*दुख के कारन कहाँ हे?*
व्यंग्य -द्वारिका वैष्णव
दुख के कारन ये आय कि महूँ एक संवेदनशील मनखे अँव, भले शकल ले नई दिखँव। सुभाव मोर नीचट पेनपेनहा, रोनहा लईका के तरा हे। दूसर के दुख देखंव निहीं कि मोर भीतर के संवेदनशीलता हर जड़काला मा घाम मा राखे नरियर तेल के तरा टघले उपर टघले धरथे।
फेर ये दरी मोर संवेदनशीलता हर थोरकुन आहत कस होगे। कइसे? इही कहिनी ला एमेर आपके आघू राखत हंव। मोर नजर मा दुखी दिखत ये प्रानी ले अइसे तो न मोर कोनो नता-रिसता हे न जान-चिन्हार। बस सांझ के मोर घूमे जाय के समय ये डहर मा आत दिख जाथे। मैं जात रथंव वो आत रथे। वो एक सूरदास आय। बने ऊंच पूर, स्वस्थ, अच्छा पेंट कमीज पहिरे, काला चश्मा लगाय, अपन संगी के कांधा मा हाथ रखे बजार जात दिख जाथे। वोकर नाव नई जानँव ए पाय के मैं वोकर नांव सूरदास ही रख देत हंव। अइसे हम अंधा मन ला सूरदास ही कथन, भले ऊंकर नाम रेवालाल हो या हरि परसाद। वो डहर भर ऊंचा अवाज मा गोठियात दिखथे अउ वोकर संगी हाँ-हूँ कहत रथे। बस ! वोकर मोर अतकेच भेंट होथे। तबले मैं जे घंव वोला देखथों, हर बार वोकर अंधवा होय के दुख मा बुड़ जाथों। का करबे, संवेदनशीलता के कमजोरी ले अइसे हो जाथे। कपड़ा लत्ता, गोठ-बात ले वो भीख मांगत होही अइसे भी नई लगे। जइसे कि हम हर सूरदास के बारे मा सोंच लेथन। देख नई सके अतकेच कारन का पर्याप्त नइये कि वोकर जिनगी मा का कमी हे? मैं सोच मा पर जाथों" कइसे वो अतेक पहाड़ जइसे जिनगी ला बिताही? ये संगवारी वोकर कै दिन काम आही? लरे-परे मा कोन एकर सेवा जतन करही? कोन खाय-पीये बर कहीं? अगर जनम ले अंधरा होही ता बने करके रसगुल्ला काला कथें अउ बरा कइसे होथे, जानबे नई करत होही? हमर कस ये जंगल, नदी, पहाड़, मेला, तिहार, बरबिहाव, नाचगाना, प्रेम अउ प्रेमरोग ला घलो नई जानत होही?"
मोर हिरदे हर दुख मा पलपला गे अउ अतका सोंच के आंखी के कोन्टा हर भींज गे।
"बचपन मा ये न कभू तलाब मा कूद-कूद के नहाय होहीं न कभू छू-छूअउल, रेसटीप खेले होही। भौंरा, बाँटी, अउ रूख मा चढ़ के आमा बोईर टोरे ला भी नई जाने होही। पंगत के पतरी मा कहाँ मेर लड्डू अउ बालूसाही हे अउ कहाँ मेर बरा-पुड़ी कोन बतात होही? काबर मनखे ला अतेक दुख देथस भगवान! कोन एकर संग बिहाव करही? काकर लईका ल ये कोरा मा खेलाही? अंधवा बना के एकर तो जिनगी के सबो मजा ही छीन लेहे।"
भगवान ले मोर शिकायत बाढ़ते जात है। संवेदनशील मनखे एकर ले जादा कर का सकत है?
