Thursday, 28 May 2026

गीत, ग़ज़ल अउ कविता के फुलवारी: छतनार*

 

*गीत, ग़ज़ल अउ कविता के फुलवारी: छतनार*


पोखन लाल जायसवाल 

'छतनार' काव्य संग्रह राजकुमार चौधरी 'रौना' के चउथइया किताब आय। जेन हर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहन ले बछर 2025 मं प्रकाशित करे गे हे। साहित्यिक दृष्टि ले कृति ऊपर गोठ-बात करना सही रहिथे। पर कृतिकार के जिनगी ला झाॅंकत रचना संसार मं उतरे के अपन एक अलगे आनंद हे। मजा हे। भाव समझे के सुभिता घलव।

राजकुमार चौधरी 'रौना' छत्तीसगढ़ी साहित्य बर एक समर्पित नाम हे। जौन मन तीन कोरी ले आगर सावन देख चुके हें। उन ला ए सावन मन कभू हरियर होय के सुख नइ पहुॅंचाइन। उॅंकर जिनगी मं सावन हा हरदम पूरा बन के आइस। जब आवय, तब ओकर बर दुख-पीरा अउ अभाव के काप छोड़ चल देवय। उन कतको जतन करिन, उदिम करिन, फेर उॅंकर किस्मत उन ला कभू संग नइ दिस। उन बड़ मिहनती हें, करम करे ले कभू नि ढेरियाइन। बड़ फजर ले सुरुज नरायन ल परघावत अपन बुता मं लग जथें अउ बेरा आछत ले भिंड़े रहिथें। हाथ मं कतको रेखा हें, लकीर हें। फेर फ़कीर के लकीर। भाग के रेखा कभू चमकिस नहीं। भाग के जब्बर रेखा जइसे उॅंकर लाखा मं नइ परिस। तभो जिनगी ले हारिन नइ, न घबराइन। उन ल ओकर (जिनगी) ले कोनो शिकायत नइ होइस। संतोषी सुभाव के रौना हरदम खुश रहिथें। जेन हे, तेन मं खुश रहना, उॅंकर सब ले बड़े खासियत आय। कखरो ले न जलना अउ न कोनो कॉम्पीटिशन। बड़े बने के कोनो सउॅंक नहीं। ...ससन भर अगास मं उड़े पाछू आना तो भुइॅंया च म हे। बस अपन बाॅंटा के बुता मं लगे रहिथें। अपन व्यंग्य अउ कविता मन ले उन आजो छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़वार मं चेतलगहा बुता कर हावॅंय।

'छतनार' उही उदिम के एक ठिन चिन्हारी आय। छतनार के ए फुलवारी मं गीत, छंद, ग़ज़ल, मुक्तक अउ नवा कविता के रकम-रकम के फूल फूले हें। जेमा जिनगी के रंग हे। माटी के ममहासी हे। बेरा के व्यथा हे। प्रगतिशीलता हे। जागरण के आरो हे, संदेश हे। मया-पीरा के कथा घलाव हे। प्रकृति के सुघराई हे। 

मनसे जब महतारी के गोदी म रहिथे, तौ ओकर मन लोरी सुन के बहल जथे। कहे के मतलब हे कि गीत ले हमर जुराव ननपन ले रहिथे। गीत आनंद देथे, जिनगी मं रस घोरथे। चाहे गीत लोरी, सोहर, बिहाव, ददरिया, करमा, जइसन कोनो भी गीत होवय। ए संग्रह के पहिली खंड गीत ले सजे हावे। रकम-रकम के 31 गीत हें। जेन म प्रकृति चित्रण के संग मया-पिरीत के गीत हे। जेन मं मिलन के सुग्घर सुर मिलथे त बिरहा के पीरा घलाव।

पहलइया गीत मं मैना ले मुॅंहाचाही करत रौना लिखथें-

जेन करे जंगल अजार

ओ तो पाही दुख अपार

कर ले भुॅंइया के सिंगार मैना मीठ-मीठ गा ले

तोर भाखा हवे मज़ेदार मैना....

      

सिरतो तो हरे कि जब जंगल उजर जही त दुख-पीरा के पूरा आही। जिनगी संकट मं पर जही। खाड़ी मं युद्ध के चलत कहूॅं तेल नि आही/नइ मिलही त का होही, कल्पना कर सकत हन। जेन हम ला कॅंपा देथे। जंगल के रहे ले जम्मो सुख हे। बिन जंगल के जिनगी के जम्मो रंग फीका हे। फेर समझत कहाॅं हन? बस विकास के सरग निसैनी मं चढ़े जात हन। सरग छुआही कि नहीं एकर ठिकाना नइ हे। काबर कि मन पंछी उड़े ले नि छोड़य।

      

दूसर कोती जंगल मं एक डर हे। जेहर रोज रोवाथे। नक्सली मन के करतूत ले काकर अंतस् रोवत नइ होही। बेकसूर अउ आम आदमी के लहू ले रॅंगत भुइॅंया के पीरा ला रौना लिखथें-


रोज़ हमर धरती लाले लाल होवथे।

नक्सल के मारे माटी, लाले लाल होवथे।


ए पीरा के बादर कब छटही कोन जनी। इही मेर ओ गोहार लगाथे कि 'वो दिन कौने दिन आही'

ए गीत मं विकास के अगोरा मं हमर स्वाभिमान के गिरवी धराय के पीरा हावय। मन मं इही भरोसा राखे कि कोनो दिन हमरो आही। इही सपना देखत लिखथें-


खान खदानों धन दोगानी उहिच मन पोगरावत हें 

तुॅंहरो ठेंगा फरसा भाला धरे-धरे भोथरावत हें 


मुड़ी अपन गड़ियाना छोड़, चेथी ला खजुवाना छोड़

अपने छाती ला तनियाही रे....


हमर इहाॅं उवत बेरा के पैलगी करे के चलन हे। धरती मं जिनगी सुरुज के वरदान आय, काबर कि ओकरे ऊर्जा ले ये दुनिया संचालित हे। सुरुज ला लेके 'रौना' के लिखे मानवीकरण अलंकार के एक उदाहरण आप मन के पढ़े बर रखत हॅंव, जेन मं आशा के एक किरण हमर घर पहुना बन के रोज आथे। सुख सकरात लाथे।


पहिली किरन सुरुज देव के, भाॅंड़ी चढ़ के आवत हे।

आस जगावत 

नवा किसम के, सुख सुमता बगरावत हे।


'ये पिंजरा के पोसे सुवना' विरह के गीत आय। फेर ए गीत मं छायावादी गीत के ममहासी हे। दर्शन हे। आत्मा अउ परमात्मा के बीच संवाद हे। 


सतरंगी कविता (कविता खंड) मं गर्मी अउ बरसात के सुग्घर चित्रण हे। बेटी कविता के प्रवाह, भाव अउ शिल्प अतेक बढ़िया हे कि पाठक गरीब अउ मिहनतकश बाप के अंतस् के पीरा संग अगाध मया के सगरी ले तर-बतर होय बिगन रहे नइ सके। आखिरी पद देखिहौ-


