Monday, 18 December 2023

4 दिसंबर पुण्यतिथि// पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा


 

4 दिसंबर पुण्यतिथि// 

पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा

      आज के नवा छत्तीसगढ़ म पंडवानी गायन ल एक बड़का विधा के रूप म देखे जाथे, माने जाथे अउ गाये घलोक जाथे। एकरे सेती आज एकर गायक-गायिका मनला पद्मश्री ले लेके कतकों अकन राष्ट्रीय अउ राज्य स्तर के सम्मान मिलत रहिथे। फेर ये बात ल कतका झन जानथें के ये विधा के जनमदाता कोन आय, ए विधा ल गावत कतका बछर बीत गये हे?


     आप मनला ये जान के सुखद आश्चर्य होही के नवा बने जिला बलौदाबाजार के गांव झीपन (रावन) के किसान मुडिय़ा राम वर्मा के  सुपुत्र के रूप म जनमे नारायण प्रसाद वर्मा ला ये पंडवानी विधा के जनमदाता होय के गौरव प्राप्त हे। वोमन गीता प्रेस गोरखपुर ले छपे सबल सिंह चौहान के किताब ले प्रेरित होके वोला इहां के लोकगीत मन संग संझार-मिंझार के पंडवानी के रूप म विकसित करीन।


    मोला नारायण प्रसाद जी के झीपन वाला घर म जाये अउ उंकर चौथा पीढ़ी के सदस्य संतोष अउ नीलेश के संगे-संग एक झन गुरुजी ईनू राम वर्मा के संग गोठबात करे के अवसर मिले हे। ईनू राम जी ह नारायण प्रसाद जी के जम्मो लेखा-सरेखा ल सकेले के बड़ सुघ्घर बुता करत हवय। संग म गांव के आने सियान मन संग घलोक मोर भेंट होइस, जे मन नारायण प्रसाद जी ल, उंकर कार्यक्रम ल देखे-सुने हवयं। उन बताइन के धारमिक प्रवृत्ति के नारायण प्रसाद जी सबल सिंह चौहान के संगे-संग अउ आने लेखक मन के किताब मनके घलोक खूब अध्ययन करयं, अउ उन सबके निचोड़ ल लेके वोला अपन पंडवानी के प्रस्तुति म संघारंय।


    पंडवानी शब्द के प्रचलन

नारायण प्रसाद जी ल लोगन भजनहा कहंय, ये हा ये बात के परमान आय के वो बखत तक पंडवानी शब्द के प्रचलन नइ हो पाये रिहिस हे।  पंडवानी शब्द के प्रचलन उंकर मन के बाद म चालू होय होही। काबर के आज तो अइसन जम्मो गायक-गायिका मनला पंडवानी गायक के संगे-संग अलग-अलग शाखा के गायक-गायिका के रूप म चिन्हारी करे जाथे। जइसे कापालिक शैली के या फेर वेदमती शाखा के गायक-गायिका के रूप म।


    नारायण प्रसाद जी अपन संग म एक सहयोगी घलोक राखयं, जेला आज हमन रागी के रूप म जानथन। रागी के रूप म उंकरेच गांव के भुवन सिंह वर्मा जी उंकर संग म राहंय, जउन खंजेरी बजा के उनला संग देवयं। अउ नारायण प्रसाद जी तबूंरा अउ करताल बजा के पंडवानी के गायन करंय। उंकर कार्यक्रम ल देख के अउ कतकों मनखे वइसने गाये के उदिम करंय, एमा सरसेनी गांव के रामचंद वर्मा के नांव ल प्रमुखता के साथ बताये जाथे। फेर उनला वो लोकप्रियता नइ मिल पाइस जेन नारायण प्रसाद जी ला मिलिस।


    रतिहा म गाये बर प्रतिबंध

नारायण प्रसाद जी के लोकप्रियता अतका जादा बाढग़े रिहिस हवय के उनला देखे-सुने खातिर लोगन दुरिहा-दुरिहा ले आवंय। जिहां उंकर कार्यक्रम होवय आसपास के गांव मन म खलप उजर जावय। एकरे सेती चोरी-हारी करइया मन के चांदी हो जावय। जेन रतिहा उंकर कार्यक्रम होवय वो रतिहा वो गांव म या आसपास के गांव म चोरी-हारी जरूर होवय। एकरे सेती उनला रतिहा म कार्यक्रम दे खातिर प्रतिबंध के सामना घलोक करना परीस। एकरे सेती उन पुलिस वाला मनके कहे म सिरिफ दिन म कार्यक्रम दे बर लागिन।


     एक मजेदार घटना के सुरता गांव वाले मन आजो करथें। बताथें के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र म उंकर कार्यक्रम चलत रिहिसे। उहों ले चोरी-हारी के शिकायत मिले लागिस। अंगरेज शासन के पुलिस वाले मन उनला ये कहिके थाना लेगें के वो ह कार्यक्रम के आड़ म खुद चोरी करवावत हे। बाद म असलियत ल जाने के बाद उनला छोड़ दिये गेइस। उन 18 दिन तक जेल (थाना) म रहिन, अउ पूरा 18 दिन उहाँ पंडवानी सुनाइन. तहाँ ले उनला छोड़ दिए गिस. जानबा राहय के उंकर पंडवानी के कार्यक्रम ह चारोंमुड़ा होवय, उन सबो डहर जावयं।


    प्रशासनिक क्षमता

नारायण प्रसाद जी एक उच्चकोटि के कलाकार अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम  के पुरोधा होय के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता रखने वाला मनखे घलोक रिहिन हें। उन अपन जिनगी के अखिरी सांस तक गांव पटेल के जि मेदारी ल निभावत रिहिन हें। एकर संगे-संग गांव म अउ कुछु भी बुता होवय त अगुवा के रूप म उन हमेशा आगू रहंय।


