Sunday, 25 February 2024

सुरता// 'का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल' के पाछू के दर्शन...


 

सुरता//

'का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल' के पाछू के दर्शन...

    छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के मयारुक मन सुप्रसिद्ध गायक रहे केदार यादव के गाये ए लोकप्रिय गीत- "का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल, तोर होगे आती अउ मोर होगे जाती, रेंगते- रेंगत आंखी मार दिए ना..." 

   एला जरूर सुने होहीं अउ घनघोर सिंगारिक गीत के सुरता करत मन भर मुसकाए होहीं. फेर ए गीत के रचयिता लोककवि बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' जी एला का कल्पना कर के कइसन संदर्भ म लिखे रिहिन हें. एला जानहू, त परमानंद जी के कल्पना अउ ओकर गहराई के कायल हो जाहू.

    बात सन् 1989-90 के आय. तब मैं छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के प्रकाशन-संपादन करत रेहेंव. एक दिन रायगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. बलदेव जी के मोर जगा सोर पहुंचिस के हमन लोककवि बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' जी संग भेंट करे बर रायपुर आवत हन. तहूं तइयार रहिबे. काबर ते हमन वोकर घर ल देखे नइ अन, तहीं हमन ल वोकर घर लेगबे. 

   निश्चित दिन 9 जनवरी 1990 के डाॅ. बलदेव जी रायगढ़ के ही एक अउ साहित्यकार रामलाल निषादराज जी संग रायपुर पहुँचगें. इहाँ रायपुर म आकाशवाणी म कार्यरत खगेश्वर प्रसाद यादव अउ मैं उंकर संग संघर गेंन. मोर बचपन रायपुर के कंकालीपारा, अमीनपारा आदि म ही बीते हे, तेकर सेती परमानंद जी के महामाई पारा वाले घर मैं कतकों बेर गे रेहेंव. 

     सबो साहित्यकार मनला लेके परमानंद जी के घर गेन. उहाँ आदर-सत्कार अउ चिन-चिन्हार के बाद साहित्यिक गोठ-बात चालू होइस. सब तो बढ़िया चलत रिहिस. तभे डाॅ. बलदेव जी थोक मुस्कावत, मजा ले असन पूछ परिन- 'परमानंद जी! का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल' जइसन गीत ल आप कब लिखे रेहेव?

   तब परमानंद जी डाॅ. बलदेव के मनसा भरम ल टमड़ डारिन, अउ घर के दुवारी कोती ल झांक के आरो दिन- 'ए गियां आ तो..' उंकर बुलउवा म एक चउदा-पंदरा बछर के चंदा बरोबर सुग्घर नोनी ओकर आगू म आके ठाढ़ होगे, अउ कहिस- 'काये बबा' तब परमानंद जी अपन उही नतनीन डहर इसारा करत कहिन- 'इही वो गियां आय. जे दिन ए ह ए धरती म आइस, उही दिन ए गीत ल लिखे रेहेंव. 'तोर होगे आती अउ मोर होगे जाती, रेंगते-रेंगत आंखी मार दिए गोंदा फूल'. 

   वो नोनी छी: बबा कहिके घर म खुसरगे. तब परमानंद जी के निरमल हांसी घर-अंगना के संगे-संग हमरो मनके चेहरा म बगर गेइस. उन कहिन- 'डाॅक्टर साहेब, कवि के जाए के बेरा होवत हे, अउ आगू म उन्मत्त प्रकृति हे, उद्दाम कविता के रूप म दंग-दंग ले खड़ा हो गिस.'

     घनघोर सिंगारिक गीत कस लागत ए रचना के मूल म कतका निर्दोष अउ उज्जवल भाव. हमर जइसन आम कवि-लेखक मन के कल्पना ले बाहिर के दृश्य आय. 

    परमानंद जी आगू कहिन- 'नारी सौंदर्य अउ प्रेम बरनन म मैं ह ओकर प्राकृतिक स्वरूप ल जरूर अपनाय हौं, फेर शिथिलता ल कभू स्थान नइ दे हौं... आज तो हमर बड़े कवि मन घलो सीमा लांघ जाथें डाॅक्टर साहेब, सारी-सखा तो बेटी बरोबर होथे, फेर वोकर बरनन म बनेच मजाक होगे हे. शायद उंकर इशारा- ' मोर सारी परम पियारी' जइसन लोकप्रिय सिंगारिक रचना डहर रिहिस.

( ए प्रसंग संग संलग्न चित्र उही दिन के आय, जेमा नीचे म डेरी डहर ले- डॉ. बलदेव साव, बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' अउ रामलाल निषादराज. पाछू म खड़े- खगेश्वर प्रसाद यादव अउ मैं सुशील वर्मा 'भोले')

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी

 “विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी


घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध - तइहा के जमाना के हाना आय। अब हमन नँगत हुसियार हो गे हन, गाँव ला छोड़ के शहर आएन, शहर ला छोड़ के महानगर अउ महानगर ला छोड़ के बिदेस मा जा के ठियाँ खोजत हन। जउन मन बिदेस नइ जा सकिन तउन मन विदेसी संस्कृति ला अपनाए बर मरे जात हें। बिदेसी चैनल, बिदेसी अत्तर, बिदेसी पहिनावा, बिदेसी जिनिस अउ बिदेसी तिहार, बिदेसी दिवस वगैरा वगैरा। जउन मन न बिदेस जा पाइन, न बिदेसी झाँसा मा आइन तउन मन ला देहाती के दर्जा मिलगे।


हमन दू ठन दिवस ला जानत रहेन - स्वतंत्रता दिवस अउ गणतन्त्र दिवस। आज वेलेंटाइन दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, राजभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस अउ न जाने का का दिवस के नाम सुने मा आवत हे। ये सोच के हमू मन झपावत हन कि कोनो हम ला देहाती झन समझे। काबर मनावत हन ? कोन जानी, फेर सबो मनावत हें त हमू मनावत हन। बैनर बना के, फोटू खिंचा के फेसबुक मा डारबो तभे तो सभ्य, पढ़े लिखे अउ प्रगतिशील माने जाबो।


एक पढ़े लिखे संगवारी ला पूछ पारेंव कि विश्व मातृ दिवस का होथे ? एला दुनिया भर मा काबर मनाथें? वो हर कहिस - मोला पूछे त पूछे अउ कोनो मेर झन पूछ्बे, तोला देहाती कहीं। आज हमन ला जागरूक होना हे। जम्मो नवा नवा बात के जानकारी रखना हे। जमाना के संग चलना हे। लम्बा चौड़ा भाषण झाड़ दिस फेर ये नइ बताइस कि विश्व मातृ दिवस काबर मनाथे। फेर सोचेंव कि महूँ अपन नाम पढ़े लिखे मा दर्ज करा लेथंव।

