छत्तीसगढ़ी लोक कथा
तिलोत्तमा अउ चौरसिया
वीरेन्द्र सरल
एक गाँव म डोकरी अउ डोकरा रहय। डोकरी- डोकरा मन अड़बड़ गरीबी म जियत रहय। डोकरा ह बनी- भूति करय अउ डोकरी ह पर घर कुटिया -पिसिया। डोकरी डोकरा के एको झन लइका नइ रिहिस। अइसने -अइसने गजब दिन बीतगे ।
डोकरी -डोकरा के चौथापन आगे ओमन सियान होय लगिन तहन जांगर घला थके ल धरलिस। डोकरी -डोकरा मन रात -दिन गुनय अभी तो थोड़ -बहुत जांगर चलत हे तब कमा- खा लेवत हन। जब जांगर ह निचट थक जही तब कइसे करबो?
डोकरी ह रात दिन लइका पाय के मन करय तब डोकरा ह ओला समझावत कहय - "अरे डोकरी! इहां तो हमन अपने पेट ला नइ भर सकत हन अउ तैहा लइका के साध करथस। ये गरीबी म हमरे पेट भर खाय के न तो जेवन हे अउ न तन भर पहिरे के ओन्हा अउ तोला अपन वंश बढ़ाय के संशो पड़े हे, लइका आही तब कइसे पोंसबो?"
डोकरा ह कतको समझावय फेर माईलोगिन के जात डोकरी ह समझबे नइ करय अउ रात -दिन लइका पाय के चिन्ता म घूरत रहय।
डोकरी ह रोज दिन भगवान ला गोहारत कहय -"हे भगवान! मोरो कोख ल चिन्ह देते। मोरो डेहरी म दीया बारे बर लइका भेज देते। अइसने गुनत -गुनत डोकरी के दिन पोहावत रहय फेर भगवान ह ओला चिन्हबे नइ करिस।
डोकरी -डोकरा मन जब कमा - धमा के आवय तब खाय के बाद बांचे चंउर ला एक ठन कोठी म छाब देवय। एक दिन डोकरी ला बनी के रूप म तिल सकरात के दिन गाँव के गौटनीन ह थोड़किन तिली दे दिस तब डोकरी ह तिली ला थोड़किन बंचा के दूसर कोठी म छाब दिस।
अइसने ढंग ले जिनगी बीतत रिहिस। एक बेर अइसे होइस कि डोकरी -डोकरा ला बहुत दिन ले कहूं मेर काम-बुता मिलबे नइ करिस। ओमन कई दिन ले लांघन- भूखन रिहिन तब डोकरी ला घर के कोठी म छाबे चंउर अउ तिली के सुरता अइस काबर कि आघू म देवारी के तिहार घला रिहिस। डोकरी ह कोठी ला खोल के देखिस तब अकबकागे।
कोठी ले तिली के जगह एक झन सुघ्घर कैना निकलिस अउ डोकरी ह जब चंउर के कोठी ला खोल के देखिस तब उहू म एक झन सुघ्घर कैना निकलिस। डोकरी गजब खुश होइस अउ ये बात ला डोकरा ला बताइस।
दुनो झन कैना मन ला देख के डोकरा ह घला खुशी के मारे नाचे लगिस। खुशी के मारे उंखर भूख -पियास भगागे। ये कैना मन ल ओमन भगवान के किरपा समझ के उंखर पालन -पोषण करे लगिन।
डोकरी -डोकरा मन चंउर कोठी ले निकले कैना के नाव चौरसिया अउ तिली के कोठी ले निकले कैना के नाव ला तिलोत्तमा रख दिन।
अइसन ढंग ले अब डोकरी -डोकरा के जिनगी ह हंसी- खुशी बिते लगिस। लइका मन बाढ़िस तहन घर के खरचा पानी घला बाढ़गे।
येती डोकरा ला संशो होय लगिस कि कैना मन दिनो -दिन बाढ़त हे, बड़ सुघ्घर राजकुमारी मन असन दिखथे ये कैना मन। कइसनो करके इंखर बिहाव हो जतिस तब येमन अपन घर म बने सुख से कमातिन - खातिन।
