छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा
ठग अउ जग
वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गाँव में एक ठग परिवार रहय। ओमन छै भाई अउ एक बहिनी रहय। छैयो भाई के बर-बिहाव होगे रहय, अभी उंखर बहिनी भर कुंवारी रिहिस हे। उंखर काम लोगन ला ठगना रहय। लफर-लफर गोठियाके, लबारी मार के लोगन मन ला अपन जाल में फंसावय अउ सब ला ठग के पइसा कमा के अपन परिवार के गुजर-बसर करय। दूरिहा-दूरिहा के मनखे मन ओमन ला जाने। ओमन गजब प्रसिद्ध होगे रिहिन। सब लोगन समझे इहीच मन ला सबला ठग सकथे, कोई दूसर येमन ला कभु नइ ठग सके।
ठग मन के गाँव ले गजब दुरिहा जग के गाँव रहय। जग मने महाठग, उहू अपन अतराप भर दूसर मन ला ठगे बर प्रसिद्ध रहय। जब ठग मन के प्रसिद्धी ला ओहा सुनिस तब ओखर मन में विचार आइस कि ये पइत ये ठग मन ला ठगना चाही। तब लोगन मन ला पता चलही कि दुनिया में शेर ले सवा शेर घला होथे। ओहा ठग मन ला ठगे बर मन बना के अपन घोड़ा म सवार होइस अउ एक दिन उही ठग मन के गाँव में पहुँचगे।
जग ह ठग मन के गाँव में पहुँच के गाँव के बाहिर तरिया पार में जा के खड़े होगे। ओ बेरा ठग मन के घरवाली मन तरिया में पानी भरे बर पहुँचे रिहिन। ओमन ला देख के जग ह समझगे अउ योजना के मुताबिक काम करना शुरू करिस।
सबले पहिली ओहा अपन घोड़ा ला पानी के तीर में लेगिस अउ घोड़ा के पुंछ ला पानी में बोर के जोर से चिचिया के कहिस-‘‘बने पेटभर पानी पी ले रे घोड़ा, कोन जनी रद्दा में अउ तरिया-डबरी मिलही कि नहीं?"
ठग के घरवाली मन ये बात ला सुनके सोचिन-‘‘अई! ये परदेशिया ह तो निचट लेड़गा आय तइसे लागथे। घोड़ा ह कोन्हों पुंछ कोती ले पानी थोड़े पिही? संसार के सबो जीव-जन्तु मन मुंहू डहर ले पानी पीथे दई। ये लेड़गा ह अपन घोड़ा में अड़बड़ अकन समान घला लादे हावे। लागथे बने मालदार आदमी आय। आज तो इहीच ला ठग के येखर सब समान ला झटकना चाही।"
ओमन छैयो देरानी-जेठानी सुनता होईन अउ ओ जग ला किहिन-‘‘भैया परदेशिया! आज तो निचट सांझ होगे हावे अउ तैहा दूरिहा जाना हावे कहिके घोड़ा ला पानी पियावत हस। रतिहा रद्दा में चोर-डाकू, हुर्ड़ा-बघवा के डर बने रहिथे। तेखर ले आज भर हमरे घर चार पहर रतिहा ला बिता लेते भैया अउ बड़े बिहनिया ले जिहां जाना हे तिहां चले देते। "
जग के योजना सफल होवत रिहिस। ओहा अंधरा चाहे दू आंखी बरोबर इहीच ला तो चाहत रहिस। ओहा मने मन मुस्काइस अउ उखर घर रतिहा पोहाय बर तैयार होगे।
