Sunday, 11 December 2022

चिरई बर धान के झूल---


 चिरई बर धान के झूल---


हमर छत्तीसगढ़ म किसिम-किसिम के चिन्हारी, परंपरा, नेंग, रीति-रिवाज हवय जेहा कोनों न कोनों डहन ले प्रकृति ले जुड़े अउ परोपकार के भावना ले भरे होथे। ये परोपकार के भाव धरती के सबो परानी मन बर होथे। ये बुता ल खुशी-खुशी ले घलो करे जाथे। जेकर ले मन म बड़ा आंनद आथे। ये साल मेहा अपन स्कूल म घलो चिरई मन बर झूल ल खीला म अरो के रखें हों।


किसानी के बुता म जब धान के सोनहा बाली ल झुलत रथे त गजब मनभावन लगथे। किसान के मन ह कुलकत अपन जांगर के कमई के फल ल देख आगास म उड़त कई ठन सपना संजोवत रथे। 


धान बाली के आये के बाद करगा ल निकालत अउ धान के लुवई के बेरा म बासी-पेज खाय के समे हमर दाई-माई मन सुरतावत बढ़िया बुता घलो करथे। धान के बाली ले झूल बनाये के बुता। जेला सबो झन ल बनाये बर नई आये। कोई-कोई मन ल ही बनाये बर आथे। झूल के बनई घलो एक कला हरे। जे बने के बाद बढ़िया चापे-चाप मुड़ी कोरे गांथे सही दिखत रथे।


धान के झूल ल बनाये के बाद घर के परवा-छानी के खाल्हे म रख देथे। चिरई मन आके ओला खाथे अउ अपन पेट भरथे। देवारी तिहार के दिन घलो झूल ल घर म रखे जाथे जेला शुभ माने जाथे अउ बढ़िया घलो दिखत रथे। चिरई मन झूमे रथे अउ बाली के दाना मन ल खोल-खोल के मजा करत खावत रथे।


धान के झूल जीव-जंतु मन बर दान अउ किसान मन के परोपकार के भावना ल घलो बताथे। किसान अपन संग सबो जीव मनके संसो करथे। किसान के उपजाये फसल ह सबो जीव के बांटा लगे रहिथे। ओमन कोनो डहन ले अपन हिस्सा ल ले डारथे। प्रकृति सबो जीवधारी मन बर भोजन के बेवस्था करथे। प्रकृति अउ जीव-जंतु मन ले जुड़ाव आदमी के जनम ले बने रथे, जेहर कभू नई दुरिहाये।


          हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगाँव


चिरई चुगनी चन्द्रहास साहू

 



चिरई चुगनी

                  

                             चन्द्रहास साहू 


                        Mo 8120578897


"मेंहा किरिया खाके कहत हँव दाई ! बिहाव करहू ते ओखरेच संग। मेहा जावत हव ओखर संग मिले बर।''

मोटियारी सुमन किहिस। आँखी के समुन्दर जलरंग -जलरंग करत रिहिस ओखर । जानकी तो ठाड़ सुखागे। हुंके न भूंके। आँखी के आंसू घला अटागे रिहिस। झिमझिमासी लागिस। मुँहू चपियागे। दुवारी के बरदखिया खटिया मा हमागे अब । खटिया के तरी मा माड़े फुलकाछ के लोटा के पानी ला सपर-सपर पी डारिस। उदुप ले उठिस अऊ नानकुन झोला ला धरिस। अपन बेटी सुमन के हाथ ला धर के रेलवाही कोती चल दिस। टिकट कटा के रेलगाड़ी में बइठगे दुनो महतारी बेटी। गाड़ी दउड़े लागिस अपन गति मा अऊ जानकी के मन घला। भलुक मुक्का हावय तभो ले मन गोठियावत हावय। सुरता करत हावय अपन ननपन ला।

                 चौक के महाबीर ला पैलगी करथे। दूध पियावत गाय ला जोहार करथे। शीतला तरिया के पार ला चढ़के पिपराही खार मा जाथे, तब मन मोहा जाथे जानकी के। बम्बूर के पिवरी फूल मुड़ी मा गिरे तब अइसे लागथे जइसे प्रकृति हा स्वागत करत हावय। चिरई चिरगुन के चिव- चिव स्वागत गीत गाथे।  जानकी के मन गमके लागथे । बइला के घाँघरा अऊ टेक्टर के गरजना- सब सुहाथे।  खेत के नानकुन बखरी मा झूलत तोरई तुमा कुम्हड़ा  के लोई ला कुंदरा मा पीठइया चढ़ाथे। भाटा ला झेंझरी मा टोर के धर लेथे। दाई हा जिमीकांदा खनत हावय झौउहा भर । ददा हा मुँही फोर के ये डोहरी ले ओ डोहरी पानी पलोवत हावय।  नान - नान बिता भर के लाल अऊ पालक भाजी फूलगोभी .…..। सेमी के नार मा फरे पोक्खा- पोक्खा सेमी , सादा फूल, फूल मा उड़ावत- बइठत रंग - बिरंगा  तितली  अऊ तितली के पांख......सुघ्घर । अइसे लागथे जइसे सब ला काबा भर पोटार लेवव। 

"बेटी ! ये जतका खेत दिखत हावय ते हमर आय। चालीस एकड़।''

ददा हा जानकी ला खेत देखावत रिहिस। जानकी बेरा-बेरा मा आथे खेत देखे बर। पाछू दरी पोरा मान के चीला चढ़ाये बर आये रिहिस।

"ददा माईलोगिन मन जब अम्मल मा रहिथे तब सात किसम के कलेवा ले सधौरी खाथे। अन्न्पूरना  के बरन धान जब गभोट होथे तब चाउर गहु के गुड़हा चीला खवाके इही मंगलकामना करथे- दाई तोर कोरा भरे राहय, तोर कोरा ले पोठ धान मिलही जौन हा हमर कोठी ला भरही अऊ गरीबी नइ आवन देवय।दाई अन्नपूरना हा सबके पालक आवय फेर आज किसान हा पालक बनके अपन बेटी ला सधौरी खवाथे ।''

"हाव सिरतोन काहत हस बेटी !''

