Friday, 25 April 2025

अहसास : ये बात ला माने बर मन हा तैयार नइ हे!* (संस्मरण:छत्तीसगढ़ी) -डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 *अहसास : ये बात ला माने बर मन हा तैयार नइ हे!* 

                  (संस्मरण:छत्तीसगढ़ी)


                              -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


                             ( 1 )


          बिलासा कला मंच के दीपावली मिलन कार्यक्रम इतवार के दिन मँझनिया तिलक नगर स्कूल मा होवत रहिस। मँय उहाँ सपत्नीक पहुँचे रहेंव। स्कूल के मैदान मा कतकोन छोटे-छोटे खेल बिलासा कला मंच के डहर ले आयोजित रहिस ... फूगड़ी, गेड़ी दौड़, रस्सी खींच,नरियर फेंक अउ आन-आन कतकोन ठिन। नरियर फेंक मा महूँ शामिल हो गेंव, देखेंव कि कतको झन अधेड़ संगवारी मन के नरियर 15 - 20 फुट ले जादा दूरिहा नि गिरत रहिस। तभे एक झिन कच्चा उमर के टूरा नरियर ला 50 फुट दूरिहा फेंक दीस! एक-दू झिन के नारियर 30 फुट दूरिहा मा घलो गिरिस। मने-मन मैं बहुत खुश रहेंव कि कम से कम दूसरा नंबर तो अइच्च जाहूँ। इनाम ले कोई मतलब नि रहिस, मतलब रहिस सिरिफ ये कि उहाँ अपन-आप ला साबित करना हे! कालेज मा नरियर फेंक मा मँय हमेशा अव्वल आवँव.... 60 फीट दूरिहा तक फेंक देवँव। तभे एक झिन नरियर ला 40 फुट दूरिहा फेंक दीस। एकर बाद मोर नंबर रहिस। मने-मन भगवान ला सुमरेंव अउ नरियर ला पूरा जोर लगा के फेकेंव। मोला उम्मीद रहिस कि नरियर 40 फुट ला नहाक जाही। फेर देखेंव त 15 फुट दूरिहा मा नरियर हा गिरे-परे रहे! एक झिन संगवारी पाछू ले कमेंट करिस- ' बुढ़ापा आ गे हे सर जी!  नरियर फेंक ला जीतना हमर-तुँहर बस के बात नि हे!'

          तब मोला पहिली बार अहसास होइस कि सचमुच बुढ़ापा आ गे हवय ....  तभो ले ये बात ला माने बर मन हा तैयार नइ हे!


.                               ( 2 )       


          पूस के महीना। संझाती 06 बजती बेरा। ठंड बाढ़ गे रिहिस। स्वेटर पहिने अउ कनटोप लगाये स्कूटर मा नेहरू चौक के पेट्रोल पंप मा पहुँचेंव। आघू वाला अपन स्कूटर मं पेट्रोल भराय के बाद मोबाईल म बात करे लगिस। तुरते पेट्रोल पंप के कर्मचारी मीठा आवाज मं बोलिस- ' भाई साहब! उमर के  चेत करव....पाछू मा कोन हवय ? अतका उमर मा तो आप रेंगे तक नि सकिहॅव! '

        आगू के स्कूटर वाला ' साॅरी ' बोलिस अउ तुरते हट गे। ओ दिन सचमुच मोला अहसास होइस कि अब मैं सत्तर पार हो गे हँव! बुढ़ापा आ गे हे,.......  *तभो ले ये बात ला माने बर मन हा तैयार नइ हे!* 


.                              ( 3 )


             ट्रेन मा आज भीड़ रहिस। जनरल बोगी मा चढ़ना मुश्किल रहिस, त मैं स्लीपर कोच म चढ़ गेंव। रायपुर ले बिलासपुर के सफर दू घंटा के रहिस। मैं जगा के तलाश बर आघू बढ़ेंव .... ट्रेन मा दू घंटा खड़े-खड़े यात्रा करना मुश्किल रहिस। कालेज के जमाना मं पसिंजर ट्रेन मा कतको बखत चार-पाँच घंटा तक खड़े-खड़े सफर करे रहेंव, फेर अब बात अलग हे। स्लीपर कोच के ट्रेन मं सबो सीट फुल रहिस। थोरकुन अउ आघू बढ़ेव त देखथँव कि दू झिन टीसी कुछ हिसाब-किताब निपटावत सीट मा बइठे हें अउ नावा-नेवरिया टूरामन के फाइन ठोंकत हें या फेर डाँट-डपट के आघू स्टेशन मं स्लीपर कोच ले उतर के जनरल कोच मं जाय के हिदायत देवत हें! 

            मोर जी धक् ले करिस!..... कहीं फाइन झन ठोंक दें! एमन के का भरोसा..... रेल्वे के नावा-नावा नियम अउ चेकिंग करइया नावा पीढ़ी के कच्चा उमर के टूरा! न बात करे के सउर न उमर के लिहाज़!

          एक टीसी के नजर मोर उपर परिस। ओ खड़े हो गे। मोर जी धक्-धक्, धक्-धक्  करे लगिस ....पता निहीं कतका फाइन ठोंकही?

         ' दादा जी आप बैठ जायें! '- टीसी के मीठी बोली सुन के मन ला ठंडक जुड़वास मिलिस। 

      ' नहीं, आप लोग बैठें। मैं यहीं ठीक हूँ! '

      ' दादा जी आप बैठें। आपकी उमर सत्तर पार है। आपके सामने हमारा बैठे रहना शोभा नहीं देता! '

            मैं  सीट मा बइठ गें। फेर ये अहसास आज फेर होइस कि सचमुच अब बुढ़ापा आ गीस हे। आज मोर उमर ला देख के फाइन करना तो दूर टीसी अपन सीट ला घलो दे दीस! 

          देखव तो समय के फेर! आज पहिली बार अहसास होइस कि बढ़ती उमर के घलो अपन अलग दाब होथे। शायद एहा हमर देश के एक साँस्कृतिक पहिचान घलो  बनगे हे। नई तो कतकोन पच्छिम के देश मा बूढ़ा मन ला परे-डरे मनखे समझ के परिवार अउ समाज ले दूरिहा टार देथें! ..... तभो ले *ये बात ला माने बर मन हा अभी घलो तैयार नइ हे कि बुढ़ापा आ गे हे!* 


Memoir written by-


      डाॅ विनोद कुमार वर्मा 

व्याकरणविद्, कहानीकार, समीक्षक 


मो-  98263 40331

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Tuesday, 22 April 2025

शंकर पार्वती के गोठ-बात*

 .               *शंकर पार्वती के गोठ-बात*


                                - विनोद कुमार वर्मा 


            ' नाथ, मोला भूमंडल के सैर करे के बड़ इच्छा होवत हे! '

           ' ठीक कहत हस। कैलाश मं बइठे-बइठे महूँ असकटा गे हँव! '

          भोले बाबा अउ माता पार्वती भूमंडल के सैर करे बर निकल गीन।

         ' ये कोन नदी हे बहुत दूर तक लामे हे! '

       ' दू ठिन नदी एक्के म जुड़ गे हे। एक मिसौरी नदी हे जेकर लम्बाई 2540 मील हे। ओहर मिसिसिपी नदी मं मिल गे हे। मिसिसिपी के लम्बाई 2260 मील हे। दुनों ला जोड़ दे त 4800 मील होथे। '

         ' नाथ, तूँ टेप धर के नापे हॅव का? अतका एक्कुरेट बतावत हॅव! '

        ' अरे, नापे के का जरूरत हे, विकीपीडिया मं सब लिखाय हे! '

        ' ये पर्वत चोंटी बहुत ऊँचा दिखत हे! '

        ' हाँ अकोंकगुआ पहाड़ हे। एकर चोंटी तक के लम्बाई 22829 फीट हवय। फेर हमर माउंट एवरेस्ट ले छोटे हे। माउंट एवरेस्ट के उँचाई 29035 फीट हवय! '

        ' त, ऊँचाई ला कइसे नापा? '

       ' अरे पगली, नापे के का जरूरत हे, विकीपीडिया मं सब लिखे हे न! '

      ' ये तो अच्छा बात नोहे कि आन के लिखे पढ़े ला देख के बता देवव! ये तो नकल हो गे! '

      ' अरे त मँय कोई व्यापम या पीएससी के परीक्षा देवंत हँव का!..... सुन भाग्यवान, मनखे मन ला पढ़े-लिखे बर कोन सिखाइस हे?.... ब्रह्मा जी अक्षर बनाइन।अउ तोर बहिनी सरस्वती ओमन ला ज्ञान बाँटिस! ..... नि तो एहू-मन कुकुर-बिलई कस परे रहितीन! '

          ' ये देश के सियान तो बदमाश कस लागत हे! सबो देश ला डरवावत-धमकावत  रहिथें! '

        ' अरे, सबो ओला नि डरावँय। थोरकिन दिन आघू  यूक्रेन कि सियान ओला जम के लताड़िस हे! पत्रकार वार्ता मं दुनों बइठे रहिन त बड़का सियान बँगला झाँके लगिस! कोनो भी देश के सियान ला अइसनेच्च होना चाही। यूक्रेन तो नानबुटी देश हवय। 1991 तक सोवियत रूस के हिस्सा रहिस। फेर जनमत संग्रह के बाद 24 अगस्त 1991 के नवा देश बनिस। जनमत संग्रह मं 90 फीसदी मन नवा देश के समर्थन करे रहिन। अब सोवियत रूस ओला फेर हथियाना चाहत हे! फेर अंगूर अभी खट्टा हे! '

          ' तूँ महाकुंभ मेला देखे गे रहेव का? सुनथों कि अड़बड़ेच्च भीड़ रहिस। '

          ' अरे झन पूछ, प्रयागराज जंक्शन मं उतरेंव त एक ठिन टीसी पकड़ लिस। फाइन ठोंक दे रहिस। फेर गुस्सा मं देखेंव त तीन फीट दूरिहा जा गिरिस। हाँव-काँव हो गे। ले-दे के मँय बाहिर निकल गेंव। झन पूछ 10 -11 किलोमीटर पैदल चले ला परिस तब संगम तक पहुँचेव अउ डुबकी लगायेंव! '

         ' त व्हीआईपी डुबकी नि लगा लेता। तुँहला तो व्हीआईपी पास मिल जातिस! '

       ' अरे भाग्यवान, मँय कोई मंत्री-संत्री हँव का? कि कलेक्टर ओं कि मोला वहीआईपी पास मिल जातिस? कोनो निगम के अध्यक्ष घलो नि हावँव, नि तो पास मिलिच्च जातिस! '

         ' त नागा बाबा मन ला कइसे पास मिल जाथे? '

       ' अरे भाग्यवान, मँय शेर के खाल ला लपेटे रहेंव न!.... तँय बड़ क्वेश्चन करथस, थोरकुन साँस तो लेन दे! '

         पार्वती माता चुप हो गे। फेर शंकर भगवान कहिस- ' अब गोठ-बात ला खतम कर। मोला अड़बड़ भूख लागत हे। चल कैलाश पर्वत लौटत हन। बासी बाँहचे हे, ओइ ला दे देबे। मोला छत्तीसगढ़िया बासी बड़ सुहाथे। नून डारके मिरचा चटनी पीस देबे। ओही मं दुनों खा लेबो! '

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    Story written by-


           *डाॅ विनोद कुमार वर्मा* 

व्याकरणविद्,कहानीकार, समीक्षक

लघु कथा - 'सेल्फी'

 लघु कथा - 'सेल्फी'

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नवा जमाना के फाइफ जी सीम वाले फाइफ जी मोबाइल के टसन धरे नवा कट के गोड़ अउ कनिहा उघरा करे दू झन कुकराचुंदा कटिन कटाय टूरा मन होंडा के दुपहिया मे सांय सांय हारन बजावत भीड़ वाले जगह में लहरावत पेल दिन | पलट के उतर के अपन खुलाबटन वाले शर्ट के कालर ल खिंचत कहे लगीन वी आर द बेस्ट |

 हील वाली सेंडिल पहीने होंठ म करिया के रंगनी पोते टूरी हर ओति पिछोत ले भीड़ के आवत रहय | एक झन बबा ये सब चरितर ल  बइठे - बइठे  ठेला म देखत रहय| बड़ दिन बाद  बिशेसरा के मेला हर ये दरी सिग बिग ले भरे रहय| मेला म बबा हर महॎशिवराती में मुँगफली बेंचे बर तीर के गवँइ परसवारा ले आय रहय| 

बबा के जीव रखमखाय जाय पर का करय रोके नइ सकय कउनो ल|   

    जवान टूरी टूरा इंकर दई - ददा मन का संस्कार दे हें टूरी मन घलो चिरहा कटाय वाला जिन्स पहिने हे लोरमा उतरे लट असन चुंदी हर छरियार हे| बबा के ठेला में मुंगफली लेवत शनमरहा टूरा मन मोबाइल ल घेरी बेरी जेब ले निकालँय| अउ एक दू फोटो खींच के फेर भीतरी खुसेर लेवँय | बबा पुछ परिस बाबू हो का तुहँर मोबाइल म फोटु खीचे ले  तुहँर होलिया सहींच म बने हो जथे ? टुरा मन के जवाब मिलथे येला तँय का जानबे बबा| येकर मजा तोर डोकरी के परोसे खाना ले जादा

सेवाध वाले हे| 

       टूरा मनन बबा के एक एक डहर के गाल ल चुमत असन करत अपन मोबाईल केआगु वाले कैमरा ल आन करके फोटो खींचते रहीथें|के डोकरी  हर आरो करत कहिथे सेल्फी सेल्फी सेल्फी| तव दौड़त मोटियारी टूरी सेल्फी हर डोकरी कर आके अपन मोबाईल म फोटो खींछते रहीथे| के बबा कहिथे ये तो मोर सेल्फी आय|


अश्वनी कोसरे रहँगिया कवर्धा कबीरधाम (छ. ग.)

