Wednesday, 8 July 2026

संस्मरण वह फ्राक वाली तीजन

 संस्मरण


वह फ्राक वाली तीजन


मेरा मामा गाँव महका है। हम लोग गनियारी को पार करके जाते थे। वहाँ की डबरी मेरे नानाजी ने बनवाया था। गाँव जाते समय हम लोग वहाँ कभी कभी उतर कर हाथ पैर धोते थे। हमारे मामाजी  लोगों के ये लोग जानते थे। हम दोनों की उमर बराबर है।

वहाँ पर खेलते रहती थी, उसके साथ दो तीन और बच्चे रहते थे। मुझे तो कोई मिल भर जाये, खेलना बात करना शुरु कर देती थी। मैं दौड़ते वहाँ चली जाती थी उसके साथ खेलती थी। वहाँ पर खुले मे ये लोग चटाई बनाते थे और झाड़ू। मामा जी चटाई वहीं से ले जाते थे। 

मेरे लिये तीजन नाम अनोखा था इस कारण ये मुझे याद रही।जब भी मामा जी आते थे तो तीजन की उन्नति के बाते में बताते थे। 

मेरी शादी हो गई तो एक बार गाँव में ही नाचा रखे थे तब तीजन का एक घंटे का कार्यक्रम रखे थे। क्योंकि मामा जी के गाँव की थी।

उसके बाद मैं विवेकानंद आश्रम में मिली। उसका कार्यक्रम था।

दो घंटे तक चला था। आत्मानंद जी सामने जमीन पर बैठ कर पूरा सुन रहे थे। जब उतरी तो हम लोग बाजे के कमरे के बाहर में मिले।  वहाँ पर बैठी थी।माँ ने पूछा "चिन्हत हस तीजन?"

" वह देखती रही फिर नहीं करके सिर हिला दी। स्वामी जी हंस रहे थे। माँ ने कहा "महका मोर मइके आये। जेठूलाल झुमुकलाल मोर भाई आये।"

वह तुरंत बोली ",रायपुर वाली फूफू आस का?"

पैर पड़ने झुकने लगी तो माँ ने उसके दोनों हाथ को पकड़ लिया।"ये कोन आये?"

हाँ मोर संगवारी बेबी आये।"

मेरे हाथ को पकड़ कर बोलती है " मोर असन संग खेले बर आवस बहिनी।"

दोनों मुस्कुराते रहे। यही हमारी सालों पहली प्यारी मुलाकात थी। उसके बाद एक बार और कार्यक्रम हुआ थख मैं देखकर वापस आ गई।

पहले हम लोग बड़े थे दाऊ थे करके। वह मिलने में झिझकती थी। पर अब वह बड़ी हो गई थी। मुझे उससे मिलने में अच्छा नहीं लग रहा था। मिलती तो हम लोग क्या बातें करते। बचपन के प्यार भरे सम्बंधों के बीच का समय के अन्तराल का सन्नाटा। मैं उसके बचपन का डिलडौल और फ्राक को याद करती हूँ। आज वह एक छोटे से गाँव गनियारी से निकल कर  पूरी दुनिया की हो गई है।

सुधा वर्मा, 5/7/2026

तीजन बाई के श्रद्धांजलि म मोर लिखे किताब _*‘‘तीजनगाथा’*_ ’ ले _*रखही राम त लेगही कोन ?*_

 तीजन बाई के श्रद्धांजलि म मोर लिखे किताब _*‘‘तीजनगाथा’*_ ’ ले 

_*रखही राम त लेगही कोन ?*_

ये असार-निसार संसार बाजार-पसरा के एक ठिन परसार हरे। विधाता के रचे मया के मेकराजाला ये। एक न एक दिन अवइया सबो ल इहाँ ले जाए बर परथे। आवाजाही लगे रहिथे सरीदिन, सरलग अउ ओसरीपारी। ये मृतलोक म अवतरे हरेक जीव ल अपन-अपन करम के फल ल भोगे बर परथे। जीवात्मा के भल-अनभल कोनो करम ओकर पाछु ल नइ छोड़य। पीछु जनम के भल करम भाग बनके त अनभल करम बिपत बनके जीवात्मा के संग चलथे।

कोन जानथे, निच्चट गँवार, अनपढ़ अउ गरीब घर-परिवार म अवतरे तीजन बाई का करम करे रिहिसे ? जेन हँ काल के सऊँहत देवता यमराज के फाँदा ल टोर-फाँदके लहुुट आइस अपन डेरा म। ताबूत के दुवार ल उघार साबूत खड़ा होगे अपन कंुदरा म।

बात वो पइत के हरे, जब तीजन बाई छै दिन भर के रिहिसे। फूल हँ झरके लोई भर धरे रिहिसे, माने भइगे ... तीजन बाई अवतरके तियार भर होय रिहिसे।

पारधी परिवार म छेवरिहा माइलोगन मन जँचकी के छठवाँ दिन मुड़ मिंजके नहाथे-धोते। नहा-धोके नवा कपड़ा धारण करथे। छठी माई के पूजा करथे। पूजा करके अपन सही सलामती अउ स्वस्थ लइका खातिर छठी माई के पाँव तरी धन्यवाद पठोथे, जेला बरही नहाना कहिथे।

तीजन बाई के महतारी सुखबती अपन वो नवा-नवा बियाए नान्हे लइका ल बने धोइस-पोंछिस। धो-पोंछके सुग्घर नवा कपड़ा म लपेट लिस अउ परोसिन राधा घर छोड़के नहाए बर तरिया गै। वोतका बेरा झुनुक लाल कुछु काम लेके परोस के डेरा कोति गये राहय।

परोसिन राधा तको लइकुसहीन रिहिस। लइकुसहीन नहीं, भलकुल लइकच रिहिस हावय। जादा चेतलग नइ रिहिसे। लइकाजात कतेक बेर ले एके ठऊर म ठहिरे राहय भला। लइका के जात, न पाँव माड़य न बात ठाढ़य। लइका के मिले लइका उहू खेले बर भागगे। एति घर म नान्हे लइका तीजन बाई अकेल्ला परगे।

थोरके बेरा बुलके ले सुखबती नहाके तरिया ले आगे। घर म लइका के रोए-खेले के थोरको आरो नइ पाइस। महतारी, महतारी होथे। जब तक लइका के किलकारी कान म नइ परय, तब तक महतारी के मन नइ भरय, न माड़य। मनखे मन तो संसो के समुन्दर होथे, ओकरो मन म संसो अवतरगे। लइका ल जिहाँ सुताके गे रिहिस, उहाँ लकर-धकर गिस। लइका ल नइ देख-पाके ठाढ़ सुखागे सुखबती। 

बोमफार के रोए लगिस -‘हाय ! मोर लइका, कोन चोर चोराके लेगे।’

सुखबती के रोवा-राही ल सुनके पारा-परोस के जम्मो मनखे सकेलागे। सब के सब बक्क-खाए एक दूसर के मुँह ल देखत रहिगे। कोनो फोर फरिहा के त कोनो गुपचुप इसारा ले एक दूसर ल पूछे लगिन - 

‘का होगे ?’