ददा हुकारु दिस। सोनहा धान के बाली ला सिल्होए लागिस दुनो कोई । पोठ- पोठ लम्बा बाली नगरी दुबराज सफरी सरोना अऊ हाइब्रिड धान के । ये जम्मो धान के बाली के सुघ्घर झालर बनाथे जानकी हा । ओखर डोकरी दाई सीखोये हावय न । आड़ी - चौड़ी धान के बाली ला खोंच-खोंच के अइसे बनाथे कि दाना मन बाहिर कोती अऊ ढेठा भीतरी कोती। दाना ओरमत रहिथे। सुघ्घर दिखथे अब्बड़ सुघ्घर। गोल चकोर ईटा आकार के सुघ्घर झालर। झालर सेला धान के झूमर चिरई चुगनी रिकम-रिकम के नाव हाबे ऐखर । लछमी दाई के बरन घला आय येहाँ।  चिरई मन बइठथे अऊ दाना ला फोल - फोल के खाथे। चिरई के चिव- चिव, कुटूर- कुटूर ,गुटूर - गुटूर अब्बड़ सुघ्घर लागथे। मन मोहा जाथे। गौरइया सलहई पड़की परेवा मिठ्ठू मैना के संग परदेसी चिरई मन घला आ जाथे दाना चुगे बर .....!  चिरई दाना ला चुग के अपन वंश बढ़ाथे। धान के बाली अपन अस्तित्व ला मेटा देथे  चिरई मन बर।  तभे तो चिरई चुगनी कहिथे येला। ...अऊ बाचल पैरा ला गाय खाथे तब वहु अघा जाथे। जानकी अऊ ओखर  दाई हा बना डारे रिहिस सुघ्घर धान बाली के झालर ...चिरई चुगनी ।

"कतका सुघ्घर हावय ददा ! हमर छत्तीसगढ़ के परम्परा संस्कृति हा ..! अब्बड़ गुरतुर ।''

जानकी  किहिस अपन बनाये चिरई चुगनी ला देखावत । दाई ददा घला अब्बड़ उछाह हावय।

"कुंदरा के मियार मा.., मंझोत के डंगनी मा.. जाम के रुख मा.. कोन जगा बांधो चिरई चुगनी ला ..? नही .. । बोर के पाइप  मा मोर चिरई चुगनी ला बाँधहु।  ददा !  चिरई मन आही दाना ला खाही अऊ पानी घला पिही कतका सुघ्घर लागही चिंव - चिंव करत चिरई हा।'' 

 जानकी  किहिस अऊ अपन मुँहू ला बजाए लागिस चिंव- चिंव ।

"हव बेटी बांध दे ।''

ददा किहिस अऊ  पंदोली दिस। 

"कतका सुघ्घर हावय ददा हमर बोर के पानी हा । मोर संगवारी घर के बोर फेल होइस अऊ हार्ट अटैक मा ओखर बाबू ....!''

"कलेचुप रहा बेटा अइन्ते- तइन्ते के गोठ झन गोठिया  बेटी !''

ददा बरजिस। 

"हमर किसमत मे कहा गंगा माई हावय बेटी ! ओ तो तोर पूजा करे के जगा मा बोर करवाय हव तब निकलिस भक्कम पानी । हमर पूजा करे वाला भुईयां के पानी अटागे रिहिस धुन हमरे हाथ छुतियाहा रिहिस ते ? येहा पांचवी बेरा आय । पाछू दरी के चारो  बोर हा तो सुक्खा होगे। बोर पानी के लालच मा अब्बड़ करजा होगे हावय ओ ! कोन जन कइसे छूटाही ते  ? पांच एकड़ खेत बेचे ला लाग जाही अइसे लागथे।''

 ददा संसो करे लागिस।

                      जानकी तो फुरफन्दी रिहिस । ये घर ले ओ घर, ये पारा ले ओ पारा किंजरे । फेर जिनगी मा गरेरा कइसे समागे आरो नइ पाइस। ददा के टट्टागाड़ी मा बइठ के आइस जवनहा  परदेसी ओखर दाई अऊ ददा हुकुमचंद हा। ओखर राज मा दंगा फसाद होगे तेखर सेती पलायन करके आये हावय। सब सुघ्घर होही अऊ लहुट जाही...। अइसना किरिया खाये रिहिस । फेर नइ लहुटिस ।          

                      भलुक सड़क तीर ला पोगरा डारे हावय। बेसरम काड़ी झिपारी छा डारिस । बंदन पोताये पथरा माड़ गे अब। बंदन पोताये पथरा माड़  जाथे तब आस्था बिसवास  बाढ़ जाथे । 

 पार्षद पंच सरपंच कोनो नइ बरजिस । भलुक महाशिवरात्रि आथे तब दूध पीयाथे । नवराति दसेरा देवारी मा खीर पुड़ी .. । ईद , क्रिसमस मा कोल्ड्रिंक अऊ शरबत बाटथे। जम्मो धरम बर आस्था हावय तब का के डर...? कोन डरवाही ....? कोन भगाही...?

                        पथरा हा भगवान आय कि नही परमात्मा जाने फेर भीड़ हा तो भगवान आय जुझारू कर्मठ नेता माटीपुत्र मन बर। सुकालू करा राशनकार्ड नइ हावय। अऊ बुधारू करा मतदाता परिचय । फेर ये परदेसिया मन कर सब हावय अब । समारू के परछी भसके चार बच्छर होगे। आधार कार्ड के बिना कोनो योजना के लाभ नइ मिले अऊ...! 

