Sunday, 26 January 2020

माई चिरई - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


कहानी-माई चिरई


              छन्नू रतिहा बेरा अँगना म लाल लाल गमकत दसमत फूल तरी खटिया बिछाके,अगास म रिगबिगात  चंदा अउ चंदैनी ल फुर्सत म निहारत सोचत रहिथे कि, जिनगी के बाँसठ बछर देखते देखत म गुजरगे, अउ आज मैं अपन नवकरी ले छुटकारा पा चुके हँव।फेर उही बीते बछर के सुरता करत डाकिया बाबू छन्नू के आँखी ले आँसू तरतर तरतर झरे ल लग गिस।वोला अइसे लगत रिहिस कि कालीच तो पट्टी बस्ता धरके ददा दाई के दया मया अउ सपना ल गाँठियाय स्कूल जावत रेहेंव।कालीच तो छन्नू भैया कहिलावत गली गली घूम घूम के चिट्टी पत्री बाँटत रेहेंव,फेर कब छन्नू भैया ले छन्नू बबा होगेंव,तेखर पता घलो नइ चलिस।छन्नू ल लगिस कि सुख के पल अउ कामबूता म खुद ल घलो बरोबर टेम नइ दे पायेंव,त का अपन सुवारी देवकी अउ एकलौता बेटा सुमेर ल टेम दे पाये होहूँ।सुमेर कभू कभू अर्दली करे फेर देवकी छन्नू ल देख बड़ खुश होवय अउ बरोबर दया मया लुटावव। "होनहार बिरवान के होत चिकने पात" ये हाना छन्नू उप्पर एकदम फिट बइठे काबर कि छन्नू बचपन ले बनेच हुशियार अउ संस्कार वान लइका रिहिस।पढ़ाई लिखाई के तुरते बाद जइसने दाई ददा संग जम्मो गाँव वाले मन कहय कि छन्नू पढ़ लिख के नवकरी करही,वइसनेच छन्नू अपन गाँव भर म सरकारी नवकरी करइया पहली लइका बनिस अउ डाकविभाग म पोस्टमैन के नवकरी पाइस। कामबूता बर छन्नू बड़ चंगा अउ चोक्खा रहय,अपन जम्मो काम ल लगन अउ ईमानदारी ले करे।नवकरी पाये के पहिली भी छन्नू के गाँव म बड़ मान गउन होवय,त नोकरी लगे के बाद का कहना? फेर छन्नू ल कभू गरब गुमान अपन चंगुल म नइ फँसा सकिस।रोज जब छन्नू  कामबूता निपटाके अपन घर आवय तब वोहा गाँव गुड़ी अउ चौपाल म  बरोबर टेम देवय,संगे संग जम्मो बड़का सियान मनके आशीष घलो लेवय।घर म घलो रोज एक दू घण्टा सुमेर ल पढ़ावय अउ झट खा पी के सपरिवार सुत जावय।पहाती पहली छन्नू जागे अउ ओखर आरो ल पाके बाद म कुकरा बासे, चिरई चिरगुन घलो बाद म चहचहावय।छन्नू घर के कामबूता म हाथ बँटावय तेखर बाद नहाखोर के, नास्ता पानी करके,साइकिल ओंटत ऑफिस कोती चल देवय।

             छन्नू के सुवारी देवकी अपन आप ल बड़ भागी माने कि मैं नवकरी पेशा वाले आदमी के अर्धांगनी आँव।तभे तो छन्नू के हां में हां मिलावत सदा हाँसत दया मया लुटावय अउ लइका लोग  संग घर परिवार के सेवा जतन करत दिन पहावय। रोज पहाती पहाती देवकी उठके,परछी अँगना बाहर बटोर के,चूल्हा चाकी लीप के,नास्ता पानी,खाना पीना बना पहली छन्नू ल ऑफिस बिदा करे, तेखर बाद सुमेर ल स्कूल।पति के ऑफिस अउ लइका के स्कूल जाये के बाद  भी देवकी अपन आप ल कभू अकेल्ला नइ  पाइस।वो अबड़ लगन अउ आनन्द के संग जम्मो बूता काम ल रोजेच गीत गुनगुनावत गुनगुनावत पूरा करय।रँधई गढ़ई अउ पूजा पाठ के संगे संग देवकी कुछ समय परोसिन मन संग घलो बितावव।देवकी बिहाव होके जब ले ससुराल आय रिहिस,कभू मइके बर सुध नइ लमाइस,अउ बिचारी जाये भी त काखर मया म।ददा तो बिहाव के पहलीच गुजरगे रिहिस अउ दाई बिहाव के एक बछर बाद म।ददा दाई के मया  ल देवकी जादा दिन नइ पा सकिस,तेखरे सेती सदा पतिप्रेम म डूबे रहय,अउ ससुराल म ही अपन ददा दाई के मया ल  अँचरा म गाँठियाके  दिन गुजारय।देवकी सबो गुण म सम्पन्न रिहिस, वो आज के नारी कस भले घर के चार दिवारी ले नइ निकले रिहिस फेर सिलई कढ़ई बुनई सबे काम जाने।देवकी के गुण के सबे प्रसंशा करय चाहे गाँव वाले होय या फेर छन्नू। देवकी  प्रसंशा के लइक भी रिहिस, सादा सरल स्वभाव अउ चीज बस के कोनो गरब गुमान नही।छुट्टी के दिन कभू कभू छन्नू देवकी अउ सुमेर ल घुमाये फिराये घलो।कुल मिलाके कहे जाये त जिनगी सोला आना रिहिस न कोनो चीज बस के कमी न कोनो बात के दुख।इही सुख के डोंगा म सवार दूनो प्राणी ल कब चौथा पन अपन काबा म पोटार लिस,तेखर भनक घलो नइ लगिस।

             छन्नू अउ देवकी अपन लइका सुमेर के भविष्य ल लेके अबड़ चिंतित रिहिस। ओमन चाहत रिहिस कि लइका पढ़ लिखके अपन पाँव म खड़ा हो जातिस।अउ अइसन कते ददा दाई नइ सोंचय, फेर सुमेर पढ़ई लिखई म थोरिक कमजोरहा रिहिस।बारवीं तक तो लगभग बने बने पढ़िस फेर जब कालेज पढ़े बर शहर गिस ता, ओखर आदत बिगड़त गिस। सुमेर गलत संगत म पड़के नसा पान ,अउ लड़ई झगड़ा करेल लग गिस।कालेज के दू बछर घलो ले देके बितायस, फेर तीसर बछर म बनेच बिगड़ गे अउ एक साल फेल घलो होगे।ददा दाई के चिंता बढ़ेल लग गिस।देवकी कभू कभू छन्नू ल बोले कि सुमेर के बिहाव कर देथन, जिम्मेदारी पाके सुधर जाही फेर छन्नू तियार नइ होय। वो कहय लइका जब जिम्मेदारी उठाये के लइक होय तभे बिहाव करना चाही।कभू कभू सुमेर के व्यवहार ल देख रिस म कह भले देवय कि तोर बिहाव करबों,फेर सुमेर म कोई बदलाव नइ आय। वो लापरवाह बनके घूमय फिरय दारू गाँजा पीयय अउ लड़ई झगड़ा घलो करे।जतके बढ़िया मान मर्यादा अउ नाम छन्नू कमाय रिहिस ओतको बेकार छबि सुमेर के रिहिस।गाँव के मनखे मन ताना घलो मारे कि जादा लाड़ प्यार म लइका के इही गत होथे।छन्नू अभाव अउ दुख पीरा के भट्ठी म पकके बने मनखे बने रिहिस।जब पोस्टमैन के नोकरी लगिस तब छन्नू के मन म कभू  आवय कि मोर ददा कर कहूँ अउ सब कुछ रितिस त अउ बड़े नवकरी करतेंव।फेर आज सुमेर ल देख के डर म काँप जावय ।छन्नू सुरता करथे कि भले बालपन म अभाव रिहिस, फेर दुर्गुण अउ कोनो संसो फिकर के चिटिक भी नामो निशान नइ रिहिस, पर आज चौथा पन म जब सब कुछ हे तब जबर संसो अन्तस् ल झगझोरत हे।छन्नू देवकी कर कभू कभू तो अपन दुख के गठरी ल खोलत कहि परे कि टूरा अत्तिक उछन्द अउ झेक्खर हो जही कहिके जानत रहितेंव त नवकरी के एकात बछर पहिली जान दे देतेंव, ताकि मोर जघा वोला जीविकायापन के  माध्यम तो मिल जातिस,फेर कोन जानत रिहिस ये सब करम लेखा ल। तब देवकी छन्नू के मुँह म हाथ रखके चुप करावत कहय,वाह स्वामी, फेर मोर का होतिस अउ अइसे कहिके देवकी चिल्लाके रो पड़े। छन्नू के संग देवकी घलो संसो फिकर के घानी मा लइका के गत ला देखत पेराय लग गिस।