सुखबती तो रोवई गवई म चेत ले बिचेत होगे रिहिस। जब कोनो कोति ले कोन्होच हँ कुछु जुवाब नइ पाइस, तब राधाबाई ले ये रोए-गाए के कारण पूछे गिस। सबो के पूछ-परख ले राधाबाई के मन म अपन गलती उफले के डर हमागे। ओकरो बुध छरियागे। उहू घबराके रोए लगिस।

वोतके बेरा परोसी डेरा के एक झिन लइका रामू दऊँड़त आइस अउ हँफरत बताइस -‘कालू (उन्करे पोसवा कुकुर) हँ अपन मुँह म कपड़ा असन कुछु दबाए-चबाए डेरा के पछीत म सपटे बइठे हे।’

तब तक लोगन ल पता चलगे रिहिस के सुखबती के लइका नइ दिखत हावय। अब उन मन ल समझत चिटको देरी नइ लगिस -

‘अच्छा ! त डेरा ल सुन्ना पाके कालू हँ सुखबती के लइका ल उठाके लेगे हावय।’

रामू के गोठ ल सुन सुखबती मारे डरके चीचियाके रोवत बेहोष होगे।

बिना सियान के ध्यान नइ होवय, ध्यान बिना ग्यान नइ मिलय, अउ बिना ध्यान बिना ग्यान के कोनो बूता म सफलता नइ मिलय। मान अउ बड़ई के बात तो गजब दूर के कौड़ी होथे। तेकर सेति सियान मन के उचित मान अउ सम्मान के ध्यान रखना चाही। सियान मनखे ग्यान, ध्यान अउ कल्याण के सऊँहत, सवाँगे, साक्षात मूर्ति होथे। 

सियान मन समझावत कहिन -‘रोए -गाए ले बनत बात बिगड़ जही। कलेचुप राहव। तुँहर हो-हल्ला सुनके कालू बिफड़ परही त जऊँहर हो जही। कालू के मति बिगड़े ले बिन मारे के मारे बिपत बाढ़ जही, आफत आ जही।’ 

मारनेवाला ले बचानेवाला बड़े होथे, तेकर सेति बचानेवाला ल हमर संस्कृति म ईष्वर के दर्जा देहे गे हावय।

जेन कभू ककरो बिगाड़ नइ करे राहय तेकर बिगाड़ कोनो नइ करे सकय। वोकर रक्षा-सुरक्षा खातिर साक्षात मुरली मनोहर गोवर्धन धरके आ जथे। भेष चाहे काकरो होवय, भाषा चाहे काँही होवय, भूषा चाहे कुछु होवय। रूप-स्वरूप तो वोकर बर तुरूप के पत्ता हरे। मँगरा के मँुह मारे हाथी के पीर म, भरे सभा बीच द्रौपदी के चीर म, त इन्द्र के बज्र बरसा म ब्रजवासी मन के धीर म ..... कोन खड़ा होइस हे.....उही मुरली मनोहर बंषी वाले जेला सबो मनमोहना कहिथन। 

सियान मन उपाय सुझावत कहिन -‘झुनुक लाल रोटी धरके पछीत म जावय। कालू ल रोटी के टुहु देखावत वोला अपन तीर म बलावय। कालू मालिक के बात मानके रोटी के लालच म झुनुक लाल तीरन आ जही। अउ जइसे ही कालू लालच म वो कपड़ा के गठरी ल छोड़के रोटी कोति लपकही, ओतकेच बेरा कोनो चेतलग मनखे चतुरई ले सावधानी से जाके झट्ट ले वो गठरी ल ले लानही।’

ये किसम ले सियान मन के रोंठ-पोठ उदीम-उपाय ले तीजन बाई काल के गाल ले उबरके नवा जनम धरिस। झुनुकलाल सुखबती के जिनगी ले वो उदासी के अंधियारा छँटगे।


_धर्मेन्द्र निर्मल_ 

_9406096346_

डिग्री दुकान म नॉन अटेंडेंस के खेल" (छत्तीसगढ़ी व्यंग्य)

 मुक्त दिवस आय तेकर सेती



  "डिग्री दुकान म नॉन अटेंडेंस के खेल"

             (छत्तीसगढ़ी व्यंग्य)

                                                                     अभी अभी के बात आय शहर के बड़ नामी-गिरामी प्रायवेट कॉलेज के प्राचार्य ल 

शिक्षा के लोकव्यापीकरण के उदिम बर सम्मान मिलिस। प्रिंट मीडिया सोशल मीडिया वोकर अतेक गुनगान करे लगिस कि हजार मुख वाले बपुरा शेष नाग रहितिस ते अपन फन ल कलेचुप सकेल चुरमुरा के बईठ जतिस।  फेर कॉलेज के थीम ल जम्मो शहर जानथे -"एडमिशन लो, ड्रीम लो, अटेंडेंस कौन पूछथे? "कॉलेज" ल "कमाई-लेज" बना डारे हें। "कॉलेज कम, दुकान जादा"। रंधईया खवईया दूनों खुश त कोन ल काय मतलब। फेर जेन लइका रोज कॉलेज आवत हें वोकर मन के पीरा ले कोनो ल काय वास्ता? इहि बात ल मँय पूछेंव- कस सर जी अईसन अन्याय काबर करथव जी? वो कथे- "जिंकर लौठी उँखर भैंस" अउ "समरथ को नही दोष गुसाईं "बात फोकट मा नइ कहे गे हावय। रेगुलर अटेंडेंस वाले स्टूडेंट मन जब एक्जाम के समे नॉन अटेंडेंस वाले मन ल देखथें त फ्यूचर म धनवान बने बर प्रेरित होथें। मन म संकल्प जगथे कि अपन पाहरो म अपन लोग लइका मन ल नॉन अटेंडेंस म पढाहूँ। वोकर लॉजिक सुन के बेहोश होवत-होवत बाँचेव। मन कहिस यहा का अंधेर गर्दी हे। 

       कॉलेज' के बोर्ड पढ़ के लगथे कि ज्ञान बांटत हें।भीतर जाके देखबे त ज्ञान नई, हाजिरी बेंचावत हे।प्रिंसिपल साहब कहिथे - "बेटा, क्लास आना जरूरी नइये, फीस आना जरूरी हवय।" स्टूडेंट घर मा सूतत रहिथे, हाजिरी रजिस्टर मा अपने आप 'प्रेजेंट' हो जाथें। अउ कहूँ रेगुलर अवईया स्टूडेंट एक दिन अब्सेंट हो जाही त सौ रुपिया फाइन ह कम्पलसरी हे। कॉलेज के नाम 'पढ़ाई-ऐप', फेर लगथे काम गड़बड़ाई ऐप'। एडमिशन अउ आने- आने फीस ल जाने बर कहूँ फोन करबे, कतको किलौली कर ले। ददा रे ददा!वोमन जानकारी कभू नइ देवँय। सोझ कालेज बलाथें। मोबाइल फोन धरके ऑफिस म खुसर नइ सकस।"सावधानी हटी दुर्घटना घटी"। उहाँ कम बोले अउ जादा समझे के बात होथे। "गागर म सागर समई काय होथे तेला जानना हे त उहाँ जाके अपन जीवन ल धन्य कर सकथन।"

       जादातर क्लास रूम ल ऊपर मंजिल म बिना शौचालय सुविधा के रखे के कारन ल पूछेंव। बड़ दार्शनिक अंदाज म बताइस कि कतकोन मैरिड फीमेल स्टूडेंट्स मन ल प्रेगनेंसी पीरियड म घेरी-घांव सीढ़ी के चढ़ई-उतरई ले नॉर्मल जचकी के संभावना जादा रहिथे। गोठ सुनके मोर टोंटा सुखागे। दू गिलास पानी गट-गट ले एकसस्सू पियेंव तभे अंतस जुड़ाइस।