               झिल्ली झिपारी वाला चार कुरिया हा अब संगमरमर लगगे तरी-तरी । चकाचक मन्दिर अऊ मन्दिर प्रांगण होगे। मंत्री जी उदघाटन करे हावय न।  

                     " जतका चर ले ..चर । जतका चुहक ले...चुहक। येहा तो छत्तीसगढ़ माने सी. जी. आवय। सी. माने चारा अऊ जी  माने गाह आय.. चारागाह । जतका चर ले...।''

बाप  हुकुमचंद अऊ बेटा परदेसी खिलखिलाए लागिस गोठिया के। 

                      जानकी अऊ परदेसी हम उम्मर तो आय अऊ कब दुनो के अंतस मा मया के गोरसी रगरागये लागिस पार नइ पाइस। हुकुमचंद तो एखरे ताक मा रिहिस। बिलई ताके मुसवा।

"ददा परदेसी संग बिहाव करहु ।''

 अब्बड़ बरजिस फेर जानकी के अर्दली पन मा नवगे ददा हा । दू संस्कृति दू रस्म रिवाज ले बिहाव होगे। फेर गाँव समाज के ठेकेदार हा जानकी के ददा ला छोड़ दिही का...? आनी बानी के हियाव - नियाव होये लागिस । बइठ - बइठका होये लागिस। कतक ला सहही माटी के चोला हा । एक दिन सिरागे ददा हा ।

    

                    परदेसी के साध पूरा होगे । चालीस एकड़ खेत जानकी के नाव ले कब परदेसी के नाव मा चढ़िस  पार नइ पाइस।

मीठ लबरा के बरन अब दिखे लागिस । ताना अपमान रोज के गोठ होगे अब ।  अऊ बेटी के जनम आइस तब ...? सात जनम ले संग निभाहु, मया के किरिया खवइया ला जानकी अऊ ओखर बेटी सुमन बस्साये लागिस। निकाल दिस घर ले। कोन जन कुलदीपक, डेहरी के अंजोर करइया टूरा के जनम आतिस तब डिंगयहा के घर कतका महर -महर ममहातिस ते ....?

                  मामी-ममा मरजाद ला राख लिस जानकी के। नही ते का होतिस ते .... ? भगवान श्री राम के जानकी कस यहु जानकी होगे दुखियारी....।  गोसाइया ले वियोगी । अब तो हुकुम चन्द हा सेठ हुकुमचंद होगे हे । धनबल बाहुबल सब ओखर । अइसन ससुर अइसन गोसाइया संग कइसे  लड़ो ... जानकी गोहार पार के रो डारथे।

               परदेसिया मन हमर  छत्तीसगढ़ मा उत्ती बुड़ती रकसहु भंडार जम्मो कोती के देश राज ले आये हावय कमाये खाये बर । कोन राज के नइ आय हावय  इहा ....? सब लोटा धर के आइस अऊ अतका जैजात सकेल डारिस।  बड़का होटल, फेक्ट्री, बड़का बिल्डिंग, दुकान, शॉपिंग मॉल, पेट्रोल पम्प, बड़का गाड़ी,अऊ बड़का कालेज...सब  जिनिस तो हावय ओखर मन करा । .....अऊ हमर मन करा का हावय....? हमर करा हावय सुघ्घर नारा  - "छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया'' के।

जानकी गुनत -गुनत मुचकाये लागिस करू ..करेला अऊ लीम ले जादा करू मुचकासी ।

हा ! सब ले बढ़िया तो हावन हमन । लांघन ला जेवन करवाथन, पियासे ला पानी पियाना अऊ रहे बर छइयां देना। इही तो हमर सुघरई आवय फेर ....?  कड़ी मिहनत सरलग बुता अऊ टाइम मैनजमेंट ले अतका पोठ होवत होही परदेसिया मन कि ..... ? फेर छत्तीसगढ़िया मन घलो सिधवा हावय भोकवा नही..। अपन अधिकार ला लेये ला परही। 

जानकी गुनत- गुनत थाना कछेरी  चल दिस।  ससुर अऊ गोसाइया ले अधिकार पाये बर। बिसवास अतका रिहिस कि पथरा मा पानी ओगर जाही तब न्याय कइसे नइ मिलही..?

                     ददा के पनही बेटा के गोड़ मा आथे तब बेटा बड़का हो जाथे। पिकी फूटत दाड़ी मेंछा ला रोखा के लजाथे तब ..सिरतोन बेटा बड़का हो जाथे। अऊ बेटी ... ओ तो ननपन ले बड़का हो जाथे..। ठूबुक - ठूबुक रेंगत- रेंगत बहराये परछी ला अऊ बहारथे। धोवाये बरतन ला, अऊ मांजथे । रोटी बनावत पिसान ले सनाय ओन्हा अऊ कोवर- कोवर हाथ अंगरी ला मटकावत कहिथे

" दाई मेंहा रोटी बनाहु तेन अब्बड़ मिठाही । खाबे । मेंहा बड़े होहु तब तोला नइ कमाये ला लागे ।'' 

थके जानकी के माथ मा कोवर - कोवर हाथ ले मालिस करथे नानचुन  सुमन हा गोठियावत - गोठियावत तब जानकी के मन अघा जाथे । दू टीपका  आँसू गिर जाथे।


"दाई  अमर गेन रायपुर के रेलवे स्टेशन ला उतरबोन चल।'' 

सुमन के दुसरिया आरो कान मा गिस तब सुरता ले उबरिस जानकी हा। जिनगी के किताब के जम्मो पन्ना ला उलट - पुलट डारिस जानकी हा आज । आँखी के कोर के ऑंसू ला पोछिस अऊ उतरके बड़का होटल कोती चल दिस दुनो कोई।

सुमन के मन मंजूर बनके नाचत हावय। सपना के राज कुमार ले मिलही आज । बिदेशी ले मिलही आज। बिदेशी राम इही तो नाव हावय फेसबुकिया राजकुमार के। बच्छर भर के फोन फ़ेसबुक वाट्सअप के मया । ओमे तो गजब सुघ्घर दिखथे सिरतोन मा कतेक सुघ्घर लागत होही ....?  सुमन गमकत हावय। मने-मन गुनत हाबे।

"बस आतेच हव।''

  फोन म किहिस बिदेशी हा अऊ कटगे। कब आही ते ...?-आधा घंटा ...एक ..डेढ़  अगोरा करत हावय   होटल मा बइठ के। सुमन हा बिदेशीराम के।

" मेंहा अब्बड़ सीखोये हँव बेटी पैडगरी के कांटा खूंटी होवय कि जिनगी के बिच्छल सावचेती होके रेंगबे। बर बिहाव ठठ्ठा - दिल्लगी नोहे बेटी ! मया के विरोध नइ करो बेटी फेर टूरा ला अपन अनभव ले जाचहु अऊ मोर मन आही तब गोठ बात बनही । जादा झन सपना देख। जादा झन गुन ...।  दू घन्टा होगे कब आही ते पूछ फोन लगा के ।''

जानकी फेर बरजिस सुमन ला।

"नइ लगत हावय दाई फोन.....। स्वीच ऑफ आवत हावय... बैटरी लो होगिस होही दाई ..।'' सुमन  आस के संग किहिस।

"ओहा नइ आय बहिनी ! ओहा तो अपन राज भाग गे । तेहा अकेल्ला आतेस तब होटल के कुरिया मा लेगतिस। अऊ ...?  अऊ दाई संग आवत देख के पल्ला भाग गे।''

 रिसेप्शनिस्ट बताइस सुमन ला । सुमन अकचकागे...।

"सिरतोन काहत हस बहिनी ?''