लघु कथा- नीबू -मिर्ची

 लघु कथा- नीबू -मिर्ची

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ऊँघात सो उठ के टुकरु आखी कान ल रमजत खुँटी मं टँगाय गत मइलहा झोरा धरत अपन कुरिया ले भँदई पहिनत निकल गे| फइरका ल वोधावत लुसुर लुसुर रेंगत चाँटीडिह ले अरपा ल नाकत शनिचरी मं हबर गे| आभी -अभी दुकान मन खुलत हें | आज सौदा के बने जोखा होय के उम्मीद धरे |

डहर खोर मं नजर दौड़े लगीस | 


                  सोचत हें| सेठ मनन कब फेंक देही.... टप ले धरे अउ आगु बढ़े के काम हे, ऊँकर धंधा चलय के झिन चलय? हमर तो चलबे करही! साँझ के नीबू -पानी अउ मिर्ची के तीखी चटनी चटा देबो | बरा संग बेंचा जही | 

                

                      झोरा मं टप -टप बीन के धर  के भर ले हे टुकरु |बड़ महिनत के काम आय सियानी जाँगर म निहर के उठाना सड़क मं फेकाय ...... ऊकर बर टोटका | तव टुकरु बर अइटिका |   धंधा रोजी रोजगार बर बंदन बुकाय नीबू -मिर्ची| 

अश्वनी कोसरे 'रहँगिया' कवर्धा कबीरधाम (छ. ग.)

डोकरी दाई मर गे !*

 *नक्सलवादियों से जुझते अर्ध सैनिक बल के एक जवान की मार्मिक कहानी* 


*छत्तीसगढ़ी कहानी  :  डोकरी दाई मर गे !* 


                      डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 

                    ( *1* )


      'तड़ ! ........ तड़.! ........ तड़ ! .......... कई ठन गोली सब- इंसपेक्टर झिंटूराम के कान के तिर ले गुजर के शांत होगे। दू गोली ओखर कंधा म लगिस अउ एक जाँघ म ! एही कोई संझाती पाँच बजती के बेरा रहे। बस्तर के सुनसान दरभा घाटी म नक्सली अउ अर्ध सैनिक बल टुकड़ी के बीच मँझनिया दू बजे ले मुठभेड़ लगातार चलत रहे...!..?...

          मझनिया दू बजती बेरा  ........ भयंकर बारूदी विस्फोट ले पुलिया उपर गुजरत बख्तरबंद गाड़ी हवा म उछल के बीस फीट दूरिहा जा गिरिस! गाड़ी म दस सैनिक सवार रहिन। ओखर पाछू-पाछू चालीस सैनिक मन स्पेशल बस म आवत रहिन जेमन लगभग 500 फीट पाछू रहिन। - ए  बस हा आम बस ले मजबूत अत्याधुनिक संचार अउ चिकित्सा उपकरण ले लैस रहिस। एही बस म सब इंसपेक्टर झिंटूराम घलो रहिस। एही बेरा सड़क के डेरी डहर ले जोरदार फायरिंग शुरू होगे। सबो अर्धसैनिक बल के जवान मन सड़क के जेवनी डहर साल, साजा आदि बड़े-बड़े पेड़, डिलवा-गड्ढा के आड़ लेवत बस ले उतर के घना जंगल मा तुरते मोर्चा संभाल लिन। नक्सली मन 10-12 मिनट तक डेरी डहर ले फायरिंग करिन अउ फेर फायरिंग बन्द हो गे। एती जेवनी डहर ले  घलो 20 मिनट बाद जोरदार फायरिंग शुरू हो गे। जइसे-जइसे नक्सली मन फायरिंग करत पाछू हटत गिन वइसे-वइसे जवान मन आघू बढ़त गिन। नक्सली मन एही तो चाहत रहिन। ठीक एही समे बस के पाछू अउ आघू डहर के सड़क ला घदनास्थल ले लगभग एक-एक किलोमीटर दूरिहा ब्लास्ट करके नक्सली मन उड़ा दीन! ए दूनों ब्लास्ट छोटे रहिस। ..... अब सड़क के एके कोती- जेवनी डहर नक्सली अउ जवान मन आमने-सामने मोर्चा ले रहिन। दरभा घाटी के मुख्य मार्ग ले कुछ हट के अंदरूनी क्षेत्र के घना जंगल मा युद्ध के हालात रहिस मानो दू दुश्मन देश के सैनिक एक-दूसर ले लड़त हों! जवान मन समझ गिन कि आज ओमन नक्सली एंबुस म फँस गे हें! सुरक्षित बाहर निकले के कोनो रद्दा समझ मा नि आवत रहिस। अन्तिम विकल्प केवल एक ठिन बचे रहिस- मरो या तो मारो!!

             वास्तव मा सड़क के जेवनी डहर सशस्त्र नक्सली मन सैकड़ों के तादात मा जंगल-झाड़ी के घना झुरमुट मा छुपे रहिन अउ जवान मन के जंगल के अंदरूनी क्षेत्र मा घुसे के अगोरा करत रहिन काबर कि जवान मन ला उहाँ घेर के मारना आसान रहिस ......  आज जवान मन के संख्या ओमन के तुलना मा बहुत कम रहिस! ...... दू-तीन दिन ले ये गोपनीय सूचना पुलिस हेडक्वार्टर मा लगातार पहुँचत रहिस कि दरभा घाटी के अंदरूनी क्षेत्र मा नक्सली मन के हलचल अचानक बाढ़ गे हे अउ कुछ बड़े नक्सली नेता मन डेरा डारे हुए हें! ....... आज सर्च आपरेशन पूरा करे के बाद जवान मन के वापसी के समे मंझनिया बेरा मा ये हमला नक्सली मन करे रहिन। ओमन ये जानत रहिन कि जवान मन के मदद बर सरकारी मदद चार घंटा ले पहिली नि आ सके अउ ओकर बाद आ घलो जाहीं त कारी अंधियारी रात मा कुछु मदद घलो नि कर पाँय।  सर्च आपरेशन म जावत समे बिहनिया के बेरा मा जवान मन उपर नक्सली मन एकरे सेथी हमला नि करिन कि जवान मन के मदद करे बर दिने-दिन सरकारी मदद आ जातिस त नक्सली मन न तो हथियार लूटे पातिन न ही जवान मन ला घेर के मारे सकतिन! 

           दरअसल ये बछर के शुरूआती कुछ महीना नक्सली मन बर ठीक नइ रहिस। ये बीच ओमन ला भारी नुकसान पहुँचे रहिस। जवान मन के संग मुठभेड़ मा 27 ले जादा नक्सली मारे गे रहिन। तीन दर्जन ले जादा नक्सली पकड़े गे रहिन त दू दर्जन ले जादा नक्सली सरकार के योजना के फायदा लेहे बर आत्म-समर्पण कर दे रहिन। सरकार अति उछाह मा रहिस कि बस्तर अंचल ले नक्सलवाद ला जड़ से खतम करे के बेरा अब आ गे हे।..... एकरे जवाब देय बर देश के बड़े नक्सली नेता मन सुनियोजित तरीका से ये बहुतेच् घातक आपरेशन ला लांच करे रहिन। .......  सरकारी सूचना तंत्र ले घलो एक कदम आघू नक्सली मन के सूचना तंत्र रहिथे, एकरे सेती संख्या बल म कम रथें तभो ले सरकार ला चुनौती देवत रहिथें! नक्सली मन ला सबसे ज्यादा फायदा ए बात के घलो मिलथे कि ओमन स्थानीय भाषा के जानकार होय के सँगे-सँग इलाका के घना जंगल के ओनहा-कोनहा, झील-झुरमुट रसता के जानबा रहिथें। सरकारी तंत्र एही मेर कमजोर पर जाथे। जवान मन बस्तर के घना जंगल के भूगोल ले अनजान रहिथें, एकरे खातिर पाँवपुट मा ओमन ला खतरा झेले बर परथे। हालाकि नक्सली मन ला घलो बेरा-बेरा मा जबड़ नुकसान उठाना परथे!

            नक्सली मन के एंबुश मा आज जवान मन ठीक वइसने फँस गे रहिन जइसने मुसुवा मन लालच मा आके पिंजरा मा फँस जाथें!..... वास्तव म देखव तो जवान-मन के मन मा तो कुछु लालच रहिस निहीं, ओमन तो  अपन ड्यूटी करत रहिन। फेर लालच सरकार डहर ले जरूर रहिस ..... जबड़ लालच ..... नक्सलवाद ला खतम करे के लालच! ..... बस्तर अंचल मा अमन-चैन स्थापित के लालच!! ......... बस्तर अंचल के  विकास करे के लालच!!!

           तीन साल पहिली भारी बारिश के कारण सड़क बह गे रहिस, सड़क अउ पुल दुनों उखड़ गे रहिस। सड़क मा पुल ले करीब 150 फीट दूर जिहाँ सीसी सड़क खतम होय रहिस अउ डामर सड़क शुरू होय रहिस वोही जगा मा मरम्मत अउ नवा सड़क निर्माण के दरमियान नक्सली मन हाई क्वालिटी के तीस किलो आईईडी सड़क के गहराई मा प्लांट करे रहिन। थोरिक दूर किनारे मा साल के 10 -12 पेड़ लाईन से लगे रहिस जेमन के ऊँचाई 70-80 फुट ले जादा रहिस होही। नक्सली मन ला ये समझे मा कोई दिक्कत नि रहिस कि ओमन आईईडी कहाँ प्लांट करे हें! नक्सली मन ये जानकारी जगा बदले के बाद अपन दूसर नक्सली नेता मन ला दे देथें, एकरे सेथी तीन साल पहिली बिछाय आईईडी ले सटीक निशाना लगाय मा आज ओमन फेर कामयाब हो गिन। 

         विस्फोट स्थल ले दू किलोमीटर दूर जंगल के अंदरूनी क्षेत्र के एक छोटे से गाँव मा चार दिन पहिली ले नक्सली मन डेरा डारे रहिन।सशस्त्र नक्सली मन के संग बारूदी सुरंग विस्फोट के जानकार मन रूके रहिन। नक्सली मन गाँव वाले मन ला कहीं भी जान-आन नि दीन।.....   पुलिस मुख्यालय मा ये सूचना नक्सली मन के एजेंट मन ही पहुँचाईन कि नक्सली मन जंगल के पन्द्रह किलोमीटर अंदर डेरा डारे हें! जबकि ओमन के वास्तविक लोकेशन जंगल के बीचोंबीच सड़क से केवल दू किलोमीटर अंदर रहिस जेमेर तीन साल पहिली बारिस मा पुल बह गे रहिस। वोही मेर ला पार करके जवान मन के वाहन वापिस लौटत रहिस तभे नक्सली मन ब्लास्ट करके बख्तरबंद गाड़ी ला उड़ाइन। ...... युद्ध जइसन हालात के बीच एती नक्सली मन ला बेरा डूबे के अगोरा रहिस। ....  ओती जवान मन ला सरकारी मदद मिले के उम्मीद लगभग खतम हो गे रहिस, काबर कि  मदद पहुँचे के सबो रद्दा अब छेंका गे रहिस! .....  वास्तव म एहा नक्सली मन के बड़े मगर सुनियोजित हमला रहिस, जेमा आज अर्धसैनिक बल के जवान मन पिंजरा मा मुसुवा कस फँस गिन हें!

         झिंटूराम सात साल ले बस्तर के नक्सली जोन म नौकरी करत हे। कांस्टेबल ले अब सब-इंसपेक्टर बन गे हे। नक्सली मन के संग मा ओखर एहा तीसरा मुठभेड़ हे, फेर सबले खतरनाक मरो ..... या...... मारो ! ..... अउ कोई विकल्प शेष नि बचे रहिस !........एहा वोही दरभा घाटी ए, जेहा सात साल पहिली काँग्रेस के एक दर्जन बड़े-बड़े लीडर मन के लहू- रकत ला पीए रहिस!

       आज नक्सली मन के कई बड़े लीडर मन झिंटूराम के गोली के शिकार होय हें! दरअसल अर्धसैनिक बल के साथी मन लड़े बर मोर्चा लिन त झिंटूराम पेड़ के आड़ लेत अपन टुकड़ी के नेतृत्व करत पाँच कांस्टेबल साथी सहित लगभग दू किलोमीटर के चक्कर काट के नक्सली मन के पाछू डहर पहुँच गे। ये बड़ जोखिम ले भरे काम रहिस, काबर कि जंगल के भीतरी रद्दा के ओमन ला कुछु भी जानकारी नि रहिस। जगह-जगह जान के खतरा रहिस ......  पता निहीं कोन डहर नक्सली मन घात लगाये छुपे होहीं ?......  कुछ नजदीक पहुँचिन त पाकिट दूरबीन ले झिंटूराम देखिस कि 10 - 12 नक्सली लीडर मन एक बड़े दरख्त के पाछू मा दारु पार्टी करत हें!.......शेखर रमन्ना !!... नक्सली मन के तीसरा सबले बड़े  लीडर ...... जेला जिंदा या मुर्दा पकड़े बर छत्तीसगढ़ सरकार के चालीस लाख अउ आन्ध्रप्रदेश सरकार के साठ लाख रूपिया ईनाम घोषित रहिस! ...... झिंटूराम ओला पहिचान गे ...... छै फुट चार इंच ऊँचा-पूरा, एकदम काला रंग, बाल लंबा-लंबा, एक आँख ले काना ..... बम बनात-बनात ओखर फटे ले एक आँख गइस अउ संग मा हाथ के चार-पाँच ऊँगली घलो...... चेहरा म कई जगह चोंट के निशान...... एकदम राक्षस बरोबर !..... झिंटूराम के खून उबाल मारे लगिस..... शरीर गरम होगे!...... फेर दुरिहा ले निशाना लगा पाना संभव नि रहिस....... ओमन लगभग 300 फीट के दूरी म पाछू डहर थोरिक निचाई वाले जगा मा म रहिन। लगभग 150 फीट आघू एक बड़े दरख्त रहिस। झिंटूराम अपन साथी मन ले कहिस - तुमन चौड़ाई म 50 -  60 फीट के दूरी बनाके फैल जावव। आघु कोती झन बढ़िहा। मैं पेड़ तक पहुँचे के कोशिश करत हौं! अगर पेड़ म चढ़ पायँ तव नक्सली नेता मन मोर  टारगेट म आ जाहीं!...... मोला उहाँ पहुँचे म आधा घंटा लग जाही। मोर फायर करे के बाद तुमन एक साथ फायरिंग शुरू कर दिहा- चाहे कोनो टारगेट म रहे या झन रहे! ओखर पहिली बिलकुल भी फायरिंग नि करना हे!