         नॉन अटेंडेंस डीलिंग सेंटर म पेरेंट्स पूछथे - "सर जी, लड़का कइसन पढ़त हे?" जवाब मिलथे - "बहुत बढ़िया। एको दिन अब्सेंट नइये। रिजल्ट के दिन जरूर आहू। फोटो खिंचवाये बर। फोटू ल फ्लेक्स बनवाके चौक- चौराहा म लगाबोन। फोटू देख के तोर लइका के कैम्पस सलेक्शन के श्योर चाँस रइही। संसो झन कर तोर लइका के अस्सी परसेंट ले उपराहा लाय के ठेका हमर कॉलेज ह लेय हावय। "जइसन- जइसन देहू रे गार्जियन तइसन-तइसन देबो असीस हो। कोनो काय कर लिही हमर दाँत ल अपन पीस हो।।" 

           लाई डिटेक्टर मशीन कतेक असरदार हे तेला तो जांच एजेंसी कोर्ट कचहरी मन जानतेच्च हें। देश के बड़े-बड़े घोटाला बाज मन ल ये लाई डिटेक्टर मशीन म बइठारे ले एकोकन झूठ नइ बहिराइस न उदबत्ती जलिस। सबूत नइ मिले ले छेल्ला गोल्लर कस अभो घूमतेच्च हें। मने मन कल्पना करे लगेंव कि वैज्ञानिक मन ल "लाई आउटर टेबलेट" (झूठ बहिरावन वटी) बनाय के उदिम करना चाही। जब जुलाब गोली सक्सेस हे त यहू ह होई जाही! येकर सक्सेस होय ले नॉन अटेंडेंस फीस लेउल प्राचार्य संग गोठ-बात करे म कईसन- कईसन बात बहिराही वोला सुनके कतको कवि साहित्यकार मन खंडकाव्य महाकाव्य लिख सकत हें। जइसे:-पचहत्तर परसेंट अटेंडेंस का नियम? अरे ! वो तो पचहत्तर हजार फीस जमा करते साट पूरा हो जाथे। बाकी प्रैक्टिकल के नंबर तो 'गिफ्ट' मा मिल जाथे। संग मा कॉलेज के डायरी-कैलेंडर फ्री।"पहिली डिग्री बर पढ़ना परत रहिस, अब खरीदना परथे। कॉलेज वाले कहिथे - पढ़े बर नई, बड़े बर एडमिशन लो।" कॉलेज के किस्सा सुनबे त दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के मस्त डायलॉग 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी ' के सुरता आथे। इहाँ क्लासरूम मा मकड़ी ह अपन जाला बुनत रहिथे अऊ टीचिंग नॉन टीचिंग स्टॉफ मन ऑफिस मा नोट गिनत रहिथें। साहू मैडम पूछथे- सुनो मिश्रा मैडम वो पूरण कोठारी सेकण्ड सेम का ऊपर वाला अमाउंट आपके पास ही है न?

जी मैडम मैंने उनसे अस्सी लिया है पर मैंने उसे  पचास का ही रिसिप्ट दी हूँ।

अच्छा हाँ वो जागृति लास्ट सेम वाली जो प्रेग्नेंट है उसका ऊपर वाला डील कर ली न? पचास से ज्यादा ही लेना उनसे।' उँखर आँखी म चमक अउ बड़ कुटिल मुस्कान ल देख के स्टाफ रूम म बइठे जम्मों झन सर मैडम के मुँहू म लार आय कस लगगे।

      एडमिशन के दिन साहब हाथ जोड़ के कहिथे - "बेटा, टेंशन नई लेना। पढ़ाई-लिखाई तो बहाना हे, असली काम तो हाजिरी बनाना हे।" लईका पूछथे - "सर, क्लास कब आना हे?"जवाब मिलथे - "क्लास? अरे वो तो एग्जाम के एक दिन पहिली 'क्रैश कोर्स' मा निपटा देबो। तैं बस फीस के किश्त टाइम मा पटा दे।"

             अटेंडेंस के जुगाड़ इहाँ 'उंगली' से नई, 'अंगूठी' ले होथे। एक लाख देबे त, पूरा सेमेस्टर प्रेजेंट। दो लाख देबे, टॉपर की लिस्ट मा नाम अऊ फोटो खिंचवाये बर स्टेज फ्री। मास्टर जी खुद कहिथे -"बेटा, कॉलेज तो आये-जाये के जगह नईये। ये तो 'डिग्री-ए.टी.एम हवय - पैसा डालो, सर्टिफिकेट निकालो।" पेरेंट्स मीटिंग मा सबके सामने सौ परसेंट रिजल्ट के बैनर टंगा जाथे, अऊ पाछू लाइब्रेरी मा किताब के जघा ताला लटकत रहिथे। अब तो हाल अईसन हवे कि लड़का नौकरी बर इंटरव्यू दे बर जाथे त इंटरव्यू लेवईया सेटिंग बाज अधिकारी ह पूछथे - " तुम्हे क्या आता है?" लईका कहिथे - "सर, अटेंडेंस के बिना पास होना आता है। 

_"पहिली कॉलेज ज्ञान के मंदिर रहिस, अब कलेक्शन-सेंटर बन गेहे। इहाँ सरस्वती के पूजा कभू नइ होवय, लक्ष्मी गिने जाथे। पेपर के पहिली, सेटिंग हो जथे। एग्जाम के महीना भर पहिली 'रेट-कार्ड' जारी हो जाथे। नोटिस बोर्ड मा लिखाये रहिथे - "सप्लाई क्लियर कराना हे? संपर्क करो।" 

थ्योरी मा पास होना हे? - बीस हजात लगही।  

प्रैक्टिकल मा फुल नंबर? - तीस हजार अऊ गुरुजी बर 'खुशी के मिठाई' अलग से।  

'बैक-पेपर' क्लियर? - अरे वो तो 'कॉम्बो-ऑफर' मा हो जाही।

          स्टूडेंट एग्जाम हॉल मा जाथे त कलम नई, फोन ले जाथे। गार्ड साहब खुद कहिथे - "बेटा, आराम से लिख। व्हाट्सएप ग्रुप मा आंसर भेज दे हंव।"कॉपी जांचे वाला मास्टर जी लाल पेन से नई, पे टी एम' ले नंबर देवत हे।पेरेंट्स रिजल्ट देख के खुश हो जाथे - "वाह बेटा,अस्सी परसेंट लाये हस।" बेटा मने मन मा कहिथे - " पापा मेरे पापा अस्सी परसेंट तो कॉलेज वाले लाये हावँय, मँय तो बड़ भाग ले तोर असन पापा पाय हँव दू लाख देय पाये हँव।"

         कन्वोकेशन के दिन फोटो सेशन होथे। सब लइका गाउन पहिन के 'डिग्री' लहराथें। प्रिंसिपल साहब माइक मा कहिथे -"हमर कॉलेज के होनहार सबो लइका मन अफसर बनहीं।" पाछू बइठे चपरासी मन मा कहिथे - "साहब,अफसर नहीं तोरे जइसन जुगाडू 'फ्रॉड' बनहीं।" पहिली नकल करे वाला रेस्टिकेट होवय, अब नकल करईया मन बेस्ट प्रिंसिपल अवार्ड' ले जाथे। कॉलेज के 'प्लेसमेंट' तो नई होवय, पेमेंट' पक्का हो जाथे। 

     रोशन साहू 'मोखला' (राजनांदगांव)