फेसबुक मा कुछु काहीं लिख के डार देथंव। 


भाषा ला जिंदा रखे बर बोलने वाला चाही। खाली किताब अउ ग्रंथ मा छपे ले भाषा जिंदा नइ रहि सके। पथरा मा लिखे कतको लेख मन पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा हें फेर वो भाषा नँदा गेहे। पाली, प्राकृत अउ संस्कृत के कतको ग्रंथ मिल जाहीं फेर यहू भाषा मन आज नँदा गे हें  । माने किताब मा छपे ले भाषा जिन्दा नइ रहि सके, वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही।


भाषा नँदाए के बहुत अकन कारण हो सकथे। नवा पीढ़ी के मनखे अपन पुरखा के भाषा ला छोड़ के दूसर भाषा ला अपनाही तो भाषा नँदा सकथे। रोजी रोटी के चक्कर मा अपन गाँव छोड़ के दूसर प्रदेश जाए ले घलो भाषा के बोलइया मन कम होवत जाथें अउ भाषा नँदा सकथे। बिदेसी आक्रमण के कारण जब बिदेसी के राज होथे तभो भाषा नँदा सकथे। कारण कुछु हो, जब मनखे अपन भाषा के प्रयोग करना छोड़ देथे, भाषा नँदा जाथे। 


छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर घलो खतरा मंडरावत हे। समय रहत ले अगर नइ चेतबो त छत्तीसगढ़ी भाषा घलो नँदा सकथे। छत्तीसगढ़ी भाषा के बोलने वाला मन छत्तीसगढ़ मा हें, खास कर के गाँव वाले मन एला जिंदा रखिन हें। शहर मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के बोलबाला हे। शहर मा लोगन छत्तीसगढ़ी बोले बर झिझकथें कि कोनो कहूँ देहाती झन बोल दे। छत्तीसगढ़ी के संग देहाती के ठप्पा काबर लगे हे ? कोन ह लगाइस ? आने भाषा बोलइया मन तो छत्तीसगढ़ी भाषा ला नइ समझें, ओमन का ठप्पा लगाहीं ? कहूँ न कहूँ ये ठप्पा लगाए बर हमीं मन जिम्मेदार हवन। 


हम अपन महतारी भाषा गोठियाए मा गरब नइ करन। हमर छाती नइ फूलय। अपन भीतर हीनता ला पाल डारे हन। जब भाषा के अस्मिता के बात आथे तब तुरंत दूसर ला दोष दे देथन। सरकार के जवाबदारी बता के बुचक जाथन। सरकार ह काय करही ? ज्यादा से ज्यादा स्कूल के पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी लागू कर दिही। छत्तीसगढ़ी लइका मन के किताब मा आ जाही। मानकीकरण करा दिही। का अतके उदिम ले छत्तीसगढ़ी अमर हो जाही?


मँय पहिलिच बता चुके हँव कि किताब मा छपे ले कोनो भाषा जिंदा नइ रहि सके, भाषा ला जिन्दा रखे बर वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही। किताब के भाषा, ज्ञान बढ़ा सकथे, जानकारी दे सकथे, आनंद दे सकथे फेर भाषा ला जिन्दा नइ रख सके। मनखे मरे के बादे मुर्दा नइ होवय, जीयत जागत मा घलो मुर्दा बन जाथे। जेकर छाती मा अपन देश बर गौरव नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन गाँव के गरब नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन समाज बर सम्मान नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन भाषा बर मया नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर स्वाभिमान मर गेहे, तउन मनखे मुर्दा आय। 

जउन मन अपन छत्तीसगढ़िया होए के गरब करथें, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाए मा हीनता महसूस नइ करें तउने मन एला जिन्दा रख पाहीं। 


अइसनो बात नइये कि सरकार के कोनो जवाबदारी नइये। सरकार ला चाही कि छत्तीसगढ़ी ला अपन कामकाज के भाषा बनाए। स्कूली पाठ्यक्रम मा एक भाषा के रूप मा छत्तीसगढ़ी ला अनिवार्य करे। अइसन करे ले छत्तीसगढ़ी बर एक वातावरण तैयार होही। शहर मा घलो हीनता के भाव खतम होही। छत्तीसगढ़ी ला रोजगार मूलक बनावय। रोजगार बर पलायन, भाषा के नँदाए के एक बहुत बड़े कारण आय। इहाँ के प्रतिभा ला इहें रोजगार मिल जाही तो वो दूसर देश या प्रदेश काबर जाही? छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार, लोक कलाकार ला उचित सम्मान देवय, उनकर आर्थिक विकास बर सार्थक योजना बनावय।


छत्तीसगढ़ी भाव-सम्प्रेषण बर बहुत सम्पन्न भाषा आय। हमन ला एला सँवारना चाही। अनगढ़ता, अस्मिता के पहचान नइ होवय। भाषा के रूप अलग-अलग होथे। बोलचाल के भाषा के रूप अलग होथे, सरकारी कामकाज के भाषा के रूप अलग होथे अउ साहित्य के भाषा के रूप अलग होथे। बोलचाल बर अउ साहित्यिक सिरजन बर मानकीकरण के जरूरत नइ पड़य, इहाँ भाषा स्वतंत्र रहिथे फेर सरकारी कामकाज बर भाषा के मानकीकरण अनिवार्य होथे। मानकीकरण के काम बर घलो ज्यादा विद्वता के जरूरत नइये, भाषा के जमीनी कार्यकर्ता, साहित्यकार मन घलो मानकीकरण करे बर सक्षम हें।


सरकार छत्तीसगढ़ी बर जो कुछ भी करही वो एक सहयोग रही लेकिन छत्तीसगढ़ी ला समृद्ध करे के अउ जिन्दा रखे के जवाबदारी असली मा छत्तीसगढ़िया मन के रही। यहू ला झन भुलावव कि जब भाषा मरथे तब भाषा के संगेसंग संस्कृति घलो मर जाथे।


“स्वाभिमान जगावव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियावव”


*लेखक - अरुण कुमार निगम*


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21 फरवरी - अंतर्राष्ट्रीय महतारी भाषा दिवस म विशेष साहित्य म नारी शक्ति के योगदान

