर पंडाल लगाय गे रिहिस। पंडाल के चारो कोती ला डोर म घेरा लगाय गे रिहिस अउ बीच म मंच बने रिहिस। मंच म राजा-रानी मन सुंदर श्रृंगार करे बइठे रिहिन। राजकुमारी ह घला सोलह श्रृंगार करे अपन वर ला चुने बर तैयार रिहिस। राजा के शाही हाथी ह अपन सूंड़ म वरमाला धरे खड़े रिहिस। राजकुमारी के शर्त रहय कि हाथी ह जउन राजा के घेंच म वरमाला डारही ओखरेच संग बिहाव करहूं। राजकुमारी ह हाथी ला पहिलीच ले समझा दे रिहिस कि राजा वीरदेव ह चाहे जउन भेष म, जउन ठउर म बइठे होही ओखरेच घेच म वरमाला ला डार के मोर तीर म आबे।

     पंडाल म चारो डहर मन माने कुरसी माढ़े रहय। जेमे देश-विदेश ले स्वयंवर म भाग ले के अपन रानी चुने बर राजा मन सकलाय रहय उही मन सब अपन किस्मत के अगोरा करत कुरसी म बइठे रहय।

       तेलीन घर रहवइया ठुठवा ल घला राजकुमारी के स्वयंबर देखे के शउख लागिस। ओहा अपन मन के बात ला तेलिन ला बताइस तब मया के मारे तेलीन बपरी ओला अपन गाड़ा म बइठार के पंडाल के स्वयंवर मैदान ले दूरिहा के एक ठन ऊँच असन भाड़ी म बइठार दिस। ठुठवा ला घला स्वयंवर ह दिखे लगिस।

     स्वयंवर शुरू होइस। हाथी वरमाला धरे चारो डहर ला किंजर-किंजर के देखे। हाथी जउने राजा डहर आय तब उही राजा कुरसी ले झट ले खड़े हो के वरमाला पहिरे के अगोरा करत खुश हो जाय। फेर हाथी ह ओला एक नजर देख भरके आघू बढ़ जाय। राजा मन ल अइसने देखत-देखत अउ चारो कोती किंजरत-किंजरत हाथी ह पंडाल ले बाहिर निकलगे अउ दूरिहा म ऊँच भाड़ी म बइठे ठुठवा के घेंच म वरमाला ला डार दिस। 

      स्वयंवर के पंडाल म सननाटा छागे। राजकुमारी के दाई-ददा मन भड़कगे। ओमन ओ ठुठवा ला अपन दमांद स्वीकार करे बर तैयार नइ होइन अउ हाथी ला फेर पंडाल म लान के ओखर सूड़ म दूसरा वरमाला धरादिन अउ ठुठवा ला दुत्कार के उहां ले दूरिहा म लेगके बइठार दिन।

    हाथी फेर चारों डहर घूम-घूम के सब सकलाय राजा मन ला एक नजर देखिस अउ ठुठवा ला खोजत -खोजत जाके फेर ओखरेच घेंच म  वरमाला ला डार दिस।

     राजकुमारी ह राजा वीरदेव ला चिन्ह डारिस अउ ओला अपन पति स्वीकार कर लिस। दाई-ददा मन ओला गजब समझाइस फेर ओहा मानबे नइ करिस अउ अपन जिद म अड़ दिस। आखिर म राजा-रानी ला घला मानना पड़िस। बेटी के खुशी बर ओमन ठुठवा ला अपन दमांद स्वीकार कर लिन अउ बिहाव के सबो नेंग -नत्ता करके उंखर बिहाव करा दिन। स्वयंबर म भाग ले बर आय सबो राजा मन मनटूटहा होके अपन -अपन राज लहुटगे।

      राजा ह ठुठवा अउ अपन बेटी के रहे बसे बर एक अलग महल म बेवस्था करा दिस। सुख-सुविधा के सबो समान रखवा दिस, नौकर-चाकर के घला बेवस्था कर दिस। अइसने-अइसने बहुत दिन बीतगे।

      एक दिन राजमहल म राजा मेर एक झन बैपारी ह अपन नियाव मांगे बर आइस। बैपारी ह राजा ला बताइस कि ओहा अपन बेटा के बिहाव करे बर बरात धर के जावत रिहिस। रद्दा के एक ठउर म दूलहा ल बाहिर-भांठा लागगे। ओहा बाहिर गिस तहन शनि-गिरहा ह मोर बेटा के भेष धरलिस अउ दूलहा बनके दूल्हा के डोला म आके बइठगे। जब डोला ह आघू बढ़िस तब असली दूलहा ह भागत-भागत आके सब बात ला बताइस। अब असली दूल्हा अउ नकली दूल्हा म पहिचान करना हमर मन बर बड़ मुश्किल होगे हावे, काबर कि दोनो के देहे-पांव, रूप-रंग अउ साज-सवांगा ह एकेच हे। एखरे नियाव कराय बर मैहा आपके दरबार म आय हवं। कोन असली दूलहा आय अउ कोन नकली आय। एखरेच पहिचान करके बता देतेव तभेच नियाव ह होही। 

      सुनके राजा ह घला अचरज म पड़गे। ओखर मेर अइसन नियाव बर कोन्हो पहिली बेर आय रिहिस। राजा, मंत्री, पाड़े-परधान, नेंगी-जोगी सबोच झन असली अउ नकली दूल्हा ल घेरी-बेरी देखे लगिन। दुनो झन एकेच किसिम के लागे। दूनो दूलहा ह अपन आप ला असली बतावय अउ मनमाने झगड़ा होवय।  राजा अउ मंत्री मन कुछु समझ नइ पावत रिहिन। 

धीरे-धीरे ये बात ह राजकुमारी तक पहुंचिस तब ओहा अपन पति ला ये बात ला बताइस। सुनके ठुठवा ह किहिस-"मोर मेर कोन्हो ओ बैपारी ह आतिस तब  मैंहा तुरते असली अउ नकली दूलहा के पहिचान करके बता देतेंव फेर इहां तो सब झन मोला हत्यारा समझथे। तोर दाई-ददा मन तो आज तक मोला अपन दमांद घला स्वीकार नइ करे हे। मेंहा नियाव कइसे कर सकथवं।"

    अपन पति के कहे बात ला राजकुमारी ह अपन राजा ददा ला बता दिस। येला सुनके रानी ह राजा ला किहिस-"स्वामी ! ओला अब कतेक दिन ले हत्यारा समझबो। बेटी संग बिहाव होगे हावे तब तो ओहा हमर दमांद तो होइच गे हावे। अब बेटी ह कहत हे तब हमन उही दमांद ला इहां बला के ये नियाव ला करा देथन हो सकथे ओहा असली अउ नकली दूल्हा म भेद कर के नियाव कर दे।" 

रानी के बात ला सुनके राजा ह कुछ समेे तक गुनिस अउ रानी के बात माने बर तैयार होगे।

    मौका देख के एक दिन राजा ह अपन बेटी दमांद बर उखर महल म रथ ला भेजिस अउ परघा के बेटी-दमांद ल अपन राज दरबार म बलाइस।

 राजा रानी मन ठुठवा के गजब मान-सम्मान करके ओला ऊँच पीढ़ा में बइठारिन अउ बैपारी के समस्या ला बताइन। बनिया घला ओखर पांव म गिरके नियाव मांगे लगिस।

     अब ठुठवा ह दोनो दूल्हा ला अपन आघू म खड़े करके बने धियान लगा के देखिस अउ असली दूलहा ल पहिचान घला डारिस। फेर मन म गुनिस असली दूलहा कोन आय येला तो बैपारी, बरतिया, राजा- रानी अउ दरबारी मन ला देखाय बर कुछु सबूत लागही । ओहा मने मन उपाय सोचे लगिस। ओहा सोचिस तहन एक ठन उपाय घला सूझगे। 

