Friday, 17 November 2023

देवारी म जिमीकाॅंदा के साग...

 देवारी म जिमीकाॅंदा के साग... 

    वइसे तो हमर छत्तीसगढ़ म जिमीकाॅंदा के साग खाए बर बारों महीना मिल जाथे, फेर देवरिहा सुरहुत्ती के बिहान दिन, जे दिन गरुवा मनला खिचरी खवाए जाथे वो दिन अवस करके खाए बर मिल जाथे. ए परंपरा लगभग सबो घर देखे बर मिल जाथे. हमन मैदानी भाग म एला अन्नकूट के रूप म 'नवा खाई' घलो कहिथन. 

    घर के सियान ए दिन चुरे जिमीकांदा (कोचई अउ मखना मिंझरे) के साग अउ खिचरी ल घर के देवता म चढ़ाए के बाद गरुवा मनला खवाथे, तहाँ ले खुद घलो खाथे. लइका राहन त हमर बबा हमू मनला खाए बर देवय. पहिली तो छिनमिनावन. काला-काला खवाथे कहिके बिदके असन करन, तभो ले खाएच बर लागय, काबर ते ए दिन घर के जम्मो सदस्य खातिर जिमीकांदा के साग चुरे राहय. संग म दूसर साग घलो चुरे राहय, फेर जिमीकाॅंदा ल खाना अनिवार्य राहय.

    आज जब बड़े बाढ़ेन अउ जिमीकाॅंदा के आयुर्वेदिक महत्व ल जानेन त लागथे, के हमर पुरखा मन कतेक वैज्ञानिक सोच के रिहिन हें, जेन विविध परंपरा के नॉव म कतेक महत्वपूर्ण जिनिस मनला हमर स्वास्थ्य खातिर जोड़ दिए रिहिन हें.

    आज वैज्ञानिक शोध के माध्यम ले जानकारी पाएन, के जिमीकाॅंदा म फास्फोरस के गजबे मात्रा पाए जाथे. सिरिफ ए देवारी के दिन ही एके पइत जिमीकाॅंदा खा लेइन त हमर शरीर म कई महीना तक फास्फोरस के कमी नइ होही. ए ह बवासीर ले लेके कैंसर जइसन कतकों जबर रोग ले बचाके राखथे. एमा फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी 1 अउ फोलिक एसिड होथे. संगे-संग पोटैशियम, आयरन, मैग्नीशियम अउ कैल्शियम घलो पाए जाथे.

    संगी हो आजकल बजार म हाइब्रिड वाले जिमीकांदा घलो देखे बर मिलथे, फेर एमा आयुर्वेदिक तत्व के थोर कमी होथे. अच्छा हे, के देशी किसम के ही जिमीकाॅंदा के उपयोग करे जाय.

    हमर छत्तीसगढ़ म तो वइसे घरों घर जिमीकाॅंदा बोए अउ खाए जाथे. एकर कनसइया (पोंगा) के घलो कतकों झन साग रांध के खाथें. कतकों झन एकर ले बरी घलो बनाथें, जे ह 'लेड़गा बरी' के रूप म जगप्रसिद्ध हे. ए सबो ल खाना चाही. कभू-कभार मुंह खजवाए असन लागथे, फेर एकर ले डर्राना घबराना या छिनमिनाना नइ चाही.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

सोहाई* चन्‍द्रहास साहू

 *सोहाई*

                                    चन्‍द्रहास साहू

                                  मो 8120578897

बिहनिया ले उठगे आज ओ नोनी हा। काबर नइ उठही ? आज दुसरइया दिन आवय। जम्मो जीव-जिनावर भक्तिभाव मा बुड़े रहिथे। पहिली दिन जोरा-जारी, हियाव-नियाव, स्वागत-सत्कार मा निकल जाथे। बच्छर मा एक बेरा आथे कुवार नवराति हा।.. अउ संग मा आथे सौहत देबी हा…। जोत-जेवारा, डांग- डोरी धजा -पताका .. ।

रिकम-रिकम के बरन-बईगा- गुनिया, चेला-चंगुरी, डीही-डोंगर, देवी-देवता के। दरसन-परसन, सेवा-सटका करे बर। ओला तो आने गाॅंव जाना हावय आज। अपन कला देखाय बर , आदिवासी लोक नृत्य देखाये बर। ओखर दल बेरा परब मा नाचके, झुमके जम्मो दुख पीरा अउ जिनगी के थकासी ला बिसरा लेथे अपन गाॅंव मा। फेर आने गाॅव‌ के नेवता मा कला देखाये बर घला चल देथे।

             जम्मो लोकनृत्य मा भगवान आराध्य, इष्टदेव के महिमा, ओखर जस अउ ओला उछाह करे के गोठ रहिथे । चाहे करमा, सरहुल, गौरानृत्य, मांदरी, डंडा, रहस, पंथी, गेड़ी, राउत नृत्य होवय। लोकनृत्य घला भक्ति के माध्यम आय । शहर के ओन्हा ओढ़ईया कस्बा अउ बड़का शहर मा ये गाॅव‌ महुआटोला के नांव के सोर अब्बड़ हावय ।

            मन मंजूर अउ गोड़ मिरगा के होगे हे आज ओखर । भिनसरहा भईसा मुंधियार रिहिस तभो ले कतका बुता कर डारिस। गाय बछरू के जतन पानी । गोबर-कचरा, बरतन-बासा .. जम्मो बुता । बम्बर बारके परछी ला करिया मा, अउ लाल घेरू माटी मा कोठ ला खुंटिया डारिस । उपका डारिस काली के बाचे खोचे ला ..। माटी के घर खपरा वाला अउ छानी के टिप मा बइठे सोनचिरई ..। सिरतोन कुम्हार हा अभिन लान के मड़हा देय हावय अइसे लागत हावय। बढ़ई अभिन घर ला बनाये होही। सरई अउ बीजा लकड़ी के काड़-कगड़ी, खिड़की-कपाट, खइरपा तक हा सुघ्घर उज्जर नवां -नवां दिखत हावय । सुरुज नरायेन सोनहा अंजोर बगरावत हे ..। सीत बरसे ले सुघ्घर लागत हे। ससन भर देखिस अपन घर ला मुचकावत । सुरहीन गाय के गोबर ले लिपाये अंगना ला, खीरा कुंदरू के झूलत बारी ला। धोवाये बरतन के मइलाहा पानी ला आरमपपई म रिकोइस। कोवर-कोवर आमा पाना के ममहासी ला सूंघीस । कुम्हड़ा नार ला कोठा के छानी मा चड़ाइस। नहा के छाती बांधे – बांधे दरपन के आगू मा ठाड़े होइस तब सिरतोन उही लजागे अपन बरन ला देख के। सांवर गोरी झक्क दमकत सिकल । खीरा बीजा कस दांत । उल्हा-उल्हा कोवर सरई पत्ता कस होठ-गुलाबी । डोमी कस सुघ्घर बाल अउ कजरारी आँखी हा …।

         जादा तारीफ झन कर फुलगजरा अपने आप के । मनेमन ओहा फुसफुसाइस । चेथी मा चपत मारिस अउ महुआ झरे कस खनखनावत हाॅंसे लागिस।

        अब जान डारे होहु रूपषोडसी मोटियारी ला । महानदी के निरमल पानी ला कछोरा भिरके तौरे हे। परसा फूल के आगी मा तन ला सेके हे । झरत महुआ ला ओली मा झोंके हे । सरई-सइगोना, बर-पीपर के कोरा मा डंडा पचरेंगा खेलइया ये नोनी आय – फुलगजरा । रुप षोडसी मोटियारी फुलगजरा । चातर राज, बस्तर राज अउ उड़िया राज जिला धमतरी, जिला कांकेर कोंडागांव अउ जिला नवरंगपुर के लोक परब अउ संस्कृति के मिंझरा सियार आय ये गाॅंव – महुआटोला हा। जगन्नाथ भगवान ला पांव परके गजामूंग खा लेथे । पचहत्तर दिन के दसेरा मनावत सल्फी लांदा ला चुहक लेथे। तब गौ लछमी ला गोबरधन खुन्दाके, सोहाई पहिराके, खिचरी खवाथे । नगरी सिहावा के कर्णेश्वर मड़ई मा डांग-डोरी ला गिदबिद-गिदबिद नचा घला लेथे। अउ भाखा ग्यान …उड़िया छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, हल्बी, भतरी सब गोठिया लेथे अपन पीरा ला बताये बर।जइसन भेष तइसन भाखा ।

” तुई तो तियार होऊन गेली से रे फुलगजरा ? पूजा पाठ करतोर काजे शीतला दाई बले जावतोर आसे (तेहा तियार होगेस का फुलगजरा ? शीतलामाता मा पूजा करे बर घला जाये के हे ।”)

” हव री होऊन गेली । (हव , बस हो गेव।)”

हिरौदी, मानकुंवर, सुकारो, सुकधनिया, दुलारी आयतिन , रमौतीन, नीलम, रेखा अउ मधु जम्मो कोई आगे दोरदिर ले। जहुरिया मन के गोठ ला सुनके किहिस। माड़ी ले लाल लुगरा, फुग्गा पोलखा, रूपियामाला, सुता ,नागमोरी करधन, अइठी, बाहा भर चुरी , माथ मा कौड़ी के मथौड़ी, मोरपंखी खोपा …गजब सुघ्घर बरन। संगी मन देखते रहिगे।

दुलारी इतरावत किहिस

“आजी तो तुई हुंचो जीव च नेऊन जहुआस कसन आले! ” (तेहा तो मार डारबे आज !)