 21 फरवरी -  अंतर्राष्ट्रीय महतारी भाषा दिवस म विशेष 


साहित्य म नारी शक्ति के योगदान 


महतारी भाषा ह दाई के दूध कस अमरीत बरोबर होथे। अपन भाषा म गोठियाय अउ लिखे ले वो भाषा ह समृद्ध होथे। अपन महतारी भाषा म गोठियाय अउ लिखे ले हिरदे ल

जउन उछाह मिलथे वोहा आने भाषा म नइ मिलय। आने भाषा ल सीखना बने बात हे पर अपन महतारी भाषा ल कभू नइ भूलना चाही। जउन मन अपन महतारी भाषा ल भुला जाथे वोमन धीरे ले अपन संस्कृति, संस्कार अउ सभ्यता ले घलो दूर हो जाथे। महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अउ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संगे संग कतको महापुरुष अउ बुधियार साहित्यकार मन महतारी भाषा म शिक्षा देय के समर्थन करे हावय। जउन

भाषा ल नइ बउरे जाय वोहा एक न एक दिन नंदा जाथे। 



साहित्य ल समाज के दर्पन कहे जाथे। साहित्य के बारे म कहे गे हावय कि तोप अउ तलवार ले जादा साहित्य म जादा सक्ति होथे।  वो देस मुर्दा जइसे होथे जिहां साहित्य नइ हे।  इतिहास ले जानकारी होथे कि साहित्य अउ अखबार के बदउलत कतको देस के बेवस्था म बदलाव घलो होय हे। साहित्य म सबके हित छुपे रहिथे। जउन साहित्य म सुघ्घर संदेश रहिथे उही ह निक साहित्य हरे। जउन साहित्य ह लोगन मन ल बुराई डहन ढकेल देथे वोहा उथला साहित्य माने जाथे। 

   साहित्य  म पुरुष मन के संगे -संग नारी शक्ति के अब्बड़ योगदान हावय। नारी शक्ति मन अपन निक लेखनी ले साहित्य जगत  ल समृद्ध करे हावय। एक कोति नारी शक्ति मन कतको सामाजिक बुराई मन उपर कलम चलाके समाज अउ देस ल सुधारे बर सुघ्घर उदिम करे हावय त दूसर कोति स्त्री विमर्श पर कलम चला के नारी समाज के दयनीय दसा ल सुधारे बर समाज अउ देस के मुखिया मन के आंखी ल उघारे के काम करे हावय। त आवव वो नारी शक्ति मन के सुरता करथन जउन मन अपन कलम के ताकत दिखाय हे। जिंकर मन के लेखनी ह समाज अउ देस के बेवस्था ल बदल दिस। जिंकर मन के सुघ्घर लेखनी ले साहित्य के ढाबा ह लबालब भरे हावय।


    कृष्ण प्रेम म डूबे मीरा बाई के गिनती हमर देस के महान महिला साहित्यकार म होथे।  मीरा बाई भक्ति काल के कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख रचनाकार म सामिल हे।महान संत रैदास उंकर गुरु रिहिन। भगवान कृष्ण उपर कतको पद के रचना करिन हे। नरसी जी का मायरा उंकर आख्यानक काव्य हरे। उंकर रचना म गीत गोविंद टीका,रंग गोविंद,राग सोरठ ( पद संग्रह) सामिल हे।सरोजिनी नायडू ह अंग्रेजी म रचना करिन। उंकर सुघ्घर रचना खातिर महात्मा गांधी जी ह वोला "भारत कोकिला" के उपाधि ले सम्मानित करिन।

अमृता प्रीतम हिंदी अउ पंजाबी म अपन लेखनी लेअपन एक अलग छाप छोड़िस।उंकर" पिंजर में " कहानी म भारत के बंटवारा के समय के स्थिति के मार्मिक बरनन करे गे हावय। शिवानी के उपन्यास अउ कहानी म कुमाऊं अंचल के संस्कृति झलकथे।


   आधुनिक मीरा के नांव ले प्रसिद्ध महादेवी वर्मा के गिनती छायावाद के  चार प्रमुख रचनाकार के रूप म होथे।उंकर रचना म  नीहार, रश्मि,नीरजा,आत्मिका, परिक्रमा,संधिनी, यामा,गीत पर्व,दीप गीत, स्मारिका, नीलांबरा के अब्बड़ सोर हे। उंकर निबंध म भारतीय संस्कृति के स्वर संकल्पिता, संस्मरण म " पथ के साथी", रेखा चित्र म " अतीत के चलचित्र",सुभद्रा कुमारी चौहान के रचना( आख्यानक काव्य)- खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी.... के सुघ्घर सोर बगरे हे। उंकर कहानी म बिखरे मोती,उन्मादिनी अउ काव्य रचना म मुकुल, त्रिधारा सम्मिलित हे।अइसने बंग महिला ( दुलाईवाली),महाश्वेता देवी, मन्नू भंडारी के उपन्यास म एक इंच मुस्कान,आपका बंटी,महाभोज अउ स्वामी अउ कहानी म मैं हार गई,रानी मां का चबूतराअउ आत्मकथा म "एक कहानी यह भी") के सोर होइस।

।शोभा डे, मृणाल पांडे( कहानी -एक स्त्री का बिदा गीत, शब्द बेधी,दरम्यान)मृदुला गर्ग, मृदुला सिन्हा के उपन्यास ज्यों मेंहदी के रंग,अंजुम हसन,इंदिरा , कृष्णा अग्निहोत्री,चित्रा मुद्गल( कहानी- जहर ठहरा हुआ), बंग महिला ( दुलाईवाली), सूर्यबाला ( गृह प्रवेश),शिवानी (लाल हवेली), कृष्णा सोबती ( सिक्का बदल गया),  उषा प्रियंवदा ( वापसी), ममता कालिया,डा. वीणा सिन्हा, मैत्रेयी पुष्पा यात्रा वृत्तांत- अगन पांखी, कहानी -अब फूल नहीं खिलते),इंदिरा मिश्रा, इंदिरा राय, डा. कृष्णा अग्निहोत्री ( जीना मरना), वासंती मिश्रा ( मेरी स्मरण यात्रा), मालती जोशी,मेहरून्निसा परवेज,अनिता सभरवाल, उर्मिला शिरीष,स्वाति तिवारी,रेखा कस्तवार,अल्पना मिश्रा, 