          एकदिन छन्नू अँगना म बइठे रिहिस ओतकी बेर सुमेर नशा म धुत घर आइस।सुमेर के हाल देख के छन्नू के आँखी लाल होगे अउ बाजू म पड़े लउठी म चार घाँव जमा घलो दिस।छन्नू अउ देवकी भले आज तक गारी देवय फेर एको बेर हाथ नइ उचाय रिहिस।छन्नू कभू सोचे घलो कि कास ये लइका ल पहली ले लउठी पड़े रहितिस, त ये दिन नइ देखेल मिलतिस।सुमेर ददा ल मारत अउ खिसियावत देख गुस्सा होगे  अउ  रिसे रिस म झोला  झांगड़ी सकेल के दस हजार पइसा धरके रात कुन घर ले फरार होगे।देवकी अउ छन्नू तीर तखार ल गजब खोजिस फेर सुमेर के आरो नइ पाइस।अब जब छन्नू अउ देवकी ल सहारा के जरूरत हे तब बाढ़ें बेटा के घर ले भाग जाना कोनो गाज गिरे ले कमती नइ हे।छन्नू के चौपाल,गाँव गुड़ी सब छूट गे।छन्नू खुदे संसो म बोजाय देवकी ल दिलासा देवत बोलय कि जादा दुख झन मना देवकी,पइसा सिराही ताहन का करही, खुदे घर आ जाही। फेर महतारी अन्तस् मा भभकत संसो के आगी कहाँ बुझे? देवकी ल यहू संसो खाये की कहूँ सुमेर चोर ढोर के संगत म झन पड़ जाये, गुंडा मवाली झन बन जाय। छन्नू अपन बचपना के सुरता करत सोंचय कि जब ददा दाई अउ सियान मन गारी देवय अउ गलती म मार घलो देवय,तब हमन वो मार ले सबक अउ सीख लेवन,फेर वाह रे आज के लइका; थोरिक मार अउ फटकार म घर ल तियाग देवत हो।कोन जनी हमर असन कहूँ सबे चीज ल खुदे सिधोवत, ददा दाई के आज्ञा मानतेव तब का नइ करतेव? छन्नू के ददा दाई अपन जाँगर चलत म ही बिना सेवा जतन कराये,झट  परलोक सिधार गे रिहिस। कथे दुख म  मनखे के दिमाग चारो कोती घूमथे तभे तो छन्नू यहू सोचे कि, जब मँय अपन महतारी बाप के बूढ़त काल म सेवा नइ करे हँव त मोर बेटा बूढ़त काल म मोर कइसे हो पाही, महूँ ल अपन दाई ददा असन झट मर जाना चाही।ये सोच  छन्नू के आँखी झलकेल बर धर लेवय।छन्नू ल सुरता आवय सुमेर के ननपन के,जब वोला वो खूब मया करे,पीठ म घोड़ा चघावव,बाजार हाट अउ दुकान घुमावव।छन्नू के घर आते साँट सुमेर ओखर झोला म मिठई खोजे त ड्यूटी जाये के बेरा साइकिल ल रगड़ रगड़ के पोछें अउ बरसात घरी टायर के चिखला ल साइकिल के पैडल  ल हाथ म चला चला बड़ मजा लेके निकालय।सुमेर शुरू शुरू  म पढ़ई म बने रिहिस,कभू छन्नू कहय घलो तोला नवकरी मिलही रे बेटा बने बने पढ़बे अउ सबके बात बानी मानत बने बने रहिबे।फेर होनी ल कोन जाने? आज सुमेर छन्नू अउ देवकी के डेहरी ल छोड़ के भाग गे हे, दूनो प्राणी दुख के दहरा म उबुक चुबुक करत हें।अब बस दूनो झन घरे म कभू लइका के त कभू यम के रद्दा जोहत दिन अउ रात ल काटेल लग गिस।

            एती सुमेर, शहर ले लगे एक ठन होटल के छत म बने कमरा म रहे बर लग गिस,जिहाँ ले एक ठन आमा पेड़ के फुलिंग म बने चिरई खोंधरा चकचक ले दिखे।जेमा एक माई चिरई रहय जउन पहाती खोंधरा छोड़ के उड़ जावय अउ संझौती बेरा फेर लहुट आवय।कुछ दिन बाद वो  चिरई घड़ी घड़ी खोंधरा मेर दिखे ल धर लिस।सुमेर के नजर पड़िस त देखथे कि खोंधरा म दू ठन अंडा हे, तेखर सेती माई चिरई  जादा दुरिहा नइ जावत रिहिस।कुछ दिन म दू ठन नान्हे चिरई  मनके चिंव चिंव गुंजेल  लगिस।अब माई चिरई चौबीसों घण्टा पेड़ेच के आजू बाजू दिन बताये बर लग गे,खोंधरा ले दुरिहाय नही।खेवन खेवन अपन  चोंच म दाना दबा के लावय अउ नान्हे चिरई मन ल खवावय।ये सब दृश्य ल सुमेर बरोबर रोज देखय।माई चिरई के आहट पाके नान्हे चिरई मन चोंच उठा उठा के नरियावय अउ दाना माँगय।एक दिन रतिहा जइसे सुमेर के नींद पड़त रिहिस ओतकी बेर ओखर कान म  माई चिरई के भारी नरियाय के आवाज आय लगिस।सुमेर ओढ़ के सोये के कोशिस करिस फेर सुत नइ पाइस,अंत म का होगे सोचत बाहर आथे त देखथे कि एक ठन बिरबिट डोमी साँप नान्हे चिरई मन ल खाये बर खोंधरा के तीर पहुँच गे हे।माई चिरई  अपन जान के संसो करे बिना फन उठाय नांग ल उड़ उड़ के चोंच मारय, अउ भारी नरियावय,ओखर नरियई ल सुनके अइसे लगे जइसे माई चिरई, साँप ल भागे बर काहत घेरी बेरी बखानत हे। आखिर म थकहार के साँप नीचे उतरेल लगिस।माई चिरई के जीत देख के सुमेर के अन्तस् गदगद होगे।एक दिन मनमाड़े हवा गरेर के संग झमाझम पानी गिरे बर लगिस, गड़गड़ गड़गड़ बादर गरजय,कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी चमकय अउ पटपट पटपट करा घलो गिरय।सुमेर के जी ये सोच के छटपटाय बर लगिस कि वो खोंधरा म का बीतत होही।हिम्मत करके बाहिर आइस त देखथे के माई चिरई  अपन नान्हे चिरई के उप्पर छत बरोबर बइठे हे।हवा गरेर म डारा बिकट लहसे तभो मूसलाधार बरसा अउ टप टप बरसत करा ले नान्हे चिरई ल बचाये बर माई चिरई लगातार जमे हे।थोरिक देर म हवा अउ पानी दूनो थम गे।नान्हे चिरई मन डार म फुदके बर धर लिस।खाना खावत ले सुमेर खोंधरा ल झाँकथे फेर ओला माई चिरई दिखबे नइ करिस।ओखर मन छटपटाय बर धरलिस,तुरते भागत भागत होटल ले उतर के आमा पेड़ कर चल देथे, अउ जउन देखथे ओहर ओखर छाती ल दू फाँकी चीर देथे।माई चिरई, करा अउ पानी म पिटा के जान गँवा चुके रिहिस,ओखर तन म चाँटी झूमत रिहिस। सुमेर के आँखी ले आंसू के धार बरसेल लगगे, वो फफक फफक के रोय लगिस कि वाह रे महतारी चिरई तैं  लइका मन बर अपन जान घलो दे देएस,तोर समर्पण ल मैं बारम्बार नमन करत हँव।उही बेरा सुमेर ल पहिली बार दाई देवकी अउ ददा छन्नू के सुरता आइस कि मैं कतेक अभागन आँव जेन दाई ददा ल अकेल्ला छोड़ के भाग आय हँव,कोन जनी मोर लालन पालन वोमन कइसन कइसन दुख पीरा ल झेल झेल के करे होही,मोला धिक्कार हे।सुमेर के अन्तस् ल माई चिरई के मया ममता अउ समर्पण ह रही रही के कुरेदे बर लग गिस,वो दौड़त होटल म आइस अउ अपन झोला झांगड़ी ल खाँध म अरो के घर कोती जाय बर निकलिस ,जावत बेरा खोंधरा ल झाँकथे त देखथे कि नान्हे चिरई म खोंधरा ल छोड़ आने कोती उड़त जावत रहय,अउ एती पेड़ तरी म माई चिरई मरे पड़े हे।ओखर मन म उँखर बर क्रोध उमड़िस, फेर एक क्षण बाद खुद ल वो मेर रख के देखिस त सुमेर के आँसू के धार अउ बढ़गे।माई चिरई ल आमा पेड़ तरी गड्ढा खन के पाटत बेरा सुमेर सोचे लगिस के  चिरई मन तो जानथे कि ओखर लइकामन आघू चलके खोंधरा छोड़ उड़ा जाही, ओखर कोनो काम नइ आवय, तभो अइसन मया ममता लुटाथे।फेर हमर ददा दाई मन तो अपन बुढ़ापा के सहारा अउ डीही म दीया बरइया मानथे।अइसन म लइका यदि दाई ददा ल छोड़ देय त ओखर मन म का बीतत होही? अउ जेन ददा दाई ल तज देय वो लइका ले बढ़के मूरुख अउ कोनो नोहे।सुमेर लकर धकर घर म जाके, ददा दाई के पँवरी म जाके गिर जथे। सुमेर के आँखी ले बरसत पछतावा के आँसू ल देख छन्नू अउ देवकी बेटा ल गला लगा लेथे।सुमेर के अन्तस् म वो माई चिरई के मया ममता के खोंधरा  बनगे रिहिस।सुमेर अपन ददा दाई संग सबके मन लगाके सेवा करे बर लगगे।अउ एकदिन सुमेर ल घलो सरकारी नवकरी के बुलावा आगे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