       झिंटूराम अउ ओखर साथी मन अपन-अपन गंतव्य बर स्क्रोलिंग करत रवाना हो गिन। झिंटूराम ला पेड़ तक पहुँचे अउ चढ़े मा लगभग 30-35 मिनट के समय लगिस।...... झिंटूराम ला बचपन म ही बेंदरा के उपाधि मिले रहिस काबर कि पेड़ चढ़े मा ओला महारथ हासिल रहिस। कई बार साथी मन ओला ' झिंटू बेंदरा ' कह के चिढ़ायँ तव लड़े बर भिंड़ जाय।

       पेड़ म लगभग 25 फीट उपर चढ़ के झिंटूराम बड़े डारा के सहारा ले के अपन पोजिशन ले लिस। अभी तक किस्मत ओखर साथ देत रहिस..... फेर हर-हमेशा तो अइसे नि होय। झिंटूराम उहाँ ले देखिस....... 10 - 12 नक्सली नेता मन निश्चिंत होके एक बड़े दरख्त के पाछू खड़े-खड़े दारू पार्टी म मगन रहें! अउ आघू डहर प्यादा नक्सली मन बतरकिन्नी कस चारों ओर फैले रहें, जेमन के संख्या 300 ले उपर रहिस होही।

           ओतके बेरा ओती नक्सली नेता मन के दारू पार्टी चलत रिहिस एती झिंटूराम के रायफल ले थ्री-नाट-थ्री के गोली ......  तड़!..... तड़.!!..... तड़ !!! ..... झिंटूराम के रायफल गोली उगलत रहे ...... वजीर! ...... घोड़ा! ..... हाथी! ...... ऊँट ...... एक-एक कर धरासायी होत रहें .....  नक्सली लीडर मन के सिर ओखर टारगेट रहिस।.....  ठीक एही बेरा ओखर साथी मन भी फायरिंग शुरू कर दिन, जेन मन चौड़ाई म फैले रहिंन।  ......   दस मिनट के फायरिंग म नक्सली मन समझ नि पाइन कि पाछू डहर कोन कोती ले फायरिंग होत हे!.... ओही बेरा जवाबी फायरिंग म कई गोली सनसनावत झिंटूराम के आसपास ले निकलिस। झिंटूराम ला तीन गोली एक के बाद एक लगिस!...... दू कंधा म अउ एक गोली जाँघ म...... 25 फीट के ऊँचाई ले झिंटूराम नीचे गिरिस!.... असीम पीड़ा अउ घायल अवस्था म घलो झिंटूराम के मुख म मुस्कुराहट दौड़ गे ! ...... अतेक बड़े सफलता ! ....... वजीर...घोड़ा... हाथी... ऊँट... सबो तो गइन! 

        पाछू डहर म सैनिक मन के जादा संख्या बल के आशंका अउ अपन चार-पाँच बड़े नेता सहित 15-20 नक्सली मन के मौत ले नक्सली मन-मा घबराहट अउ डर फैल गे अउ ओमन तेजी से पीछे हटिन।...... नक्सली नेता मन के मंसूबा धरे के धरे रह गे! ओमन ला आज अपन जीत के पूरा भरोसा हो गे रहिस, ओखरे खुशी म  दरख्त के पाछू बड़े नेता मन दारू पार्टी भी करत रहिन।..... आज ओमन ला केवल अंधेरा होय के इंतजार रहिस, काबर कि अंधेरा होय के बाद सैनिक मन के सहायता बर कोनो नि आ पातिन ।...... फेर नक्सली मन हथियार अउ युद्ध सामाग्री ला लुटतिन अउ घायल सैनिक मन के उपर मौत के नंगा नाच नाचतिन! 

        नक्सली अउ अर्धसैनिक बल के बीच मुठभेड़ तीन घंटा चलिस अउ आखिर म नक्सली मन अपन मृत अउ घायल साथी मन-ला ले के तुरत-फुरत जंगल कोती भाग गिन। ......  सैनिक मन के हथियार अउ गोली-बारूद लुटे के ओमन के मंसूबा धरे के धरे रह गे!......ये लड़ाई म आधा ले जादा सैनिक मन शहीद हो गिन ! फेर बाकी घायल मन के जान बचगे! ....... नक्सली मन के हत्थे चढ़तिन तव कोनो के जान नि बचतिस !

        झिंटूराम के शरीर ले ताते-तात लहू तर-तर, तर-तर बोहावत रहे,- ओला रोक पाना ओखर बस म नि रहिस। अब रात के बेरा होत रहे- सरकारी सहायता बर बिहान पहाय के इन्तजार करना परही! 

      धुप्प अंधियारी रात.....कहीं दूर ले कराहे के आवाज आवत रहिस त पास के पेड़ ले उल्लू के बोले के कर्कश ध्वनि ! ...... झिंटूराम के चेतना धीरे-धीरे  जावत रहिस। ओला अइसे लगिस कि अब ओखर आखिरी बेरा आ गे हे! .......बचपन के कुछ चेहरा मन ओखर पथराए खुले आँखी के आघू मा चलचित्र जइसन आय लगिन, जेमन सो या तो बहुत मया करे या फेर बहुत घृणा! ....... सबले पहिली पिता के राक्षसी चेहरा सामने आइस जेहा शराब पी के ओखर अम्मा संग लगभग रोज मारपीट करय ! अउ फेर ट्रक दुर्घटना म ओखर मृत वीभत्स शरीर!......फेर अपन अम्मा के सुरता आइस जेहा अर्ध सैनिक बल म ओखर भर्ती के समाचार ला सुन के रोवत-रोवत मुँहटा तीर म आधा घंटा ले बइठे रहिस!.....फेर सुरता आइस ओ घटना कि  नौकरी ज्वायन करे के छै महीना बाद जब ट्रेनिंग कम्पलीट करके घर वापिस आय रहिस अउ अम्मा बर नावा लुगरा के संग घुंघरू वाला पैंरी खरीद के लाय रहिस, त ओला देख के अम्मा मुँहटा म बइठ के फेर रोय ला धर ले रहिस..... 

        झिंटूराम के चेतना धीरे-धीरे  अंतरिक्ष म विलीन होत रहिस ...... आखिर म डोकरी दाई के सुरता आइस जेला ओहर अपन प्राण ले भी जादा प्यार करे।.... फेर ओला गुजरे पाँच बरस ले घलो जादा समे हो चुके हे......  जेखर हाथ ले चाकलेट अउ भात खाना ओहा कभू नि भूल पाइस! ...... ओह!........ बचपन भी कतका मासूम होथे........ डोकरी दाई.! ... .. डोकरी दाई !  कहत ओखर मुँह नि थके।..... भला डोकरी दाई के मया ला ओह कइसे भूल पाही?...... अंतिम बेरा घलो बचपन के एक-एक घटना चलचित्र के भाँति ओखर पथराई आँखी म झूलत रहे ..... जेमन अंतस म हमा गे हें, ओमन तो जी के साथे जाहीं! ........


                       ( *2* )


       लगभग 22 बरस पाछू जब छत्तीसगढ़ राज नि बने रहिस ...(झिंटूराम के बचपन के कहानी)


         'मर जाय साला बेर्रा ह.......कीरा परे.......मोर डेगची अउ जम्मो चाउँर ला चोरा के ले गे ! ...... ओई दरूहा मंगतू होही ! का करों.....मोर हाथ-गोड़ थक गे हे, नि तो साले ला......'  -डोकरी दाई बड़बड़ावत रहे, फेर ओखर गारी के सुनईया ओमेर कोनो नि रहिस।

          इंदिरा आवास योजना म दू जगा घर बने हे। डोकरी दाई रइथे तेन मेर चार घर अउ बाकी घर थोरकुन दुरिहा म। डोकरी दाई ओमेर अकेल्ला रइथे, बाकी तोनों घर म कोनो रहे बर नि आय हें। डोकरी दाई दू दिन ले परेशान हे , काबर कि ओखर नानकुन ताला मुरचा खा के खराब हो गे हे। बिहन्चे एक बार अउ कोशिश करिस फेर ताला नि सुधर पाईस त बाहर पार के संकरी लगा के गोबर संइते बर चल दिस। डोकरी दाई गोबर के छेना बना के बेचे त दू पइसा पा जाय, फेर हर महीना सरकारी पेंशन के पइसा अउ  चाउँर के भरोसा ओखर दिन मजे म कटत रहिस। आज गोबर संइत के आइस त देखथे कि घर  खुल्ला हे! ओखर जी धक् ले रह गे!  घर भीतरी खुसरिस त देखथे कि ओखर कुल जमा पूंजी डेगची, लोटा, गिलास अउ आठ किलो चाउँर गायब हे! ओला समझत देरी नि लगिस कि एहा मंगतू दरूहा के करतूत हे!

        मंगतू दरूहा के पाँच पीढ़ी ला गारी देत-देत डोकरी दाई थक गे, तहाँ अब चिन्ता सताय लगिस। मंझनिया  के बेरा झिंटू आही त ओला खाय बर का दूहूँ? न डेगची हे न चाउँर, फेर भात कइसे राँधहूँ ?....... पाँच बरस के झिंटू बर ओखर अतेक मया जइसे दू शरीर एक प्राण ! ओही चिन्ता म डोकरी दाई बिपतिया गे।

       झिंटू के पिता घलो अखंड दरूहा रहिस। एक साल पाछू दारू पी के चलती ट्रक म झंपा गे। 24 साल के मोटियारी कस फरसोनहिन दुच्छा हाथ होगे।अब ओ बिचारी के सहारा फकत झिंटू रहिस .....ओखर चार साल के नानकुन लइका! ..... बिचारी लइका ला सुबे आँगन-  बाड़ी केन्द्र म छोड़े , फेर बनी-भूती बर निकल जाय त चार बजे संझा  वापिस आय। आँगन-बाड़ी केन्द्र म झिंटू कुछु खाय-पिये बर पा जाय ,फेर छुट्टी होय त उहाँ ले एक किलोमीटर पैदल चलके डोकरी दाई करा पहुँच जाय। उहाँ फेर कुछु खाना-पीना मिल जाय अउ चुटुर-चाकलेट घलो। डोकरी दाई झिंटू के आय बिना खाना नि खाय। एक ठिन डब्बा म चुटुर-चाकलेट बिसा के रखे रहय, तेमा के रोज एक ठिन ओला आते-आत खाय बर दे। फिरती बेरा म फरसोनहिन हा डोकरी दाई के घर आवय- लाल चाय पियँय, अपन दुख-सुख गोठियावँय फेर अपन बेटा ला पीठ म घोड़ा-बइठार के फरसोनहिन वापिस घर ले के जाय।....... डोकरी दाई अउ फरसोनहिन आन-आन जात-बिरादरी के हें फेर झिंटू के ददा के मरे के बाद डोकरी दाई फरसोनहिन ला अपन बेटी बरोबर जाने लगिस। फरसोनहिन घलो इंदिरा आवास म रहे फेर ओखर घर हा डोकरी दाई के घर ले आधा किलोमीटर दूरिहा रहिस।

       आँगन-बाड़ी ले जइसे छुट्टी होइस तइसे झिंटू हा तरतिर- तरतिर डोकरी दाई के घर कोती भागिस। उहाँ पहुँचिस त देखथे कि घर हा भीतर ले बंद हे!

      झिंटू जोर से चिल्लाइस- डोकरी दाई ! डोकरी दाई !.......  फेर भीतर ले कोई आवाज नि आइस। झिंटू पूरा ताकत लगा के दरवाजा ला हला-हला के चिल्लाय लगिस। फेर ओखर आवाज के सुनईया एमेर कोनो नि रहिन।

        दरवाजा के झेंझरी ले झिंटू भीतर कोती ला झाँकिस। ओखर जी धक् ले रह गे ! खूंटी म लटके  लालटेन के मद्धिम रौशनी खटिया उपर परत रहे..... ओहा देखिस कि गोदरी ओढ़ के कोनो सुते हे!

       झिंटू जोर-जोर से विलाप करे लगिस-' डोकरी दाई मर गे ! डोकरी दाई मर गे ! डोकरी दाई उठ ओ........अब मैं तोला कभू तंग नि करों !..... '

       फेर ओखर करूण क्रंदन ला भला कोन सुनतिस?अब मरना- जीना ला भला झिंटू का जानतिस, फेर साल भर पहिली अपन पिता के मरना ला देखे रहे!...... मुहँटा मेर बस्ता पटक दिस अउ रोवत-रोवत बइठ गे।....... कतको दुख हा घेरे रहे फेर नींद हा अपन बूता ला करबेच्च करथे- झिंटू घलो रोवत-रोवत घर के बाहिर धुर्रा- गोंटी-माटी उपर सुत गे अउ स्वप्न लोक म विचरण करे लगिस। ओला अइसे लगत रहे कि डोकरी दाई ला भगवान वापिस भेज देहे हे अउ एके थारी म भात खात दुनों झन कतकोन बने-बने गोठ-बात करत हें!

       अइसने डेढ़ घंटा बीत गे । झिंटू मुँहटा तीर म सुतत एती-ओती हाथ-पैर ला फटकारत अल्थी-कल्थी मारत रहे। कुर्ता-पेंट धुर्रियागे।.......तभे ओला अइसे लगिस कि डोकरी दाई हा जोर-जोर से हलावत हे अउ उठे बर कहत हे। आँखी खोलके निहारिस त बिजली के झटका कस लगिस अउ चैतन्य होके तुरते खड़े होगे। ....... सामने डोकरीदाई साक्षात खड़े रहे! डोकरी दाई ला झिंटू कस के पोटार लिस अउ रोवत-रोवत बोलिस- 'डोकरी दाई तैं कहाँ चल दे रहे ? मैं अब तोला कभू तंग नि करों!'

     डोकरी दाई हाँसिस-' ए दे लड्डू खा, तोर बर दू ठिन लड्डू खरीद के लाने हँव।'

    एखर पाछू दरवाजा के पल्ला ला आघू- पीछू ढकेल के हाथ बोज के भीतर पार के संकरी ला डोकरी दाई खोलिस। झिंटू सरपट घर के भीतर खुसरिस,  त देखथे कि डोकरी दाई हा  खटिया उपर  मुसरिया ला गोदरी ओढ़ाय रहे! दरवाजा के झेंझरी ले झाँक के देखे म अइसन लगत रहे कि डोकरी दाई सुते हे!

       थोरकुन बेर म डोकरी दाई भात-साग ला चुरो दारिस अउ झिंटू दुनों ताते-तात भात-साग ला खात मीठ-मीठ गोठिवावत रहें।

     झिंटू पुछिस- 'डोकरी दाई तैं भीतर पार ले संकरी लगा के कहाँ चल दे रहे? '

    डोकरी दाई बोलिस- 'बेटा, पइसा निकाले बर बैंक गये रहेंव। भारी भीड़ रहिस, फेर धन्न हो  बड़े बाबू के - मोला सबले आघू पइसा निकाल के दे दिस। ओखर बाद डेगची, लोटा, गिलास,ताला अउ चाउँर - साग ला तुरते खरीद के लाने हँव तभो ले बेरा होगे।..... सुबे मंगतू दरूहा सबो जिनिस ला चोरा के  ले गे हे!'