इस्मत चुगताई,निर्मला देशपांडे,सुनीता देशपांडे,लीला मजूमदार, अरूंधति राय, तसलीमा नसरीन , शम्पा शाह, वंदना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, इंदिरा दांगी जइसन कतको विदुषी साहित्यकार मन के सुघ्घर लेखनी के कारन साहित्य जगत म अब्बड़ पहिचान हावय।


 हमर छत्तीसगढ के नारी शक्ति मन  पोठ लेखनी के माध्यम ले साहित्य जगत म अपन एक अलगे पहिचान बनाय म सफल होय हे। छत्तीसगढ़ के सोना बाई के नांव ले प्रसिद्ध डा.निरुपमा शर्मा हमर छत्तीसगढ के पहिली कवयित्री माने जाथे।उंकर कविता  संग्रह म "पतरेंगी" रितु बरनन, दाई खेलन दे अउ" बूंदो का सागर" सामिल हे।  निबंध संग्रह म इन्द्रधनुषी छत्तीसगढ़, डा. सत्यभामा आडिल ह छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी म दूनों म कलम चलाय हे। उंकर छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह म गोठ,ठीहा, रतिहा पहागे अउ हिंदी काव्य संग्रह म नर्मदा की ओर,काला सूरज, नि: शब्द, उपन्यास म प्रेरणा बिंदु से निर्वेद तट तक, यात्रा कथा म पहाड़ की ढलान से समुंद्र की सतह पर , रेडियो रूपक म एक पुरुष , चंपू काव्य म दस्तक देता सूरज सम्मिलित हावय।


डा . सुधा वर्मा ह छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी म पोठ साहित्य के रचना करे हावय। उंकर छत्तीसगढ़ी रचना मन म उपन्यास - बन के चंदैनी, तरिया के आंसू,  काव्य संग्रह म कइसे हस धरती, कहानी संग्रह म धनबहार के छांव म, निबंध संग्रह म बरवट के गोठ,परिया धरती के सिंगार अउ तरिया के आंसू, नाटक म श्रीरामचरितमानस सामिल हावय। आप मन अरबी लोककथा के अनुवाद करे हौ। हिंदी काव्य संग्रह म क्षितिज के पार,नदी के किनारों का परिणय, कहानी संग्रह म मुन्नी का पौधा, संस्मरण म" वे दिन भी अपने थे," चित्रकथा म डा. खूबचंद बघेल, छत्तीसगढ़ अउ हिंदी काव्य संग्रह म कोख म बसेरा के सुघ्घर सोर बगरिस। देशबंधु के मड़ई अंक के संपादक हौ।


शरला शर्मा के  छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी  म दर्जनभर रचना प्रकाशित हो चुके हे। उंकर छत्तीसगढ़ी रचना म  -आखर के अरघ ( निबंध),  सुन संगवारी ( कविता, कहानी, निबंध), सुरता के बादर ( संस्मरण), माटी के मितान ( उपन्यास) अउ हिंदी म पंडवानी और तीजन बाई ( व्यक्ति परिचय), बहुरंगी ( निबंध संग्रह), वनमाला ( काव्य संग्रह) अउ कुसुमकथा ( उपन्यास) जइसे पोठ साहित्य हे। 

शकुंतला तरार ह  त्रैमासिक पत्रिका नारी संबल के संपादन करिन। नव साक्षर मन बर लघु पुस्तक बन कैना अउ "बेटिया छत्तीसगढ़ की" प्रकाशित होइस। उंकर हिंदी काव्य संग्रह के नांव "मेरा अपना बस्तर"हे।



शकुंतला शर्मा छत्तीसगढ़ी के संगे संग हिंदी म अब्बड़ कलम चलाय हे। उंकर छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह म चंदा के छांव म,चन्दन,कोसला,  महाकाव्य म कुमार संभव, लघुकथा म करगा, छंद काव्य संग्रह म "छंद के छटा "अउ गजल संग्रह म बूड़ मरय नहकौनी दय के सुघ्घर सोर हे। आप मन के हिंदी म दर्जनभर के करीब काव्य संग्रह, बेटी बचाओ, महाकाव्य अउ निबंध संग्रह प्रकाशित हो चुके हे।

शकुंतला वर्मा के "छत्तीसगढ़ी लोक जीवन और लोक साहित्य का अध्ययन",( शोध ग्रंथ),संतोष झांझी के हिंदी काव्य संग्रह म हथेलियों से फिसलता इन्द्रधनुष,डा. उर्मिला शुक्ला के छत्तीसगढ़ी रचना छत्तीसगढ़ के अउरत ( काव्य संग्रह), महाभारत म दुरपति (खंडकाव्य), गोदना के फूल ( कहानी संग्रह) के संगे संग हिंदी म इक्कीसवीं सदी के द्वार पर ( काव्य संग्रह), गुलमोहर ( गजल संग्रह) , अपने- अपने  मोर्चे पर ( कहानी संग्रह) अउ आलोचना म छत्तीसगढ़ी संस्कृति और हिंदी कथा साहित्य प्रकाशित होय हे।


, गीता शर्मा ह संस्कृत महाकाव्य शिवमहापुराण अउ इशादि नौ उपनिषद् के छत्तीसगढ़ी म गद्य अनुवाद करे हावय।  वसंती वर्मा हछत्तीसगढ़ी म सुघ्घर रचना करे हे। उंकर छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह म मोर अंगना के फूल, मितानिन अउ मउरे मोर आमा के डारा सामिल हावय। आप मन के छंदबद्ध रचना बर घलो अब्बड़ सोर हे।

डा. शैल चंद्रा के छत्तीसगढ़ी लघु कथा संग्रह म गुड़ी अब सुन्ना होगे अउ हिंदी रचना म विडंबना,घोंसला ( लघु कथा संग्रह), इक्कीसवीं सदी में भी ( काव्यसंग्रह), जुनून और अन्य कहानियां ( कहानी संग्रह) के चर्चा होथे।  डा. अनसूया अग्रवाल के छत्तीसगढ़ी रचना म छत्तीसगढ़ के ब्रत - तिहाउ अउ कथा - कहानी, छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियां अउ जन जीवन, हिंदी म नव साक्षर किताब मन म कहावतों की कहानियां अउ वसीयत, यात्रा वृत्तांत म "यात्रा द्वारिका धाम की" सामिल हावय। गिरिजा शर्मा ह संस्कृत म लिखे किताब कातिक महात्म के छत्तीसगढ़ी म गद्य अनुवाद करे हे। तुलसी देवी तिवारी के छत्तीसगढ़ी रचना म केजा ( कहानी संग्रह)अउ हिंदी रचना  म पिंजरा,मेला ठेला,परत दर परत, आखिर कब तक,सदर दरवाजा अउ उपन्यास म कमला अउ कहानी म शाम से पहले की स्याही सम्मिलित हे


