Saturday, 14 February 2026

विद्रुपता मन ले आहत कवि-मन के पीरा आय - 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'*


 *विद्रुपता मन ले आहत कवि-मन के पीरा आय - 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'*


*संग्रह - दिन म घलो ॲंधियार हवय*

*रचनाकार - डॉ पीसी लाल यादव* 

*प्रकाशक - वैभव प्रकाशन रायपुर, छत्तीसगढ़* 

*वर्ष - 2025*

*कापीराइट - रचनाकार*

*पृष्ठ संख्या - 71*

*मूल्य - 200/ रुपये*

        डॉ. पीसी लाल यादव लोक संस्कृति के मर्मज्ञ हवॅंय। लोक संस्कृति ला लेके अपन लेखनी ले लोकजीवन के जम्मो ताना-बाना ला उकेरे मं उन मन लगे हवॅंय। अपन इही प्रयास मन ले उन कभू गद्य रचना रचथें। कभू लोकगीत मन ले ममहावत अपन गीत अउ कविता मन बर अपन कलम धरथें।  उॅंकर इही प्रयास मन मं एक हे, 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'। जउन छत्तीसगढ़ी गीत, कविता अउ गजल मन के संग्रह के रूप मं प्रकाशित हे। अइसे उॅंकर गीत ला पारंपरिक गीत मन के श्रेणी मं रखे जाय त जादा बेहतर होही। उॅंकर गीत मन के सुर लोकजीवन के सुर आय। जउन मं श्रमशील लोक अपन अनुभव ले अपन गोठ बिना कोनो लाग-लपेट के रखथें। अइसन मं लोकगीत मन या लोक के सृजन ला साहित्य के शास्त्रीयता (शिष्ट साहित्य) के कसौटी मं कसई या परखई ह लोकजीवन के मनोभाव संग नियाव नइ होही। लोकजीवन अउ उॅंकर दिनचर्या ला कोनो भी विधा के शिल्प मं सॅंजोए के उदिम असंभव तो नइ हे फेर कठिन जरूर हावय। शिल्प मं जाय ले, ओकर भाव पक्ष कमजोर होय धर लेथे। 

       अइसे तो डॉ. पीसी लाल यादव के ए प्रयास सराहनीय भर नइ हे, बल्कि स्तुति के लाइक हे। भाव पक्ष सशक्त हे। डॉ पीसी लाल यादव के बारे मं ए कहई प्रासंगिक होही कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन बर उन मन लोक के धरती ऊपर लोक संस्कृति, लोक साहित्य और लोक कला रूपी नदिया मन ला संरक्षण देहे के बड़का बीड़ा उठाय हवॅंय। 

      'दिन म घलो ॲंधियार हवय' 2025 के आखिर मं प्रकाशित उॅंकर नवा कृति आय। शीर्षक ध्यान आकर्षित करथे।एमा आम जन के पीड़ा ला लेके उॅंकर संसो-फिकर हवय। ए संग्रह मा उॅंकर 51 रचना मन शामिल हवॅंय। गिनती के मुताबिक एहर अटल जी के सुरता कराथे। संगे संग 'जइसन मैंहा लिखत हॅंव, तइसने बस दिखत रहॅंव।' दिल की बात मं लिखे गे डाॅंंड़ घलो अटल जी के सुरता दिलाथे। जउन म ओमन लिखे रहिन कि .....मुझे इतनी ऊंचाई मत देना....।

      मोर नजर मं ए किताब लोक के ऊपर लिखे गे अउ लोक ला समर्पित हवय। पहलीच घलो कहे हवॅंव कि एमा शामिल जम्मो रचना मन ला शिष्ट साहित्य के मानक शिल्प मं कसना एकर संग नियाव नइ होही। लोक के रचना लोक बर लोक स्वर मं हे। इही एकर खासियत ए। 

      संग्रह के पहलीच दू डाॅंड़ प्रतीकात्मक रूप मं लोक जीवन बर बड़का संदेश देथे, जउन मं उन लिखे हवॅंय-

              बेरा-कुबेरा तैं आबे बादर।   

              तब कइसे तैं पाबे आदर।

      उॅंकर ए डाॅंड़ 'तुलसी वहाॅं न जाइए, जहाॅं न बरसे नैन।...' उन ला तुलसीदास जी के लोक धारा ले जोड़त नजर आथे। बादर ला पहुना रूप मं देखे ले संदेश अउ स्पष्ट हो जथे। 