        डोकरी दाई ला ग्रामीण बैंक के सबो कर्मचारी मन जानें अउ ओला देख के मुस्कुराय लगें। एखर कारण सिर्फ ए रहिस कि बिना नांगा किए हर महीना डोकरी दाई बैंक आवय अउ अपन बाँहचे पचास-सौ रूपिया ला जमा करे!...... कम पैसा जमा करना ही ओखर लोकप्रियता के कारण रहिस!.... अउ बैंक कर्मचारी मन के हँसी के कारण भी !

        डोकरी दाई के घर म चोरी अउ फेर ओखर मरे के डर हा झिंटू के बालमन मा घर कर गे अउ पुलिस बने के जुनून सवार होगे!

    झिंटू बोलिस- 'दाई बड़े होके मैं पुलिस बनहूँ अउ मंगतू दरूहा ला पकड़ के जेल  म भरहूँ! '

    दाई बोलिस -' बेटा पढ़-लिख के जरूर पुलिस बनबे।फेर ओ दिन तक मैं इहाँ नि रहों- भगवान के कर्जा बाँहचे हे, ओहू ला तो छूटे बर जाना हे!'

    झिटू बोलिस-' महूँ जाहूँ दाई तोर संग!'

     दाइ बोलिस-' नहीं बेटा, तैं पाछू आबे। पुलिस बनबे त अपन अम्मा बर कुछु लेबे कि निहीं?'

      झिंटू हा अपन सबो ज्ञान के निचोड़ ला समेटत बोलिस-' हाँ दाई, अम्मा के लुगरा चिरा गे हे। ओखर बर नावा लुगरा अउ घुंघरु वाला पैंरी खरीदहूँ ! अम्मा नावा लुगरा पहिर के रेंगत-रेंगत घर आही त ओखर पैरी के छम-छम आवाज मा मैं पहिली ले जान डारहूँ कि अम्मा आवत हे!


                      ( *3* )


          *कुछ दिन बाद एक समाचार अखबार म प्रमुखता ले छपिस -' छत्तीसगढ़ के अर्धसैनिक बल के सब- इंसपेक्टर झिंटूराम को* *मरणोपरांत कीर्तिचक्र से* *सम्मानित किया जाएगा। सम्मान प्राप्त करने के लिए उनकी माँ फरसोनहिन बाई छत्तीसगढ़ शासन के विशेष विमान से 24* *जनवरी को* *दिल्ली जाएँगी*।' 

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 *पुनरीक्षित दिनांक 16 जनवरी 2025* 


 छत्तीसगढ़ी कहानी :


           डाॅ विनोद कुमार वर्मा

व्याकरणविद्, कहानीकार, समीक्षक 

                  बिलासपुर


मो- 98263 40331

लंबा छत्तीसगढ़ी कहिनी)

 -


*आज तिथि जेठ अंधियारी तीज के दिन, महराजिन त्रिपुर सुंदरी अउ ठकुराइन सोनकली के जिद -बाद अउ नोंक झोंक के आनन्द लो।कथा म आठे कन्हैया के गोठ आही।फेर वो लाला नन्द लाला बर का होरी कि का आठे कन्हैया।वो तो गुणातीत ये।सबो गुण- अवगुण तो हम मनई मन भर ये...*


         


               *विश्व रूप दरसन*

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             (लंबा छत्तीसगढ़ी कहिनी)



                       1 .




           पुन्नी के चन्दा अगास म फरियात हे ।रगबग चटक  चंदैनी  बगरत बगरत महराज सदानन्द  के परसार  ल घलव छू डारे रहिस ।महराज अउ महराजिन.... दुइक -दुवा अभी ।दु ठन नोनी बिहा के अपन ससुराल म हें, अउ दउ हर शहर म नौकरी पा गय हे ।


              महराज, नियम- धरम बर पक्का।उंकर बस चले त दिवसावसान होय के पहिली ही वो रात के जेवन कर लेथिन; फेर रसोई विभाग हर तो उँकर जिम्मा म तो रहे नहीं ।अउ जेकर  जिम्मा म रथे, वो ये महराजिन त्रिपुर सुंदरी ।


          अउ महराजिन ल महराज के बुता- काम म  हर बुता कम भेवा जादा लागथे ।तेकरे बर कभु भी महराज ल सूर्यास्त- पारायण के शुभ अवसर नइ मिल पाय ।वोतका बेरा तो  उँकर चूल्हा हर सुलगथे । फेर आज कौन कोती के राजा के चला चली होय हे, तब महराजिन हर बर्तन -भांडा ल संकेल के ये पूरब म उवत सुधाकर के सुधा पान करत हे ।


"खा डारे ओ,महराजिन ।"सोनकली ठकुराइन निकलिस अपन मुहटा ल ।


"हाँ..।"


"ठीक हे, फेर मैं साग नइ पूछत अंव न।मोला तोर अलवा- जलवा साग ल पूछे बर घलव नइ ये।"


"का कहे रे न**इन !मोर साग अलवा- जलवा अउ तोर हर चोखट ।"महराजिन एकदम भड़क गय रहिस ।


"ह ओ ब***नीन, देखे गोठ -पतियाये गोठ तो आय ,तोर साग- पान हर।रान्ध बे मुनगा काड़ी तउन म माड़ी भर के झोर ।अइसन तो रथे तोर साग भात हर ।वो तो नेम धरम के पक्की -पक्का महराज,कहे कुछु नही तोला अउ आंखी कान मूंद के गट.. गट.. लील देथे बोपरा हर ।हमर ठाकुर करा तो तंय एकदिन भी नइ चलथे ओ ।"


"पानी पी ले सोन कली,तब फिर बखानबे अउ उखा*बे ।"महराजिन तीर म धरे लोटा ल वोकर कोती  अमरत कहिस ।



   अब सोनकली सिरतो म चुप पर गय रहिस । महराजिन तो मुचमुचात रहिस ।अतका तो येकर रोज के बुता ये ।फेर कभु- कभु येकर गोठ ले ,जी हर बम बिया घलव जाथे ।


"महराजिन...!" भीतर कोती ल महराज के गोठ हर उदगरत रहिस । महराजिन सुनिस ,फेर वोकर जवाब नइ दिस 


"ये महराजिन...!'अवाज हर थोरकुन उंचहा आइस ।


"रा... हा ... न थोरकुन।" महराजिन ललकारत  कहिस महराज ल ,"करत रहा न बने पारायण  ,काके करत हव तेला।रमायन  के  ये सुखसागर  के तेला ।"


"तंय बझ झन काकरो करा बस ।"


"माने मंय जनम रेन्धही अंव।"


"मैं तो अइसन नइ कहत हंव ।"


"तव फेर काय कहत  हावा तुँ ।"


"ले बबा ,बझ- लड़  काकरो करा ...।"


           येला सुनके सोनकली खुश ...खुश..हाँसत रहे।देखे महराजिन, तंय मोला झगड़हीन बनाथस,तोला खुदे तोर गोसांन हर झगड़हीन करार देवत हे ।


 "अरे तंय ,काकर करा लड़बे महराजिन, मोर छोड़ आने करा ।"सोनकली पांच परगट कहिस ।


"तंय मोर करा का खा के लड़बे रे नवा**न"


"देख..देख..तोर  भाखा ल।जीभ ल  बने सम्भार के राख । वह दे महराज सुनत हे नही त जना देय रथें तोला अभी ।"सोनकली के ठनकत आवाज सुनइ परिस ।


"महराजिन...!"महराज के भयग्रस्त अवाज फेर सुनई परिस।फेर येती महराजिन बर, का ये न का..।


"जा ओदे ,बेर हो जावत हे।"सोनकली कहिस अउ भेदहा हाँसी हँसे लागिस । ये पइत महराजिन थोरकुन हथियार डाल दिस।वोहर थोरकुन सकुचा घलव गय रहे ।


 "नइच जाँव अभी,हाँक पारन दे,महराज ल "सुंदरी महराजिन कहिस ।


"तोर मन दइ,...!कह पारत रहेन ओ ।"सोनकली कहिस  अउ चुप हो गय ।


"काय कहत ..र ..रहे,वोतका बेरा।बड़े ठाकुर मन के बड़े तलवार  रथे , रणभूमि म जाये बर...।अउ तुमन  छोटे ठाकुर अव, तेकर बर तुमन के तलवार हर छोटे रथे।वाह रे..,छोटे तलवार..! छुरा देवता...!"


"हाँ..!येहर तो सच आय ।एमे कोनो शंका नइ ये ।"सोनकली  हाँसत -हाँसत कहिस ।



         महराजिन अब अपन आँट ल उतर के खोर -गली म आ गय रहिस ।एक प्रकार ले ठकुराइन के तीर म ।माने तंय महराज के लिहाज करके वोला जवाब देवत हस ,तब आनन्द नइ आवत ये ।अब बोल तोर बोलवाही ल ,चिटिक महुँ सुनों..का बोलथस तंय हर । 


   अतका बेर म चन्दा हर पुरा फरिया के झक्क- सादा बरफ के गोला बन गय रहय ।महराजिन वोला निच्चट कर के देखत रहय ।वोला अइसन देखत देखिस,तव ठकुराइन फेर भेदहा हाँसी हाँसिस।


"अब तोला का हो गय ।"महराजिन कहिस । 


"मोला का होही, चन्दा ल तो तइच हर देख मरत हस ।"


"वो तो कतेक सुंदर दिखत हे..।"


"होही..।" ठकुराइन सरपट उत्तर दिस ।


"का चंदा हर तोला सुंदर नइ  लागत ये ।"


"अरे हमर साही  मन ल तो लगबे करिही, जउन मन महीना दिन म एक पइत देखे पाथन ये चन्दा ल,फेर.....?"


"फेर....का फेर..?का अधूरा बंचा देय  अउ।"महराजिन थोरकुन अचकचावत कहिस ।


"वो अइसन ये ओ महराजिन, हमन महीना म एक दिन देखे पाथन पुन्नी के चन्दा ल अउ तंय तो रोजीना -चौबीसो घड़ी देखत हावस अइसनहेच चांद ल,तेकर बर,का के पुन्नी के चन्दा के सुघरई...!"


"मंय चौबीसों घड़ी देखत हंव...चन्दा ल,तोर काय मतलब...?"सुंदरी महराजिन सिरतोन म जंगा गय रहिस ।


"अरे चौबीसों घड़ी नइ देखत अस अपन महराज के मुड़ वाला चन्दा ल ।एकदम चिलकत....एकदम.. चिक्कन....!"


"रा ...रे  बंजर का कहे तंय,तोला मंय बतात हंव ।"सुंदरी महराजिन तो एकदम वोकर कोती कूद परिस ।


"महराजिन ,नइ सुनस का...!,महराज के थोरकुन रिस मिंझरा गोठ फेर हवा म  तउरिस ।


"जा ओ महराजिन  जा।वोती जी हर छुटिच जाही ,तब फेर तैय जा के का करबे ।"


"तंय चुप भी कर ,अब छि**र  कहीं के ।"


"देख.. देख.. तंय अपन जिभिया ल सम्भाल , नही त,"ठकुराइन सिरतोन जंगाय के शुरू कर देय रहिस ।


    तंय रे... कहत महराजिन सिरतोन ठकुराइन के चुन्दी ल जाके धर लिस ।


"इया.. इया.. कइसन करत हव ,महराजिन  येकर चुन्दी ल।  कालेच चुन्दी झन झरही कह के झरन तेल लाने हंव।अउ तुँ एके पइत म एक गोंछा ल   नीछ देवत ह।"ठाकुर जगजीवन ठीकेच ये बतर म आ गय रहीस ।


           महराजिन ठकुराइन ल छोड़ के अपन भीतर कोती  जाय लागिस।वोतकी बेरा म सदानन्द महराज पीतल बाल्टी म भरे पानी ल महराजिन उपर उलद दिन..जा बनेच गर्मी हो गय हे, तेकर सेथी अउ नहा के आ..कहत । महराज के शौच -अशौच विचार हर बड़ प्रबल रहिस ।ठकुराइन के चुन्दी ल धरे माने स्पर्श दोष तो लगी गय।अब बिन स्न्नान घर म प्रवेश वर्जित ...!




                      2



कभु कभु महराजिन ल रात रात भर नींद नइ परय ।वोकर कारण, महराज हर बिन मेहनत चोखट भोजन ल बताथे ।


         आज  घलव वइसनहेच  होवत  हे।जब तक सोनकली ठकुराइन ल नीचा नइ देखा लिही तब तक सुंदरी महराजिन ल चैन नइ पड़य । 


          तोला तोरेच घर म घुस के पटकनी देंहा , तब तोला समझ आही , मैं कोन अंव तेहर ...महराजिन  गुनथे,अउ  मने ..मन ..म  का..  न ...का.. खिचडी पकात रहिथे ।


"ठकुराइन, नाश्ता -कलेवा हो गय  का..?"।महराजिन ठनकत अवाज म पूछिस।येकर गहिल अर्थ रहिस,अगर ,फुरसत हो गय होबे त आ अब  वाक-युद्ध शुरू करी ।


"रा ..ना..!ठाकुर हर गंवई  गइन हें।आके कलेवा करहां कहिके गय हें ।


"कतेक  गंवई करथे ठाकुर हर,कभु देखबे त गंवईच गय हे ।"महराजिन थोरकुन तमकत कहिस ।


"तोर घर के महराज नइ जाय का ,अपन जजमानी म।"


"वो जाथें तब ठाकुर  ल घलव  ले जाथें संग म  ।अउ जतका अपन पाथें ,चढ़ोत्तरी म वोकर ठीक आधा ओहु ल देवाथें । "


"ये बुता ल महराज हर तो, बढ़िया च करथें ।वो बोपरा तोरे कस कचकचहा नोहें ।सदा प्रसन्न रहइया जीव ।  हां ..बार-बाछ हर थोरकुन जादाच हो जाथे कभु -कभु  ।"


"येई च हर तो ब्राह्मण के निशानी आय ,ठकुराइन । पूजा-  पाठ, धरम -करम..येइच म तो दुनिया हर टेकाय हे, ठकुराइन । नही त दुनिया हर रसातल म नइ चल देथिस ।"


"ओहो रे मोर धरम -करम ।वो बोपरा अपन मन के शान्ति बर पूजा -आचा करथें ।"



"महराजिन.....!" महाराज के  हाँका फेर गुंजिस ।


"वह दे ,महराजिन ,महराज तोला फेर  हाँक पारत  हें ।"ठकुराइन कहिस ।


"पारन दे,उंकर तो बस एइच बुता ये ।"