“को चो ? ” (कोन ला ?)

” हुनि ” (उही)।

“को हुनि ”(कोन उही)।

“अऊर को मोके चलासित, गहिरा लेका के ।” (अउ कोन , मोला चलाथस । गहिरा टूरा ला कहत हँव।)

फुलगजरा अब लजागे । बातिक बाता नइ कर सकिस।

हा… हा …खी.. खी.. के आरो आइस। शीतला दाई के अंगना घला गमकत हावय अब।

           फुलगजरा अपन टोली के मुखिया डांसर आवय। गहिरा टूरा बलराम हा मांदर बजाथे तब सब मात जाथे । आज टेक्टर मा जोरा के मांदरी नृत्य देखाये ला जावत हे गरियाबंद।

” सेठ पिला के फोन आये रिहिस। रायपुर बलात हावय। एलबम मा बुता दुहुं कहिथे । जतका पइसा कबे ओतका दुहुं कहत रिहिस। मेंहा तो जाहू मोला हीरोइन बनना हे। तहुं चल फुलगजरा ।”

मानकुंवर किहिस मुचकावत।

“ओ चतुरा मन के बुध मा झन आ बहिनी । न घर के रहिबे, न घाट के । सेठ-साहूकार आदिवासी, छत्तीसगढ़िया के भला करे हे…. ? हुसियार फुलगजरा समझाइस। ओखर आँखी अगियावत रिहिस।

          आज बलराम हा दुकान ले बिसाके लाये मोरपांख ला ओरियावत रिहिस। बबा ढेरा मा परसा डोरी ला आटत हावय। अउ बाबू हा, सोहाई के छोटकुन बंडल बनात हावय। 

“बलराम तेहां का करत हस ? प्रैक्टिकल कापी देना तोर ?”

बलराम देखते रहिगे फुलगजरा ला आज  अपन घर मा।

“बइहा देखते रहिबे कि कुछू बताबे।”

“सोहाई बनाथन फुलगजरा ! (सोहाई पशुधन के नरी मा बांधे जाथे जौन हा मोर पांख, परसा के डोरी ,छोटकुन रिकम-रिकम के कपड़ा ला सुघ्घर सजाके बनाथे । येहा मनमोहनी हार आय।) ये परसा के जड़ ला लान के कुचरथन। छालटी निकाल के एक-एक रेशा ला हेर के ढे़रा मा आटथन। ये सादा डोरी ला हर्रा अउ चिखला माटी मा चिभोर के करिया करथन। सादा करिया डोरी मोरपांख अउ नान नान कुटका चिकमिकी ओन्हा बांधके बना लेथन सोहाई।”

बलराम बताइस फुलगजरा मुचकावत रिहिस ।

“हा सुघ्घर बनाये हव रिकम-रिकम के।”


“हव ! येहा दुहर सोहाई आय । झक्क सादा । येला देबी-देवता, गोर्रैया, ठाकुर देव अउ नन्दी महराज मा, डीही-डोंगर अउ दुधारू गाय में बांधथे। पचेड़ी सोहाई आय पचरंगा । गाय भईस मा बाँधथन। ये करेलिया सोहाई पांच लर के। ये गोल्लर अउ बड़का गर वाला गौलछमी मा बँधाथे। मंजुरहा सोहाई मा जोरदरहा मोरपंखी डारके बनाथन दुधारू गाय बर। सुघ्घर मंजूरपंखी के चांदा ला देखत रिहिस फुलगजरा हा। 

गोल सादा सोहाई येला गईठा कहिथे येला बईला भईसा बछरू ला बाँधथे ।”

बलराम के ददा देखाये लागिस ओरी पारी ।

“अभी ले बनाबो बेटी ! तब देवारी बर पुर सकबो ओ ! गाॅव‌ भर के गौलछमी बर।”

“येला सोहाई काबर कहिथे बबा ? ”

फुलगजरा किहिस

“सोहाई माने शोभा बढ़ानेवाला । पशुधन के शोभा मुकुट पहिरे राजा कस बाढ़ जाथे। पसीना ओगरा के हमर किसानी कारज मा पंदोली देवइया गौलछमी अउ प्रकृति ला मान देथन। सोहाई के मंजूर पांख भगवान किशन अउ सादा डोरी ला राधारानी घला कहिथे।”

बलराम बतावत रिहिस ।

फुलगजरा देखत रिहिस ओखर सांवर बरन ,फडकत भुजा, चाकर छाती, नरी मा करिया रेशम ला …।

“मोरो घर के शोभा बढ़ाबे का मोर जिनगी मा आके ? सोहाई कस सतरंगी कर देबे का ? मोर रानी ..! मोर सोहाई…।”

बलराम के आँखी गोठियाये लागिस । फुलगजरा घला हुंकारु दिस पलक झपक के। सब बिसरागे रिहिस जात धरम, रीति रिवाज, चाल चलागन , गाॅंव समाज ला । चन्दा-सुरुज, नरवा -डोड़गा , ताल-तरिया, सरई, महुआ रुख तक भेद नइ करिस। तब मया मा का के भेद….?

मोर राजा.. मोर बलराम !

मोर रानी .. मोर सोहाई..!

आँखी गोठियावत रिहिस । मुक्का भाखा, मूक सम्प्रेषण फेर सब गोठिया डारिस दुनो कोई प्रेक्टिकल कापी के बहाना। दुनो कालेज मा हावय।

चिरई-चिरगुन नानकुन रहिथे घर के शोभा बढ़ाथे । अउ उड़ियाये लागथे तब डर समा जाथे । कोनो शिकारी झपट्टा झन मारे अइसे । फुलगजरा के दाई ददा ला संसो होये लागिस। मया तो गोरसी के आगी आय उप्पर ले बुताये कस अउ तरी-तरी धधकत रहिथे। मया तो स्प्रिंग घला आय जतका दबाबे ओतकी उछलथे। ….अउ कोनो उछलथे तब दुरिहा के शिकारी कइसे फांसथे, फंसइया ला आरो नइ होवय। 

                येहां जंगलिहा गाॅंव गवई आय जतका सुघ्घर हावय ओतकी भयानक घला। मीठ चार तेंदू के रुखवा मा कोन कोलिहा बईठे हावय..? महुआ मा कोन परेत हावय…? आमा अमली के बौर मा कोन राच्छत लुकाये हे ..? मूसली सतावर सर्पगंधा मा कोन सांप लपेटाये हे..? कोंन गली ले रायफल पिस्तौल लेके निकलही ..? कोन पैडग़री मा टिफिन बम होही .? कोन सड़क उखड़ जाही..? कोन रेलवाही छिही बिही हो जाही….? कोनो नइ जाने।

फुलगजरा अउ बलराम पढ़ई मा हुशियार रिहिस । अउ गोठ बात मा सब मोहा जाही..। फेर आज तो उही मन मोहागे हावय । जल जंगल जमीन आदिवासी के हित गोठियइया मीठ लबरा मन मा। अधरतिया के वर्दी पहिन के मइलाहा सोच के दल मा वहु मिंझर गेहे। लाल सलाम के झंडा बुलंद करत हावय।


मुरलीवाला किसन कन्हैया की ….जय !

राऊत भाई मन जयकारा बोलाइस।

अरा ररा रे…….