     लगातार 18 दिन तक कथापाठ

अइसे कहे जाथे के पंडवानी या महाभारत के कथा ल लगातार 18 दिन तक नइ करे जाय। एला जीवन के आखिरी घटना के संग जोड़े जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी ये धारणा ल झूठलावत अपन जिनगी म दू पइत ले 18-18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन हें। एक पइत जब उन शारीरिक रूप ले बने सांगर-मोंगर रिहिन हें, तब पूरा बाजा-गाजा के संग करे रिहिन हें, अउ दूसरइया बखत जब उंकर शरीर उमर के संग कमजोर परे ले धर लिये रिहिस हे, तब बिना संगीत के सिरिफ एकर वाचन भर करे रिहिन हें।


     अइसे बताये जाथे के पहिली बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करे रिहिन हवयं तब ये अफवाह फैल गे रिहिस हावय के ये 18 दिन के गायन के तुरते बाद उन समाधि ले लेहीं, एकरे सेती उन 18 दिन तक गायन करत हावंय। काबर ते अइसन गायन ल जीवन के अंतिम समय के घटना संग जोड़े के बात जनमानस म रिहिस हे। एकरे सेती उनला देखे के नाम से चारोंमुड़ा ले जनसैलाब उमड़ परे रिहिस हे।  दूसरइया बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन तेकर बाद उन खुदेच जादा दिन तक जी नइ पाइन, कुछ दिन के बाद ही उन ये नश्वर दुनिया ल छोड़ के सरग सिधार देइन।


   मठ अउ जनआस्था

हमर समाज म अइसे चलन हवय के घर-गिरहस्ती के जिनगी जीने वाला मनके देंह छोंड़े के बाद उनला मरघट्टी म  लेग के आखिरी क्रिया-करम कर दिये जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी के संग अइसन नइ होइस । उनला मरघट्टी  लेगे के बदला गांव के तरिया पार म मठ बना के ठउर दे गइस। अउ सिरिफ अतकेच भर नहीं उनला आने गांव-देंवता मन संग संघार लिये गइस। अब गांव म जब कभू तिहार-बार होथे त गांंव वाले मन आने देवी-देवता मन के संग म उंकरो मठ म दीया-बत्ती करथें, अउ उंकर ले गांव अउ घर खातिर सुख-समृद्धि मांगथें। अइसे कहे जाथे के सन् 1974 म 4 दिसंबर के जब उन सरग सिधारीन तब उंकर उमर करीब 80 बछर के रिहिस हवय। सियान मन बताथें के तिंवरा लुवई के बखत उन सरग लोक वासी होइन.


पारिवारिक स्थिति

नारायण प्रसाद जी के वंशवृक्ष के संबंध म जेन जानकारी मिले हे तेकर मुताबिक उंकर सियान के नांव मुडिय़ा राम वर्मा रिहिस हे। फेर नारायण प्रसाद जी, नारायण जी के बेटा होइस घनश्याम जी, अउ घनश्याम जी के बेटा होइस पदुम जी। पदुम जी के दू झन बेटा हवयं संतोष अउ निलेश जउन मन अभी घर के देखरेख करत हवंय।


इहां ये बताना जरूरी लागथे के नारायण प्रसाद जी के बेटा घनश्याम घलोक ह अपन सियान सहीं कथा वाचन करे के कोशिश करयं, फेर उन बिना संगीत के अइसन करंय। उंकर बाद के पीढ़ी म पंडवानी गायन या वाचन डहर कोनो किसम के झुकाव देखे ले नइ मिलिस। आज उंकर चौथा पीढ़ी के रूप म संतोष अउ निलेश हवंय, फेर इंकर पूरा बेरा सिरिफ खेती किसानी तक ही सीमित हे। एकरे सेती हमला नारायण प्रसाद जी के संबंध म वतका जानकारी नइ मिल पाइस, जतका मिलना रिहिस हे। कहूं उंकर वारिस मन घलोक ये रस्ता के रेंगइया रहितीन या लिखने-पढऩे वाला होतीन त पंडवानी के ये आदिगुरु आज लोगन के बीच अनचिन्हार बरोबर नइ रहितीन, पूरा देश-दुनिया म उंकर सोर-खबर रहितीस।


-सुशील भोले 

संजय नगर , रायपुर 

मो/व्हा. 9826992811

भाव पल्लवन-- चतुरा ल केकरा नइ चाबे।

 भाव पल्लवन--



चतुरा ल केकरा नइ चाबे।

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कोनो भी काम बुता ला सोच-समझ के थोकुन दिमाग लगा के करइया ला नुकसान उठाये ला नइ परय।ओहा अनचेतहा मा होवइया कष्ट ले तको बाँच जथे।केकरा ला चतुराई ले पकडे़ मा वो चाब नइ पावय।केकरा पकड़इहा हा वोकर धियान ला भटकाके अपन एक हाथ ला आगू कोती अइसे देखा के जना मना उही मा पकड़ही, दूसर हाथ ले पाछू कोती ले वोकर दूनो डाढ़ा ला चप ले चपक के पकड़ लेथे।केकरा बेचारा ये चतुराई ला समझ नइ पावय। कई झन तो केकरा ला पकड़े बर काड़ी ला वोकर आगू मा लाथें तहाँ ले केकरा हा कसके काड़ी ला दूनों डाढ़ा मा चाबत हँव कहिके जमिया लेथे।केकरा पकड़इहा मनखे हा समझ जथे के अब वो कामा चाबही तहाँ ले बिन खतरा के पकड लेथे। अब के जमाना मा तो केकरा पकड़े बर किसम-किसम के फाँदा उदगरित होगे हे।

  अइसनहें पहलवान मन, खेलाड़ी मन,राजनेता मन बुद्धि लगाके अइसे दाँव चलथें के विरोधी हा समझ झन पावय अउ वोला जीत मिल जवय। 