"हाव ''

" ओहा हमर होटल मा आते रहिथे । जानथो मेंहा ओला। अऊ...ओहा कोनो जवनहा नोहे । पचपन साठ बच्छर के डोकरा आवय ... डोकरा। फेसबुक वॉट्सअप मा आने जवनहा के फोटो ला स्टेटस मा डाल के....!

झटकुन मोबाइल निकाल के फेस बुक के चैटिंग देखिस सुमन हा।

 "गुड बाय'' 

 "ब्रेकअप ''

 करिया आखर ला देखत - देखत रो डारिस। भरम टुटगे रिहिस अब सुमन के। दाई जानकी के नरी मा झूलगे अब। 

                       ससन भर देखिस होटल ला । आदिवासी नृत्य मांदर खुमरी पंथी पंडवानी के पोस्टर ....छत्तीसगढ़ी संस्कृति के छप्पा ... जम्मो दिखावटी लागत रिहिस। 

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़िया अऊ छत्तीसगढ़ी कोनो चिरई चुगनी नोहे ..। कोनो परदेसी चिरई आही अऊ चुग के चल दिही ...। कोनो जयचन्द ला आवन नइ देवन ये भुइयाँ मा...। संकल्प लिन दुनो कोई।

       मेन गेट मा झूलत सुन्ना झालर चिरई चुगनी ला देखिस ससन भर दुनो कोई । अऊ अपन घर चल दिस गुनत- गुनत । 

चिव- चिव, कुटूर- कुटूर ,गुटूर - गुटूर कान बाजत हे नवा उछाह के संग  जानकी अऊ सुमन के अब। मन गमकत हावय ।


चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो. 8120578897

परम्परा के ताना अउ आधुनिकता के बाना म बीने गय एकठन नान्हे मया -पिरीत के कहिनी (प्रेम कथा)* -

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*परम्परा के ताना अउ आधुनिकता के बाना म बीने गय एकठन नान्हे मया -पिरीत के कहिनी (प्रेम कथा)*  -



            🌈🌈 *मोहरी* 🌈🌈



-रामनाथ साहू


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               मोहरी बाजत हे।


           बाजा - रुंजी मन म , ये मोहरी के बड़ महत्तम हे। येहर हमर छत्तीसगढ़ीया -शहनाई आय। अइसनहेच मिलता- जुलता बड़े आकार के बाजा ल हमर  दक्षिण भारतीय भई मन - नाद स्वरम  घलव कहिथें ...रत्नाकर मोहरी के धुन ल सुनत मने मन गुनत हे।  वोहर अभी अपन थोरकुन धुरिहा के रिश्तेदारी म बरात आये हे।अउ अभी वोकर  करा कुछु खचित काम घलव नइ ये। पूरा फुरसत ले , वोहर ये बिहोतरा- बाजा के आनन्द उठात हे ।  



        अपन मुड़ म परे कारज म तो मनखे ल मुड़ खुजियाय के फुरसत नइ मिलय। अउ निकट -सम्बन्धी  मन के  कारज ल तो कूद के उठाय बर लागथे ।तब अइसन बाजा -रुंजी सुने के अवसर कहाँ मिल पाथे।


        मोहरी के सुर कान म मिश्री ल घोलत हे ।


 "हाय.. रत्नाकर..! कइसन हावस बाबू अउ इहाँ तंय कइसन..? "आवाज हर जाने -चीन्हे कस लागिस, रत्नाकर ल।वोहर  वो    कोती ल  देखिस।  अब तो वोकर क्लासमेट श्रुति,वोकर तीर म आ के खड़ा हो गय रहिस ।


"कोन श्रुति...!! तंय इहाँ कइसन...?"


"येहर मोर गांव...मोर  छईंहा- भुइंया।"


श्रुति झरझरात कहिस,"अउ तंय बारात आय हस ।"


"वाह...!तँय कइसे जान डारे कि मंय बारात आँय हंव।" रत्नाकर घलव श्रुति ल अइसन अचानक आगु म पा के आनन्द -विभोर हो गय रहे।


"तँय अतेक फुरसत लेके ये दे मोहरी ल सुनत हावस अउ बरतिया मन के संग म मिंझरे हावस न।अउ येकर ल बड़खा बात...तँय इहाँ मोर गांव शायद पहिली बार आय हावस।"श्रुति पूरा विस्तार ल बता दिस।



        अउ वो मुचमुचात खड़े रहिस । अब  रत्नाकर विपत्तिया गय,अब श्रुति करा गोठियाव कि मोहरी ल सुनों। वोहर दुनों च छोड़ना नइ चाहत  रहिस ।



          श्रुति  अउ रत्नाकर कक्षा -संगवारी ये। वोमन के स्नातकोत्तर कक्षा म मनखे के कमी नइ ये।श्रुति करा  रत्नाकर के विशेष परच..उठना- बैठना नइ रहिस।हाँ... फेर एके जात -बिरादरी के होय के सेथी, वोकर उपर नजर हर परिच  जाय ।वोकरे कस अउ चार -पांच लड़की मन वोकर  ये कक्षा म हांवे वोइच जाति- बिरादरी के।वो सब  मन उपर जाने -अनजाने नजर परिच जाय ।



             मोहरी बाजत हे...!



"चल मोर घर...!"


"अभी नहीं...!"


"अभी नहीं त, तँय अउ कब आबे?"