Saturday, 21 December 2019

छत्तीसगढ़ी व्यंजन - डॉ. मीता अग्रवाल

"पुष्टई ले भरपूर छत्तीसगढ़ी व्यंजन"

छत्तीसगढ़ी संस्कृति, कला अउ साहित्य के अपन एक अलग पहचान हवे, इही गोठ ला चेत करके घर के रँधनी ले अपन गोठ के शुरुआत करत हँव । हमर जिनगी म खानपान के बहुतेच महत्व हवे।  छत्तीसगढ़ी जेवन के ररँधई जब महमहाथे तव मुँह मा पानी भर जाथे। "धान के कटोरा" कहाए वाला छत्तीसगढ़ मा किसम -किसम के चाँउर के उत्पादन होथे। लगभग 1000 ला आगर धान के पैदावार हमर खानपान के महत्वपूर्ण जिनिस हवे। चाँउर - दार, साग- भाजी के अलावा,  आनी बानी के कलेवा घलो बनाए जाथे, जेमा- फरा, दूध फरा, चीला, चौसेला चाँउर-पिसान ले रोजेच बनाय जाथे।
          तीज तिहार मा बनने वाला पकवान अउ जेवन  मा, चाँउर पिसान संग गँहूं पिसान, बेसन भी प्रयोग करें जाथे। इन पकवान मा ठेठरी ,खुरमी, देहरवरी ,अइरसा, गुझिया, कुसली, पिडिया,  बिडिया, खाजा, पपची, कुर लाड़ू ,बरा ,बोबरा प्रमुख हवें।
खान पान मा इहाँ विविधता के कमी नइये। रँधनी मा रोजेच
भाजी के बड़ महत्व हे।,कहावत घलो जनजीवन में प्रचलित हवे -"छत्तीसगढ़ के भाजी, जेमा भगवान राजी"।  छत्तीसगढ़ मा बासी संग भाजी सबे झन खाथें। बटकी मा बने बासी के सेवाद संग भाजी खाय के अलगे मजा हवे। इहाँ पचास ले ज्यादा किसम के भाजी गाँव अउ शहर मन मा राँधे जाथे, जउन विटामिन ले भरपूर रथे। प्रमुख भाजी मा- सरसों भाजी ,खेड़ा भाजी, बोहार भाजी , कुरमा भाजी, चाटी भाजी, चरोटा भाजी, बथुआ भाजी, खोटनी भाजी, खट्टा भाजी, मुनगा भाजी, मुरई भाजी, गोंदली भाजी, गोल भाजी, तिनपनिया भाजी, करमत्ता भाजी, चेंच भाजी, चौलाई भाजी, पाला भाजी, लाल भाजी ,अमारी भाजी, गुमी भाजी, उरीद- मूंग भाजी ,मछरिया भाजी, गुडरु भाजी,  मुस्केनी भाजी उल्ला भाजी, बर्रे भाजी चना भाजी ,मेथी भाजी ,तिवरा भाजी ,पोई भाजी, मखना भाजी, कांदा भाजी, कुसुम भाजी छत्तीसगढ़ मा ये भाजी मन अधिकतर बनाये जाथें।

कुछ भाजी ल कम बनाए जाथे ,ऐमा- भाजी मिरचा भाजी, पीता भाजी, लमकेनी भाजी, कुलफा भाजी, खोटलिइया भाजी, धरकूट भाजी ,बरेजहा  भाजी, कुरमा भाजी, कौवकानी भाजी, इमली भाजी, पटवा भाजी, कोईलार भाजी, कोचई भाजी, गिरहुल भाजी पत्थरी भाजी, सेमी भाजी, लेड़गा भाजी ,लेवना भाजी, बर्रा भाजी , उल्ला भाजी ये सबो भाजी ला बिशेष बिंध ले राँधे जाथे, जेमा फोरन मा लसून, लाल मिरचा, तिली, पताल नून डार के पकाये जाथे।
साग म जिमीकाॅदा इहाँ के राजा साग हवे जे बरबिहाव के समधी भोज मा खवाना जरुरी रथे अउ देवारी अनकूट मा घर-घर राँधेन जाथे। सुक्सा साग मा भाटा, गोभी, बुंदेला मुरई, दही मिर्चा, किसम किसम के बरी-रखिया तूमा, पपीता, कोहडा के अलावा,भात ,लाई, अदौरी बरी, विशेष कर बनाय जाथे। चाँउर पापर,चाँउर कुरेरी, रखिया बीजा के बिजौरी ला तर के पहुना ला खवाय के चलन हवे। अथान गुराम, चटनी, अरक्का के  सेवाद ह, खाना के सेवाद ला बढ़ाथे।

छत्तीसगढ़ में बनने वाला ये व्यंजन के सेवाद, केवल प्रदेश मा ही नही, पूरा देश मा, बगरे हवे, काबर कि ये व्यंजन, छत्तीसगढ़ के पहचान के संगे संग पुष्टई मा प्रोटीन, विटामिन, खनिज- लवण, कार्बोहाइड्रेट, वसा आदि ले घलो भरपूर हवे। राँधे गढ़े  मा आज के जमाना मा एकर तरीका आसान हवे। मेला- मँडई मा लोगन व्यंजन के सेवाद ल लेके आनी बानी के जेवन के प्रशंसा करत नइ थकँय।
 इही कोशिश मा मँय हर 2002 छत्तीसगढ़ी व्यंजन-"आनी बानी के जेवन" के नाम ले पुस्तक लिखे हँव , उन हमर राज्य के व्यंजन ला घरोघर बगराय म फलित होवत हवे । हमर छत्तीसगढ़ के खानपान के तरीका अपन आप मा बिशेष महत्व रखथे।

लेखिका -  डाॅ. मीता अग्रवाल मधुर, रायपुर
 छत्तीसगढ़

Tuesday, 10 December 2019

सोनाखान के शान: वीर नारायण महान - कन्हैया साहू "अमित", चोवाराम "बादल"


(1) सोनाखान के शान: वीर नारायण महान
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        छत्तीसगढ़ राज हा अपन पोठ खनिज संपत्ति के कारन देश-बिदेश मा प्रसिद्ध हावय। इहां चारो खुँट जंगल के हरियाली अउ अन-धन के अगाध खुशहाली बगरे हावय। धान-पान अउ ओनहारी बर हमर राज मा भन्डार आगर भरे रथे। एखरे सेती धान के कटोरा हमर छत्तीसगढ़ राज हा कहाथे। धरम-करम अउ दान-पुन मा घलाव हमार ए राज हा अघुवा हावय। मंदिर-देवाला,मेला-मङई,तीरथ-बरथ के कोनो कमी नइ हे। प्रकृति  हा घलो हमर राज ला अंतस ले मया लुटाय हावय तभे तो इहां
नंदिया-नरवा,कछार-भाँठा,मइदान,घाटी अउ खेत-खलिहान के भरमार हे। सबले बङे बात हमर ए नेवरिया राज हा बिकास के रद्दा मा सरलग दउड़त हावय। नवा राज बने सोला बच्छर होगे हे फेर बिकास के रद्दा मा रेंगई हा अजादी बिन बड़ मुसकुल रहीस। हमर देश ला अजाद होय सत्तर बच्छर होगे हे अउ बिकास के रथ मा सवार होके समे के संगे संग सुग्घर भागत हावय। फेर ए अजादी के बरदान हा तन-मन अउ धन के लाखों बलिदान ले मिले हावय। अइसने सोज्झे फोटईहा कोनो रद्दा मा परे नइ मिले हे हमर ए अजादी हा। देश के संगे संग हमर छत्तीसगढ प्रदेश मा ए अजादी मा सरबस निछावर करईया *दधीचि* मन के कोनो कमी नइ हे। अजादी के अमर शहीद बलिदानी मा हमर राज के नांव के अलख जगईया मा सबले अघुवा अमर वीर नारायण सिंह के नांव हा अव्वल हावय।
               छत्तीसगढ के गरब अउ गुमान वीर नारायण सिंह हा
आदिवासी जमींदार परवार के सपूत रहीन। ए मन हा अपन बाहर ददा के जमीन-जयदाद मा बड़ अराम ले एश-अराम के जिनगी ला बिता सकत रहीन। वीर नारायण हा अराम ले जादा परहित मा, देशहित मा अजादी ला अपन मन मा रमा लीन। अपन जनमभूमि अउ जनता के रक्षा बर ए मन हा अपन परान हाँसत-हाँसत निछावर कर दीन। इंखर इही करनी हा इनला अमर बना दीस। छत्तीसगढ के असल अउ सरल निवासी आदिवासी बंस मा
जनम लेवईया नारायण सिंह हा बिंझवार समाज के बीर बेटा रहीन। इंखर जनम हा महानदी के घाटी अउ छत्तीसगढ के माटी सोनाखान मा बछर 1795 मा होय रहीस। इंखर ददा रामसाय हा सोनाखान के जमींदार रहीन। बछर 1818-19 के बखत मा
अंग्रेज अउ भोंसले राजा मन हा बड़ अतियाचार करत रहीन। इही अतियाचार के बिरोध मा जमींदार रामसाय हा तलवार उठाय रहीन फेर ए बिदरोह ला केप्टन मैक्सन हा दबा दे रहीन। बिदरोह के बाद मा रामसाय हा अपन बिंझवार आदिवासी समाज के समरथन अउ सहजोग ले अपन दल-बल ला सकेल के पोठ करीन। इंखर बाढ़त
दल-बल ला देख के अंग्रेज मन हा जमींदार रामसाय ले राजीनामा कर लीन। देशभक्ति अउ बहादुरी नारायण सिंह ला अपन बाप ले बपउती मा मिले रहीस। ददके मृत्यु पाछू ए मन हा बछर 1830 मा सोनाखान के जमींदार बन गीन।
                     नारायण सिंह हा अपन आदत बेवहार ले जन-जन के हितवा,नियाव धरमी, बहादुर जमींदार के रुप मा लोकप्रिय बन गीन। लोगन मन के अंतस मा नारायण सिंह प्रजा पालक,अनियाव ले लड़ईया अउ जनता के पोसईया के रुप
मा जघा बनाईन। ए मन हा जन-जन के अघुवा अउ हितवा जमींदार बन के अपन अंचल मा लोकप्रिय अउ जनप्रिय होगें। इंखर इही प्रसिद्धि हा परोसी जमींदार मन ला फुटहा आँखी मा घलाव नइ सुहावत रहीस। तीर तखार के इंखर संगी जमींदार मन हा इंखर ले बैर अउ जलन भाव रखंय। बछर 1854 मा अंग्रेज मन हा कर वसूली बर एक ठन नवा कर *टकोली* ला लागू कर दीन। ए *टकोली* कर के नारायण सिंह हा जनता के हित मा बड़ भारी बिरोध करीन। एखरे सेती रइपुर मा वो समे के डिप्टी मिशनर इलियट हा इंखर सबले बङे बिरोधी अउ बैरी बनगे।