     कुछ मनखें अइसे चतुरा होथें के छल-कपट करत रथें। अपन उल्लू सीधा करे बर कोनो ल धोखा देवई ल अपन चतुराई समझथें। आनी-बानी के प्रपंच रचके सीधा-सादा मनखें मन ला मनमाड़े ठगत रहिथें। बाते-बात के अइसन जाल बुनथें के सीधा-सादा मनखें वोमा फँस जथें।अइसन चतुरा मन सहायता करत हँव कहिके उल्टा लूट लेथें। ये मन फ्राड होथें। फ्राडगिरी हा सँहराये के चतुराई नोहय भलुक बेइमानी के चिनहा अउ पाप करम आय।कतकोन नेता मन के वादा,व्यपारी मन के विज्ञापन अइसनहेच चतुराई होथे।

  कहे जाथे के --आदमी ला एकदमेच सीधा-सादा घलो नइ होना चाही ।अइसन जादा सिधई हा भोकवापन कहाये ला धर लेथे।सीधा पेड़ हा पहिली कटा जथे।तेकरे सेती सियान मन कहिथें-ये दुनिया के ठग-जग मन ले बाँचे बर समझदारी वाला  चतुरा होना जरूरी हे।जिनगी ला बने ठीक-ठाक चलाये बर,ठग-फुसारी ले बाँचे बर हुशियार होना चाही।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

सुरता// जब गोरसी तापत अंगाकर दमोरन..

 सुरता//

जब गोरसी तापत अंगाकर दमोरन.. 

    तब जाड़ ह हमर मन बर तिहार बरोबर जनावय. अघ्घन-पूस दू महीना तो गजबे निक जनावय. हमर गाँव-गंवई म ए बेरा ह धान मिंजई के बेरा होथे. धान मिंजई माने बेलन खेदना अउ बीच-बीच म बेलन ले उतर के चारों मुड़ा बगरे पैर म उलानबाटी खेलना. 

    गाँव म किसान-किसानीन, बनिहार-कमईया सबोच के दिनचर्या बियारा म पैर बगराना, बेलन फॉंदना, कलारी म खोभा मारना, धान के दाना मन झरझें, त पैरा ल झर्रावत हेरना अउ पैरावंट म गॉंजत जाना, पैर के झरे जम्मो धान मनला सकेल के एक तीर म रास मढ़ाना, फूल-पान नरियर चघा के हूम-धूप देना. तेकर पाछू फेर वोला काठा म राम ले लेके सरा (1 ले 20) तक के गिनती गिनत नापना. एक सरा माने एक खॉंड़ी पूर जाय त फेर एक बाजू म वोकर खातिर एक मुठा धान के कुढ़ेना मढ़ा देना. अइसने एकक मुठा करत बीस मुठा हो जावय, त फेर एक गाड़ा (बीस खॉंड़ी) के वो सबो कुढ़ेना ल एक तीर सकेल दिए जाय.

    घर के सियान- सियानीन मन तो अतकेच म चिथियाय राहंय, फेर हमन कूद-फॉंद अउ एती-वोती धूम-धड़ाका म राहन. सूत के उठन तहाँ ले बियारा के आगू म गड्ढा खान के बनाए कौड़ा म आगी तापना. थोकिन चरचराए असन लागिस तहाँ ले मुखारी चगलत तरिया जाना, फेर उहाँ नहाए के पहिली घठौंदा म बगरे चिरी मनला सकेल के भुर्री बारना. भुर्री के दगत ले धरारपटा तरिया म कूद के निकलना अउ झटपट कपड़ा पहिर के फेर भुर्री तापना.

   घर म आवन त घीव चुपरे अंगाकर रोटी बर झपेट्टा मारन. अउ देखन त अंगाकर के फोकला अतका मन हमर बॉंटा म राहय अउ वोकर जम्मो गुदा मनला हमर बिन दॉंत के भोभला बबा खातिर अलगिया दे राहय. हमन बस गोरसी तापत फोकला अतका ल झड़कन तहाँ फेर स्कूल के बेरा हो जावय.

    संझा स्कूल ले लहुटे के पाछू फेर बियारा म धान मिंजाय बर बगरे पैर म चलत बेलन म चढ़ना, बीच-बीच म उलानबाटी खेलना चालू हो जावय. कभू-कभू बियारा म गाड़ा ल पैरा म तोप के रतिहा के रखवारी करइया मन बर बनाए कुंदरा म खुसरना, उहाँ माढ़े जिनिस मनला देखना-हुदरना बस अतकेच म बेरा पहा जावय.

    मुंधियार अस जनावय त फेर घर कोती जाना, चिमनी अंजोर म गुरुजी मन घर म लिखे-पढ़े बर कुछू अढ़ोय राहय तेला सिध पारन. फेर रतिहा बियारी के पाछू डोकरी दाई जगा कहानी सुनना. सबो भाई-बहिनी गोरसी के आंवर-भांवर बइठ के कहानी सुनन. एक झन कोनो ह हुंकारू देवय. हमर तो कहानी सुनत ही नींद पर जावय, कतका जुवर कोन ह हमला खटिया म ढनगा दिस तेकरो गम नइ मिलय.