"पता नइये।वो दे ध्यान लगा के सुन! मोहरी हर बाजत हे अउ का का कहत हे।"


"वो तो बहुत कुछ कहत हे। सुने सकबे तव सुन...!"श्रुति हर अब रत्नाकर कोती ल देखे नइ सकत रहिस।


"चल मोर घर...!" वो थोरकुन हड़बड़ी म कहिस।


"अभी पहिली... उहाँ,  जिहाँ जाना हे ।"


"वोकर बाद...?"


"मोर तो दुबारा इहाँ आये के मन करत हे।वो दे सुन मोहरी काय कहत हे।"


"तईंच सुन...!"श्रुति कहिस,फेर भागे नइ सकिस ।


"चल मोर घर...!"वो  आन कोती ल देखत फेर कहिस।जइसन ले जा के ही मानही अपन घर।


"पक्का बलावत हस कि कचिया।" रत्नाकर तो जइसन मोहरी के बोल म बोलत हे।


"अगर मंय कचिया कह हां तब...?"


"मंय तुरन्त चल दिहां।" रत्नाकार ल खुद अचम्भा होवत रहिस कि वोकर मुहँ ल  का... का ... ये ...आन...तान...निकलत हे।अउ ये मोहरी तो बाजतेच हे।


""अउ मंय पक्का कह हां तब...?"श्रुति खुदे कहत हे


"तब  तो   पाछु आहाँ  तोर घर...फेर अइसन मोहरी जरूर बाजही ...!रत्नाकर के मुँह ले तुरते निकल गय ,"अब बोल का कहत हस...तँय...!"



       श्रुति अब ले घलो भागे नइ सकिस।मोहरी हर बाजतेच रहिस।अब  तो दुनों झन वोला सुनत रहिन।


"का कहत हस...अब बोल।"रत्नाकर बड़ बेर बाद म पूछिस।


"  अब मोला नही ये मोहरी ले ...पूछ।"श्रुति अब भी रत्नाकर के तीर ल भागे बर समरथ नइ होय पाये रहिस। 



         हाँ..मोहरी हर अब ले भी बाजतेच रहिस।अउ येती बरात के पइरघनी,घलव हो गय रहिस। फेर ये बात ल, ये दुनों अभी भी  पता नई पाय रहिन।



*रामनाथ साहू*



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नान्हें कहिनी पूस के जाड़

 नान्हें कहिनी

                पूस के जाड़

                सुकारो अऊ बुधिया  दुनों झन आज झुलझुलहा बेरा ले जंगल कोती लकड़ी काटे ल चल दिन। पूस के कड़कड़ाती जाड़ म कांपत-कांपत दुनो झन लकड़ी काटे फेर  उखर दांत कटकटावत  रहाय।

         सुकारो ह बुधिया ल कहिस-"दीदी ओ,अड़बड़ जाड़  लागत हे।कईसे करन?काली ले थोरकुन बेरा म आबो। मेंहा दु बछर होगे ।सोच थंव एक ठीन सूटर अऊ कम्बल लूहुँ कहिके फेर  पईसा के जुगाड़  नी होवय। जंगल हमर दाई-ददा आय।हाथ- गोंड भर लकड़ी धरे सकथन।अतके के हमन ल बन बिभाग ह छूट देहे हे। इही लकड़ी ल बेच के हमन अपन परवार ल पोसत हन। दिनभर म सौ -पचास कमा लेथन फेर अतेक मंहगाई म का होही?

         बुधिया कहिस -"सही कहत हस बहिनी, अतेक पूस के जाड़ म हमन के मरना हे। लकड़ी  जला के रतिहा बिताथन फेर कतेक लकड़ी जलाबोन ?लकड़ी बेचे ल लागथे। महुँ कमरा अऊ कम्बल लेहे बर पईसा सकेल थंव फेर जम्मो कुछु काहिं म खर्चा हो जथे ।का करबे चिरहा कथरी मन ल ओढ़ के  रहिथन। पूस के जाड़ म हाड़ -हाड़ मन जुड़ा जाथे। एसो तो जरूर  एक ठी कम्बल लूहुँ ।मोर भाई मोला चांदी के साटी  देहे ।उहि ल सेठ तीर गिरवी धरहूँ।"

        बुधिया के गोठ ल सुनके  सुकारो कहिस -"मोर तीर तो  चांदी के कोनो गहना नी ये।मेंहा का करहुं बहिनी?"

        अइसन कहत ओखर आँखिन डाहर ले आंसू  चुचवाये लागिस।

                डॉ.शैल चन्द्रा

दिसंबर// वो ऐतिहासिक बेरा के सुरता...


 9 दिसंबर//

वो ऐतिहासिक बेरा के सुरता... 

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म 9 दिसंबर 1987 के दिन ल सदा दिन सुरता राखे जाही, जे दिन छत्तीसगढ़ी के पहला मासिक पत्रिका 'मयारु  माटी' के विमोचन रायपुर के आजाद चौक तीर तात्यापारा के कुर्मी बोर्डिंग के सभा भवन म जम्मो छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन के उपस्थिति म संपन्न होए रिहिसे.


    ए विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी रहिन हें. अध्यक्षता दैनिक नवभारत के संपादक कुमार साहू जी करे रिहिन हें. संग म 'सोनहा बिहान' के सर्जक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी विशेष अतिथि के रूप म पधारे रिहिन हें. ए बेरा म छत्तीसगढ़ी भाखा साहित्य के जम्मो मयारुक मन उहाँ बनेच जुरियाए रिहिन.


चित्र 1- 'मयारु माटी' के विमोचन के बेरा. डेरी डहर ले- सुशील वर्मा (भोले), पंचराम सोनी, टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, विमोचन करत दाऊ रामचंद्र देशमुख जी अउ नवभारत के संपादक रहे कुमार साहू जी.


चित्र 2- डेरी डहर ले- कुमार साहू जी के स्वागत होवत, स्वागत करत मयारु माटी के संपादक सुशील वर्मा 'भोले', अउ बीच म कुर्सी म बइठे दिखत हें- सोनहा बिहान के सर्जक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी.


चित्र 3- विमोचन के बेरा म उपस्थित छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन म. डेरी डहर ले-  जागेश्वर प्रसाद जी, डॉ. देवेश दत्त मिश्र जी, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र जी, डॉ. शालिक राम अग्रवाल 'शलभ' जी, डॉ. व्यास नारायण दुबे जी, जगदीश बन गोस्वामी जी

उंकर पाछू म डॉ. भारत भूषण बघेल जी, डॉ. राजेन्द्र सोनी जी रामचंद्र वर्मा जी संग डॉ. सुखदेव राम साहू 'सरस' अउ जम्मो छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन.