एक दिन डोकरा ह खीर रांधे बर किहिस अउ नहाय बर तरिया चल दिस। येती तिलोत्तमा अउ चौरसिया दुनो बहिनी सबो खीर ला अपन दाई मेर मांग- मांग के खा डारिन। डोकरा बर थोड़किन खीर ल ओमन बचा के राखिन।
डोकरा ह तरिया ले नहा के जब घर आइस अउ खीर खाहूं कहिके बइठिस तब थोड़किन खीर ला देख के ओहा गुस्सा म तमततागे। ओखर एड़ी के रिस तरवा म चढ़गे।
खीर सिराय के कारण ल जब डोकरा ह डोकरी ला पुछिस तब डोकरी ह साफ -साफ बता दिस। डोकरी ह किहिस- "ले लइका जात आय आज सबो खीर ला खा डारिन तब काय होइस एको दिन अउ बना के बने मनभरहा खाबो। आज तो अतेकेच म मन ला मढ़ा लेवव।"
डोकरा तो गुसियाागे रहय ओहा मने मन अपन लइका मन ले छुटकारा पाय के उपाय खोजे लगिस। डोकरा ह एक दिन चाल चलत अपन बेटी तिलोत्तमा अउ चौरसिया ला जंगल म चार-तेन्दू खाय बर जाबो कहिके लालच दिस। दुनो बहिनी तैयार होगे अउ तन म एक -एक ठन पटुका ल पहिर के अपन ददा संग जंगल जाय बर निकलगे।
जंगल के बीच डोकरा ह ओमन ला मन भर के चार- तेन्दू खवाइस। जब सझांती होगे तब कैना मन अपन ददा ला किहिन-" चल ददा ! अब अंधियार होवत हे, घर जाबो दाई ह हमर मन के रद्दा देखत होही। पियास म टोटा घला सुखाय बर धरत हे।
डोकरा हव कहि दिस अउ फेर मिटका दिस, जब जादा मुंधियार होय लगिस अउ लइका मन घर आय के जिद करे लगिस तब डोकरा ह किहिस-" बेटी हो! तुमन ये दे बड़का रूख म चढ़े रहव। अब बघुआ -भालू के आये के बेरा होवत हे। मेहा थोड़किन बहिर भांठा ले आवत हवं। अइसने ठग के डोकरा ह अपन बेटी मन ला जंगल म छोड़ के अपन घर लहुटगे।
ददा के गोठ ला दोनो बहिनी मन भल -ला - भल जानिन, अपन ददा के छल के ओमन गम नइ पाइन। दुनो बहिनी पेड़ के फिलिंग म चढ़के बइठ गे। येती मुंधियार ले रात होगे , रात ले अधिरतिहा होगे फेर ओखर ददा ला न आना रिहिस अउ न वोहा आइस। दुनो झन डर के मारे कांपत - कांपत कइसनो करके रात ला बिताइन।
बिहान दिन उही घनघोर जंगल मे ओ राज के राजा के बेटा अउ दीवान के बेटा ह शिकार खेले बर आइन अउ सुस्ताय बर उही पेड़ के खाल्हे म बइठिस जेमे तिलोत्तमा अउ चौरसिया ह बइठ के रोवत - कलपत रात बिताय रिहिन।
राजा अउ दीवान के बेटा मन उही पेड़ के खाल्हे म बइठ के थिरावत रिहिन। वतकेच बेरा ओमन ला कोन्हों नारी- परानी के सुसके के आरो मिलिस तब ओमन सोचिन, अहा, बियाबान घनघोर जंगल म कोन नारी -परानी रोवत हावय । अइसे कहिके चारो मुड़ा ल निहार के देखिन। फेर कुछ दिखबे नइ करय । ओमन चारो मुड़ा ला घूम- घूम के देखय फेर उंखर धियान ओ पेड़ के उप्पर कोती नइ जावत रिहिस।
ओमन फेर सुसताय लगिन तब कैना मन के आंखी के ढारे आंसू ह ढुलक के गिरिस जउन ह राजकुमार के गाल म पड़िस अब राजकुमार ह अरझकहा पेड़ के उप्पर कोती ल देखिस तब ओला उहां दू झन कैना बइठे दिखिस।
