नान्हें कहिनी
ओखर खुसी
दुलारी ह साग भाजी के टुकना बोहे कालोनी डहर जात रहिस।ओला कालोनी कोती जात देखत समारू ह कहिस-"कहाँ जावत हस ओ दुलारी ।कालोनी म कोनो तो तोर साग भाजी ल नी बिसाये ।कालोनी वाला मन तो हमर असन गली -गली म बेचाईया मन ले कुछु जिनिस नी बिसाये ।ओमन तो आन लाइन जिनिस बिसाथे।तै ओती काबर जावत हस?"
दुलारी ह हांसत कहिस -"सही कहत हस भैय्या , फेर वो बारा नम्बर वाली मेम साहब हे न तेखर सियानिन सास ह गांव ले आये हवे। ओहा अपन बालकनी म एके झि बैठे रहिथे।एक दिन मोला देखिस त बुलाइस अउ कहिस।आना ओ बेटी का धरे हस?अउ मोर सन बड़ बेरा ले गोठियाइस ।बताइस कि ओखर बहु-बेटा मन नउकरी करथे। दु झि पोता मन बिहनिया ले स्कूल चल देथे सांझ कुन ओमन आथे अउ अपन-अपन काम म लग जाथे।मेहा दिन भर अउ रात कन घलो अकेल्ला पड़ जाथो ।एखर ले बने मोर गांव रहिस है।उहाँ पारा परोस के मन घर म आवे-जावे।सुख-दुख गोठियावय।इहा सहर म जम्मो घर के दुवार फ़ईका मन बंद रहिथे।कोनो परोसिन एक दूसरे ले कोनो वास्ता नी राखे। सुन ओ बेटी तें हा आथस त दु घड़ी गोठिया लेथो त मोला बड़ खुसी होथे।
बस समारू भैय्या एखरे कारण मेहा सियानीन तीर ये कालोनी म जाथो ताकि सियानीन ल खुशी होय।ओखर चेहरा म खुसी देखके और सुकून देख के महुँ ल खुसी लागथे।"
ये सुनके समारू कहिस- "बढ़िया काम करत हस ओ दुलारी बहिनी।अइसने सोच सबके होना चाहिये।"
डॉ. शैल चन्द्रा
रावण भाठा, नगरी
जिला-धमतरी
छत्तीसगढ़
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