बछर 1856 मा सरी छत्तीसगढ मा पानी नइ गिरीस ता सुख्खा के संग अकाल परगे। लोगन भूखन-लाँघन मरे ला धर लीन। खाये-पीये के अब्बङ समसिया समागे। नारायण सिंह हा बिपदा के ए घड़ी मा अपन प्रजा के संग खाँध मा खाँध डारके खङे होगीन। अपन अंचल ले भुखमरी ला मिटाय बर ए मन हा सरी उदिम करीन। अपन मालगुजारी के सरी माल अउ अनाज ला जनता के दुख-पीरा ला मेटाय बर बाँट दीन। अपने जइसन भुखमरी मेटाय के उदिम करे के बिनती परोसी जमींदार मन ले करीन फेर कोनो मानीन ता कोनो नइच मानीन। जनता के भुखन-लाँगन रहई हा एमन ला घातेच जियानीस। इही दरद-पीरा ला ले के नारायण सिंह हा अपन परोसी जमीदार कसडोल के बैपारी माखन ले मदद के गोहार लगाईन। एमन बिनती करीन के अपन गुदाम मा भरे अनाज ला इहां के गरीब मन ला बाँट दंय। ए बात ला बैपारी हा नइ मानीच। एखरे सेती नारायण सिंह हा वो बैपारी के गोदाम के तारा ला टोरवा के उहां भरे सरी अनाज ला गरीब जनता मा बटवा दीन। वो बैपारी हा ए बात के सिकायत अंग्रेज अधिकारी ले कर दीस। अंग्रेज सरकार हा नारायण सिंह ला 24 अक्टूबर 1856 मा संबलपुर ले पकड़ के रइपुर के जेल मा बन्द कर दीस। इही समे मा देशभर मा अजादी के लड़ई मात गे ता वो अंचल के लोगन मन हा जेल मा बन्द नारायण सिंह ला अपन अघुवा मान लीन अउ अजादी के लड़ई मा सामिल होगें। नारायण सिंह हा घलाव अंग्रेज के बाढ़त अतियाचार ले लड़े बर अजादी के लड़ई मा कूद दीन अउ जेल ले भाग गीन।
अंग्रेज मन संग लड़ई लड़ीन अउ अपन आप ला अंग्रेज ला संउप दीन। अगस्त 1857 मा देशभक्त सैनिक अउ अपन सहजोगी के मदद ले वीर नारायण सिंह एक बेर फेर जेल ले निकल भागीन अउ ए दरी अपन गांव सोनाखान जा पहुँचीन। अपन गाँव मा
पाँच सौ बंदुक वाले मन के सेना बनाइन। अंग्रेथ घलाव कलेचुप नइ बईठीन। एहू मन हा अपन दल-बल के संघरा सोनाखान बर निकल गीन। अंग्रेज मन ला सोनाखान के बारा मा कुछु जादा जानकारी नइ रहीस फेर लालची अउ गद्दार जमींदार मन के
मदद ले सोनाखान आ पहुँचीन। सोनाखान के जंगल मा वीर नारायण सिंह के सेना अउ अंग्रेज मन के भारी लड़ई मात गे। अंग्रेज मन हा हारे ला धर लीन। एखर ले अंग्रेज मन खखुवागें अउ जनता उपर अतियाचार ला बढ़ा दीन। वीर नारायण सिंह
हा अपन जनता ला अंग्रेज के अतियाचार ले बचाये खातिर अपन आप ला सोनाखान ले निकाल के लकठा के एक ठन पहाड़ी मा जाके सरन ले लीन। अंग्रेज मन हा सोनाखान मा खुसर के सरी गांव भर मा आगी लगा दीन। नारायण सिंह मा जब तक  शक्ति अउ समरथ रहीस अपन छापामार बिधि ले अंग्रेज मन ले लड़त अउ पदोवत रहीन। बड़ दिन ले ए लुकाय-चोराय लड़ई बिधि ले लड़ई चलते रहीस फेर तीर तखार के जमींदार मन हा गद्दारी करके नारायण सिंह ला पकड़वा दीन। वीर नारायण सिंह उपर राजद्रोह
के मुकदमा चलाय गीस। एक परजा पालक,जन-जन के हितवा उपर राजद्रोह के मुकदमा हा सरासर गलत अउ लबारी रहीस फेर अंग्रेज मन के नियाव के नाटक अइसनहे होवय। अपन मनमरजी नियाव के नाव मा अनियाव करंय।
                      अंग्रेज मन हा राजद्रोह के नांव मा वीर नारायण
सिंह ला मृत्युदंड के रुप मा फाँसी के सजा सुना दीन। 10 दिसम्बर 1857 के दिन रइपुर के जयस्तंभ चउक मा वीर नारायण सिंह फाँसी मा टाँग दे गीन। फाँसी मा झुलत इंखर देंह ला तोप ले उङा दीन। ए हमर भाग हे के अइसन वीर सपूत हा हमर छत्तीसगढ महतारी के कोरा  बलौदाबाजार मा जनम धरे रहीन। भारत देश अउ छत्तीसगढ राज घलाव अमर शहीद बलिदानी वीर नारायण के करजा लागत हे। इही करजा ला चुकाय खातिर भारत सरकार हा बछर 1987 मा 60 पइसा के डाक टिकिट छापे रहीन। ए डाक टिकिट मा वीर नारायण सिंह ला तोप के आगू मा बंधाय देखाय गे हे। छत्तीसगढ हा घलाव अपन राज के एकलउता अंतराष्ट्रीय
क्रिकेट स्टेडियम के नांव ला वीर नारायण सिंह के नांव मा राख के सनमान दे हावय। एखरे संगे संग छत्तीसगढ सरकार हा खाद्य सुरक्षा अधिनियम ला सबले पहिली अपन राज मा लागू करीन हे। ए अधिनियम ले सस्ता अनाज गारंटी जन-जन ला मिलथे। ए योजना ला देश भर मा सबले पहिली हमर राज मा लागू करे के पाछू वीर नारायण सिंह के सबला अनाज मिलय, कोनो भूख झन मरय ए सोच अउ समझ हा हावय। अइसन जन-जन के अघुवा अमर बलिदानी अजादी के मयारू वीर नारायण सिंह ला ए
छत्तीसगढ राज हा 10 दिसम्बर के दिन हर बछर अपन श्रद्धांजलि अरपित करे जाथे। छत्तीसगढ के आन बान शान सोनाखान के माटी अउ उंखर सपूत वीर नारायण सिंह ला जींयत भर सत-सत पयलगी।
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*कन्हैया साहू "अमित"*
*शिक्षक*~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क ~ 9200252055
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(2)
*शहीद वीर नारायण सिंह*