खाई लेके खाबे कहिके/ अठन्नी दे मनाये हॅंव/ पेट बिकाली हवे जरूरी/ लकर-धकर तब आये हॅंव/ वो मोर मया के झॅंपली ए/ प्यार के संदूक पेटी ए/वो मोर मयारू बेटी ए।


'रेला के झाला' कविता प्रतीकात्मकता रूप मं मनखे के जीवन के संघर्ष ला रेखांकित करे मं सफल हे। रेला/रेरवा/बया/दर्जिन पक्षी मानव के प्रतीक आय। कविता मं जीवंतता हे। 

    

साहित्य, संस्कार अउ संस्कृति के पोषक आय। फेर इही साहित्य समाज बर सचेतक के भूमिका अदा करथे। समाज मं व्याप्त विसंगति, विद्रुपता के संग पाखंड अउ आडंबर के विरुद्ध मुखरित हो के समाज ला एक दिशा बोध कराथे। रौना के लेखनी समाज मं व्याप्त हर कुरीति अउ विसंगति ऊपर चलथे।  

देश धर्म ला ताक मं रख आपस मं जात-धरम के नाॅंव ले लड़इया मन ऊपर उॅंकर गुस्सा देखव-


रोजे झगरा जात धरम के, मंदिर मस्जिद माथा फोर।

सूते जठना सिसकी पारे, देश धरम के कनिहा टोर।। (पृ. 59)


बिम्ब अउ प्रतीक विधान संग्रह ला नवा उॅंचास देथें। भाषाई दृष्टि ले शब्द चयन लाज़वाब हे। ध्वन्यात्मक अउ जोड़ा शब्द (युग्म) मन संग्रह के सुघरई बढ़ाथें। हाना-मुहावरा मन के प्रयोग मनभावन हे। गीत कविता ला नवा उॅंचास देथें। अलंकार के बिगन काव्य रचना संभवे नइ हे। एकरे सेती अलंकार के गोठ-बात करना ज़रूरी नइ समझत हॅंव। गीत मन मं माधुर्यता हे। शृंगार के संग सामाजिक सरोकार घलाव हे। 

 

ग़ज़ल मं व्यंजना अउ व्यंग्य दूनो के पुट मिलथे। ग़ज़ल मन बह्र मं लिखे गे हें, ग़ज़ल के कहन उॅंकर ग़ज़ल संग्रह 'पाॅंखी काटे जाही' के तुलना मं इक्कीस हे। कहन अउ बुनावट मं कोनो समझौता नइ दिखिस। उॅंकर ग़ज़ल पटरी मं दौड़े ला धर लेहे। 

जाॅंगर टोर कमइया मजदूर अउ किसान ला समर्पित एक ग़ज़ल के मतला अउ एक शेर आप मन बर बतौर नज़राना पेश करत हॅंव-


हवा घाम पानी म जाॅंगर छरे हन।

तभे भात रोटी के सथरा धरे हन।


सधे ना किसानी करम हा सहज मा

खपाके बदन चाम करिया करे हन। (पृ.96)


व्यवस्था मं बाधा परत मन ला ताना मारत उन शेर कहिथें


झूठ लबरा सियानी करे देश मा

दोगला ला न तो बातबानी हवे। (पृ.92)


मन के करिया मनखे ऊपर उॅंकर शब्द बाण देखव


बैर भरे हे जेकर भीतर

भूॅंजत हें वो मन दाॅंवा ढिल।


'मुक्तक रौना के' खंड मं उॅंकर 47 मुक्तक शामिल हें। जौन मन प्रभावी हें। भाव पक्ष अतेक प्रबल हे के पाठक पढ़त खानी एक नवा दुनिया मं विचरे लगथे। चित्रण गज़ब के हे।


बीपत के ऑंसू ला हम पीये बर सीखे हन।

घाम-छाॅंव मा जिनगी ला जीये बर सीखे हन।

झन देखव रे तुम तन के तुनहा ओनहा ला,

हम तो फटहा मन हिरदे ला सीये बर सीखे हन।


नता-गोता, मनसे, अउ घर-परिवार के नैतिक मूल्य मं गिरावट ऊपर उॅंकर मन के पीरा ए मुक्तक मं झलकथे-


छप्पर छानी घलो बदलगे जेमा बरखा घाम सहन।

धरे कटारी वो किंजरत हे जेला भाई राम कहन।

बाॅंटे भाई परोसी होगे परछी मा नेंग निभाथे

बदल गये घर के परिभाषा जेला चारों धाम कहन। (पृ.90)


मृत्यु ए संसार के आखरी सच आय, फेर माया के टोपा पहिने मनखे ले उन सवाल पूछथें-


छूट जही इहचे सबो गठरी जबर जैजाद के।

छोड़ दे अभिमान तन के शान ला औलाद के।

काल जब सोरियाही तब कहाॅं तैं भागबे

लेगही मरघट मं रौना चार संगी लाद के। (पृ.89)


ऊपर के ए मुक्तक मं जिनगी के दर्शन हे, सच्चाई हे।

रौना छंद अउ ग़ज़ल के जानकार हें, मुक्तक बढ़िया लिखथें। मुक्तक छंद या ग़ज़ल के शिल्प मं होथे। अइसन मं कुछ मुक्तक मन मं शिल्पगत सुधार के ज़रूरत हे। जेन ला उन कर सकथें। अवइया संस्करण मं ए कसावट दिखही ए आशा करत हॅंव।


लेखन मं समय के संग प्रगतिशीलता दिखना चाही। एके ढाॅंचा/खाॅंचा/पटरी अउ कथानक मं चले ले नीरसता आथे। इही ला सरेखत रौना एक सवैया लिखथें-


कतका दिन ले बड़ गात रहिबे रखिया मुनगा बर गीत सखा।

भरमार लिखे हस देव मया जस तीज तिहार फलीत सखा।

बितगे जुग बात नवा कर ले हित मान जगे नव रीत सखा।

लिख मानवता जग व्यापकता रस राग जिये धर पगीत सखा।


तुलसी दास जी मन अपन लेखन ल स्वांत: सुखाय बताय रहिन।  आजो बहुत झन उही सुख के अनभो करथें अउ लिखथें। रौना घलव अपन मन के भाव ला लेखन मं उतारे के फकत एक उदिम कहे हे। उॅंकर ए उदिम ला नमन करत हुए उॅंकरे लिखे मुक्तक उन ला समर्पित करत हॅंव -

पेड़ पथरा मा फूल पान चढ़ा लेथन हम

उथली तरिया मा डूबकी लगा लेथन हम

का लिख पाबो हम गीत पोथी रचना ला

कागज करिया करके मन मड़ा लेथन हम।


छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले प्रकाशित ए कृति के मुखपृष्ठ आकर्षक हे, आयोग डहर ले प्रकाशन के ए सुविधा रचनाकार ला प्रोत्साहित करथे। 'छतनार' मं बहुत अकन वर्तनी त्रुटि हे। जेकर ले आयोग के साख दाॅंव मं लगथे। छवि खराब होथे। आयोग डहर ले छपे किताब मन मं वर्तनी त्रुटि मिलना भाषा बर काम करइया आयोग कतेक गंभीर हे, ए सवाल खड़ा करथे। ए त्रुटि मन ले छुटकारा पाए बर प्रकाशन विभाग ला छत्तीसगढ़ी के जानकार ले प्रकाशन के पहिली दुबारा जाॅंच कराना चाही।

