Monday, 6 September 2021

छत्तीसगढी बियंग (ठेसरा ) ====उत्तम लोकाचार =====

 छत्तीसगढी बियंग  (ठेसरा )


====उत्तम लोकाचार =====


सउॅखिया आदमी मन जब पान ठेला मा सॅघरथे तब पान के बनत ले कोनो न कोनो मुद्दा मा बहस छेड़ देथे ।अउ अंतिम समाधान घलो बता के रेंग देथे।कि समस्या गांव के रहय, देश दुनिया के, राजनीति चाहे धरम करम के ।सबो ले कइसे निपटे जा सकत हे। विचार मंथन के असली ठीहा पान ठेला ले बढिया जगा दूसर कोनो नइये। इंहा बिना मंच माईक के बिना संयोजक बिना आयोजक अउ बिना सभापति के सफल  गोष्ठी निपट जाथे ।अइसन सतसंगी मन के तिर व्यवहार के सबो सिष्टाचार लोकाचार के सब्द ज्ञान भरे रथे ।

हम ये कइसे कहि देन कि इंकर खुद के बोहाय हे, अउ समाज ला धोय सुधारे के ठेका लेय हवें। बिना स्वारथ के अपन बिचार तो रखत हे। इंहा तो ग्यारा दिन ले भागवत गीता के ज्ञान बॅटइया संत हर मनखे मन ला माया मोह लोभ ले दुरिहा रेहे के उपदेश देथे, अउ आखरी के दिन झोरा बोरा खीसा मा माया मोह ला भर के चल देथे। चढउतरी कम परथे त अवइया साल मा ओकर मुख ले भागवत कथा सुने बर नइ मिले ।

      तर्क देके हम काकरो लोकाचार अउ उदारता ला ठेंस नइ पहुंचावन । फेर लोक अउ परलोक के गोठ ला ओतके दूर तक समझथन जतका हमला जरुरत हे। फेर लोकाचार निभाके उतारता देखाय बर कमती घलो नइ करन । लोक के सॅग हमर अचार बिचार समगे उही तो लोकाचार आय।आगू वाले निभगे अउ हम निभा डारेन एकर ले बड़े लोकाचार का हो सकथे।

      आज दुनिया लोकाचार के एके तराजू मा चलत हे। समझे बर अतके कहूं कि हम जेकर कुकरा ला चोरा के लानेन,खाय के बखत दारू धरके ओहू ला बलाथन अउ खवाके भेजथन । सच कहे जाय तो इही पैतराबाजी हर असली लोकाचार आय। या फेर रात मे डाॅका डार अउ दिन मा चार झन के देखऊ उही मन ला दान मे बाॅट। अइसन सहिष्णुता ले भरे सनमान के हकदार होगेस माने सदाचार के उत्तिम लोकाचार निभा  डारे।

आज अइसन लोकाचार के जरूरत हे।

       अब के जमाना मा कोनों काकरो ले खुस नइये। अच्छा कर तब खराब, अउ खराब हे तब खराब । हमर असन ला खुशी तब होथे जब परोसी घर शादी परटी मा खाये के बेरा जाथन लिफाफा मा बीस रूपिया धराके माई पिल्ला छकत फेंकत ले खाथन।अबके चले पंगत के  नवा रिवाज मा चार पूड़ी नइ फेंकाइस तहू का काम के। रिस्ताचार मे लोकाचार  तो हमर घर के  माई लोगिन मन निभा लेथे। ओमन पहिली ले तय कर डारे रथे कि कते सस्ता वाले झलझलहा लुगरा ला फू फू सास ला देना हे, अउ कते ला मइके के भऊजी भतीजी ला दे ना हे।जइसे भी होवय शिष्टाचार मा लोकाचार झलकना चाही । बखत परे मा परम मितान ला रूपिया पइसा चलाना हे तो दूसर तिर ले पांच परसेंट मे लाने हवॅ केहे ला परथे।नइते वापसी के संभावना घलो कम रथे। देखना सुनना सहज हे, फेर देख सुनके चुप रहना अलग बात हे। ठेही देके सुनाबे तो दिन बुलक जाथे बात माड़े रथे।

अइसन संजोग काकरो घर हो सकत हे। नइ होतिस तो पाॅच साल के जुन्ना गोठ छट्ठी मा साग कम होगे, लकर धकर कड़ही डबका के पोरसिस । फेर कतको के हाजमा अतका खराब रथे कि ये बात कतको साल ले पेट भारत गुड़गुड़ी करत रथे।

         अब गोधूलि बेरा मा बिहाव होबे नइ करे।खुसरा चिरई के बिहाव कस आधा रात के लगिन होथे। सगाई  बरात अउ लगिन बरात दूनो मा सगा सम्मान करत ले बेटी वाले के कनिहा कतका हालिस बिहाव के बाद पता चलथे । पहिली चार झन सियान मन जाके लगिन चाॅउर बांध के आ जावे । अब सगई बरात मा घलो सौ दू सौ बराती नइ आही त देखइया मन कहि सकत हे, कि येकर दुनिया मा कोई नइये।या फेर जात समाज ले बाहिर हे का? धोखा ले कोनो बराती मा छुटगे तब वो तानाचार के सुर मा सुना सुनाके कही,कि मोरे बर ऊॅखर गाड़ी छोटे परगे। सच यहू आय कि चली देतिस त अद्धी चघाके हुडदंग ही करतिस ।अइसन आदर्शवादी संस्कारी बेसरमपना ला सगा होवय या समधी आदर पूर्वक झेलथे । एकर ले बड़े उदार भाव कहुंचो देखे बर नइ मिले । चेंदरा मा झुलइया मनखे के लाश ला जब तक दूर चार कोरी नवा कपड़ा नइ ओढाबो हमर लोकाचार के गोठ पूरा नइ होवय। येकर ले मुरदा खुश होथे कि मनखे कहि पाना कठिन हे। मरे आतमा ला शान्ति देय बर पार वाले अउ पारा वाले ला झारा झारा बरा सोंहारी खवाना परथे। नइते मरइया के आतमा  परछी मा झूलत रही। फेर नवा तीखा ला जरे बर चघइया कोनो ये नइ पूछय कि बरा सोंहारी पानी मा चुरथे  कि तेल मा। उपर ले शिष्ट लोकाचार धर्म निभाके ये कहि सकथे कि बरा मा नून कम रिहिस।

           आज आदर्शवादी बन फेर गांधी गिरी देखाय के जरूरत नइये। धर्माचार बन फेर परसाद के मिलत ले।राष्ट्रवादी आशावादी बन फेर संविधान के किताब धरके झन रेंग।ये धरती राम के हरे । मरियादा बचाना हे त आज के समाज मा कइसे निभना हे तोर उपर हे। सब किसम के अपराध ला देख सुन फेर मानवाधिकार के ताबीज पहिराय के उदिम मत कर। सदाचार सहिष्णुता उदारता शिष्टाचार लोकाचार के टोपी पहिर के सब घूमत हे।समता समानता अउ सद्भाव के रस बड़े बड़े मंच मा खूब मिठाथे। फूटे दरपन मा सकल देखके कोनो करम ठठाना नइ चाहे । भले आचरन के अचार बनत रहय ।दोष उही मन गिनथे जेमन दूध के धोवल रथे। फेर जिंहा दूध के अंकाल होवत हे उॅहा धोवात कोन हे।बस लोक के सॅग मा बिचार बइठे रहय।🙏


राजकुमार चौधरी "रौना "

टेड़ेसरा राजनांदगांव 🙏🙏🙏

आज के भारत बर कृष्ण


 

 सरला शर्मा: आज के भारत बर  कृष्ण 

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      राम कस बेटा मिले के असीस सबो झन ल मिलथे ...कृष्ण असन बेटा काबर नहीं ? गुने बर  पर गे भाई ..। सबले पहिली देखिन के कृष धातु के पहिली अर्थ आकृष्ट करना माने अपन कती खींचना दूसर अर्थ जोतना देखव न कृष्ण तो दुनों काम करथे ...ओकर सुन्दराई , ओकर लीला , ओकर चरित्र मन ल खीँचथे त मनसे के मन ल , हृदय ल नांगर चला के जोत देथे तभे तो प्रेम के बीज बोआथे ....कृष्ण नांव सार्थक हो जाथे । 

    कृष्ण जब तक यशोदा नन्द के संग रहिन ...ओ समय के आम आदमी के दुख सांसत ल समझिन भर नहीं ओला दुरिहाये के उदिम घलाय करिन । नन्दगाँव के दूध दही ल मथुरा के राजा कंस के कारिंदा मन पानी के मोल जबरन लेवयं अतके नहीं बरवाही असन नियम रहिस के ग्वालिन गोपी मन दूध दही ल नदिया पार करके , जाड़ा , गर्मी , बरसात मं जूझत मथुरा पहुंचाए बर जावयं । लइकन ल तो दूध , दही , माखन मिले च नइ पावत रहिस ..राजा के डर मं कोनों कुछु कहे नइ सकत रहिन त कृष्ण उपाय करिन  के लइकन संग माखन चोराये लगिन के लइकन ल खाए बर मिलय ओहू मन के देह मन पोठावय दूसर ग्वालिन मन के मटकी च फोर देवयं । कंस के अत्याचार के विरोध अउ गोप मन के दूध उत्पादन के समर्थन मूल्य देवाए के उदिम इही हर आय । एतरह कृष्ण जन नायक बनिन ..जनक्रांति के सूत्रधार बनिन , दुखी भुखी , पिछुवाये मनसे मन ल अपन वाजिब हक बर लड़ना सीखोईन । 