सोनाखान के सोन : शहीद वीर नारायण सिंह :-


 

• सोनाखान के सोन : शहीद वीर नारायण सिंह :-


शहीद वीर नारायण सिंह छत्तीसगढ़ के पहिली शहीद आय। 10 दिसंबर सन् 1857 में अत्याचारी अंग्रेज मन वीर नारायण सिंह ल फांसी दे दे रिहिन। ओखर अपराध अतके रिहिस के सन् 1856 के भयंकर दुकाल के समे वो ह अपन जमीन्दारी के भूख से तड़फत जनता बर एक झन बेपारी के अनाज गोदाम के तारा टोर के उहाँ भराय अनाज ल जनता म बाँट दे रिहिस। अतके नहीं ये बात के जानकारी लगिहांत वो समे के रयपुर के डिप्टी कमिश्नर ल घलो पठो दे रिहिस के ये काम वोला भूख म तड़फत उनता के भूख मिटाय खातिर करना परिस। फेर अंगरेज कमिश्नर ल ओखर मानवता अउ इमानदारी नइ भाइस। वोला तो वो जमाखोर बैपारी के सिकायत म नारायण सिंह ऊपर कार्रवाही करना पसंद आइस। अउ इही बात म डिप्टी कमिश्नर ह वीर नारायण सिंह बर गिरफ्तारी वारंट निकाल दिस। वो अत्याचारी डिप्टी कमिश्नर के नांव एलियट (चार्ल्स इलियट) रिहिस। तेखरे पाय के कतको झिन जुन्ना छत्तीसगढ़िया मनखे के एलियट नांव पलो सुने म मिल जाथे। खैर हमला नामकरन म धियान नई दे के शहीद वीर नारायण सिंह के किस्सा कोती धियान देना है।


शहीद वीर नारायण सिंह के जनम सोनाखान के जमीन्दार रामराय बिंझवार राजपूत के घर सन् 1795 ई. के कोनो तारीख म होय रिहिस। तारीख के पक्का जानकारी नई मिलय। अपन बाप के इंतकाल के बाद 35 बछर के उमर म नारायण सिंह सोनाखान के जमीन्दार बनिस। उन बड़ धारमिक, गियानी, मिलनसार अउ परोपकारी परवृत्ति के रहिन। एखरे संगे संग उंखर म धीरज, साहस अउ प्रजापालक के गुन घलो लबालब भरे रिहिस। वो सिरतोन सोनाखान के सोन रिहिस। वो ह निच्चट सादा जीवन बिताय। वो ह महल अटारी म नहीं भलुक माटी अउ बाँस के बने कच्चा मकान में राहय अउ अपन परजा के तकलीफ ल दूर करे म हरदम तियार राहय । सोनाखान के राजा सागर, रानी सागर अउ नंद सागर तलाब आजो ओखर जन कल्यानकारी सोंच के गवाही देथे।


नारायण सिंह अपन जमीन्दारी ल वह सुघर ढंग ले चलाय के बेवस्था करे राहय इही बीच सन् 1954 ई. म अंगरेज मन नागपुर के संगे संग छत्तीसगढ़ ल घलो अंगरेजी राज में मिला लिन अउ लगान लेना सुरु कर दिन। लगान ल वो समै टकोली काहय। ये टकोली के नारायण सिंह जबर विरोध करिस। इही पाय के रइपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट ह रानायण सिंह से चिढ़े राहय अउ वोला डांड़े के मउका खोजत राहय।


सन् 1856 के अंकाल में इलियट ल से मउका घला मिलगे । वो बछर छतीसगढ़ म सुक्खा दुकाल परगे। लोगन दाना दाना बर मोहताज हो गे। एक गांव के माखन नाँव के बेपारी ह अपन गोदाम में अनाज जमा करके राखे राहय। ये बात नारायण सिंह ल सहन नइ होइस। बेपारी जात, सोझयाय त मानतिस नहीं। आपद धरम निभाय बर नारायण सिंह वो गोदाम के तारा टोर के अनाज ल जनता में बँटया दिस। लगिहांत ये यात के जानकारी डिप्टी कमिश्नर इलियट कर घलो पठो दिस। अउ बैपारी ल सही स म भरती देय के वादा घलो करिसि, फेर बैपारी ल संतोष नइ होइस । एती इलियट ल तो मउका के तलास रिहिस काबर के नारायण सिंह के राजनैतिक चेतना, जागरुकता आ अंगरेजी सत्ता के विरोध ह अंगरेज अधिकारी मन पर चुनौती बन गे रिहिस। माखन बनिया के सिकायत ह बहाना बन गे। वीर नारायण सिंह बर गिरफ्तारी वारंट निकाल दे गिस। 24 अक्टूबर 1856 के दिन संबलपुर म वीर नारायण सिंह ल गिरफ्तार करके रइपुर के जेल में धांध दे गिस। ओखर ऊपर चोरी अउ डकैती के मुकदमा चलाय गिस असहाय जनता के दुख तकलीफ से उनला कोनो मतलब नइ रिहिस।


फेर वाह रे वीर नारायण सिंह, 28 अगस्त 1857 के वीर नारायण सिंह जेल से भागे म सफल होगे। सन् अट्ठारा सौ सन्तायने म देस म कांति के ज्वाला भड़क गे रिहिस। जेखर आंच छत्तीसगढ़ म घलो पहुंचिस । छत्तीसगढ़ के जनता मन एक सुर म जेल में बंद वीर नारायण सिंह ल अपन नेता चुन लिन। वियाकुल सोनाखान के जनता अपन नेता ल छोड़ाय वर छटपटात राहय। वो सबै संबलपुर म सुरेन्द्र साथ नांव के एक झिन क्रांतिकारी नेता रिहिस जउन हाले म हजारी बाग जेल से भागे म सफल होय रिहिस सोनाखान के जनता मन ओखरे मदद ले के बीर नारायण सिंह ल रइपुर जेल से भागे के उपाय करिन। जेल म सुरंग बनाके बीर नारायण सिंह भाग गे वीर नारयण सिंह के जेल ले भागे से अंगरेज अधिकारी मन के होस गायब हो गे इन्क्वायरी सुरु कर दे गिस अड बोला दुबारा पकड़े बर सेना के सहायता लेय गिस। यो जमाना म वीर नारायण सिंहल पकड़वाय वर 1000 रु. इनाम के घोसना करे गे रिहिस, जउन आज के लाखों रुपिया के बरोबर होथे। एती नारायण सिंह ल पकड़े बर लेफ्टीनेन्ट स्मिथ अउ लेफ्टीनेन्ट नेपीयर ल कमान संउप दे गिस।