"तब ले ओ..!" ठकुराइन कहिस अउ महराजिन के मुख ल देखिस ।


"तोर ठाकुर का का बुता करथे, ठकुराइन ।"महराजिन जइसन प्रण कर डारे रहिस के ये ठकुराइन ल धर के दबोचना च हे ।


"ठाकुर हर 'क्षौर -करम' के सब बुता करथे,फेर तोर घर म आधा च लागथे ।"ठकुराइन भेदहा मुचमुचात कहिस ।


" वो कइसन आधा लागथे हमर घर ओ।"महाराजिन थोरकुन भकचकात कहिस ।     


        येला सुनके ठकुराइन कुछु कहिस नहीं ।वो तो अब ठाकुर के रास्ता देखे के शुरू कर देय रहिस ।


"महराजिन....!!" येती महराज के हाँका फेर पर गय । फेर महराजिन अपन अभियान ल  पिछु नइ हटिस ।अउ अभियान रहिस, कछु कर के ठकुराइन ल गोठ बात म चित्त कर  दिया जाय ।


"तंय कइसे कहे  ठकुराइन, हमर घर के बुता कइसन म आधा लागथे ।


"वो वइसन ये ।महराज के तो बस दाढ़ी- मेंछा भर  बनाय बर लागथे ओ,बाकी हर तो बस सत्य नारायण ये ...!"ठकुराइन कह दिस फेर अपन हाँसी ल रोके नइ सकिस ।


  वोकर हांसे के गूढ़ार्थ ल महराजिन समझ गइस । अरे ये का...!येला मैँ गोठ घेरहां कहत हंव ,अउ  इहाँ मैं खुद घेरा जावत हंव।


"सोनकली,तंय महराज के ऊपर ऊपर ल देख के हाँसत हस ।देखे हस उंकर मेंछा ल ।तारा जोगनी संग अगास हर गिरे लागही तब वो अपन ठाड़ मेंछा म वोमन ल झोंक लिहिं ।"


"बने कहे...।"


"मोर महराज के ठाड़  -ठाड़ मेंछा,अगास कोती जावत अउ तोर ठाकुर के  तरी ओरमत मेंछा ,जाने माने धरती माता हर वोमन ल खीँच लेवत हें ।"


"वो तो उंकर हाथ के बनाय बनोरी ये महराजिन ।मोर ठाकुर हर तो मेंछा मास्टर ये ,वोकर जेती मन लागही तेती गजुम लीही


ओमन ल ..।"  ठकुराइन कहिस,"तंय  जाबे कि नहीं ,तेला तंय जान।फेर मैं अब जावत  हों ,काबर के वह दे मोर ठाकुर आवत हे ।


         महराजिन अबक्क ठाढे रहिस।वो खुद तय नइ कर पात रहिस के बाजी  ये पइत काकर हाथ म हे ।


   



   थोरकुन बेर बाद म  ठकुराइन घर ल बाहिर निकलिस।तब का देखथे, महराजिन जाड़ म कुड़कूड़ात तरिया ल फेर नहा के आवत हे।अब रसोई बनही ।अउ शुचिता  म सदानन्द महराज कोई समझौता नइ  करेंय ।


    वोला अइसन जाड़ म कुड़कूड़ात देखिस,तब ठकुराइन फेर मुचमुचा उठिस ।


"तंय कइसन भी हाँस बे मोला, तब ले भी तोर तीर म नइ जाओ ।महराज, देखहीं तब फेर वापिस तरिया भेज दिहीं।"महराजिन तो फेर ठाढ़ हो गय रहिस।


"महराजिन, तंय मोला तो ओझिया -बतरा घलो डारे,अब ।जा....जा...भीतर कोती जा नहीं तव ठिकाना च नइ ये ।"अइसन कहत ये पइत खुद ठकुराइन अपन घर भीतर कोती आ गय ।






                      3




         महराज सदानन्द अपन ब्राम्हणत्व बर बहुत ही सचेत, वोतकी महराजिन त्रिपुर सुंदरी हर बिन्दास...!महराज के लाख हरके- बरजे  ल भी महराजिन अवइया -जवइया मन ल दु चोंच नइ मारही,तब बनबे नइ करय ।



          आज भी ये जगह म महराज के एकछत्र राज चलथे  । बिना कछु भय के ही जनता -जनार्दन हर उंकर आगु म नत मस्तक रथे ।येकर मर्म ल महराज हर अच्छा तरीका ले जानथें  ।वोहर आय उंकर कर्म काण्ड  अउ सुचिता । थोरकुन समाज ल दूरी बना  के रइबे,तब तोर प्रभा- मंडल सदाकाल अइसनहेच बने रही । येहर उंकर बर अधिकतम कुटिलता ये।येकर ल आगु वोहर अपन स्वार्थ बर अउ आन कछु नइ ज जानीन । सदा प्रसन्न राम हर उंकर आराध्य आँय ।अउ वोई मूर्ति ल अपनों म उतारे के प्रयास हर ही उँकर जीवन उद्देश्य घलव ये ।


             


            फेर महराजिन के मन आय ,तब न...!जब तक वोहर दु -चार लइका मन के मूड के जुंहा नइ देख लीही, अउ खुद के मूड़ के एक दु पाकत चुन्दी मन ल,पड़ोसिन नावा बहु- बोहासीन मन करा ले सुलरवा


 नइ लीही, तब तक वोकर दिनचर्या पूरा नइ होय।अउ महराज देख डारिन,तब येकर सजा....वोइच  तीर के तरिया ल स्न्नान करके  ,कइनचा ओनहा पहिन के घर म घुसर  ..। कै पइत तो महाराजिन ल पांच... पांच पइत तक ल नहाय बर पर गय हे,दिन भर म ।


          


        अउ ये सजा हर महराजिन ल अइसन सिझो देय  हावे कि अतेक नहाय ले  भी उनला कुछु फरक नइ पड़े । न.. जर  ..न ..जुड़..न छींक ...न..खाँसी ,कुछु भी नहीं । महराजिन बर येकर लिये महराज करा लें कुछु भी छूट नइ ये ।


   


        महराज के पूर्वज मन  ही ठाकुर के पूर्वज मन ल ये तीर म बसाय रहीन हें , काबर के बनेच अकन कर्म काण्ड म ठाकुर के  उपस्थिति हर जरूरी होथे। मर मिट म  पिंडा धारे के बेर म परसा पान के खोनिया बना के लान थे ,चुरी - चाकी  ल पानी नहाय के बेर घाट म अपन छुरा ले....। बिहाव पढ़े के बेर म ,वोहर तो महराज के हाथ -पाव बने रइथे । येकर सेथी ठाकुर हर महराज के पूरक आय ,कहके  ये महराज घर तीर म वोकरो उपस्थिती हे ।


         


        फेर सदानन्द महराज अपन पुरखा के चलागत ल कस के अपन म राखे हे ।अउ ठाकुर करा  क्षौर कर्म कराये के बाद,स्न्नान ध्यान बर बराबर सचेत रइथे । अउ ठाकुर हर दिन के पहिली बुता करही, तब वोहर महराज के बुता रइथे ।


             महराज महराजिन ल कै न कै पइत चेताथे  । बिना काम ..अकारण काकरो आन के देहरी झन खुंद । फेर महराजिन अइसन भलमनसी वाले  जीव आय  ,के कोई झगड़ा- झंझट होवत देखही, तव घर -भीतर ल खुसर जाही । समझाय बुझाय  बर ।कोन्हों रिसाय फुलाये हें ,तब महराजिन हावे वोला मनाय बर । ये बेरा म वोकर आत्मीयता हर देखतेच बन थे ।फेर महराजिन हर निज नारी पुरुष मन के लड़ई भिड़ई, म अतेक दखल दे देवत हे ,ये समय म  ।


             परनु राउत ,ये गांव के बड़ डिंगर  जीव ।एक दिन दुनो राउत- रौताइन कुछु जिनिस ,बर तीरा -घिंचा  होवत रहीन।फेर बात महराजिन के कान म खुसर गय ।वोइच दे,तुरत- ताही महराजिन पहुंच गय उँहा ।समझाइश देवत हे दुनो झन ल ।समझाइश कम डांट -डपट वोकर ल कतको जादा। तरी मुड़ करके दुनों के दुनों हाँसत हें, अउ येती महराजिन त्रिपुर सुंदरी ,वोमन ल पानी पी ..पी ..के समझात  


रहिस । बनेच बेर म वोमन मानिन ।महराजिन ल एक पइत अउ पानी मंगा के पिये बर लाग गय।


"तुंहला इंहा पानी पीयत देखहीं ,तब महराज हमन बर जंगाही,महराजिन ..!" 


"ठीक हे, अब बने रइहा।मैं अब जावत हंव " महराजिन कहिस अउ उँहा ल निकल आइस ।



        एकर बाद तो महराजिन बुता च कर देय रहिस।आत -जात,भेट- मुलाकात हरदम वोमन  के  खोज -खबर लेये के।बने राखथे ये पइत के फिर वोइच दिन कस डिंगरई  करत हे । कनहुँ मारा पीटा तो नइ करय । 


           बने रान्ध पसा के देवत हे के बारा भिभो करथे,मुँहू फूलोय रइथे के बने हाँसथे गोठियाथे । देखबे दउ, अउ कहाँ जाही वोहर तोला छोड़के ।



     


      परनु तो ठहरिस डिंगर मनखे...।महराजिन के अइसन  पूछ परख ल अस्कटाके  वोहर अपन रौताइन ल कहिस-अतेक ध्यान तो तोर हमर दुनों के महतारी- बाप मन नइ राखत ये।


                 रउत,वोकर कान म कुछु फुसुर.. फिया ..करिस ।


"ये... ये...!येहर नइ बनय ।"


"तब फेर जिनगी भर,येकर उपदेश सुन ।"


"हे ..हे..!नहीं.. नहीं..! तब ले भी..।"


"चुप्प..!"रउत दलकारत कहिस,"जइसन मंय बोले हंव, ठीक तोला वइसन करना हे ।"


 "असतिया...!"रौताइन  घलव हाँस डारे रहिस ।



       


            राऊत घर किल्ली गोहार परत हे ।ठक ...ठीक ..परवा ..टाटी टूटे- फूटे के  अवाज आवत हे।


"कइसे रे..फेर का हो गय, तुमन ल मोर अतेक समझाय के बाद घलव ।"महराजिन दहाड़त खुसर गइस ,मोर्चा बीच म । राऊत बड़का तेल पिया सटका ल धर के रोताईन ल कुदावत हे।रौताइन येती ...ओती..भागत हे, अपन जान बचाय बर।


..ये महराजिन  दइ, बचावा.. बचावा.. कहत रौताइन वोला पोटार लिस ।राऊत आ गय, बड़ गुस्सा म हे  वोहर । अरे ..अरे..पापी ..असतीया मारीच दारबे,अबला ल का ।घोर नरक म जाबे ।


महराजिन छोड़ा तुँ येला.. छोड़ा ।रौताइन किंजरत हे।  वोकर  ले नजर मिल   गइस राउत के तब वोहर वोला आंखी मार के मुचका दिस ।इशारा म झनीच छोडबे महराजिन ल...!राउत डिंगर...मउका देख के महराजिन के  पोठ माँसल कुल्हा म बने एक सटका थोरकुन जनाय के लाइक  जमा दिस ।


"हरे मुरहा,मार डारे रे..."कहत महराजिन राउत घर ल भाग परइस ।


        पीछू दुनो राउत -रौताइन महराज घर जाके महराजिन करा ले मुँहू ल छबकत माँफी घलव मांगे गय रहीन ।


        


      फेर तब तक ल महराजिन अपन आन घर जाय के सजा...तरिया ल स्न्नान कर के आवत रहिस ।


"चोट्टी -चोट्टा हो ,ठग- ठियाली के लड़ई होके मोला एक सटका मार देया ।" महराजिन घलव हाँसत रहिस, रौताइन ल देख के ।



       वो दिन ले थोरकुन कम हो गय रहिस, महराजिन के आन -आन के घर जवइ हर ।




           


         फेर ठकुराइन करा तो महराजिन के पेंच हर अरझेच  रइथे । वो दिन  के तना - तनी  हर तो जितीच गय रहिस ।दुनों के दुनों विचित्तर शर्त लगा दारें रहिन ..! हाँ.. फेर ठकुराइन आश्वस्त रहिस कि जीत तो मोरेच होही।काबर के वोकर य


ठाकुर ,वोकर गोठ ल सुनथे, बरोबर सुनथे ।  हाँ...   हिम्मत भर करे बर हे ।अउ ठाकुर हर वोकर खातिर करही घलव  । अउ महराज करा महराजिन के एको नइ चलय ।अउ महराजिन शर्त लगा बइठीस अतेक बड़े ।





 



                   


                       



                        4










                बाजा रुंजी घिडक़त रहिस । परोस के परसादी के बेटी के बरात आये हे । बरात  ठीक  बेरा म आ गय हे । ठीक बेरा म  पइरघई हो जाथे ,तब सब कुछ ठीक - ठाक निबट जाथे।


समधी भेंट हो गय । सदानन्द महराज द्वारपूजा बर मुंहटा म बइठीन । तीर म अतेक लइका -पिचका मन चुटा मरत रहिन, के ठाकुर ल अपन विचार ल बलदे बर लागिस ।


           द्वार पूजा, मउर  सेंकई  के बाद दुल्हा मंडवा तरी म आ गय ।उँहा तो महराज वोकर ले पहिली आ के विराज गय रहिन ।आन आन धुरिहा गांव ल बिहा पढ़े जाय बर लागथे,तब आज मउका मिले हे घरेच तीर म बिहा पढ़े के,येकर ल अउ का सुख लेबे । महराज तो आज अपन खास पीताम्बरी धोती ल पहिने हें । उंकर चेहरा  म अभी ले विजेता के भाव तउरत हे।


    


      फेर महराजेच काबर, ठाकुर  जी के  भी  के संग भी तो एइच गोठ हे।पर वोहर अभी बड़ तनाव म दिखत हे ।अतका तनाव तो बधु के ददा परसादी के चेहरा म नइ ये ।


    वोहर एक पइत ये मुड़ी जाथे मंडवा के,त कभु वो मुड़ी जावत हे।


    वोतकी बेरा वोकर ठकुराइन सोनकली आ गय ,बर -बिहा देखे बर । वोला आवत देखिस,तब ठाकुर के चेहरा हर कठोर हो गय ।


          थोरकुन बेर बाद म वर पक्ष ले लाने समान मन के पूजा- आंचा करके सुवासीन मन ल  लड़की ल पिंधाय ओढ़ाय बर अंदर भेज दिन ।


               अब एक परकार ले महराज के जगह हर सुन्ना हो गय, कन्या के आवत ल ।येती ठाकुर , महराज के तीर म गइस,अउ अवइया संकट ल बेखबर  बइठे महराज ल अपन दुनों बलिष्ठ भुजा म धर के उठा दिस ,दशानन रावण कस ।अउ उतारे के बेर थोरकुन  महराज ल पटके कस घलव कर दिस ।


        महराज तो अबक्क...!!फेर सबो कोती हाहाकार मच गय । ठाकुर हर महराज ल अलगा दिस ।ठाकुर.. हर....महराज ल मार डारिस ।महराज ल धर के पटक दिस ।महराज ल कचार दिस ।


 "महराजिन ,महराजिन कइसे दइ, तंय आज इंहा घर म खुसरे हवस।अउ वोती  ना* हर तोर महराज ल पटक -पटक के मार डारिस हे ।"


"ये नवा*न , भइगे जीत डारिस  ।" महराजिन के मुख ल बड़े आराम से निकलिस ।


           येला सुनके जउन महिला बेचारी, इहाँ तक शोर बजाय आये रहिस,वोकर मुंह सुख्खा के सुख्खा हो गय ।वो कुछु भी समझ नइ पाइस ।चुपे चाप वोहर फिर आइस उहाँ ल ।


                


             येती गुड़ी पंचायत के नौबत आ गय रहे।परसादी हर ठाकुर बर बड़ रोसियाये रहय ।वोला तो महराजेच हर शांत करिस.. येला बेटी विदा करे के बाद देखबो .. कहत।परसादी तो अपन बिहाव मंझ म रंग म भंग होय के कारण बड़ दुखी  रहिस ।


          ठाकुर ,अब  महराज आगु म दण्डाशरण परे हे। भुइंया म घुण्डल घुण्डल के माफी  मांगत हे.... त्रिया हठ.. महराज त्रिया ..हठ !