    उही गोप मन ल चरागाह युग के पशु पालन ले कृषि युग मं ले चलिन , जंगल ल निरवार के , नदिया के तीरे तीर , गोवर्धन पहाड़ के तलहटी मं किसानी करे के प्रेरणा दिहिन ....अपन बड़े भाई बलराम के बल बुता ऊपर भरोसा रहिस त उंकरे खांध मं नांगर बोहा दिन ...फेर का देखते देखत नन्द गांव के घरों घर दूध दही संग अनाज पाती के भंडार घलाय भरे लागिस । कृष्ण के नेतृत्व क्षमता , जन मन मं बस जाए के गुन , थके हारे मन ल बांसुरी के धुन मं मगन करे के गुन माने संगीत के स्थापना ....। आज के भारत के गिरे , हपटे , पिछुवाए मनखे मन ल कृष्ण के अगोरा तो आजो हावय । 

    नन्द गांव छूट गिस ..मथुरा आइन ...कंस वध हर निरंकुश राजतंत्र के खात्मा तो आय गुने लाइक बात आय के कंस के निरंकुश अत्याचार अतका बाढ़ गए रहिस के ओकर वध से जनता नाराज नइ होइस उल्टा कृष्ण के जय जयकार होइस ...जन नायक बन गिन यशोदानन्दन ...। 

कारागार ले देवकी , वसुदेव संग कंस के पिता माने अपन नाना उग्रसेन ल भी मुक्त करिन ..उन्मन के असीस पाइन तभे तो देवकीनन्दन वासुदेव कहाइन । ध्यान देहे के अउ आज के भारत बर पटन्तर एहर आय के अतका जनप्रिय नायक रहिन कृष्ण फेर मथुरा के राजगद्दी तो कंस के पिता उग्रसेन ल दे दिहिन ..खुद भी तो राजगद्दी मं बइठ सकत रहिन ...नहीं निदान ..अपन पिता वसुदेव ल ओहू नहीं त बड़े भाई बलराम ल राजा बना देतिन ...? 

आज के भारत मं कृष्ण असन सर्वत्यागी , जनप्रिय , लोगन के सुख दुख समझइया , निर्लोभी नायक ( नेता ) के जरूरत हे न ? 

     क्षमाशील कृष्ण शिशुपाल के 99 गलती , निंदा , गारी ल सहे के बाद सुदर्शन चक्र चलाये रहिन आज तो मानहानि के दावा निपटाए मं उम्मर पहा जाही ...। थोरकुन अउ आघू देखिन ...

स्त्री स्वतंत्रता के पोषक रहिन तभे तो महा रास मं गोपी मन ल बला के उन मन के मन ल संगीत , नृत्य , ईश्वरीय प्रेम से भरे सकिन ...सुरता राखे के बात एहर आय के शरद पुन्नी के रास के समय कृष्ण के उमर केवल तेरह साल के रहिस ...कोनो किसिम के अमर्यादित आचरण करे के उमर रहिबे नइ करिस हे । आज गांव , नगर , शहर मं स्त्रीजाति के जौन तरह अपमान होवत हे तेला  देख के कहे बर परत हे " एक बार फिर आओ माधव , एक बार फिर आओ कृष्ण । " 

     मथुरा नगरी जरासंध के घेरी बेरी के लड़ाई , झगरा करे ले हलकान होए लगिस त कृष्ण अपन संगी संगवारी मन संग समुद्र तीर नवा नगर बसाईन ...एदारी कृष्ण व्यापार ऊपर ध्यान दिहिन त द्वारिका नगर के स्थापना होइस ...बड़े बड़े डोंगा मं जेला आजकल मालवाहक डोंगा कहि सकत हन तेकर सहायता से मनसे नवा ढंग ले रोजी रोजगार करे लगिन ...नवा राज बनिस त एदारी राजगद्दी मं बइठारिन बड़े भाई बलराम ल ....कृष्ण तो कभू राजा बनबे नइ करिन आज के भाषा मं कहि सकत हन कृष्ण king maker रहिन ...धुंरधर राजनीतिज्ञ रहिन , जनसेवक रहिन फेर राजा तो कभू नइ रहिन । आज के भारत मं कृष्ण असन परमार्थी मनसे ,  राजनीतिज्ञ के बहुते च जरूरत हे ।  

   कृष्ण चरित्र ल भारत के अलग अलग भाषा मं देश के अलग अलग प्रान्त मं कई झन कवि , साहित्यकार मन अपन सोच विचार के अनुसार वर्णन करे हें , भक्ति कालीन कृष्ण , रीतिकालीन कृष्ण , निम्बार्क सम्प्रदाय के मोक्षदाता कृष्ण , चैतन्य महाप्रभु के परमानन्दम् माधवम् आऊ बहुत अकन मत , मतांतर के कृष्ण वर्णित हे ...तभो कहे बर परत हे के युगीन विसंगति मन ल ध्यान देके , अन्याय , अनाचार के विरोध के महाभारत मं पाञ्चजन्य शंखघोष करे बर कृष्ण के जरूरत आज के भारत मं हे । 

  एक हाथ मं बांसुरी दूसर हाथ मं सुदर्शनचक्र ले के फेर एकबार भारत मं आवव कृष्ण ..तभे तो  कहत बनही ...." हे दीन बंधु , हे दीना नाथ , राखो शरण लेहु साथ । " 

   कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम् । 

        सरला शर्मा 

          दुर्ग

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*छत्तीसगढ़ में चलत एक ठन गोठ*

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*राम ज़इसन कर कर ! तोर जीवन सुफल हो जाही ।*


(राम मर्यादा पुरुषोत्तम आँय । उँकर जीवन के अनुकरण उँकर हर पद -चिन्हा के अनुसरण ,हमर जीवन ल पोठ अउ सुरक्षित बनाही । श्रेय अउ प्रेय ,बनी अउ भूती दुनों मिलहीं ।


*कृष्ण जइसन झन कर ! तोर जीवन अरझ जाही ।*


( श्री कृष्ण लीला- पुरुषोत्तम आँय। उँकर असन बिल्कुल झन कर । उंकर लीला ल देख -सुन -चिंतन - मनन -अनुभव कर ! 


करे के कोशिश 

करबे ,तब फेर पिटानेच-पिटान ! विश्वास नई होत ये ,तब तहुँ एको पइत गोपिका चीरहरण करके देखले ।


तब कृष्ण के एको बुता का मनखे नई करे सके । नहीं ! अइसन बात नइये । तँय उँकर जउन सबला प्रिय बुता रहिस - अपन आत्मानुसंधान जइसन बाँसुरी वादन ! वो बुता ल कर सकत हस। केवल अउ केवल कृष्ण असन बाँसुरी बजा भर बजा सकत हस ।


सोलह हजार एक सौ आठ रानी के स्वामी कृष्ण हर पहिली गोस्वामी (गो-इन्द्रिय , अपन इन्द्रिय के स्वामी )आँय, योगिराज आँय, योगेश्वर आँय, तेकर पाछु कुछु आन । जिंकर उरु ( जंघा )के तरी म उर्वशी जइसन प्रेय मन बन- कचरा असन दबे परे हांवे, अइसन जगद्गुरु ल वंदन ! )


     आज के भारत ल भी उँकर गोठ के मर्म ल समझे -गुने के जरूरत हे। उंकर लीला ल नहीं फेर उँकर उपदेश के एक एक पद ल करे के जरूरत हे।


*रामनाथ साहू*


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बादल: आज के भारत अउ श्री कृष्ण

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वंदे कृष्णं जगत गुरुं।

     यशोदा के लाल, वासुदेव श्री कृष्ण ला  जगत गुरु कहे जाथे। गुरु के अर्थ होथे वो मार्गदर्शक मनखे जेन हा अपन अनुयायी ला अंधकार (अज्ञान)ले उबार के अँजोर (ज्ञान) कोती, असत ले सत कोती, मृत्यु ले अमृत(मुक्ति) कोती ले जाय। एक पथ प्रदर्शक के रूप मा सदगुरु के ये जम्मों लक्षण, महामानव, लोकनायक ,कुशल राजनीतिज्ञ,परम पुरुषार्थी, क्रांतिकारी अउ चमत्कारिक ,आकर्षक व्यक्तित्व के धनी श्रीकृष्ण मा देखे ला मिलथे।

     लगभग 5200-5300 साल पहिली  ए पावन भारत भुँइया मा,कंस के जेल मा जनम लेये श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन अउ शिक्षा जतका महत्वपूर्ण रहिसे, वोकर ले जादा आज हावय अइसे कहना कोनो अतिशयोक्ति नइ होही। नाना प्रकार के समस्या ले जूझत भारत के संग पूरा संसार श्रीकृष्ण के चरित्र ले प्रेरणा लेके सुख-शांति प्राप्त कर सकथे।

        योगाचार्य श्रीकृष्ण के जिए जीवन अउ देये उपदेश जेला पूर्ण ज्ञान के सार गीता ज्ञान कहे जाथे ला अपना के कोनो भी अपन जिनगी ला धन्य बना सकथे, प्रेरणा ले सकथे, समस्या ले उबर सकथे। वोमा के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हे----

संतुलित जीवन शैली---वर्तमान मा लोगन के खान-पान, अचार-विचार ,रहन-सहन आदि अइसे होगे हे के अकूत धन-सम्पत्ति , आसमान ला छूवत भौतिक प्रगति के बावजूद सुख-शांति नइये। मनखे के शरीर हा नाना प्रकार के रोग के घर बनगे हे। काबर के हमन प्रकृति ले दूरिहावत जावत हावन। कुछु बात मा संतुलन नइये।न भोजन मा, न सुते-जागे मा ,न तो मेहनत मा।  

            तन-मन ला स्वस्थ रखे बर उन योग के शिक्षा दे रहिन हें। आज भारत सहित पूरा संसार योग ला अपनावत हे। बहुत ही अच्छा बात ये फेर ये बात के तको ध्यान रखे ला परही के योग वोकरे सध सकथे जे हा न तो जादा खाय, न तो हठ करके ,भूँखन लाँघन रहिके शरीर ला सुखा दय। योग वोकरे सध सकथे जेन न तो जागय, न तो जादा नींद भाँजय। ये बात गीता मा स्पष्ट रूप ले बताये गेहे। कहे के मतलब हे संतुलित जीवनचर्या होना चाही। 