जग हा ओ देरानी-जेठानी मन के पाछू-पाछू अपन घोड़ा ला रेंगावत उखर घर पहुँचगे। देरानी-जेठानी मन परदेशिया के लेड़गई बुद्धि ला चुपचाप अपन-अपन घरवाला मन ला बतादिन। ठग मन आज तो बने मोटहा माल मिलही कहिके गजब खुश होईन।
रतिहा होईस तहन बने सबो झन खइन पिइन अउ घर के परछी में बइठगे।
अब बड़े ठग किहिस- ‘‘ अरे! अइसने कलेचुप बइठे रहिबो तब तो असकट लागही तेखर ले चलव ना कुछु गप-शप मारबो। गपशप मारत रतिहा तो बीतबे करही संगे-संग मनोरंजन घला हो जही।"
तब मझला ठग ह अपन बड़े भाई डहर ल कनेखी देख के आंखी मारत किहिस-‘‘बड़े भैया ह बने तो कहत हे फेर एक बात हे हमन जउन गप मारबो तउन ला पतियाय ला लागही भई। जउन काखरो गप ला नइ पतियाही तब ओहा शर्त हार जही अउ ओला हरजाना के रूप में अपन तीर रखे जम्मो समान ला दे बर पड़ही, समझगेव ना?" जग ह ठग मन के चाल ला समझत रहय। अब ओहा तो ये ठग मन ल ठगना हे अइसे सोच के आय रहय। उहू ठग मन के हाँ में हाँ मिलावत किहिस-‘‘ हव भई चलो शुरू करव अपन-अपन गप ला।‘‘
ठग मन डहर ले सबले पहिली गप मारत बड़े ठग ह किहिस-‘‘अरे! काय करबे गा परदेशिया भाई, एक बेर हमन अपन खेत में चना बोंय रहेन। खेत भर चना ह बने घमघम ले उपजे रहय। एक दिन के बात आय मैंहा भइंसा गाड़ा धरके खेत गे रहेंव। भइंसा मन ला ढिल्ला छोड़ के मैंहा अपन बुता-काम में लग गेंव। ये डहर भइंसा मन हरियर-हरियर चना ला देख के ललचागे अउ चना के खेत में खुसरगे। घर आय के बेरा मैंहा भइंसा मन ला मनमाने खोजेंव फेर भंइसा मन कहाँ मिले ददा! मैं तो थक गेंव। आखिर में थक हार के घर आगेंव। ये बात ला घर में बतायेंव तब मोर सबो भाई मन मिलके एक पइत फेर भंइसा मन ला खोजिन फेर भंइसा मन मिलबे नइ करिन। रात दिन बस भंइसा मन के संशो में हमन सुखाय लगेन। आखिर में जब चना के फसल ला लुयेन, मिजेंन अउ ओखर दार ला पिसवा के बेसन बनायेन तब एक दिन बड़की ह उही बेसन के भजिया रांधिस। सबो झन भजिया ला खाय लगेन तब एक ठन भंइसा ह मोर टोंटा में अटकिस अउ एक ठन ह मोर छोटे भाई के टोंटा में। मैंहा कहेंव भाग भइगे ददा, ये भंइसा मन ला हमन अकाश ले लेके पताल तक खोजेंन अउ येमन अहा चना के भीतरी में खुसरे हे।‘‘
ये गप ला सुन के सबो झन मनमाने हाँसिन फेर काय करे, नइ पतियाय में तो हरजाना भरे बर लागतिस तिही पाय के सबो झन बड़े ठग के गप में हाँ में हाँ मिलाय लगिन।