               7999840942

पंडवानी अउ तीजन बाई

 पंडवानी अउ तीजन बाई 


हमर छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के सोर सिरिफ भारत भर म नइ बल्कि दुनिया भर म बगरे हे। रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले इहां के लोककलाकार मन विदेश म घलो अपन प्रतिभा के लोहा मनाइस हे। एक तरफ मंदराजी दाऊ ह नाचा,दाऊ रामचंद्र देशमुख ह देहाती कला विकास मंडल अउ सांस्कृतिक संस्था चंदैनी गोंदा , दाऊ महासिंह चंद्राकर ह सोनहा बिहान के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ी संस्कृति के परचम पूरा भारत वर्ष म फैलाइस। खुमान साव के संगीत, लक्ष्मण मस्तुरिया,केदार यादव ,भैया लाल हेड़ाऊ, अनुराग ठाकुर,ममता चंद्राकर, जयंती यादव,कविता वासनिक अउ आने गायक -गायिका मन के जादू चलिस।दूसर कोति रंगकर्मी हबीब तनवीर के नया थियेटर के माध्यम ले फिदा बाई मरकाम, माला बाई मरकाम, अंतराष्ट्रीय पंडवानी गायिका तीजन बाई,अंतरराष्ट्रीय पंथी गायक/नर्तक देवदास बंजारे बंजारे, मदन निषाद, गोविंद राम निर्मलकर, सुरूज बाई खाण्डे ( भरथरी,ढोला - मारू गायन), शिवकुमार दीपक,दीपक विराट, पूनम विराट,उदेराम श्रीवास  मन जैसे कतको कलाकार मन भारत अउ छत्तीसगढ़ के मान बढ़ाइस। पंडवानी ल अंतराष्ट्रीय स्तर म पहिचान दिलाय म पंडवानी कलाकार झाड़ू राम देवांगन, पूना राम निषाद,तीजन बाई , रितु वर्मा के नांव शामिल हे। ये विधा म लक्ष्मी बाई बंजारे,शांति बाई,उषा बारले, प्रतिमा बारले, रेवा राम साहू, समप्रिया निषाद, दानी परधान,गोगिया परधान, रामजी देवार ,  तरूणा साहू,आराध्या साहू साधना करके छत्तीसगढ़ के लोक कला के सोर बगरावत हे।

 येमा पंडवानी के देवी, पंडवानी के डाक्टर तीजन बाई ह 5 जुलाई 2026 के  ये दुनिया ल छोड़ के चले गिस।  एम्स रायपुर म इलाज चलत रिहिन।उंकर निधन न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि भारत वर्ष के लिए अपूर्णीय क्षति हे। उत्कृष्ट पंडवानी गायन बर तीजन बाई भारत सरकार द्वारा बछर 1987 म पद्मश्री,2003 म पद्मभूषण, फुकुओका सम्मान,जापान (2018),  पद्म विभूषण 2019,संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सम्मान 2022  ले सम्मानित होय रिहिन हे।वोहा  पद्मश्री ले सम्मानित छत्तीसगढ़ के पहिली महिला हे।


पंडवानी एक परिचय 


 पंडवानी महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत कथा के छत्तीसगढ़ी लोक रुप हरे।येकर रचनाकार सबल सिंह चौहान ( रतनपुर) हे। पंडवानी के मुख्य नायक भीम,अर्जुन अउ मुख्य नायिका द्रोपदी हे। खलनायक म दुर्योधन, दु:शासन शकुनि,कीचक हे।


गायन अउ वाद्य यंत्र 


पंडवानी म एक मुख्य गायक अउ वोला संग देय बर रागी होथे। गायक/ गायिका खुद तंबूरा,खंजरी,अउ करताल (खड़ताल) बजाथे।आने कलाकार मन तबला,ढोलक, हारमोनियम,बेंजो अउ मंजीरा ले संगत करथे। रागी ह मुख्य गायक के हुंकारू भरथे।वोहा मुख्य गायक गाथे तेला दोहराथे। रागी ह तत्कालीन कथा ल वर्तमान बेरा म जोड़थे। अइसे करके जिहां लोगन मन के मनोरंजन करथे त बाते -बात म संदेश घलो देथे।


पंडवानी के शैली 


पंडवानी के दू शैली प्रचलित हे- वेदमती अउ कापालिक। वेदमती शैली के गायक मन शास्त्र सम्मत अउ महाभारत के मुताबिक गायन करथे।  मंच म बइठ के प्रस्तुति देथे।येमन अपन आप ल पंडवानी गायक के जगह महाभारत गायक कहलाना पसंद करथे। ये शैली म सिरिफ गायन होथे।नृत्य नइ करे जाय। 

   दूसर कोति कापालिक शैली के बात करन त वाचिक परंपरा पर आधारित होथे।  येमा मंच म खड़े होके,तंबूरा ल लहरावत , पांव ल थिरकात गायन करे जाथे।येमा गायन अउ नृत्य दूनों होथे।येमा कल्पना के घलो सहारा लेके कथा ल रोचक बनाय जाथे।ये शैली म । गायक/ गायिका नृत्य करथे अउ कथा अभिनय के बेरा थिरकथे।ये शैली म पुरुष मन के जोर रेहे हे पर तीजन बाई ह ये शैली ल अपना के एक इतिहास रच दिस।


हमर छत्तीसगढ़ म पारधी, देवार अउ भिम्मा पंडवानी गायन करइया प्रमुख जन जाति हरे।  कंवर जनजाति के मन घलो शौकियाना रूप म गायन करथे।


तीजन बाई के शुरूआती जीवन 


देश विदेश म पंडवानी के माध्यम ले अपन एक अलगे पहिचान बनइया तीजन बाई के जनम छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला के गनियारी गांव म 24 अप्रैल 1956 म होइस। उंकर जनम शोषित अउ वंचित समाज पारधी जाति म होइस।जीव- जंतु मन के शिकार करना पारधी समुदाय के काम राहय।उंकर बाबू जी के  हनुक लाल पारधी अउ महतारी के नांव सुखमती देवी रिहिन। छत्तीसगढ़ के लोक परब तीजा के दिन जनम होय के सेति वोकर नांव तीजन बाई रखे गिस। परिवार म गरीबी रिहिस । नानपन अब्बड़ अभाव म बीतिस। तीजन बाई पढ़ाई नइ कर पाइस पर अपन मिहनत अउ दृढ़ इच्छाशक्ति ले पंडवानी के माध्यम ले दुनिया म राज करिस ‌।


पंडवानी के शुरुआत 


 तीजन बाई ह नौ बछर के उमर म अपन चचेरा नाना बृज लाल पारधी ल पंडवानी गावत सुनिस। वोकर मन पंडवानी कोति रमगे अउ अपन नाना ले पंडवानी सीखे बर चालू कर दिस। बारह बछर के उमर म बिहाव होगे।जब तीजन बाई ह मंच म पंडवानी गायन चालू करिस त परिवार अउ समाज म अब्बड़ विरोध होइस। तेरह बछर के उमर म जब वोहा मंच म पंडवानी के गायन करत रिहिन त वोकर बाबूजी ह नंगत भड़क के प्रस्तुति ल रोके बर बोलिस पर तीजन बाई नइ मानिस। येला अपन कला के अपमान मानिस अउ अपन बाबू जी ल किहिस आज ले तोर मोर कोनो रिश्ता नइ हे। अइसन परिस्थिति म तीजन बाई ल खुद के घर से निकाल देय गिस। कलाकारी के कारण वोकर पहिली शादी टूटगे। दूसरा बिहाव ह घलो सफल नइ होइस। तीन जीवन साथी मन वोकर संग छोड़ दिस।अपन दू बेटा अउ एक झन गोद बेटा ल घलो खो दिस पर विपरीत परिस्थिति म घलो अपन कला ल नइ छोड़िस।


  पहिली सार्वजनिक कार्यक्रम चंदखुरी म 


तीजन बाई सन 1973 म पंडवानी गायन के शुरुआत करिन। पहिली सार्वजनिक कार्यक्रम चंदखुरी म होइस। येकर आयोजन मालगुजार भूषण लाल देशमुख ह करे रिहिन।