       एही तरा ग्रामीण जीवन अउ शहरी जीवन मा तको समन्वय अउ संतुलन के जरूरत हे। श्रीकृष्ण मथुरा शहर मा पैदा होइस, गोकुल मा रहिस। आज नँदावत गाँव अउ सुरसा के मुँह कस बाढ़त शहर मन संतुलन बनाके लगाम कसे ला परही।


प्रकृति प्रेम अउ पर्यावरण रक्षा----

श्रीकृष्ण ला वन-उपवन, जंगल-झाड़ी, नदी-पर्वत ले अगाध प्रेम रहिसे। कदम के पेंड़ मा चढ़के बँसरी बजाबत राहय, झुरझुट मा लुकावय खेलय, जंगल मा गाय चरावत घूमत राहय। पुन्नी के रात मा रास रचावय।

    यमुना जल मा जहर फइलइया कालिया नाँग ला नाथ के ,उहाँ ले भगाना जल ला प्रदुषित होये ला बँचाये के, नदी के गंदगी ला साफ करे के शिक्षा देथे।

       वर्तमान मा जतका बड़े-बड़े कल कारखाना हे जे मन अपन गंदगी ला नदी-नाला मा बोहवावत हें ,उही मन कालिया नाग आँय ।ये मन ला नाथना जरूरी हे।

   जम्मों नदी-नरवा मन ला साफ करे के जरूरत हे।


एक जूट होके अत्याचार ,अधर्म के विरोध--


 श्रीकृष्ण हा ब्रजवासी मन ला समाइस के हम ला गोवर्धन पर्वत, यमुना नदी, वृंदावन ,ब्रजभूमि के पूजा करना चाही काबर के इही मन असली देवता ये जे मन हमर गाय मन ला चारा-पानी देथें। हमन ला अन्न-धन देथें। इंद्र के पूजा (निरंकुश राज सत्ता के चाटुकारिता) ला व्यर्थ बताइस।

  सब ब्रजवासी मानगें। इंद्र नराज होगे।भयंकर पानी गिराये ल धरलिस त वोहा गोवर्धन ला उठाके ,छाता जइसे तान के रक्षा करिस। चाहतिस त अक्केला तको उठा सकत रहिस फेर सबो झन के सहयोग लेके कहिस तहूँ मन अपन डंडा मा गोवर्धन ला टाँगव।

        ए घटना एकता मा बल हे के शिक्षा देथे जेकर आज बहुतेच जरूरत हे काबर के सत्ता के नशा हमर भारत मा नाना रूप मा देखे ला मिलथे। 


कृषि अउ गोपालन ला बढ़ावा--


श्रीकृष्ण हा धेनु चरावय। वोला गोपाल कहिथन। सम्पन्न नंदबाबा के लाला अउ गाय चराना----बहुत बड़े संदेश छिपे हे।

    हमर भारत कृषि प्रधान देश आय । गो माता हा खेती-किसानी के काम बर बछड़ा देथे। वोकर गोबर हा उत्तम खातू देथे। दूध-दही हा शरीर बर अमृत के समान होथे। गोमुत्र के प्रभाव ले बहुत कस घातक जीवाणु, विषाणु मन मर जथे।

 भारत बर तो गाय हा वरदान ये।वोकर बध मा पूरा प्रतिबंध लगा देना चाही।

  कोनो कहि सकथे यहा आधुनिक टेक्टर के युग मा नाँगर बइला के बात---- गाय संरक्षण के बात----? हव काबर के टेक्टर हा धुँआ दे सकथे--दूध नइ दे सकय । आधुनिकता हा रोग फइलया, धरती ला जला के बंजर बनइया रसायनिक खाद दे सकथे,जमीन ला उपजाऊ बनइया जैविक खाद नइ दे सकय-।


खेल ला बढ़ावा---

नटखट बाल कृष्ण हा अपन ग्वाल-बाल सँगवारी मन संग खेलत राहय। कभू रिसावय-कभू मनावय, हँसी -ठिठोली होवय।मतलब  सहीं ढ़ंग ले बचपन मा तन-मन के विकास होवय। खेल कूद कतका फायदा वाला हे खासकर घर ले बाहिर निकल के खेलना( आउटडोर गेम )

   , समझे जा सकथे। खेलकूद तो सुग्घर स्वास्थ्य के खजाना आय।

वर्तमान मा हमर लइका मन अइसन खेलकूद ला छोड़के कुरिया मा खुसरें-खुसरें  मोबाइल गेम खेलत हें जेन तन-मन ला बीमार करत हे।अइसन खेल ला हतोत्साहित करके अन्य खेल ला प्रोत्साहित करे के बहुतेच आवश्यकता हे।


नारी सम्मान के रक्षा---

श्रीकृष्ण सदा प्राण-प्रण ले नारी सम्मान के रक्षा करिस। देवकी नंदन होके ,माता यशोदा के लाल कहाइस। नरकासुर के कारागृह ले बंधक नारी मन ला छोड़ाइस।

राधा ले निश्चल प्रेम करिस ।वोकर मान सम्मान मा कभू दाग नइ लगन दिस। 

कौरव- सभा मा चीर-हरण के समे द्रोपदी के लाज बँचाइस।

       आज जब  नारी के स्वाभिमान ला अब के कौरव मन कुचलत हें।जगा-जगा हिंसा, बलत्कार ,हत्या  होवत तब श्रीकृष्ण अपन भीतर के कृष्ण ला जगाए ला परही।


सकारात्मक जीवन--


श्रीकृष्ण के पूरा जीवन संघर्ष के ,संकट के ,विरोधाभास के जीवन रहिस फेर वो कभू निराश नइ होइस भलूक हाँसत -मुस्कावत हर संकट के मुकाबला करिस।

जेन होइस तेन अच्छा होइस, जेन होवत हे अच्छा होवत हे अउ जेन होही उहू अच्छा होही।एखर ले बड़े सकारात्मक सोच अउ का हो सकथे। मनखे ला सदा वर्तमान मा जीना चाही।

       आज आधुनिकता के भँवरजाल मा फँसके कतकों भारतवासी छटपटावँत हे। बाल,युवा, वृद्ध, नर-नारी अवसाद मा घिरत जावत हें।आत्महत्या बेतहाशा होवत हे अइसन समे मा श्रीकृष्ण के जीवन ले शिक्षा लेये के जरूरत हे।


भाग्यवाद के विरोध कर्मवाद के शिक्षा---


अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।

दास मलूका कह गये, सबके दाता राम।।

        संत मलूका हा अइसन बात अपन इष्ट के महिमा के अतिशयोक्ति पूर्ण बखान करत कहिस होही।भक्त तो शरणागत होथे -----। फेर कहूँ ये भाग्यवाद के बात होही त मानव जाति बर एकदम घातक हे काबर के भाग्यवाद हा तो एकदम नकारा अउ आलसी बना देही।

असली तो केवल कर्म होथे।कोनो भी एक सेंकण्ड तको बिना कर्म करे नइ रइ सकय।

   श्रीकृष्ण प्रबल पुरुषार्थ करके देखाइस अउ सदा सुकर्म(धर्म) करे के शिक्षा देइस। वो जेन कर्मवाद के सिद्धांत देइस वो अटल सत्य हे, सब बर हे।कर्म बिना कोनो नइ रइ सकय। कर्म के फल जरूर मिलके रइथे। जइसन कर्म होही,वइसन फल मिलही।"बोंए पेंड़ बबूल के आम कहाँ ले होय।"

   कर्मवाद आत्मनिर्भर तको बनाथे। हर भारतवासी ला कर्मयोगी बन बर कदम उठाना चाही।


शोषण के विरोध अउ दबे-कुचले ला साथ देना---

श्रीकृष्ण अपन युग के अत्याचारी क्रूर शोषक कंस के ,जरासंध के ,नरकासुर के , दुर्योधन के ,अकासुर, बकासुर ---आदि के पुरजोर विरोध करिस।

शोषित होए पाँडव मन के साथ दिस। गरीब ग्वाला  मन ला गले लगाइस।दीन-दुखी गरीब सुदामा संग द्वारिकाधीश होके तको मित्रता निभाइस। ये सब विशेष गुण वोला सच्चा लोकनायक बना दिस।

        आधुनिक भारत मा तथाकथित लोक सेवक मन ला श्रीकृष्ण ले शिक्षा लेना चाही। अउ जनता ला तको शोषक मन ला उखाड़ फेंके बर जागरूक होना चाही। कोन सच्चा हितैषी अउ कोन गला मुरकेटने वाला ये तेकर परख करना चाही।


शांति अउ अहिंसा के समर्थन फेर स्वाभिमान के रक्षा--


श्रीकृष्ण शांति अउ अहिंसा के प्रबल समर्थक रहिस। महाभारत युद्व के पहिली हिंसा ला टाले बर कौरव सभा मा शांतिदूत बनके गेइस। जब दुर्योधन नइ मानिस त पाँडव मन ला धर्म रक्षा ,सत्य के रक्षा अउ स्वाभिमान के रक्षा बर हथियार उठाये ला कहिस। भयग्रस्त अजुर्न ला गाँडिव उठवाइ अउ महाभारत करवा दिस। ओइसने शिशुपाल के 99 गारी ला शांति पूर्वक सुन लिस अउ जब पानी सिर तक पहुचगे त चक्र चलाके वोकर मूँड़ ला काट दिस।

   बड़ गौरव के बात हे आज आधुनिक भारत के विदेश नीति मा इही सिद्धांत लागू दिखथे। महात्मा गाँधी के अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन अउ असहयोग आंदोलन मा एखर छाप रहिस। जब अँग्रेज मन के अति होगे अउ स्वाभिमान मा बट्टा लगे ला धर लिस ता " करो या मरो" के नारा बुलंद करिस। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के "आजाद हिंद फौज" पाँडव सेना कस लड़िस। अमर शहीद क्रांतिकारी मन "जैसे को तैसा" सिद्धांत ला अपनाइन।