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काव्य संग्रह: छतनार 

कवि: राजकुमार चौधरी 

प्रकाशक: डॉ अभिलाषा बेहार, सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 

प्रकाशन वर्ष: 2025

पृष्ठ: 108

स्वामित्व: छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 

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पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा छग 

मोबाइल 9977252202

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*

 *छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*


हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा तिहार मन के विशेष महत्ता हे चाहे वो हरेली हो, राखी, अक्ती, देवारी, जेठौनी, छेरछेरा या तीजा तिहार हो। सबो तिहार के अपन-अपन महत्व हे। अइसने हमर, छत्तीसगढ़ अउ पूरा देश मा तीज तिहार के विशेष महत्व हे। तीज तिहार सिरिफ ब्रत उपवास नो हरे, ये तिहार नारी के सनमान के परब आय, नारी के आत्म स्वाभिमान के, सामाजिक ताना-बाना के परब आय। सादगी अउ सामूहिकता के परब, नारी के ‘अटूट संकल्प’ ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा-विश्वास के परब आय। अउ इही सामाजिक परिवेश मा नैतिक मूल्य, धीरज, प्रेम के तिहार आय। इहाँ के तीज-तिहार केवल मनोरंजन या रोटी-पीठा पकवान तक सीमित नइ हे। अगर हम एकर पाछू के छिपे परंपरामन के परत हटा के देखबो, त येमा गहरा वैज्ञानिक, पर्यावरनीय अउ मनोवैज्ञानिक रहस्य छुपे हे।


*आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक रूप* –    आध्यात्मिक रूप ले, जब तीज तिहार ल देखथन त एला ‘हरिततालिका तीज’ कहे जाथे। ये माता सती के (जेकर ददा प्रजापति दक्ष दाई प्रसूति) अग्निकुंड मा अपन प्रान के दाह करे के बाद लगभग 108 जनम के बाद पार्वती के रूप मा हिमालयराज ( हिमवान ) अउ मैनावती के बेटी के रूप मा जनम लिस। जेकर नाम पर्वत पुत्री के कारन पार्वती ( शैलपुत्री) कहाइस। पार्वती भगवान शिव ले अगाध भक्ति, प्रेम विश्वास रखे। जब होकर बिहाव भगवान विष्णु के संग होही कहिन, तब माता पार्वती घर ले दूर जंगल मा  गिन अउ भगवान शिव ल पति के रूप मा पाय बर त्याग-समर्पन के संग तपस्या करिन  एकरे सेती एला कहिथें ‘हरतालिका’, शाब्दिक अर्थ मा देखा जाय तब ‘हर’ मतलब ‘हरण’, ‘आलिका’ मतलब ‘सखी’, सखी के द्वारा पार्वती के हरन करके जंगल मा तपस्या करना। भौतिक सुख सुविधा ल छोड़ के आध्यात्मिक सुख के प्राप्ति करना ए हरे हरितालिका तीज-तिहार।

    हरतालिका  तीजा ल वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त कोनो भी  काम या लक्ष्य के प्राप्ति बर एकांत मा काम करना बहुत जरूरी होथे। जब हमन  कोनो कठिन अउ बड़का काम करथन त मन,  बुद्धि, विवेक ल शांत रखे बर एकांत अउ  शुद्ध वातावरण के जरूरत होथे। जेन हा, चिंतन, करे बर, साधना करे बर, बहुत जरूरी होथे।  एकरे ले कोनो भी कारज या लक्ष्य सही दिशा मा प्राप्त  होथे। एकरे  सेती माता पार्वती जंगल, निर्जन वन, प्राकृतिक पर्यावरन के बीच म रहिके अपन साधना करिन अउ अपन लक्ष्य ल पाइन ।

         तीज-तिहार हा ग्रामीण जनमानस मा अपन बहुत बड़े महत्व रखथे। भादो महीना के  अँजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) तीज के  होथे ये तिहार। तीजा के एक हफ्ता पहिली कृष्ण जन्माष्टमी, पोरा ले  ददा-भाई मन बेटी बहिनी मन ल तीजा लिवाय बर जाथें। बेटी-माई मन हा ददा-भाई के अगोरा मा रद्दा जोहथ रहिथें कि कब ददा-भाई मन आही अउ कब हमन अपन मइके के घर-अँगना मा जाबो। ददा-भाई मन जब बेटी के ससुराल मा आथें त एक बेटी के ससुराल अउ मइके  के रिश्ता मजबूत होथे। हिरदे के भाव प्रगाढ़ होथे। 


*करु भात के महत्व वैज्ञानिक दृष्टि अउ आध्यात्मिक दृष्टि ले * – तीज तिहार मा करुभात के बड़ महत्व हे। करुभात के दिन करेला के साग बनाय जाथे। इही करु करेला ‘करुभात' आध्यात्मिक दृष्टि ले मन के शुद्धि,  बैराग, संयम के प्रतीक आय। कठिन निर्जला ब्रत के पहिली करेला के सेवन उपसहीन मन के भीतरी भाव मा सांसारिक मोह-माया अउ सवाद ले दूर हिरदे के बहिरी, भीतरी ला शुद्ध करे के  आध्यात्मिक साधना आय । |जिनगी के दुख ल सही के कड़वाहट ल सही के सुख के अगोरा मा आगू बढ़े के प्रतीक आय। जब तक जिनगी मा दुख नइ होय तब तक सुख के भान नइ होवय। 

      वैज्ञानिक रूप रूप मा देखे जाय त करेला के तासीर जुड़ होथे जब बेटी-माई मन तीन दिन के निराहार निर्जला तीजा उपास रहिथें तब ये करु करेला ओकरमन के शरीर मा ऊर्जा के काम करथे। अउ छोटे-मोटे शारीरिक रोग ल दूर करथे। शरीर के विषाक्त पदार्थ ला जलाय मा काम करथे।

           छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा करुभात के दिन बेटी-माई मन ए पारा ले ओ पारा दाई-ददा, कका-काकी, मीत-मितान घर  करुभात खाय बर जाथें त ये जनजीवन मा पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता के प्रतीक आय। कोनो, सबो घर जाके भात नइ खावँय फेर भाव रखथें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त बेटी-माई मन मइके मा आके अपन ससुराल के जवाबदारी ले दू-चार दिन बर सुस्ता के, घर परिवार के संग; सखी सहेली के संग मन के भारी पन ला हल्का करथें। मानसिक थकान ले मुक्ति पाथें। एक दूसर ले सुख-दुख, मया-दुलार बाँटथें। इही प्रेम भाव रिश्ता ल मजबूत बनाथे। फेर अब देखे सुने मा मिलथे कि तिहार बार मा घलो परिवार मा मनखे मन एकाकी होवत जावत हें। फोन मा बुलावा भेज देथें । बेटी-माई मन ल प्रेम से खायबर त खायबर बइठे बर घलो बुलाय मा जोर परे  धर ले हे, अना-कानी करे धर ले हें; अइसे दिन आवत हे। मनखे मन अब अपने-अपने घर मा अकेल्ला तिहार मना लेथें। एकर ले पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक समरसता कमजोर होवत हे। तिहार बार के महता घटे ल धर ले हे। तब समरसता, जोड़े पर अनायास मोर चार पंक्ति निकलगे।