छत्तीसगढ़ के पावन भुइयाँ जेला तइहा के जुग मा दक्षिण कौशल घलो काहयँ, बड़े-बड़े संत, गुरु, ज्ञानी अउ वीर सपूत मन ला अपन गोदी में खेलइया महतारी आय । ए महतारी के अँचरा मा घन जंगल घटते हे  त  हीरा, सोना ,चाँदी  के खदान घलो हाबय । इहाँ के नदिया मन मीठ पानी ले भरे कुलकत- गावत रहीथें ।किसान के कोठी ह अन्न मा भरे  छलकत रहिथे ।भगवान राम के महतारी माता कौशिल्या के मइके ए भुइयाँ मा सदा  धरम-करम के अलख जागे रहिथे। इहाँ के रहवासी मेहनती, सरु किसान मन ला  देख के कतको झन काहत रहिथें-- छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया।
     जुन्ना जुग ले ए भुइयाँ  मा देशभक्ति के पुरवइया तको फुरुर-फुरुर चलत हे।अन्याय, अत्याचार के विरोध करें मा छत्तीसगढ़िया कभू पिछू नइ राहयँ। भारत के पहली स्वतंत्रता संग्राम ले घलो पहिली इहाँ के सपूत मन अंग्रेज मन के मुकाबला करे  हें।उही कड़ी मा सोनाखान के वीर सपूत नारायण सिंह अउ ओकर  पूर्वज मन ला भुलाये नइ जा सकय।
  वर्तमान मा बलौदाबाजार जिला मुख्यालय ले लगभग 70 किलोमीटर दूरिहा मा डोंगरी पहाड़ के बीच, घन जंगल मा सोनाखान  नाम के गाँव, जेला सिंघगढ़ घलो काहयँ, हाबय। जेन हा 17 वीं शताब्दी मा सारंगढ़ के राजा के वंशज मन के जमीदारी के राजधानी बने रहिसे। इहें के परजा हितैषी वीर जमीदार रामराय के धर्मपत्नी  रानी रामकुँवर देवी के  कोंख ले सन 1795 मा महान प्रतापी बालक नारायण सिंह के जनम होइच।
     कहे गे  हे--होनहार बिरवान के होत चिकने पात। सोला आना सहीं बात आय। बालक  नारायण सिंह ला खून मा दाई के धार्मिक संस्कार और पिता के दयालु पन ,वीरता के गुण मिले रहिसे। जमीदार रामराय परजा के हित करे बर कई बेर अंग्रेज मन ले झगरा लड़ाई करिच ।अपन बिंझवार आदिवासी सेना के संग मा सन 1818- 19 म अंग्रेज अउ भोंसले राजा के विरोध मा तलवार उठाइच। तेकर सेती  कैप्टन मैक्सन हा ओला अपन बड़े दुश्मन मानय।
    परोपकारी जमीदार राम राय के सन 1830 मा इंतकाल होये के बाद 35 साल के  उमर मा  युवराज नारायण सिंह हा सोनाखान के जमीदार बनिच अउ अपन जिनगी ला परजा मन के सेवा मा खपाये ल धरलिच । ओकर निस्वार्थ सेवा अउ राजकाज ला देख के जम्मों परजा अब्बड़ खुश राहयँ । 
    जमीदार नारायण सिंह ह अपन दुलरुवा घोड़ा म बइठ के, कनिहा मा तलवार खोंचे, घूम-घूम के  अपन परजा के सुख-दुख के सोर -सन्देशा लेवत राहय। एक दिन एक झन आदिवासी हा गोहराइच-- जमीदार महराज, रक्षा करव। एक ठन बघवा हा  अबड़ेच उतपित करत हे। हमर पाले-पोंसे गाय-गरुवा, छेरी-बोकरा मन ला हबक-हबक के खावत हे।अतका  ला सुन के वीर नारायण हा  अपन जान के बाजी लगाके तुरते बघवा ला खोज के मार देइच ।चारों मुड़ा जय जयकार होगे। बताये जाथे उही दिन ले वोला चालबाज अंग्रेज मन वीर के उपाधि देये रहिन।
  सन 1856 के बात आय। भारी दुकाल परगे।लोगन दाना-दाना बर मोहताज होके भूँख मा मरे ल धरलिन। वीर नारायण सिंह  ले उँकर दुख देखे नइ जाय। अपन कोठी के जम्मों धान कोदो ला  बाँट दिच  फेर कतका झन ला पुरतिच भला ? वोहा बड़े-बड़े सेठ साहूकार  मन सो हाथ पसार के अन्न माँगय।जेन मिलय तेला बाँट दय।सहीं बात ये - पाँचों अँगुरी एके बरोबर  नइ होवय। कतको के हिरदे पथरा कस निष्ठुर होथे।ओइसने काइयाँ कसडोल के सेठ माखन रहिसे। वीर नारायण सिंह ह उहू ला गोहरावत कहिच-- सेठ जी! लोगन भूख मा  मरत हें। तोर गोदाम मा  अबड़े  धान-चाउँर भरे हे।  किरपा करके ओला  बाँट दे ।आगू बछर धान- पान होगी तहाँ ले तोला लहुटा देबो।ओतका ला सुन के माखन भन्नागे अउ इंकार करत हाथ हलादिच । तब तो वीर नारायण सिंह हा आव देखिच न ताव ,  गोदाम के तारा ल टोर के धान -चाउँर ला बाँट दिच।वोती  माखन ह रायपुर जाके अंग्रेज कैप्टन इलियट करा शिकायत कर दिच। अंग्रेज मन तो ओखी खोजत राहयँ। चोरी अउ डकैती के आरोप मा 24 अक्टूबर 1856 के संबलपुर मा वीर नारायण ला पकड़ के रायपुर के जेल मा डारदिन।
  फेर शेर हा पिंजरा मा कतका दिन ले धँधाये रतिच ? 28 अगस्त 1857 ई. मा वीर नारायण सिंह हा अपन तीन झन साथी मन संग जेल ले फरार होके सीधा  सोनाखान पहुँच गिच। वो हा अंग्रेज मन ले निपटे बर तीर-कमान वाले सेना के संग 500 बंदूकधारी सेना के गठन  करिच ।एति एलियट हा कैप्टन स्मिथ ला आदेश देवत कहिच--जा नारायण ला जिंदा या  मुर्दा लाके देखा।आदेश पाके कैप्टन स्मिथ हा भारी सेना लेके  सोनाखान ला चारों मुड़ा ले घेरलिच।वीर नारायण सिंह हा कुर्रूपाट के डोंगरी ऊपर मोर्चा संभाले राहय।भारी लड़ाई होइच। स्मिथ अउ ओकर सेना के पाँव उखड़े ल धरलिच। बहुँते सैनिक मरगें।उही समय देवरी के गद्दार जमीदार हा आके स्मिथ सँग मिलगे। भारी मारकाट मातगे।फेर वीर नारायण हाथ आबे नइ करत रहिच। तब अंगेज मन गाँव मन मा आगी लगाये ल धरलिन। निहत्था परजा मन ला मारे काटे ल धरलिन।जेला देख के अपन परजा ला बँचाये खातिर वीर नारायण हा आत्म समर्पण कर दिच।
      कैप्टन स्मिथ ला ओला पकड़ के रायपुर के जेल मा ओलिहा दिच। अंग्रेज मन ओकर उपर चोरी अउ डकैती के देखवटी  मुकदमा चलाके, मौत के सजा सुनाके 10 दिसम्बर 1857 के दिन आज के रायपुर मा जेन जगा जयस्तम्भ चौंक हे उही जगा तोप मा बाँध के उड़ा दिन।
       अपन परजा अउ महतारी भुइयाँ खातिर जान गवाँके  वीर नारायण सिंह हा अमर होगे। जब ले ए धरती रइही, जब ले सुरुज- चन्दा रइही ,तब ले वीर नरायन सिंह के नाम अम्मर रइही।
      छत्तीसगढ़ महतारी के वीर सपूत , प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी ला कोटि कोटि प्रणाम हे।

 चोवा राम 'बादल '
 हथबन्द (छत्तीसगढ़)
9926195747

Thursday, 21 November 2019

अगहन बिरसपति के पूजा

अगहन बिरसपति के पूजा

हिन्दू पंचाग मा अगहन महीना के बहुत महत्व हे। कातिक मास के बाद अगहन मास में बिरस्पत (गुरुवार)  के दिन अगहन बिरसपति के पूजा करे जाथे।
बिरसपति देव के पूजा करे ले घर मा सुख शांति,  समृद्धि, धन वैभव अउ सबो मनोकामना पूरा हो जाथे। अइसे लोगन मन के धार्मिक मान्यता हे।

पूजा के तैयारी  ------- अगहन बिरसपति पूजा के तैयारी ल बुधवार के साँझकुन ले ही शुरु कर देथे। सबले पहिली घर दुवार , अँगना , खोर ला बढ़िया लीप बहार के साफ सुथरा करे जाथे। घर के बाहिर दरवाजा मा बढ़िया रंगोली बनाय जाथे।  घर मा लक्ष्मी माता के आसन बनाय जाथे। लक्ष्मी दाई के पाँव बनाय जाथे। घर ल तोरण पताका से सजाय जाथे।

लक्ष्मी माता के आसन ------- अगहन बिरसपति के दिन बृहस्पति देव अउ लक्ष्मी माता के चित्र आसन मा रखे जाथे।
आसन के तीर मा रखिया, अँवरा (आँवला), अँवरा के डारा, केरा पत्ती, धान के बाली आदि सामान रखे जाथे।
ये पूजा मा रखिया अउ अँवरा के बहुत महत्व हे।
एकर अलावा गेंदा के फूल,  पीला चाँऊर , चना ,पीला कपड़ा अउ मीठा पकवान रखे जाथे।
पूजा के बाद मँझनिया (दोपहर) कुन कथा सुने जाथे तभे पूजा पूरा होथे।
पूजा पाठ करे के बाद प्रसाद बाँटे जाथे ।