         अइसे तो पूर्णावतार, लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अगम-अपार हे ,वोकर अंश मात्र तको के पूरा बखान कोई नइ कर सकय ।

       कुल मिलाके देखे जाय तो जगत गुरु श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन अउ शिक्षा आधुनिक भारत के संदर्भ मा बहुतेच उपयोगी हे। 

   शरीर ला तको जगत के उपमा दे गेहे ।जइसे सृष्टि पाँच तत्व ले बने हे ओइसने मनखे के शरीर तको हे।इखर भीतर मा आत्मारूपी जगत गुरु श्रीकृष्ण बइठे हे।वोकर आवाज ला सुनके अपन मानवता ला जगाके ,अपन जीवन ला धन्य करके ,भारत ला पुन: विश्वगुरु बनाना हे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़


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 चित्रा श्रीवास: *आज के भारत अउ श्री कृष्ण*



*कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन*।

*मा कर्मफलहेतुःर्भूमा ते संगोस्त्वकर्मणि*।।


  कर्म करे मा तोर अधिकार हावे,कर्म के फल मा नइ हे तेखर कारण तयँ हा फल पाये बर कर्म झन कर अउ झन अइसे सोच के फल  के आसरा नइ हे त कर्म  काबर करवँ।

        कुरुक्षेत्र के मैदान मा अर्जुन ला निष्काम कर्म के शिक्षा देवत सबले बड़का कर्मयोगी श्रीकृष्ण ।या फेर बचपन के मितान गरीब सुदामा के गोड़ धोवत ,मितानी के उदाहरण बनत श्रीकृष्ण।महाभारत के युद्ध मा युद्ध के रणनीति बनात महारणनीतिज्ञ।बुद्धि, चतुराई, गुरुत्व ,नेतृत्व क्षमता,आकर्षण,   सब गुण कृष्ण मा कूट कूट के भरे हावय जेखर ले मनखे प्रेरणा ले सकत हवे।

              कृष्ण के व्यक्तित्व मा ये सब गुण हा बचपन ले दिखत रहिस हे।वोहा माखन ला मिल बाँट के अपन संगी मन संग खावय,आज के समय मा जब मनखे मनखे के दुश्मन बने हे जात धर्म के नाम मा लड़त हे श्रीकृष्ण के जीवन ले शिक्षा लिये जा सकत हे।प्रकृति ले प्रेम के शिक्षा गोवर्धन पूजा के माध्यम ले दिहिन,देव पूजा इंद्र देव के पूजा करे ले मना करके प्रकृति के पूजा करे बर कहिन काबर कि जन्म ले मृत्यु तक मनखे प्रकृति के बीच मा रहिथे,हवा,पानी ,अनाज,फल ,जंगल ,लकड़ी के उपयोग जब मनखे करथे ता ओखर संरक्षण करना घलौ मनखे के दायित्व आय फेर आज मनखे प्रकृति ला अपने हाथ ले नष्ट करत जावत हे। कालिया मर्दन के माध्यम ले

नदी ,तलाव के साफ सफाई के महत्तम ला बताइन आज के समय मा गंगा ,यमुना सहित महानदी शिवनाथ होय चाहे हमर अरपा प्रदूषण के मार झेलत इँखर दुर्दशा कखरो ले नइ छुपे हावय।निरंकुश राजतंत्र के विरोध करिन एखरे कारण जनता ऊपर अत्याचार करइया दुष्ट कंस के वध करिन।गीत संगीत ला जीवन मा महत्वपूर्ण मानिन इही कारण वो बंशी बजाथें ता गोकुल के सब नर नारी मंत्रमुंग्ध हो जाथें अउ दिन भर के अपन काम बुता के थकान ला भुला जाथें।कृष्ण के मन मा सत्ता के लालच घलौ नइ हे तभे कंस वध के बाद ओखर राज खुद नइ लेके ओखर ददा उग्रसेन ला दे देथें।कुर्सी बर पार्टी ,निष्ठा ,संगी बदलत आज के नेता मन कृष्ण ले कुछु सीख लेवयँ ता बढ़िया हे।पीड़ित पांडव मन के संग दिहिन।

                 उँखर देहे गीता के ज्ञान मनखे समाज ला हरदम रद्दा दिखावत रही।आज के भ्रमित मनखे बर गीता मार्गदर्शक ,पथप्रदर्शक हो सकत हे।कृष्ण के पूरा जीवन चरित्र ही हा मनखे ला बहुत कुछ सीखाथे ।अगर मनखे हा सीखना चाहे तब।

           अतका कन गुण श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व मा हावे जेमा से एक गुण ऐसे हावय जेहा मोला सबले ज्यादा प्रभावित करथे वो गुण हे महिला मन के प्रति उँखर दृष्टिकोण ।महिला सशक्तिकरण ,महिला समानता के प्रबल पक्षधर श्रीकृष्ण।महिला सम्मान के रक्षक श्रीकृष्ण ।हस्तिनापुर के राजसभा मा जब भीष्म ,द्रोण, अर्जुन, भीम जइसे महारथी मन कुछू नइ कर सकिन तब श्रीकृष्ण हा द्रौपदी के सम्मान के रक्षा करथें।आज भारत ला कृष्ण के इही रूप के सबले जादा जरूरत हे जब निर्भया जइसे कांड होवत हे ।नानकिन नोनी ले सियानिन दाई तक कोनों सुरक्षित नइ हे।

घर के अहाता म बंद रहइया गोपी मन ला घर ले बाहिर निकालिन,उँखर स्वाभिमान ला जगाइन ।चाहे रूक्मिणी हो या बहिनी सुभद्रा वर चुने मा नारी के अधिकार के समर्थन करिन।येखर लिये रूक्मिणी के मामला मा शिशुपाल, रूक्मी के सेना ले युद्घ करे बर पड़िस ता सुभद्रा के मामला मा अपनेच बड़े भाई हलधर बलराम के निर्णय के विरोध म जाना पड़िस।आज जब समाज मा खासकर के हरियाणा जइसे अउ कई राज्य मा आनर किलिंग कतको बहनी बेटी मन के जान ले डारे हे

अउ खाप पंचायत हा नइ जाने कतका जान आनर किलिंग ले लिही।

              ये तरह से युग दृष्टा पथप्रदर्शक, विश्व गुरु  मयारुक मितान, दुलरुआ बेटा, स्नेहिल भाई हर रूप मा कृष्ण प्रेरणीय हे।उँखर बारे मा लिखे बर मोर लेखनी बहुत कमजोरहा हे।हा अतका जरूर हे अभी भारत के संगे संग दुनिया के जइसे हालत हे उँखर दिखाय रद्दा म चलके प्रेम, सौहार्द,विश्व बंधुत्व जइसे मानवीय मूल्य मन ला पाये जा सकत हे।अउ भारत हा फेर एक बार विश्व गुरु बन सकत हे।




चित्रा श्रीवास 

बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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छत्तीसगढी व्यंग ======निन्दा पुरान=======

 छत्तीसगढी व्यंग


======निन्दा पुरान=======


         चारी निन्दा करना सबके बस के बात नोहे।ये काम मा नारी परानी मनके बड़का हाथ गोड़ अउ दिमाग होथे। चार झन माई लोगिन मन सकेलाइस तब झन पूछ ।उॅकर बीच चरचा के विषय नइ रहय। रथे तो सिरिफ निन्दा के गोठ।अच्छा हे ये काम चलते रहना चाही। काबर कि येकर ले आगू वाले के सोच विचार अउ ब्यवहार के पता चल जथे। अइसन काम मा अड़ंगा झन परे । चार दिन पहिली अखबार ला पढके भैरोनाथ कहत रहय ----हमर नेता जी हर ओ दिन के हत्याकांड के जबरदस्त निन्दा करे हे भाई । मॅय कहेंव-------तोर चेतना सक्ति मर गेय रिहिस का जी? ये काम ला तो तहूं कर सकत रेहे।  भैरोनाथ कथे-----कर सकत रेहेंव फेर मोर तिर कड़ा सब्द के अभाव हे न। तब ओला केहेंव-----कड़ा शब्द के अभाव हे त चार झिन  महिला मंडली के बाजू मा बइठ जाय रते, समझ मा आ जाय रतिस निन्दा कइसे करे जाथे। कड़ा शब्द के कोचिंग घलो हो जातिस । ओकर रोना परे , ओकर खटिया रेंगे ते हर, कीरा परके मरही, उॅकर घर दीया बरइया झन रहय। अरे बाबू निन्दा पुरान मा येकर ले ठोस अउ कड़ा शब्द दूसर नइ मिलय । तयॅ कहूं मरदानी भाषा मा अनाप सनाप बोल बयान कर पारबे । तोर भाषा संवैधानिक नइये तब उलटा तोरे निन्दा होय के सुरू हो जाही।

           पुरान मा निन्दा के भेद दू किसम के बताय गेहे । पहिली जे चार जन सॅग बइठ के भारी कड़ा शब्द मा बोल सकत हस।अउ दूसर उही बात ला कोनो ठोसहा पावर वाले मंतरी लेबल के मनखे करथे जेकर प्रचार मिडिया के माध्यम ले होथे। ओकरे असन के नाम घलो होथे। ओ बेरा अइसे लगथे कि सबले जादा धक्का उही ला परे हे। मोर असन टुटुक पूजिया लिखइया के निहीं भलुक बड़े नामधारी कलमकार के रचना ऊंचा स्तर के होथे ।साहित्यिक स्तर के होथे। ओइसने निन्दा अउ निन्दक के स्तर हे ।विश्व स्तर के निन्दा, राष्ट्रीय स्तर के निन्दा राजनीतिक निन्दा अउ फेर गांव समाज के निन्दा । एक झन मनखे ला निसाना बनाके निन्दा करबे तब मानहानि के दावा ठोकाय के संका रथे। ओकर सेती निन्दा करे के पहिली अपन हैसियत के खियाल रखना घलो जरूरी हे।