चल-चल दीदी जाबो सबझन, खाए बर करुभात।

दाई-ददा कका-काकी ले, करबो सुख-दुख बात।।


मिलबो सखी सहेली  मनले, करबो  गुरतुर  गोठ।

होही मइके के  दया-मया, सगरो  दिन  बर पोठ।।


समरसता  के  मया  बहाबो, गाबो  मिलके  गीत।

सुम्मत के  डोरी  मा  रहिबो, होही  चोखा  प्रीत।।


       करुभात के बाद आथे बेटी-माई मन के निर्जला तीन दिन के उपास के बारी। आध्यात्मिक दृष्टिकोण देखे जाय तब तीजा उपास मा महिला / नारीमन नदिया या तरिया के रेती या करिया माटी ल ला के शिव-पार्वती के प्रतिमा बनाथे। चाउर पिसान के,  रंगोली के चौक पुरथें अउ घर ल सुग्घर सजाथें । ये दर्शाथे कि ईश्वर के भक्ति मा आडंबर के नइ बल्कि ये माटी के जइसे मन के सादगी,  पवित्रता के आवश्यकता हे। शिवलिंग बना के फुलेरा साजथें। जेमा पाँच धागा या बाँस के कमचील के पाँच डंडी मा आमा, बिही, कदम, गोंदा, तरोई के नार फूल ले सजाथें। ये हा हमर प्रकृति ले जुड़े रहे के शिक्षा देथे।

  वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त  नदिया के माटी ल लाके शिवलिंग बनाना प्रकृति ले जुड़े  रहे के सुग्घर हिस्सा आय।  बिना प्रकृति के जीवन संभव नइ हे। तरिया-नदिया के माटी पानी तन-मन ल जुड़ छाँव देथे। नदिया,  तरिया, माटी, पथरा, पेड़-पौधा, जीव-जंतु सबके सनमान करना, सुरक्षा करना, सफई रखना हमर फरज हे। चौक पुरना, गोबर ले लीपना। एकर पीछे कारन हे, घर मा नकारात्मक ऊर्जा  ल आय ले रोकना। ये ये गोबर, चाउर मा लीपना हा घर ला पवित्र करेथे। मन ल शुद्ध करेथे, पवित्रता के भाव जगाथे। जब तीजा तिहार के ए तीज उपास ल हमन आध्यात्मिक दृष्टि ले देखथन त  सांसारिक बंधन ले भौतिक सुख-सुविधा ले दूर परमात्मा के प्राप्ति के परब आय जेमा बहू-बेटी मन अपन पति के दीर्घायु सुख शांति बर ये उपास  रखथें। रात भर भजन-कीर्तन करथें। ये आस्था संसार के व्यावहारिक पति के संग असली पति असली प्रिया परमात्मा ल जाने के परब आय तीजा। निर्जला उपास रहिके नारी मन अपन इन्द्री ल, संयमित रखथें। अउ जेन मन  अपन इंद्रिय ल जीत के भूख-प्यास के तितिक्षा करथें। शारीरिक सुख के त्याग करके भीतर के,  परमात्मा ल जगाथें निश्छल भक्ति-भजन करके बुद्धि-विवेक के माध्यम ले; उही ल परम आनन्द के प्राप्ति होथे। जइसे माता पार्वती ल परम आनंद के प्राप्ति होइस। ये हरे सही उपास के अर्थ।

  

    अइसने  ब्रत, उपास ल जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ले देखन त बरसात के मौसम मा हमर पाचन शक्ति धीमा हो जथे। तीजा के कड़ा उपास शरीर के पाचन तंत्र ल आराम देथे  अउ संचित टॉक्सिन्स (जहरीला तत्व) ल शरीर ले बाहिर निकालथे। एकर ले शरीर मा नवा ऊर्जा मिलथे। फेर आज ये सबो आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल लोगन मन नइ समझ पावत हें। अवैया पीढ़ी मन ब्रत, तीज-तिहार के पाछू मा छुपे वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल  अइसने मा कइसे जान पाहीं? एकरे सेती  आज जनमानस मा बेटी-माई मन ल वर्तमान के ढोल-ढकोसला ल छोड़ के अपन, वास्तविक संस्कृति अउ परंपरा, आध्यात्म दर्शन ल अपन नवा पीढ़ी  के लइका मन ल जनाय के जरूरत हे। तब अवैया समे मा तीजा के सार्थकता बने रही नइ  ते तीजा खाली घूमे-फिरे, खाए-पिए मौज-मस्ती अउ सेल्फी ले के दिन बन जही।


*सनमान के प्रतीक लुगरा के महत्ता* – उपास के पूरा होय  के बाद बहू-बेटी, दाई-माई मन मुन्देरहा ले उठ के नहा-धो के नवा-नवा लुगरा-कपड़ा पहिनथें। भगवान के पूजा-पाठ करके भोग प्रसादी लगा के अपन उपास के पारण करथें।  अउ सात्विक आहार छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भोजन, पकवान ठेठरी, खुरमी, बरा सोहारी, सिंघाड़ा के संग ब्रत ल खोलथें। तीज तिहार के खारा-मीठा पकवान जीवन मा मधुरता घोलथे।  तब ये उपास मा सनमान के प्रतीक,  बेटी-माई मन ल मइके  ले लुगरा उपहार के रूप मा मिलथे। ये लुगरा नारी के सनमान, मइके के मान-मरियादा के प्रतीक आय। बेटी के ससुराल अउ मइके ल जोड़े के परम्परा आय। जेन ल दाई-ददा मन पाँव पोंछ लेहू बेटी कहिके देथें। जेकर भाव ल बेटी मन ही समझ सकथे। लुगरा ल देख के बेटी मन, मइके के सुरता, दाई-ददा, भाई- बहिनी के सुरता करथें जेमा प्रेम छुपे रहिथे। वो  मूल्यवान कीमती होथे। आजकल कतको देखे बर मिलथे कि भाईबंध मन संपन्न होय के बाद घलो बेटी-माई ल पाँव पोछे के लईक तक लुगरा कपड़ा नइ दे सकत हें उल्टा उँकर अधिकार ल छिनत हें। अपमान देवत हें। अउ कहिथें लुगरा पुरही का? लुगरा पूरे नइ वो तो मइके  के सनमान होथे जेन बेटी के ससुराल मा प्रदर्शित करथे कि बहू के मइके के भाव का हे। इही ल घर-परिवार के चार सदस्य मन  देखथें। बेटी-माई मन अपन मइके मा भाई-भउजी ले मीठ बोली के आसा रखथे। धीरे धीरे यहू भाव घटत जावत हे। जेकर ले पारिवारिक समरसता के जघा समाज मा दुरिहाव देखे बर मिलत हे। तभो कतकों बेटी मन मइके वाले के फभित्ता झन होय कहिके गम खावत हें।  अइसन स्थिति आज समाज मा बहुत देखे बर मिलत हावय जेन दुख के बात आय।