तीजन बाई ल वाद्ययंत्र मन के संग जुगलबंदी अउ लय के बारीकी मन ल उमेंद सिंह देशमुख ह सिखाइस जेला अपन गुरु मानत "ददा" काहय।


 हबीब तनवीर ले भेंट फेर जिनगी म बदलाव 


चंदखुरी म प्रस्तुति के बाद तीजन बाई के सोर आस पास के गांव म फइल गे ‌।येकर बाद भिलाई म कार्यक्रम देय के नेवता मिलिस।फेर दुर्ग, रायपुर अउ भोपाल के भारत भवन म घलो पंडवानी गायन के मउका मिलिस ‌। तीजन बाई के भेंट भोपाल म देश के जाने-माने रंगकर्मी हबीब तनवीर ले होइस। तनवीर जी कला के पारखी रिहिन।वोहा तीजन बाई के प्रस्तुति ले अब्बड़ प्रभावित होइस अउ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ले तीजन बाई के भेंट कराइस। इंदिरा गांधी घलो तीजन बाई के गायन शैली ल खूब पसंद करिन।

येकर बाद फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ह तीजन बाई के अद्भुत शैली ल देखके अपन टीवी धारावाहिक " भारत एक खोज" म पंडवानी गायन बर नेवता दिस।


भिलाई स्टील प्लांट म नौकरी 


दूरदर्शन म मउका मिले के बाद तीजन बाई के सोर घर- घर तक पहुंचिस। वोकर प्रतिभा के कदर करके भिलाई स्टील प्लांट म सरकारी नौकरी दे गिस। येकर ले उंकर जिनगी के गाड़ी बने चले लगिस अउ निश्चिंत होके देश के संगे संग विदेश म घलो पंडवानी के प्रस्तुति दे लगिस। बछर 1985 म फ्रांस म होय भारत महोत्सव म अपन विशिष्ट शैली ले धूम मचा दिस ‌। मारीशस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, साइप्रस,माल्टा,कतको देश म उत्कृष्ट पंडवानी गायन कर भारत अउ छत्तीसगढ़ के समृद्ध लोक कला ल एक नवा ऊंचाई प्रदान करिस। तीजन बाई द्वारा वीर रस म 

पांडव मन के कथा ल प्रस्तुत करे के अद्भुत कला, तंबूरा के बेमिसाल तान अउ मंच म भाव के अनुरूप अद्भुत अंग संचालन के कारण सिरिफ भारतवासी ह नइ अपितु विदेशी मन के घलो दिल ह खुश हो जाय अउ दर्शक मन ल बांध के राखय। तीजन बाई मूल कथा ल आज के सामाजिक अउ राजनीतिक स्थिति म जोड़त नंगत प्रहार करके अपन प्रस्तुति ल सार्थक बनाय। हमर गांव सुरगी के मुख्य सांस्कृतिक मंच म तीजन बाई के पंडवानी सुने रेहेन। वोकर प्रस्तुति ल देख के क्षेत्रवासी मन म अब्बड़ उछाह छागे रिहिन।


चतुर्भुज देवांगन के भजन' चोला माटी के हे राम......वोकर प्रिय भजन राहय ‌‌। जब तीजन बाई प्रस्तुति के शुरूआत - "बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय......",

सना नना नना मोहन..... ल अपन तंबूरा के तान ले मंच म थिरकत विशिष्ट अंग संचालन शैली ले प्रस्तुति देय त हर दर्शक रोमांचित हो जाय।

   तीजन बाई भले निरक्षर रिहिन पर वोहा पंडवानी के डाक्टर रिहिन। बछर 2003 म बिलासपुर विश्व विद्यालय अउ 2006 म रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर ह डी. लिट के मानद उपाधि ले सम्मानित करिन।


  तीजन बाई खुद निरक्षर रिहिन पर महिला अधिकार अउ साक्षरता अभियान म बढ़ चढ़ के भाग लिस अउ साक्षरता के महत्व ल समझाके लोगन मन ल साक्षर बने बर प्रेरित करिन।

  पंडवानी के देवी तीजन बाई के निधन भारत अउ छत्तीसगढ़ के लोक कला के लिए अपूर्णीय क्षति हे। तीजन बाई अपन यश रूपी शरीर ले जीवित रहि। पंडवानी के  डाक्टर ल विनम्र श्रद्धांजलि। शत् शत् नमन हे।🙏💐🙏 


          - ओमप्रकाश साहू अंकुर 

        सुरगी, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य सड़क में मछरी पालन

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य


सड़क में मछरी पालन

वीरेन्द्र ‘सरल‘

गरमी के दिन में बने नवा चमचमाती सड़क ह बरसात के पहिलीच पानी में हिरोइन के मेक-अप असन धोवागे अउ रेती, सिरमिट, डामर अउ बजरी गिट्टी मन भिंगे उड़िद दार के फोकला कस उफलगे। सड़क ह चुहके आमा के फोकला कस खोचका-डबरा होगे। 

जी पराण देके जनता के सेवा करइय्या भैय्या जी किसम के मनखे मन तुरते ये बात के शिकायत सड़क बनवइय्या  बड़े साहब मेरन जा के करिन। पत्रकार मन घला साहब मेरन पहुँचगे।

पत्रकार मन साहब ला पुछिन-‘‘कस साहब! आजकल लाखों-करोड़ो रुपया के बने पुल-पुलिया अउ चमचमाती सड़क मन बरसात के पहिलीच पानी में चाउर असन धोआ जावत हे। ये बड़ अचंभा के बात आय भई। अभी घला अंग्रेज जमाना के बने कतकोन पुल-पुलिया अउ भवन मन वइसनेच के वइसने हावे। फेर नवा मन कइसे निचट सिगसिगहा होवत हे? आज बनत हे तेखर चिन्हा कालीच सिरा जावत है, ये काय बात आय ? "

साहब पहली अपन पेट में हाथ ला फेरिस अउ डकार लेवत किहिस- ‘‘ येमें अचंभा के काय बात हे यार! सियान मन कहिथे ‘तइहा के बात ला बइहा‘ लेगे। पहिली के सड़क ह जुन्ना तकनीकि में बने। अब के मन बिल्कुल नवा तकनीकि ले बनत हे। बेरा के संगे-संग तकनीकि ह तो बदलबे करही। हमन तो ‘सियाराम मय सब जग जानि‘ के सिद्धाँत ला अपना के सबके कल्याण करत हन। देखत नइ हव सड़क में आज कल कतेक मनखे मन कल्याण होवत हे?  अरे भई! जब तरिया डबरी मन पटावत हे तब मेंचका-मछरी के रहे-बसे बर जगा लागही कि नइ लागही?  जउन ला तुमन खोचका - डबरा समझत हव तउन सब मेचका-मछरी आवास योजना के अन्तर्गत इखर बर बनाय आवास आय, समझगेव? "