             आज मानवता के चिता बंग बंग बरत हे। ओमा राजनीति के पॅचलकड़िया डारे बर कतको लाईन मा खड़े रथे। सरहद मा सहीद होय सिपाही के श्रद्धांजलि के मौका बनाने । ओकरे सॅग व्यवस्था ला कोसत निन्दा करके राजनीतिक लाभ खोजत रथे। अउ फेर जेमा अपन अउ अपन पारटी के लाभ नइ होइस ओहू निन्दा का काम के? नबालिक सॅग सामुहिक कुकरम दहेज लोभिया, किसान के फांसी ला लेके निन्दा इसकूल अस्पताल के गिरत स्तर पानी बिजली के समस्या के निन्दा बिकास योजना के पइसा ला सरपंच डकारत हे। ये सब आजकल छोटे निन्दा के भीतर आथे। आतंकी हमला नक्सली के नर संहार राष्ट्रीय अउ विश्व स्तर के मसाला हरे। अइसन के निन्दा करे ले स्तर बाढथे । निन्दा पुरान के अभी तक प्रमाणित ग्रंथ नइ आ पाइस ये बहुते दुख के बात हे।फेर एक बात हे तयॅ काकरो भी कइसनो भी निन्दा कर जब तक वो प्रचार  माध्यम ले होके नइ गुजरय निन्दा बेकार हे।घर खुसर के कोनो ला कतको कोसत रह फरक नइ परय। जमाना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अखबार फेसबुक अउ ट्वीटर के हे।इमेल जीमेल के हे। कड़ा से कड़ा शब्द मा होय निन्दा इंकरे माध्यम ले बगरना जरूरी हे।

            चिन्ताजनक बात ही निन्दा जनक होथे जरूरी नइयै।राजनीति ले जुड़े हस त विरोधी मनके तोनगी छुटतले नींद हराम होत ले निन्दा कर सकथस । मंहगाई गरीबी बेरोजगारी के भूल के मत कर।काबर कि चुनाव के बखत मा इही मन तोरो बैनर मा चिपकही । जमाना वार अउ पलटवार के हे। एक दूसर उपर निसाना साधे के दौर चलत हे। वार निसाना म परगे तब लहू तो नइ निकलय फेर आगू वाले अधमरहा तो हो सकत हे। भैरोनाथ ला केहेंव ------कड़ा शब्द तो मयॅ दे देहूं फेर तोर तिर कोनो बिषय हावे निन्दा करे बर।भैरोनाथ कथे -----हावे न जी  ये नेता मन के सभा रैली मा होवत खरचा उपर करना रिहिस । मॅय कहेंव ------भैरोनाथ ये मन पहुंचे हुए पदासीन मनखे हरे।समझले तोर का होही। अउ ये अखबार वाले  मन छापही कि निंही । मानले छपीगे अउ शब्द जादा कड़ा होगे त उॅकर चार झन मनखे आके तोर कुटासन करने चल दिंही तब तयॅ निन्दा करे के लाईक नइ रबे। निन्दक नियरे राखिए के जमाना खतम हे।ओकर ले अच्छा हे उॅकर जनम दिन के बड़का फोटू सॅग बधाई संदेश छपवात रह । मान सम्मान बाढत रही। बिन गतर के पाकिस्तान जेखर खाय के खपरा न बजाय के दफड़ा तेहर रहि रहि के आतंकी हमला करवात रथे ओकर कर।पूरा देश तोर पाछू रही।नोट बंदी जी एसटी अउ कोरोना बर चीन असन के करे रते। मउका ला गॅवा डारे। फेर भूलके अमेरिका उत्तर कोरिया के झन करबे ।खिसियाके मिसाईल के मुहूं ला हमरे कोती कर दिही त तोर निन्दा के चक्कर म सबो धारे धार जावय रबो। तोला जादा हाईलाइट होय के सऊख हे त कूद जा निन्दा के आगी मा। तोर शब्द कतका कड़ा हे जनता समझ लिहीं ।


राजकुमार चौधरी "रौना "

टेड़ेसरा राजनांदगांव 🙏🙏

छत्तीसगढ़ी रोटी

 छत्तीसगढ़ी रोटी


               खइरखा डांड़ तिर सांझ कुन हमर गाँव के सियान मन सकलाथे तहन ..... फकर फकर बीड़ी पियत .. रंग रंग के बकर बकर मारत रहिथे । एक दिन एक झिन सियान के लइका हा ..... छत्तीसगढ़ी म एम.ए. करके आये रहय ..... तेकरे गोठ चलत रहय । जम्मो झिन हा सियान ला बधाइ देवत कहत रहय के ..... अब तोर लइका हा सरकारी स्कूल म गुरूजी बन जही । सियान किथे – सब तुँहर मनके आशीर्वाद आये भइया हो । छत्तीसगढ़ी पढ‌‌के मोर लइका नौकरी पा जही ..... मेहा सोंचे नइ रेहे हंव । 

               कुछ बछर नहाकगे । लइका हा गाँव म एती ओती लठँग लठँग किंजरत रहय । ओकर संगवारी मन साहेब सिपाही बन गिन .... बर बिहाव घला होगे अऊ घर के जनसंख्या म बढ़होत्तरी के नम्बर आगे । गाँव के लगभग हरेक जवान मन काम धंधा म लग चुके रिहीन । सिर्फ इही लइका हा बिगन काम के बेरोजगार किंजरत रिहिस । सियान मन साँझ कुन ओला रोज देखय । उही ला देखके .... गाँव म अब कन्हो लइका मन ..... न छत्तीसगढ़ी गोठियावय ..... न ओला पढ़य लिखय .... न सुनय .... न समझय । सियान मन अपन भाखा अऊ ओला जनइया लइका के भविष्य बनाये के फिकर म बुड़ गिन । लोगन के हृदय म अपन भाखा के प्रति मोह जगोये बर .... अऊ पोट पोट करत अपन भाखा ला साँस देवाये बर अइसन लइका ला नौकरी देवाये बर जुरियाके गोहार लगइन । एक जगा म सकलाके सरकार तिर अपन बात राखत ..... जम्मो सियान मन छत्तीसगढ़ी भाखा के लिखइया पढ़इया मनके समस्या ला उजागर करिन अऊ सरकार ला बतइस घला के ..... छत्तीसगढ़ी भाखा के बोलइया , लिखइया पढ़इया समझइया अऊ सुनइया काबर कमतियावत हे .... ? ओमन सरकार तिर सुझाव राखिन के ...... छत्तीसगढ़ी भाखा ला रोटी संग जोड़ देहे म बहुतेच फायदा होही । सरकार सुनिस घला अऊ खमाखम आश्वासन घला दिस । 

               कुछ दिन पाछू ...... छत्तीसगढ़ी हा रोटी संग जुड़गे । एक झिन सियान हा .... बुगुर बुगुर बरत लालबत्ती कार के भीतर रोटी टोरत हे । कुछ ..... छत्तीसगढ़ी भाखा ला बजार म बेंच के .... रोटी खावत हे । एती छत्तीसगढ़ी पढ़इया लिखइया लइका के हांथ हा रोटी म सनागे .... ओकर हांथ म रोटी के सुगंध भरगे .... ओकर हांथ ले .... रोटी के सरलग निर्माण होय लगिस .... फेर .... ओकर मुहुँ ला अभी भी रोटी के अगोरा हे .... ओकर पेट अभी घला जुच्छा के जुच्छा हे ...... । आश्वासन देवइया मन .... छत्तीसगढ़ी अऊ छत्तीसगढ़िया के इही लइका के हांथ के बने रोटी ला .... भुकर भुकर के झड़कत हे । चारों डहर शोर मचगे के छत्तीसगढ़ी भाखा हा रोटी संग जुड़गे ..... । सरकार के वाहवाही होगे ..... थपड़ी पिटइया के संख्या बाढ़गे .... ।  


हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

साहित्य के इमारत*

 *साहित्य के इमारत*


आखर के माटी ला जब ज्ञान के भट्ठी मा तपाये जाथे तब शब्द के ईंटा तैयार होथे। भाव के गहिर गड्ढा मा अनुभव के पखना पाट के नेंव बनाये जाथे। नेंव जतका गहरा रही, इमारत वतके मजबूत रही। ये नेंव ऊपर शब्द के ईंटा के दीवार खड़े करे जाथे। ईंटा ला जोड़े बर नम्रता के गारा चाही। नम्रता बिना, नमी नइ आवै। बिना नमी के जोड़ तको पक्का नइ बन सके। दीवार खड़े होगे तहाने छत के ढलाई के पारी आथे। ढलाई बर धीरज के सेनट्रिंग, विषय-वस्तु के सीमेंट, नवापन के गिट्टी अउ ईमानदारी के लोहा के जरूरत पड़थे। अतका उदिम के बाद ढाँचा तैयार हो जाथे। एमा सहनशीलता के प्लास्टर होए के बाद आलोचना के खिड़की अउ सद्भावना के दरवाजा लगाए जाथे। रस, छन्द, अलंकार, लोकोक्ति, मुहावरा, लक्षणा अउ व्यंजना के सतरंगी रंग मा इमारत ला सजाए जाथे। अतका पिचकाट करे के बाद, साहित्य के इमारत तैयार होथे फेर ये इमारत के बनइया एमा नइ रह सके। ये इमारत मा रहे के अधिकार पाठक-पहुना मन ला मिलथे। अब ये पाठक-पहुना ऊपर रहिथे कि वो ये इमारत मा अपन ठियाँ बना लेथे कि दूसर दुवारी ले निकल के उदुप ले चल देथे। इमारत बनाये मा जउन-जउन जिनिस के उपयोग होथे, उनकर गुणवत्ता बढ़िया रही तो पाठक-पहुना उही इमारत मा अपन जिनगी पहा देही। विचार करव, हमन पाठक बर कइसन "साहित्य-इमारत" बनावत हन।