बिरसपति देव के कथा ------- बहुत दिन के बात हरे। एक राज्य मा एक बहुत प्रतापी अउ दानी राजा राज करत रिहिसे । वोहा रोज गरीब मन ल दान देवय अउ ओकर सहायता करे। फेर ये बात ह रानी ल अच्छा नइ लगत रिहिसे ।।वोहा न तो कभू दान देवय न काकरो सहायता करे।
एक दिन राजा ह शिकार करे बर जंगल गे रिहिसे , उही बेरा भगवान बृहस्पति देव ह साधु के भेष मा महल मा भिक्षा माँगे बर आइस। रानी ह भिक्षा देबर इंकार कर दीस, अउ बोलथे -- हे साधु महराज मेहा तो राजा के दान पून करे ले तंग आ गे हँव। रोज के रोज दान करत रहिथे। आप ह मोला कुछु अइसे उपाय बतावव जेकर से ये सब धन दौलत ह खतम हो जाये। न रहे बाँस न बजे बाँसुरी । ताकि मेंहा चैन से रहि सँकव।
साधु महराज बोलथे --- रानी तेंहा तो अजीब बात करत हस। आज तक तो कोनों धन दौलत से दुखी नइ होय हे। फेर ते तो उल्टा बोलत हस।
रानी बोलीस के- --' हाँ महराज मँय सचमुच में तंग आ गे हँव।
तब साधु महराज बोलथे कि ------ अइसे करबे बिरस्पत के दिन घर ल लीपबे पोतबे, पीला माटी से केश धोबे, माँस मदिरा के सेवन करबे, धोबी ल कपड़ा धोय बर देबे। अइसे करे ले सब धन ह नष्ट हो जाही।
जइसे ही साधु महराज गीस रानी ह ओइसने करे ल धर लीस। बिरस्पत के दिन माँस मदिरा खाय के शुरु कर दीस। धीरे धीरे सब धन दौलत कम होय ल धर दीस। तीन बिरस्पत बीते के बाद राजा के सबो धन नष्ट हो गे। राजा रानी के ऊपर भारी विपत्ती आ गे। राजा रानी बहुत गरीब हो गे। खाय पीये बर तरसे लगीस।
ये सब ल देख के राजा ह काम करे बर दूसर देश चल दीस।
एक दिन रानी ह अपन दासी ल बोलीस के पास के नगर मा मोर बहिनी रहिथे। वोहा अब्बड़ धनवान हे। ओकर तीर ले कुछ अनाज माँग के ले आतेस त हमर कुछ दिन के गुजर बसर  चल जाही।
दासी ह ओकर बात मान के रानी के बहिनी के घर मा गीस। वो दिन बिरस्पत रिहिसे । रानी के बहिनी बृहस्पति देव के कथा सुनत रिहिसे ।
दासी ह रानी के संदेश ल ओकर बहिनी ल बताइस। फेर ओकर बहिनी ह कुछु जवाब नइ दीस।
दासी ह वापिस आ के रानी ल बताइस। रानी ह बहुत दुखी होइस।
रानी के बहिनी ह पूजा पाठ पूरा करके जब उठीस त ओहा सीधा रानी के महल मा गीस, अउ बोलीस  -- मेंहा बृहस्पति देव के कथा सुनत रेहेंव तेकर सेती दासी ले कुछु नइ बोलेंव। का बात हे अब बता। दासी काबर गे रिहिसे?
तब रानी ह अपन बहिनी ल सब बात ल बताइस अउ दुख ल सुनाइस।
तब रानी के बहिनी ह बृहस्पति देव के पूजा करे के सलाह दीस अउ सब विधि -विधान ला बताइस।
रानी ह ओकर बात मान के बृहस्पति देव के विधि - विधान से पूजा करे ल धरलीस। धीरे-  धीरे ओकर घर मा धन संपत्ति बाढत गीस। कुछ दिन बाद राजा भी घर मा आ गे। अब राजा अउ रानी सुख से रहे ला धर लीस। फिर से दान पुन करे ला धर लीस।
लोक मान्यता हे कि ये कथा ला सुने से सब प्रकार के मनोकामना पूरा होथे , अउ घर मा लक्ष्मी के वास होथे।
बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय ।

लेख
महेन्द्र देवांगन "माटी" (शिक्षक)
पंडरिया (कवर्धा)
छत्तीसगढ़
8602407353

Tuesday, 22 October 2019

नान्हे कहिनी - श्री मोहन कुमार निषाद


नान्हे कहिनी (पीरा कइसे मनाबो देवारी )


एक ठन गाँव रहिस परसाडीह ओ गाँव मा एक झन कुम्हार रहिस बंशी नाव के बंशी कुम्हार अपन परिवार संग गाँव मा राहय , बंशी कुम्हार के दू झन बेटी अउ एक झन बेटा रहिस हे।
बंशी कुम्हार अपन परिवार संग माटी के जतेक भी जिनिस बनय सबो ला चलागन समय के अनुसार बनावय अउ अपन परिवार संग बने सुग्घर जिनगी ला बितावय ।
धीरे धीरे समय हर आघू बाढ़त गीस , छोटे - छोटे गाँव मन हर सब बड़का होवत गिन , अउ फेर समय के संगे संग सब पुराना जिनिस मनके जगा नवा नवा चलागन के जिनिस मन सब आय लगीन ,
अब गाँव मन हर सब धीरे धीरे शहरी रूप ला धरे लगीन।
पहिली जतेक भी हमर तीज तिहार आवय ओ सब मा जतेक भी माटी के जिनिस  लगतिस तेला कुम्हार मन हर अपन गाँव के संगे संग आस पड़ोस के गाँव मन  मा घलो घरो घर जा जाके पहुचावय , अउ ओ समान के 
भाव के हिसाब ले घर वाला मन जतेक भी दार चाउँर अउ रुपया पईसा दय ओला दान पुन समझ के राख लय , अउ सुग्घर असीस देके तिहार ला हंसी खुशी ले जुरमिल के मनावय ।
समय अउ आघू बाढ़त गीस अब तो अइसन समय आगे की हमर देशी अउ देश के पुराना जिनिस मन सब नंदावत जावत हे , अउ ये नवा जमाना हर अपन चलागन के जम्मो जिनिस मन ला शहर ले लेके गाँव गाँव तक फइलावत जावत हे , येखर चलते आज कल बिदेशी समान मन के चलागन अब्बड़ बाढ़े लगिस । आज कल कोन गाँव वाले कहिबे कोन शहर वाले कहिबे , सबे झन बिदेशी समान मन ला  बउरे ला धरलीन ।
आज कल के मनखे मन गाँव जे गाँव घर मा बनय रोटी पीठा - हमर चीला फरा खुरमी ठेठरी अइसा बरा पुड़ी सोंहारी चौसेला ये सबो के सेवाद मन ला  धीरे धीरे लोगन मन भुलावत जावत हे । आज कल के लइका मन ला पुछबे ये गिल्ली भौरा बाटी 
फरा चीला चौसेला काय कहिके ता ओ बता नइ पावय ।
काबर ये सब नवा नवा चलागन आय के कारण 
हमर गाँव देहात मन के जउन सवाद हे अउ हमर मन के जउन पुराना रीती रिवाज हे ओ सब जम्मो नंदावत जावत हे ।

 गाँव गाँव अब नइ रहिस , शहर लीन अवतार ।
जम्मो जिनिस भुलात हे ,  संगे सबो तिहार ।।

देवारी के तिहार आइस बंशी हर हर साल बनाथे तइसने फेर एहु साल अपन काम मा बनाये बर भीड़गे , जम्मो माई - पिला सुमत लगाके सुग्घर मिहनत करके कमावय ।
बंशी के गोसइन तिहार मा  दिया पहुँचाय बर घरो घर जावय तइसने गीस उँहा मनडलीन हर कहिथे बड़ महंगा लगाथव ओ तुमन हर , ओ दिन मोर बेटा हर बजार ले लेके लान डरे हे कहिदिच , बपुरी हर का करतीच , कलेचुप बाहिर आगे । अब एक घर ले दूसर घर दूसर ले तीसर घर घूम डरीन सबे घर मा उनला उहिच जुवाब मिलय ।
ले देके थोड़े बहुत दिया हर बेचावय , सबे दिया मन ला महतारी बेटी मुड़ मा बोहे - बोहे बेचे बर किजरै ।
 बाजार घलो लेके गीन बाजारों मा लगाइन , लेकिन आज कल सब मशीनी अउ चाइना के चका चौंध ले भरे जिनिस  मन के बाजार मा जादा मांग अउ चलन रहिस तेपाय के उखर दिया मन उहो जादा नइ बेचाइस ।
का करतीन बपुरी मन जतेक भी बेचाइस ओत के ला बेच के घर आ गीन , महंगाई के समय सबो जिनिस मनके बाढ़े भाव अउ ऊपर ले अइसन मन्दी के समे मा कइसे एक गरीब परवार के मनखे मन बढ़िया ढंग ले तिहार मना सकत हे ।
ओतका मा बंशी के एके झन लड़का रहय ओहर जींद करे ला धरलिस बंशी ला कपड़ा लेहे बर ,  अब बंशी बड़ अचरज मा पड़गे करव ता का करव भगवान कहिके , तीन तीन झन लइका अब एके झन बर ले देहु उहू हर नइ बनय कहिके बड़ सोचे ला धरलिस ।
एक तो आज कल अतका आमदनी घलो नइये , तेमा ये रोजगार हर घलो बड़ मन्दा हे , ता लइका मन अपन ददा के गरीबी हालात अउ ये सब परस्थिति मनला देख के कहिथे नही ददा भइगे हमन ला काही नइ चाहि , हमन अइसने देवारी मना लेबोन , कहिके सबे झन कलेचुप हो होंगे । बंशी अपन अइसन हाल ला देख के रो डरिस , का आसो अइसने मनाहव देवारी कहिके ।
संगवारी हो अगर हमर मन के थोड़कीन सहयोग करे ले अगर कखरो परिवार मा खुशहाली आथे , ता आवव हम सब मिलके दूसर मनला खुशी देके अपन परम्परा मन के संग एसो हाँसीअउ खुशी ले भरे देवारी मनाथन। 