दूसर बात ये आय कि आजकल मनखे मन गजब सुविधाभोगी होगे हावे। मिहनत के काम जादा नइ करे तेखर सेती किसम-किसम के बीमारी ओमन ला घेरे रहिथे। शरीर ह निचट कमजोर होवत जावत हे। खेल मैदान अउ चरागन में मनखे मन अवैध कब्जा करके बइठे हे। तिही पाय के हमन सोचे हन मनखे जब उबड़-खाबड़ सड़क में चलही तब उखर अच्छा व्यायाम होही। जिनगी के ऊँच-नीच रद्दा में चले के अभ्यास होही। हमन जउन नवा तकनीकि ले सड़क बनावत हन ओमें कई किसम के फायदा हे। पहली बात तो ये हे कि हम जनसंख्या नियंत्रण अउ अंधत्व निवारण  बर स्वास्थ्य विभाग ल अपन भरपूर सहयोग देवत हन। जउन मनखे हमर बनाय सड़क म बने सोझ बाय रेंगत हे मतलब समझ जाओ कि ओखर दोनों हेड लाइट  ठीक हे अउ जउन सड़क के खोंचका -  डबरा म झपा के गिरत - हपटत हे माने उंखर आँखी के फ्यूज होय के डर हे। ओला बिना जांच - पड़ताल के सोझे ऑपरेशन थियेटर म ओईलाय के जरूरत हे, समझेव? तीसर बात ये हे कि आजकल अंतरराष्टीय खेल प्रतियोगिता में हमर खिलाड़ी मन अपन खेल के प्रदर्शन  ठीक से नई कर पावत हे, एखर कारण ल जानथव, नहीं ना? एखर कारण खेल मैदान के कमी होना आय। मोला पक्का विश्वास हे हमर खिलाड़ी मन हमर  नवा तकनीक के सड़क म जब कूदत-फाँदत रेंगहीं तब उंखर अच्छा प्रेक्टिस होही अउ ओमन कहीं नहीं ते लम्बी कूद अउ ऊंची कूद म सफल हो के  हमर देश बर जरूर मेडल जीत के लानही। चौथा फायदा ये हे कि सड़क के गड्ढा म जब पानी भरे रही तब जल संरक्षण घला होही। पानी भरे सड़क म चलइय्या मोटर गाड़ी मन अपने आप धोवाही तब उंखर मालिक मन के पइसा बाँचही । सड़क के दचाका में कोन्हों मोटर गाड़ी बाँचगे तब समझ लेव कि गाड़ी बहुत मजबूत हे, मतलब एखर ले गाड़ी के मजबूती के घला जांच होही अउ--------।

  साहब के गोठ ल सुनके सुनइय्या मन ल तीन डिग्री के बुखार धर लिस, ओमन मुड़ धरके बइठगे।  एक झन किहिस - " भइगे ददा! हमन समझ गेन, आप मन अइसन सड़क के माध्यम ले गजब अकन कल्याणकारी योजना चलावत हव। हमी मन मूरख अन ददा जउन आप मन के योजना ल आज ले नई समझे रहेन। अब समझ गेन अउ जादा झन समझा।  जादा समझे म तो हमर इंहचे कल्याण होय के डर हे। हमन जावत हन मोर बाप।"

 साहब ह हव कहिके मुड़ी ल डोलावत अपन पेट म हाथ फेरिस, वतकीच बेर ओला डकार आगे। कुरिया भर डामर अउ सीमेंट के बदबू भरगे। उँहा रिहिन तउन मन नाक ल चपक के थू -थू कहत भागिन।

 वीरेन्द्र सरल

बोडरा ( मगरलोड )

जिला- धमतरी ( छत्तीसगढ़ )

पद्मश्री, पद्मभूषण अउ पद्मविभूषण तीजन बाई - पंडवानी के निधन

 


पद्मश्री, पद्मभूषण अउ पद्मविभूषण तीजन बाई - पंडवानी के निधन


कला के दुनिया में अपन लोहा मनवा के भारत देश के तीन-तीन ठन पोटलगहा गहना पद्‌मश्री, पद्मभूषण अउ पद्मविभूषण ला पहिन के हाँसत बदन छत्तीसगढ़ के दुलौरिन बेटी तीजन बाई सरग में वास करे बर निकल गे । ए कह सकथन के तीजन के संगे-संग पंडवानी के घलो निधन होगे । काबर कि तीजन अउ पंडवानी एक दूसर बर बने रिहिन, कहे के मायने एक दूसर के पूरक रिहिन । एकरे सेतिक लिख पारें के पंडवानी के घलो निधन होगे । हाँलाकि छत्तीसगढ़ में पंडवानी के कतको गायक मन ए पंडवानी के चमकत झंडा ल थाम के चलत हें।

   छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति,  लोककला अउ लोकगाथा के पोटलगहा परंपरा पंडवानी हर भारतीय सांस्कृतिक  धरोहर के हिस्सा आय। ए समृद्ध परंपरा मा पंडवानी एक अइसन लोकगायन शैली आय, जेन हर महाभारत के कथा ला गीत, संगीत, अभिनय अउ हाव-भाव के माध्यम ले जीवंत रूप में प्रस्तुत करथे। पंडवानी कला ला राष्ट्रीय अउ अंतरराष्ट्रीय स्तर में मान दिलाय बर जेन लोक कलाकार के नाम सबले पहिली सम्मान के साथ ले जाथे, ओ हावय तीजन बाई। ओमन सिरिफ एक लोकगायिका नइ, भलुक छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक अस्मिता, लोकपरंपरा अउ महिला सशक्तिकरण के प्रतीक बने हवंय।


धन्य-धन्य वो गनियारी गाँव अउ धन्य-धन्य ओकर दाई-ददा जेमन के कोख ले जगमगात जुगनू अवतरे रिहिस, ओखर संगे- संग सब्बो अनर होगिन । तीजन बाई के जनम सन् 1956 मा ओ समय के दुर्ग जिला अब बालोद जिला के गनियारी गांव माँ एक सामान्य पारधी परिवार मा होय रहिस। बचपन ले ओमन के मन मा लोककला अउ महाभारत के कथा के प्रति बनेच लगाव रहिस। ओमन अपन नाना ब्रजलाल पारधी ले महाभारत के कथा सुनत-सुनत पंडवानी के प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करिन। पइसा-कौड़ी के अभाव अउ सामाजिक बंधना के बाद भी ओमन अपन कला साधना ला सरलग जारी रखिन। इकर कला भिलाई मा आय के बाद दिनो-दिन परवान चढ़त गिस । ओ समय ए कलाकार के कला ला देखे बर , हाव-भाव के साथ महाभारत के कथा के रस लेहे बर गाँव-गाँव मा पोता दसा के जगहा पोटारंय । रात भर ओकर मुखारवृन्द ले गाना, कथा, नाचा, जोश मा पाँव के पटकइ, कोस्टाहु लुगरा, रंग-रंग के गहना, मुँह मा बीड़ा पान के लाली, तंबूरा ला देख के अकबका जावंय ।


ओ समय मा पंडवानी गायन हर पुरुष कलाकार मन के क्षेत्र माने जावत रहिस। महिला मन के मंच मा खड़े होके पंडवानी प्रस्तुत करना सामाजिक रूप ले स्वीकार नइ रहिस। फेर तीजन बाई अपन मन के मनसूबा, आत्मविश्वास, संघर्षशीलता अउ कला के प्रति समर्पण के बल मा ए रूढ़िवादी सोच ला चुनौती देवत सरलग आघु बढ़िस।


पंडवानी के दू प्रमुख शैली – "वेदमती" अउ "कापालिक" – प्रसिद्ध हवंय। वेदमती शैली मा कलाकार मन बइठ के गायन करथे, जबकि कापालिक शैली मा कलाकार मन खड़े होके अभिनय, संवाद, स्वर परिवर्तन अउ नाटकीय अभिव्यक्ति के माध्यम ले प्रस्तुति देथें।

तीजन बाई कापालिक शैली के सबले ज्यादा प्रसिद्ध अउ प्रभावशाली कलाकार माने जाथें। ओमन अपन प्रस्तुति मा एक साधारण तंबूरा ला भीम के गदा, अर्जुन के गांडीव, दुर्योधन के अस्त्र अउ कइठन प्रतीकात्मक रूप मा उपयोग करत रिहिन। ए प्रकार के अभिनय कौशल, हाव-भाव अउ स्वर के मिठास हर दर्शक मन ला मंत्रमुग्ध कर देथे।