अइसने हमर छत्तीसगढ के महिला साहित्यकार मन म डा . मीता अग्रवाल, डा . जयाभारती  चंद्राकर, डा. कल्याणी महापात्र, डा. शोभा श्रीवास्तव, ज्योति गभेल , आशा देशमुख( छंद चंदैनी),शोभा मोहन श्रीवास्तव, जया जादवानी( उपन्यास-तत्वमसि, कहानी- समंदर में सूखती नदी,आर्मीनिया की गुफा), अर्चना पाठक, वंदना केंगरानी,शांति यदु, स्नेहलता मोहनीश, आभा श्रीवास्तव,आभा दुबे,विद्या गुप्ता,जनक दुर्गवी,पूनम वासम,ऋचा रथ, गायत्री शुक्ला,शोभा निगम,सुमन मिश्रा, दुर्गा हाकरे, इंद्रा राय(कहानी-तुम इतनी अच्छी क्यों थी),कुंतल गोयल, मृदुला सिंह, विश्वासी एक्का,अनामिका सिंह, गुरप्रीत कौर चमन,


आशा झा,डा. वीणा सिंह, हंसा शुक्ला,लता शर्मा,लता राठौड़, केंवरा यदु, शशि साहू, संगीता वर्मा,नीरमणि श्रीवास,सरोज कंसारी, इन्द्राणी साहू सांची(  छंदबद्ध रचना -सांची साधना),द्रोपदी साहू सरसिज, पदमा साहू पर्वणी, नीलम जायसवाल,शुचि भवि( छंद फुलवारी),धनेश्वरी गुल,(बरवै छंद कोठी, सवैया छन्द संग्रह, गुल की कुंडलियां),

रश्मि गुप्ता, मनोरमा चंद्रा,सुमित्रा कामड़िया,  चित्रा श्रीवास, गायत्री श्रीवास, प्रिया देवांगन प्रियू, शैल शर्म,माधवी गणवीर, जागृति सार्वा, शकुन शेंडे, शशि तिवारी महुआ, गीता विश्वकर्मा,निशा तिवारी, संतोषी महंत श्रद्धा, संध्या राजपूत, सुजाता साहू प्राची साहू , धनेश्वरी साहू, केशरी साहू जइसन कतको नांव सम्मिलित हावय। छंदविद् अरूण कुमार निगम द्वारा संचालित आन लाइन गुरुकुल क्लास " छंद के छ" के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ के सैकड़ों प्रतिभा मन साहित्य के क्षेत्र म पोठ उदिम करत हावय जेमा कोरी भर ले जादा महिला साहित्यकार मन के नांव घलो सम्मिलित हावय।  छंद के छ परिवार ले जुड़े दर्जन भर महिला साहित्यकार मन के कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हे जिंकर साहित्य जगत म सुघ्घर तारीफ होय हे। त ये प्रकार ले हमन देखथन कि हमर देस अउ हमर छत्तीसगढ के नारी शक्ति मन साहित्य डहन अपन एक अलगे पहिचान बनाय हावय। साहित्य के सबो विधा म सुघ्घर कलम चलावत हे अउ साहित्य के माध्यम ले जन जागरन के अंजोर बगरावत हे। 

हमर महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर इंहां के  भाषाविद्,

बुधियार साहित्यकार, कुछ 

 अखबार के संपादक के संगे -संग कुछ व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक, ब्लाग, ई-पत्रिका मन ह सुघ्घर उदिम करत हे।  लोकाक्षर ग्रुप, छंद के छ परिवार, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग,आरूग चौरा,नंदन झांपी, कला परंपरा,मयारू माटी, गुरतुर गोठ, अरई तुतारी, हमर गंवई गांव, छत्तीसगढ़ी मान सरोवर, वक्ता साहित्य मंच,बाल साहित्यकार,  लोकाक्षर पत्रिका,देशबंधु के मड़ई , हरिभूमि के चौपाल, पत्रिका के पहट, अपन डेरा, विचार विथि , विचार विन्यास,सुघ्घर छत्तीसगढ़ के सुघ्घर साहित्य, लोक सदन के झांपी, खबर गंगा, चैनल इंडिया, छत्तीसगढ़ आस पास, साकेत स्मारिका सुरगी,अपन चिन्हारी, गुड़ी के गोठ ,लोक असर, कृति कला एवं साहित्य परिषद सीपत, भोरम देव साहित्य मंच कबीरधाम,  मधुर साहित्य परिषद बालोद,पुरवाही साहित्य समिति पाटेकोहरा, छुरिया सहित कतको माध्यम ले सुघ्घर उदिम चलत हे। हमर छत्तीसगढ के बुधियार साहित्यकार मन ह पद्म के संगे संग गद्य विधा म अपन कलम चला के छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करत हावय।

 


                 ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

                सुरगी, राजनांदगांव

आखर के अरघ




 आखर के अरघ 

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        छत्तीसगढ़ी भाषा , साहित्य , संस्कृति , कला के बढ़ोतरी बर जनम भर लगे रहइया प्रदीप कुमार वर्मा 18 फरवरी 2024 के रात हमन ल छोड़ के चल दिन ...जाए बर तो सबला हे फेर अइसे बिन कुछु कहे सुने जवाई हर बने बात नोहय जी ....तभो बिधि के बिधान ल तो कोनो टारे नइ सकयं।

    प्रदीप कुमार वर्मा के जनम सरफोंगी गांव मं 3 जून 1945 के दिन होए रहिस फेर उंकर गांव तो अर्जुनी बलौदा बजार रहिस । भिलाई इस्पात संयंत्र मं नौकरी रहिस त भिलाई मं रहत रहिन । आजकल विद्युत नगर दुर्ग मं बेटा प्रशांत बहू किरण संग रहत रहिन । 

     उंकर साहित्यिक अवदान ल सुरता करबो त पहिली कृति 'दुवारी' काव्य संग्रह , दूसर हे 'प्रेमदीप ', तीसर हे  'भांवर'  कहानी संग्रह ।  

" सूरत " संस्मरण आय ज़ेहर प्रकाशनाधीन हे । " आँखी के काजर "  ऑडियो , वीडियो , सी डी के रचनाकार प्रदीप कुमार वर्मा जी रहिन । 