*अरुण कुमार निगम*

कहानी : तीजहारिन*

 *कहानी : तीजहारिन*

       

      हरेली मनीच तहाँ ले दाई-माई अउ बहिनी मन के मइके कोति बर सुध लामे लगथे। बेटी माई मन खेत-खार के बूता ल लउहा-लउहा निपटाय के सोचथें। कोनो मइके जा के अपन भाई मन ल राखी बाँधे के साध मरथें, त कोनो मन अपन मयारुक भाई मन बर अकताहा राखी पठोय के उदिम करथें। राखी भाई-बहिनी के मया-दुलार के चिन्हारी आय। जम्मो भाई-बहिनी मन राखी के पबरित अउ अटूट बँधना म ननपन ले बँधे रहिथें। अउ जिनगी भर निभाय के कोशिश करथें। बहिनी मन बिहा के अपन नवा घर चल देथें। अपन घर संसार म रम जथे। बेटी-बहिनी मन धरम के जम्मो रिश्ता ल निभावत ससुराल म बड़ खुश रहिथें। अउ सबो के खियाल रखत हँसी खुशी ले जीथें।  मइके कोति भाई-बहिनी के ननपन के मया परेम के बँधान अउ सजोर होवत जाथे। अतका जरूर आय कि दाई-ददा के डेरवठी म खेलई हर अब सपना हो जथे। दाई-ददा, संगी-संगवारी, भाई-बहिनी मन सुरता म हबरत रहिथें। बर-पीपर के छाँव तरी के फुगड़ी, खो-खो, गोंटा खेल, सवनाही झूलना के उठे बरोड़ा मन दाई-ददा अउ भाई-बहिनी के सुरता के बादर धर के आथे अउ नैना ले झमाझम बरसे लगथे। वाह रे नारी परानी के जिनगी ....जनम लेके कहूँ... जिएँ के कहूँ।....अउ... दाई-ददा अउ बहिनी-बेटी ले मोह लामे पाय रहिथे, कि अचकहा बाढ़त मोह ल छोड़ के सजन के अँगना जाय ल परथे। गनेसिया इही सब बात मन ल मनेमन गुनत रहिथे, तभे परोसिन सुखियारिन ह का करत हस गनेसिया दीदी? कहिके आरो देवत आथे। दूनो झन मुँहाचाही गोठियाय बर एक-दूसर तिर आवत-जात रहिथें। दूनो झन अपन-अपन सुख-दुख ल आपस म बाँटत रहिथें। दूनो झन ल एक दूसर के घरू बात के घलव जानबा रहिथें। जेला ओमन कभू कोनो तीसर मेर नइ गोठियाँय। इही दूनो झन के विश्वास हरे जउन उन मन ल तब ले जोरे राखे हे। अइसे तो दूनो झन तीन साल के आगू-पीछू बिहा के ए गाँव म आय रहिन। अउ परोसिन बनिन हे। बीतत बेरा के संग दूनो के पहिचान बाढ़े रहिस।

      'का करहूँ बहिनी ? कतेक मार होथे तीन इकड़ (एकड़) के खेती... दवा पानी के आय ले निदई-चलई के बूता अब जादा नइ लगय। बस ठेलहा बइठे हवँव बहिनी। आठे कन्हैया मना डरेंन। मोर भइया मोला तीजा लिहे कब आही कहिके ओकरे रस्ता जोहत बइठे हँव। पहिली लगतीच भादो म बियासी निंदई चलई हो जात रहिस। तइसने असो पानी काँजी के बने रेहे ले जम्मो बूता काम मन तिरिया गे हे। अउ ए बादर दोखहा ह रोज आथे अउ टुहूँ देखावत बिन बरसे कोन जनी कति जाथे ते....कोन का मोहनी खवाय हे ते भंडारे च कोति उड़त चले जाथे। चिटिक झाँके के नाँव नइ लय।' 

गनेसिया ह जम्मो बात ल एके साँस म कहि डरिस।

         'आठे के मने ले तीजा माने चल देत रहिन हे। कोनो कोनो मन भाई भउजी अउ मइके के खेती आय कहिके निंदे चाले बर खेत घलव चल देत रहिन। अब तो करू भात के बेरा ले तीजा जाथें-आथें। लइका मन के पढ़ई के नाँव लेके अब सबो एके दू दिन बर आथें जाथें। तीज तिहार मन अब पहिली सहीं खुशी नइ बाँटय कस जनाथे कि मोर भरम आय ते।'  ए दरी सुखियारिन घलव गनेसिया के सुर म सुर मिलावत कहिस। 

         'बने सोरिया हस बहिनी। फेर तइहा के बात बइहा लेगे किथे, पहिली सहीं अब कोनो मइके के खेती ल झाँके बर नइ जावँय। '

        'अब कोनेच ह अपन बेटी ल खेती बूता करय कहिके सोचथे।'

          'दीदी! सावित्री नोनी ह तो आय नइ हे अउ तैं ह अपन मइके जाहूँ कहिके सधाय हवस। अइसन ह शोभा नइ देवय दीदी! बेटी तोर दुआर आही, अउ तैं ह अपन भाई के दुआर जाबे, सावित्री नोनी काय सोचही?'

        'कइसे करबे बहिनी! बछर भर के एक ठन तिहार आय। नइ जाहूँ त भाई रिस करही। दाई-ददा जेन दिन आँखी मुँदही तेन दिन मइके म भाई भउजीच ह तो जगा दिही। मेंहा आज नइ जाहूँ, त काली भाई ह दीदी आबे नइ करय कहिके मोला नइ पूछही? रहिगे सावित्री के गोठ, त सावित्री अपन महतारी बरोबर फूफू मन करा रहिके, तीजा मना लिहीं। तीजा भाई-बहिनी के परेम ल जोरे रखे के तिहार हरे। तीजा सुहागिन बहिनी-माई के मइके म मनाय के तिहार आय। ए  अलगे बात आय कि बहिनी फूफू मन जिनगी भर ए तिहार के अगोरा करथें। ननपन के सँगवारी मन ले मिले के मउका देथे। इही तिहार बछर भर म जम्मो भाई बहिनी ल मिले के मउका देथे। सुख-दुख अउ मन के गोठ करत मन ल फरियाय के मउका देथे।' 

       का करबे दीदी! मैं परबुधनिन ह पर के बुध म आके अपन दाई-ददा ले बाँटा माँग के घाव कर डरेंव। जब ले दूनो झन आँखी मूँदे हें, मोर भाई मन मोला कुछु च बात बर नइ सरेखँय। अपन मन मिल के एक दूसर के अँगना म नाचथें। फेर मोला नेवता नइ देवँय। दूनो बाँटे भाई परोसी बनके एक दूसर घर आथें-जाथें, त महूँ ल बुला लेतिन, महूँ ल सरेख लेतिन त का होतिस? महूँ हर उँकरेच दाई-ददा के बियाय हरँव। दू बूँद लहू छोड़े रेहेंव तभे तो ओमन होइन हें। फेर बाँटा माँग के अतेक का गलती कर डरेंव? भाई होतेंव त बाँटा पातेंव के नइ? सुखियारिन ह अपन अंतस के पीरा ल कहि डरिस। अउ ओकर आँखी ले धार बोहाय लगिस।

        'तोर सवाल सही हे बहिनी! फेर तँय खुदे गुन का दाई-ददा के सरग सिधारे के समे तैं कतका दवा-दारू करे हस? ऊँकर सकला जतन बर के दिन संग रेहे हस? उन मन ल कतेक साहमत दे हस?'

         'काँहीच नइ करेंव दीदी! चार काठा के खेती ले भला मैं का साहमत दे पातेंव? ऊपर ले बेटा बहू के आय ले' .... सुखियारिन के पछतावा के आँसू अउ बोहाय लगिस।

          अब का होही बहिनी! उही चार काठा के जमीन ले तोर दूनो भाई मन दाई-ददा के सेवा जतन करिन। अपन धरम निभाइन अउ तैं ह इहाँ के मोह म पर के मउका चूक गेस। अइसन म भाई मन के मन म काँटा तो चुभबेच करही। 

        मोला लागथे बेटी के हाथ पिंवराय के पाछू दाई ददा तिर ओला देहे बर कुछु नइ बाँचत रहिन  हे। अइसन म तइहा के मनखे मन बेटी-माई ल लिवा के लाय बर तीजा के ओड़हर करिन होही। अउ दू कुल के परिवार म नाता सदा दिन जुरे राहय सोचिन होही। तभे तो ए तिहार हमरे इहाँ चलन म हे।

       'तोर कोनो बेटी नहीं त ननद रहितिस त तहूँ ए तिहार के मरम ल जान पातेच। बेटी ल दाई ददा ले बँटवारा माँगे के चाही, फेर बँटवारा ले काकरो मन झन छरियाय त बने होथे। सुमता सुलाव ले बँटवारा होय ले मया परेम बाँचे रहिथे। लइका मन म तनातनी होवत देख के दाई-ददा मन के मन फाट जथे। ऊँकर जिएँ के आस मर जथे। लइका मन ल चाही के एकर ले बाँचय।'

       भाई-बहिनी म मया-परेम के बाँचे ले ही तीजहारिन लुगरा पाथे। जेन ल सबो तीजहारिन अपन ससुरे म जाके देरानी-जेठानी अउ परोसिन ल उछाह ले दिखाथें। तीजहा मिले लुगरा के गरब करथे।

          एती गनेसिया के भाई ओकर अँगना म ठाड़े दूनो झिन के गोठ ल सुन डरिस। ओमन गनेसिया ले कहिथे- दीदी! असो तैं बस अकेला तीजा नइ जावस। तोर संग सुखियारिन दीदी घलव तीजहारिन बनके मोर घर जाही।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

बलौदाबाजार छग

Saturday, 4 September 2021

सुरता खुमान साव जी-ओमप्रकाश साहू अंकुर,,,,,,, 5 सितंबर को लोक संगीत सम्राट श्रद्धेय खुमान साव जी की जयन्ती पर विशेष...