"का...!"


"हाँ..! भरे सभा म तुंहला अलगा के दिखाना ।ठकुराइन के महराजिन करा शर्त लगे रहिस।ठकुराइन के कहे ल  ठाकुर मानथे।  मानथे तव ये मुश्किल काम ल कर के बता ।"


"महराजिन तंय अब महू ल पांचाली असन दांव म लगाय के शुरू कर देय ।"महराज थोरकुन रिस मिंझरा गारी महराजिन ल दिन।


  "चल सोनकली के भक्त..,येती माड़ी कोहनी ल छोल देय।अब बर बिहा म चेत कर ।"महराज ठाकुर साहब ल झिड़कत कहिन  ।


" मैं थोरकुन स्न्नान कर के आवत हंव।वोतका ल नोनी ठीक तइयार होये सके रहही,परसादी गौटिया    ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे बर  अपन घर डहर चल दिन ।


    येती  मुँहटा म महराजिन उंकर  स्न्नान बर धोआ कपड़ा धर के खड़े रहिन ।


"महराजिन बड़ नाम कमाये ,न...!"महराज थोरकुन रिस म कहिन ।


"फेर ठकुराइन हर जितीच तो गय।अउ तुँ मोला कभु भी जितवावा  तो नही ..!"महराजिन  महराज ल कपड़ा धरावत कहिन ।







                         5   







      आज भी पूर्णमासी ये ।फेर अगास म बादर छाय हे, तेकर सेथी रग ..बग   ल चंदैनी हर नइ दिखत ये ।तब ले भी चन्दा रात के अंजोर हर दिखतेच हे।सावन- महीना म ही, ये बच्छर बरसात हर एकदम गझा गय हे ।


              खँचवा-डबरा सब भर गय हे ।तरिया लबालब भर के उल्टा लहुटत हे । पानीच ..पानी..पनिहर हो गय हे ,सब कोती हर ।


फेर झिंगरा मन के ये सिटी के तो का कइबे।



      रांधे -पसाय के बाद एक घरी तो फुर्सत मिलबे  करथे ।आज ठकुराइन अघवा गय हे, तेकर सेथी आगु आके परसार म बइठ गय हे, पसीना  जुड़वाय बर ।



             ठकुराइन के बाद म तुरतेच महराजिन  घलव निकल गय । फेर रोज कस चंचल, अमर के ओझियाने वाली ठकुराइन आज ,आन कछु म खोये हे कहु


लागत हे ।



"कइसे सोनकली, आज बने नइ दिखत अस ।" महराजिन उनमुंनहा बइठे ठकुराइन ल देख के कहिस ।


         महराजिन सिरतो म कउआ गय रहिस ।का हो गय येला, सदा -सर्वदा  चढउ लेने वाली ठकुराइन आज ,निच्चट अशक्त दिखत हे ।


"तोर देहें तो ठीक हे, ठकुराइन।"महराजिन वोला  कोंचत-कुरेदत पूछिस  ।


"हाँ.. महराजिन  ।मोर तबीयत हर तो बने हे ।"


"तोर मतलब..?"


"मोर हर तो बने हे।फेर ठाकुर ल, वोकर जुन्ना बीमारी हर फेर उबक गय  रहिस  हे, आज ।"


"ठाकुर के जुन्ना बीमारी..!तोर -हमर  एके करा रहत,तो जुग-जनमन कटत है अब ।फिर मंय ठाकुर के कुछु बड़का बीमारी नइ जानत अंव ।"


"........"


"एके ठन बीमारी मंय जानत हंव,ठाकुर के ।वोहर आय, वोकर मेंछा हर ओरम गय हे ।"महराजिन, ठकुराइन ल हँसवाय बर  कहिस ।


        ठकुराइन हाँसिस तो फिर आन दिन कस गमकत हाँसी नइ रहिस आज के हर । वोकर हाँसी हर मुरझाय फूल कस रहिस ।


"......"


"मैं ठाकुर के एक ठन अउ बीमारी ल घलव जानत हंव ।"


         ठकुराइन, महराजिन कोती ल भेदहा देखिस...का कहत हे, येहर...?


"अरे,वो दूसर बीमारी तंय खुद अस ।वो बपुरा बर ...।


     महराजिन के कोशिश, बेकार जावत रहिस ।


"अरे कुछु कहबे तब तो  जानबो...!!"महराजिन थोरकुन जोरलगहा कहिस ।


"का बताबे,महराजिन..।ठाकुर ल पहिली मिर्गी -बाफुर के दौरा पड़य।वोहर बीस- पच्चिस बच्छर के गय ल फेर काल रात के उमड़ आय रहिस ।"


"ये बबा रे..!वोला तो आज तक देखइ तो धुरिहा हे ।कान म सुनें तक नइ रहेन ,ओ ठकुराइन ।" महराजिन तुरतेच कह उठिस ।


"हाँ...महराजिन ,सच गोठ आय ।"


"ये बीमारी के तो आगी -पानी हर बड़ दुश्मन आय।" ठकुराइन के उदासी हर ,महराजिन ल विधुन कर देय रहिस ।


"फेर ठाकुर हर ,कोई ल बताय बर नइ कहे


ये । "


"येती बताबे नहीं, तव जानहि कौन.।"


"वो तो ठीक हे, महराजिन, तभो ले मंय तोर पांव परत हंव। कनहुँ  ल भी झन बताबे ,ये गोठ ल।"


"चल ठीक..।" महराजिन कहिस ।










                      6







           


                आज  भादों के  अँधियारी के आठे ये । आज आठे कन्हैया  ये ।आज के ये  दिन हर महराज बर बड़ खास रइथे । साल भर ल महराज हर ये दिन ल अगोरथे ।


           आजे के दिन, महराज हर मुकुंद- मुरारी....लड्डू -गोपाल के श्री विग्रह ल अपन सीना म लगा के एक  प्रकार ले  पैदल नगर भृमण करथे । नगर का.....ये मंझोलन कद काठी के गांव  ये ,महराज के भुइंया हर । संग म दु -चार,  कभु -कभु तो कोरी- ख़इरखा, किरतनहा-भजनहा हो गीन तब अति उत्तम।नहीं त डेरी हाथ म   भगवान चरण वाला ...ठीनठीनी घण्ठी ल बजावत,जेवनी हाथ म भगवान के छोटकुन सिंहासन  वोई सीना म  डांटे।


         


            आज के दिन, महराज एक प्रकार ले गांव के हर गली -खोल ,मुहल्ला म बिना कोई भेदभाव... बिना कोई आग्रह.. दुराग्रह के समभाव ले किंजरथें ।



              प्रणाम करइया प्रणाम करथें..।आरती करइया ...आरती अउ पूजा करइया पूजा -आंचा । सब अपन अपन ढंग ले लड्डू- गोपाल के झांकी ल निहारथें । 


 


              महराज आज अपन गांव म भगवान के श्री- विग्रह ल घुमा लेथें,वोकर बाद म तीर के गांव म लोकनाथ गौटिया घर ले  जाथें।उँहा तो भगवान संग महराज के विशेष विशेष अगोरा होवत रइथे।  खुद गौटिन अउ आन- आन नारी परानी मन भगवान  के ये झांकी..मञ्जुल मुरतिया ल जी भर निहार के अपन ल धन्य मानथे । पूजा -आंचा कर के  संझाती बेरा ल उंकर वापसी होथे ।



       फेर एक ठन बात ,आज  काकरो करा वोहर दान -दक्षिणा,भेंट -उपहार स्वीकार नइ करंय । महराज के  हालत पोठ हे।ये बात के गुमान  सब ल हे। येकरे सेती, कोइ जोर जबरदस्ती भी नइ करें चधौतरी बर ।




"महराजिन ,अमली पानी ल अमर न,मंय लड्डू  -गोपाल के आसन ल माँजो।"


"देवा न मोला, मैं मांज हाँ तब ,नइ बनही का ।"


"बनही,फेर मोला माँजन दे ।"


"ठीक हे, फेर पहिली सुख्खा राख म पहिली रगडा ।अइसन म जादा  सफ्फा होही ।"


" हाँ...।ठीक कहत हस  तैं..।"




"ले अब ,आसन धोआ गय।भगवान के बारी ये अब..!" महराज ,महराजिन ल अपन गोठ के साखी देवत कहिन ।


" भगवान ल कतेक नहवाईहा महराज...!उनला जर जुड़ धर लिही ,त..?"महराजिन महराज करा ठठ्ठा मसखरी करत कहिन ।


"जर -जुड़ के आदि अउ अंत ल ,जर -जुड़ धरे सकहि , महराजिन..!" महराज भाव- विभोर हो गय रहीन ।


            महराजिन उंकर अकारण- सकारण, भाव -विह्वलता ल देख के मुचमुचा के चुप रह गइन ।





"महराजिन,  लड्डू -गोपाल सादा पानी म नहा डारिन। अब पंचामृत ल लान ।अब वोमे नहाहीं।तब फेर  नावा वस्तर धारन करिहीं।यज्ञोपवीत.. श्रृंगार....! अभी तो कतेक बुता बांचे हे...!!"महराज थोरकुन उतावला होवत कहिन।


"सब हो जाही, महराज ।"


"तभो ले..।"


"तुं हर बच्छर, अइसनहेच बेरा तो निकलथा।"महराजिन घलव थोरकुन जल्दबाजी करत कहिन ।





       पूजा-आंचा.. आरती भोग अस्तुति के बाद महराज, लड्डू गोपाल ल  मनायिन ।चलव...प्रभु..तुँहर ..कतेक न कतेक भक्त मन दरशन  बर डहर देखत हें...!



        बहुत ही आदर के साथ,भगवान लड्डू -गोपाल के मंगल- मूर्ति ल पीतल के वोइच चमकत आसानी म बइठार के  फूल दल ले सजा के, महराज बाहिर  निकालीन । महराज के सीना म चटके  हे ,भगवान के वई आसानी हर ।जेवनी हाथ म आसनी हे अउ डेरी म घण्ठी हे । घण्ठी के आवाज बड़ धुर ल जावत हे, तब अगर गुँगुर धूप हर


भी बढ़ धुर ल गमकत हे।


    आठे -कन्हैया उपास करइया लइका,सियान सब भगवान के झांकी दरशन करत हें। आन- आन कत्था झांकी हर तो रात के होही मन्दिर म ।अभी तो घरो घर पाखा म छपाय ,गोड़रंगी रंग म बने आठे कन्हैया ल, भोग लगा के  लइका पिचका मन  ल अपन 'एक -गाल 'अउ 'पूरा गाल ' वाला उपवास ल समोखे बर हे। महराज के झांकी हर बुलक जाही तब..।



          महराज के संग बनेच कीर्तनहा ...।महराज  नगर भृमण कर डारिन ।वो दु ठन नरिहर वोमन ल प्रसाद बना के खाय बर देवत अब  अपन गांव  ले विदा लेवत हें ।


      जयजयकार जयघोष होइस अउ कीर्तनहा मन फिर गइन ।


    




       अब महराज...वो परोस के गांव ,लोकनाथ गौटिया के घर जाय के संकल्प के संग म ये पैडग़री म पाँव धरत हें अकेला ...।वो अकेला च  जायें उँहा..।संग म कभु कनहुँ ल नइ ले जांय ।


    


         अपन हृदय म बसुदेव जी  के सुख  ल धारण करत महराज चिखला.. खँचवा-डबरा म पाँव मढावत आगु बढ़त हें ।गांव के  रास्ता.. चिखला के कमी कइसे होही ।धरसा परत हे.... । धरसा म तो ये चिखला अउ बिच्चछल  के भरमार ये।रो ..हो..पो..हो..चिखला ।आगु तो चिखला के समुन्दर दिखत हे।


   त्रिलोकी नाथ ल हृदय म लगाय के सुख ।वोहू म वात्सल्य भाव...!आज अउ अब साक्षात मथुरा ले  ब्रज जाना होवत हे नन्द बबा के घर ,बसुदेव जी के । भाव समुन्दर अतेक गहरा के, दुनों आंखी ले गंगा जमना बोहावत हे ।




 हे प्रभु...!कोंन....? महराज के मुख ल निकलिस।अउ उंकर हाथ अउ हृदय म लगे भगवान लड्डू गोपाल के आसनी हर वोई चिखला म फेंका गय ।


           महराज चिखला म  बुड़े अउ बुड़ ...बुड़ करत वो मनखे आकृति करा, जाके  पहिली  वोकर मुड़ ल,  झोर असन पातर होय  चिखला ले उपर करिन ।



    पूरा चिखला म सनाय.. बेहोश ..मनखे।मुंह म ले गजरा निकलत हे । चीन्हउ नइ ..मिलत ये ..कोन ।अउ  इंहा येकरा..अइसन ...कइसन  होय हे । महराज के पांव हर घलव  माड़ी के जात ल चिखला म बुड़त जात हे।


         महराज अपन गमछा म  वो मनखे के मुँहू ल बने पोछिन....ये बबा रे...!