    छत्तीसगढ़ी कला अउ संस्कृति के बढ़ोतरी बर उन " दौनापान " के स्थापना करे रहिन जेमा लगभग चालीस झन योगदान देहे रहिन । 

छत्तीसगढ़ी भाषा के उन्नयन बर विमल कुमार पाठक , मुकुंद कौशल संग कई ठन कार्यक्रम मं सक्रिय रहिन । वीणापाणि साहित्य समिति के अध्यक्ष , दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग के कोषाध्यक्ष रहिन । कुर्मी छात्रावास के पूर्व अध्यक्ष रहिन । सबले बड़े बात के 78 साल के उमर मं घलाय स्वस्थ , सक्रिय रहिन । 14 फरवरी 2024 के पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के अध्यक्ष रहिन । 

           दुख के बात के जेन एम्बुलेंस हर मनसे के जीव बंचाये बर सरपट अस्पताल डहर दौड़थे उही हर प्रदीप कुमार वर्मा जी के जीव ले लिस ...। 

 19 फरवरी के मंझनिया देंह के अंतिम संस्कार हो गिस ...फेर हमन तो उनला कभू भुलाए नइ संकन तेइ पाय के मैं लोकाक्षर मं प्रदीप भैया ल आखर के अरघ देवत हौं । 


सरला शर्मा

सुरता - श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक"*

 *सुरता - श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक"* 


पथिक जी के जनम जन्म 4 अगस्त 1937 के ग्राम मोहबट्टा मा होइस। इनकर पिताजी के नाम नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, माता जी के नाम अरुंधति देवी अग्रवाल अउ धर्मपत्नी के नाम निरूपण अग्रवाल हे।

 पथिक जी हिंदी और अर्थशास्त्र मा एम. ए. करे रहिन। उन मन  "साहित्य रत्न" के परीक्षा घलो पास करे रहिन। 

बी.एड. करे के बाद दुर्ग अउ विद्यालय मा अध्यापन के कार्य करिन। अगस्त 1995 मा बीएसपी कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला सेक्टर 2 भिलाई ले वरिष्ठ उप प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त होए रहिन। पथिक जी 15 फरवरी 2020 के हम सब ला छोड़ के ब्रह्मलीन होगिन।


पथिक जी सन 1956 ले लेखन प्रारंभ करे रहिन। अनेक कविसम्मेलन के मंच मा आप काव्य पाठ करे रहेव। दूरदर्शन अउ आकाशवाणी ले अनेक कविता प्रसारित होए रहिन। राष्ट्रीय प्रादेशिक अउ क्षेत्रीय पत्र-पत्रिका मन मा आपके रचना प्रकाशित होवत रहिन। कई काव्य संग्रह में रचनाएं संग्रहित।


पथिक जी के पहिली हिन्दी काव्य संग्रह "जले रक्त से दीप" 1970 मा प्रकाशित होए रहिस।  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" 2004 अउ 2009 मा प्रकाशित होइस। "काव्य यात्रा के 50 वर्ष" नाम के समीक्षात्मक पुस्तक 2011 मा प्रकाशित होइस। तेकर बाद "आही नवा अंजोर" नाम के  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह 2015 मा प्रकाशित होइस। 


उत्कृष्ट लेखन बर पथिक जी ला अनेक संस्था मन सम्मानित करे रहिन। जइसे - 

प्रयास प्रकाशन एवं जिला छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा साहित्य सम्मान 2004 

अधिक सम्मान छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायपुर 2008 

नारायण लाल परमार सम्मान धमतरी द्वारा प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर 2010 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग द्वारा जगदलपुर में साहित्य सम्मान 2010 दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग द्वारा आदर्श शिक्षक सम्मान 1999 एवं हिंदी दिवस पर शब्द साधक सम्मान 2001 सामुदायिक विकास विभाग भिलाई स्टील प्लांट भिलाई द्वारा साहित्य सम्मान 2002 स्टेट बैंक आफ इंडिया मुख्य शाखा दुर्ग द्वारा राजहरा सम्मान 2002 गायत्री प्रज्ञा पीठ आश्रम पुलगांव दुर्ग द्वारा प्रज्ञा प्रतिभा सम्मान 2010 गांधी विचार यात्रा के अंतर्गत ग्राम पारा में साहित्यिक सम्मान 2002 निवास शिक्षक नगर चिन्हारी सम्मान छत्तीसगढ़ साहित्य समिति दुर्ग द्वारा 2012 हीरालाल का उपाध्याय सम्मान रायपुर में सितंबर 2012


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर समान अधिकार रहिस। उँकर हिन्दी काव्य-संग्रह के कुछ पंक्ति मा उँकर शैली अउ श्रेष्ठता के सुग्घर परिचय मिल जाथे -   


जलें रक्त से दीप उठे ,बलिदानों की आरती।

उठो जवानो आज देश की धरती तुम्हें पुकारती ।।

(कविता - जलें रक्त से दीप के अंश)

 

हर सुबह यही लिखता सूरज का उजियारा 

संदेश सुनाता यही रात को हर तारा।

भारत का है कश्मीर सिर्फ भारत का है

लो घूम घूमकर पवन लगाता है नारा।

(कविता - अंगार उगलने लगी सुबह की लाली भी, के अंश) 


नौजवानों फिर हमें दी है चुनौती दुश्मनों ने 

फिर दिखा देंगे उन्हें क्या शौर्य है तूफान का 

मर मिटेंगे पर न देंगे हम कभी कश्मीर उनको 

जान ले संसार ही संकल्प हिंदुस्तान का 

(कविता - संकल्प हिंदुस्तान का, के अंश) 


*मुक्तक*


पसीने से लिखो साथी नए युग की कहानी 

दफन कर दो क्षमता की सभी बातें पुरानी 

हमारा देश मांगे रक्त या श्रम हम उसे देंगे 

बढ़ो आगे कहीं कल तक न ढल जाए जवानी ।।


*मुक्तक*


क्या पार हमारे भारत से टकराएगा 

क्या अंधकार सूरज से आँख मिलाएगा 

पाकिस्तानी शासन की अर्थी पर बैठे 

भुट्टो साहब क्या ढोलक रोज बजाएगा।।


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी चार डाँड़ के मुक्तक असन कविता खूब करंय। उनकर पड़ोस मा कोदूराम "दलित" जी के निवास रहिस। दलित जी उँकर चार डाँड़ के कविता ला "चारगोड़िया" नाम दे रहिन। पथिक जी ला छत्तीसगढ़ी-चारगोड़िया के प्रवर्तक माने जाथे। छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" ले एक चरगोड़िया - 