"अइसे दीन-हीन जिनगी ले तो एकर मर जाना अच्छा।"
मैं सीधा समस्या के आसान अउ अंतिम निदान मा आ जाथों। एती सूरदास कब के बाजार जा चुके है।
हमर सही छोटे अउ गरीब आम आदमी बर सुखी जिनगी के इही मतलब आय, जेकर ले सूरदास वंचित हो गय है। हमर जीवन के किताब मा सुख के मतलब अपार धन दौलत, गाड़ी मोटर, बंगला, बड़े-बड़े पद, कुरसी, विदेस भ्रमन अउ सुरा सुन्दरी जइसे पन्ना बिलकुल नइये। हम तो अतकेच मा खुस हन।
एक दिन सूरदास फेर दिखीस। आज वोकर हाथ मा एक ठन बड़े झोला रहिस। वो अपन साथी ले कहत रहिस "सुन ना चंदू! आज बने ताजा पइन्हा मछरी मिलही न! त आधा किलो ले लेबो, नई तो फेर चिकन तो मिलबेच करही। बड़ दिन होगे यार! एको पव्वा मारे।"
सुनके मोर संवेदनशील हिरदे ला थोरकुन चोट पहुँचिस। मैं एला जतेक दुखी समझथंव ओतका दुखी ये नई दिखे। फेर मैं सोचेंव "अरे एहू तो इंसान आय, एहू ला तो हर वो चीज खाय-पीये के अधिकार हे जेन हमन ला हे। एमा गलत का हे? "मोर मन मा वोकर तरफ के कोनो वोकिल कस अवाज उठिस।
"सोंच तो? ओकर जगह अगर तैं होते त का होतिस?" बस मोला वोकर दुख ला भोगे के कारन मिलगे। अब मैं डहर भर अपन ला अंधवा समझत चले जात रहेंव। मोर मुंह ले - "जाने वालों जरा मुड़ के देखो इधर, एक इंसान हूँ।" "दोस्ती" पिक्चर के गीत निकले लगिस। मोला उम्मीद रहीस, एको ठन गाड़ी मोर तीर आके रूकही अउ वोमा ले कोनो कहीं - "कहाँ जाबे बबा! आ बइठ गाड़ी मा मैं छोड़ देहूँ।" फेर अइसे नई होईस बल्कि एक ठन बाईक वाला भरपूर ब्रेक मारत आघू मा आगे कहिस "मरबे का डोकरा ? अंधवा अस का? अभी तो बोजा गे रहे।"
मैं होस मा आ गेंव। एकर ले जादा मोर ले अंधवा होय के एक्टिंग नई हो सके। फेर मोर सोचे के संवेदनशील घोड़ा दउड़ते रहिस "अगर मैं सचमुच अंधवा हो गेंव त का करहूँ? महाकवि सूरदास कस न मोर मन मा भगवान के भक्ति जागे हे न मैं महाकवि जॉन मिल्टन कस 'पैराडाईज लॉस्ट' लिख सकंव?" अब मोला अपन अतेक संवेदनशील होके सोंचे ऊपर गुस्सा आत रहिस।" घूमे निकले हस त बने प्रसन्न मन घूम, दुनिया के तमाम लफड़ा अपना मुड़ ऊपर काबर बोंह लेथस?" मन के भीतर ले ए दरी कोनो अउ वोकिल फटकारिस ।
ए बीच कतको दिन बीतगे। डहर मा सूरदास नई दिखीस। अउ मैं कोनो दुख भी नई देखेंव। ए पाय के मोर मुंह ले "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" अउ "बदन पे सितारे लपेटे हुए" जइसे बहुत से सियान मन ला नई सूट करने वाला गीत निकलिस। मोर
संवेदनशीलता भोथरा झन जाय ये सोंच के मैं सूरदास के बारे मा सोचेंव भी - "कहाँ गे होही? काबर नई दिखत हे? काहीं वोकर संगी छोड़ के भाग तो नई गे?" तभे संजोग ले सूरदास डहर मा आवत दिखगे। फेर ये का? आज वोकर संग ओकर संगी निहीं, एक जवान, बने पहिरे ओढ़े, आंखी मा काजर, मुँह मा लाली, माथा मा सेन्दूर लगाय नवा दुल्हन कस स्त्री रहिस। सूरदास ओकर बांही धरे हमेसा के तरह गोठियात आवत रहिस। तब का सूरदास के बिहाव होगे? पुराना आदत अनुसार अभी मोर धियान सूरदास उपर नई होके वोकर बाई तरफ रहिस। "अतेक जवान टूरी अउ ये सूरदास?" देख के कोन जनि काबर बने नई लगिस।
तभे मन के भीतर ले ओकर डहर के वोकिल फेर खड़ा होगे, कहिस "अरे तहूँ तो चाहत रहे एकर जिनगी मा कोनो होतिस जेन एकर धियान राखतिस। अब का तकलीफ हे? सूरदास ला भी वो सब खुशी पाय के अधिकार हे जेन समान्य आदमी ल है। भगवान सब के साथ न्याय करथे अउ दुख काकरो जीवन मा सदा के लिये नई रहे।"
वोकिल के बात तो ठीक हे फेर मोर उही भगवान ले अब अतकेच बिनती हे कि बिहाव करे हर सूरदास के दुख पाय के दूसर कारन झन हो जाय। बाकी मोला कोई तकलीफ नइये। मैं अपन संवेदनशीलता के उपयोग कहूँ अउ कर लेहूँ।
अब भी मोला सूरदास बाजार आवत अपन बाई संग दिख जाथे फेर अब अंतर अतके दिखथे कि अब सूरदास चुप, सुनत दिखथे अउ बाई बोलत, बहुत बोलत दिखथे। अब कोनो बताहू, दुख के कारन कहाँ हे?सूरदास मा, ओकर बाई मा, या फेर मोरे मा?
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