 

5 सितंबर को लोक संगीत सम्राट श्रद्धेय खुमान साव जी की जयन्ती पर विशेष... 

•जनता के प्रेम को सबसे बड़ा पुरस्कार मानते थे खुमान जी.
•ऊपर से कठोर और अंदर से नम्र स्वभाव के थे खुमान जी.
•राजनांदगांव जिले के डोंगरगॉव ब्लॉक के ग्राम खुर्सीटिकुल में 5 सितंबर 1929 को जन्म हुआ था .
• 9 जून 2019 को स्वर्गवासी हुए. 

-आलेख,ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’
[ सुरगी,राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ ]

●स्व.खुमान साव जी :

कोई भी क्षेत्र विशेष की संस्कृति उस क्षेत्र (अंचल) के लोगों की पहचान होती है. उसी में उसकी आत्मा रची बसी होती है. यह जब अभिव्यक्त होकर लोगों के सामने आती है तो लोग भाव विभोर होकर उसका रसपान करने लगते हैं. अपनी संस्कृति का दर्शन कर लोगों को बहुत सुकून मिलता है.
ढाई करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, लोक परंपराएं, लोक पर्वों, लोक नृत्यों, लोक कलाओं एवं लोक गाथाओं की एक विशिष्ट पहचान है. छत्तीसगढ़ की माटी की महक को भारत ही नहीं अपितु विदेशों में बिखेरने वाले कला साधकों में स्व. देवदास बंजारे, स्व. हबीब तनवीर, स्व. झाड़ू राम देवांगन, श्रीमती तीजन बाई, स्व. मदन निषाद, स्व. दाऊ रामचंद्र देशमुख, स्व. दुलार सिंह साव मंदराजी, लालू राम साहू, स्व. महासिंग चन्द्राकार, स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, स्व. गोविन्द राम निर्मलकर, पूना राम निषाद, माला बाई, फिदा बाई ऋतु वर्मा, ममता चन्द्राकार, कविता वासनिक, पूनम विराट, दीपक चन्द्राकार, रामाधार साहू, एवं लोक संगीत सम्राट
स्व. खुमान लाल साव के नाम अग्रणी है.

जब छत्तीसगढ़वासी फिल्मी संस्कृति की चकाचौंध में अपनी समृद्ध लोक संस्कृति को भूलते जा रहे थे. ऐसी स्थिति में नाचा के भीष्म पितामह स्व. दुलार सिंह साव मंदराजी, लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम के अग्रदूत स्व. रामचंद्र देशमुख, स्व. महा सिंग चन्द्राकार, केदार यादव, लक्ष्मण मस्तुरिया, स्व. खुमान साव जैसे महामानवों ने हमारी समृद्ध एवं गौरव शाली लोक संस्कृति के संवर्धन एवं संरक्षण में अपने जीवन को समर्पित कर दिया.

संगीत में परिवारिक माहौल मिला

खुमान साव जी का जन्म 5 सितंबर 1929को राजनांदगाँव जिले के डोंगरगाँव ब्लाक के ग्राम खुर्सीटिकुल में हुआ था. उनके पिता का नाम टीकमनाथ साव था. थे. .खुमान को लोक संस्कृति से जुड़ने में परिवारिक माहौल मिला. उनके पिता टीकमनाथ गौटिया हारमोनियम बजाते थे. बालक खुमान घर पर ही हारमोनियम बजाने का अभ्यास करने लगे. वे रामायण मंडली में हारमोनियम बजाने लगे. उनकी बड़ी मां के बेटे एवं नाचा के पुरोधा पुरुष मंदराजी दाऊ भी उन्हें हारमोनियम बजाने हेतु प्रोत्साहित करते थे. बालक खुमान 13 साल की उम्र में बसन्तपुर के नाचा कलाकारों के साथ खड़े साज में पहली बार हारमोनियम बजाया. मंदरा जी द्वारा संचालित रवेली नाचा पार्टी में वे 14 वर्ष की उम्र में सन् 1944 में शामिल हुए. उन्होंने नाचा में हारमोनियम पर लोक धुनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सोंधि माटी की खूशबू बिखेरी.

सुरगी में 3 मई 2015 को माँ
कर्मा सामुदायिक भवन में
साकेत साहित्य परिषद् के 16 वें वार्षिक सम्मान समारोह में अपने
अपने उद्बोधन में साव जी ने बताया कि वे अब्दुल रहीम नामक कव्वाल के साथ हारमोनियम बजाने जाते थे. एक बार बालोद जिला के मुजगहन (जेवरतला)में मोजरा करने वाली दो औरतें आई थी. लेकिन उसकी पार्टी के हारमोनियम वादक कमजोर थे. वहां खुमान जी को हारमोनियम वादक का काम मिल गया.

आर्केस्टा के साथ ही सांस्कृतिक मंच का गठन किया

उन्होंने 1950-51 में राजनांदगांव में अार्केस्टा पार्टी भी चलाया. छत्तीसगढ़ के साथ ही महाराष्ट्र एवं मध्यम प्रदेश के विभिन्न शहरों में सफल कार्यक्रम प्रस्तुत किए. 1952 में उन्होंने सरस्वती कला मंडल का गठन किया. कला के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की चाहत में खुमान साव ने भैया लाल हेड़ाऊ, गिरिजा सिन्हा, रामनाथ सोनी इत्यादि लोगों के साथ मिल कर सन 1960 में शिक्षक सांस्कृतिक मंडल का गठन किया. म्युनिसीपल स्कूल राजनांदगांव में शिक्षकीय पद पर रहते हुए लगभग 30 वर्षों तक उनके संगीत निर्देशन में वहां के छात्रों ने प्रतियोगिता में परचम लहराया.
लगभग एक दशक तक अविभाजित मध्य प्रदेश में वहां के विद्यार्थियों ने राज्य स्तरीय लोक सांस्कृतिक प्रस्तुति में धाक बनाए रखा. इस दौरान राजनांदगांव में रहे फिर वे सोमनी के पास ठेकवा गांव में बस गए.

जब दाऊ रामचंद्र देशमुख ने आमंत्रण दिया

साव जी ने बताया कि उनकी घर की नौकरानी समारिन बाई ने भी नाचा में काम किया.
सन् 1952 में पिनकापार (बालोद) निवासी दाऊ रामचंद्र देशमुख के आमंत्रण पर खुमान साव मंडई के अवसर पर आयोजित नाचा में हारमोनियम बजाने पिनकापार गए. साव जी के अनुसार पिनकापार में दो साल मंडई के अवसर पर हुए नाचा कार्यक्रम का असर यह हुआ कि 1953 में रवेली और रिंगनी नाचा पार्टी का विलय हो गया. वीदित हो कि इन दोनों वर्ष ख्यातिलब्ध रवेली और रिंगनी नाचा पार्टी के संचालक के छोड़ बाकी नामी कलाकार आमंत्रित किए गए थे. ( मंदराजी महोत्सव समिति रवेली द्वारा प्रकाशित “गम्मत “1999 के लेख – नाचा के शिखर पुरुष : मंदराजी दाऊ
लेखक – खुमान साव, पृष्ठ 63- 64, संपादन – जय प्रकाश)
1971 में आकाशवाणी रायपुर में उनके संगीत निर्देशन में गाने की रिकार्डिंग हुई. भैया लाल हेड़ाऊ एवं अन्य कलाकारों ने गीत गाए. एक बार बघेरा वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख (पिनकापार
वाले जो अब बघेरा में रहने लगे थे) ने आकाशवाणी रायपुर से खुमान साव एवं उनके कलाकारों के गीतों को सुना . उनके संगीत से प्रभावित होकर दाऊ जी ने खुमान साव को बघेरा बुलाया. दाऊ जी उस समय छत्तीसगढ़ के छुपे हुए लोक कलाकारों को तराशने का काम कर रहे थे. वे चन्देनी गोंदा में हारमोनियम वादक के रुप में सम्मिलित कर लिए गए. 1971 में चन्देनी गोंदा का प्रर्दशन बहुत ही शानदार रहा. चन्देनी गोंदा के प्रसिद्धी में संगीत पक्ष का अहम योगदान रहा है जिसमें साव जी की भूमिका स्तुत्य है. खुमान के संगीत एवं लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, कविता वासनिक जैसे अन्य मधुर
आवाज के धनी लोक गायक गायिकाओं के बल पर चन्देनी गोंदा का संगीत पक्ष इतना सुदृढ़ हो गया कि सोने पे सुहागा हो गया.

इस दौरान खुमान साव जी ने अपने कलाकारों के साथ घर में ही 27 गाना रिकार्ड करवाए और रमेश राय के माध्यम से आकाशवाणी रायपुर गया. इस दौरान लोक संगीत के संबंध में प्रसिद्ध उद्घोषक केसरी प्रसाद बाजपेयी से तकरार भी हो गया. बाद में कैसेट को बाजपेयी ने भी सराहा.                              बुढ़ापा में भी संगीत का जुनून रहा

दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा चन्देनी गोंदा को विसर्जित करने के बाद 1980 से 2019 तक (39 वर्ष) वे निर्बाध गति से चन्देनी गोंदा को संचालित करते रहे. उन्होंने जिस प्रकार से लोक संगीत के माध्यम से छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है वह अतुलनीय है. वे 1990 में शिक्षकीय कार्य से सेवानिवृत्त हुए और पूरी तरह लोक संगीत के लिए समर्पित हो गए.