नारायण सिंह जेल से भागे के बाद चुपचाप बइठे के बजाय अंगरेजी सत्ता से सोझ मुकाबला करे के अयलान कर दिस। सोनाखान के आदिवासी अपन नेता के वापसी से खुस हो गे राहय। 500 बंदुकधारी सेना खड़ा करे म नारायण सिंह ल कांही दिक्कत नइ आइस। फेर वो समै के अऊ बाकी दोगला जमीन्दार मन अंगरेज मन के साथ दीन।


देवरी के जमीन्दार अउ नारायण सिंह के बीच तो खानदानी दुस्मनी रिहिस। उँखरे मदद अउ रद्दा देखाय से 26 नवंबर 1857 के स्मिथ अपन सेना संग नारायण सिंह के इलाका म पहुंचे म सफल हो गे । उहां वोला मालूम परिस के नारायण सिंह अपन संग 500 सैनिक जोर डारे हे अउ वोहा अंगरेज सेना संग जोरदार मुकाबला करे पर तइयार बइठे हें। तभे एक झिन घरभेदिया ह स्मिथ ल बताइस के नारायण सिंह सोनाखान के नाकाबंदी म लगे हे फेर वो काम पूरा न होय हे अउ सोनाखान म खुसरे जा सकथे। देवरी अउ सिवरीनरायेन के जमीन्दार मन गद्दार निकलिन उँखरे सहायता ले स्मिथ 1 दिसंबर 1857 के सोनाखान बय धावा बोल दिस। नारायण सिंह घलो तइयार रिहिस। ओखर सैनिक मन स्मिथ के सेना उपर बंदूक से हमला कर दिन। एखर बावजूद स्मिथ अपन सेना सहित सोनाखान पहुंचे म सफल हो गे ।


सोनाखान गांव ल नारायण सिंह खाली करवा दे रिहिस। बगियाय स्मिथ ह खाली गांव में आगी लगवा दिस। सरी गांव भंगर-भंगर जर के राख हो गे नारायण सिंह अइसन तबाही हो जही कहि के नइ सोंचे रिहिस। एती स्मिथ ल अऊ उपहारा सेना मिल गे। ओखर मदद ले स्मिथ वो पहाड़ी ल घेर लिस जिहां नारायण सिंह अपन साथी संग मौजूद राहय। दुनो डाहर ले मुकाबला होय लगिस स्मिथ के सेना जादा रिहिस, धीरे-धीरे नारायण सिंह कमजोर पड़त गिस आखिर म गद्दार मन के मदद ले नारायण सिंह के आंदोलन ल मटियामेट कर दे गिस। 2 दिसंबर के बीर नारायण सिंह गिरफ्तार हो गे। 5 दिसंबर के वोला रइपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट के हवाले कर दे गिस। वीर नारायण सिंह ऊपर देसद्रोह के मुकदमा चलाके फांसी के सजा सुना दे गिस। 10 दिसंबर 1857 के बिहन्चे फांसी के सजा तामील कर दे गिस। बीर नारायण सिंह देस के आजादी खातिर शहीद हो गे। बताय जाथे के जेन जघा बीर नारायण सिंह ल फांसी दे गिस तेन उही जया आय जेला आज हम रइपुर के जय स्तंभ चौक के नांव ले जानथन।


इहां सुरता करे जा सकथे सन् 1857 में भारत के आजादी खातिर पहिली स्वतंत्रता संग्राम लड़े गे रिहिस। इही लड़ई ल बीर नारायण सिंह छत्तीसगढ़ में लड़े रिहिस। छत्तीसगढ़ म सबले पहिली आजादी के अलख जगइया अउ कोनो नोहे इही वीर नारायण सिंह आय इहां यहू धियान देव के बात हे के छत्तीसगढ़ के ये पहिली शहीद एक आदिवासी बीर रिहिस। धन्न हे शहीद वीर नारायण सिंह, तोर जीवन धन्य है।


जब तक सुरुज नारायण के ताव रही, बीर नारायण तोर नांव रही, बीर नारायण तोर नांव रही।


   -दिनेश चौहान, छत्तीसगढ़ी ठीहा, 

    आदर्श कालोनी, नवापारा (राजिम)



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वीरनारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही

 वीरनारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही 


          भारत देश के अजादी बर लड़इया छत्तीसगढ़ के पहिली शहीद छत्तीसगढ़िया वीर नारायण सिंह ला आज कोन नइ जानय। छत्तीसगढ़ के लइका लइका ,चेलिक जवान मन अब ओकर गाथा अउ वीरता के गीत गावत हे।वीर नारायण सिंह के नाम ले के गरीब छत्तीसगढ़िया,अउ आदिवासी मन के छाती घलाव फूल जाते। छत्तीसगढ़ के मजदूर, किसान, आदिवासी अउ संघर्ष के दद्दा मा रेंगइया,शोषण के खिलाफ लड़इया मन वीर नारायण सिंह ला आदर्श मानत अउ जुलूस हड़ताल मा ओकर फोटू के पूजा करके कसम खाथँय कि अन्याय के खिलाफ लड़बो अउ जीतबो।