   इतवार के छुट्टी के दिन के दिनचर्या ह थोरिक अलगे राहय.  ए दिन बिहनिया गोरसी तापत अंगाकर रोटी दमोरे के पाछू खेत डहार जावन. कोनो मिठहूं असन बोइर के पेड़ म चढ़ना, कोनो पाके असन दिखत बोइर वाले डारा ल हलाना, फेर खाल्हे म उतर के पेंठ के दूनों खीसा म खसखस के बोइर ल भरना तहाँ ले खेत म उल्होए तिंवरा भाजी ल सुरर-सुरर के हकन के कोल्हान नरवा कोती बढ़ जावन. कभू कभू तो सबो संगी तिंवरा भाजी ल रॉंध के खाए खातिर तेल-फूल जइसे जम्मो जिनिस मनला अपन-अपन घर ले धर ले राहन अउ नरवा खंड़ म आगी सिपचा के वोला रॉंध के खावन. ए किसम वो छुट्टी के दिन हमर मन के तिंवरा भाजी अउ बटकर के पिकनिक पार्टी हो जावय.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

भाव पल्लवन-- तेल न तेलई, बरा-बरा नरियई

 भाव पल्लवन--


तेल न तेलई, बरा-बरा नरियई

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बरा खाना हे त उरिद दार के पीठी भर ले काम नइ चलय ।वोला बनाये बर तेल अउ तेलई(कड़ाही),चुल्हा-आगी के तको जरूरत होथे। समान अउ इंतजाम अधूरा हे त बरा खाहूँ---बरा खाहूँ--झटकुन बरा चाही --चिल्लाये भर ले नइ मिल जवय।कतेक झन अइसने बिना मतलब के चिल्ल पों मचावत रहिथें। 

  कोनो चीज के साध करना बुरा नोहय फेर साध तभे पूरा होथे जब वोकर लइक सराजाम होथे--बढ़िया तैयारी होथे।

  जे मन बिना तइयारी के कोनो प्रतियोगी परीक्षा म बइठहीं वो मन ला भला सफलता कइसे मिलही? टूटहा--अधमरहा मन ले, आधा-अधूरा  तइयारी करे ले सफलता मिलबेच नइ करय।कतेक झन तो दसों साल ले तको अइसनहे तइयारी करत रथें अउ बार-बार असफल होके निराश हो जथें।ये मन ला तो शांत मन ले कारण ला खोजके निवारण के उपाय करना चाही। 

                    किसान हा बिना बिजहा, खातू-माटी अउ बिना पानी के खेती करही त फसल कहाँ ले लूही? जमीने रहे भर ले कुछु नइ होवय ।फसल बर माटी म माटी मिलके,पसीना ओगारे बर परथे।

  अइसने कोनो आयोजन के सफलता बर वोकर हर पहलू मा ध्यान देके मुकम्मल तइयारी करे बर लागथे।छोटे-छोटे जिनिस मन के चेत रखे बर लागथे नहीं ते कभू-कभू अइसे देखे म आथे के उद्घाटन के समे, दिया बारेच के बेरा छिहीं-छिहीं माचिस खोजे ल पर जथे।कार्यक्रम म बाधा आये ले हल्ला-गुल्ला तो होबे करथे अतिथि मन के आगू म आयोजक मन ला मूँड़ी गड़ियाये  ल पर जथे।

   मनखे के जिनगी ल संग्राम कहे जाथे। ये युद्ध म कई प्रकार के बाधा-बिपत्ति ले लड़े बर लागथे।लड़ना हे त साहस अउ हथियार दूनों चाही। सैनिक ह युद्ध के मैदान म बिना हथियार के लड़े बर जाही त मरही धन बाँचही तेन ह गुने के बात आय।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद छत्तीसगढ़

नवा सरकार के शपथ-ग्रहण छत्तीसगढ़ी मा होही!?

 *नवा सरकार के शपथ-ग्रहण छत्तीसगढ़ी मा होही!?*


छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा बने सोलह बछर बीत गे हे। फेर न तो राजकाज के भाषा बन सकत हे, न पढ़ाई के माध्यम बन सकत हे, न बने ढंग ले येला मान-सम्मान मिलत हे। आज घलो कतरो लोगन छत्तीसगढ़ी मा गोठियाय बर नाक-कान सिकोड़त रथे। का अइसने मा छत्तीसगढ़ी भाषा के बढ़वार होही। जम्मो छत्तीसगढ़िया मन अपन महतारी भाखा के मान रखत छत्तीसगढ़ी ला अंतस ले नइ स्वीकारबो, तब कइसे बनही। अपन भाखा-बोली बोले मा काके लाज।


अभी समाचार पत्र, फेसबुक, व्हाट्सएप मा देखे बर मिलत हे, कि का हमर नवा सरकार के शपथ ग्रहण हा छत्तीसगढ़ी मा होही? बात तो बिल्कुल सोला आना हे। बिल्कुल होना चाही, अउ काबर घलो नइ होना चाही? आखिर छत्तीसगढ़ी हमर महतारी भाखा आय। जम्मो नवा-जुन्ना 90 विधायक मन ला छत्तीसगढ़ी मा शपथ लेना चाही। विधायक मन खुदे कहय कि हमन छत्तीसगढ़ी मा शपथ लेबो। फेर अधिकारी मन खुद लेवाही।


का छत्तीसगढ़ी गोठियाय बतराय के ठेका गाँव के लोगन मनके, अउ शहरिया छत्तीसगढ़िया मनखे मनकेच आय का। सबो झन के तो आय। का छत्तीसगढ़ी हा दिखावटी भाखा आय? ये चुनाव के पहित वोट माँगे के भाखा भर नोहे। 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' केहेच में कहीं नइ होय। अभी येला शपथ-ग्रहण मा साबित करे के बढ़िया मौका हे। का होगे आठवीं अनुसूची मा नइ जुड़े हे। हमर राजभाषा तो आय ना।


हमर एम.ए. छत्तीसगढ़ी छात्र संगठन के संगवारी मन ऋतुराज साहू जी के संग सरकार ल छत्तीसगढ़ी मा शपथ ग्रहण बर ज्ञापन देहे। ये खबर पढ़के बढ़िया लगिस। महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर सराहनीय प्रयास हे। वरिष्ठ साहित्यकार सुशील भोले, अजय अमृतांशु के फेसबुक मा घलो अइसने बात चलत हे।। मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी राजभाषा के संरक्षण नंदकिशोर शुक्ल घलो डॉ. रमन सिंह जी ले मिल के छत्तीसगढ़ी मा शपथ-ग्रहण बर जोर देहे। संग मा जम्मो छत्तीसगढ़ी प्रेमी मनके अइसने कहना हे।


