Saturday, 14 February 2026

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा लेड़गा के कड़ही वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा


लेड़गा के कड़ही

वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक गांव म एक झन डोकरी रहय। डोकरी के एक झन बेटा रहय, गांव भर के मनखे ओला लेड़गा कहय। लेड़गा ह काम-बुता कुछु करय नहीं बस गोल्लर कस झड़के अउ गली-गली किंजरय। डोकरी बपरी ह बनी-भूती करके अपन गुजर-बसर करत रहय। 

       एक दिन डोकरी ह किहिस-‘‘ कस रे धरती गरू लेड़गा। अब तो तैहा जवान होगे हस अउ मोर जांगर थकगे हे। कहीं काम-धाम नइ करबे तब हमर गुजारा कइसे होही? तोर देहें पांव भर बाढ़े हे अक्कल-बुध ला घला बढ़ाके कुछु काम करबे तभे तो जिनगी चलही।

         फेर लेड़गा ह तो लेड़गा रहय। फकत नाम के नहीं बल्कि पक्का काम के घला। अपन संगी -जहुंरिया मन के बिहाव होवत देखे तब उहू ला अपन बिहाव करे के साध लागे। गांव म जेखर घर बिहाव होवय, उहां लेड़गा ह बिहाव के झरत ले अपन अड्डा जमा देवय। लेड़गा ह बिहाव के नेंग नत्ता ल बड़ा धियान से देखे तब सगा सोदर मन ओला तहु बिहाव कर ले कही के भड़का देवय।

   अइसने दूसर मन के भड़कौनी म आ के लेड़गा ह एक दिन अपन घर म जाके टुटहा खटिया ला बिछा के मुंहू फुलोय सुतगे।  

     ओखर दाई ह रोजी-मंजूरी करके घर अइस तब लेड़गा ल रिसाय देख के पुछिस-‘‘ कस रे गड़उना, आज काय होगे तेमे मुंहू फुलोय रिसाय हस।‘‘

       लेड़गा किहिस-‘‘गांव भर के सबो मोर जहुंरिया टुरा मन के बिहाव होगे हे। मोरे भर बांचे हे। गांव भर के मनखे मोला डिड़वा भगत कहिके भड़काथे। अब तैहा मोर बिहाव करबे तभे मेंहा जिंहू नहीं ते अन्न-पानी त्याग के मर जहूं।‘‘

    लेड़गा के गोठ ला सुनके, डोकरी के हँसई के मारे पेट फूलगे। डोकरी किहिस-‘‘ अरे लेड़गा तैहा नान-नान बात बर रिसा जथस। अरे, तोर संगवारी मन के बिहाव तो अभी होवत हे, मैहा तो तोर बिहाव ला तोर ननपन म कर दे हवं। अब तै सज्ञान होगे हस तब जा अउ बहुरिया ल लेवा के ले आ।"

              डोकरी ह लेड़गा के ससुरार के पता ठिकाना , नाव-गांव सब ला बता दिस। अपन बिहाव के बात सुनके लेड़गा खुश होेगे।

       बिहान दिन डोकरी ह चुनी-भुंसी के रोटी रांध दिस अउ मोटरी म जोर के लेड़गा ल दे दिस। लेड़गा अपन ससुरार गांव जाय बर घर ले निकलगे।

        बिहनिया के रेंगत-रेंगत लेड़गा ह संझाती अपन ससुरार घर म पहुँचिस। 

          दमाद बाबू दुलरू ला आय देख के ओखर सास-ससुर मन घला खुश होगे। रतिहा लेड़गा के सास ह बने बड़ा - भजिया, खीर - सोंहारी रांधिस अउ अम्मट म डुबकी-कड़ही के साग बना दिस।

     लेड़गा बाप पुरखा कढ़ी,  डुबकी-बफौरी के साग खाय नइ रिहिस । ओला डुबकी के साग अड़बड़ मिठाइस। लेड़गा ह अपन सास ल साग के नाव अउ एला बनाय के विधि पुछिस अउ मने मन गुनिस घर पहुँच के दाई ल अइसनेच साग रांधे बर कहूं अउ मनमाने झड़कहूं।     गोठ-बात करत रतिहा ह बीतगे।

          बिहान दिन लेड़गा ह गौना के बात करिस तब ओखर सास- ससुर मन किहिन-‘‘दमाद बाबू अभी तो हमन बेटी के जोखा-तोरा करे नइ हन। तुमन उदुप ले आय हव। थोड़किन समे अउ देवव। हमन बेटी के जोखा करके तुमन ला संदेश भेजबो तहन ले बर आ  जाहू।"     लेड़गा ह हव कहिके उहां ले घर आय बर निकल गे। 

बरसात के समय रहय रतिहा पानी गिरे रहय। रस्ता म चिखला माते रहय फेर लेड़गा के दिमाग म तो खाली कड़ही के साग रहय। ओहा नाव ल झन भुला जावं कहिके कड़ही-कड़ही कहत रस्ता रेंगत रहय।

        एक जगह मेड़ के मुंही पार ल कूद के नहकत लेड़गा बिच्छल के गिरगे अउ कड़ही के नाव ल भुलागे। लेड़गा ह समझिस साग के नाव ह इही मेरन गंवा गे। ओहा मुही के पानी म उतर के कड़ही के नाव ला खोजे लगिस। लेड़गा ला गजब बेरा ले कुछु खोजत देख के सब खेत के कमइय्या मन सकलागे। 

    एक झन किसान ह पूछिस-‘‘ काय गंवागे हे भैया। अड़बड़ बेर के खोजत हस।‘‘

     लेड़गा किहिस-‘‘अरे गोल-गोल ग बबा। पिंयरे-पिंयर रहिथे। उही ह गंवाय हे तउन ल खोजत हव।‘‘

        कमइय्या मन सोचिन-‘‘गोल-गोल, पिंयरे-पिंयर कथे बुजा ह। कहूँ सोन के डल्ला ल तो नइ गवांय होही? 

        सोन के डल्ला के लालच म सब कमइय्या मन घला खोजे बर भिड़गे। खोजत-खोजत ऊवत के बुड़त होगे। संझा होेइस अउ सब झन थकगे तब एक झन सियनहीन दाई कहिस-‘‘ ये मेरन के चिखला ह खोजई के मारे दही के मही कड़ही होगे ओ फेर काय गंवाय हे तउन ह मिलबे नइ करिस।

         कड़ही के नाव सुन के लेड़गा खुश होके नाचे लगिस अउ मिलगे-मिलगे कही के ऊंहा ले पल्ला भागिस। सब कमइय्या मन सोन के डल्ला ल झटकबो कहिके लेड़गा ल अउ़बड़ कुदाइस फेर अमराबे नइ करिन। लेड़गा ह कड़ही-कड़ही कहत भागगे। मोर कहानी पुरगे , दार भात चुरगे।

बोड़रा , मगरलोड

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

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