     वीर नारायण सिंह के जनम कसडोल जनपद के गांव सोनाखान मा माने जाथे। ओला गोंड़ राजा के कुल के माने जाथे फेर आदिवासी बिंझवार जाति के मानता जादा हवय। उँखर कुल देवता, राजदेवता डोंगरी मा बिराजे कुर्रुपाट ला बताय हवय।कुर्रुपाट देवता वीरनारायण सिंह के सबले बड़का देवता रहिन जिहाँ उँखर संस्कृति परम्परा के संगे संग अंग्रेज मन के गुलामी ले मुक्ति बर संघर्ष के खरी डराय रहीस।इही कुर्रुपाट मा चेलिक नारायण के दिन शुरु होवय अउ दिन बीतय। अपन चितकबरा घोड़ा मा बइठ के गाँव ले आय फरियादी, किसान, वनवासी, आदिवासी मन के दुख पीरा ला हरे बर गाँव गाँव घुमय। कहे जाथय के ओला हिम्मतवाला मन ले अड़बड़ मया रहय।कोनों अंग्रेज संग लड़ई झगरा करके अउ एकोझन अंग्रेज ला दू चार चटकन मारके गांँव ले खेदार के आवय ओखर मनके पीठ मा हाथ रखय अउ डरपोकना मनखे ला चिटको नइ भावय।

        जमीदार रामराय के घर जनमे वीर नारायण के मुँड़ मा जमीदारी के बोझा चेलिक उमर मा आ गय रहीस जब ओकर ददा हा ए दुनिया ले चल दीन। कम उमर ले ओकर हिरदे मा जनता के भलाई करे उनला ला सुखी देखे के सपना देखय। नारायण सिंह अंग्रेज मन के दलाल साहूकार मन के बैरी बने लगिन। एक बेरा देश मा करिया अंकाल परगे। मनखे खाय पीयेबर दाना दाना बर तरसे लगिन।गाय गुरु मवेशी मन घलाव पैरा भूसा बर तरसे लगिन।जनता त्राहि त्राहि होगे। क्षेत्रभर के जनता मन अपन समस्या लेके नारायण सिंह के तीर आय लगिन।भूख ले तड़पत अउ मरत मनखे मन के दुख ला नारायण सिंह देख नइ सकिस।ओहा साहूकार माखन के गोदाम मा भराय अन्न के भंडार लूट के जनता मा बँटवा दीन।एखर जनाकारी अंग्रेज मन ला होइस ता ओला पकड़ के जेल मा डार दिन अउ किसान बनिहार मन उपर अइताचार करे लगिन।जेल मा ए बात नारायण ला जनाकारी होइस ता रातेचकुन जेल के तारा टोर के जनता कर आगे अउ चेलिक जवान मोटियारी मन ला सकेल के  दू किसम के दल बनाके गाँव के रक्षा दल अउ अंग्रेज मन संग लड़इया दल मा बाँटके क्षेत्र मा अंग्रेज मन के दखल ला दुरिहाइन। अंग्रेज मन नारायण सिंह के नाम ला सुनत काँपे लगिन।इही बखत ले जनता ओला बहादुर नारायण सिंह कहे लगिन।

         अंग्रेज मन अपन हाथ ले दुरिहात क्षेत्र ला कब्जियाय बर अउ बहादुर नारायण सिंह ला पकड़े बर नवा नवा दद्दा खोजिन अउ नवा नवा अंग्रेज अफसर इलियट अउ स्मीथ संग सिपाही मंगाइन। बिना विभिषण रावण नइ मरे वइसने अंग्रेज मन ओकर बहिन दमाद ला लालच देके बहादुर नारायण सिंह ला पकड़ डारिन।कछेरी अदालत सब उँखरे रहिस ता 19 दिसम्बर 1857 के दिन फांसी मा टांगे के सजा सुनाइन। नारायण सिंह उपर जनता के मया अतका रहिन कि ओकर बर अपन प्राण दे देतीन। जेल मा हमला करके ओला छोड़ा डारतीन। अंग्रेज मन ला एखर भान हो गे रहिस। एखर सेती वीर नारायण सिंह के नाव ले डर्राय अंग्रेज सरकार हा सजा के दिन ले नौ दिन पहिलीच 10 दिसम्बर 1857 के रायपुर मा जिहां आज जयस्तम्भ चौक हवय उहां फाँसी देय पाछू तोप मा बांध के उड़ा देईन। जनता के हित बर लड़इया वीर ला जनता ले सदा सर्बदा बर दुरिहा देईन।

     वीर नारायण सिंह के इतिहास ला अंग्रेज मन संदूक मा तारा देके लुका दे रहिन। अजादी मिले पाछू घलाव ओखर बलिदान के शोर खबर कोनों ला नइ रहिस।एक बेरा मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ला अपन जेल यात्रा के बखत वीरनारायण सिंह के इतिहास गजेटियर मा पढ़ेबर मिलीस पाछू ओमन वीरनारायण सिंह के जन्मभूमि सोनाखान गीन अउ उँखर वंशज मन ले मिल के जनाकारी ले के आइन अउ अपन मजदूर संगठन के संगवारी मन संग मिलके शहीद दिवस मनाय के शुरुआत करीन। गरीब किसान बनिहार ला अपन हक बर लड़े बर जगाइन।पाछू सरकार घलाव एखर हियाव करिन अउ 10 दिसम्बर के वीरनारायण सिंह के शहीद दिवस मनाय के परंपरा के शुरुआत होइस।  

         आज देश आजाद होगे हवय फेर सत्तर बच्छर पाछू देश दू भागा मा बँटाय हवय अमीर अउ गरीब, पूंजीपति अउ बनिहार, शोषक अउ शोषित। आज घलो गरीब के लहू पीयइया अउ अपन तिजोरी भरइया, भ्रष्टाचारी मन बड़हर बनत जावत हे। बड़े बड़े अधिकारी मन इलियट अउ स्मीथ बनत हवय। किसान के खेत खार कंपनी, उद्योगपति मन कब्जियावत हे।ओकर फसल के सही दाम नइ मिलत हे, उत्पादन ला औने पौने मा दलाल मन लेवत बेचत हे। कारखाना मा बेरोजगार नवजवान मन के लहू चुहकत हे। जाति धरम में बाँट के एक दूसर ला लड़ावत अपन राज करत हे। अपन हक बर लड़इया ला जेल,पुलिस अउ गोली मा टीपत हे। टेक्टर अउ मोटर गाड़ी मा रउँदत हे।कृषि कानून के विरोध करइया मन उपर अइताचार करत हें, एखर बर वीर नारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही।


हीरालाल गुरुजी "समय"

छुरा,जिला-गरियाबंद