*छत्तीसगढ़ी चारगोड़िया*


एक जन्म के नाता ला तुम टोरौ झन

सुनता के सुग्घर बँधना ला छोरो झन

बसे बसाई अपन देसला फोरो झन

बिख महुरा अलगाववाद के घोरव झन।


*छत्तीसगढ़ी दोहा* - 


राजनीति ल देख लौ, आजादी के बाद

संसद म टूटत हवै, संसद के मरयाद।।


ये मंदिर कानून के, बनिस अखाड़ा आज

मल्ल युद्ध नेता करें, देखे सकल समाज।।


हंगामा के होत हे, संसद म बरसात

धक्का मुक्की तो उहाँ, हे मामूली बात


*छत्तीसगढ़ी गजल*


गाँव सो कर मया दुलार संगी

गाँव चल देख खेतखार संगी।

देख आमा बगइचा के शोभा

धान के खेत कोठार संगी।। 

तैं गरीबी अउ अशिक्षा ला

देखबे गांव म हमार संगी।


*छत्तीसगढ़ी कविता*


कुर्सी फेंक, माइक टोर

अउ ककरो मूड़ी ल फोर

राजनीति म रोटी सेंक

पद अउ पइसा दुनों बटोर।

अतको म नइ काम बनय तौ

कालिख पोत दाँत निपोर

इही असीम ले हमर देश मा

जल्दी आही नवा अँजोर।


 आज चतुर्थ पुण्यतिथि मा छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर के श्रद्धांजलि


*आलेख - अरुण कुमार निगम*

बसंत पंचमी*

 *बसंत पंचमी*


      

    माघ महिना के उज्जर पाख के पंचमी के दिन ला बसंत पंचमी कहे जाथे ।इही दिन ले ऋतु मन के राजा बसंत के राज हा प्रकृति मा सौहत दिखथे।बगीचा मा कोयली  कुहू कुहू कुहके लागथे।ओखर बोली कान मा रस घोरथे।खेत खार मा परसा फूले ला धर लेथे जेहा अइसे दिखथे  जइसे दरपन देखत माँघ भरे के बेर कोखरो हाथ ले बंदन हा छिटक गय हे।

सेम्हर के फूल हा दहकत अँगरा कस लागथे। मौरे आमा खुलखुल ले हाँसत नवा बहूरिया कस दिखथे।पींयर सरसों

ला देख मन घलौ बासंती हो जाथे।कचनार, गुलाब  के फूल मन ला मोहथे अउ मन कहिथे अब आगे बसंत।


         ये दिन हा सरस्वती देवी के प्रगटे के दिन घलौ आय।सरस्वती देवी ला बुद्धि ,ज्ञान, कला ,साहित्य ,संगीत के अधिष्ठात्री देवी माने गय हे। येही कारण आय की कला साहित्य ,सूर ,संगीत के साधक मन आज के दिन माँ शारदा के कृपा पाये बर ऊँखर आराधना  करथें।विद्यार्थी मन बर घलौ आज के दिन के अबड़े महत्तम हावे ज्ञान के देवी ले ज्ञान के वरदान माँगे के दिन।जब हम स्कूल मे पढ़न तब बड़ धूमधाम ले स्कूल मा सरस्वती दाई के पूजा पाठ करन। कोंडागाँव मा तो बसंत पंचमी के दिन हा तिहार कस लागय काबर की उँहा स्कूल कॉलेज के सब छोटे बड़े नोनी लइकन मन लुगरा पहिर के जावन ।कई दिन पहिली ले बसंत पंचमी आवत हे कहिके मन हा कूहके लागय। मानव चेतना के तीन गुण सत ,रज अउ तम  माने गय हे जेमा सतोगुण के देवी ये माँ शारदा। शीतल ,सौम्य  जगत ला वाणी के वरदान देवइया।

           हम मनखे मन के आम जीवन मा ज्ञान

 के जरूरत हर क्षेत्र मा हावे। बिना ज्ञान के मनखे कुछु काम ला नई करे सकय।विषयगत ज्ञान ,कम्प्यूटर ज्ञान,सामान्य ज्ञान,कार्यक्षेत्र के ज्ञान सब मा तो ज्ञान के जरूरत हे।विज्ञान घलौ मा तो ज्ञान छुपे हावय बिना ज्ञान के विज्ञान कइसे हो सकत हे।

           *या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता।

            नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमो नमः।।



चित्रा  श्रीवास

बिलासपुर छत्तीसगढ़

बसन्त ऋतु :- जम्मों ऋतु मन मा बसंत ऋतु ला ऋतु मन के राजा माने जाथे एखर सेती एला ऋतुराज बसंत घलो कहिथे।

 बसन्त ऋतु :-


        जम्मों ऋतु मन मा बसंत ऋतु ला ऋतु मन के राजा माने जाथे एखर सेती एला ऋतुराज बसंत घलो कहिथे। 


          जाड़ के मौसम के बाद जब मार्च महिना आथे तब बसंत ऋतु के आगमन होथे। ये हा कड़ाके के ठण्ड ले राहत दिलाथे अउ ये मौसम मा न तो जादा ठण्ड होथे अउ न ही जादा गर्मी। ए ऋतु मा पेड़-पौधा मन मा नवा-नवा पाना - पतउवा आ जाथे, चारो कोती चिरई चुरगुन मन के मनमोहक आवाज सुनाई देथे। बसंत ऋतु मा प्रकृति के खूबसूरती बाढ़ जथे तेखर सेती एला जम्मों ऋतु मन के राजा कहे जाथे।


बंसत ऋतु के आगमन के दिन बंसत पंचमी के तिहार मनाए जाथे। बंसत पंचमी के दिन ज्ञान के देवी माता सरस्वती के जन्म दिवस घलो होथे। महाशिवरात्रि, होली, बैसाखी जइसे तिहार घलो इही ऋतु मा आथे अउ बड़े धूमधाम ले मनाए जाथे। बसंत ऋतु हा जम्मों प्राणी जगत मा एक नवा उर्जा के संचार घलो करथे अउ ये ऋतु हर सब ला पसंद हे।