ये तो ठाकुर ये।हाँ.. तीर म वोकर ये साज समान हर फेंकाय हे ।


ठाकुर....!महराज कस के वोला हाँक पारिन।फेर चिट न पोट...!मुहँ ल गजरा अउ निकलत हे।कोई ..अहिरू -बिच्छू तो नइ छू दिस।अब कइसे करंव..लड्डू गोपाल ।


महराज के शरीर हर भी अभी पोठ हे।वो ठाकुर ल अपन खांध म उठाईंन अउ वापस गांव कोती  फिरे  लॉगिन ।




      देखइया अबक्क रह गइन।वोमन सहायता बर कुदिन, फेर महराज ठाकुर ल सीधा अपन घर म ले आइन। अंगना म भगवान के स्न्नान सामग्री हर  माढ़ेच रहिस ।


        महराजिन येला देख के अबक्क हो गइन ।फेर थोरकुन दिन पहिली ,ठकुराइन के कहे गोठ हर सुरता घलव आवत रहिस ।



महराज....!ठाकुर ..!! कहत किल्ली गोहार पारत ठकुराइन आके ठाकुर ल पोटार लिस।अतका बेरा म महराज वोला बढ़िया नहवा के पोंछ डारे रहिन।


 


"देखे महराजिन, जउन चीज ल डरात रहंय।वोइच जिनिस हर होइस , हे।"ठकुराइन के आँखी मन ले रकत धार आँसू हर बोहावत रहिस।


     अब ठाकुर के आंखी खुलिस।वोहर अपन ल महराज के घर भीतर म पाके अबक्क होवत रहिस ।


 महराज सब गोठ ल सार संक्षेप म बतावत कहिन-लड्डू गोपाल,मोला वो कोती नइ ले जाय रथिन,तब तो अंधेर हो गय रहिस, ठकुराइन ।


          


   महराज अब ले भी वइसनहेच चिखला..रद म सनाय  हें।वो उठे कस नइ करत यें ।


"ठाकुर, आधि व्याधि मन चोर असन यें।ये मन  ल लुकाना माने चोर मन ल घर खुसारना  ये ।" महराज कहत हें,"सब्बो जिनिस के उपचार हे, वैद मन करा ।"


         


      ठकुराइन, भुइंया म दण्डाशरण  परे हे महराज के आगु म ।बस.. बस.. अब ठकुराइन  । अब हम सब भगवान के पांव परी...।वोइच तो प्रेरणा देने वाला आँय ।


"तब ले महराज,  तुं अपन नेम धरम के पक्का। काकरो आन के छइंहा  ल नइ छुवा ।तेहर आज मोर असन ल खांध म बोह के अतेक धुरिहा ल लाने हव।"ठाकुर हर  घलव रोवत रहिस ।


"ले भइ गे बस्स ,बराबर हो गय।परसादी के मंडवा म तंय मोला अलगाय रहे न, वोकर बदला ये, चल।"महराज हाँसत कहिन, तब ये पइत एके संग तीन झन लजा गइन- महराजिन, ठाकुर अउ ठकुराइन ।


"ले ठकुराइन ,अब महराजिन घलव जीत डारिस न ।"वो फिर कहिन ।


  ठकुराइन एक पइत फेर महाराज के पांव परत ठाकुर ल अपन घर लानिस,वोकर बहां ल धर के ।



"महराज,स्न्नान ...?"


"रा ..ना ..महराजिन,थोरकुन बाद म करत हंव ।"महराज कहिन ।


"जावा, कर लेवा पहिली ।"


"हाँ...ठीक।फेर तुरतेच तंय ,एक ठन बुता कर।वो  लोकनाथ गौटिया घर पहिली खबर भेजे के व्यवस्था कर।वोला सब्बो गोठ ल  पूरा बता दिही, जवईया हर ।"


"लागही च..?"


"पूरा सोलह आना ....!ये विश्वास के बात आय। जा..जा..।उँहा मनखे भेज ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे के तइयारी करिन ।




"नहा लेया, तुं...?" महराजिन वापिस आवत रहिस।


"कोन ल भेजे ...?"


"गोवर्धन ल...।"


"पूरा बताये..?"


"हाँ....।"महराजिन कहिस अउ नहा खोर के फिर तइयार महराज के नजदीक म चल दिस।


             महराज वोकर चेहरा ल बने ध्यान लगा के देखिन।थोरकुन अफसोस के भाव..


!


 "सब कुछ खइता च हो गय, आज ।"महराजिन थोरकुन धीरन्त सुर म कहिन ।


" का कहे ,महराजिन ।  खइता च  हो गय...!अरे पगली,आजे तो असली बुता होइस हे, पूजा के। आज मैं लड्डू गोपाल के, आदि अउ अंत देव् के विश्व रूप के दर्शन करे हंव।अउ देख अभी ल मै करतेच हंव ,वोला।"


"......"


"अर्जुन हर वोतकी आनन्द नइ पइस होही , वोकर ल ज्यादा आनन्द मैं पावत हंव ।"महराज एक पइत फिर भाव विभोर हो गय रहिन ।


"फेर..लड्डू गोपाल कहां हें..?"महराजिन पुछिन।


"लड्डू- गोपाल,ये पंचतत्व के मालिक....!अपन पांचो तत्व-जल, पावक ,गगन ,समीर अउ क्षितिज माने  धरती म खुसर गइन हैं कनहुँ करा ।" महराज थोरकुन हाँसत कहिन ।


"तुहर मतलब...?"


"हाथ ल फेंका गइन,चिखला म गड़े होंही कनहुँ करा ।"


"हे.... राम..!!!"महराजिन  के मुँहू ल किल्ली -गोहार निकल गय ।अतका बेरा  ल सपना दशा म  वोहर येला नइ सोचें रहिन ।


"चुप..कुछु नइ होय ।"


"येकरे बर उनला बाहिर ,ले गय रहा ।" महराजिन रिस अउ दुख म थर ...थर कांपत रहिन ।


"उनला जाके खोज बो पाछु।मिल गइन तब मिल गइन।अउ नइ मिलिन तब पीछू आने बिसा  के , खरीद के ले आनबो ।" महराज , महराजिन ल समोखत कहिन ।


"बिसाये ल भगवान मिलथे ।"


"तंय एक बात के उत्तर दे ।"


"भगवान  शालिग्राम अउ  लड्डू गोपाल ल कंहा ल लाने रहेन..?"


"   वो शिवरीनारायण के मेला ल..।"


"अउ आसन ..?"


"डभरा मेला..ल ।"


"मुफ्त..?"


"मुफ्त काबर.. अउ  कोन दिही ।आसन बर तो कतेक न कतेक ..मोल भाव करना पड़ गय रहीस ।सुरता हे तुंहला...?"अब महराजिन के आंखी म चमक आ गय रहिस ।"


"ठीक कहे तंय।अउ मैं  घलव यइच कहत हंव न..।" 


"भगवान के मूर्ति अउ आसन ,खरीदे ले कतको मिल जाहीं..?"


"हाँ..! वो तो हे ..।"


"फेर खरीदे ले ठाकुर हर नइ मिलय, महराजिन..!"  महराज हाँसत कहिन।भगवान के विश्व रूप दरशन के अलौकिक आनन्द अब ले भी उँकर  मुख मंडल म खेलत रहिस ।





*रामनाथ साहू*



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कहानी: बड़ोरा पोखन लाल जायसवाल

 कहानी: बड़ोरा

पोखन लाल जायसवाल

        मनखे रोवत आथे त दुनिया हाँसथे। जब जाथे, त दुनिया ल रोवा के जाथे। दुनिया के ए  आवाजाही म मुठा बाँधे आथे अउ हाथ पसारे जाथे। बँधाए मुठा अइसे लगथे कि कोनो बड़का संकलप ले के मनखे आय हावे। पसारे हाथ बताथे कि भगवान मोर ले चूक होगे। जम्मो संकलप ल भुलागेंव। मोला क्षमा दिहा भगवान!। मैं तोर सरण मं आवत हँव। मोला तार दिहा... भग...वान।

        मनखे भवसागर मं आ घमंड करे लगथे। नाना परकार के घमंड मं ओहर पाँव ले मुड़ी जात सना जथे। सब कुछ इहें के आय अउ इहें च रहि जाना हे। तब ले घमंड मं बुड़े मनखे खुद ल भगवान ले बड़े समझे धर लेथे। रुपवान अउ धनवान होगे त तो अउ ....भुला जथे कि रूप चार दिन के चाँदनी फेर अँधियारी रात सहीं होथे। पइसा तो हाथ के मइल आय। अभी हे, त हे...नइ.. ते...भइगे। एक बड़ोरा आथे अउ सबो... उड़ा जथे। कुछु नइ बाँचय। मनखे के जिनगी घलव दुख-पीरा के बड़ोरा ल ठेलके आगू बढ़थे।

        जिनगी ल चलाय बर धन दौलत जरूरी हे। फेर जतिक भी नगदी रहिथे, वो कब खिरथे, कुछुच पता नइ चलय। इही बात आय कि लोगन 'चल' ले जादा 'अचल' सम्पत्ति ल मान देथें। नगदी थोरको जादा होइस कि गहना-गुँठा अउ जमीन म लगा देथें। जउन ह अड़चन घरी काम आथे। दू पइसा आगर देथे, वो अलगे...निमगा ठगे तो नइ। एकर रेहे मनखे संबल पाथे। दूसर मेर हाथ फैलाए के नौबत नइ आवय। फेर... गरब घलव करथे। बिरथा के गरब। तहान घमंड।

        लोगन समधी सजन के नता जोरत खानी घर-कुरिया अउ खेती के हिसाब लगाथें। एक किसम ले जुरत नता बर सुरक्षा निधि होथे। सुरक्षा निधि। जमीन सबो झन बिसा तो नइ सकँय, त गहना-गुँठा कोति चेत करथें। सुनहर अउ रमसीला सोनार दूकान गे रहिन। बहू बर गहना बिसाए। बिहाव के अकताहा बिसा-बिसा के राखत हावँय। कोनो भी बड़का कारज के जोरन अइसने तो धीरे-धीरे जोरे ल परथे। दू दिन के काज रही, फेर ओकर जोगासन  बर कतको दिन पूर जथे।

       हाँ ! सुनहर तो नाँव हावे, सियान कका के। रेगहा-कुता मिला के पाँच छे एकड़ के किसानी कर लेवय ओहर। ओकर संग म वोकर गोसाइन रमसीला काकी घलो बने मरे-जिए ले कमावय। खेती अपन सेती, नइ ते नदिया के रेती। इही गोठ ल जिनगी म गठरी बाॅंधे दूनो परानी रात-दिन खेते च म गड़े राहय। अपन दूनो लइका ल बने चेत करके पढ़ाइन। अब तो हाई स्कूल खुल गे हावय, गाॅंव म। वोकर पढ़े के दिन म प्राइमरी स्कूल के रहे ले पांचवी भर पढ़ पाय रहिस हे,वोहर। तहान ले बइला-भैंसा चराय म भुलागे। ...तब वोकर बबा मन पाँच भाई रहिन। बँटावत-बँटावत सब बँटागे। माया अउ मया दूनो खिरे लग गे। बाँटे भाई परोसी बनगिन।....सुनहर तिर आज चार एकड़ हावय। दू एकड़ ल बिसाये हे अउ दू एकड़ पुरखौती के आय। ओकर ददा मन दू भाई रहिन। वहू मन पाय बाँटा ल मिहनत के परसाद एक ले दू एकड़ करे रहिन। सुनहर कका अपन बाप के इकलौता हरे।

       सुनहर कका कमती पढ़े हावे त का होगे? पढ़ई के मरम ल जानथे। तभे तो दूनो बेटा कोति बने धियान दिस। उॅंकर मन भर उन ल पढ़ाइस। सबे च ल नौकरी मिल जाय, अइसे कहाँ संभव हे।

       सबो पढ़ाथें। जतका झन पढ़थें, सरकारी नौकरी बर परीक्षा घलाव देथें। फेर... नौकरी पाये बर मेरिट लिस्ट म ऊपर आय ल पड़थे। तब कहूँ नौकरी पक्का होथे। नौकरी पक्का होय ऊप्पर ले खेल घलव होथे। पोस्टिंग के खेल। उत्ती के ल बुड़ती मुड़ा। रक्सेल के ल भंडार छोर। माने ...जिला बदर। जइसे सौदा नइ करइया ह ...कोनो ...अपराधी आय।... मुख्य लिस्ट...फेर ... वेटिंग...जम के खेल। वेटिंग लिस्ट म घालमेल के गुंजाइश बनावत अफसर मन बड़ चतुरई करथें।...जेकर ले कुछ के जिनगी म घुप्प ॲंधियारी हो जथे।

       अब के दाई-ददा मन पढ़ई-लिखई के नाॅंव म लइका ले कोनो बुता नि करावॅंय। सबो खेती किसानी ले दुरिहा रहय कहिके सोचथें। अइसन म आखिर खेती कोन करही? यहू सोचे ल परही। अब के लइका मन तो आड़ी-काड़ी नि करॅंय। कटाय अँगरी म नइ मूतँय। जिहाँ खेले कूदे रही, पछीना बोहाय रही, तिहाँ बर मनखे के हिरदे म जुड़ाव रही। मोर आय कहिके लगाव रही। नइ ते खेती भुइयाँ माटी के कुटका बस जनाही। जब चाही तब...बेच... खाही।

       एक समय रहिस, जब लइका मन रोपा लगाय जावॅंय। रोपा लगई के पइसा ले कापी-किताब बिसावॅंय। गणपति पूजा करॅंय। धान लुवई घरी बोझा डोहारॅंय। सिला बिनॅंय। वहू ल स्कूल जाय के पहिली अउ स्कूल ले आय के पाछू। सिला बिने धान के मुर्रा अउ मुर्रा लड्डू दूनो बिसावँय। जादा बिने ले कोनो चिन्हारी बिसावँय। बढ़ोना मिला के उखरा पाँव बर बने सरिख जूता-चप्पल लेवँय। गाँव-गँवतरी जाए बर कपड़ा लत्ता। अब के लइका मन टीवी अउ मोबाइल म मुड़ी गड़ियाय रहिथें। जड़ ले कटत हावँय। अइसन म खेती-बुता जानॅंय, न अउ आने बुता ल जानँय। तव जिनगी तो ॲंधियार होबेच करही। तइहा के बात ल बइहा लेगे। 'जनम दे हे ल जाने हन, करम ल थोरे देबोन', कहिके पिंड छुड़ाय नइ जा सकय। करम करे बर सिखाय ल परही...वहू ल नेक करम। नइ ते अपने लइका बिन मारे मरही। हमीं ल पदोही...हमरे मुड़ म मुतही। पक्का हे। एक दिन हमर जाँगर थकही त उन ल कमाय बर परही। यहू बात आजे बताय के हे।

०००

          कमा-कमा के जाँगर एक दिन थकबे करथे। अउ उमर जइसे-जइसे खिरकत जाथे, अपन परभाव दिखाबे करथे। जाॅंगर जुवाब देहे ल धर लेथे। घंटा दू घंटा के बुता करिस, तहान थके लगथे। मउसम बदलिस नहीं के, फट ले जुड़-खांसी घलव अपन डेरा बना लेथे। अइसने सुनहर के थके जाॅंगर उमर के संग जवाब दे ल धर ले राहय। रमसीला काकी के बुता अउ बाढ़े लगिस। कभू-कभू दूनो झन मं खटपिट होवय।

        "महूँ ल थकासी लागथे। तहीं भर नइ कमावस। महूँ ह कमाथँव। मोरो जाँगर थकथे। मैं तो बाहिर ले आके, घर म घलव खटथँव।" रमसीला काकी के कहना सोला आना आय। ओकर तन ह लोहा-पखरा के तो नइ बने हावय, के नइ थकही। थकबे करही।

        मशीन गरम झन होवय, कहिके चलत मशीन ल थोकिन बंद करथे। जुड़ावन दे कहिथें। जब मनखे ल मशीन के अतिक संसो रहिथे। त रमसीला काकी के अपन बर संसो करई कोनो गलत नइ हे। सबो ल सुरताय बर लागथे। रमसीला काकी सुरताना चाहथे त एमा ओकर का दोष?