अब अवइया शपथ-ग्रहण मा देखे बर मिलही, कि का हमर नवा राजनेता मन छत्तीसगढ़ी मा शपथ लिही, कि आठवीं अनुसूची मा नइ होय के बहाना करही, कि हिंदी मा लेके राजभाषा के हिनमान करही। हमर महतारी भाखा के कोन कतिक मान-सम्मान ला रखहीं। कोन कतिक छत्तीसगढ़िया हवे, ये सब ला देखे बर मिलही। असली छत्तीसगढ़िया के पहिचान के अवसर आही। अब शपथ-ग्रहण के खचित अगोरा हवे।


हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया)

राजनांदगाँव

मील के पथरा बनही महाकाव्य श्री सीताराम चरित


 मील के पथरा बनही महाकाव्य श्री सीताराम चरित


           प्रभु श्रीराम के जीवन गाथा ला सबले पहिली आदिकवि बाल्मीकि संस्कृत म लिखिन। 16 वीं सदी मा महाकवि तुलसीदास जी रामचरित मानस ला अवधि मा लिख के जन जन म लोकप्रिय कर दिन। येकर अलावा सैंकड़ों के संख्या मा कई भाषा मा रामायण लिखे गिस। छत्तीसगढ़ी भाषा मा घलो ये उदिम होइस । छत्तीसगढ़ी भाखा म कपिलनाथ नाथ कश्यप सहित कुछ अऊ लेखक मन के रामायण आ चुके हव फेर वोमा छन्द के अभाव रहिस। परंतु बादल जी के महाकाव्य पूर्णतः छन्दबद्ध अउ व्याकरण के दृष्टिकोण ले पूर्णतः परिमार्जित हवय।  

          ये महाकाव्य मा कुल 9 सर्ग (पूजा के फूल) हवय जेमा श्रीराम जन्म से लेके रावण के वध अउ श्रीराम के राज्याभिषेक तक के संपूर्ण घटना के चित्रण हवय। महाकाव्य के आधार छंद दोहा अउ चौपाई हवय। कुल 98 प्रकार के छन्द के प्रयोग ये महाकाव्य मा होय हवय । मानस मर्मज्ञ बादल जी के अथक मेहनत अउ भागीरथ प्रयास ये महाकाव्य मा साफ दिखाई देथे। महाकाव्य के शुरुवात गणपति वंदना से होथे। तदुपरांत श्रीराम, हनुमान,माता सरस्वती,भोलेनाथ,आदि शक्ति मां दुर्गा,अउ गोस्वामी तुलसीदास जी के वंदना हवय। महाकाव्य मा रामायण के संपूर्ण घटनाक्रम के चित्रण करत श्रीराम के राज्याभिषेक के संग महाकाव्य के समापन करे हवय। मर्मस्पर्शी चित्रण होय के कारण पाठक शुरू ले अंत तक भावुक होके येला पढ़ही। 

            महाकाव्य 309 पेज के हवय जेमा कुल 98 प्रकार के  छंद - दोहा,सोरठा,चौपाई,अनुष्टुप छंद, अमृतध्वनि,कुण्डलिया,त्रिभंगी,आल्हा, ताटक,रूपमाला,हरिगीतिका,सरसी, कामरूप,जनक,सार छंद,उल्लाला,पद पादालुक,जयकारी,प्रमाणिका,आनंदवर्धक,वीर छंद, कज्जल,शक्ति,विधाता,कुकुभ, लावणी, मंगलवत्थु,मधु वल्लरी, बरवै, त्रिभंगी, शार्दुल विक्रडीत,विष्णुपद,मधु मालती,रोला,शंकर छंद,जयकारी छंद,वसंत तिलिका,डिल्ला,मालिनी,शोभन, भुजंग प्रयात,पुनीत,कुण्डल, हाकलि,रास, 

राधिका,मनोरम,मुक्तामणि छंद,शुद्ध गीता,शिव छंद,तोटक,सिंधु छंद,सुखदा छंद,गोपी,गगनांगना छंद,दिगपाल,मानव, चण्डीका,त्रिलोकी छंद,अखण्ड छंद,अनुगीत, विंध्वकमाला,वंशस्थ, कामना,वर्णिक, राधिका, तोमर,निश्छल,दीप, आनंदवर्धक, सुगति,श्रृंगार, पद्धरी छंद, डिल्ला, छप्पय, विजात छंद,त्रोटक, अरिल्ल,तामरस छंद,शशि वंदना, तोमर,गीतिका,उपजाति, भुजंगप्रयात वर्णिक छंद के अलावा 

मनहरण घनाक्षरी,रूप घनाक्षरी बउरे गे हवय। सवैया में -दुर्मिल,मदिरा, बागीश्वरी,अरविंद सवैया, सुन्दरी,मुक्तिहरा, मत्तगयन्द,सर्वगामी,सुमुखी,चकोर, महाभुजंगप्रयात, मोद,वाम, मत्त्त, अरसात अऊ सुखी सवैया कुल 12 प्रकार के सवैया के सुग्घर प्रयोग हवय।

             महाकाव्य के भाषा सरल अऊ बोधगम्य हवय। रस छन्द अउ अलंकार के प्रयोग ले महाकाव्य के खूबसूरती म चार चाँद लगगे हवय। घटना के कलात्मक चित्रण मा बादल जी माहिर हवय। बादल जी के ये अनुपम कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य मा अपन अलग स्थान बनाही। ये महाकाव्य मा अतेक अकन छंद के प्रयोग करके छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे के सुग्घर उदिम बादल जी करे हवय। छत्तीसगढ़ी म प्रकाशित उत्कृष्ट महाकाव्य खातिर बादल जी ला अंतस ले  बधाई अऊ शुभकामना।