     ओहा तुरते एक झन राज करमचारी ला कुम्हार घर भेज के माटी के कच्चा हंडी मंगाइस अउ ओमे सात छेद करवा दिस। अब दूनो झन दूल्हा मन ला किहिस- "जउन दूल्हा ह ये छेद मन ले सात बार आर -पार बुलक दिही उही ह असली दूल्हा आय।"

   अब सिरतोन के मनखे ह ओ नानकीन छेद म कहाँ बुलक सकही? ओ दूल्हा बपरा ह बोकबाय खड़े रहिगे अउ शनि-गिरहा वाले मायावी दूल्हा ह हकन के किहिस-"हव जी, हम सात बार का कहिथव , इक्कीस बार बुलक के तुमन ला देखा देबोन।"

    शनि-गिरहा वाले मायावी दूलहा ह ओ छेद म बुलके के शुरू करिस। ओ जउन छेद ले भीतरी म खुसरे ओ छेद ला ठुठवा ह माटी म छबवा देवय। अइसने-अइसने ओ दूलहा जब आखिरी छेद म बुलक के  भीतरी म गिस तब ठुठवा ह आखिरी छेद अउ हंडी के मुहूं ला घला छबवा दिस। दूल्हा बने शनि-गिरहा ह हाड़ी भीतरी धंधागे। ओ हाड़ी ला कुम्हार घर के धधकत आंवा म डार दे गिस। ओ नकली दूल्हा ह आंवा म भुंजाके  मरगे अउ असली दूल्हा ह राजा-रानी अउ अपन ददा के आघू म मुस्कावत खड़े होगे।

      बैपारी ह असली दूलहा ला पहिचान के गजब खुश होईस। ओहा राजा-रानी अउ ठुठवा के घोलंड के पांव परिस। अब ओला नियाय मिलगे रिहिस। ओहा अपन दूलहा बेटा अउ बरतिया मन संग बहु बिहाय बर निकलगे।

        राज दरबार म ठुठवा के जय-जयकार होय लगिस। राजा-रानी मन घला समझगे कि हमन जउन ला अपन बेटा के हत्यारा समझत रहेन तउन ह कोन्हो साधारण मनखे नोहे भलुक बहुत गुनवान अउ धरमी चोला आय। राजा के आंखी म अपने करनी बर पछतावा होय लगिस अउ ओखर आंखी ह आंसू म डबडबागे। ओहा ठुठवा ले माफी मांग के ओखर परिचय पूछिस।

      ठुठवा राजा के आंखी म घला आंसू आगे। ओहा अपन परिचे बतावत किहिस -"महु ह एक राज के राजा वीरदेव अवं। एक बेर अपन राज म यज्ञ करायेंव तब सब देवता मन के पूजा करेंव फेर शनि देव ला भुलागेव। शनिदेव ह रिसा के अपन माया ले मोर अइसन हाल करवा दिस। अब मैंहा इहां सबके आघू म शनिदेव ले माफी मांग के कहत हवं कि मैंहा कोनहों तुंहर बेटा के हत्यारा नइ होहूं तब मोर हाथ-गोड़ फेर साबूत हो जाय।" ठुठवा ह येती शनिदेव ला सुमरिस अउ ओखर कटाय हाथ-पांव ह फेर जुड़गे।

 जब ठुठवा के हाथ-पांव फेर जुड़गे तब सब ला पक्का विश्वास होगे कि येहा राजा वीरदेव आय। राजा -रानी मन अपन करनी बर ओखर ले क्षमा मांगत अउ गजब अकन उपहार देवत रथ म बइठार के ओला अपन राज ले बिदा करिन। राजकुमारी ह राजा वीरदेव के रानी  बनके बने खइस-कमाइस अउ राज करिस। मोर कहिनी पूरगे , दार भात चूरगे।

 बोड़रा, मगरलोड

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

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