पहिली तो राजकुमार अउ दीवान के बेटा घला डर्रागे। दीवान के बेटा ह हिम्मत करके किहिस- "ये घनघोर जंगल म तुमन कोन जीव आव अउ तुमन ला काय दुख पड़े हे जउन अतेक बिहिनिया ले तुमन रोवत - कलपत हव। हमन मनखे जीव आवन। कहूं तहू मन मनखे जीव होहु तब खाल्हे म आ जाव हमन तुमन ला कहीं नइ करन। डर्रावव झन।"
दीवान के बेटा के बात ला सुन के तिलोत्तमा ह पेड़ के उपर ले किहिस- "हमु मन मनखे जीव आवन। काली संझा इही पेड़ म चढ़ा के हमर ददा कोन जनी कहां चल दिस ते अभी तक नहीं लहुटे हावे। हमन लटपट ये रात ला इहां आधा डर आधा बल करके बिताय हवन। हमन तुंहर तीर कइसे आवन हमर तन म घर के पहिरे एक -एक ठन पटुका रिहिस तहू मन काली रतिहा के हवा गरेरा म उड़ागे हावे। हमन बिन कपड़ा के इहां बइठे हावन।"
तिलोत्तमा के बात ला सुनके राजकुमार अउ दीवान दुनो झन ह अपन -अपन मुड़ ले अपन पगड़ी ला निकाल के पेड़ के उप्पर कोती उछालत किहिन -"ले, ये पगड़ी मन ला झोंकव अउ पहिरव। अउ येला पहिर के खाल्हे म आके सब बात ला साफ -साफ बतावव।"
दुनो बहिनी उही पगड़ी मन के ओनहा पहिर के पेड़ के खाल्हे म उतरिन अउ अपन राम कहानी ला राजकुमार अउ दीवान के बेटा मेरन साफ -साफ बता दिन।
तिलोत्तमा ह राजकुमार के पगड़ी ला ओन्हा पहिरे रहिस अउ चौरसिया ह दीवान के बेटा के पगड़ी ला ओन्हा पहिरे रहिस।
राजकुमार ह किहिस-"तुमन तो अब इहां निचट मुरही- पोटरी होगे हावव। तुंहर मर्जी होही तब बतावव हमन तुमन ला अपन रानी बनाके अपन राज म ले जबो। "
दुनो बहिनी सुन्ता होइन अउ तियार होगे। तिलोत्तमा ला राजकुमार ह अउ चौरसिया ला दीवान के बेटा ह अपन रानी बनाके अपन संग राज अपन राज म ले गिन।
धीरे -धीरे दिन बने कमावत - खावत दोनो बहिनी के दिन ह बीते लगिस । तिलोत्तमा ह रानी होगे अउ चौरसिया ह दीवानीन।
दुनो झन भले बहिनी रिहिन फेर दुनो के सुभाव म जमीन आसमान के अंतर रिहिस। रानी बने के पाछू तिलोत्तमा ल अउ जादा गरब- गुमान होगे ओहा अपन दाई- ददा ला भुलागे फेर चौरसिया निचट सरल- सुभाव के रहिस। ओला अपन दाई -ददा बर घात मया - पीरा रिहिस। ओहा घेरी -बेरी अपन दाई- ददा के सुरता करय अउ कभु -कभु सुरता करके आंसू ढारय। अपन दाई -ददा ले एक बेर भेंट करे के ओखर मन होवय।
एक दिन चौरसिया ह लक्ष्मी दाई के उपवास रिहिस।
येती डोकरी जब गम पाइस कि डोकरा ह दुनो झन बेटी ला जंगल म बरो के आगे हावे तब ओहा अपन करम ला ठठा के रहिगे फेर काय करतिस बपरी ह इही निर्दयी डोकरा संग तो सात भांवर किंजर के ओहा इंहा बिहा के आय रिहिस। सब ला जान के घला अपन हिरदे म पथरा रख के कलेचुप रहिगे।
कइसनो करके अपन दिन ला काटे लगिस। एक दिन डोकरा ह सियान होके मरगे अउ डोकरी के जांगर घला निचट थकगे अब ओला अपन बेटी मन के सुरता अउ जादा आय लगिस।
येती दुनो बहिनी अपन घर म बने सुघ्घर कमावत- खावत रहय अउ डोकरी ह अब भीख मांग- मांग के अपन गुजर -बसर करत रहय।
एक दिन डोकरी ह भीख मांगत -मांगत उही राज म पहुँचगे जिहां ओखर बेटी मन रानी अउ दीवानीन होय रिहिस। अपने बड़े बेटी के मुंहरन सही रानी ला देख के ओहा तिलोत्तमा कहि के हांक पार पारिस।
तिलोत्तमा अपन दाई ल चिन्ह घला डारिस फेर लोक -लाज के डर म ओहा अपन दाई ला दुत्कारत किहिस-"मैहा तोर बेटी नोहवं ये राज के रानी अवं। तैहा कभु मोला अपन बेटी कहिके कोन्हो ला झन बता। चल भाग इहां ले कहिके ओहा अपन दाई ला दुत्कार के पीढ़ा म फेंक के मार दिस अउ भगादिस।
डोकरी ह ओला सरापत -बखानत अउ कनिहा पीड़ा म दंदरत उहां ले निकलगे। डोकरी अब चौरसिया घर जाय बर घला डर्रावत रिहिस फेर काय करतिस बिचारी ह, एक तो बेटी के मया अउ दूसर रोगही गरीबी। ओहा आधा डर आधा बल करके चौरसिया के दुवारी म पहुँचगे।
चौरसिया ह अपन दाई ला चिन्ह डारिस । बने पानी पीढ़ा दिस अउ ओखर अड़बड़ मान - सम्मान करत ओखर सेवा -जतन करिस। कुछ दिन होइस तहन हाथ जोड़ के अपन दाई ले बिनती करत किहिस-"दाई! मैहा तोर सेवा - जतन तो करबे करहूं फेर तैहा मोर दाई अवं कही के कोन्हों ला झन बताबे। तोला मोर दाई आय कहिके ये राज के मनखे मन जानही तब मोर गजब हांसी उड़ाही अउ कोन्हो दीवान ला पता चल दिही तब उहू ह कोन्हो लाज शरम के मारे मोला घर ले निकाल दिही तब अड़बड़ फजीहत हो जही। मोर मरे बिहान हो जही। अभी दिवान ह राजा संग परदेश गे हावे, तेखर ले दीवान के आय के पहिली मोर घर ले जउन जिनिस लेगे के मन हे तउन ला ले जा अउ बेरा - बखत म जउन जिनिस के जरूरत होही उहू ल बतावत रहिबे, मैं भेजवावत जाहुं।" अइसे कहिके चौरसिया ह डोकरी के मोटरी म कुछ दिन बर चंउर दार जोर दिस। डोकरी के चिरहा लुगरा ला हेर के ओला अपन नवा लुगरा ला पहिरा के बिदा कर दिस।
डोकरी ह चौरसिया ला अड़बड़ आशिष देवत कुछ दिन उहां रहे के बाद बिदा होगे।
डोकरी अपन घर जाय बर निकलगे तब चौरसिया ह अपन दाई के चिथरा लुगरा ला मोटरी म बांध के घर के कोन्टा के एक ठन अइसन खूंटी म टांग दिस जे मे काखरों नजर पड़बेच नइ करय।
एक दिन के बात आय जब दीवान परदेश ले घर लहुटिस अउ घर म ठेल्हा रिहिस तब घर म येती ओती किंजरत रहिस तभे उदुप ले उही मोटरी म ओखर नजर पड़गे। दीवान ह चौरसिया ल ये मोटरी म काय हावे कहिके पूछिस तब चौरसिया किहिस-" कहीं नइ हे, मइके ले दाई ह मोर बर तिजहा लुगरा भेजे हावे तउन ला इही मोटरी म बांध के इही मेर टांग दे हवं।"
दीवान ह तिजहा लुगरा ल देखे के जिद करे लगिस। तब चौरसिया ह भेद खुले के डर म देखाय बर तियार नइ होवत रिहिस।
दीवान ह अड़बड़ जिद करिस तब चौरसिया ह पहली आंखी मूंद के अउ हाथ जोड़ के भगवान के मने मन सुमरनी करिस -" हे भगवान! आज मोर लाज ला बचा ले। मोटरी के चिथड़ा ला देख के दीवान भड़क के मोला घर ले निकाल झन दे। मोर महतारी के लाज ला रख दे भगवान।" भगवान ला सुमर के ओहा मोटरी ला खोल के दीवान के आघू म मढ़ा दिस अउ अपन ह कांपत डर्रावत आँखी मूंद के कोंटा म लुकागे।
येती दीवान ह मोटरी ला खोल के देखिस तब ओमे सोना- चांदी, हीरा -मोती, पन्ना- पुखराज भराय रहय। रंग- रंग के गहना -गुरिया अउ सोन के मोहर भराय रहय। ये सब ला देख के दीवान ह दंग रहिगे ओहा तो अभी तक चौरसिया ल निचट मुरही -पोटरी अउ गरीबिन समझत रिहिस फेर ये चौरसिया तो कोन्हो राज के राजकुमारी आय तभे तो तीजा के लुगरा संग अतेक अकन कीमती चीज ह इहां आय हे ।
दीवान ह खुश होके चौरसिया ला अपन तीर म बला के ये सब ला देखाइस अउ हांसत किहिस-"अरे तैहा अतेक बड़े राजा के बेटी होके घला आज ले मोला कुछू नइ बताय हस। अइसने जाने रहितेन तब कभु - कभु अपन ससुरार आवत -जावत रहितेन। अब तो हम दुनो झन कालिच तोर मइके जाबो अउ तोर माता -पिता के दरशन करके आशीरवाद ले के आबो अउ हमर उहर ले अपन शक्ति भर कोन्हो चीज घला भेंट करबो। अरे! ओमन अतेक कीमती चीज भेजे हावे तब हमरों तो कुछ फरज बनथे कि नही?"
दीवान के गोठ ला सुन के अउ आघू के मोटरी म माढ़े सब जिनिस ला देख के चौरसिया ह बोकवाय खड़े रहिगे। ओला कुछु समझ म नइ आवत रिहिस। ओहा ये सब ला भगवान के किरपा समझ के मने मन भगवान ला अपन लाज बचाय बर धन्यवाद देवत प्रणाम करिस। फेर दीवान के जिद ला देख के अपन मइके जाके भेद खुले के डर म ओहा कांपे लगिस। दीवान ह बिहानेच दिन चौरसिया संग अपन ससुरार जाय के तैयारी कर डारिस।
येती चैरसिया ह संशो म बुड़गे कि हे भगवान अब काय होही। एक बेर मोर लाज ला अउ बचा प्रभु! भगवान ह ओखर गोहार ला सुन लिस।
दीवान संग रथ म बइठे चौरसिया ह मइके जाय बर निकल तो गे फेर कहां जहूं कहिके मने -मन रोय लगिस। ओखर तो आंखी म अंधियार पड़गे रहय फेर काय करतिस बपरी ह । राजा के डर ते बबा के डर।
ओहा बीच जंगल म अपन रथ ला रोकवाइस अउ दुवार -पानी जाय के बहाना करके जंगल म रथ ले थोड़किन दुरिहा म जाके आंसू ढारे लगिस। उही मेर ओला एक ठन भिंभोरा दिखिस।
चौरसिया ह सोचिस इही भिंभोरा म अपन हाथ ला डार देथवं, ये मे कोन्हों सांप होही तउन ह मोर हाथ ल डस लिही तहन ओखर जहर म मोर जीव छूट जही अउ मैहा मर जहुं। तहन का के मइके अउ का के ससुरार। मोर मरे बाद दीवान ह घर लहुट जही अउ महूं ह ये जंजाल ले बांच जहूं। फजीहत करा के मरे ले तो अइसने मरना बने हे।
अइसने सोच के चौरसिया ह अपन हाथ ला उही भिंभोरा के बिला भीतरी डार दिस। ओ बिला म एक नांगराज के बसेरा रहय जेखर पीठ म जब्बर पाठा घाव होय रहिस। घाव के पीरा म नांगराज ह गजब हलाकान रहय। चौरसिया के हाथ के ठोकर ले ओखर घाव ह फूटगे अउ नांगराज ला तुरते पीरा ले मुक्ति मिलगे।
नांगराज ह बिला ले बाहिर निकल के देखिस तब चौरसिया ह आंसू ढारत खड़े रहय।
नांगराज ह पुछिस तब चौरसिया ह अपन राम कहानी सुना के गोहार पार के रो डारिस।
नांगराज किहिस-" बेटी ! तैहा थोड़को चिन्ता- फिकर मत कर, तैहा मोर पीरा ल हरे हस तब मैहा तोरो पीरा ल हरहूं। तैहा इहां ले पूरब दिशा म एक कोस दूरिहा जा, उहां तोला एक ठन महल दिखही उही ला अपन मइके समझ के जतका दिन ले तोर मन होही ततका दिन ले रहिबे। उहां तोला कोन्हों परकार के दुख नइ होवय अउ तोर मइके ला देखके दीवान ह घला गदगद हो जही। मैहा ओ महल के मालिक राजा के कुल देवता अवं।"
चौरसिया ह एक मन के आगर नांगराज के तीर ले लहुटिस अउ रथ म बइठके हांसे -कुलके लगिस। दीवान ह हांसे के कारण पुछिस तब किहिस-" अई! हम अपन मइके के तीर म आगे हवन तब खुशी तो होबेच करही। "
ओहा दीवान ला नांगराज के बताय रद्दा ला देखावत चलिस। सिरतोन म एक कोस असन रथ ह चलिस अउ एक राज आगे। उहां के सतखंडा राजमहल के मोहाटी म राजा -रानी मन अपन बेटी -दमांद के सुवागत करे बर खड़े रहय।
राजा- रानी मन चौरसिया ला अपन बेटीच असन मान- सम्मान देवत परघा के अपन महल म लेगिन अउ गजब आवभगत करिन। उहाँ के राजकुमार अउ राजकुमारी मन चौरसिया अउ दीवान ला अपन सगे बड़े बहिनी अउ भांटो असन मया करिन। गजब हांसी -ठिठोली करिन। दू दिन के रहवइया चौरसिया अउ दीवान ह उहां महीना भर ले रहिगे।
जब अपन घर -दुवार के चिंता होइस तब ओमन अपन घर आय बर राजा -रानी ले बिदा मांगिन।
राजा -रानी मन अपन बेटी - दमाद ला गजब अकन हीरा- मोती, पन्ना -पुखराज अउ काठा भर सोन के मोहर उपहार देवत ओमन ला बिदा करिन।
दीवान अउ चैरसिया ह जब गजब अकन कीमती चीज धर के जब अपन राज म आइस तब ये बात के पता तिलोत्तमा ल लगिस । ओहा तुरते चौरसिया ल अपन महल म बलाके सब बात ला पुछिस।
चौरसिया ह दीवान के जिद अउ अपनी पीरा ला बतावत सब बात ला साफ- साफ बता दिस।
तिलोत्तमा के मन म लालच हमागे अउ उहु ह अब राजा ला अपन मइके जाय के जिद करे लगिस।
एक दिन तिलोत्तमा घला अपन राजा के रथ म बइठ के अपन मइके जाय बर निकलगे।
चौरसिया के बताय ठउर म जाके भिंभोरा भीतरी अपन हाथ ला डार दिस। ओ समय नांगराज ह सुते रहय। तिलोत्तमा के हाथ के ठोकर लगिस तब ओखर नींद उमचगे, ओहा गुसिया के तिलोत्तमा के हाथ ला डस दिस। नांगराज के डसे ले तिलोत्तमा रानी उही मेर मरगे।
राजा ह तिलोत्तमा के लाश ला धरके रोवत- कलपत अपन राज म लहुटिस अउ सब किरियाकरम ला कराईस। तिही पाय के कहे जाथे मिहनत के फल मीठा अउ लालच के घर खाली। संसार के सबो जीव म एके आत्मा के वास होथे हम कोन्हों जीव बर दया करके ओखर मदद करथन तब कोन्हों जीव घला हमर बर दया करके हमर मदद करथे। मया देबे तब मया पाबे अउ गारी दे बे तब गारी। जइसन बोंबे वइसनेच पाबे। मोर कहिनी पुरगे, दार भात चुरगे।
बीरेंद्र सरल
बोड़रा, मगरलोड
जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़
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