कहानीकार - श्री मोहन कुमार निषाद
              गाँव लमती , भाटापारा , 
             बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 18 October 2019

छत्तीसगढ़ी कहानी - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


                             कहानी - उजास

             संझौती अउ रतिहा के संगे संग बिहना अउ मंझनिया बेरा म घलो कुरेल गाँव ल अँधियारी के अगजर लीलत हे तइसे दिखथे।चारो मुड़ा पसरे कुलुप अँधियारी अउ साँय साँय करत  जंगल , कतको दमदार आदमी के पछीना निकाल देथे।अगास ल अमरत बड़े बड़े पेड़ अउ बड़े बड़े पहाड़ के पँउरी म नान नान आस धरे कुरेल गांव के मनखे मन जिनगी जीयत नइहे,बल्कि दिन ल गिन गिन के काटत हे।अइसने अँधियारी अउ अभाव म कई पीढ़ी आइस अउ चल दिस।फेर कोनो ल घर,गाँव,ठिहा-ठौर अउ जिनगी म उजास के आरो घलो नइ मिलिस।कोनो कुलुप अँधियार कुरिया म टिमटिमावत दीया, कखरो दुख भरे जिनगी म सुख के सुगबुगाहट,कखरो उदास मन म उछाह,अनपढ़ कारी जिनगी म शिक्षा के जोती,व्याकुल टकटकी नैनन म ससन भर नींद,उन्ना कोठी काठा म छलकत अन्न धन,सुन्ना कोरा म लइका के किलकारी,बरसत नैना म उमंग के सपना,उबड़ -खाबड़ अउ काँटा खूंटी वाले डहर के सपाट अउ साफ होना,डर म निडर,कुँवा म खुसरे मेढ़क के बाहिर निकल के तरिया नन्दिया म कूदना,छेल्ला जिनगानी म मीत मितानी, फूल फुलवारी  ये सब उजास तो आय।अउ इही सब  उजास ल कुरेल गाँव के किसोरहा लइका अल्दू कभू ऊँच पेड़ के फुलिंग म,त कभू पहाड़ के मूड़ म नाचत गावत सपनावत रहय।ओखर मन अइसन कुलुप सुनसान अँधियार जिनगी ले तंग आगे रिहिस।तभे तो उजास अउ ऊँचाई खोजे बर कभू पेड़ के फुलगी म चढ़के आगास ल झाँके त कभू पहाड़ म बइठे, नाना जाति के उड़ावत जिनिस ल देखे,अउ अपन दिमाक म उजास के दीया बारे।अल्दू के करिया,गठीला अउ ऊँच पुर देह,खांद तक झूलत लंबा करिया चुन्दी, कारी कारी आँखी,चमचम चमकत  दाँत,अपार बल अउ पवन कस फुर्ती सबके  मन ल मोह लेवय।गाँव म कोनो भी विकट स्थिति आय अल्दू सबे काम बर अघुवाय राहय।कुरेल गांव जेन जंगल के सिरिफ चार गाँव के अलावा अउ कोनो गाँव ल नइ जानत रिहिस,कभू शहर,अउ कभू बने डहर घलो नइ देखे रिहिस,उँहा अल्दू के मन ये सब कमी ल पूरा करे के आशा जागिस।अल्दू हवा म उड़ात हवाई जहाज,राकेट अउ पंछी मन ला देख के सोचे के कास मोरो पाँख होतिस त महूँ ये घनघोर जंगल ल, चीर के दुनिया के संग खाँद ले खाँद मिलाके चलतेंव अउ अइसन अभाव अउ दुख भरे जिनगी म उछाह उजास भरतेंव।अल्दू देखे रिहिस बीमारी म तड़प तड़प के प्राण गँवावत अपन कतको संगी साथी मन ला,कांदा कुशा म पेट भरत पूरा गाँव ल,दुख दरद ल किस्मत समझ के झेलत अउ जिनगी ल बोझा कस ढोवत।कुरेल गाँव के चारो मुड़ा जंगले जगंल हे ,चाहे कहूँ कोती जाये जाय, न कोनो गाँव हे न अइसन  एको रद्दा बाट जेन समाज के प्रमुख धारा ले उँहा के मनखे मन ल जोड़ सके।बने ढंग के सुरुज के रोशनी घलो नइ आय।कतको तेज हवा गरेरा होय बड़े बड़े ठाढ़े पेड़ पौधा के बीच ओखर दाल नइ गले।कहे के मतलब ये कि, हवा घलो बंध के चले।
हवा के सरसर तो नही बल्कि साँप बिच्छू अउ जीवलेवा जंगली जानवर ले पूरा जंगल साँय साँय करे। चाहे बिहना होय या फेर रतिहा झिंगरा ,हुँड़ड़ा,बघवा,भलुवा अउ कई किसम के जंगली जानवर मनके दहाड़ अउ शोर गूँजत रहय।भले नन्दिया अउ झरना के कलकल आवाज मन ल मोह लेवय,फेर ओखर अम्बार जल धारा,भँवरी मारत दहरा,तंग घाटी,पाताल लोक तक खोदाये खोह, मन ल मातम के दरिया म बोर देवय।कभू कभू, का बल्कि आय दिन जंगली जानवर अउ साँप बिच्छु, इँहा के मनखे मन ला अपन शिकार बना लेवय।फेर गाँव वाले मन जइसे कोनो परिवार म घलो कभू लड़ई झगड़ा हो जथे वइसने कोनो अलहन समझ के मन ला मना लेवय।हाथी ,बघवा,भलुवा,साँप,बिच्छू जेन रोज कोनो परिवार के सदस्य कस उंखर घर द्वार के चक्कर लगात दिखय।बरसात म चारो मुड़ा आसा विस्वास ल बोरत पानीच पानी,जड़काला म काल कस जाड़ ,कुरेल के मनखे मनला जीयन नइ देवय।अउ हाँ गरमी के मौसम थोर बहुत ठीक ठाक रहय।उंखर बर तीर तखार म बसे गाँव,घर अउ जंगल झाड़ी सबे चीज आय ।येखर बाहिर अउ कुछु नइ जाने।पीढ़ी दर पीढ़ी चलत आवत रीति रिवाज अउ परपंरा उंखर शिक्षा अउ संस्कार आय,सियान मनके गोठ बात ,ग्यान - ध्यान आय,अउ अइसन घोर अभाव ,आफत अउ अँधियार म जिनगी जीना साहस अउ बल।फेर ये साहस सबे कोनो ल नसीब नइ हो पाय।अउ जेखर अंग अंग म साहस अउ अपार शक्ति हिलोर मारत राहय ,वो लइका रिहिस,अल्दू।
         अल्दू एक दिन बड़ बड़का सइगोन के पेड़ म चढ़े आजू बाजू के चार गाँव के अलावा अउ कोनो गाँव कस्बा शहर ल ताकत रिहिस,ततकी म देखथे की बीच जंगल म धुँवा उठत हे।हब ले उतर के अल्दू वो मेर पहुँचथे त देखथे कि दू झन मनखे जहाज के पेड़ म फँस जाये ले बेहोश अउ जख्मी पड़े हे।जहाज के कुछ हिस्सा म आगी लग गे रिहिस,अल्दू कोनो काम बर कमती नइ रिहिस तुरते दूनो ल खाँद म लाद के तिरियाइस अउ जइसे तइसे करके जहाज के आगी ल घलो बुताइस।घर म लाके उंखर दवा पानी करिस, वो दूनो अब एकदम ठीक होगे।फेर एक दूसर ले बात कर पाना सम्भव नइ रिहिस।वो दूनो मनखे शहरिया वैज्ञानिक अउ अल्दू मन जंगल के रहवइया।अल्दू संग वो गाँव के अभाव अउ दुख दरद ल दूनो वैज्ञानिक मन घलो देखिस अउ झेलिस।वो तो जंगली जड़ी बूटी अउ गाँव के सियान मनके किरपा ए जेन बिना डॉक्टर अउ अस्पताल के उंखर घाव भरगे।अल्दू उंखर मनके तीर अपन गाँव म उजास के कल्पना ल रखथे,वोमन वादा करथे की गाँव म उजास जरूर आही।फेर वो वैज्ञानिक म बीहड़ जंगल ले अपन शहर जाये कइसे।नक्शा खसरा ले वोमन गाँव के बसाहट ल पता करथे अउ अपन अउ साथी मन ला वो मेर बलाथे।कुछ दिन बाद दूनो वैज्ञानिक म कुरेल गाँव ले गाँव के तरक्की के वादा करके वापस चल देथे।जावत बेरा अल्दू ल शहर लेगे के घलो बात वोमन करथे,फेर दाई ददा अउ गाँव वाले मनके  मया के अँचरा ले नइ निकल पाय।दूनो मनखे मन ल देखे के बाद कुरेल के मनखे मन जानिस कि  सुख सुविधा वाले आदमी अउ शहर,नगर घलो होथे।दूनो वैज्ञानिक ले मिले के बाद अल्दू के आत्मविश्वास अउ बढ़गे।वोला कई ठन कस्बा अउ शहर के घलो पता चलिस।पता लगते साथ जम्मो गाँव वाले मन संग रद्दा बनाये म भिड़ गे।बनेच दुरिहा रद्दा बने के बाद जम्मो गाँव वाले मन अपन आँखी ले तीर के कस्बा अउ शहर देखिन।अल्दू आघू आघू अउ गाँव के आने मनखे म पाछु पाछु।अब आय दिन अल्दू अपन ठिहा ले कस्बा, शहर आना जाना करे लगिस।अल्दू जेन चीज ल एक घांव देखे ओला वइसने गढ़े के उदिम करे।डॉक्टर ,मास्टर के महत्ता वोला समझ आगे रिहिस।फेर न मोटर गाड़ी अउ न पइसा कौड़ी बपुरा करे त काय करे।उंखर गाँव ले वो कस्बा बनेच दुरिहा राहय अउ ओतको में रेंगत जाना,बनेच बेरा लँग जावय।कभू कभू बइठे सोचे के वो वैज्ञानिक मन देव दूत कस आही अउ कुरेल गाँव ल विकास के मुख्य धारा ले जोड़ देही।फेर ये सिरिफ सपना कस लागय,काबर कि सालभर बीत जाय राहय अउ उंखर अता पता घलो नइ राहय।अल्दू खाय पीये के समान ,दवई दारू,अउ अँधियारी भगाय बर कई चीज ,चार ,चिरौंजी,तेंदू के बदला लाये लगिस। जेन जहाज गिरे पड़े रिहिस वोला लेगे बर एक दिन फेर वो वैज्ञानिक मनके,अल्दू के सपना ल सिरजाय बर आना होवस।जले जहाज के स्थिति ल देख के ओमन  हक्का बक्का हो जथे,अल्दू लगभग जहाज ल पूरा बना डरे रहिथे।दूनो वैज्ञानिक ल अबड़ खुशी होइस।वोमन अल्दू ल जहाज म चढ़ा के ए दरी शहर ले जाना चाहथे।सब ले विदा लेके झटकुन आये के किरिया खाके अल्दू चल घलो देथे।अब अल्दू अउ वैज्ञानिक एकदूसर के भाँखा ल समझ पावत रिहिस।अल्दू के उमर काय रिहिस,चार पाँच बरस बड़े शहर म पढ़ई लिखई करे के बाद वोला वोखर हुनर अउ आत्मविश्वास अनुसार बड़का वैज्ञानिक के नवकरी घलो मिल जथे।
                  कुरेल गाँव ले अल्दू के जाये के बाद गाँव सुन्ना पड़ गे राहय।दाई ददा संग गाँव वाले मनके रो रो के हाल बेहाल राहय।आठ नव बरस ले तरसत कुरेल गाँव म अचानक अल्दू के पाँव पड़थे।फेर ओखर पहिनावा ओढ़ावा ल देख  पहिचाने म भोरहा हो जावत रिहिस।कथे दाई ददा के आँखी कभू धोखा नइ खाय, ओमन अपन बेटा अल्दू ल काबा म पोटार लिन।गाँव म उमंग छागे,अइसन उमंग अउ उछाह उँहा कभू नइ होय रिहिस।अल्दू संग दूनो वैज्ञानिक घलो अल्दू के सपना ल पूरा करे म लग गे।अल्दू अपन लगन महिनत ले जतका कमावै सबला अपन गाँव के विकास म लगावै। देखते देखत पानी,बिजली,स्कूल,अस्पताल सड़क,अउ नाना जाति के सुख सुविधा ले कुरेल गाँव जगमगाये बर लग गे।दस बछर पहली देखे उजास के सपना ल साकार होवत देख अल्दू अड़बड़ खुश होवय।अल्दू कस सपना सँजोये अउ कतको लइका गाँव कुरेल म दिखे लगिस,वो दिन अल्दू के छाती गरब ले फूल गे।फेर आज ओ लइका मन बर सुख सुविधा हे,जेन उंखर आशा अउ विश्वास ल बढ़ावत हे।अल्दू तीर तखार के कुरेल कस जम्मो गाँव म उजास भरे म लग जथे।बीहड़ घनघोर जंगल म भले सुरुज के रोशनी नइ जा पाय फेर जेन रद्दा ले अल्दू रेंगे वो डहर अउ गाँव घर उजास ले लबालब हो जावय।चारो मुड़ा चाहे बीहड़ गाँव होय,कस्बा होय,या फेर शहर होय,अल्दू के गुणगान होय लागिस।आज कुरेल कस कतको गाँव म खुशी हे, सुख शांति हे, धन धान्य हे,स्कूल कालेज हे, डॉक्टर मास्टर हे,चैन सुकून हे,कुल मिलाके कहे जाय त उजासे उजास हे।