       रेगहा-कुता के तीन एकड़ खेती जेकर भरोसा कभू कखरो आगू हाथ फैलाय के नौबत नइ आइस। ढलती उमर मं जाॅंगर थके ले उही खेती अब अजीरन लागत हावय।

        बने होइस कि दू बछर पहिली खेत मालिक किसुन ह शहर ले लहुटे पाछू कुता के दू एकड़ खेती के सौदा वापिस ले ले रहिस। जेन ह अपन परोसी के दू एकड़ सँघार के बने मन लगा के किसानी करत हावय। शहर मं मोटर-गाड़ी, राइसमिल अउ बड़े-बड़े कारखाना मन के धुँगिया, मच्छर अउ नाली के बस्सउना हवा नइ सहाइस। गाँव के शुद्ध हवा मं रहइया किसुन घेरी-बेरी बीमार परे लगिस। जतका कमाय, ततका दवा-दारू मं लग जावय। हाथ कुछ नइ बाँचत राहय। दूनो परानी म मनमुटाव बाढ़े लगिस। जिहाँ पइसा-कौड़ी के खॅंगती होथे, उहें उटका-पैरी अउ झगरा होथे। घर के सुमता(एका) छरियाय लागिस। किसुन सुजानिक रहिस। ओला समझ मं आगे रहिस कि शहर आके ओहर बड़ जंजाल म फॅंसगे हावय। बड़ बिचारिस। एकर ले मोर गाॅंव बने हे। इही बिचार संग एक दिन शहर ले अपन गाँव, अपन छाॅंव लहुट के आगिन। जब ले शहर ले लहुटे हावँय, उँकर जिनगी सुलिनहा लागत हे। उँकर जिनगी के हाँसी-खुशी लहुट गे हे। दिन बने-बने बीते लगिस। झगरा के नाँव बुता गे हावय। जउन ह शहर म उँकर जिनगी म जहर-महुरा घोरत रहिस।

०००

       .... सुनहर अउ रमसीला अपन दूनो बेटा के बिहाव के सोचे लगिन। दू-चार जघा बात जनाय रहिन। कहूँ मेर बने सरिख नोनी होही त आरो देहू। तीन-चार महीना बीत गे कहूँ कोति ले कोनो सोर नइ आइस।... परोसी दरी साँप नि मरय, कहि सुनहर दू-चार झिन सगा घर गिस। पूछिस। फेर कहींच कोनो आरो नइ मिलिस। ...चार महीना बर बिहाव के नेत नइ जम पाइस।.....आसो ले दे के दूनो बेटा बर नोनी मिल पाइस। सिरतोन बिहाव ह कोनो ठठ्ठा दिल्लगी नोहय। संजोग वाले होहीं, तिंकरे चप्पल बिहाव के नाँव मं नइ घिसावत होही। दूनो डाहर ले तार जुरई बड़ मुश्किल आय। कोनो खेल-तमाशा अउ घरघुंदिया नोहय, बर बिहाव ह। जे ल मन नइ आय म दू चार दिन बाद बिझार दे।

         सुनहर बहू खोजत ले थक गे रहिस। बड़ परेशान हो गे रहिस। संसो मं दुबराय ल धर ले रहिस। ...कहूँ मेर सुनहर के मन आवय, त बेटा मन के मन नइ आवय। कहूँ मेर दूनो के मन आतिस, त लड़की वाले मन ल मन नइ आय। कभू दूनो कोति जमे बानिक लगय त बात रास-बरग मं आ के अटक जय। कुछ न कुछ बाधा परय। अइसे-तइसे माघ ले चइत बीत गे।

        गाँव के मनखे मन, जे मन म आवय ते गोठ करँय। जे मुँह, ते गोठ। लोगन मन गोठियाय लागिन कि सुनहर ह बने दाइज डोर के लालच म बने बने नता ल हीनत हावय। हड़िया के मुँह ल परई म तोप लेबे, फेर मनखे के मुँह ल कामा तोपबे? .....लगती बइसाख म सिध परिस।

       .... बिहाव के दिन आइस। बड़ धूम-धड़ाका ले बिहाव होइस। इंजीनियरिंग करे बेटा के आघू सुनहर के एक नइ चलिस। पइसा ल पानी बरोबर बोहावत गिस। गाँव-गोढ़ा म जइसन कभू नइ होय राहय, तइसन करिस। बफर सिसटम म खवाना। गाँव म नेंग-जोंग के बेरा गड़वा बाजा...बरात बर डीजे। बरात बर दर्जन भर गाड़ी। बरतिया मन के पूरा खियाल। जेन ल जे चाही, उही ब्रांड के...। साज-सज्जा के तो पूछ झन। महाराजा सेट।... कुछू बर टोंकय त बेटा काहय- "शादी एक बार होनी है, बार-बार नहीं। लोग क्या कहेंगे? एक इंजीनियर की शादी और...." मोबाइल के घंटी बाजे ले बात ल आधा ए छोड़ मोबाइल म भुलागे। 

       सुनहर ह बेटा के गोठ सुन.. बुदबुदाइस भर। "पइसा कमाबे तब पता चलही बाबू.... कतिक मिहनत ले पइसा आथे।....बाप के कमई उड़ाय म का जियानही।" आज सुनहर के मन टूट गे राहय। बिहाव के नाँव ले उपरछवा हाँसत भर हावे। भीतर ले बड़ रोवत हे। रोही काबर नहीं, जब लहू-पछीना के कमई पानी सहीं बोहावत रही अउ चाह के सकला नइ कर पाही।

०००

       ....सुख के छइहाँ म समय कब बीतथे, पता नइ चलय। दुख के घाम रहे ले एक छिन ह बड़ जियानथे। काटे नइ कटय, चाबे ल कुदाथे। घाम रहय ते छाँव, जिनगी तो जिए ल परथे। रो के जी, चाहे हाँस के। जिए के नाँव तो जिनगी आय। समय निकलत गिस। मुठा म हमाय रेती बरोबर।

         बहू हाथ के पानी पिए के साध, साध रहिगे, सुनहर अउ रमसीला के। दू महीना बीते नइ पाइस। अवई-जवई नइ जमत हे, कहिके बड़े बेटा-बहू शहर के रस्ता धर लिन।

         छोटे बेटा बड़े बेटा ले जादा खर निकलिस। जेन ह नज़र मिला के गोठ नइ कर सकत रहिस। ओकर मुँह उले लगिस। उछरत हावे। आगी ले अँगरा ताव दिखावत हावे।

       "मोर नाँव के खेती ल मैं सौदा कर डारे हँव। रायपुर म फ्लेट बिसाहूँ कहिके। उहें कमाहूँ-खाहूँ, खेती म का धरे हावय? कागज पत्तर ल कति लुकाय हस, तेन ल दे देबे मोला। नइ ते मेंह थाना-कछेरी के रस्ता रेंगाहूँ। घी निकाले ल आथे मोला।"

          रजधानी म राहत दू साल होय हे बाबू ल, उहाँ के हवा लग गे। गाँव के धुर्रा-माटी ल भुलागे। अउ खेती सोन के अंडा होगे। जेन ल बेच फ्लैट के सपना म सवार हे। वाह रे कलजुग... दू नया पइसा नइ लगाये ए अउ खेती के मालिक बनगे...।

         सुनहर के भरम टूटगे। बड़ गरब रहिस दू झिन बेटा हावे कहिके। ...ओकर संग का होवत हे? समझ नइ पावत हे। का सोचे रहिस अउ का होवत हावे? काँहीं च समझ नइ आवत हे ओला। बिहाव पाछू मुड़ ऊपर चार लाख रूपया के चढ़े करजा ....

         मोहलो-मोहलो म बहू मन बर गहना-गूँठा बिसाय रहिन। सबो अइसन करथें। का जानय अइसन होही? भल ल भल समझत सपना सँजोय रहिन हें दूनो परानी। थोर बहुत राखे पइसा घलव खिरक गे राहय। संसो बाढ़े लगिस। कभू करजा ल जाने नहीं, तउन आज करजा म लदा गे हे। खपलाए करजा ए। बेटा मन तो हाथ खींच ले हावय। खेती भरोसा करजा उतारे परही।

         संसो म बुड़े गुनान करत हावे कि बिसाय जमीन ल हाथ ले बिहाथ कर डारेंव। मोर आँखी मूँदे पाछू बेटा मन के होबे करतिस। अभी मोर नाँव म रहितिस त मोर बियाय लइका मोला आँखी नइ दिखातिस। बस इही गोठ रहिगे-अब पछताए का होत हे, जब चिरई चुग गे खेत।

        सुनहर अपन लहू-पछीना के कमई ले बिसाये दूनो एकड़ ल दूनो बेटा के नाँव म चढ़ाए रहिस। तब रमसीला के बरजई ल एको नइ धरिस। सरवन कुमार समझत रहिस हे ...दूनो बेटा ल। अउ निकलिन का...भुलागे रहिस कि कलजुग आय।

        वोकर जिनगी म बड़ोरा अवई ह अभी अउ बाकी रहिस। पुरखौती तीनों खेत के रस्ता चारों मुड़ा ले रुँधागे। सड़क के खाल्हे दू खेत पार के खेत मन मं धन्ना सेठ अउ दलाल मन के नजर गड़े हावे। तभे तो धन्ना सेठ मन मुहाँटी ल बिसा के घेरा बंदी कर डारिन। विकास के बड़ोरा म अइसने कतको खेत परिया परत हावँय। धान के कटोरा उरकत जावत हे। गरीबी म जीयत मनखे जमीन के भाव देख चउँधिया गे हे। पुरखौती पूँजी ल बेच महल टेकावत हे। किसानी भुइयाँ नाँव ले उतरे पाछू चढ़ै नहीं, एकर कोनो ल चेत नइ हे। सब ल पइसा के धुन सवार हे। ...सड़क म आवत हावे। सड़क हे कि सुरसा बने लीले बर दाँव लगाय हे। ...फोर लेन सिक्स लेन....आज नइ ते काली... लीले बिना राहय नहीं। पक्का ए।

        आय किसानी के दिन म....। करय ते करय का? कुछु च सूझत नइ हावय। अब का होही भगवान ?...संसो सँचर गिस। इही संसो म बुड़े कब नींद परिस ते सुरता नइ हे।... बिहनिया उठथे त देखथे कि वोकर एक ठन हाथ उठत नइ हे। मुँह ले आरो नइ निकलिस। उठे के कोशिश म खटिया ले उतरत खानी भकरस ले गिर परिस। कुछु गिरे के आरो सुन रमसीला आइस त बोमफार रो भरिस। ....परोसी मन आइन। लउहा-लउहा बिगन देरी करे अस्पताल लेगिन। अटैक के संग लोकवा हे। इही तो बताइस हे। लकठा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ह। अउ कहिस," हायर सेंटर ले जाइए।" अउ तुरते रिफर कर दिस।

       रायपुर के प्राइवेट अस्पताल लेगिन। डॉक्टर मन सुनहर कका के हालत ल देख झटकुन आई सी यू म भर्ती करिन। ऑपरेशन करे परही काहत रमसीला काकी ले कागजात म दसखत करवाइन। आयुष्मान कार्ड के भरोसा भर्ती होगे रहिस। दू लाख रुपया अउ खर्चा आही। हाथ जुच्छा रहिस। कति ले पइसा आतिस। रमसीला खेत ल बेच पइसा दे हे के भरोसा देवाइस। अउ ऑपरेशन करे के विनती करिस, तीन दिन मं दू लाख रुपया अउ जमा करे के मोहलत मिलिस।

        बड़े बेटा अपन नाँव म चढ़े खेत बेचे बर तियार नइ होइस, त रमसीला काकी अपन माँग के लाली बचाए बर उही दलाल ल फोन करत हावे, जेन ल चारे च दिन पहिली सुनहर कका ह मोर पुरखौती भुइँया ल जीयत भर नि बेचँव कहे रहिस। दलाल ह मौका के फायदा उठाय के मूड म दिखत हावे। भाव नइ देवत हावे, रमसीला काकी के गोठ ल। अनाप-शनाप बोलत हावे। कहूॅं अउ बिजी हॅंव काहत हावे।

       सुनहर कका के जिनगी म आए बड़ोरा विकास के बड़ोरा आय‌। कोन जनी थमही कि नइ थमही ते? सब ल बहारत-बटोरत उड़ा के, तो नइ ले जही, ए बड़ोरा बैरी ह? बड़ोरा के मन म काहे ? कोन जानत हावे?

       कुछु होवय रमसीला काकी ल ए बड़ोरा थमे के अगोरा हावे। वोकर अंतस् ले एके आरो आवत हे- ए बड़ोरा उँकर जिनगी ले जुच्छा हाथ लहुटबे करही।   

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        पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा छग