    हमर देश मा फरवरी और मार्च महिना मा बसंत ऋतु हा आथे। बसंत ऋतु ला सब ऋतु मन के राजा या ऋतुराज बसंत घलो कहिथे। ये ऋतु के आय ले प्रकृति मा कई किसम के बदलाव देखे बर मिलथे। वृक्ष मन मा नवा पाना घलो आ जाथे  आमा के पेड़ मन मा बौर घलो लग जाथे, सरसों के खेत मन मा पींयर-पींयर सुग्घर फूल खिल उठथे। कोयली के कुहू-कुहू बोली बड़ सुग्घर लगथे। ये दिन मा आसमान एकदम साफ सुथरा दिखाई देथे अउ दिन मा चिरई चुरगुन सुग्घर उड़त दिखाई देथे अउ रात मा चंदा के चंदैनी मन घात सुग्घर दिखाई देथे।


   बसंत ऋतु के आय ले किसान मन के फसल घलो पके बर लग जथे। पेड़-पौधा जम्मों जीव-जंतु अउ मनुष्य ये मौसम मा जोश अउ उल्लास से भरे होथे। बसंत ऋतु बड़ सुग्घर सुहावना होथे। ये स्वास्थ्य बर घलो एक सुग्घर मौसम होथे काबर कि ये महिना मा वातावरण के तापमान सामान्य हो जथे। न जादा ठण्ड अउ न जादा गर्मी।


चारों कोती हरियाली छा जथे :- 


हरियाली कोन ला पसंद नइ हे अउ बसंत ऋतु तो एक अइसे ऋतु आय जउन खासतौर मा एखरे लिए जाने जाथे। ये मौसम मा रंग बिरंगा फूल प्रकृति के शोभा बढ़ाथे अउ हरा-भरा डार पान शाखा मन एक नवा जान भर देथे जेखर ले एखर सुंदरता सुग्घर बढ़ जाथे। ये मौसम मा चिरई मन खूब चहचहाथे, कोयली गुनगुनाथे अउ आसमान सुग्घर साफ सुथरा दिखाई देथे।


ये मौसम किसान मन बर बहुत उम्मीद ले भरे होथे काबर कि ये समय उँखर मन के फसल पके बर लग जथे अउ ओखर कटाई लुवाई के बेरा घलो हो जाथे। खेत मन मा लगे सरसो के फूल देखब मा बहुत सुंदर प्रतीत होथे। बाग- उपवन मन के सुघराई देखे के लायक होथे। पशु पक्षि मन बर बसंत अब्बड़ उपहार लेके आथे। इँखर मन बर पेड़ मन मा लगे हरियर हरियर पाना अउ स्वादिष्ट फल मन ला खाए के कतको विकल्प होथे। ये प्रकार वोमन ये मौसम के भरपूर आनन्द उठाथे।


सुहावना हो जाथे ये दिन :-


 हम सब  लोगन मन ला घलो ये बसंत ऋतु बहुत प्रिय होथे काबर कि शीत ऋतु के जाड़ भरे साँझ ला बिताय के बाद ये सुग्घर दिन आथे। अपन मन पसन्द हल्का कपड़ा पहन सकत हन अउ राहत भरे हवा के मजा उठा सकत हन। बसंत ऋतु के हर दिन सुग्घर सुहावना रहिथे, चारों कोती सुग्घराई दिखाई देथे। बाग बगीचा मन मा सुग्घर फूल खिल  के अपन पूर्ण आकार ले चुके होथे अउ ये दिन नवा उमंग ले भरे होथे।


     बसंत ऋतु हा कवि मन ला बड़ सुग्घर अनुभूति करथे जेखर ले प्रभावित होके वो मन एक ले बढ़के एक कविता मन के रचना करथे है। उँखर मस्तिष्क ये बखत जादा सृजनात्मक हो जथे काबर कि बसंत ऋतु के मौसम मा तन अउ मन दूनों ला बहुत सुग्घर अनुभूति होथे। जेखर ले दिमाग मा सुग्घर विचार मन के उत्पति होथे। 


एक रोला छंद देखव -


(बसंत बहार)-

देखौ छाय  बहार, आय  हे  गावत  गाना।

मन होगे खुश आज,देख के परसा पाना।।

फूले परसा  लाल, कोयली  बोलय  बानी।

गुरतुर लागे बोल,करौं का मँय अब रानी।।


एक जलहरण घनाक्षरी देखव -


(बसंत बहार)-

मन मोर  झुमें  नाचे, पड़की  परेवा बाचे,

लागथे  लगन  अब, शोर   बगराय बर।

परसा के फूल लाली,गोरी होगे मतवाली,

कुहके कोयलिया हा,जिवरा जलाय बर।।

आमा मउँर महके, जिवरा  घलो  बहके,

सरसो  पिँयर  सोहे, मन  ललचाय  बर।

हरियर     रुखराई,    चलतहे     पुरवाई,

आस ला बँधावत हे,मया ला जगाय बर।।


माता सरस्वती के जन्मदिन :- 


        बसंत ऋतु के बात हो अउ माता सरस्वती के सुरता न हो, बसंत पंचमी तो हम सब मनाथन काबर कि ये दिन माता सरस्वती के जन्म दिवस के रूप मा माने जाथे। जेला हर भारतीय एक पर्व के रूप मा मनाथे अउ विद्या के देवी माता सरस्वती ले स्वास्थ्य अउ अच्छा मस्तिष्क अउ ज्ञान के कामना करथे।


        ये दिन जघा-जघा  सरस्वती माता के मूर्ति घलो स्थापित करे जाथे। जेला बहुत ही पूरी आस्था के साथ सजाए जाथे अउ एखर 2 या 3 दिन बाद सुग्घर हर्ष अउ उल्लास ले लोगन मन के एक टोली नाचत कूदत गावत मूर्ति विसर्जन खातिर जाथे। ताकि माता अगले साल फिर आवय अउ हम सब ला आशीर्वाद देवय। बसंत पंचमी वाले दिन स्कूल अउ कॉलेज जवैया वाले विद्यार्थी मन पूरे भक्ति भाव ले माता सरस्वती के विशेष पूजा करथे ताकि माता सदैव उँखर ऊपर अपन कृपा दृष्टि बनाये रहै। ये दिन हिंदू धर्म मन बर बहुत महत्वपूर्ण होथे, पीला रंग सरस्वती माता के पसन्दीदा रंग आय एखर सेती बहुत से लोगन मन ये दिन पीला रंग के कपड़ा घलो धारण करथे।


       इही दिन होली के डाँड़ घलो गड़ाय जाथे। बसंत ऋतु मा होली के तिहार देश भर मा बड़ धूमधाम ले मनाय जाथे।



आलेख :-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)