 *प्रकृति ले जुड़े हे तीजा-तिहार*- हम छत्तीसगढ़ के जनमानस मा, लोक संस्कृति मा, तीजा तिहार, धार्मिक अनुष्ठान या पारिवारिक लोक संस्कृति भर नो हरे, बल्कि ये मनखे अउ प्रकृति के अटूट अंतरसंबंध के तिहार आय। जेमा हरियाली चारों कोती कर देखे बर मिलथे।  खेत के हरियर-हरियर धान, हरिहर पेड़-पौधा मन मनखे के अंतस ल खुशी व उल्लास ले भर देथे। बाग-बगइचा मा तीज के झूला मा बेटी-माई मन झुलना झुलथें।  हवा मा फूल के महक, कोयल के कुक, हवा के सनसनाहट, प्राकृतिक नजारा के आनन्द अंतस ल ऊर्जा अउ उमंग ले भर देथे। ए तिहार प्रकृति ले जुड़े के अउ प्रकृति के संरक्षन के सीख देथे।  

   ये ढंगले छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति मा तीजा तिहार जनमानस के बीच आध्यात्मिक दृष्टिकोन, वैज्ञानिक दृष्टिकोन, सामाजिक समरसता, प्रकृति ले जुड़े के परब आय। इही हमर लोक संस्कृति के प्रान हरे। नारी स्वाभिमान के तिहार हरे। इही लोक संस्कृति मन, त्याग-समर्पन, प्रेम, नैतिकता के शिक्षा देथे। येला हमन ला अपन नवा पीढ़ी के लइका मन ल सिखाना बहुत जरूरी हे। तीज-तिहार हमर संस्कृति के गहना आय जेमा बेटी मन के आत्मसम्मान, त्याग-समर्पन, प्रेम के रूप झलकथे। तब मोरो भाव बेटी मन बर अइसन ढंग ले झलक थे-


    बेटी अँगना के फुलवा कस, महके बनके सदाबहार।

    मइके  आथे  आशा  धर  ये, पाये  बर  बड़ मया दुलार।।

    त्याग-समर्पन अउ जप-तप ले, बने रहै प्रभु अमर सुहाग।

    पानी-पसिया  गुरतुर  बोली, संग मिलै  मइके  के  राग।।


डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़

Thursday, 30 April 2026

सुरता सुशील भोले

 सुरता सुशील भोले


छत्तीसगढ़ी भाखा ल बढ़ावा देवइया, कला संस्कृति अउ साहित्य के संग-संग भाषा बर स्वाभिमान 

के सकेला करइया सुशील वर्मा “भोले“ जी के जनम 2 जुलाई सन 1961 म भाठापारा म होय रहिस हे। उंखर पिता जी स्व. श्री रामचन्द्र  वर्मा जी, माता स्व. श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा जी, के घर म दूसर संतान के रूप म जनम लेय रहिस हे। श्री भोले जी मन चार भाई अउ दू बहिन हावंय। श्री भोले के पिता श्री प्राथमिक शाला म गुरुजी रिहीन। ओमन आदर्श शिक्षक रहिन अउ उंखर लिखे हिन्दी व्याकरण के किताब मिडिल स्कूल म चलत रहिस हे। पिता के शिक्षा अउ संस्कार सुशील ल मिले रहिस हे। अउ एकर से भोले जी ल अड़बड़ लाभ मिलिस। उंखर प्रतिभा सबो डाहर दिखे ले लगगे।आध्यात्मिक रुचि घलो ओखर चिन्हारी रहिस हे। वरिष्ठ साहित्यकार के संग संग पत्रकार, स्तम्भकार, साहित्य के पुरोधा रहिन हें।


 जेन मनखे म  प्रतिभा होथे ओ ह हर परिस्थिति म अपन ल साबित करत जाथे। कखरो मोहताज नइ राहय। प्रतिभा ह मौका मिलते ही उजागर होय ले लग जथे। सुशील के चौथी तक के पढ़ाई जनम स्थान भाठापारा  म होइस ओखर बाद सातवीं तक के पढ़ाई नगरगांव म अउ ८वीं ले 11वीं तक के पढ़ाई रायपुर म होय रहिस हे। ऐखर पिताजी ह एक प्रिंटिंग प्रेस खोले रहिस हे। ओला इही म रुचि होगे  प्रिंटिंग प्रेस लाइन वाला विषय म आई टीआई के कोर्स ल पास कर लीन। कंपोजिंग के काम करे ले लगगें।


 सुशील भोले ह अपन साहित्यिक यात्रा सबले पहिली दैनिक अग्रदूत समाचार पत्र ले शुरू करे रहिस हे।  सन 1983-84 म स्वयं के कविता, कहानी के प्रकाशन शुरु करे ले लगगें। ये लेखन के शुरुआत सरलग चलत रहिस हे जेन अंतिम सांस तक "कोंदा भैरा के गोठ" तक चलिस। ये बीच म दैनिक अग्रदूत, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ म सहसम्पादक के रूप म अपन सेवा दिन। समाचार, पत्र-पत्रिका म काम करत करत घर के प्रिंटिंग प्रेस के संचालन शुरू कर दिन। एक स्टूडियो स्थापित करिस। मासिक समाचार पत्रिका “मयारू माटी” के रुप म पहिली छत्तीसगढ़ी पत्रिका निकाले ले लगगें। 9 दिसम्बर 1987 ले निकलत रहिस हे। इहाँ ले साहित्यिक समाचार पत्र के प्रकाशन तो शुरु होबे करिस, येखर अलावा अपन स्टूडियो म ऑडियो गीत, कैसेट म रिकॉर्डिंग घलो होय ले लगगे। 


भोले जी  के जीवन के एक पक्ष आध्यात्मिक जीवन के घलो रहिस हे जेमा कठिन तप ,धियान, साधना ह सरलग 1994 ले 2000 तक 14 बच्छर तक चलिस। ओ ह शिव भक्त रहिस हे, शिवजी के साधना करिस। ए साधना के बाद सुशील वर्मा ले सुशील भोले लिखे ले लगगें। साधना ले आध्यात्मिक रहस्य ल जानिन अउ ओला आत्मज्ञान मिलिस। ओहर हमेंशा काहय "बिना आध्यात्म के जिनगी ल मुक्ति नई मिलय।”


छत्तीसगढ़ राज बने के बाद हमेंशा इंहा के आदिधर्म अउ मूल संस्कृति के बात करय।येखर बर एक संस्था के स्थापना करिस अउ  जोर दरहा काम शुरु करे रहिस हे। अपन हर लेख म इंहा के तीज तिहार म हमर आदि संस्कृति के बात ल बतावय। "आज जेन तरिका ले तीज तिहार ल मनाथन ओ हर हमर सँस्कृति नोहय।ओ ह उत्तर भारत ले आए हावय जेन ल हमर ऊपर थोपे गे हावय। हमन ल अपन सँस्कृति के रक्षा करना हे, अउ ओखर प्रचार-प्रसार करना हे। बाहरी पूजा विधि जेन ल हमर उपर थोपे गे हावय ओला बदलव। हमर संस्कृति ल चिन्हव अउ बचावव।"


भोले जी ह छत्तीसगढ़ के निर्माण बर घलो काम करिस। । इंहा के अस्मिता अउ संस्कृति बर अपन आप ल समर्पित कर दिस।  भोले ह अपन बात ल छत्तीसगढ़ी  भाखा साहित्य के माध्यम से पोट्ठ ढंग ले रखय ले लग गीन। भोले जी जब अपन मासिक पत्रिका “ मयारू माटी” के शुरुवात करिन त सबसे पहिली येमा छतीसगढ़ी भाखा के उपयोग करिन।ये छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली पत्रिका रहिस हे। ये ह उंखर भाषा के प्रति प्रेम ल देखाथे। ऐमन जिनगी भर छत्तीसगढ़ी भाखा के उपयोग करे के बात करिन, अउ अपन राज के बोली भाखा के चिन्हारी ल जिनगी भर निभाइन।  भाषा के अतेक सेवा के बाद भी ओला ओ सम्मान नइ मिलिस जेन मिलना रहिस हे।


सुशील ह हर अखबार म छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज ल बोये के काम करिन। जईसे ही ओ अखबार म छत्तीसगढ़ी स्थापित हो जतिस त छोड़ के दूसर अखबार म आ के फेर छत्तीसगढ़ी शुरु करतिस। "इतवारी" साप्ताहिक पत्रिका जेन ह शुद्ध हिन्दी के रहिस हे उंहा के सह सपादक रहिस हे। ओखर हर अंक म छत्तीसगढ़ी कहानी, निबंध, पुस्तक समीक्षा निकालत रहिस हे। सुशील ह जिंहा जिंहा छत्तीसगढ़ी भाषा के बीज डारे हावय ओ ह आज लहलहावत हावय।


ओखर हिंदी के कविता कहानी मन घलो बहुत ही स्तरीय रहिस हे। ऐखर कविता मन ल देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन जी बहुत पसंद करय। कइ बेर ओखर कविता मन ल सुनय घलो अउ छापय घलो। ओमा के एक कविता खास रहिस हें...


पत्थर-पत्थर बोल रहा है,

मन की आंखें खोल रहा है,

तेरे श्रम का हर-एक पल,

इतिहास बन बोल रहा है।।

चलो आज फिर दीप जला दें

श्रम के सभी ठिकानों पर..।


भोले जी के प्रकाशित साहित्य 

छितका कुरिया(काव्य संग्रह (1988)

दरस के साथ(लंबी कविता (1989)

जिनगी के रंग ( गीत व भजन संग्रह (1995)

ढेंकी (कहिनी संकलन (2006)

आखर अँजोर (छ ग के सँस्कृति उपर आलेख  (2006) दूसर संस्करण (2017)

भोले के गोले ,काव्य संग्रह (2015)

सब ओखरे संतान (चार गोड़िया के संकलन 2021-22)

सुरता के संसार (संस्मरण के संकलन 2021-22)

कोंदा भैरा के गोठ 2024

भोले जी ह कइ अखबार अउ पत्रिका म कॉलम लिखे रहिस हे...

बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़  सेवक 88-89)

किस्सा कलयुगी हनुमान के (मयारू माटी 88-89)

तरकश अउ तीर (दैनिक नव भास्कर 1990)

आखर अँजोर (दैनिक तरुण छ. ग. 2006-2007)

डहर चलती(दैनिक अमृत सन्देश 2009)

गुड़ी के गोठ (साप्ताहिक इतवारी 2010 लोगों 2015 तक)


राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्र-पत्रिका मन म अउ छत्तीसगढ़ म कविता कहानी लेख, समीक्षा साक्षात्कार मन के नियमित प्रकाशन होवत रहिस हे।

“लहर” अउ “फूल बगिया” ऑडियो कैसेट म गीत लेखन अउ गायन करे रहिस हे।

अनेक साहित्यिक,सांस्कृतिक मंच मन म गीत अउ भजन गायव।


भोले जी ल छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग दूवारा राज भाषा सम्मान 2010 म मिलिस। कइ ठन सामाजिक,धार्मिक,साहित्यिक संस्था ले घलो सम्मान मिलिस।

भारत सरकार साहित्य अकादमी दूवारा

गुजराती एउ छत्तीसगढ़ी भाषा 2017 के सम्मेलन म भागीदारी घलो करे रहिस हे। 

मोर ले ओखर बहुत ही अच्छा सम्बंध रहिस हे। मोर छोटे भाई आये, बहुत ही लाड़ दुलार ले मोर घर साइकिल ले आ जावय। बहुत जुवर ले बइठय घलो। हमेंशा साहित्यिक चर्चा ही करय। मैं ओखर घर बेटी मन के बिहाव म गेंव। ओखर अलावा बइठे बर भी गेंव। जब तबीयत खराब रहिस हे तब दू बेर देखे बर भी गेंव।  अभी मोर पुस्तक के विमोचन म चार जनवरी के बलाये रहेंव त कोई लेगही तब जाहुँ कहिस। अभी  बारह फरवरी के फोन करे रहेंव पुस्तक समीक्षा बर तब कहिस के "तबीयत ठीक नइये कमजोरी आगे हे, अभी पढ़ना लिखना बंद कर दे हंव दीदी।"

मैं ह "आराम कर भाई।" कहेंव 

मोला का पता रहिह हे के छोटे भाई सुशील लम्बा आराम करे बर चल दिही। मोर बर ओ ह इनसाइक्लोपीडिया रहिस हे। बहुत कुछ जानकारी लेवत राहंव। ओ ह छत्तीसगढी भाषा अउ संस्कृति बर अपन पूरा जीवन दे दिस। आज भी मोला ओखर साधना के बाद के समय के सुरता आवत हें। जब मोर घर आके बहुत कुछ बतावय। मोर आध्यात्मिक रुचि ल देखके बहुत खुलके बात करय। ओखर घर के एक कुरिया के कोना म रखे करिया रंग के बड़े से शिवलिंग मोर आंखी के आगू म आ गे। जेखर ओ ह पूजा करय अउ ओखर सामने म साधना करय। कोनो ल ओला देखाये बर नइ लेगत रहिस हे। आज सुशील उही शिवलिंग म समागे। जेन सम्मान ओला मिलना रहिस हे तेन सम्मान ओला सरकार ले नइ मिलिस। 

सुधा वर्मा 25/2/2026

ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '

 .                       *ठग-जग* (छत्तीसगढ़ी कहानी) '


                           - विनोद कुमार वर्मा 


          ' रानी दुर्गावती योजना मा प्रदेश के नोनी मन ला 18 साल पूरा होय के पाछू डेढ़ लाख रूपया मिलही। एक अप्रैल 2026 ले एहा लागू किए जाही। एही सत्र मा विधेयक लाए जाही।  ' - ये छत्तीसगढ़ी समाचार ला रेडियो मा सुनके जब्बर उछाह मा रामलाल अपन सुवारी ले कहिस- ' अरे सुनत हस! हमर बिटिया सतरा के हो गे हे। ओला डेढ़ लाख मिलही! छै महीने बाद दिवाली हे। उही दिन तो 2008 में जनमे रहिस! '

         ' का सही मा रानू के बाबू? भगवान भला करे! सरकार हा कतका कुछु करत हवय हमर बर! ...... अपन कमाई ले तो तँय ढेला घलो नि खरीदे सकस! '

      ' का बात करथस ओ रानू के दाई, सकरो-दिन लड़े के जुगत बनाय  रहिथस! ......  पाछूच्च महीना तो बिटिया बर नावा सेंडिल खरीदे रहेंव! '

     ' हाँ हाँ,  बिटिया बड़े होवथ हे त सैंडिल तो खरीदबेच्च! ....ओकर सहेली के पापा अपन बेटी ला जनम-दिन मा पचास हजार के नया आई फोन दे हवय! '

    ' त मँय कहाँ ले लावँव अतेक पैसा? बैंक मा एक लाख जमा हे, ओकर ले बाबू के कालेज के थर्ड इयर के फीस जमा करहूँ ! ..... ओला खर्च कइसे करँव ? '

     ' ठीक बात हे।  ...... मँय सोचत रहेंव कि बाबू के आखिरी बछर के पढ़ाई बर अपन सोन के माला ला बेच दूहूँ। ...... संसी झन कर! चार बछर के पढ़ाई खतम होय के पाछू बाबू  ला नौकरी मिलही त हमार माली हालत सुधर जाही! '

       ' आजकल नौकरी कहाँ मिलत हे भाग्यवान?  '

     ' सुनव जी! रानू बर एक ठिन लैपटाप खरीद देवा। कालि मातारानी के पूजा करत-करत मन्नत माँगत रहिस, एला मँय सुने रहेंव। .... ओकर पढ़ाई मा बहुत काम आही न ? .....  फेर नोनी हा बोलय कुछु निहीं। '

      घड़ी भर सोचे के बाद रामलाल बोलिस- ' ठीक हे लैपटाप खरीद देहूँ अउ एक ठिन नावा मोबाईल घलो! बैंक मा पइसा हे उही ले खरीद देहूँ। छै महीने बाद रानू ला योजना के डेढ़ लाख मिलही त ओला बैंक मा जमा कर देहूँ। ..... रानू बर तो मँय अभी तक कुछु घलो नि कर पाय हँव। वो बिचारी कुछ कहे तो घलो निहीं  ...... फेर  बाबू के पढ़ई बर अब तोला गहना बेचे के जरूरत नि परे!  '

         रानू आज बहुत खुश रहिस। ओकर मन्नत हा जो पूरा होने वाला हे। ओला नावा मोबाइल अउ लैपटाप मिलने वाला हे! ' चइत नवरात मा खरीदहूँ '- कहत रहिस बाबू हा। दाई-बाबू के गोठ-बात ला ओहा रंधनीखोली ले सुन डारे रहिस! तब उनकर गोठ-बात ला सुनके ओकर कजरारी आँखी ले आँसू के बूंदी मोती कस टप-टप टपकत रहिस। 

          एक हप्ता बाद विधानसभा मा पारित वित्त बजट के समाचार अखबार मन मा प्रमुखता ले छपिस। जेमा के एक समाचार ला स्कूल के लाइब्रेरी मा पढ़ते-पढ़त रानू के आँसू ढरके लगिस- ' रानी दुर्गावती योजना के अन्तर्गत प्रदेश के बालिकाओं को 18 साल पूरा होने पर डेढ़ लाख रूपये मिलेंगे। प्रदेश में रानी दुर्गावती योजना का लाभ एक अप्रैल 2026 के बाद जन्म लेने वाली बेटियों को मिलेगा। '

          ये तो अइसने बात होगे न! कि किसान मन ला 2042 मा मिलइया धान के बोनस बर एसों के सत्र मा विधेयक पारित करे हें!

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होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी) *सुकुवा तारा* (लघुकथा)

 *होरी के रंग* (त्वरित टिप्पणी)


                   *सुकुवा तारा* (लघुकथा)


                                 -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


          ' तोर स्टेटस् ला देखेंव मितान। बढ़िया लिखे हस। भाई सुशील भोले ला सुकुवा तारा के संज्ञा देहे हस। '

      ' हाँ मितान! छत्तीसगढ़ी साहित्य के सुकुवा तारा हे भाई सुशील भोले। ओकर असामयिक निधन के समाचार ले पूरा साहित्य विरादरी व्यथित हे।आज होरी तिहार के दिन लोकसदन समाचार पत्र सा भाई सुशील भोले उपर दू पृष्ठ के विशेष परिशिष्ट निकाले हे। ओही मा मोर लेख छपे हवय। '

        ' ओ तो ठीक हे मितान। फेर एक बात मोला समझ मा नि आइस ? '

       ' का बात ? '

       ' कतकोन साहित्यकार अउ कृषि वैज्ञानिक मन ला तँय अपन लेख मा सुकुवा तारा के संज्ञा दे हस। मँय सब ला पढ़थँव अउ गुनथँव। सुकुवा तारा तो एक्का ठिन हे! '

     ' सुन मितान, ये-सब-मन मोर बर सुकुवा तारा हें। तँय तो जानतेच्च हस कि साहित्यकार मन कतकोन लिखथें या  कृषि वैज्ञानिक मन कतकोन अपन गोठ-बात किसान मन ला बताथें फेर ओमन ला एकर कोई पइसा-कौड़ी नि मिलय। अइसने महूँ ला नि मिलय। हमन उजियार मा नि घूमन बल्कि अंधियार मा कोई बात -कोई सूत्र ला ढूढ़थन जेकर ले किसान, आम आदमी या अंधियार मा दिन बितइया लोगन मन ला उजियार मिले। कभू -कभू वो सूत्र मिल जाथे अउ समाज अउ देश ला फायदा मिलथे। चालीस बरस पहिली एक इकड़ मा 15 बोरा घलो धान नि उपजत रहिस।आज चालीस बोरा उपजत हे। एहा तो कोनो वैज्ञानिक के ही कोशिश के परिणाम होही कि जादा उपज देने वाला धान के जाति बनाइस। अइसने साहित्यकार मन समाज अउ देश के अंधियार कोती के बात ला सामने लाथें त सरकार अउ बड़े लोगन मन  सचेत होथे अउ उहाँ उजियार लेके जाथें।  एकरे खातिर साहित्यकार अउ वैज्ञानिक मन ला सुकुवा तारा कहिंथँव! '

     ' बात तो ठीक कहत हस मितान! '

    ' एहा  कोनो मजाक के बात नि होवय मितान, तँय हाँस झन! ...... साहित्यकार मन करा बड़े संसाधन नि रहे। ओमन हवाई जहाज या बीस लाख के गाड़ी मा नि घूँमय! ओमन अपन जाँगर के भरोसा मा ही अपन काम करिथें। ..... भाई सुशील भोले कस कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य मा अंजोर बगराय हें। ओही अंजोर मा महूँ देख-टमर के अंधियारी रात मा घलो रेंग देथँव। जादा सुकुवा तारा रहे मा तो मोइच्च ला फायदा हे! '

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आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू

 आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जावत हे । बने बात आय थोरकुन पीछू 