कहानीकार- श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

Saturday, 5 October 2019

छत्तीसगढ़ी आलेख - चित्रा श्रीवास












"प्रकृतिस्वरूपा नवरात मा दाई के नव रूप"

जेठ के तीपत भुइँया के पियास ला बरखा रानी आके बुझाथे। बादर पानी ला देख के किसान मन अब्बड़ खुश होथें अउ खेती किसानी के काम शुरु करथे। सावन भादों मा बढ़िया पानी पा धान लहलहाय लागथे। इही बेरा मा हमर तीज तिहार मन घलौ शुरु होथें । हरेली ,तीजा, पोरा मनाय के बाद बिघ्न हर्ता  गनेस जी बिराजथें । गजानन के जाय के बाद पितर पाख मा हमन अपन पुरखा मन ला सुरता करथन। हमर जिनगी पुरखा मन के देहे आय तेखर सेती पंदरा दिन पितर मन के मान गौन कर असीस लेथन।पितर मन ला बिदा करे के बाद आथे नवरात। नव दिन के परब मा दुर्गा दाई के नव रुप के पूजा करे जाथे।

                कुँवार के महीना मा प्रकृति अपन सबले सुंदर रुप मा रहिथे । चारों कोती  भुइँया हरियर रहिथे। खेत के धान हा छटके लगथे । भादों के करिया बादर लहुटे लगथे । दूरिहा ले मेढ़ खार मा फूले उज्जर काशी मुस्काथे । सावन भादों रात दिन काम बुता कर किसान थोरिक सुसताय लगथे इही बेरा मा नवरात आथे। नवरात के नव दिन दाई के नव रुप शैलपुत्री, ब्रम्हचारणी,चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी अउ सिद्धिदात्री के पूजा करे जाथे।

                  देखे जाय ता प्रकृति जेमा हम सब झिन रहिथन  शक्तिच आय अउ शक्ति ला नारी रुप माने गय हे। शक्ति के पूजा माने प्रकृति पूजा। महतारी जेहर हमला जनम दिहिस, जेन भुइँया मा खेलेंन , अन्न जेला खाथन,, तरिया नदियाँ के पानी से पियास बुझाथन। बरखा जेहर सब ला जिनगी देथे ,सबो नारी रुप मा माने गय हे। देवी या शक्ति जेला हमन कहिथन प्रकृतिच आय अउ प्रकृति दाई के हमर उपर अब्बड़ करजा हे ।

प्रकृति शक्ति आय अउ शक्ति प्रकृति आय। पर मूरख मनुज अपन सुआरथ बर प्रकृति के नास करत हे । रुख राई काटके नवा शहर बसात हे , नदियाँ नरवा ला दूषित करत हे । बेरा बेरा मा प्रकृति दाई हमला चेतावत घलौ हे फेर हम ओखर इशारा नइ समझत हन या समझना नइ चाहत हन।

शक्ति उपासक देश मा शक्ति रुप प्रकृति के उपेक्षा होवत हे। येखर पहिली के प्रकृति दाई अपन काल रात्रि रुप मा आवय अउ सास्त्र मा बरनन करे गय परलय आवय ये नवरात शक्ति रुप मा प्रकृति के पूजा करीन  ओला उजरे ले बचावन। हर बछर रुख राई लगा सेवा करिन , दूसर जीव बर करुना के भाव रखन तभे देवी पूजा सफल होही ।

           हे शक्ति रुप प्रकृति दाई हमला असीस दे तोर कोरा मा सब झन सुख शांति  सद्भाव ले रहिन।

आलेख -          
चित्रा श्रीवास         
दीपका कोरबा, छत्तीसगढ़