येती जग हा ठग मन ला हरवाय बर गप सोचे लगिस अउ किहिस-‘‘हव भैया! बने बताय अइसनेच एक बेर मोरो संग होईस गा। जेठ के जाती अउ अषाढ़ के आती के बेरा रहय। रतिहा मैंहा अपन दुवारी में सुते रहेंव। अच्छा अधरितहा के बेरा रहय। उहीच बेरा मनमाने हवा-तूफान आइस। जेमा मोर घर-दुवार, बारी-बखरी, खेत-खार, गाय-गरू सब उड़ागे। अब काला बताववं मोर घरवाली घला उड़ागे। ओला अड़बड़ पता लगायेंव फेर पता नइ चलिस। आज तुंहर मन के किरपा ले मोर घरवाली मिलगे भैया हो, तुमन मोर बर भगवान अव ददा। यही दे खंभा ल धरके जउन खड़े हे उही मोर घरवाली आय।‘‘
जग के गप ला सुन ठग मन बक खागे। ठग मन सोचिन, "अरे इहां कहाँ ले एखर घरवाली आगे? ओमन खंभा कोती ला देखिन तब सातो ह खड़े रहय। फेर सवाल तो हरजाना के रहय। गप ला नइ पतियाय में तो अपन सबो समान ला हराय के डर बने रहय।"
ठग मन अपन शर्त के मुताबिक अपन बहिनी ला जग मेरन हारगे अउ जग संग सातो के बिहाव कर दिन। फेर सातो भाई ठग मन, मने-मन म जग ले बदला ले के ठाने रहय। बस मउका तलाशत रहय।
सातो ल बिहा के जग ह अपन देश लेगगे। ठग के घरवाली मन ह ओमन ल धिक्कारत कहय, " बड़ ठग बने हव, तुहंरे बात म फांस के वो परदेशिया तुहंर बहिनी ला बिहा के लेगगे अउ तुमन मुंहू देखत रहिगेव मुंहू लुकवा हो। हिम्मत हे तब ओ जग ले बदला ले के देखावव।"
थोड़िक दिन पाछू सबो भाई मन सुन्ता होके ओ जग ल मारे बर ओखर देश जाय बर निकलगे। फेर भगवान जाने उखर ये बात के भनक जग ल कइसे लगिस कि ओहा फेर ठग मन ला फंसाय के फांदा खेल डारिस।
पहिलीच दिन गजब असन मछरी पकड़ के अपन घर म एक ठन हउला के पानी म भरके राख लिस। अपन घरवाली ल चेता दिस काली मझनिया बेरा मैहा घर म आहूं अउ इशारा करहूँ तहन ये हउला के सबो मछरी ला दुवारी म बगरा देबे। अपन ह बिहान दिन एक ठन कोलिहा ल अपन घर म बांध दिस अउ उहीच मुढ़हन के दूसरा कोलिहा के घेंच म डोरी बाँध के अपन संग लान के गांव के बाहिर रस्ता के तरिया पार म बइठ के गरी खेले लगिस।
ठउका उहीच बेरा सातो के भाई मन ओला मारबो कहिके उदिम करत उहीच रस्ता ले गुजरत रहय। जग ला तरिया पार म बइठ के गरी खेलत देख के ओमन ओखर तीर म पहुंचिन अउ जय जोहार करिन।
जग ह किहिस-‘‘बने बेरा म आवत हव जी सगा हो। आजेच तुहंर नेवता-हिकारी बर कइसे मैंहा जाने असन मछरी मारत हवं। थोड़किन पाछू घर कोती जाबो अउ बने गरमे-गरम मछरी बात झड़कबो।‘‘
मछरी भात के नाव सुनके ठग मन के जी ललचागे। फेर ओमन देखथे कि जग के गरी म एको ठन मछरी नइ फँसत रहय। जग ह घेरी-बेरी सट ले मारवं फट ले आय अउ तरिया के मछरी घर म जाय कहिके गरी ल तीरे फेर मछरी फंसे नहीं।
ठग मन ला अचरज होगे। ओमन सोचे इहां तो कहीं नइ फंसे फेर कोन तरिया के मछरी घर म जाही?
बड़े ठग ह पूछिस, तब जग ह खलखला के हांसत किहिस-‘‘ मोर गरी ह मंतर वाले गरी आय रे भाई। एमा फंसे मछरी ह दिखय नहीं सोझे घर पहुंच जाथे। तुमन नइ पतियायव तब मोर घर म जाहू तहन देख लुहू।
जग ह कोलिहा के घेंच के बंधना ल हेरत कहिस-‘‘जा रे कोलिहा घर म जाके तोर भउजी ल बतादे कि तोर भाई मन सगा आवत हे अउ मछरी भात खाय के शउख करत हे। तहन ओहा बने मछरी भात रांध के राखे रही।‘‘
बंधना छूटिस तहन कोलिहा ह जंगल कोती पल्ला भागगे।
कुछ समे बाद जग ह अपन सारा डेरसारा मन ल लेके अपन घर पहुँचिस अउ मोहाटी म तीन-चार बेर ले जोर-जोर से खांसिस। ओखर घरवाली पहिलीच ले रखे मछरी ल दुवारी म बगरा दिस। ठग मन भीतरी म पहुंचके देखथे सिरतोन म दुवारी म मछरी कूदत रहय अउ अंगना म कोलिहा बंधाय रहय। ठग मन सोचे लगिन, कोन्हो कोलिहा ह तो पालतू नइ हो सकय फेर ये जग मेरन काय मंतर कि कोलिहा ह बज्र बांचा माने हे। ये दूसरा कोलिहा आय कहिके ठग मन गमेच नइ पाइन।
बहिनी घर बने गरमे-गरम मछरी भात खाके ठग मन के गुस्सा उतरगे अब उंखर नियत ह जग के गरी अउ कोलिहा उप्पर गड़गे। ओमन गरी ल जादू वाले गरी समझत रहय। मौका देख के ओमन जग ले इही गरी अउ कोलिहा के मांग कर दिन। जग के चाल ह सफल होगे रहिस ओहा मने-मने मुस्कात गरी अउ कोलिहा ल जग मन ला दे दिस।
बिहान दिन ठग मन अपन गांव तीर के तरिया म बइठ के मछरी मारे लगिन। मछरी तो एको ठन फंसत नइ रहय फेर ठग मन समझे, जइसे जग के घर मछरी ह मंतर से पहुंचगे रहिस वइसने हमरो घर पहुंचत होही। ओमन कोलिहा ल ढिलत कहिन जा तोर भउजी मन ला बने मछरी भात रांध के राखे ल कही देबे। बंधना छूटिस तहन कोलिहा भागगे।
ठग मन घर पहुँचके मछरी भात के मांग करे लगिन। फेर कहां के मछरी। ओमन जग के सबो बात ल अपन घरवाली मन ला बताइन। घरवाली मन जग के चाल ल समझगे अउ ठग मन ला फेर मनमाने बखाने लगिन।
जग के चाल ह समझ म आइस तहन ठग मन के एड़ी के रिस तरवा म चढ़गे ओमन फेर ओला मारे के उदिम सोचत कुछ दिन बाद जग के घर पहुँचगे।
ये पइत जग ह दूसर चाल सोचे रहिस। ओहा बमरी के ढेखरा ला लान के पहिली ले अपन बखरी म गड़िया दे रिहिस अउ बरा रोटी ला रांध के उही ढेखरा म गूंथ दे रिहिस। जग मन जब हाथ पांव धोय बर बखरी कोती गिस तब ढेखरा म गरमे-गरम बरा रोटी फरे देख के बक खागे।
बड़े ठग ह जग ल पूछिस तब जग ह किहिस-‘‘अरे ये तो बरा रोटी के रूख आय भैया। येमे बारो महीना बरा रोटी फरथे। न दार पिसे के झंझट न तेलई बइठे के झंझट। जब मन लागिस बखरी म जा अउ मन भर के बरा रोटी खा। तुहर कोती अइसन बरा रूख नइ होवय का जी?‘‘ अब ठग मन के नियत ह बरा रोटी के पेड़ म गड़गे। ओमन जिद करके बरा रोटी के पेड़ ला जग ले मांगलिन अउ अपन घर लानके अपन बखरी म गड़िया दिन। नकली बरा के पेड़ म रोटी कहाँ ले फरे। पहिली के बरा मन बसियाय लगिन। उखर अक्कल ल देख के उखर घरवाली मन ओमन ला फेर मनमाने गारी बखाना देवय।
घरवाली मन के रोज के गारी-बखाना ला सुनके ठग मन के जीव बिट्टागे। अब ओमन जग ला मारे के परन कर लिन। ओमन सुन्ता बंधाइन कि ये पइत जग ले कोन्हों किसम के बातचीत नइ करना हे। बात करे म हमन ओखर चाल म फँसके मूरख बन जाथन। अब सोझे रतिहा ओखर घर म जाके ओला सुते खटिया म बाँध के लानबो अउ दहरा म फेक देबो।
थोड़िक दिन बाद ओमन अधरतिहा जग के घर पहुँचिन। गरमी के दिन रहय। जग ह अपना अंगना म खटिया म सुते रहय। ठग मन चुपचाप जग के गोड़-हाथ ल खटिया के खुरा मन म बाँध दिन अउ खटिया ला उठा के रेंगे लगिन।
जग के गांव ले कई कोस रेंगत दहरा तीर म पहुँचत ले बेरा पंगपंगागे। गांव के बाहिर एक झन ठेठवार ह गरवा चरात रहय। उही मेरन ठग मन जग ला खटिया सहित सुता दिन अउ अपन मन बहिर भांठा चल दिन।
ठेठवार ह देखथे कि खटिया म जियत मनखे ह बंधाय हे। तब ओहा पूछिस-‘‘ कस भैया! येमन तोला अइसन मुर्दा असन खटिया म बाँध के कहां लेगत हे।‘‘
जग ला बोचके के मउका मिलगे। वोहा किहिस-‘‘काला बताबे संगवारी। ये मन ये राज के राजा के करमचारी आय। मैंहा बिहाव नइ करव कहिथव तभो ले राजा ह अपन बेटी संग मोर जबरन बिहाव कराना चाहत हे। तेखरे सेती येमन मोला बांध के लेगत हे।‘‘
ठेठवार किहिस-‘‘ मोर बिहाव आज ले नइ होय हे भैया। तैंहा बिहाव नइ करव कहिथस फेर मोला बिहाव करे के गजब साध लागथे। तोर मन होतिस ते तैहा ये खटिया म मोला बांध दे अउ तैहा मोर खुमरी कमरा ला पहिर के इहां ले भाग जा। तैहा बिहाव कराय ले बाँच जबे अउ मोर बिहाव कराय के साध पूरा हो जही।‘‘
जग ह उप्पर छावा तो नहीं-नहीं करत रहिस फेर मने मन अब मोर जीव बाँचगे ददा कहिके एकदम खुश होगे। ओहा तैयार होगे। ठेठवार ह ओखर हाथ-गोड़ के बंधना ला छोर दिस। जग ह खटिया ले उठगे अउ ठेठवार ला खटिया म सुता के ओखर गोड़-हाथ ला बांध दिस। अउ अपन ह ओखर खुमरी-कमरा ला पहिर के बंशी बजावत गरवा चराय लगिस।
ठग मन बहिर भांठा ले निपट के आइस। अउ खटिया ला देखे बिना अपन रद्दा रेंगे लगिन। दहरा कोती लेगत देखके ठेठवार ह अड़बउ हाथ-पांव जोड़िस, अर्जी बिनती करिस, जग के सब बात ला सफा-सफा बताइस फेर ठग मन ओखर एको बात ला नइ सुनिन अउ ओला लेगगे के दहरा म फेंक दिन। दहरा के गहरी पानी म बुड़ के ठेठवार ह मरगे। ठग मन समझत रिहिन कि जग ला मार डारे हन फेर जब उही रद्दा म लहुटिन तब देखथे कि जग ह बंशी बजावत गरवा चरावत रहय। ठग मन बक खागे।
बड़े ठग ह किहिस-‘‘ अरे जग! हमन तो तोला दहरा के गहरी पानी म फेंक के मार डारे हन फेर तैहा कइसे जीं गेस? अउ ये बड़े-बड़े भंइस-भंइसा मन काखर आय जउन ला तैहा चरावत हस।‘‘
जग ह मुस्कावत किहिस-‘‘ बड़े भैया। तुंहर उदिम के सेती तो मैंहा मंडल होगे हवं। जउन दहरा म तुमन मोला फेंके रहेव उहां के देवता मोला देख के खुश होगे अउ बरदान म ये भंइस-भंइसा मन ला मोला दे हावे। जब मोला एके झन ला अतेक अकन भंइस-भइंसा मिले हे तब तुमन तो छै भाई हो। कहूँ तुमन मन दहरा के पानी म कुदहू तब सोंचव कतेक अकन भंइस-भंइसा मिलही?‘‘
सबो ठग मन एक-दूसर ला देखे लगिन। मने मन सुन्ता होइन अउ भैंस भैंसा के लालच म एके संघरा उही दहरा के पानी म कूद पड़िन। पानी म बोजाके सबो झन ठग मन मरगे। अउ जग ह अपन घरवाली संग बने खइस-कमाइस, राज करिस। मोर कहिनी पुरगे दार भात चुरगे।
बोड़रा, मगरलोड
जिला-धमतरी , छत्तीसगढ़
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