कृति  -   श्री सीताराम चरित

लेखक -  चोवाराम वर्मा 'बादल'

प्रकाशक -शिक्षादूत ग्रंथागार प्रकाशन,

              नई दिल्ली

समीक्षक -अजय अमृतांशु

छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक ठन कलगी: वीर हनुमान सिंह प्रबंध काव्य*


 *छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक ठन कलगी: वीर हनुमान सिंह प्रबंध काव्य*


छत्तीसगढ़ी साहित्य के दिन बहुरत हे। अब छत्तीसगढ़ी म नरवा नदिया, घाट घटौंदा, डोंगरी-पहाड़, खेत-खार अउ माटी-महतारी के संग शृंगार के गीत भर नइ लिखे जावत हे। आज के साहित्य म मनोरंजन भर नइ रहिगे हावय। अब गंभीर किसम के साहित्य लिखे जावत हे। इतिहास अउ संस्कृति ल सरेखत अउ आज के संघर्ष ले भरे जिनगी के जीजिविषा संग मनखे के चिंतन अब साहित्य के विषय बनत हे। साहित्य के सब विधा म एकर प्रभाव अउ असर दिखत हे। बस जरूरत हे कि हम उन ल पढ़न। हम कखरो लिखना ल पढ़बो तभे तो कोनो हमरो लिखे ल पढ़़ीं। आज भले किताब बिसा के पढ़इया मन के गिनती कमती दिखत हे। फेर व्हाट्सएप अउ फेसबुक जइसन सोशल मीडिया म साहित्य पढ़े जावत हे।

           पढ़न अउ पढ़ावन के इही चलन ल आगू बढ़ाय म बड़का उदिम हे, श्री अरुण कुमार निगम जी के छंद के छ परिवार। जेन ऑनलाइन कक्षा के रूप म संचालित होथे। एहर गुरुकुल आय। जेन ह 'सीखबो अउ सिखाबो' के मूल मंत्र ल ले के सरलग आगू बढ़त हे। २०१६ ले अब (२०२३) तक २०० ले आगर अनगढ़ कविता लिखइया मन छंद के साधना करत हें अउ उँकर लेखन छंद साधना के पटरी म सरलग चलत हे। निगम जी के मिहनत रंग लावत हे। छंद के छ परिवार गुरु-शिष्य के परम्परा संग आगू बढ़त उँकर सपना ल पूरा करत हे। जेन हमर पुरखा जनकवि श्री कोदूराम दलित के नेंव धरे आय। अरुण कुमार अपन सियान ददा कोदूराम दलित जी के विरासत ल खड़े करे हें। जे आज एक आंदोलन बनगे हावय। जेकर प्रभाव अउ चर्चा अब छत्तीसगढ़ के साहित्य म दिखत हे, होवत हे। इही गुरुकुल के भट्टी (साधना) म तपे अउ निखरे साधक आँय मनीराम साहू 'मितान'। जे मन मंचीय कवि के रूप म तब चर्चित रहिन अउ आजो छत्तीसगढ़ के चारों खुँट म अपन मंचीय प्रतिभा के लोहा मनवाथें। वीर रस ले सनाय गीत ले जिहाँ श्रोता मन के रग-रग म जोश भरथें, उहें पारम्परिक सुर म साजे गीत ले मनोरंजन कराथें अउ जागरण के गीत सुनाथें। सुधि श्रोता मन बर गंभीर किसम के रचना के पाठ घलव करथें।

         छंद म लिखना कोनो खेल तमाशा नोहय। एक कोति छंद के नियम ल साधना रहिथे, त दूसर कोति भाव पक्ष ल सजोर रखे के चुनौती रहिथे। भाव पक्ष लोगन ल झटकुन समझ म आथे। अइसन म भाव पक्ष श्रोता अउ पाठक बर जरूरी हे। अइसे भी कविता बर भाव पक्ष पहिली आवश्यकता बताय जाथे अउ कतकोन बुधियार मन एला पहिली शर्त मानथें। ए दूनो पक्ष कहे के मतलब शिल्प अउ भाव पक्ष म मितान कोनो मेर समझौता करत नइ दिखँय। मितान दूनो पक्ष म बड़ सावचेती ले लेखन करथें। अभ्यास अउ लगन के संग शब्द भंडार बाढ़थे। शब्द भंडार के मामला म मितान धनी आवँय, कहि सकथँव। कतको नँदावत शब्द इँकर रचना म जीयत-जागत हें। छंद म लिखई ल कतकोन मन छँदाना समझ के दुरिहा भागे लगथें। छंद म फँसना मतलब भाव पक्ष ले दुरिहाना ए। भाव नइ समा सकय कहिके अपन कमजोरी ल छुपाथें, फेर मितान ल तो छंद लिखे म मजा आथे। तभे तो इन मन रोज नामचा के गीत लिखे के संग प्रबंध काव्य लिखे बर अपन पाँव उसालिन अउ एक नहीं तीन-तीन ठन खंड काव्य लिख डरिन। हीरा सोनाखान के, महापरसाद अउ छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे : वीर हनुमान सिंह। खंड काव्य कोनो विशिष्ट विषय ऊपर लिखना होथे। जे ल कई खंड/खँड़ म बाट के लिखे जाथे। अतके च नइ, हर खँड़ बर आने-आने छंद के नियोजन करे बर परथे। अइसन सिरिफ उही कर पाथें जे छंद म पकड़ रखथें अउ ओकर बने जानकार होथें।

           छंद भर साधे ले रचना के सुघरई नइ आवय। छंद के संग अलंकार अउ रस के सँघरे ले रचना श्रेष्ठ बन जाथे। कालजयी हो जथे। अइसन करे म शब्द चयन के बड़ भूमिका होथे। शब्द चयन ह विषय वस्तु अउ प्रसंग ल जीवंत बनाय म साहमत होथे। एकरे ले अलंकार जगर-मगर होथे। रस के धार बोहाय लगथे।  मुहावरा अउ हाना के प्रयोग ले रचनाकार पाठक के तिर पहुँचथे। गद्य साहित्य एकर बिना बिन लिपाय-पोताय घर बरोबर होथे। हाना मुहावरा के प्रयोग पद्य म करना बड़़ कठिन होथे, काबर कि छंद विधान के पालन करना होथे, फेर मँजे छंदकार बर ए कोनो कठिन बुता नोहय। ए बात के प्रमाण आय मितान अउ एक सबूत देवत हे उँकर सिरजाय प्रबंध काव्य वीर हनुमान सिंह। प्रबंध काव्य म प्रसंग के मुताबिक रस तभे आ पाथे जब नायक के जिनगी के वृत्तांत रचनाकार तिर होवय। जीवन वृत्त बर अध्ययनशील अउ जिज्ञासु होना जरूरी होथे। जतके जादा जानबा रही, ओतके सुघर लिखना हो पाही। जानबा सकला करे बर खोजी होना जरूरी हे। मितान पेशा ले मास्टर आय। मास्टर के स्वाभाविक गुण होथे अध्ययनशीलता अउ खोजी। मितान के इही गुण के चलत ए खंडकाव्य संग्रह रूप म आज अपन पाठक तिर पहुँचे के यात्रा पूरा कर ले हावय। 

         मितान किसनहा परिवार के बेटा आय। किसानी म घलव भरपूर बेरा देथे। खेती अपन सेती, कहे गे हे, एकर मतलब हे मिहनत ले पाछू नइ हटना।  इही मिहनत उँकर साहित्य साधना म घलव देखे ल मिलथे। ऐतिहासिक अउ शोधपरक विषय के भुइँया म अध्ययन के बीजा डार लगन अउ मिहनत के खातू पानी ले मितान खंडकाव्य के बड़ पोठ खेती करे हावय। जेकर दाना आज आपके हाथ म हे।

        मोर नजर म ए प्रबंध काव्य शिल्प अउ विधान के पैडगरी म कोनो मेर डगमगावत लड़खड़ावत नइ लगत हे। भाव पक्ष के जतका गोठ करन ओतके कम हे। तभे तो ए किताब के भूमिका म प्रणम्य गुरुदेव अरुण कुमार निगम लिखे हवँय- "मनीराम साहू जी वीर रस आधारित ये किताब म कहूँ भी वीर छंद माने आल्हा छंद के प्रयोग नइ करके ये बात ल साबित करिन हें कि बिना आल्हा छंद के घलो वीर रस आधारित प्रबंध काव्य लिखे जा सकथे।"

          प्रूफ रीडिंग के कमी के चलत ही कोनो-कोनो तिर व्याकरणिक चूक नजर आवत हे। इशारा अउ इसारा दूनो के प्रयोग 47/41 पृष्ठ। समासिक शब्द खासकर द्वंद्व के चिह्न। कुछ एक जघा म विधान ह पटरी ले बेपटरी हो गे हावय।

          टंकन के चलत अर्थ स्वाभाविक अर्थ ले भिन्न हो गे हे। 

          *तपत हवँय ये गोरा मन हा,  मौत उँमन ला भागे हे।*

          एमा भा गेहे/ भा गे हे होना चाही। अभी भागना के अर्थ व्यंजित होवत हे। जबकि भा जाना ले भा गे हे होना चाही।

          आख्यानक काव्य या प्रबंध काव्य बर जरूरी रचनाकार के उड़ान (कल्पना) सिरतो म वीर हनुमान सिंह म हावय। जे पाठक के नस-नस म उतर जाही।

           हमर भारतीय संस्कृति म कोनो भी बड़का काज के शुरुआत करत खानी अपन ईष्ट देव मन ल भजे जाथे। उन ल सुमरन करे जाथे। जेमा काज के सुफल होय बर असीस ले जाथे। ए ह हमर साहित्य म घलव दिखथे। प्रबंध काव्य म इही ह मंगलाचरण के रूप म नजर आथे। जेकर ले काव्य के शुरुआत अउ कतको मन हर खँड़ के शुरुआत मंगलाचरण ले करथे। मितान के ए प्रबंध काव्य म मंगलाचरण दस किसम के छंद म देखे ल मिलथे। जेन म उन मन अपन इष्ट देवी-देवता, जनम भुइयाँ, गुरु सहित बड़का मन ले असीस माँगत वीर हनुमान सिंह के गाथा ल जन-जन तिर पहुँचाय के शुभ काज के श्री गणेश करें हें।

     *दोहा* 

उमापूत बुधनाथ गा, हे गजकरन कवीस।

भकला मनी मितान ला, देदे बुद्धि असीस।

     *अनुष्टप*

दाई उमा भवानी वो, अंतस मा उम्हाव दे।

बीर जस लिखौं मैं हा, आरुग पोठ भाव दे।

रहै न खोट एको माँ, देदे असीस दास ला।

तैं सीघ-सीघ दे माता, अक्षर शब्द रास ला।

तैं हा सुने सबो के माँ, सुनले मोर आज वो।

मूरख ये मनी हावै, दे माई काज साज वो।

         संग्रह के पहलइया खँड़ मनहरन खँड़ नाँव के मुताबिक भारत के गौरवशाली इतिहास के बखान करत मन हर लेथे। स्वतंत्रता संग्राम के शंखनाद ले लेके छत्तीसगढ़ के योगदान ल बढ़िया चित्रण हावय। वीर हनुमान के परिचय सुग्घर ढंग ले कराय गे हे।

        दउँड़य राजपुताना शोणित, ओकर जब्बर छाती मा।

        जेन लगाइस जीव दाँव मा, माटी रक्षा खाती मा।।

         दूसर खँड़ म अत्याचारी अंग्रेज मन के अत्याचार ले वीर सपूत मन के हिरदे म धधकत पीरा हे। ए पीरा छत्तीसगढ़ के वीर सपूत शहीद वीर नरायन सिंह ल दे गे फाँसी के घलव आय।

       आय दिसम्बर के दस तारिट, करिया घोर उदासी के।

       जन-जन ला पीरा देवइया, वीर नरायन फाँसी के।।

         विजया खँड़ म गुलामी ले मुक्ति बर अँग्रेज़ मन ले विजय बर दृढ़ निश्चय के जउन नेंव धरे हे। वो कवि के कल्पना हो सकत हे, फेर कवि के ए उड़ान वीर हनुमान सिंह के संकल्प ले आने नइ हे। ए खँड़ म मितान के आखर-आखर भारत माता के सपूत मन के अंतस् के आरो देवत हे। स्वतंत्रता बर ललकार के सुर हे। वीर हनुमान सिंह के संगी-साथी मन म स्वतंत्रता बर अलख जगाय के आह्वान हे। दृष्टांत देखव-

बंदुक ला सब रखव सँवारे, टेंये राखव खाँड़ा ला।

तन के गरमी रखव बढ़ाये, फटकन झन दव जाड़ा ला।

जबर गुलामी साँकड़ काटे, साथ तुँहर मोला चाही।

एक दुये मा बनय नहीं गा, होवय बल हाही-माही।

       कृपाण खँड़ के ए ताटंक छंद देखव-

       खँधँय बगावत करबो कहि जब, हनुजी के सँगवारी गा।

       सोचय बम्बर बारे बर हनु, मेटे बर अँधियारी गा।

       इहाँ अँधियारी के मतलब गुलामी ले हे अउ बम्बर बारे के तार जुरे हावय, स्वतंत्रता के उजियार ल जन-जन के अंतस् म जलाय ले।

       कृपाण के अर्थ ल सार्थक करत ए खँड़ म हनुमान सिंह अउ उँकर संगवारी मन भारत माँ के बइरी मन ल उँकर नानी याद कराय हे।

      बोलत जय जय भारत माता, बीच पेट लउहे जोंगै।

       तुरत उठा सँगवारी खाँड़ा, आल पाल वो दे भोंगै।

      खींचत वो खाँड़ा ला तुरते, वार दुसर कर देवै गा।

      कहत वार ये सिंह फाँसी के, बदला ला ले लेवै गा।


       इहें रण क्षेत्र के लड़ई के जीवंतता के दृश्य उकेरे म मितान के कलम पाछू नइ हे-

       टकरावँय जब एक दुसर ले, खाँड़ा मन हा भारी जी।

        लागय बिजली लउकत हे का, उठय अबड़ चिंगारी जी।

        वीर सपूत हनुमान सिंह ल समर्पित ए संग्रह वीर रस म पगाय हे, अइसन म वीर के शौर्य वर्णन खातिर जरूरी अलंकार सहज रूप ले इहाँ झलकथे। कवि के कल्पना सुघ्घर हे।

      पचवइया अउ आखिरी खँड़ 'रूप खँड़' म छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे वीर हनुमान सिंह अउ उँकर संगी मन के जे रूप और शौर्य के गुनगान गे हे वो सउँहत स्वतंत्रता दिलाय म कोनो कसर नइ छोड़तिस।

       सउँहे यम के दूत असन जब, उँकर रूप हा लागै गा।

        डर के मारे बइरी काँपत, भिरभिर भिरभिर भागैं गा।।

        तभे एक भिंड़त म गोली बारूद के कमतियाय ले वीर सपूत मन के मन म उदासी आगे फेर हिम्मत ले भारत माँ के रक्षा बर आखिरी साँस तक लड़िन अउ वीर हनुमान ल उहाँ ले सुरक्षित निकल संगठन ल अउ मजबूत करे बर भारत माँ के किरिया दिन। हनुमान सिंह मन मार के उहाँ ले निकलिन अउ दुबारा जबर कोशिश करिन एकर सुघ्घर वर्णन हे, पर आगू कोनो पुख्ता खबर नइ मिलिस।

       मनीराम साहू 'मितान' अपन अध्ययन अउ शोध ले जतका हो सकिस वीर हनुमान सिंह के चरित गाथा ल छंद बद्ध समेटे के उदिम करिन अउ दुमदार दोहा के संग छेवर करत लिखिन- 

        सिधगे पूरा पाँच खँड़, सुग्घर नाने-नान।

        लिखके जस हनुमान के, होगे धन्य 'मितान'।।

        भाग ला वो सँहरावै।

        मया जम्मो के पावै।

        स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के जीवन चरित ल  खंड काव्य के रूप म सिरजाय के, मितान के ए उदिम के जतका बड़ई करे जाय, ओतके कमती रही। उँकर ए उदिम ले अउ कतको सेनानी मन के गाथा कोति कवि मन के चेत जाही अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य ल नवा अउ उत्कृष्ट रचना मिले के आस बँधथे।

          छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे: वीर हनुमान सिंह, प्रबंध काव्य छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक कलगी साबित होही। एकर ले छत्तीसगढ़ी साहित्य मान पाही। ए किताब छत्तीसगढ़ी साहित्य ल नवा उँचास दिही। वीर हनुमान सिंह के वीरता ल सरेखत मनीराम साहू 'मितान' के मिहनत अउ लेखनी ल नमन। उँकर ए प्रयास स्तुत्य हे, बंदनीय हे। 

      

रचना: *छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे*: वीर हनुमान सिंह

रचनाकार:  श्री मनीराम साहू 'मितान'

प्रकाशक: शिक्षादूत ग्रंथागार प्रकाशन नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष: 2023

पृष्ठ : 96

मूल्य:  299/-

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पोखन लाल जायसवाल

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