अनुशासन प्रिय शख्स थे

लोक संगीत सम्राट स्व. खुमान साव जी से प्रथम बार मुलाकात 17 मार्च 2002 को राजनांदगांव के दिग्विजय स्टेडियम में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वार आयोजित छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्ति इतिहास और भविष्य विषय पर आयोजित संगोष्ठी में हुआ था। वहां वह शोरगुल कर रहे कुछ जवान बच्चों को अपनी कड़क आवाज से डाट रहे थे. यह देखकर अग्रज कवि श्री महेन्द्र कुमार बघेल मधु जी ने मुझसे पूछा कि ये शख्स कौन है. बहुत ही कठोर व्यवहार लगता है. मैंने भी पहचानने में असमर्थता जाहिर की. इसी बीच कार्यक्रम की अगुवाई कर रहे गुरुवर डॉ. नरेश कुमार वर्मा जी (प्राध्यापक, हिन्दी, दिग्विजय कॉलेज, राजनांदगांव )हम लोग बैठे थे उस तरफ आए तो मैंने पूछा कि – ऊंचा कद काठी, श्वेत वस्त्र धारण किए एवं रौबदार व्यक्तित्व के धनी यह व्यक्ति कौन है ? तो वर्मा सर जी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है कि”- अरे! ओम प्रकाश इसे नहीं जानते? वो सामने खड़ा शख्स कोई व्यक्ति नहीं एक संस्था है. छत्तीसगढ़ लोक संगीत के पुरोधा पुरुष है. अरे भई वे” चंदैनी गोंदा” के संचालक आदरणीय खुमान साव जी है”. फिर साव जी से चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिए।

नारियल की तरह थे साव जी

दूसरी मुलाकात मानस भवन दुर्ग में आयोजित राज्य स्तरीय छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन में हुआ ,कार्यक्रम प्रारंभ नहीं हुआ था. साहित्यकारों और कलाकारों का आगमन हो रहा था. भवन के स्वागत द्वार में आदरणीय खुमान साव जी और अन्य साहित्यकार खड़े हुए थे. मैंने खुमान सर जी सहित वरिष्ठ साहित्यकारों से आशीर्वाद लिया।
इसी बीच एक युवा साहित्यकार आए और जिन साहित्यकारों को पहचानते थे उनके चरण स्पर्श किए. और हम लोगों से खुमान साव जी तरफ इशारा करते हुए पूछने लगे कि ये कौन है? मैं खुमान सब जी का परिचय देने ही जा रहा था कि साव जी ने मेरे हाथ पकड़ते हुए रोक दिया और उस नौजवान रचनाकार से पूछा कि – “पहिली तेहा बता कोन गांव के हरस. नवजवान संगवारी ह बोलिस -मेहा बघेरा (दुरुग) के हरव, खुमान सर जी ह बोलिस -तेहा बघेरा के हरव कहिथस त में कोन हरव तेला तोला जाने ल पड़ही, अऊ मोर नाम नई बता पाबे ते तोला मारहू किहिस, वहू नवजवान ह सकपगागे। ”
फिर इस दौरान चूंकि खुमान साव जी के अख्खड़ स्वभाव से मैं परीचित हो चुका था। देरी न करते हुए बताया कि आपके सामने जो महामानव तन कर खड़ा हुआ है वह और कोई नहीं लोक संगीत के के भीष्म पितामह श्री खुमान साव जी है।वह नए रचनाकार कर यह सुन कर गदगद हो गए और श्रद्धा से पांव छुए और कहा कि आज मैं आपके दर्शन पाकर धन्य हो गया। और साव जी ने पुत्रवत भाव से उसके सर पर हाथ रखते हुए उसे आशीर्वाद प्रदान किया। इस बीच चार पांच वरिष्ठ साहित्यकार इस प्रसंग पर मंद मंद मुस्कुराते रहे.
फिर खुमान साव जी अत्यन्त विनम्र भाव से कहा कि-” तेहा बघेरा के हरो केहेस तेकर सेती तोला केहेंव कि मोला जाने ल पड़ही ।फेर वो नव जवान ल पूछिस कि -दाऊ रामचंद्र देशमुख ल जानथस? वो ह बोलिस हाव. फेर पूछिस विश्वंभर यादव मरहा ल जानथस? त वोहा फेर कहिस कि हाव जानथव।”

“साव जी बोलिस ओकर घर म रिहर्सल चले त महू ह डेरा डारे रहव. हारमोनियम बजाव. तेकर सेती तोला केहेंव रे बाबू कि मोला जाने ल पड़ही?”
तो इस घटना से यह पता चलता है कि साव जी उस नारियल की भांति थे जो बाहर से बहुत ही .कठोर नजर आते थे परन्तु अंदर से बहुत ही नम्र थे.                उनके द्वारा संचालित चन्दैनी गोंदा की प्रस्तुति को देखने का सौभाग्य मुझे भरदाकला (बालोद जिला ) में प्राप्त हुआ था. हमारे गांव सुरगी के बहुत सारे कला प्रेमी भी भरदाकला पहुंच कर विराट सांस्कृतिक प्रस्तुति के दर्शन का पुण्य लाभ उठाए थे। खुमान साव जी के मधुर संगीत से सजे विभिन्न गीतों को जब लोक गायकी में दक्ष गायक- गायिका के कोकिल कंठी आवाज गाते और उसमें नृत्य की मनोहरी छटा मन को झंकृत कर दिए थे. बारहमासी गीत के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सोंधि सोंधि माटी की महक को बिखेरे वहीं भारत की आजादी की लड़ाई को प्रस्तुत कर लोगों में शहीदों के प्रति श्रद्धा भाव जगाने के साथ ही
देश प्रेम की अलख जगाए। पूरी रात भर दर्शक टक बांध कर चन्दैनी गोंदा की प्रस्तुति को देखते रहे.

जब साकेत के वार्षिक समारोह में पहुंचे

साकेत साहित्य परिषद के रचनाधर्मीयों के प्रति वे बहुत2 वात्सल्य भाव रखते थे .वर्ष 2012 में मॉ भवानी मंदिर करेला धारा डोंगरगढ़ के प्रांगण में आयोजित 13 वॉ वार्षिक समारोह में उनका प्रथम बार आगमन हुआ .
अखबारों में साकेत के वार्षिक समारोह के समाचार को पढ़कर वे करेला पहुंचे थे . माता के दर्शन के साथ ही साहित्य के प्रति अनुराग और साहित्यकारों के प्रति सम्मान भाव के चलते वे वहां पहुंचे थे . माता के दर्शन कर वे सीधे श्रोता दीर्घा में पहुंच गए. साकेत में हम सभी जिम्मेदार सदस्य खुमान सर जी के पास पहुंचकर आशीर्वाद लिए और हाथ जोड़कर मंच में विराजमान होने के लिए निवेदन किए.
लेकिन स्वाभिमानी खुमान सर मंच पर जाने से मना कर दिया और ज्यादा जिद करने पर अपनी चिरपरिचित अख्खर स्वभाव में आ गए और बोले” तुमन अपन काम करव अऊ मेहा अपन काम करत हव. तुमन ज्यादा ब्रेक मत लेन. मेहा मंच मा नई जाव क्रेन न मतलब नइ जाव. ”
इतने रौबदार आवाज सुनने के बाद अब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उनसे और निवेदन कर सकें .
इस दौरान साकेत के सदस्यगण असहज महसूस करते रहे छत्तीसगढ़ लोक संगीत के पुरोधा पुरुष मंच के नीचे बैठे हुए हैं लेकिन खुमान तो खुमार ठहरे न. और इस बीच में इत्मीनान से घंटों बैठकर साहित्यकारों के विचार सुनते रहे .इसे हम मां भवानी की कृपा ही कह सकते हैं कि साव जी का सानिध्य हम सबको मिल पाया .

सुरगी में सुनाए अपनी कला यात्रा के साथ रोचक संस्मरण

जनता के प्रेम को ही सबसे बड़ा सम्मान मानते थे

इसी प्रकार वर्ष 2013 में सुरगी के ग्राम पंचायत भवन में आयोजित साकेत के 14 वां वार्षिक समारोह में पहुंचकर सभी साहित्यकारों को अनुग्रहित किए यहां उन्होंने संस्मरण सुनाने के साथ ही साहित्यकारों का उत्साहवर्धन भी किया.
साकेत का 16 वॉ वार्षिक सम्मान समारोह वर्ष 2015 में सुरगी के कर्मा भवन में आयोजित किया गया इस समारोह में खुमान सर जी को साकेत सम्मान 2015 से सम्मानित किया गया .इस दौरान उन्होंने चंदैनी गोंदा से संबंधित मनोरंजक संस्मरण सुना कर घंटों तक बांधे रखा .उत्तरप्रदेश में चन्दैनी गोंदा की प्रस्तुति के दौरान कलेक्टर की पत्नी को देवता आ जाना . फिर दूसरे दिन कलेक्टर द्वारा साव जी को सम्मानित करना. इस प्रसंग को सुनाने का अंदाज ही निराला था. उन्होंने अपने उद्बोधन से सब को भावविभोर कर . खुमार सर किहिस – “मोला जनता से जउन परेम मिलथे उही हा मोर बर सबसे बड़े सम्मान हरे, आज तक मेरा राज्य सम्मान अऊ पद्म सिरी के लिए आवेदन नई करे हंव न भविष्य म कहीं. हॉ शासन हा मोला स्वेच्छा से सम्मान देना चाहय त दे सकथे .
आप मन के बीच ये साकेत सम्मान ले सम्मानित होत हंव वोहा कोनो राज्य अलंकरण अऊ पद्मश्री से कम नइ हे . छत्तीसगढ़ के लाखों जनता के परेम ही मोर सबसे बड़े सम्मान हरे .”

इसी प्रकार वर्ष 2016 में सुरगी के मुख्य सांस्कृतिक मंच (शनिवार बाजार चौक) में 17 वां वार्षिक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. इसमें 87 वर्षीय खुमान साव जी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 हेतु चयन किए जाने पर नागरिक अभिनंदन किया. लोक संगीत के इस पुरोधा पुरुष ने 89 वर्ष की अवस्था में 9 जून 2019 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.लोक संगीत के इस महामानव को शत् शत् नमन है. 

           ओमप्रकाश साहू" अंकुर "  सुरगी, राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) 
    मो. 7974666840