     कहे गे हवय कि साहित्य मं प्रतिरोध के स्वर होना चाही। पटरी ले उतरत व्यवस्था ला पटरी मं लाने के जिम्मा साहित्य अउ साहित्यकार के होथे। ए संग्रह मं ए डहर इशारा हवय। 

दारू भट्टी भरोसा सरकार चलत,

उन्ना के दुन्ना जऊॅंहर भइगे।

    प्रकृति के मानवीकरण ए संग्रह मं भरपूर हे। प्रतीक मन के माध्यम ले डॉ पीसी लाल यादव अपन बात पाठक तक सहजता ले पहुॅंचात दिखथें जइसे -

बाज के डर शिकारी के डर।

सुवा चना ल फोलय नहीं।

      एमा बाज अउ शिकारी शोषक के प्रतीक हें त सुवा शोषित के।

      साहित्य के मूल स्वर ले जुरे डॉंड़ देखव, जेन मं कवि के पूछे प्रश्न यक्ष प्रश्न जनाथे।

एक घर हॅंड़िया परे हे लांघन।

दूसर कूद-कूद के देवे भासन।

गरीब कइसे आगू बढ़ही तहीं बता?


एक ठन अउ उदाहरण-

बड़े-बड़े सपना देखा के लूटथे कोई,

सरलग ठग फुसारी कब तक चलही। 


    संग्रह मं एक कोति गॅंवई जीवन मं आपसी प्रेम अउ सहकार के भाव के जीवन्त चित्रण हवय। लोक मं प्रचलित अनूठा चलन मन के झलक हें। उहें दूसर कोति कुछ लोगन के तीर्थ यात्रा ला लेके चुटीला व्यंग्य घलव हवय।

माली ल घलो जुच्छा नइ फेरे।

साग-पान धरके देथे परोसी।

    

दाई-ददा हवय तोर घर देवता।

बेकार हे तोर जात्रा पंचकोसी।


    मनखे के भीतर घटत मनखेपन ले आहत कवि के बोल ए तरह फूटे हवॅंय -

इरखा-बैर ह भोगावत हे रोज़,

दुबरावत हवय मीत-मितानी।


मिले के मिले ठगत हवे मनखे,

छल-कपट म सनाय मीठ बानी।


हाथ मा फूल अउ दिल मा आरी हे।

आज काल मिलत अइसने संगवारी हे।


दर्शन के भाव समेटे मं उन पीछू नइ हें। संग्रह ला पढ़े मं सबो के लइक कविता मिलथे। संवेदनशील मनखे ला समाज के पीरा ओकर अपन पीरा जनाथे। कवि ने 'नवा साल के बधई' गीत मं इही ला अभिव्यक्ति दे हवॅंय।


     संग्रह के मुख पृष्ठ आकर्षक हवय। शीर्षक के भाव घलाव उभर के आय हे। काग़ज के क्वालिटी बहुते बढ़िया हे। छपाई अच्छा होय हे। एक-दू जगह प्रूफ रीडिंग के कमी नजर आइस, जउन होना नइ रहिस। यहू बात हवय कि अर्थ नइ बिगड़े ले, एला नजरअंदाज करे जा सकथे। 

     गीत अउर ग़ज़ल काव्य के विधा हरे। जम्मो गीत अउ ग़ज़ल कविता माने जाथे फेर जम्मो कविता ला गीत या ग़ज़ल नइ कहे जा सकय। पारंपरिक गीत ला छोड़ देवन तौ गीत अउ ग़ज़ल के अपन शिल्प होथें, जेन मं ए संग्रह के जादातर रचना मन फिट नहीं बइठॅंय। अइसन मं ए संग्रह ला मोर नजर मं केवल काव्य संग्रह लिखना बेहतर होतिस। 

     भाषाई दृष्टि ले ध्वन्यात्मक शब्द, बिसरावत ठेठ छत्तीसगढ़ी अउ मुहावरा मन के प्रयोग ले संग्रह उच्च स्तरीय बन गे हावय।

    

     आखिर मं एक वाक्य मं अतके कहिहूॅं कि डॉ पीसी लाल यादव के ए संग्रह अपन समय के विद्रुपता मन ले आहत कवि मन के पीरा हरे।

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पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा 

छत्तीसगढ़

मो: 6261822466

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