संघर्ष अउ सफलता के यात्रा मा

तीजन बाई के जीवन संघर्ष, परिश्रम अउ आत्मविश्वास हर प्रेरणादायक उदाहरण आय। समाजिक विरोध, आर्थिक समस्या अउ पारिवारिक चुनौती के बाद भी ओमन अपन कला यात्रा ला बंद नइ करिन। धीरे-धीरे ओमन के प्रतिभा के पहचान स्थानीय मंच ले निकल के भिलाई होवत राष्ट्रीय मंच तक पहुंचिस।


भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर, रंगनिर्देशक बी.वी. कारंत अउ पोटलगहा कला समीक्षक मन तीजन बाई के प्रतिभा ले प्रभावित होके ओमन ला बड़े मंच प्रदान करिन। एखर बाद तीजन बाई देश-विदेश के बनेच अकन सांस्कृतिक कार्यक्रम मन मा पंडवानी के प्रस्तुति दीन अउ छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति ला वैश्विक मंच तक पहुंचाइन।


तीजन बाई हर भारत सहित फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड, रूस, ऑस्ट्रेलिया अउ कइठन देश मा पंडवानी के नाम कमाय लायक प्रस्तुति दे चुके हवंय। ओमन के गायन अउ अभिनय शैली हर विदेशी दर्शक मन ला घलो बनेच प्रभावित करय। ए प्रकार ओमन छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति के वैश्विक राजदूत के रूप मा प्रतिष्ठित होइन।


तीजन बाई के कारण आज पंडवानी कला विश्व स्तर मा पहिचान प्राप्त कर चुके हावे। कतको शोधार्थी, संगीतकार अउ लोकसंस्कृति विशेषज्ञ मन ओमन के कला शैली ऊपर अध्ययन करे अउ करत हवंय।


तीजन बाई के असाधारण योगदान बर भारत सरकार अउ विभिन्न संस्थान मन ओमन ला आनी- बानि के सम्मान प्रदान कर चुके हवंय, जेमां प्रमुख हवंय –पद्मश्री सम्मान (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995),

पद्मभूषण सम्मान (2003), नृत्य शिरोमणि सम्मान, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, पद्मविभूषण सम्मान (2019), अउ बनेच अकन राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्मान पा चुके हें। ए सम्मान मन केवल तीजन बाई के व्यक्तिगत उपलब्धि नइ, भलुक छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति के गौरव के प्रतीक हवंय।


तीजन बाई के व्यक्तित्व मा कइठन पोटलगहा गुण देखे बर मिलथे –

गजब के आत्मविश्वास, कला के प्रति समर्पण, सरलता,  सहजता, हँसमुख, 

परंपरा के संरक्षण के भावना,

नवा पीढ़ी ला प्रेरित करे के क्षमता,

राष्ट्रीय अउ सांस्कृतिक चेतना आदि ।

ओमन कतको युवा कलाकार मन ला पंडवानी के प्रशिक्षण देके ए लोककला के संरक्षण अउ संवर्धन मा बनेच अकन योगदान देत रिहिन।


तीजन बाई छत्तीसगढ़ के माटी के ओ दुलौरिन रतन हवंय, जेन अपन कठिन परिश्रम, प्रतिभा अउ पोठ संकल्प के बल मा पंडवानी लोककला ला नवा ऊँचाई प्रदान करिन। ओमन सिद्ध करिन कि प्रतिभा, लगन अउ आत्मविश्वास के माध्यम ले कोनो मनखे विश्व मा पहचान प्राप्त कर सकथे।

पंडवानी के इतिहास मा ओमन के नाम सबो काल बर स्वर्ण अक्षर मा अंकित रही अउ आने वाला पीढ़ी मन बर प्रेरणा के स्रोत बने रही।


डॉ. कृष्ण कुमार चन्द्रा

सचिव

मुकुटधर साहित्य समिति

कोरबा

दुस्सासन के साहस*.

 *दुस्सासन के साहस*.          

                                            ब्यंग.

              जेन देश राज मा पुरूष के प्रधानता हे उँहा नारी जात ला पिड़हा मा बइठार के पूजा करना सृष्टि रचइता के सँग मजाक हो सकथे। जे मन इँकर पाँव धो के पीये हें उही मल लिख दिन कि "यत्र पूज्यन्ते नारी तत्र रमन्ते देंवता" अइसन पूजनीय नारी के सम्मान वस्त्र दान करके नहीं वस्त्र उतार के करे जावत हे। वस्त्र हरन के गरिमा ला दुस्सासन जइसे साहसी पुरूष हर देख लगाइस। जे हर आज के समाज बर प्रेरणादायी हे। जेकर नतीजा आय कि दुर्योधन अउ दुस्सासन जइसे कीरा काँटा दिनोदिन पनपत रथे। पति पीड़ित मन नारी उत्पीडन केंद्र के सुविधा ले तलाक ले सकथे। फेर कोंवर पीकी ला रमजे के, डोंहरू ला मुरकेटे के, अउ छतनार काया ला चील गिधान असन झपट के लहू-लुहान करे के नवाचार चलत हे। भुगतमान देंह ला सरकारी सहानुभूति के घुनघुना मिलथे। अउ दुस्सासन ला सुरक्षा। इही मन घुनघुना बजा बजा के बताथें किये दुनिया मा जइसे बिना कपड़ा के आए हव ओइसने ही तुमला सोभा देथे। (ये कायदा पुरूष बर लागू नइये।

                     नारी जात के कोख ले जनम धरने वाला मन ही तिरिया जात ला पाँव के पनही कहिके सम्मान देथे। संसार के सबो नारी परानी ला बहिनी बनाना नैतिक अपराध मा गिने जाथे। ओकरे सेती ये नत्ता ला स्वीकार कर पाना आदमी अउ आदमीयत बर खतरा माने गेय हे। उपर वाला स्त्री जात ला भोग विलास के समान बनाके भेजे हे तब सँगे सँग दुर्योधन अउ दुस्सासन घलो भेजे हे। पेट के भूख कइसनो करके मारे जा सकथे। फेर हवस अउ वासना के भूख दाँत झरे अउ चूँदी पाके वाला के घलो नइ मरे। ना उमर के सीमा हे ना जात धरमके ना तो नाता रिस्ता के। चील गिधान कस मास चिथोल के भूख मेंटाना मानव कर्तव्य मा आथे। ३६४ दिन तिरिया जात समाज के दुधारी तलवार सँग खेलत मिलथे। बाँचे राखी के एक दिन सुरक्षित हे  अइसे कल्पना करे मा का  सिराही।