डहर जाए के मन होइस त सुरता आइस ...। 

    सन् 1900 के पहिली संसार के कोनो देश राज मं महिला मन ल बरोबरी करे के अधिकार नइ रहिस न सामाजिक न राजनैतिक न पारिवारिक स्तर मं फेर का ? महिला मन मं जागृति आए बर सुरु होइस त सन् 1909 के 28 फरवरी के बिहनिया बेरा अमेरिका मं महिला मन छोटकुन बैठक करीन । 

 1910 मं ए बैठक मं अंतर्राष्ट्रीय महिला जागरण के बात चिटिक जोरहा उठिस । 

1911 मं अमेरिकन महिला मन के संग अउ कई देश के महिला मन संगठन बनाये बर सुरू कर दिहिन ...बरोबरी के चर्चा जोर पकड़े लगिस । 

    आवागमन के असुविधा , सम्पर्क के अभाव के संग पोट्ठ नेतृत्व के कमी के चलते ए आंदोलन हर अपन अपन देश , राज , समाज तक रुंधा गिस तभो गुंगुआत तो रहिबे करिस । समय जात देरी तो लगय नहीं ...60 साल ले ऊपर होगिस ...चिंव चांव कभू काल सुना जावय फेर कोनो देश मं जबरदस्त आंदोलन नइ होइस ..। 

    सन् 1975 मं महिला मन फेर जागिन एदारी अमेरिका के महिला मन यूरोपीय देश के संगे संग भारत के जागरुक महिला मन से सम्पर्क , बातचीत , चिट्ठी पत्री के माध्यम से संगठन के उद्देश्य ल बगराइन सुरता राखे लाइक बात एहर आय के तब तक दूनों विश्व युद्ध खतम हो गए रहिस भारत असन कई देश मं नारी शिक्षा बगर गए रहिस । एतरह यूनाइटेड नेशंस हर 8 मार्च ल अंतर्राष्टीय महिला दिवस मनाए के घोषणा करिस । 

  सबले जरुरी बात जेला सुरता करत हन के 1909 के पहिली महिला मन ल ..

1 वोट देहे के अधिकार नइ रहिस 

2 पुरुष मन के बरोबर तनखा नइ मिलत रहिस । 

3 महत्पूर्ण पद मं महिला मन के स्थापना नइ होवत रहिस । 

4 महिला मन ल सामाजिक , राजनीतिक समानता नइ मिलत रहिस । 

        आज 8 मार्च 2026 आय प्रश्न हे अतका साल बाद जब महिला मन ल राष्ट्रपति असन पद मिलत हे , सेना , मेडिकल , इंजीनियरिंग मं जगह मिले बर शुरु हो गए हे त अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के जरुरत काबर हे ? दूसर बात अगर जरुरत हे त कोन क्षेत्र मं हे , ओ क्षेत्र मं कोन तरह से उदिम करना चाही ? 

      संगवारी मन ! चिटिक थिरा के सबो झन गुनव न ? एला आदेश नहीं अनुरोध समझिहव । 

       सरला शर्मा

कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)

 कारी कमौत के खुशबू-1(संस्मरण)


काली कार म हमन दुर्ग जात रहेन। सुरता आये ले लगगे के लइकापन म हमन दुर्ग जावन त जी ई रोड के दूनो डाहर खेत राहय। भिलाई जंक्शन रहिस हे त बहुत अकन रेल खड़े राहय। बस ल रोक के कोनो मेर के कुँआ म पानी पीयन। धान के फसल के बेरा म अब्बड़ खुशबू आवय। अधिकतर मढ़रिया दाऊ मन के खेत रहिस हे। सुगंधित धान 'कारी कमौत' लगावंय। हवा चलय त ये धान के खुशबू रोड तक आवय। 

हमन अपन मामा गाँव माहका जावन त भिलाई तीन म उतर जावन। मामा के नौकर आये राहय। बैलगाड़ी पटरी के ओ पार खड़े राहय। तब लोहा के पेटी चलय। गाँव पेटी ले के जावंय। हमरो माँ पेटी लेगय। पेटी ल नौकर ह मुड़ म बोह लेवय। माँ संग हमन दूनो भाई बहिनी रेंगत जावन। बहुत अकन माल गाड़ी पटरी म खड़े राहय। हमन रेल के नीचे ले झुक झुक के निकलत जान। पेटी ल सरका के नौकर ह निकालय। चार पाँच रेल पटरी पार करके ओ पार पहुँचन। बइला ल गाड़ी म फांदय। हमन बइठन। पेटी ल गाड़ी के आगू म बांध लेवय। अब छाकड़ा गाड़ी दउड़य। थोरिक देर में ही गाँव पहुँच जान।व बीच म तरिया परय त उतर के हाथ गोड़ धो लेवन। तीजन बाई के गाँव गनियानी ल पार करन त इंहाँ छींद के चटाई अउ बाहरी बनावत देखन। 

मामा गाँव पहुँचन त पीपर के छाँव म बइला गाड़ी ढिलावय। सामने म बियारा रहिस हे। ममा अगोरत खड़े राहय। हमन उतर के घर आवन। पीपर पेड़ के बाद नहर नाली रहिस हे। ये ह तरिया म पानी भरे के काम आवय।

नहर नाली के ओ पार लाइन से हमर नाना मन के घर रहिस हे। आखरी वाला हमर मामा के घर रहिस हे।


दीवाली के छुट्टी म जावन त दिन रात खुशबू म साँस भर जावय। गर्मी म जावन तभो खुशबू राहय फेर घर तक।  अँगना म कलमी आमा के रुख रहिस हे। मोर मामा घर मोर तीन चार बहिनी मोर उमर के राहंय हमर मन के धमाचौकड़ी पूरा डेढ़ महिना चलय।


नहर म नहाना, तरिया म गोड़ धोना, तरिया पार के आमा तोड़ना, कुँआ पार के चँदैनी गोंदा, बेल के मजा लेवन। सबले ज्यादा खुशी तो बरगद के जटा ल धर के झूलन अउ तरिया म कूदन। ये सब शहर म कहाँ मिलही? बियारा म बोईर के रुख रहिस हे त गर्मी म ओखर गुठली मिलय तेन ल बिन के घर लानन। मंझनिया भर ओला फोरन। सांझ के ठंडा पानी म नून अउ चिरौंजी डार के शरबत पियन अउ मामा मन ल घलो देवन। वाह अइसना स्वाद कोनो अउ शरबत म नइ मिलय, चिरौंजी ल चबा के नून पानी पियत जाव। ठंडा पानी अपन अपन बर बनावन। हाँसी के बात आये न के ठंडा पानी बनाये कइसे जाथे? हा हा हा। एक कांसा के लोटा म पानी भर के ओखर मुँह ल कपड़ा म बांध देवव अउ ओला मियार म उल्टा टांग देवव। पानी बरफ असन ठंडा हो जथे। डेढ़ महिना के बाद घर आये के बेरा म सब अब्बड़ सुरता आवय। सबले बड़े बात सुगंधित चावल ह भुलाये नइ भूलय।

 कार म बइठे बइठे सुरता आवत हे कारी कमौत धान के खुशबू के। आज बीज ह घलो नंदागे। भिलाई स्टील प्लांट के हवा सब ल निगल दिस।

सुधा वर्मा 8/3/2026