घर घर दीया जलाओ संगी, आगे देवारी तिहार रे।

मोर संहाड़ा देव बर राखे हव, नरियर फुलगजरा हार रे।।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……।

दफड़ा बाजा तान मारिस


राउत भाई मन दोहा पारिस अउ बजनिया मन लहस-लहस के बाजा बजाइस। टिमकी मोहरी सिंगबाजा दफड़ा गुदुम झांझ मंजीरा झुमका ।

      सुघ्घर सवांगा राउत मन के । माड़ी ले पीयर धोती, लाल छिटही सलूखा , मोरपंखी के कमर बाजूबंद , मुड़ी मा खुमरी, खुमरी मा खोसाये चंदैनी गोंदा । बंगला पान के लाली ले मुॅॅंहू रंगे। अब्बड़ सुघ्घर बरन हावय गहिरा टोली के। ठोमहा भर तेल पियाईया तेन्दुसार के चिकचिकावत लउठी अउ आनी बानी के रेशम सुत चिकमिकी मा सजाये लउठी ला उप्पर उठा-उठा के नाचत हावय। गाॅंव के गौटिया पारा जावत हावय सोहाई बांधे बर। पहिली गौटिया बेड़ा-बड़का मंझला, नान्हे गौटिया घर के गौलछमी ला सोहाई बाँधही ।

अरे हा… ,

नेवरिया घर घला बाँधही सोहाई ला। नेवरिया-नवा-नवा आये हे ये गाॅंव मा। चार पाॅंच बच्छर होवत हे फेर अतका धाक हावय गाॅंव मा …कि अब ये गाॅंव मा नेरवा गड़े सियान दाऊ के घला कुछु नइ चले । कोन जन का मोहनी मंतर जानथे ते …. लइका सियान जम्मो मोहा जाथे । जवनहा मन तो अपन दाई ददा के पांव भलुक नइ परे अउ ओखर आगू मा डंडा सरन हो जाथे। अइसे हावय नेवरिया हा। अड़गड़ा पल्ली बड़गड़ा … टार अइन्ते तइन्ते हो जाही । बिचित्तर नाव हे। महुं ल लेये ला नइ आवय ओखर नाव ला। ओखरे सेती नेवरिया कहिथो सोझहा।


राउत नाचा अउ गौरी गौरा के बाजा बजनिया के पइसा नेवरिया कोती ले रहिथे। गाॅंव समाज वाला मन ऐखरे सेती तो मिलाय हावय अपन गाॅंव समाज मा। अउ सोहाई …? पइसा वाला के पांव कोन नइ परे..?


देवारी के दिन दाऊ बेड़ा मा । जेठाऊनी के दिन बीच पारा के किसान मन घर अउ पुन्नी के दिन आबादी पारा के नान्हे किसान मजदूर के गौलछमी मा सोहाई बाँधथे। 

"अभी सोहाई बांधे के पाछू काछन निकलही जल्दी करो गहिरा भाई मन ।"

गाॅंव के सियान मन किहिस।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……डंग। दफड़ा बाजा ताल दिस।

अरा ररा रे…….

जय महामाई रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल।

चौसठ जोगनी पुरखा के, बइहा मा होबे सहाय।।

बड़े दाऊ घर गिस सोहाई बांधे बर सुमिरन करत राउत टोली हा। गाॅंववाला मन उछाह मा रिहिस अउ गौलछमी.. वहू मन अब्बड़ गमकत हावय।

अरा ररा रे…….

मन मैला तन उजला , बगुले जैसा भेष हो।

इन सब ले कागा भला, भीतर बाहर एक हो।।


गहिरा मन दोहा पारिस नाचत कूदत । अउ गाॅंव के निकलती मसान घाट जाए के रस्दा, जंगल ले लगे झुंझकुरहा खेत मा बसे नेवरिया घर कोती रेंगे लागिस।

चार आँखी सब ला देखत रिहिस । जंगल मा हुआ-हुआ करइया आज गाॅंव आये हे। करिया बरन ला हेर के उज्जर बरन धर के। राउत मन तो जइसे कौआ अउ बगुला बर नही ..ऐखरे बर दोहा पारिस। आज दुनो एक दुसर के हाथ ला धरके मसकत रिहिस। आदिवासी के हित के गोठ करइया मन, जल जंगल जमीन बर न्याय के गोठ करइया मीठलबरा मन के कथनी अउ करनी ला जान डारे रिहिस। सड़क पुल पुलिया बिजली स्कूल कालेज बर बाधा बनइया ला जान डारिस।….असल गोठ ला जान डारिस।

           हमर संगठन हा पातर होवत हावय । अपन संगी संगवारी मन ला दल में जोर। पुलिस प्रशासन हमर कुनबा ला नाश करत हावय। घर लहुटे अभियान लोन वर्राटू हा कनिहा ला मुरकेट डारे हावय। लोगन मन घला अब नइ डर्रावय। नाच गान दल ले प्रमोशन होगे तुंहर । परीक्षा के घड़ी आवय । अब गाॅंववाला मन के बीच एसो के देवारी मा अइसे फटाका फोड़ कि रायपुर भोपाल दिल्ली अउ देश के कोना कोना तक आरो जाना चाही। इही तुंहर परीक्षा आवय । इही तुंहर  टास्क आवय।

              अइसना तो केहे रिहिस ओखर आंका हा। ओखरे सेती अइसे बम धरे हावय लुका के, कि काछन देखइया , गोबर्धन खुन्दवइया गाॅंव भर दहल जाही। हाहाकार मच जाही। ये चार आँखी बलराम अउ फुलगजरा के आय।

               सिरिफ बलराम अउ फुलगजरा भर नइ आये हे आज । ओखर संग आये हे सोमारू, आयतु, मड़का, श्रीनिवास, वेंकटेश, कुमारलू देवारी मनाये बर। लाखो करोड़ो इनाम हे ऐखर मन उप्पर प्रशासन डाहर ले। नेवरिया आय न नेवता देये हे, देवारी के कांदा कोचई खाये बर। देवारीच देखे बर नइ आये हे ऐमन। बम के धमाका सुने बर घला आये हावय। राउत मन नाचत हे फेर उछाह सब के सिकल मा हावय। बुढ़वा-जवान, लइका-पिचका, जीव-जिनावर सब मगन हावय। सब गमकत हावय। फटाका बर बिटोवत लइका। मंद महुआ पीके भकवाय कका, खोड़खोड़ी खेलइया टुरा मन, ठेठरी खुरमी बनावत दीदी मन । हाथा देवइया राउताईन मन ,पान खा के इतरावत नाती बबा…..।


सब मर जाही … ? सिरतोन सब मर जाही…? सब जुच्छा हो जाही …? सब सुन हो जाही… ? सब मरे ले आदिवासी ला अधिकार अउ न्याय मिल जाही..? ये गाॅंव के सिधवा मन के का कसूर …? फूल कस लइका काही नइ जाने…ओखर का होही….?


फुलगजरा अउ बलराम ला ओखर नान्हेंपन सुरता आगे । जम्मो कोई नत्ता गोत्ता लरा जरा लागत हावय कका काकी दाई महतारी दीदी बहिनी …। …गुने लागिस । ….जी कांप गे। रुआ ठाड़े होगे।


बाजा बाजत रिहिस। राउत मन नेवरिया घर तीर अमरगे।


“फोड़ो रे फटाका मोर बैरी बड़का दाऊ के कान फूटना चाहिये। बीच बस्ती ला घला जानबा होना चाही नेवरिया घर के सोहाई बँधागे अइसे।”

नेवरिया आय। अपन अंगना मा राउत मन ला नचवाये लागिस। सौ सौ के गड्डी ल फेकिस अउ कोठार के कुंदरा कोती चल दिस । सोमारू आयतु मड़का श्री….. जम्मो के उहिन्चे डेरा रिहिस। बलराम अउ फुलगजरा घला गिस टिफिन ला धरके । दुनो के हाथ मा रिहिस टिफिन, अउ टिफिन मा रिहिस देवारी के कलेवा कांदा कोचई बरा सोहारी सलगा बरा ठेठरी खुरमी ……।

राउत मन बिधुन होके नाचत हे अउ दोहा घला पारत हावय ।


अरा ररा रे…….

सोहाई बनायेव अचरी पचरी, गांठ दियो हर्रेइया।

जउन सोहाई ला छाटही, ओला लपेट लागे गोर्रैइया ।।


बलराम आय दोहा परइया। वहू तो आय गहिरा टूरा। सुकधनिया (सूपा मा धान दीया अउ सोहाई मड़ाये रहिथे ।)मा माड़े धान मा गोबर के लोई ला लोटाइस अउ कोठी मा सुघ्घर छपाये हाथा के बीच मा थोपिस। सोहाई ला निकाल के करिया गाय ला सोहाई बाँधत पारिस दोहा।

फट फट फट फट …..धड़ाम…। नेवरिया के दुवारी मा फटाका फूटत रिहिस फेर…. सब कोई देखे लागिस कुंदरा कोती ला। जतका फटाका फूटत रिहिस ओखर ले लाख गुना जादा आरो ले कोठार के कुंदरा मा फुटिस …फटाका… बमफटाका। चीख चित्कार करलई के आरो आइस सोमारू आयतु श्री …….सब्बो कोई के ।

ये बड़का फटाका सही जगह मा फूटे हावय आज । 


फुलगजरा मुचकावत रिहिस। ओखर सिकल मा गरब रिहिस कर्तव्य के परीक्षा मा पास होये के। चाक्कर छाती मा गुमान रिहिस बलराम ला गाॅंव लहुटे के।


दुनो के नजर अटकगे करिया गाय मा। कतका सुघ्घर लागत हावय …चपर-चपर दूध पियत बछरू …। पीठ ला चटर-चटर चाटत गाय …अउ गाय के गर मा बंधाये सुघ्घर दिखत सोहाई….। सोहाई मा साजे चाक्कर मोर पंखी…अउ मोर पंखी मा सतरंगी ….चांदा । अउ चांदा मा दुनो के …..गमकत सोहाई कस सपना। अउ सपना मा….।


-चन्द्रहास साहू

(द्वारा श्री राजेश चौरसिया)

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

मो. क्र. 8120578897

मातर मड़ई के जोहार..

 मातर मड़ई के जोहार..

  हमर छत्तीसगढ़ म देवारी परब ल तीनेच दिन के मनाए जाथे. कातिक अमावस के सुरहुत्ती अउ गौरा-ईसरदेव बिहाव परब. बिहान भर नवा खाई (अन्नकूट) अउ गोवर्धन पूजा अउ वोकर बिहान भर मातर परब. हमर  इहाँ के परंपरा म मातर के दिन ही मड़ई जगाए के परंपरा ल घलो पूरा करे जाथे. वइसे तो मड़ई ल सुरहुत्ती के दिन बनाए जाथे, अउ फेर घर के तुलसी चौरा या कोनो कुआँ तीर मढ़ा दिए जाथे, फेर वोला मातर के दिन ही गाँव के सियान मन बाजा-गाजा संग परघा के लेगथें, इही ल हमन मड़ई जगाना कहिथन. एकर बाद फेर तहाँ ले हमर इहाँ मड़ई अउ मेला के सरलग उमंग उत्साह चालू हो जाथे, जेहा महाशिवरात्रि म जाके पूरा होथे.

    हमर गाँव म गोवर्धन पूजा के बिहान भर मातर परब मनाए के रिवाज हे. गाँव भर के जतका गरुवा मन के बरदी हे, सबो ल दइहान ठउर म सकेले जाथे अउ जब गाँव भर के लोगन सकला जथें, त फेर वो सकलाए सबो गरुवा मनला वो जगा आंवर-भांवर घुमाए जाथे. ए बेरा म गाँव के पहाटिया समाज डहर ले दइहान ठउर म एक पूजा स्थल बनाए जाए रहिथे, जेला कतकों झन खुड़हर देव स्थापना करना घलो कहिथें. ये खुड़हर देव स्थापना या पूजा ठउर बनाए के बुता ल गोवर्धन पूजा के दिन ही पूरा कर लिए जाए रहिथे. उही मेर बोकरा के बली दिए के नेंग ल घलो पूरा करे जाथे. कतकों बछर बोकरा के बली के बलदा कोंहड़ा ल काटत घलो देखे हावन. अपन विशेष मयारुक गाय या भइंस ल वोमन ए बेरा म सोहाई घलो बांधथें.

    इही दिन हमर इहाँ मड़ई मनाए के घलो परंपरा हे. जानकर मन के अइसन कहना हे, के मड़ई ल खरीफ फसल के लुआए के बाद वोकर उल्लास के रूप म मनाए जाथे. एला अलग- अलग गाँव म अलग-अलग दिन मनाए जाथे, तेमा आसपास के दूसर गाँव वाले मन घलो अपन अपन गाँव के मड़ई ल धर के ए उल्लास म संघर सकंय. एकरे सेती गाँव के बइगा ह पंच सरपंच अउ आने सियान मन संग दिन तिथि जोंग के तीर तखार के सबो गाँव म एकर आरो कराथे.

   हमर गाँव नौकरीपेशा वाले गाँव आय तेकर सेती मातर के दिन ही मड़ई के आयोजन करे जाथे, तेमा रोजी रोजगार वाले मन मड़ई मना के बिहान भर अपन अपन बुता म संघर सकंय. 

  मड़ई म गाँव के जतका ग्राम्य देवता होथे, वोकरे मन के नांव म अलग-अलग मड़ई उठाए जाथे. ए सबमें एक माई मड़ई घलो होथे, जेला माई मड़ई या कंदई मड़ई घलो कहिथें. हमर गाँव म ए माई मड़ई ल मछिन्दर बबा ह उठावय. गाँव म हमरे पारा म उन राहंय. उंकर असली नॉव ल तो कभू जान नइ पाएन, हमन तो उनला मछिन्दर बबा अउ उंकर सुवारी ल मछिन्द्रिन दाई ही काहन. वोमन जात के केंवट रिहिन. उंकर मन के सरग सिधारे के बाद उंकर वंशज मन ही ए परंपरा के निर्वाह करथें.

   अइसे कहे जाथे, के मड़ई ह अच्छा फसल होए के उल्लास म ही मनाए जाथे. अउ अच्छा फसल जब वरुण देवता प्रसन्न होके भरपूर पानी बरसाथे, त होथे. एकरे सेती मड़ई परब के माई मड़ई ल केंवट या ढीमर समाज के लोगन ही उठाथें, काबर ते एमन वरुण देवता के उपासक होथें, अइसे माने जाथे.

   मातर मड़ई के परब म राउत समाज के भागीदारी अउ उत्साह ल देखतेच बनथे. एकर मन के बिना ए परब के रौनक के कल्पना घलो अबीरथा हे. जब राउत भाई मन अपन विशेष संवागा कर के गंड़वा बाजा संग दोहा पारत नाचथें, त अद्भुत दृश्य उपस्थित हो जाथे... 

पान खायेन सुपारी मालिक,

सुपारी के दुई कोर.

तुम तो बइठो रंगमहल में,

जोहार लेवव मोर.


अवत दिएन गारी गोढ़ा

जावत दिएन असीस.

दूधे खाव पूते बिहाव,

जीयव लाख बरीस.


  मातर परब संग मड़ई जागरण के जोहार अउ बधाई 🙏🌹😊

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

एक कहानी हाना के .... अपन बोली अपन रूवाब , पाँव म राख के मुड़ी म खाप

 एक कहानी हाना के ....


      अपन बोली अपन रूवाब , पाँव म राख के मुड़ी म खाप 

               अंग्रेजी राज ला देश ले भगाये बर , महात्मा गांधी के अगुवाई म , छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर मन घला , भारी मुहिम चलावत रिहिन हे । पंडित सुंदरलाल शर्मा के संगवारी मन के बीच धमतरी जिला म भारी लहर रिहिस हे । धमतरी के एक झिन नवजवान , शोभाराम जी हा , बाहिर ले डाक्टरी पढ़के लहुँटे रहय । ओहा देश के अऊ जगा के अपेक्षा , अपन प्रदेश के मनखे मनला , जादा पिछड़े हुये अऊ दुख पीरा म देखे रिहिस .... तेकर सेती , दूसर जगा डाक्टरी नइ करके , इहींचे अपन डाक्टरी सेवा शुरू करिस । डाक्टर साहेब देखय के  , अंग्रेज ले जादा , भारत के दूसर प्रांत ले आये मनखे मन , इहाँ लूट खसोट मचाये रहँय । ओला बड़ तकलीफ होवय । डाक्टर साहेब हा , गरीब मनखे के इलाज तो बिलकुल फोकट म करय फेर अमीर परदेसिया लुटइया मनखे ला , सोंटे बर छोंड़य घला निही ।    

               डाक्टर साहेब हा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रिहिस फेर संग्राम के बूता ला लुका लुका के करय । अंग्रेज मन के राज जाने बर , बड़का बड़का अंग्रेज साहेब सिपाही मन संग , डाक्टर साहेब दोस्ती कर डरिस । ओकर मन संग , जब गोठियावय तब अंग्रेजी म गिटिर पिटिर ........ , फेर गाँव के मनखे संग निमगा अपन बोली म गोठ बात करय ।  

               एक दिन एक झन अंग्रेज दोस्त हा बतइस के , सरकार हा इहाँ अंग्रेजी स्कूल खोलना चाहथे । डाक्टर साहेब पूछिस – काये करहू जी इहाँ अंग्रेजी स्कूल खोलके ? अंग्रेज दोस्त किथे – इहाँ के मनखे मन के बीच म , अपन भाखा के प्रचार प्रसार करना हे । डाक्टर के हिरदे धकधकागे । डाक्टर साहेब चाहय तो जरूर के , इहां के मन अंग्रेजी सीखय अऊ आगू बढ़य फेर , ये कभू नइ चाहिस के अपन भाखा ला छोंड़ के , दूसर भाखा संग उन्नति करय .. । अंग्रेज दोस्त ला बरगलावत डाक्टर किथे – इहाँ के अनपढ़ गवाँर मनखे मन , अंग्रेजी सीख जही त , तुँहर बरोबरी म खड़ा हो जही अऊ तूमन ला कहींच नइ समझही । अंग्रेज किथे – दोस्त , तैं निचट भोला भाला अस यार , स्कूल खोलके इहाँ के मन ला , अपन संस्कृति ले परिचय कराबो , मनखे के धरम परिवर्तन कराबो । वइसे भी एक बात ये आय दोस्त के , जदि हमन ला इहाँ लंबा समे तक राज करना हे त , इहाँ के धरम संस्कृति ला सीखे अऊ जाने बर परही , अऊ धरम संस्कृति ले परिचय के शुरूवात , बोली भाखा ले होथे । जब येला जान डरबो तब , ओकरे भाखा म उही मन के उप्पर राज करबो । 

               डाक्टर साहेब पूछथे – अरे मोर भाई , तुँहर भाखा ला यदि येमन सीख जही त , तूमन ला राज करन थोरहे दिही तेमा , बता भलुक .......? अंग्रेज दोस्त किथे – हमर कतको भाखा संस्कृति सीख जावय छत्तीसगढ़िया मन , फेर हमर कस चतुरई नइ पा सके । तैं सोंचत होबे के , हमन छत्तीसगढ़िया के उत्थान बर स्कूल खोलत होबोन कहिके , में तोला भीतर के बात बतावँव दोस्त , ये स्कूल उँकर उत्थान बर निही बल्कि , पतन बर आय । येमन हमर बोली सीख , हमर कुछ नइ बिगार सकय । हमर स्कूल म , जब इँकर लइका आही त , हमर लइका येकर सरी चीज ला सीख जही अऊ बड़े होके ,  छत्तीसगढ़ी गोठियाके , इँकरे उप्पर राज करही । डाक्टर साहेब अंग्रेज के चलाकी समझगे अऊ ओला भरमावत केहे लगिस – छत्तीसगढ़ी भाखा थोरहे आय तेमा यार , येहा केवल बोली आय , येला सीख के कायेच करहू । येमा न ब्याकरण , साहित्य , न इहाँ के संस्कृति के झलक .. । ये सिर्फ गँवइँहा मनखे के बीच , आपस म लोक बेवहार के माध्यम के अलावा अऊ कहींच नोहे । दुनिया म येकर ले खराब बोली अऊ कहींच निये । 

               छत्तीसगढ़ी सीख के , अंग्रेज मन इहाँ के जनता ला अऊ झिन लूट सकय सोंचके , अपन बोली ला सबले खराब केहे के पाछू , डाक्टर साहेब रात भर सुत नइ सकिस । फेर उही दिन कसम खा लिस के , इहाँ के बोली बात सीख के , इनला अऊ जादा लूटन नइ देना हे । अपन बोली ला कन्हो भुला झिन जाये सोंच के , ओहा भितरे भीतर अंग्रेजी स्कूल खोले के बिरोध के मुहिम म लगगे । डाक्टर साहेब हा संग्राम के हरेक बूता अऊ खबर ला , दवई बाँटत बाँटत , अपन बोली म गाँव गाँव के सुराजी बीर तिर पहुंचाये , फेर कभू आगू म बइठे ओकर अंग्रेज अफसर दोस्त , ओकर छत्तीसगढ़ही ला नइ समझ पावय । ओमन डाक्टर ला , अपन बोली सिखाये बर , जिद करय फेर , डाक्टर हा स्वतंत्रता आंदोलन बर चलत मुहिम के गोठ बात ला , बिया मन झिन समझ सकय कहिके , अपन बोली ला निचट बता के जानबूझ के , अपनेच बोली के घेरी बेरी अपमान कर देवय । 

               एक दिन के बात आय ... सेनानी मन के बइसका रायपुर म सकलाये रहय । एक के बाद दूसर , दूसर के बाद तीसर ला अपन बात राखे के मौका मिलत रहय । डाक्टर साहेब के नँबर अइस त ओहा , बाते बात म , अंग्रेजी स्कूल खोले के बिरोध म बोलत , अपन भाखा अऊ बोली के तारीफ करिस । एक झिन संगवारी , जेहा डाक्टर साहेब ला , अंग्रेज के दोस्त समझय तेहा टोंके लगिस , तैं तो कम से कम छत्तीसगढ़ी के तारीफ झिन कर डाक्टर साहेब , तैं हा येला निकृष्ट भाखा समझथस । तैंहा अपन बोली ला अपन पाँव के तरी रऊँदथस अऊ बात अबड़ बड़का बड़का करथस । ओ संगवारी सेनानी हा , अंग्रेज अऊ डाक्टर के बीच के बातचीत म , अंग्रेजी के गिटिर पिटिर म , छत्तीसगढ़ी भाखा ला बखानत , सुने रहय । डाक्टर साहेब ला , अपन संगवारी के बात ले , कन्हो फरक नइ परिस अऊ अपन पूरा बात , अपन बोली म रखिस । अपन बोली के बड़ई करत , जब अंग्रेजी शिक्षा लाने के पाछू अंग्रेज के मंशा बतावत , अंग्रेजी शिक्षा के बिरोध करिस तब , जम्मो सभा म खलबली कस मातगे । ओहा किहिस - जब हमरेच देश के दूसर प्रांत के मन , छत्तीसगढ़ी सीख के , हमर गँवइँहा छत्तीसगढ़िया मनखे मन ला अतेक ठगथे , जदि अंग्रेज मन सीख जही त , हमन ला सुक्खा चिभोर दिही । डाक्टर साहेब बतइस के अपन बोली ला मेंहा पाँव तरी नइ राखँव भाई बलकी येला अपन मुड़ी के शोभा मानथँव । सिर्फ अंग्रेज मनके चालाकी जाने बर .... उँकर आगू म अपन बोली के बुरई कर देथँव तेला कन्हो गलत झिन समझव । अपन बोली ला तहूँ मन अपन मुड़ मा खाप के .... अंग्रेजी भाखा के बिरोध म लग जावव ।  

                     अंग्रेज मन अभू तक डाक्टर ला अपन संगवारी समझय । डाक्टर के खुल्लम खुला बिरोध , अंग्रेज मनला इही दारी ले जनाबा होगे । अंग्रेज मन जान डरिन के , डाक्टर घला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आय । जे दिन मौका अऊ प्रमाण मिलिस , डाक्टर ला जेल म डार दिन । डाक्टर साहेब कस मनखे मन , अपन प्रदेश अऊ देश म , अपन बोली भाखा के राज चलाये बर ...... अपन बोली अपन रुवाब , पाँव म राख के मुड़ी म खाप ....... हाना ला जनम दे दिस ।  

हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

निर्मला

 *निर्मला*


रमेसरी अउ निर्मला नता मा देवरानी जेठानी रिहिस।निर्मला हा अपन देवरानी के कतको छोटे मोटे गलती ला घिरयावत परिवार के जतन मा लगे रहे।एती रमेसरी अपन लइका अउ अपन जेठानी के लइका मन मा दुआभेद करय।कोनो भी खाए पीए के जिनिस लावय त अपन लइका मन ला अपन कुरिया मा बलाके चुपचाप खवावय।

एती कभू निर्मला जब भी अपन लइका मन बर कोनो जिनिस बिसातिस त अपन देवरानी के लइका मन बर घलो बिसावय।एला उंकर अरोसिन परोसिन मन तक जानय।

फेर रमेसरी के बर्ताव ला देख के निर्मला के जीव घलो कल्ला जावय।ए बखत वो अपन मन मा ठान लिस कि अब में काकरो संसो नी करंव। सिर्फ अपन लोग लइका के धियान रखहूं।

काली के बात आय स्व सहायता समूह के दीदी मन संग निर्मला डोंगरगढ़ देवी दर्शन बर गे रिहिस।माता के दर्शन करके लहुटे लगिस त ओला लइका मन के कपड़ा दुकान दिखिस।ओहा दुकान मा जाके अपन लइका मन बर कपड़ा बिसाइस अउ दुकान वाले ला पैसा देके फेर मोटर में बइठे बर लहुटे लागिस।फेर को जनी का मन होइस ते फेर उही पाॅंव लहुटे लगिस त ओकर परोसिन कमला कहिथे-में जानत हंव ओ निर्मला तें अपन देवरानी के लइका मन बर कपड़ा बिसाय खातिर जावत हस।तोर मन मा दुआभेद कभू नी आ सकय। तें निर्मला हरस ओ निर्मला!!तोर मन मा मैल नी रहि सकय।

ओकर गोठ ला सुनके निर्मला मुच ले हांसदिस अउ बढ़िया असन कपड़ा छांटे बर धरलिस।


रीझे यादव

टेंगनाबासा(छुरा)

Monday, 6 November 2023

25 अक्टूबर जयंती म सुरता//

 25 अक्टूबर जयंती म सुरता//

छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक जागरण के पुरोधा दाऊ रामचंद्र देशमुख

   बछर 1971 म 7 नवंबर के जुड़हा रतिहा के सुरता छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास म सबर दिन अंजोरी बगरावत जगजग ले अमर रइही. काबर ते इही दिन दुरुग तीर के गाँव बघेरा म लोक-संस्कृति के जागरण काल के जयघोष "चंदैनी गोंदा" के प्रथम प्रस्तुति के रूप म होए रिहिसे. 

    दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के संयोजन म होए ए ऐतिहासिक प्रस्तुति ल तो मोला देखे के सौभाग्य नइ मिल पाए रिहिसे, फेर संगीतकार खुमान साव जी के संचालन म प्रदर्शित होए ए 'चंदैनी गोंदा' ल मैं जरूर देखे रेहेंव. भिलाई पावर हाउस म होए वो कार्यक्रम के जानकारी मोला खुद दाऊ जी ही दे रिहिन हें. तब वो मंच म दाऊ जी के सम्मान होए रिहिसे. तब मैं छत्तीसगढ़ी सिनेमा के नायक अउ बरछाबारी के संपादक रहे चंद्रशेखर चकोर संग उहाँ पहुंचे रेहेंव.

    दुरुग जिला (अब बालोद) के गाँव पिनकापार म महतारी मालती देवी अउ सियान गोविन्द प्रसाद जी के घर 25 अक्टूबर 1916 के जनमे दाऊ रामचंद्र देशमुख जी संग मोर चिन्हारी सन् 1987 के नवंबर-दिसंबर महीना म तब होए रिहिसे, जब छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के विमोचन करे खातिर उंकर जगा कार्यक्रम के पहुना बने खातिर अनुमति ले बर वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी संग उंकर घर पहुंचे रेहेन. बाद म तो हमेशा मेल-भेंट होवत राहय. कतकों बखत मैं उंकर घर बघेरा म रतिहा घलो रहि जावत रेहेंव. तब दाऊ जी संग चंदैनी गोंदा के संगे-संग छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया मन ले जुड़े विविध विषय म चर्चा होवय. तब जनावय, के दाऊ जी के भीतर छत्तीसगढ़ ल लेके कतका पीरा भरे हे, अउ ए सबके समाधान खातिर उंकर मन म का-का उपाय या रद्दा हे.

    ए बात सही आय के दाऊ जी ल चंदैनी गोंदा के माध्यम ले ही राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय स्तर म जादा प्रतिष्ठा अउ चिन्हारी मिलिस, फेर लोककला के संरक्षण अउ संवर्धन खातिर उन बछर 1950 ले ही 'छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच' के गठन के साथ ही लगगे रिहिन हें. एकर माध्यम ले उन तब के नाचा शैली म परिमार्जन करिन अउ वोला एक सम्मानजनक रूप देइन. वोमन कला के मनोरंजनात्मक रूप ल एक विचारधारा म जोड़त  वैचारिक क्रांति के रद्दा तक लेगे के भगीरथ उदिम करिन. आज हम छत्तीसगढ़ी गीत संगीत म, इहाँ के सांस्कृतिक मंच मन म, नवा पीढ़ी के रचनाकार मन म छत्तीसगढ़ी अस्मिता ले जुड़े विषय म बेधड़क बोलत अउ लिखत देखथन, सब उंकरे बोए बिजहा के परसादे देखथन-सुनथन.

    आज तो छत्तीसगढ़ राज बने के कोरी भर बछर ले आगर होगे हे. इहाँ के भाखा संस्कृति अउ कला खातिर इहाँ के सरकार ह कतकों उदिम करत रहिथे, तभो वो सब उदिम ह अधूरा जनाथे. तब वो बेरा के बात गुनव, जब लोगन छत्तीसगढ़ी बोले-बताए अउ अपन चिन्हारी बताए म लजाए असन करय. वो बखत अइसन बुता ल धर के आगू अवई ह कतेक जब्बर छाती वाले के बुता रिहिस होही? फेर दाऊ जी अपन धुन के पक्का रिहिन. उन पूरा छत्तीसगढ़ ले कलाकार मनला छांट-निमार के अपन संग जोड़त गिन. इनमा  मदन निषाद, लालूराम, ठाकुरराम, भुलवा दास, बाबूदास, मालाबाई, फिदा बाई आदि प्रमुख रिहिन. दाऊ जी ए बखत कला के संवर्धन के संगे-संग जनसेवा अउ समाज सुधार के कारज म ही लगावंय.

    दाऊ जी एक बखत मोला बताए रिहिन हें- छत्तीसगढ़ राज्य के स्वपनदृष्टा जेन रिश्ता म उंकर ससुर जी घलो रिहिन डाॅ. खूबचंद बघेल जी के चिट्ठी जेन वोमन 22 फरवरी 1969 के लिखे रिहिन हें, वोकर ले प्रभावित होके वोमन 'चंदैनी गोंदा' के सिरजन म आगू बढ़िन.' दाऊ जी बताए रिहिन के, डाॅ. खूबचंद बघेल जी उनला छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण खातिर आव्हान करत लिखे रहिन हें, के समाज के जनजागरण म आपके स्थायी भूमिका बनत हे. मैं चाहथौं आप समाज म वो भूमिका म आवौ, जेन अभी मैं करत हौं.  हमला आपके कलात्मक प्रतिभा के घलो जरूरत हे. अब आप वइसन नइ रेहेव, जइसन पहिली रेहेव. आप सिरिफ चिंतन, लेखन अउ निर्देशन के दृष्टि ले सोचव. महू योगदान देहूं. हमला छत्तीसगढ़ के हर हालत म नवनिर्माण करना हे.'

    डॉ. खूबचंद बघेल जी के वो चिट्ठी ह 'चंदैनी गोंदा' के सिरजन के इतिहास रचे म जबर बुता करिस. चंदैनी गोंदा के भव्यता अउ लोकप्रियता के डंका बजे लगिस. बताथें- एक बेर पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के कार्यक्रम रिहिसे अउ उहिच बेरा म थोरके दुरिहा म 'चंदैनी गोंदा' के कार्यक्रम घलो रिहिसे. बताथें, इंदिरा गाँधी जी के कार्यक्रम म लोगन के उपस्थिति नहीं के बरोबर रिहिसे. एकर कारण जाने खातिर जब इंदिरा जी पूछिन, त उनला बताए गिस के बाजू के गाँव म 'चंदैनी गोंदा' के कार्यक्रम चलत हे, जिहां लोगन उमड़े परे हे, वोकरे सेती इहाँ उपस्थिति नहीं के बरोबर हे.

    'चंदैनी गोंदा' के प्रस्तुति छत्तीसगढ़ म तो होबेच करय, एकर छोड़े उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्यप्रदेश आदि राज्य मन म घलो सफलता पूर्वक होइस. अखिल भारतीय लोककला महोत्सव यूनेस्को द्वारा आयोजित भोपाल के सम्मेलन म एला भारी सराहना मिलिस. 

    दाऊ जी अपन जिनगी के आखरी बेरा तक छत्तीसगढ़ी कला संसार खातिर समर्पित रिहिन. मोर सौभाग्य आय, छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन 9 दिसंबर 1987 के मैं उंकरेच पबरित हाथ ले करवाए रेहेंव. तब छत्तीसगढ़ी मंच के एक अउ साधक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी वो कार्यक्रम के अध्यक्षता करे रिहिन हें. 

    कला, साहित्य अउ संस्कृति के त्रिवेणी संगम दाऊ रामचंद्र जी देशमुख 13 जनवरी 1998 के रतिहा ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी लेइन. फेर जब तक छत्तीसगढ़ म गौरवशाली कला-संस्कृति के गोठ होवत रइही, तब तक दाऊ जी ल सम्मान के साथ सुरता करे जाही.

    अभी दाऊ जी के व्यक्तित्व कृतित्व ऊपर डाॅ. सुरेश देशमुख जी के संपादन म एक अच्छा ग्रंथ 'चंदैनी गोंदा : छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा' नाॅंव ले आए हे. जे लोगन या शोधार्थी मन छत्तीसगढ़ी कला ऊपर कारज करत हें, वोकर मन बर ए ह बड़ उपयोगी साबित हो सकत हे.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

पुरखा के सुरता 25 अक्टूबर - 107 वीं जयंती म विशेष

 पुरखा के सुरता


25 अक्टूबर - 107 वीं जयंती म विशेष 


चंदैनी गोंदा के सर्जक: दाऊ रामचंद्र देशमुख 


  हमर छत्तीसगढ के लोक संस्कृति ह अब्बड़ समृद्ध हे. इहां के नाचा, रहस,पंडवानी, पंथी नृत्य, भरथरी, लोरिक चंदा,कर्मा,सुवा,ददरिया, रिलो नृत्य के सुघ्घर सोर हे. हमर छत्तीसगढ के सोर बगराय म रंगकर्मी हबीब तनवीर, मंदराजी दाऊ, दाऊ रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर,तीजन बाई,मदन निषाद, गोविंद राम निर्मलकर, लालू राम, झाड़ू राम देवांगन,पूना राम निषाद, खुमान साव, लक्ष्मण मस्तुरिया, शेख हुसैन,  ममता चंद्राकर, कविता वासनिक , सुरूज बाई खांडे,अमृता बारले, नियाइक दास मानिकपुरी, झुमुक दास बघेल रामाधर साहू जइसन कला साधक मन के गजब योगदान हे. दाऊ रामचंद्र देशमुख  ह   सांस्कृतिक जागरण के  पितामह रहिन.


जब मोर जनम होइस वोकर ले दू साल पहिली “चन्दैनी गोंदा “के  स्थापना होगे रहिन हे. अउ जब येखर सर्जक श्रद्धेय दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ह जब येला कोनो कारन ले आगू नइ चलइस त मात्र 

आठ साल के रहेंव. मेहा दाउ राम चन्द्र देशमुख जी द्वारा संचालित” चन्दैनी गोंदा “ल कभू नइ देखेंव. दाउ जी ले घलो कभू आमने- सामने भेंट नइ कर पायेंव. मोर अइसन सौभाग्य नइ रीहिस हे. पर 

मोर डायरी म दैनिक सबेरा संकेत 

राजनांदगांव के “आपके पत्र “स्तंभ के पेपर कटिंग हे. वोखर मुताबिक मेहा 21 मार्च 1996 म दूरदर्शन केन्द्र रायपुर के कार्यक्रम “एक मुलाकात “ के तहत जब  राम हृदय तिवारी जी ह दाऊ जी ले “गोठ बात “करे रीहिन हे वोला मेहा गजब रुचि लेके सुने रेहेंव. काबर कि मेहा कई ठक अखबार म श्रद्धेय दाऊ जी के जीवन परिचय, चन्दैनी गोंदा अउ “कारी” के बारे म पढ़े रेहेंव.  उद्भट विद्वान डॉ. गणेश खरे जी के लेख के सँगे- सँग  कुछ अउ विद्वान मन के लेख ल पढ़े रेहेंव. जब दूरदर्शन केन्द्र रायपुर ले ये गोठ-बात ह शुरु होइस त मेहा आखिरी होत तक टस से मस नइ होयेंव.  ये भेंटवार्ता ले मोला छत्तीसगढ़ लोक कला मंच के विकास यात्रा म दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के योगदान के सुग्घर जानकारी मिलिस.  राम हृदय तिवारी जी ह दाऊ जी गजब अकन सवाल करिन कि देहाती कला विकास मंडल अउ चन्दैनी गोंदा के गठन अउ कारी, देवार डेरा के मंचन के का उद्देश्य रहिन  हे. चन्दैनी गोंदा के पहिली इहां के नाचा अउ लोक कला मंच के कइसन दशा अउ दिशा रहिन  हे .चन्दैनी गोंदा ल आप  विसर्जित करे जइसे कठिन निर्णय काबर लेंव. अइसे का परीस्थिति अइस!  ये सवाल तिवारी जी ह श्रद्धेय दाऊ जी ले करिन त वोहा एकदम भावुक  होगे. वर्तमान म लोक कला मंच के दशा अउ दिशा उपर जब चर्चा चलिस तब दाऊ जी ह गजब उदास होगे अउ कहिस कि हमर छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान ल जगाय बर काम नइ हो पावत हे! लोक कला मंच के नाम म सिनेमा संस्कृति के जोर होगे हे! अइसे कहत -कहत दाउ जी ह एकदम गंभीर होगे. 


  दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के जनम  25 अक्टूबर 1916 म बालोद जिला के डौंडीलोहारा विकासखंड के गाँव पिनकापार म होय रहिन हे. वोकर पिता गोविंद प्रसाद बड़का किसान रिहिन.  उंकर प्राथमिक शिक्षा गांव म  होइस. फेर नागपुर विश्वविद्यालय ले बीएससी (कृषि) म स्नातक  अउ वकालत के पढ़ाई करिन.  ऊंकर बिहाव छत्तीसगढ़ के स्वप्न दृष्टा खूबचंद बघेल के बेटी राधा बाई ले होइस.बचपना ले वोहा दार्शनिक अउ चिंतक प्रवृत्ति के रिहिन.नानपन ले नाचा अउ नाटक देखे के सउक रहय.  शादी के बाद बघेरा म रहिके उन्नत ढंग ले  खेती -किसानी करिन. दाऊ जी ह आयुर्वेदिक पद्धति ले अपन गांव बघेरा म लकवा अउ पोलियो मरीज मन के ईलाज करके जन सेवा करिन. 


  कला यात्रा के बात करथन त दाऊ जी शुरु म पिनकापार म राम लीला मंडली के गठन करिन. वोहा खुद नाटक अउ राम लीला म भाग लेय. 


वोहा 1950  म देहाती कला विकास मंडल के गठन करिन .  येकर माध्यम ले अंचल म प्रचलित नाचा के प्रस्तुति म परिष्कार करिन. दाऊ जी कलाकार मन के खोज म गांव- गांव भटकिन.


. येमा लाला फूलचंद श्रीवास्तव  जी चिकारावाला (रायगढ़), ठाकुर राम जी , भुलवा (रिंगनी साज),  रवेली साज के मदन निषाद जी (गुंगेरी नवागाँव, डोंगरगॉव, राजनांदगांव) जइसे बड़का कलाकार शामिल होगे. दाऊ जी ह ये कलाकार मन ल लेके काली माटी, बंगाल का अकाल, सरग अउ नरक, राय साहब मि. भोंदू खान साहब नालायक अली खां, मिस मैरी का डांस जइसे प्रहसन खेल के मनोरंजन के सँगे -सँग जनता ल संदेश घलो दिस.  दाऊ की मंडली ले जुड़े कुछ बड़का कलाकार मन प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीर तनवीर के नया थियेटर दिल्ली म शामिल होगे.  सन् 1954 ले 1969 तक  दाऊ जी ह अपन सबो समय ल जन सेवा अउ समाज सुधार म लगा दिन. कई साल तक

शांत अउ गुमनामी के जिनगी गुजारिस.  फेर अपन माटी के करजा ल छूटे के प्रेरणा ऊंकर अंतस म सदा ले समाय रहिन हे.अउ वोहा सामने आइस 20 बछर बाद "चंदैनी गोंदा "के रूप म. 


  अउ 7 नवंबर 1971 म अपन गाँव बघेरा (दुर्ग)  मा सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्देश्य लेके लोक सांस्कृतिक संस्था “चन्दैनी गोंदा “के गठन करिन.  चंदैनी गोंदा के स्थापना म" चांद बी" नांव के एक बीमार अउ भूख ले तड़पत नोनी जउन ह दाऊ जी के घर भांजी मांगे बर आय रहिन. डर के मारे कोठ म दुबक गिस. येला देखके दाऊ जी के हिरदे म उथल - पुथल मच गे. वोला लगिस कि -" धान के कटोरा, प्रकृति के अब्बड़ खजाना हे हमर छत्तीसगढ पर दूसर कोति लगिस कि -"मानो इही छत्तीसगढ़ ये; गरीब, कमजोर,बीमार अउ डर्रावत." फेर निकल पड़िन सांस्कृतिक पुनर्जागरण बर. 


 बघेरा के बाद  येकर प्रस्तुति पैरी, भिलाई, राजनांदगांव,धमधा,नंदिनी, धमतरी,झोला,टेमरी अउ जंजगिरी जइसन जगह म 50-50 हजार दर्शक मन के सामने होइस. चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन छत्तीसगढ़‌ के संगे संग उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली अउ मध्य प्रदेश म घलो सफलतापूर्वक होइस. अखिल भारतीय लोक कला महोत्सव यूनेस्को द्वारा आयोजित भोपाल सम्मेलन म कार्यक्रम के गजब प्रशंसा होइस. 


 चंदैनी गोंदा ह हमर छत्तीसगढ के कवि मन के लिखे गीत ले सजगे. दाऊ जी ह चंदैनी गोंदा के बड़का कार्यक्रम म इहां के साहित्यकार मन के सम्मान करके एक नवा उदिम करिन. 



दाउ जी ह चन्दैनी गोंदा, कारी के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के पीरा ल सामने लाइस. इहां के रहवासी मन के स्वाभिमान ल जगाइस.किसान,मजदूर अउ नारी मन के दयनीय दशा ल सामने लाके शोषक वर्ग मन के बखिया उधेड़िन . चन्दैनी गोंदा के माध्यम ले  लक्ष्मण मस्तुरिया जी,  खुमान साव जी, गिरिजा सिन्हा, लाला फूलचंद श्रीवास्तव,महेश ठाकुर, पंच राम देवदास,मदन चौहान, संतोष कुमार टांक,रामरतन सारथी, केदार यादव जी, साधना यादव जी, भैया लाल हेड़ाऊ, शेख़ हुसैन,रवि शंकर शुक्ला, शैलजा ठाकुर, संतोष झांझी, मंजूला बनर्जी,शिव कुमार दीपक, इतवारी राम साहू, बहादुर सिंह ठाकुर,श्रवण कुमार दास, प्रमोद शर्मा,जगन्नाथ,राम दयाल, ठाकुर राम, मुकुंदी राम, हीरा सिंह गौतम चित्रकार,  राज कुमार शर्मा,विजय वर्तमान,बसंत दीवान छायाकार, मुकुंद कौशल गीतकार, किस्मत बाई, माला, पदमा,लीना टोप्पो,आशा, चांद बी, सुमन ठाकुर, निर्मला ठाकुर, मैनुद्दीन, राज लक्ष्मी ठाकुर,अघनू राम ठाकुर, शुक्ला,बसंती( तेलासी),माया, ज्योत्सना महापात्र,मीना, मदन शर्मा, वासुदेव तंबोली 



कविता हिरकने (वासनिक ), संगीता चौबे, अनुराग ठाकुर,  डा. सुरेश देशमुख चंदैनी गोंदा के प्रथम उद्घोषक, माखन लाल साव, जइसे उम्दा कलाकार सामने आइन. 

 चंदैनी गोंदा के बारे म संत कवि, भगवताचार्य पवन दीवान के कहना रहिन कि -" ये कार्यक्रम ह अत्तिक मार्मिक हे कि छत्तीसगढ़ के जनता ल अपन संस्कृति अउ इतिहास बर परान देय के प्रेरना देथे." बुधियार साहित्यकार डॉ. गणेश खरे के बिचार रहिन कि -"चंदैनी गोंदा सिरिफ मनोरंजन भर नइ करय बल्कि ये अंचल म जन जागृति लाय बर सुघ्घर उदिम करत हे". डा  मनराखन लाल साहू ह कहिन कि - "छत्तीसगढ़ म जो कुछ सबले बढ़िया हे वोहा "चंदैनी गोंदा" म हे." खुद दाऊ जी ह चंदैनी गोंदा ल पूजा के फूल मानय. 


गीतकार मन के गीत ले सजगे चंदैनी गोंदा


चंदैनी गोंदा के प्रसिद्धि म गीतकार मन के सुघ्घर योगदान हावय. शीर्षक गीत रविशंकर शुक्ल के रहिन - देखो फूलगे,चंदैनी गोंदा फूलगे,चंदैनी गोंदा फूलगे. लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत- मंय छत्तीसगढ़ अंव गा,मोर संग चलव रे,जय होवय तोर, पड़की मैना, बखरी के तुमा नार, धरती के अंगना म चंदैनी गोंदा,मोर खेती खार रूनझुन, मन डोले रे माघ फगुनवा,  कोदू राम दलित के - छन्नर छन्नर पइरी बाजय,राम रतन सारथी के सोन के चिरइया, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र के धमनी हाट, प्यारेलाल ग्रुप्त के झिलमिल दिया बुता देबे,पवन दीवान के तोर धरती तोर माटी, नारायण लाल परमार के गांव अभी दूरिहा हे,भगवती लाल सेन के बसदेव गीत, हेमनाथ यदु के सहर जातेन , चतुर्भुज देवांगन के माटी होही तोर चोला, राम कैलाश तिवारी के चलो जाबो रे भाई, ब्रजेन्द्र ठाकुर के दिया के बाती,धरम लाल कश्यप के गोली तंय काबर चलाय,लाला फूलचंद श्रीवास्तव के सोहर गीत - अइसन जनितेंव, मुकुंद कौशल के चलो बहिनी जाबो,डा. विनय पाठक के अन्ताज पाय रेहेंव, रामेश्वर वैष्णव के मोला जान दे संगवारी के संगे संग लोक गीत होइरे होइरे मोर मैना बोले रे, देवार मन के पारंपरिक गीत - गोदना गोदा ले, करमा सुने ला चले आबे का,नेंगी जोगी ले लेबे हरजाना, माड़ गयो दरबार म करसा जइसन गीत ले चंदैनी गोंदा ह सजगे. गायक- गायिका मन के सुमधुर आवाज,गजब के संगीत अउ अब्बड़ सुघ्घर नृत्य ले चंदैनी गोंदा के महक ह चारो मुड़ा ममहाय लगिस. अउ ये प्रकार ले चंदैनी गोंदा के सोर सबो डहर बगरगे.


  मेहा दाऊ जी द्वारा संचालित चन्दैनी गोंदा ल कभू नइ देखेंव पर 

बाद म लोक संगीत सम्राट श्रद्धेय खुमान साव जी द्वारा संचालित चंदैनी गोंदा ल घलो मात्र दो बार देख पायेंव .


    छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संरक्षक , चंदेनी गोंदा के सर्जक दाऊ जी  ह 13 जनवरी 1998 म  रात के 11 बजे अपन नश्वर शरीर ल छोड़ के स्वर्ग लोक चले गिस. दाऊ जी ह अपन यश रुपी शरीर ले हरदम जीवित रहि.  दाऊ जी के समृति  ल संजोय बर रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान के स्थापना 1999 म करे गिस.पहली सम्मान बुधियार साहित्यकार, इतिहासकार, पत्रकार हरि ठाकुर ल प्रदान करे गिस. चंदैनी गोंदा: छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा " स्मारिका के विमोचन चंदैनी गोंदा के स्वर्ण जयंती प्रस्तुति के सुघ्घर बेरा म 7 दिसंबर 1976 म बघेरा म होय रहिन.येखर संपादक मंडल म बुधियार साहित्यकार त्रिभुवन पांडेय, नारायण लाल परमार सामिल रहिन. ये स्मारिका छत्तीसगढ़ बर एक धरोहर हे. येखर दूसरइया संस्करण दाऊ जी के भतीजा अउ चंदैनी गोंदा के पहली उद्घोषक डा. सुरेश देशमुख के संपादन म राजगामी सम्पदा न्यास राजनांदगांव के सहयोग ले 2021 म निकाले गे हावय.


श्रद्धेय दाउ जी ला शत् शत् नमन हे. विनम्र श्रद्धांजलि. दाऊ जी ह कहय-" छत्तीसगढ़ के माटी करजा हे मोर उपर. मोर सबो कला साधना ह ये करजा ल चुकाय के एक उदिम हे". 


          ओमप्रकाश साहू “अंकुर” 


      सुरगी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)


 मो. 7974666840