                  चार दिवारी सुन्ना घर मा छेड़खानी करे ले मनखे ला वो सम्मान नइ मिले जतका खुले बजार मा मिलथे। अउ कहूँ सामुहिक सहकारी भाव ले होगे तब प्रसंसा के फोटू अखबार तक नइ गिस माने चउँथा स्तंभ के खोरवापना उजागर हो जही। नारी ला अबला कहि कहिके उँकर मनोबल उपर चंदन लेप करत रथें। नारी सबल होथे ये बात के परिचय फूलन देवी हर देय रिहिस। मरियादा के निठल्लापन के गवाही देय बर दाई ददा के संस्कार घलो रूधना बारी के ओधा ले हुँकार भरत मिल सकथे। ३३% के कोटा मा पुरूष मन के दुख के कारन ये हे कि ३ परसेंटी वाले के कद काबर बाढ़गे? राजनीति के कुरसी बचाय बर नारी जात के इज्जत अस्मिता के हत्या करवाना अउ चार छै बालटी आँसू बोहाना ये दूनों के आपसी अंदरूनी संबंध गहरा हे। नारी जात के दुखड़ा उपर बहे आँसू के सुद्धता पैथोलॉजी मा पता नइ चले ओकरे सेती आँसू ला राजनीति के रंग घोर के बोहाना परथे। कोनो तिरिया इन्साफ न्याय के लड़ाई करत करत दुनिया ले तिरियागे तब ये लड़ाई ला लड़त रेहे बर कोनों दूसर ला अपन इज्जत इही वहसी कामी दुराचारी समाज के हवाला करना परथे। कोख भितर हत्या से लेके तलाक, चीर हरन से लेके नबालिक सँग कुकरम इज्जतदार समाज के बेटी बचाओ नारा ला बल देथे। ओकरे सेती 12 साल पँदरा साल भर उमर वाले केँवरी काया घलो मिठा जावत हे। एकर संसोकोन करे कि बेटी के उमर के हे कि नतनिन के। कबीर तुलसी दयानंद विवेकानंद अउ कतको नंद समाज बर प्रेरणा तब तक रिहिन जब तक मनखे के चेतना अउ सतबुद्धि नइ जागे रिहिस। अब जाग गेहे तब दुर्योधन अउ दुस्सासन असन पात्र मन ही जवान पीढी के आदर्श हो सकथे। चरित्रहीन पति अपन घरवाली ला ये बताथे कि भाईचारा के नाता ले परोसी सँग हाँस के गोठियाना स्त्री अधिकार मा नइ आय।

                महिला हिमालय मा चढगे, चंदा मा चल दिन। फौजी अउ पायलट बनगे, नेता मंत्री बनगे। नारी नारी के दुख मा संसदीय आँसू बोहाय के दम घलो रखथें। फेर नारी के आँसू पोंछे बर फूलन बने के हिम्मत नइये। कुस्ती कला मा धोबी पछाड़ के गुन नइ सीखे ले अउ फूलन के जीवनी नइ पढ़े के सेती ही हल्ला मँचिस। सीखे रतिस त कुकरमी कुरिया भीतर ले स्टेक्चर के सवारी करत गुप्तांग के इलाज बर बिदेश जातिस। मणिपुर के मामला एतिहासिक नोहे ना निर्भया पहिली केस आय। आसाराम एके ठन उदाहरण नोहे ना आंध्रा बिहार एके बखत लहूलुहान होय हे। दास प्रथा अउ हरिजन शब्द के  परिभाषा जानके अब के घटना मा भारतीय परम्परा के भान होथे। जे मन जानत हे वो मन नाक तमड़ के आँसू नइ बोहाय। वो मन जानत हे कि ये आदर्श परम्परा ला जिया के राखे बर दुस्सासन जइसे साहसी मानव धरती मा होना जरूरी हे।

                 नारी जात फूल असन कोंवर होथे। नारी माया ममता के मुरती आय। नारी गऊ हे। नारी अबला होथे नारी खेलौना हे। जे मन जइसन नजर ले देखिन परिभाषा मा बाँध दिस। नवा नाम यहू हे कि तिरिया जात माने बच्चा जने के मशीन। जेकर कोख मा खराब सिरजन होथे तब वोला उँहिचे मारके कूड़ादान के नीला हरा डब्बा मा विसर्जित करे जाथे। बहिनी तो फकत खून के रिस्ता ले ही बनाये जा सकथे। सबो ला बनाही तौ दरिंदगी के सार्थकता बर दूसर लोक खोजे बर परही। फेर ये कलजुगी धरा मा आज मोर बहिनी नइ बाँचिस माने काली तहूँ राखी के दिन अगास कोती रसता देखबे। राजनीति एक फलत फूलत दुकान आय जिंहा संवेदना के आँसू मोफत मिलथे। जिंहा पल पल करके न्याय मरत हे वो न्यायपालिका सडक बाजू के खोमचा टपरी आय। इहाँ न्याय के एक कप चाय बर धन अउ इज्जत दुनों के चघावा देय बर परथे।

           नारी सम्मान नारी अस्मिता नारी विमर्श नारी संवेदना नारी उत्पीड़न अउ नारी सुंदरता के पाठ रट रट के कतको झन पी एच डी कर डारिन। फेर उँनला पाँव के पनही माने छोडत नइये। पाँव के जगा मूँड़ मा चघाहीं तब मरद जात के मरदानगी के का होही? सहिर लुधियानवी जी नारी जात के वकालत मा गीत लिख डारिस कि---------

*औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया*।

*जब जी चाहा मसला कुचला, जब चाहा धुत्कार दिया*।

फेर हास्य कवि बर नारी जात अच्छा पात्र बिषय बन गेहे। पुरूष के पुरसारथ अउ पराक्रमी पना हर तिरिया जात ला घरके पोसे कुकरी असन पोइले बर कटारी धरे मिलथे। फाइल दफ्तर दफ्तर नाचत रही, राजनीतिक दया के आँसू नाली मा जावत रही। पक्ष विपक्ष बैमनस्यता के आँच मा इंसानियत ला लडवाते रही। तिरिया जात के चीर हरन  दुस्सासन कुल के मन करते रहीं।  दुर्योधन के जंघा अकुलाते रही। रावन के पुष्पक छानी उपर मँडरात रही। काबर कि ये करम हमर परम्परा अउ पहिचान बन चुके हे। नारी सम्मान नग्नावस्था मा जादा सोभादायी हे। देंह निंचोय अउ चिथोले बर चील गिधान बनके लहूलुहान करना नारी उपर आदमी के आदर्श संस्कार के दर्शन कराथे। विश्व महिला दिवस के दिन एको ठन घटना नइ घटे ले मरद  समाज अपन नामरदानगी के सरम ले मूड़ नँवा के रेंगथे। मुँहूँ के कथनी ला मन मा उतार के देख। वो अभागिन तोर अपन के सगे तो घलो हो सकत हे। कलंकित समाज के आँसू धरे बजार मा राखी के जगा मंदी के जमाना मा कफन सस्ता होना तय हे। रोज चार ठन घटना घटे के डर ले पुरूष प्रधान समाज के प्रस्ताव ला स्वीकार करके बइठे हें। भले संताप के आँच मा समूचा सृष्टि के बिनास बर बिनती बिनोवत हें।

          राजनीति के पिसान साने बर पीड़िता के अँगना मा आँसू बोहाना परथे। जेकर छिटका अखबार अउ मिडिया तक जाना जरूरी हे। नइते कोन जानही कि सुभ चिंतक कोन कोन हे? अपराधी  खून के रिस्ता या सगा होगे। अउ नही ते पारटी ले गहरा रिस्ता रखथे। तब उही डरे सहमे दबे कुचले महिला थाना मा रिपेट लिखवा दे। जम्मो जिनगी ठसन ले जी के मरही तब आजीवन कारावास के फरमान आही। हमर चिंता अवधपुर के भव्यता उपर हे। मणिपुर तो चुकता देश हे तब फोकट चिंता करके समय गँवाना अकारथ हे। दुस्सासन कुल के अबादी जम्मो देश मा बगरे हे। जेकर करनी उपर लोहा पथरा ले कड़ा शब्द मा निंदा भर ही करे जा सकत हे। दूसर कोनों उपाय ही नइये। तभे तो दुस्सासन मन के साहस दिनो दिन बाढ़ते हे। जावत जावत एक झन बढ़िया शायर के दू लाईन घलो गठिया लव कि---------

*किसी को काटों से चोट पहुंचा किसी को फूलों ने मार डाला*।

*जो इस मुसीबत से बच गये उसे तो उसूलों ने मार डाला।।* 


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनांदगांव।