Thursday, 27 March 2025

छत्तीसगढ़ी कहिनी कोईली बसंती ---------------------

  छत्तीसगढ़ी कहिनी


                       कोईली बसंती

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        मउरे आमा रूख म आमा पान तोपाय, पिंवरी-पिंवरी आमा मउरे, अमरइया म छागे हवय। बसंत रितु के आवत, कोईली के कूक ले चारो डहार खुसहाली आगे। सुघ्घर पिंवरी फूल सरसो के, सेमर,  परसा फूल लाली -अंगारी बंगबग ले चारो अंग खेत म बगरे हवय। आमा के माउर हर अमटहा महमहावत हवय।

        अमरइया के तीर खेत म संझा कुन धियान मगन बसंती हर, फागुन गीत ल गावत रिहिस। कोईली कस अब्बड़ मीठ गीत हर खेत खार म गूंजे लगिस। बसंती के गोठ अउ ओखर कंठ के आवाज हर अब्बड़ गुतुर, मीठ हवय। ओहर जइसने गोठियाथे,लागथे कोईली हर कूकत हवय, ओहर हांसथे त पारिजात  के रूख ले फूल हर झरथे तइसने लागथे। ओखर गाय गीत हर त सब्बो डहार खेत -खार, घर-कुरिया ,अंगना म गूंजत रहाय। का ददरिया, का जसगीत, का सुवा गीत?जम्मो गीत गाय म हुसियार बसंती। अमरइया मेर बइठे बेरा संझा ले अंधिरियागे। अमरित हर बसंती के  तीर आके कहिस-"अवो बसंती संझा कुन ले अब रथिया होवत हवय, ते अभिचे ले घर कुरिया नइ गे हवस। दाई हर तोला खोजत हवय।" अमरित के गोठ ल सुन के बसंती हर हड़बड़ागे। उठके सोझे घर कुरिया डहार रेंह दीस।

         बसंती लकर-लकर घर कुरिया के अंगना म हाथ गोड़ धोके रंधिनी कुरिया भीतर नींग गे। बसंती हर किहिस-"दाई मैंहर कछु बूता काम करव का?" दाई हर अब्बड़े रिसाय किहिस -" कस ओ नोनी तोला कोनो लोक लाज सरम हावय के नइ, अतना अंधियार होवत हवय अउ तैंहर अमरइया मेर नाचत, कूदत, गावत हवस।" गोठ ल सुन के बसंती हर चुपे चाप मुच- मुच ले हांस दिस। दाई ल पोचार के किहिस-" दाई ओ दाई मैंहर त घर कुरिया आवत रेहेव फेर रददा म अमरइया मेर नानकुन सुवा के नानकुन पीला हर अपन खोंदरा ले भुइंया म गिर परिस।ओला मेंहर लोरी गावत पुचकारत रेहव दाई, जम्मो संगवारी मन संग आमा रूख के खोल म राख के आये हवव। दाई मोर जीव हर सुवा बर कलपत हवय दाई। सुवा हर अपन पांख ल फड़फड़ावत रिहिस। ओखर खोल म कोनो नइ रिहिस। दाई मोला अब्बड़े सुरता आवत हवय।"  बसंती के दाई हर किहिस-"नोनी तैंहर कोनो फिकर झन कर भगवान  हर सब्बो जीव के रक्छा करथे। ओखरो करबे करहि। जा तोर बाबू अउ भाई ल जेवन बर बला ले।"

          बसंती अपन दाई-ददा अउ बड़का भाई ल जेवन करा के आखिरी म अपन बर थारी म भात दार साग हेरके खाईस अउ रंधनी घर ल झारू-बुहारू, झार-पोछ, लीपब बहार के बरतन भाड़ा ल मांज धोके रंधनी म राख दिस। अपन कुरिया म दसना बिछा के थोरकुन पढ़ई -लिखई करिस अउ सुतगे। बसंती पढ़ई लिखई म अब्बड़ हुसियार रिहिस।

           बसंती  के दाई दसमत हर रथिया इही चिन्ता-फिकर म नइ सुतय के मोर नोनी के का होही। काबर नोनी के उमर बाढ़त जात रिहिस। बिहाव बर सगा मन आवय फेर नोनी के तन के करिया रंग ल देख के कोनो जवाब नइ देवय। सब्बो ल उजर रंग के बहुरिया चाही। मन म गुने के लगिस के काली माता दाई हर तको त करिया रिहिस, ओखर गुन के कोनो पार नइ रिहिस। फेर इही संसार के लोगन मन त चमड़ी के रंग ल देखइया हवय। नोनी के गुन हर ओखर करिया रंग म लुकाय हवय। जइसन कोइला म हीरा तोपाय रहिथे। हीरा ल जौहरी हर परख लेथे। तइसने कोनो बसंती के गुन ल परखही। नोनी के उमर बाढ़त जावत हवय, त ओखर गुनों तक बाढ़त हवय।

        बसंती के ददा हर दसमत ले किहिस-"दसमत तैंहर हमर नोनी बर कोनो चिन्ता-फिकर झन कर, ओहर पढ़ई म सबले आगू हवय। मैंहर येला कॉलेज पढ़ाहुं,  मोर नोनी जतका पढ़ही ततका ओला पढा़हुं, ओखर जेन सपना हवय, तेला मैंहर पूरा करेके कोसिस ल करहुं। हमन नइ पढ़े लिखे हवन त का होगे,  हमर बर त पढ़ई-लिखई त करिया आखर भइंस बरोबर हवय।  फेर हमर नोनी हर बड़ हुसियार हवय। तेंहर ओखर बिहाव के फिकर ल छोड़ दे। ओखर भाग म जेन होही तेन ओखर बने बर होही।"  दसमत हर हीरा लाल के गोठ ल सुनिस त ओखर मन हर हरू होय लगिस।  कब सुत भुलाइस गम नई पाइस।

         कच्छा बारा म बसंती अपन इस्कूल म सबले ज्यादा नम्बर लानिस। जम्मो इस्कूल के सिक्छक अउ गांव के लोगन ओखर गुन ल सहराइन। काबर लोक गीत गाय तको म बसंती हर अपन जिला अउ राज म पहिली नम्बर म रिहिस। सरस्वती वंदना अउ सुवागत गीत ओखरे गाय बिना अधूरा  रहाय। बसंती के बने पढ़ई ले ओखर दाई-ददा अब्बड़ खुस रिहिन।

        कक्छा बारहवी  पास करके बसंती हर बी. ए. करीस अउ हिन्दी म एम. ए. पास कर डरिस। फेर बी. एड. तको पास होगे। बसंती के दु ठन सपना रिहिस। सिक्छिका बने के अउ दूसर गाइका बने के। इही सपना बर ओखर दाई-ददा  दुनो मन ओखर संग दिन। काबर समाज  हर अभीकुन नोनी मन के पढ़ई बर अतना जागरूक नइ होय हवय। जादा पढा़बे त बिहाव कोन करही। अइसना समाज के सोच हरे। फेर समाज म बदलाव आना चाही,  नोनी-बाबू एके समान के नारा ल सिरतोन करना चाही। इही गोठ ल दसमत अउ हीरालाल हर गाँठ बांध लिन अउ अपन नोनी के सपना ल पूरा करेके ठान लीन।

          आज बसंती अब्ड़े खुस हवय। ओखर पोस्टिंग अपन गाँव  के हाई इस्कूल म होइस। जिही इस्कूल म बसंती पढ़िस, तिही इस्कूल म आज सिक्छिका बनगे हवय। ओखर खुसी के कोनो ठिकाना नइ रिहिस। आकासवानी रेडियो  म ओखर गीत के कार्यकरम  आय लगिस। देवी गीत, जस गीत,  ददरिया, बिहाव गीत ,फाग के गीत के कैसेट  तको निकल गिस।  नवरातरी बेर जम्मो जगराता म बसंती  ल गीत गाय के नेवता तको मिले लगिस। अब बसंती ल कोईली बसंती के नांव ले जाने लगिन।

          आज बसंती के दुनो सपना हर पूरा होगे। आज ओहर अब्बड़े खुस हवय।ओखर गुन के सुवास हर चारो अंग बगरगे।  बसंती ले बिहाव करेबर सगा मन के बाढ़ आगे,सगा ऊपर सगा आवत रिहिन।

        सुखदेव हर बसंती के गीत अउ ओखर गुन म मोहाय, अपन दाई-ददा संग बसंती ले बिहाव के गोठ करे बर, ओखर घर आइन। बसंती के दाई-ददा मन खुस होगे। फेर बसंती हर बिहाव बर तियार नइ होइस अउ कहिस-"दाई मैंहर बिहाव नइ करव।" ओखर गोठ ल सुन के दसमत हर किहिस-"नोनी जिनगी म सबो जरूरी हवय, फेर सुखदेव अउ ओखर दाई-ददा तोर गुन म मोहाय हवय। नोनी तंय हां कहि दे।" बसंती हर किहिस-"दाई आपमन ल जेन बने लागे ओही ल करव, काबर मोला अपन ले जादा आपमन म बिस्वास हवय। मोर भलई जेमा होही ओही आपमन करहुं।"  जसमत अउ हीरालाल बड़ खुस होगे अउ सुख देव ल अपन दमाद बनाय बर तियार होगे। सगई अउ बिहाव ल एके संघरा करेके गोठ -बात ल करके सुखदेव के दाई-ददा मन बसंती ल नेग बर पइसा धरा के  सगा मन संग रेंग दिन।

         अब्बड़े धूम-धाम ले बसंती अउ सुखदेव के बिहाव होगे। सगई- बिहाव के बेर बसंती हर सुखदेव ल देख के देखते रहिगे। सुखदेव हर फकफक ले गोरा नारा, गोरस सही उज्जर, ऊंच पूर रिहिस। बसंती हर ओला देखते रहिगे।  अपन भाग ल सहराय लगिस, अपन दुल्हा ल देख के देखते रहिगे। सुखदेव हर बसंती ले किहिस-"बसंती तन के रंग हर त चार दिन के हवय, मन के उज्जर रंग त सदा रहहि। मोला तोर जइसन गुनी जीवन संगवारी चाहे रिहिस,आज मोला तंय मिल हवस। तैंहर मोर जिनगी म कोईली बसंती हवस। मोर दाई-ददा के सेवा जतन करइया, सबोबर मया करइया, तोर कोईली अस सुघ्घर गीत गवइया ल पा के मैंहर सबों कछु पागे हवव।"

         पहिली फागुन बसंती के फाग के गीत ले गूंजे लगिस। लाली- गुलाली रंग ले बसंती हर सब्बो झन ल अपन रंग म रंग डरिस।  कोईली बसंती के गीत हर जम्मो मनखे के हिदय म, रूख-राई, खेत-खार, गाँव -गवंई,सहर म गूंजे लगिस।


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                  लेखिका

      डॉ. जयभारती चन्द्राकर

           सहायक प्राध्यापक, रायपुर छत्तीसगढ़

मोबाइल न. 9424234098


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 रामनाथ साहू: *नारी सशक्तिकरण के पारम्परिक कहानी*


     विदुषी कथा लेखिका नोनी डॉ. जयाभारती चंद्राकर के कलम ले निसरे ये कहानी म,कहानी के सबो तत्व मन बढ़िया ढंग ले ,गुंथाय हें। उद्देश्य,कथोपकथन, देशकाल ,संवाद,चरित्र चित्रण सब के सब परछर दिखत हें।कथानायिका कोइली के चरित्र हर बढ़िया उभरे हे; खास करके  खोंधरा ले गिरे सुआ पिला बर वोकर संवेदना।वोकर अंतस ले उफनत ये संवेदना हर,पाठक मन ल,ये सोंचे बर विवश कर देथे कि ये नोनी कोइली हर आम नोनी लइका नई होइस।वो खास ये अउ कथा के छेवर म येहर साबित घलो होथे।सूरत अउ सीरत के द्वंद म सदाकाल सीरत हर ही जितथे, भले ही शुरू म सूरत खूबसूरती के आगु म सीरत हारत कमजोर परत लागथे,फेर छेवर म जीत तो  वोकर सीरत, वोकर शील- सुभाव,वोकर मानवीय गरिमा, वोकर नैतिकता, वोकर जीवनमूल्य मन के ही होथे।कथाकार हर कोइली ल कोई बहुत बड़े सपना नई देखाय ये,येकर ले कहानी के विश्वसनीयता हर बहुत गहराई ले पाठक मन ल प्रभावित करत हे।कथाकार हर वोला कोई पोठ बड़े सेलेब्रिटी बने के सपना देखाय रहथिस,तब कहानी हर केवल सुखद कल्पना फैंटेसी भर बन जाय रहथिस।फेर आज कतेक न कतेक बेटी बहिनी मन शिक्षक नर्स  अउ आन आन पद म जा बइठिन, वो सब हर हमर नजर के आगु हे; कोइली हर घलो ये सफल नारी शक्ति भीर के एकझन नारी ये।


        कहानी म देश काल चित्रण हर बड़ मनमोहक हे।वसन्त रीतू के सुघ्घरई के बरनन बड़ रुचिर हे।कथा शीर्षक हर ही बनेच आकर्षक हे। नारी सशक्तिकरण के सिद्धि बर ये कहानी महत्वपूर्ण हे।


*रामनाथ साहू*


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छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण; काबर, कइसे, कतका अउ काखर बर ? डॉ० पीसी लाल यादव

 छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण; काबर, कइसे, कतका अउ काखर बर ?

  डॉ० पीसी लाल यादव

  छत्तीसगढ़ी हमर माई भाखा ये । ये हमर लोक भाषा ले भाषा अउ भाषा ले राज-भाषा के आसन म बिराजमान हे। ये बात के हमला बड़ गरब हे । हर भाषा- भाषी ल अपन माई भाखा ऊपर गरब होना चाही। जेन अपन माइ भाखा के मान नई करे, सनमान नई करे ओखर मान-सम्मान नई होय ,ओखर चिन्हारी नई बनय । कोनों ल काखरो भाखा के हिनमान नई करना चाही, ना अपन भाखा के हिनमान करना चाही । भलुक येखर बढ़ोत्तरी के बुता करना चाही ।छत्तीसग‌ढ़ी भाषा के बढ़ोत्तरी बर चिंता जाहिर करत हमर पुरखा साहित्यकार स्व० हरिठाकुर जी मन लिखे हें " हमला ये बात के गरब हे कि हमर पास हमार लोक भाखा हे, लोक साहित्य हे अउ लोक संस्कृति हे। वो मन अभागा हे, जिनकर पास अपन लोक भाषा नई हे, लोक साहित्य नई हे । लेकिन अभागा तो वोहु मन हे जउन मन अपने लोक भाषा, लोक साहित्य अउ लोक संस्कृति के आदर नई करें, ओखर संरक्षण अउ संवर्धन बर संघर्ष नई करें | अगर हमर लोकभाषा, लोक साहित्य अउ लोक संस्कृति नष्ट हो जाही त छत्तीसगढ़ी के पहिचान घलो नष्ट हो जाही ।" आज घलो ये चिंता जस के तस माढ़े हे। अउ का उदिम करे जाय के छत्तीसगढ़ी सरकारी कामकाज के भाषा बने। राजकाज के भाषा बनाय बर छत्तीसगढ़ी के मानकी करण जरूरी हे। मानकीकरण काबर कइसे, कतका अउ काबर बर ? येखर ऊपर पोठ बिचार  होना चाही ।

  छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के गोठ करत काफी लम्बा समय होगे, फेर विद्वान मन के एक मत, एक राय नई हो पात हे। कोनों भी भाषा होय ओखर मानक रूप उही कहाथे जेन रूप हा सब बर सहज, सुग्घर अउ बियाकरण के कसोटी म सही रहिथे । ओहा बोलइया, पढइया, लिखइया बर सर्वग्राही और सर्वव्यापी होथे । अभी हमन देखथन के हिन्दी भाषा में अनेक मानकीकरण के उदिम के बाद भी कमी देखऊल देथे । मोला लगथे के येला  जाने-समझे बर एके ठन उदाहरण बहुत हे । संबंध, सम्बंध, सम्बन्ध, संमन्ध । जबकि हिन्दी में अब अइसन गलती नई होना चाहिए । तभो ले होथे त का करबे ? छत्तीसगढ़ी म त जइसन पावथे तइसन लिखत हें । ये संबंध म लिखइया मन के अपन-अपन तर्क हे । कतको विद्वान मन के कहना हे के हिन्दी के जम्मो स्वर अउ व्यंजन के उपयोग लेखन में करना चाही त कतको विद्वान मन के कहना हे के छतीसगढ़ी में ‘श’ और ‘ष’ दूनों के जरुरत नई हे । काबर के छत्तीसगढ़ी बोलइया ह ‘स’ के उच्चारण करथे ‘अनुशासन’ ल ‘अनुसासन’ पढ़थे । अइसन में हमर असन नवा लिखइया मन के मति चकराथे । काखर ल मानी काखर ल नई मानी । येहू बात सही आय के गाँव के रहवइया भाई-बहिनी ,मन ‘स’ के उच्चारण करथे ‘श’ अउ ‘ष’ के नही । अब एखर दूसर पक्ष ला घलो देखन । पहिली शिक्षा के प्रचार प्रसार नई रिहिस त लोगन पढ़-लिख नई पाईन । फेर अब गाँव-गाँव में स्कूल होय ले लोगन सब पढत-लिखत हें, हिंदी ला बोलचाल में बउरत हे त सहज रूप से ‘श’ , ‘ष’ अउ स के अंतर समझत हें । पढ़े – लिखे ले भाषा के घलो विकास होथे त इंखर ले का अंतर आही ? का आसा ल आशा पढ़े ले या आशा ल आसा केहे ले शब्द के अर्थ या भाव 


बदल जही ? एखर निरवार वो भाषा विद मन ही करही। अतका जरूर हे के व्यक्तिवाचक नाम जइसे ‘शंकर’ ल ‘संकर’ , शारदा ल सारदा, केशव ल केसव लिखे ले सरकारी कागजात या प्रमाण पत्र म लिखे ले अड़चन पैदा होही ।

  अइसने अड़चन ‘ण’ के प्रयोग के संबंध म होथे । ‘ण’ के प्रयोग करे ले छत्तीसगढ़ी के सुधरई खतम हो जथे । प्राण ल परान, गुण ल गुन, कारण ल कारन लिखबो तभे छत्तीसगढ़ी के रूप ला पाबो । व अऊ ‘ब'  के प्रयोग बर घलो दिक्कत पैदा होथे। कतको झन कहिथे के छत्तीसगढ़ी में व के जगहा ब के प्रयोग करव । कहूँ किताब ल किताव कहिबो त कइसे फबही । छत्तीसगढ़ी में बिनती तो बिनती ये येला कहु विनती लिखेन त फेर ये तो हिन्दीच होगे । परिवार ह परिबार लिखा जही त अनफबन लगही । विकास ह विकास रहे त भाषा के विकास होही । के हे के मतलब ये हे के जन-मन के जऊन उच्चारन हे ,उही ह लिखाय । बेसभूसा ह बेसभूसा ही लिखाय न कि वेशभूसा ।

  अइसने दुविधा हमला संयुक्ताक्षर क्ष, त्र ज्ञ बर घलो होथे । कक्षा लिखाय हे तभो कक्छा, क्षत्री ल छत्री शिक्षा ल सिक्छा पढ़थन । पढे-लिखे के बात हे, त त्रिशूल ह तिरसुल । जइसन बोलथन तइसने लिखाथे त का दुख हे । ज्ञान ह गियान अउ यज्ञ ह जग्य हो जथे तभो कोनो प्रकार के भेद नई आय । हिन्दी के अइसन अपभ्रंश शब्द ले बऊरे में खराबी नई हे । 

अब कुछ शब्द मन ऊपर घलो बिचार करी । जइसे संस्कृति ह संसकिरती, प्रकृति ह पर किरति ,प्रगति ह परगति, प्रभाव ह परभाव लिखा के छत्तीसगढ़ी के प्रभाव ल कम करथे । हिन्दी शब्द के अइसन छत्तीसगढ़ी अपभ्रंश लिख के हम छत्तीसगढ़ी के का भला कर सकबो ? येखर ऊपर हमला जरूर विचार करना चाही । हिन्दी भाषा के शब्द के कहूँ ओइसने अर्थ वाला छत्तीसगढ़ी शब्द नई ह त हमला ओ शब्द ल बउरे में संकोच नई करना चाही। छत्तीसगढ़ी में तो मराठी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी के कतको शब्द ल आजो जस के तस बउरत हन । इनाम, किस्सा, टेबल ,ऐना डाक्टर, दरोगा, मोटर, कार हमर ले अलग कहाँ हे ? अभी अंग्रेजी के चलन बाढ़गे हे । मोबाइ‌ल आय हे तब ले अंग्रेजी के शब्द मन डोकरी-डोकरा के मुंह म खेलत हे । एक दिन बैंक ले निकलत डोकरी ल पूछ परेंव कइसे पइसा मिलगे दाई ? दाई कइथे – “ सरवर डाऊन हे कहिथे बेटा । जेन हिन्दी नई बोलय, पढ़े-लिखे नई हे तेनो हा अंग्रेजी के शब्द ल बउरत हे। काबर के ओ प्रचलन मे हे । जेन हा सब ला अपन म समो लेथे उही ह मया ले सबके अंतस ल पलो लेथे । जेन भाषा ह उदार होथे, तेने भाषा ह गुदार होथे । ये उदारता के गुन छतीसगढ़ी म हे।

  अब आधा ‘र’ के गोठ ला घलो गोठियालन । जइसे धर्म, कर्म, मर्म गर्म, गर्भ, कर्ण अइसन शब्द के उच्चारन में छत्तीसगढ़ी बोलइया ल थोरकुन जियाने कस लगथे | तब आधा ‘र’ ह पूरा ‘र’ के उच्चरण मा सुख देथे | नई पतियाव त बोल के देखव – धर्म – धरम,  कर्म – करम , मर्म – मरम , गर्म - गरम , कर्ण – करन | अइसन सुख देवइया अउ भाषा के 



सुघरई बढ़इया अपभ्रंश ला बऊरे म फायदा ही फायदा हे | भाव अउ अरथ जस के तस | न कोनो नफा न कोनो नुकसान । 

  जब छत्तीसगढ़ राज्य बनिस त नवाँ उमेंद जागिस । छतीसग‌ढ़ी साहित्य सिरजन बर जइसे लिखइया मन एक मन के आगर उम्हियइन, फेर भाषा के मानकीकरण या मानक रूप नई होय के सेती लिखई ह जतर-कतर जनाथे । लेखन में एक रूपता देखऊल नई दय । ए स्थिति ह अभो हे। मैं ल कोनो मंय, त को में लिखथे । अइसने तैं ल कोनो तंय तें, तू लिखथे । जइसे हिंदी में मैं मै लिखाथे ओइसने छत्तीसगढ़ी म घलो ओखर रुप मानक होना चाही। ओइसने क्रिया म घलो कोनो जाथौं, कोनो जावत हंव, कोनो जाथंव, कोनो जाथों लिखथें | त एक रूपता कहाँ होइस ? ये हा तो उदाहरण भर आय । कोनो ओकर लिखथे त कोनो ओखर । आकाश शब्द ह छत्तीसगढी अकास अउ अगास दूनों लिखाथे काबर ? अइसने में मानकीकरण बर रद्दा देखइया अगास दिया  कोन बनही ? अउ, अऊ आउ में कोन बने हे

कोस-कोस म पानी बदले, चार कोस म बानी। ये तो जगजाहिर बात ये। गाँव के गाँव म घलो बोल चाल अउ भाषा म बदलाव देखऊल देथे। हमर गंडई क्षेत्र में मरार जाति होथे, ओमन हमरे कस छत्तीसगढ़ी बोलथें | फेर ‘छाता’ ल साता कइथें । 'छ' के ठऊर म ‘स'  उच्चारण करथे । चौरा ल माटी म साबत रेहेंव । अइसन भिन्नता बर घलो बिचार करे ल परही तब भाषा के मानक रूप तियार होही | फेर जुन्ना पीढ़ी मन छाता ल छाता बोल पाही विसवास नई होय । प‌ढ़े-लिखे लइका मन सुधार पाही त भाग लगे । लोक भाषा म ‘य’ ह ज हो जथे । यशोदा-जसोदा,  यश-जस | अइसने ‘र’ ह ल, ‘ल’ ह र हो जथे । छत्तीसगढ़ी के तरुवा ह अइसने मा तलुवा हो जथे । त कहाँ मुड़ी अउ कहाँ गोड़ ?,अर्थ के अनर्थ हो जथे ।

छत्तीसगढ़ी के कतकोन शब्द हे तेन संस्कृत शब्द मन के बहुत तीर हे । ओखर तत्भव रूप ये । मूषक-मुसवा, मातृ-महतारी ,घृणा-घिन, अमृत-अमरीत, पुण्य-पुन, यज्ञ – जग्य , आकाश-अगास, ऋण-रिन, शर्म-सरम, भाषा-भाखा । ये तो हमर बर गरब के बात ये । कालीच के बात ये पारा के बिहतरा घर में परोसी ह कइथे के चुनाव के सेती ये साल सगा-सोदर कम अइन गुरु जी । मोर धियान सगा-सोदर शब्द ऊपर गिस ।  सगा तो समझ अइस सोदर बर सोंचे ल परगे । गजब बेर म समझ अइस सोदर ह संस्कृत के सहोदर ये । जेन छतीसगढ़ी में सोदर बनगे। अइसन विशेषता हे छत्तीसगढ़ी म। ये तो बने बात ये । 

अब येहू बात ऊपर विचार करन के छतीसगढ़ी के मानकीकरण काखर बर ? छत्तीसगढ़ में लगभग 2 करोड अबादी ह छत्तीसगढ़ी बोलत होही । अनपढ़ होय के पढे-लिखे । क्षेत्र के हिसाब से भिन्नता हे। इही भिन्नता म एकरूपता लाना ही मानकीकरण ये । येहू बात सही ये के मानकीकरण भाषा के उच्चारण ले जादा लेखन बर जरूरी होथे। कोनों समाज, क्षेत्र या मनखे के  उच्चारण या बोली के ढंग ल नई बदले जा सकय, त ऊँखर बर मानकीकरण के कोनो मतलब नई होय । उन तो जइसे बोलत हें, ओइसने च बोलहीं। मानकीकरण जरुरी हे शासन, प्रशासन के सरकारी काम काज बर । मानकीकरण जरुरी हे साहित्य लेखन बर ताकि छत्तीसगढ़ी के लेखन, 



वर्तनी, शब्द प्रयोग, वाक्य प्रयोग सब म एक रूपता रहे । जेखर ले हमर छत्तीसगढ़ी प्रमाणिक समर्थ, सक्षम अउ सार्थक स्वरूप म आय । यहू बात सिरतोन आय के कोनो भी भाषा होय लिखे भर ल पोठ, नई होय । भाषा ल जादा से जादा बऊरे म पोठ होथे। जेन भाषा ला जतके जादा लोगन बऊरही, ओमा बोलही गोठियाही ओहा ओतके पोठ होही । जेन जतके पोठ होही तेखर ततके गोठ होही । 


एक बात तो पक्का हे के कोनों भी भाषा होय, ओखर मानकीकरण के बुता ह एक दिन, एक महिना या एक बछर म नई होय । मानकीकरण के बुता सरलग चलत रहिथे, चलत रहिथे, तब ठिहा मिलथे । जब ले छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बने हे, तब ले आयोग डहर ले ये दिशा म काम जारी हे । छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य के बढ़ोतरी बर लगातार आयोजन के संगे-संग प्रशिक्षण अउ किताब मन के प्रकाशन होत ये। येहा हमर बर सहंराय के लइक बात ये। प्रशासनिक शब्द कोष, हिन्दी से छत्तीसगढ़ी, अंग्रेजी से छत्तीसगढ़ी भाग । अउ 2, लोक व्यवहार और कार्यालयीन छत्तीसगढ़ी मानकीकरण के दिशा में एखर पहिली भी हमर छत्तीसगढ़ी भाषा विद अउ सियान विद्वान मन के कारज हमर मार्ग दर्शन करत हे ।  जेमा प्रमुख डॉ.रमेश चंद्र मेहरोत्रा, नंद किशोर तिवारी जी, डॉ.चितरंजन कर जी, पालेश्वर प्रसाद शर्मा जी,डॉ.विनय पाठक जी, डॉ.सुधीर शर्मा जी । छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व सचिव डॉ.सुरेन्द्र दुबे जी ह अपन कार्यकाल म छत्तीसगढ़ी भाषा के बढोतरी बर ओला आंठवीं अनुसूची म शामिल करे बर खूब महिनत करिन। छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण बर अभी घलो बहुत झन साहित्यकार मन बड उदिम करत हे । ओमा डॉ. विनाद वर्मा जी के नांव उल्लेखनीय हे । छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण के तीसरा संस्करण के संग संग इंखर "छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण मार्गदर्शिका” अउ “विमर्श के निकष पर छत्तीसग‌ढ़ी" पठनीय किताब हे । डॉ.गीतेश अमरोहित के संगे-संग ये दिशा म अउ कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी भाषा अउ सहित्य के बढ़ोत्तरी बर नवा-नवा सिरजन करत हें । ओ सबो साहित्यकार मन ल मोर पैलगी जोहार । अउ आखिर म-

अंधियार हे त का होगे ? तैंहा डर्रा झन,

,दिया ल बार, अंधियार के नाँव बुता जही।

अंधियार ह घपटेच रहि असन नई होय ग , 

सुरुज उही तहाँ ले बिहनिया तो होई जही ।।

 सुरुज के अगोरा म.....

     जय छत्तीसगढ़ी, जय छत्तीसगढ़, जय छत्तीसगढ़िया 

डॉ.पीसी लाल यादव

मो० 9424113122

💐💐💐💐💐💐💐💐💐

बने चिंतन हे। मानकीकरण वो भाषा के होथे, जउन उच्चारण म सरल,सीधा अउ सहज होथे। कोनो घुमावदार शब्द नई होना चाहि। राजधानी के तीर तखार म जउन भाखा बोले जाथे उहि ल राजभाषा के दर्जा मिलथे। छत्तीसगढ़ी के जतका उप बोली हाबय,ओमा रायपुर के चारो मुड़ा के भाखा ह मानक भाखा बनही।

बिलासपुर, सरगुजा,बस्तर कोती के  छत्तीसगढ़ी मानक नई बन सकय।ये बोली  मन लेखन बर  तो हो सकथे, फेर  राजकाज बर ,सरल,,सहज नई हो सकय। साहित्य रचना हो सकथे, फेर राजकाज बर  रायपुर के छत्तीसगढ़ी ह मानक बनही। जउन  राजकाज बर मानक होहि, उहि रूप ह,प्राथमिक शिक्षा बर मान्य होहि।

 पी,सी,लाल भाई ह चिंतन करके समस्या ल  बतइस कि,

 एक शब्द के कई रूप हाबय ,तेला तय करेबर पड़ही, कि कोन रूप ल मानक बनाना हे? इही बात म मतभेद हाबय,जेखर ऊपर व्याकरण वाले मन एक मत होके विचार नई करत हें। 24 साल बीत गे, हम जिहां खड़े हैं ,उंहा ले एक कदम आगू नई बढ़े हन-बड़ दुख के बात हे।देवनागरी के 52 अक्षर ल तो लेना ही हे। हम अवधी के समीप हन ,पर कुछ तो अलग होबे करहि। गणेश ल गनेस नई बोलन।  छत्तीसगढ़ी ल परिष्कृत करके मानक बनाबो।छरिया के शब्द मन ल नई लिखव।  काबर कि अब सब पढ़े लिखे हन, उच्चारण सही होथे। पहिली शिक्षा के अभाव के कारण उच्चारण नई कर पावत रहिंन।अब स्थिति बदल गेय हे, तब ठेठ छत्तीसगढ़ी के रूप ल परिष्कृत करेबर लागहि।  

 मानक बनाय बर बहुत सोच समझ के  काम करे ले लागहि।

 हमन ये बात ल हल्का म लेबो कि  "लिखत लिखत एक दिन मानक रूप बन जाहि"--ये गलत सोच हे।हमला बईठ के निर्णय करे ले लागहि।अपन आप मानक नई बनय कोनो भाखा ह। हमन अपन अपन क्षेत्रीय अहंकार ल  दबा के राजभाषा बर सोचना।🙏

---डॉ, सत्यभामा आडिल

सुरता 💐💐मोर मयारुक दादी💐💐

 सुरता


💐💐मोर मयारुक दादी💐💐


बहुत  पहली के बात हरे जब मैं डिग्री  गर्ल्स कालेज में बी ए प्रीवियस के विद्यार्थी रेहेव । तब विद्यार्थी मन ल  एन. सी. सी. या एन. एस. एस. में से कोई एक ल चुनना जरुरी  रहय , तब मैं एन. एस. एस. ले रेहेव ।तब हमर पाण्डेय मेडम एन. एस. एस. के प्रभारी शिक्षिका रिहिस। ओकरे  डहर ले कैम्प मा जाये बर मोला चुनेगे रिहिस अउ ओकरे ले पता चलिस कि ए दारी एन. एस. एस. के  समूह ल दामाखेड़ा गांव जाये बर परही अउ उहां जाके  सामाजिक कार्य करे ल परही। गांव म जाके श्रम दान करे ल परही।तब दिसम्बर  के महीने मा हमन  बस मा चढ़ के  मंझनिया  बेरा 3 बजे दामाखेड़ा गांव पहुंच गेन। उहां जाके चार पांच दिन में सब्जी बेचईया मन बर चंवरा के बनाए के उदिम करेन। बड़े बिहनिया 9 बजे ले 1 बजे तक श्रम दान करन  तेकर पाछू आके बने सपेट के दार भात खावन ।ओही  गांव मा कबीर के बहुत अकन अनुयायी रहिन , जउन ब्रह्मचर्य व्रत के  पालन करय अऊ संन्यासी के  जइसे उहां जीवन यापन करय । महिला अउ पुरुष दूनों उहां रहत रहिन। उहां के दार भात रोटी सब्जी गजब स्वादिष्ट और आरुग  रहय ।उहां भोजन के बेरा होवय तहां  भोजन के समय रसोईया मन   गोहार लगावय भोजन पावव संतमन। अइसना उन्कर गोहार मौला गजब नीक लागय । अभी भी मेहा जब कभू भी  भोजन करे बर  बुलाथंव  त मोर मुंह ले एही बात  निकलथे । आवव भोजन पावव संत। उहां कोनो गृंघ मुनि रहिन जउन ओ आश्रम के संचालक रहिन। 1:00 बजे ले लेके 2:00 बजे तक भोजन  करे  के रहय ओकर पाछू  बौद्धिक परिचर्चा के  कार्यक्रम के बेरा हो  जावय कोनो एक बिषय मा भाषण अउ वाद-विवाद  के बिषय मिलय जेमा अपन अपन बिचार ल बोलेल परय  जेमा एकले बढ़के

एक बोलइया नोनी मन  अपन बिचार ल ब्यक्त करय। एक दिन हमन ल वाद - विवाद बर  विषय मिले रहय कि, बर बिहाव अपन जात मा  करना चाही । मैं विषय के पक्ष में अपन सुघ्घर बिचार बतायेव त आने आने बिद्यार्थी मन बिषय के  बिपक्ष मा घलो सुघ्घर बिचार बात रखिन।भजन अउ सुघ्घर सुघ्घर गीत घलो गावन।

उंहा बौद्धिक परिचर्चा ल सुनेबर गांव के बिदुषी गुणी महिला मन  आवय  अउ हमर परिचर्चा भाषण जम्मों ल सुनके गजब खुश होवय । ओही गांव मा एक सियनहिन वृद्ध महिला रहय जउन  कि गजब विदुषी रहय ।जउन वाद - विवाद ल सुनके बहुत आनंद लेवय । वोहर  गांव के सरपंच घलो  रहिस ।अउ ओला हमन मिश्रा दादी कहन । दिखे मा गजब सुंदर, फक गोरी  , लम्बी ,गजब सुंदर आकर्षक नाक - नक्शा वाली बहुत सुंदर महिला रिहिस ,वोकर पूरा व्यक्तित्व बहुत आकर्षक रिहिस अऊ वोहर  बहुत सुघ्घर मनमोहक हारमोनियम बजावत रिहिस। वोहर अकेल्ला घर म रहय । ओकर  कोनो बाल बच्चा लोग लइका नी रिहिस ।  वोहर गांव  के सरपंच रिहिस अउ समाज सेविका के जम्मो गुण ओकर अंदर रिहिस।फिल्म में दादी ल जइसना सुघ्घर दिखाथें  वइसने  दिखय । वो विदुषी महिला मोर भाषण अउ वाद-विवाद ल सुनके  बहुत प्रभावित होइय अउ मोर ले गजब मया करे  लागिस। अइसने वोहर चार-पांच दिन तक हमर बौद्धिक परिचर्चा कार्यक्रम मा आवय हमर गोठ बात ल धियान देके सुनय अउ मोला ओकर बहुत मया  मिले लागिस । अउ बहुत अकन नोनीमन जउन एन एस एस कैंप में आये  रहिन ते मन ला ये बात एक्को बने नी लागत रिहिस  , त वो मन  मोला  डेरावा दीन कि वो महिला तोला  जादू  टोना कर देही। तै वोकर ले  ज्यादा मत मिले जुलेकर दुरिहा रेहे कर अइसे बोलके वोकर से मिलेजुले से रोकय । जब भी वो दादी आवए त एही पूछय की संध्या कहां हे तब मोर  वो  संगवारी मन संध्या तो दूसर काम बर गे हावय अइसे बोल के मोला  कहूं लुका  देवय । तब वो दिन में  मैं कतेक बुद्धू  रेहेव कि वो  दादी के मया ल समझ नी पायेव । हमन तब दामाखेड़ा गांव में 10 दिन रेहेन 10 दिन के बाद हमार एन एस एस के  शिविर खतम होवइया रहिस अउ हम मन अब वापिस रायपुर लहुटइया रेहेन । तब वाकई  म वो दादी ल मोर ले बहुतेच मया होगे रिहिस। अउ वोहर पता कर लिस कि हमन  कब लहुटबो । हमर मन के  लहुटे के तियारी चलतेच रहीस तभेच वो दादी आइस और गजब प्यार ले  मोला अपन हृरदे ले लगा लिस , अउ आंसु भरे आंखी ले  मोला देखिस अउ  शिकायत धलो करिस, कि मैं तोरले मिलेबर कई बार आयेव फेर

 तोला नी पायेव । तोर सुभाव गजब सुघ्घर हावय, तोर महतारी बापमन सुघ्घर  संस्कार देहे हावय  ,अउ तै गजब सुघ्घर गीत  गाथस । तोर कंठ गजब मीठ हावय कोयली बरोबर मीठ गाथस अउ सरसती दाई के घलो किरपा हावय गजब सुघ्घर बोलथस।10 दिन ले मिलत मिलत तोर ले गजब मया होगे हावय। जम्मों नोनी मन ले  दुरिहाय ल परही  ये सोच के  बने नी लागत हे ।मोर मन बहुत दुखी हावय, अइसे बोलके मोर तीर आइस अउ किहिस तोर ले मोला गजब मया होगे रिहिस वोकर अंतस के मया हर आंसु बन आंखी ले ढरे लगिस ।अउ केहे लागिस फेर कभू अपन माता- पिता के संग कभू भी आबे। अउ जब आबे त जरूर मोरसे मिलेबर  आबे अइसे कहत कहत  मयारुक  दादी हर एक ठन कलम मोर हाथ मा  थमादिस अउ रद्दा मा खाये बर बहुत अकन फूटे चना दिस, अउ अपन आंसु बोहात रोवत धोवत मोला  विदा करीस। तब मोला अपन गलती के पता चलिस  कि वो दादी मोर उपर कोनो टोना जादू करेबर नी आवत रिहिस भलुक मोला बिकट  मया करय अपन  पोती समझ के मया करे बर मोर तीर आवय ।

आज घलो मोला मयारुक दादी के मुस्कियात चेहरा मोला दिखथे। अउ अब अपन मूर्खता उपर मोला तरस आथे बढ गुस्सा आथे , कि मैं ओकर मया ल नी समझ पायेव।अपन झोली मा नी धर पायेव। मैं भगवान ले विनती करत हव वोहा जिहां भी होही सुखी रहय खुश रहय। ओकर चरण मा मोर बारम्बार वंदन हे  नमन हे।🙏🙏🙏🌷🌷🙏🙏🌹🌹🙏🙏💐💐🙏🙏🙏

डॉ संध्या रानी शुक्ला

बेलुज्जर होवत लइकामन*

 कहानी 


–डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*


*बेलुज्जर होवत लइकामन*


    एक हाथ मा बड़े जनी लउठी अउ दूसर हाथ मा अपन छोटे टूरा के चूंदी ला धर के खींचत घर के मुहाटी ले बहिरी मा धकेल के खोरबाहरा– “जब देखव तब अपन ले बड़े मन ला मुफट जवाब देबर सीखे हस। ददा–दाई के चिन्हारी नइ हे। का बोलथस तेकर हउस नइ हे, तोर मुँह मा थया नइ हे। चल निकल ये घर ले। बहुत होगे तोर रोज-रोज के तमाशा।” काहत भसरंग ले मुहाटी के कपाट ला लगाके भीतरी कोती आ जथे।


“रोज-रोज बड़े फजर ले राम-राम के बेर कुकुर कटायन,......। ये टूरा के मारे जीना मुस्कुल होगे हे। बाप-महतारी के कमई ल खावत हे तेकर सेती गोल्लर कस भुकरत किंजरत हे भड़ुवा हा। कहाँ ले मोर कोख ले राक्षस पैदा होय हे कोन जनी?”  रंधनीखोली ले रमशिला बड़बड़ावत हे।


येती मुहाटी के संकरी ला बाजत सुनके अपन टूरा ला होही काहिके खोरबाहरा आज तोला घर मा आवन नइ देंव कहिके चिल्लाथे त मैं सावित्री हरों गा सावित्री खोल बेंस ला कहिके सावित्री चिल्लाथे। रमशिला सावित्री ला पीढ़हा ला देवत कहिथे – “बइठ न दीदी। हमन तो न मरत हन न मोटावत हन हमर छोटे टूरा के मारे।”


हव बहिनी रमशिला महूँ देखत हँव तोर छोटे टूरा गोपाल तो लाहोच लेवत हे। दूसर मन के संगति मा कइसन घर के लइका ये अउ कइसन होवत हे। हमर समे मा लइका मन लाहत बिहत राहें अब के मन तो ……..।


मंडल के टूरा रईस के लइका आय जेनला काम-बूता के कोनो चिंता फिकर नइ रहय। वोकर घर नौकर-चाकर हें काम करइया त वो निठल्ला शेखी मारत घुमत रहिथे। अउ हमर घर के लइका वोकर पीछू-पीछू लगवारी करत  रात-दिन घुमत रहिथे दीदी। हमन तो किसनहा आदमी अपन खेती किसानी करबोन तभे तो पेट ला भरबो। फेर हमर लइका ला तो का कहिबे हाय राजा! हाय राजा! काहत दुम हलावत मंडल के टूरा संग लफुट्टी मारत रहिथे। संग मा नाऊ के टूरा, कोतवाल के टूरा अउ गाँव के कतको लइका मन बिगड़त हवैं सावित्री दीदी कइसे करबों तइसे लगथे? रमशिला सावित्री तीर अपन दुख ला गोठियावत हे।


परछी के मुड़की मा ओध के मुड़ी धर के बइठे खोरबाहरा ला सावित्री कहिथे– “ये खोरबाहरा बाबू तैं मुड़ी धर के बइठे झन रहा। तैं नाऊ अउ कोतवाल ला धर के अली मंडल घर जा अउ वोला बता वोकर लइका के सेती दूसरा के लइका मन कइसे बिगड़त तेला।”


खोरबाहरा– “का कहिबे सावित्री भउजी…. दू बेर तो मैं कही डरेंव हँव फेर बड़े मन के बड़े बात। वो खुदे अपन हाथ मा अपन बेटा ल बिगाड़त हे। अउ हमर लइका मन बर काल बनत हे।”


अब तोला का बतावँव अभी तीन महीना पहिली वोकर टूरा संग नाऊ के लइका शक्ति, कोतवाल के लइका भंडारी अउ हमर लइका गोपाल संग मा दूसर गाँव के लइका मन गाँव के आमा बगइचा मा बइठ के दारू मंद पियत रहिन अउ तास सट्टा खेलत रहिन। गाँव डहर ले पुलिस डग्गा आइस अउ वोमन ला पकड़ के लेगे। दू चार झिन एती-ओती भाग गिन।


अली मंडल कर खबर पहुँचिस ता थाना पहुँच के हवलदार ला कहिस – “मैं गाँव के इज्जतदार आदमी हरँव हवलदार साहब मोर लइका ला ये टूरा मन अपन संग मा लेगे रहिन एकर कोनो गलती नइ हे।” 

हवलदार ला पइसा-पानी देके छुड़ा लिस।

सबो दोष हमर लइका मन ऊपर आगे अउ मंडल के टूरा राजा छूट गे। सब झन अपन-अपन लइका ला रीस के मारे नइ छोड़ावन कहिके हफ्ता भर जेल मा रखेन फेर  पइसा-कौड़ी देके छोड़ायेन। घर मा अइन ता का समझायेन गलत संगति ला छोड़ दव रे लइका कहिके फेर काला मानही ये मन ला तो नशा सट्टा के चस्का लग गे हे। 

अतका मा टूरा भंडारी कहै – “तुँहर तो औलाद हरन छोड़ाहू नइ त का करहू।” 

येला सुनके वोकर ददा कोतवाल हा खींच के दूनों गाल ला मारिस झाफड़।

हमर टूरा गोपाल कहिस – “काश ! हमरो ददा राजा के ददा अली मंडल कस होतिस। कोनो रोक-टोक नइ रहितिस हमन अपन मन के मालिक रहितेन अउ फरफट्टी मा घुमतेंन।”

खोरबाहरा कहिथे– “मनगभरी तो हो गे हो रे। उच्च्छंद तो घुमत हो रे तभे तो सकल करम करके थाना कछेरी मा घूमवावत हो।तुमन ला दाई-ददा के मान मर्यादा अपन भविष्य की संसो कहाँ हे ?” 

लइका मन के अइसन बेवहार  ला देख आज दाई-ददा मन दुख के आँसू रोवत हन भउजी। 


एकर पाछू महीना भर पहिली गाँव के सड़क तीर बर पेड़ के खाल्हे मा बइठ के चारों झन फोन मा बेढंगा गाना सुनत फकर-फकर सिगरेट पियत धुँआ उड़ावत रहिन। अउ मँझनी मँझनिया दूसर गाँव के अवैया पढ़इया नोनी मन ला हाथ धर के छेड़त रहिन। में अपन खेत कोती ले आवत इंकर करनी ला देख परेंव। 


भंडारी एक झन नोनी ले काहत रहिस – “तैं हमर राजा के रानी बनबे का?” 

वो नोनी दू थपड़ा मारिस ललियागे टूरा के गाल।

टूरा राजा काहत रहिस – “ बने तो काहत हे आ ना तोला मोर फरफट्टी मा घुमाहूँ।”

दूसरा नोनी कहिस – “येला का घुमाबे रोगहा तोर बहिनी ला घूमा ना।”

टूरा शक्ति काहत रहिस– “टूरी तुमन नइ जानो का हमन कोन हरन तेला?”

फेर आज ये टूरा मन मोर पकड़ मा आगे। गोपाल अउ शक्ति भाग गिन फेर टूरा राजा मोर सपेटा मा आगे वोला बरजेंव – “बड़े घर के मंडल के लइका हरँव कहिथस रे। मंडल घर के लइका हरस त अपन ददा के धन दोगानी ला अइसने सिगरेट के धुँआ मा उड़ाबे का रे। अउ तोर घर मा तोर दाई बहिनी नइ हे का रे, दूसर के बेटी माई ला अइसने समझत हस। आज चलना घर तोर ददा के आगू मा तोला सोटीयाहूँ।”

    अतका ला सुन के टूरा राजा मोला लाल आँखी देखावत हाथ ला झटकारत कहिस– “मैं मंडल के बेटा हरँव अली मंडल के। तैं मोर कुछु नइ बिगाड़ सकस चल हट।”

मोरो एड़ी के रीस तरवा मा चढ़गे टूरा के चेथी ला देंव ता टूरा एकर अंजाम अच्छा नइ होय काहत अपन फरफट्टी मा चढ़के फुर्र होगे।

घर मा पहुँचेंव ता टूरा गोपाल ला बरजत दुलारत कहेंव – “तैं मोर सबर के जादा परीक्षा झन ले बेटा तैं सुधर जा अपन जिनगी ला सँवार ले। घर के काम बूता मा धियान दे। राजा जइसन संगी साथी ला छोड़ दे नइ ते तोर ये घर ले निकाला हो जही।” 

अतकेच मा गोपाल बगियाके कहिस – “तोर पइसा ला उड़ावत हँव का? तोला अतेक पीरा काबर होवत हे। तैं तो मोला एक ठन फोन अउ पिक्चर देखे बर पैसा नइ दे सकस त काबर बोलत हावस?”


गोपाल के अइसन बात ला सुनके मैं वोकर चेथी कोती ला मारेंव। अउ अपन लइका ला अइसन संस्कार तो नइ दे हों भगवान फेर का हाेवत हे कहिके अपन तरवा ला धर के रोय लागेंव। वोकर महतारी रमशिला घलो वोला समझाइस त दू दिन बने रहिस फेर राजा के रंग मा रंग गे।

अपन लइका ला एक झन हरे कहिके जादा मुड़ी मा झन चढ़ा गा नइ ते तोर धन दोगानी ला अपन अय्यासी मा उड़ा दिही। तोर लइका राजा का करत तेला तो तैं जानतेच होबे। तोर लइका के संगति मा हमर लइका मन हमर हाथ ले निकलत हावँय। चिटिक ये बात ला गुनव मंडल जादा के छूट मा लइका मन बेलुज्जर उच्च्छंद हो जथें। कोतवाल अउ नाऊ अली मंडल ला वोकार घर जाके समझा डरिन तभो ले वोकर कान मा जुँआ नइ रेंगिस।

अउ उल्टा वोमन ला कहि दिस– “तुमन मोला सलाह देवत हव तुंँहर सलाह के मोला कोनो जरूरत नइ हे। मोर लइका कुछु करे तुमन ला का करना हे, चलो जाव तुमन।”

कोतवाल अउ नाऊ के बात ला सुन के मंडलिन घलो मंडल ला कहिस – “ये मन हमर अउ हमर लइका के भलई बर काहत हें, तुमन राजा ला थोरिक बरजो जी। हमर नौकर बनिहार मन घलो काना-फूसी करत रहिन राजा के चाल चलन ला लेके।”


खोरबाहरा अपन पड़ोसिन सावित्री ला मंडल के लइका के चालबानी ला बतावत कहिथे – “अभी चारेच दिन पहिली के बात हरे भऊजी वो टूरा राजा अपन मोबाइल मा गेम खेल के 1 लाख पइसा ला हार गे हे। वो पइसा के भरपाई बर गोपाल, शक्ति अउ भंडारी ले पइसा के माँग करिस। त ये तीनों परबुधिया मन राजा हमर संगवारी हरे कहिके वोकर बर मंगलू के दुकान मा चोरी करत पकड़ा गिन। पुलिस केश होगे फेर थानादार के हाथ-पाँव जोड़के 7000–7000 हजार पइसा भरके सब ला फेर छोड़ाय हन। मान सम्मान के संग धन ला घलो खोवत हन।”

रमशिला सावित्री ला कहिथे – “देखना दीदी हमन जेन लइका बर खेती किसानी ला कनिहा के टूटत ले कमावत हन वो हा हमर समाज मा नखमरजी करत हे। हमर मिहनत के कमई हा एकर पुलिस थाना ले छोड़ाइच मा सिरावत हे। 12 वी के बाद एकर पढ़ई लिखई का छूटिस संगति मा चोरी चमारी करे ला धर लिस। बर बिहाव के लइक होगे हे तभो ले अपन काम-बुता, दाई-ददा के कोनो चिंता नइ हे। दिन भर मनमानी करत घूमत हे रातबिकाल के आय के कोनो बेरा नइ हे।”

तोला का बताँव भउजी आज तो बिहनिया टूरा शक्ति हा भांड़ी कोती ले झाँकत तोला राजा बलाय हे काहत गोपाल ला गांजा के थैली ला फेंक के दिस सबो छरिया के गिर गे। गे में देख परेंव मोर तो हाथ-गोड़ काँप गे। टूरा शक्ति मोला देख के भाग गे। अउ टूरा गोपाल ला कहेंव तो मोला "पइसा का होथे तेला तैं का जानबे ददा पइसा बर तो में कुछ भी कर सकत हों ये गांजा का हरे? तुमन ला तो जिनगी जियेच ला नइ आवै।" टूरा के गोठ ला सुने के एक लउठी वोकर गोड़ ला रट ले मारेंव अउ हदास खाके जा मंडल घर राजा संग रहिबे उही मन तोर भार ला उठाही कहिके घर ले निकाल के येदे अपन किस्मत ला कोसत बइठे हों भउजी। साले टूरा मन ला चोरी-छिनारी, गांजा-भांग, दारू-मंद के नशा होगे हे। उच्च्छंद होके मनमानी करत हें, दूसर के बेटी बहिनी ला छेड़े ला धर ले हें।

सावित्री– “का करबे बाबू अब के लइका मन कोन दिशा मा जावत हें। का होही इँकर……?”


गोपाल ला वोकर ददा घर ले निकाल देथे ता भंडारी अउ शक्ति ला धर के राजा तीर जाथे। अली मंडल ओमन ला देख के “आओ रे आओ तुँहरे कमी रहिस।” कहिके दमकाथे। 

गोपाल अली मंडल ला कहिथे – “राजा कहाँ हे मंडल वोकर ले काम हे ता मिलना हे।”

अली मंडल – का काम हे रे तुमन ला?  ओ राजा हरे राजा मंडल के लइका, अभी सो के नइ उठे हे। 10 बजे उठही।”

उँकर बात ला सुन के राजा उठ जथे। बिहनिया ले गोपाल, भंडारी अउ शक्ति ला देख के अकचकागे। 

राजा ला देख के अली मंडल कहिथे – “ले जाओ वो दे तुँहर राजा आगे।”

गोपाल राजा संग परछी तीर जाके अपन ददा के सबो बात ला बताथे। राजा ला गोपाल के बात के कोनो फरक नइ पड़े उल्टा फिलिम देखे के उदिम जोख लेथे।

राजा के महतारी उँकर बात ला सुन डरथे ओला राजा के बिगड़े अउ वोकर उच्च्छंद होके घुमई ला देख के फिकर करथे।

 

मंडलिन राजा ला बरज के कहिथे – “राजा अब तोला कहींचो नइ जाना हे बहुत होगे तोर।” 


राजा – “चुप न वो दाई बात-बात मा टोकत रहिथस।”

मंडलिन राजा ला कहिथे – “राजा मैं तोर महतारी हरों। तोला कइसे गोठियाना हे लिहाज नइ हे का?”


राजा छोड़ न यार इँकर तो अइसनेच हरे कहिके 

12:00 बजे खा पी के अपन ददा के कार मा फिलिम देखे बर सहर चल देथे। अपन ददा ला पूछे बिना। फिलिम देख के लहुटत खानी सँझा बेरा सब झन ढाबा मा बइठ के शराब पीके नशा मा गाड़ी मा चढ़थे।


शक्ति अउ भंडारी कहिथे – “आज के दिन बहुतेच बढ़िया राजा मजा आगे भाई फिलिम के फिलिम अउ चखना संग मा ये दा……….।”

फेर गोपाल अपन ददा के बात ला सुरता करत संसो मा पड़गे रहिथे।

अब राजा कार मा चढ़ के “हमर बाप के सड़क हरे बे। कोन का करही?” कहिके 100 के स्पीड मा कार ला चलाथे।

गोपाल कहिथे – “देख भाई राजा देख के चला कोनो एक्सीडेंट झन हो जाय। कुछु होथे ता तो तोला तोर दादा  बचा लेथे फेर हमन ला कोन बचाही?” 

अतकेच मा बीच सड़क मा एक ठन गाँव के आखिरी छोर मा मोटरसाइकिल वाले सियान सन झपा के एक्सीडेंट हो जथे। मोटरसाइकिल वाले ला बनेचपन लग जथे वो मूर्छा हो जथे वोला छोड़ के येमन डर के मारे उदत तपत घर आ जथें। मंडल अपन कार के क्षति गति ला देख के समझ जथे फेर राजा ला कुछु नइ बोले। शक्ति अउ भंडारी मंडल ला तिरछा-तिरछा देखत अपन घर कोती निकल जथे।

घर मा पहुँच के भंडारी कोतवाल के गारी खाथे अपन ददा संग मुँहजोरी करत सो जाथे। गोपाल जाके अपन परसार मा सो जथे। संग मा शक्ति घलो।

एक्सीडेंट मंडल के तीर वाले के गाँव मा होय रहिस ता येती मंडल मंडलिन ला उँकर चिन पहिचान वाले मन राजा ले होय एक्सीडेंट के बात ला बता डरे रहिन अउ मोटर साइकिल वाले ला अस्पताल मा भरती करा डरिन। सियनहा के इलाज मा अवैया खर्चा के भरताना ला भरे बर वोकर घर वाले संग राजी होके फोन मा मामला ला रफा-दफा करे बर कही देथे। राजा के डर ते बबा के डर मंडल के बात ला मान के सियनहा के घर वाला मन पुलिस केस घलो नइ करें। 

अब मंडल अउ मंडलिन दूनों झन राजा के बढ़त नशाखोरी, गलत काम अउ मनमानी ला देख के वोला सबक सिखाय बर सोचथें।

दूसर दिन होत बिहनिया कोतवाल, नाऊ अउ खोरबाहरा मंडल घर जाथें। मंडल वो मन ला में जानत हँव तुमन काबर आय हव तेला फेर अपन-अपन घर जावव अब सब ठीक हो जही कहिके घर भेज देथे।


अब मंडल  राजा ला बड़े फजर ले चिल्ला के उठाथे अउ कहिथे – “मैं तोला मोर एक झन लइका हरे कहिके बहुत सह दे हों बेटा। तोर गलती ला जाने के बाद घलो कुछ नइ बोले हों फेर अब तोर नशाखोरी, अय्याशी, बेहूदगी चोरी-चमारी बहुतेच बाढ़ गेहे। अइसने मा तो तैं मोर पूरा धन-दोगानी अउ इज्जत ला बेंच खाबे। सिरतोनेच कहत रहिस खोरबाहरा हा। बेटा तैं B.A. तो पास नइ हो सकेस बर बिहाव के उमर होगे फेर अइसने मा तो तोर बिहाव घलो नइ हो सकही।”


राजा– “का होगे ददा?”


अली मंडल– “का होगे कहिथस। तैं खुद अपन आप ला देख। तोला अभी तक मुड़ मा चढ़ा के मैं बहुत बड़े गलती करे हों बेटा। तैं काली कोनो आदमी ला बीच सड़क एक्सीडेंट कर के मरत छोड़ के आय हस। कखरो प्रान ले देके बाँचे हे। मोला नइ जानही कहिथस का?  अब बहुत होगे तोर। तैं घर ले 100000 के चोरी करे, दूसर के नोनी मन ला छेड़ेस, जुँआ, शराब, गांजा के धंधा मा घलो चल दे फेर मोर आँखी मा तोर मया के पट्टी बंधाय रहिस में तोला कुछु नइ बोले हों। अब तोर सिंग जादा बाढ़ गे बेटा आज ले तैं घर के नौकर-चाकर संग मिलके खेती किसानी के काम ला देखबे। मोला पूछे बिना तोला घर से नइ निकलना हे। अब तोर गोपाल, शक्ति, भंडारी ले कोनों दोस्ती नइ होना चाही। तैं सुधर जा एक बेर मउका देवत हों। नइ ते ये एक्सीडेंट के केस मा जेल के चक्की पीसाहूँ। अब मोर ले बुरा कोनो नइ होही कान खोल के सुन ले।”


अली मंडल अपन नौकर बनिहार संग राजा ला रगड़ के खेती किसानी के काम मा लगा देथे। वोकर बहिरी आना-जाना बंद कर देथे। अपन खुद रोज-रोज वोकर परछो लेवत रहिथे। हफ्ता चार दिन राजा छटपटाथे फेर पसीना गारथे ता मिहनत के मतलब ला समझथे। अउ अपन जिनगी मा सुधार लाथे। 

      येती गोपाल राजा संग लगवारी ला छोड़के अपन ददा-दाई ला हाथ-पाँव जोड़ के माफी माँगत कहिथे– “ददा-दाई हो मैं अब गलत लगवारी संग गलत रद्दा मा कभू नइ जाँव। मोर गलती ला माफी दे दव। अब मैं तुँहर हिनमान नइ करँव।” खोरबाहरा अउ रमशिला हा गोपाल बर घर के मुहाटी ला खोल देथे। गोपाल घलो अपन ददा भाई संग चना गहूँ के ओनारी करत खेती किसानी मा लग जथे अउ पढ़ई-लिखई घलो करथे।

शक्ति अपन ददा के ठकुरइ काम मा साथ देथे अउ भंडारी अपन ददा के कोतवाली काम करथे। 


अली मंडल खोरबाहरा, कोतवाल अउ नाऊ ले कहिथे – “ तुमन मोला माफी दव जी मैं लइका के मोह अउ धन के गरब मा तुँहर बात ला नइ सुनत रहेंव फेर अब मोर आँखी उघर गे हे। मोर लइका के बिगड़े मा मोर हाथ रहिस फेर अब मोर राजा बेलुज्जर नइ हे वो सहीच मा सुधर गेहे।”

खोरबाहरा, कोतवाल अउ नाऊ कहिथें – “तोर लइका के सुधरे ले हमरो बेलुज्जर लइका सुधरगे जी मंडल।”


कहानीकार 

डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

कहिनी- किसान के पीरा

 कहिनी-  किसान के पीरा


         राजा जय पाल के राज म चारो कोती हरियर -हरियर खेत-खार,धान-पान ले सम्पन्न अउ खुसहाली रहिस।चारो दिसा म राजा जयपाल के जै -जैकारा होवत रहिस।

                  एक घाव राजा जयपाल हर  सादा भेस म अपन राज के राज काज ल देखे बर अउ लोगनमन के सुख-दुख ल जाने बर अपन घोड़ा म बइठ के राज के भीतर रेंग दिस। बड़ दूरिहा रद्दा म रेंगत बिहिनिया ले मंझनिया होगे।जम्मो मनखे मन म खुसहाली रिहिस। जेठ के महिना तपत घाम चलत लू लपेट म अंगारा कस जनात घाम म, राजा बड़ दूरिहा निकलगे। रद्दा के गम नई पाइस अउ रद्दा ल भुलागे।त एकोठन कोनो ठउर देखे लगिस, जेमा एको घरी सुरतातिस।

                 त एकठन झोपरी ल देख परिस। उही झोपरी म आसरा ले बर गइस। फरिका ल खट-खटाईस त एक झिन डोकरा बने ओनहा ल पहिरे धोती कुरता म मुंडी म फेटा बांधे निकलिस। अउ कहिस-"आपमन कोन हवव? इहां कइसे आये हवव? कोनो काम हवय का? "सादा भेस म ओहर राजा ल नइ चिन्हिस। राजा हर किहिस-"मेंहर राहगीर हवव।रद्दा ल भुलागे हवव। राजमहल के रद्दा कोन हरे आपमन बता देव।" डोकरा हर किहिस-"आपमन थोरकुन बइठव ,मेंहर रद्दा ल बता दुंहु, फेर अतका मंझनिया घाम के बेर कहां जाहुं,  थोरकुन थिरा लव, सुरता लव, फेर जाहुं।" अइसना कहिके डोकरा हर अपन झोपरी के भीतरी अंग नींगगे। राजा हर झांक के भीतरी देखिस त झोपरी भीतरी अंग अंगना डहार म कुसियार के बड़का खेत ल देखिस। देखते रहिगे, चारो कोती हरियर-हरियर लांबा-लांबा कुसियार लह लहावत रिहिस। उही बेरा देखथे ,के डोकरा हर एक ठन  लांबा कुसियार ल तोर के पानी म धोके अपन हाथ म चपक के कुसियार ले रस निकाल के एक ठन माटी के कुंड़ी म लान के राजा करा लानिस।

                    राजा हर कुसियार के रस ल पीके  तृप्त होगे। कुसियार म अब्बड़ मिठास रिहिस। ऐकेठन कुसियार म कुंडी भर रस, घाम के तपन हर जुड़ागे-ठंड़ागे।  राजा हर कुसियार के रस ल पीके मन म गुने लगिस-मोर राज के जम्मो किसान मन अब्बड़ पोठ हवय अउ मेंहर त राज के चुंगी-कर ल बढ़ा सकत हव, त राज कोस म हमर राज के पइसा बाढ़ जाही। अइसना मन म गुनत राजा हर, डोकरा बबा ले राजमहल के रद्दा ल जान के राजभुवन कोती रेंग दिस।

                 राजा राजभुवन म पहुंच के दूसर दिन सब्बो मंत्री मन ल बला के अपन राज के चुंगी-कर ल बढ़ाय बर अपन राय दिस। कहिस-"हमर राज के जम्मो किसान मन अब्बड़ पोठ हवय उंखर चुंगी-कर ल दुगुना कर देवव।"

                   राजा के आदेस ले जम्मो राज म किसान मन के चुंगी-कर म बढ़ौतरी होगे। किसान मन म उदासी छागे। त ले अपन मेहनत -मंजूरी करत किसान मन, अपन करम करत कभू पाछू नइ हटिन।

                  दु बछर बीतगे। राजा फेर भेस ल बदल के उही दिन बादर म उही डोकरा के झोपरी म गिस। झोपरी हर टुटहा-फुटहा होगे रिहिस। तिपत घाम म राजा हर फरिका ल खट-खटाइस। डोकरा हर फरिका ल खोलिस अउ कहिस-"कोन हवव बाबू ।" राजा हर डोकरा बबा ल देखत रहिगे, पहिले कस नइ रिहिस। ओखर ओनहा म जघा-जघा थिगड़ा हर लगे रिहिस। मुंहु म उदासी छाये रिहिस। राजा हर किहिस -"मेंहर राहगीर हवव बबा, थोरकुन सुरताय बर इहां आय हवव।" डोकरा कहिस-"आवव बाबू थोरकुन सुसताय लेवव।" अइसना कहिके डोकरा हर अंगना के फरिका ल खोल दिस अउ अपन कुसियार के खेत ले चार ठन कुसियार ल काट के ले आनिस। अपन बेटा ल मसीन ले रस निकाले बर कहिस।  चार ठन कुसियार ले निकले रस ल माटी के कुंड़ी म धर के ओखर बेटा हर राजा ल लान के दिस। राजा हर देखथे के कुंड़ी हर रस ले आधा भरे रिहिस। त ले कुसियार के रस ल पीइस। त ओखर स्वाद म मिठास तको नइ रिहिस। राजा ल बड़ चकित लागिस।

            राजा हर डोकरा  ले पूछिस-"बबा मेंहर तुंहर इहां इही दिन बादर म ,दु बछर पहिले आय रेहेव।त आपमन अपन हाथ ले एके ठन कुसियार ल चपक के रस ल माटी केे कुंड़ी भर मोला पिये बर दे रेहेव अउ ओहर अब्बड़ मीठ रिहिस अउ कुंड़ी भर रिहिस। फेर इही दु बछर म का होगे? जेखर सेती तुंहर कुसियार के रस हर कमती होगे अउ मिठास तको कमती होगे। डोकरा हर सादा भेस म राजा नइ चिन्हिस अउ राजा ले किहिस -"का बताबे बाबू हमर राजा हर अब्बड़ लालची होगे हवय। अब्बड़ धन ल राज कोस म राखे के लालच म, वोहर हमर किसान मन के चुंगी कर ल बढ़ा के दुगुना कर दे हवय। हमन संझा -बिहिनिया खेती म बूता करथन फेर का करबे। इही हाना हर सिरतोन हवय 'बोकरा के जीव जाय, खवईया ल अलोना ,राजा के इही सब्बो करनी हर हमर खेत-खार म अनाज म दिखत हवय।  हमन मेहनत त करत हवन ,फेर राजा के मन म जनता मन बर खोट आगे हवय। तेखर सेती इही दु बछर ले हमर राज म अकाल जइसे हालत होगे हवय।

               राजा हर डोकरा के गोठ ल सुन के दंग रहिगे। मन म गुने लगिस अउ पछतावा घलो करे लगिस, के मोर करनी अउ मोर लालची बिचार ले, मोर राज के किसान अउ धरती माता तको अब्बड़ दुख पावथे। मेंहर राजा हरव मोला जम्मो किसान अउ लोगनमन के बर बने बिचार उखर बढ़ोतरी के बिचार रखना चाही। उखर खुसहाली म खुस होना चाही। आज मोर प्रजा मोर करनी के दुख ल भोगत हवय।

                  दूसरे दिन राजा अपन मंत्री  मन ल बुलाइस अउ किसान मन के करजा ल माफ कर के राज म लगे चुंगी कर ल कमती कर दिस अउ अपन मन म संतोस पाइस।

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                             लेखिका

                  डॉ.  जयभारती चंद्राकर

             सहायक प्राध्यापक,छत्तीसगढ़ 

            Mobile N. 9424234098

जोड़ा नरिहर* (छत्तीसगढ़ी कहिनी)

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*आधुनिकता अउ परम्परा के मेल मिलाप ले ही हमर जीवन सुघ्घर बनथे।*




                   *जोड़ा नरिहर* 

               (छत्तीसगढ़ी कहिनी)




                               कल्पना हाँसत -हाँसत  कठल गय.... सविता भौजी- तँय अपन कुरा ससुर  अपन जेठ ल छू डारे। तोला  जोड़ा नरिहर देये बर लागिही डांड़ म।

"मोला काबर  जोड़ा नरिहर देय बर लागही ।" "तँय  अपन कुरा ससुर भुवन भैया ल छू डारे तेकर सेथी..."

 "मंय नई देवं कोई ल नरिहर उवा ।" "नही ,तोला लागही च...!"

"काबर लागही..?" 

"तँय भैया ल छू डारे, तेकर बर।" 

"तहुँच तो छुवत हस भैया ल त ,तँय काबर नई देवत अस नरिहर..."

"वो मोर भैया आय।" 

"त वोमन मोर भैया नई होइन का।" 

"होइस फेर वइसन नहीं न जइसन वोहर मोर ये।"ननद कल्पना छलकत कहत रहिस।               

        जेठानी गायत्री ये खींचा- ताना ल सुनत भीतरे- भीतर हाँसत रहे...ले मनभरहा पाय छोकरी ननदिया । मोला बड़  परेशान करे हावस...!ले अब पाय, घोड़ा ल जोड़ा मिलिच जाथे राम ...!                


          येती कल्पना अड़ गय हे- वो  नरिहर लेके ही मानही।अउ वोती छोटकी सविता के कहना हे ,वो नरिहर नई देय । 


                गायत्री अपन हाँसी ल लुकावत  बाहिर निकलिस तब दुनो पक्षकार-ननद  कल्पना अउ देवरानी सविता , वोला घेर डारिन अपन... अपन पक्ष म करे बर।

"भौजी, येहर भुवन भैया ल छू डारिस तब..." "दीदी ,मंय भुवन -भैया ल छू ..." 

"ये बबा गा ! अब येला चार ठन नरिहर लागही । दु  पहिली के अउ दु अब ये नावा के...! "कल्पना तो हाँसत -हाँसत कठ्ठल गय रहिस।

 "कइसे... का नावा हो गय?" - सविता अचकचाइस थोरकुन। 

"तँय अपन कुरा- ससुर के नाव धर देय ।तेकर सेथी दु अउ। फेर चल जी भौजी अइसन कर दु माफ् हे...दु ठन म ही काम चल जाही।" कल्पना झरझरात कहिस । 

"मंय नरिहर नई दों ओ मोर भौजी...।मोरो तोर अतका  बड़ भाई हे घर म।" छोटकी सविता कल्पना के बेनी ल धर के तीर दिस। 

"तँय बड़ पॉवर वाली अस छोटकी भौजी।" कल्पना अब थोरकुन रोनहु बनत कहिस। "वोमे का के पॉवर मोर बहिनी..." 

"हाँ...अब बने लागिस हे बहिनी कहे हस त।भौजी कहे तब बनेच पीरात रहिस।फेर कुछु कह ले भौजी,तँय पॉवर वाली जरूर जरूर अस नोनी...!"               

येमन के बझई ल देख के बड़े भईया भुवन घलव बाहिर आ गय । 

"भौजी ,मुड़ ल ढांक...!"कल्पना कलपिस।                सविता नई सुनिस। 

"मुड़ नई ढांकत अस त , का तँय भैया ल चाय बना के धराय सकबे?" कल्पना कलपिस।


        सविता चुपे -चाप  रसोई म गिस अउ सब बर  चाय  बनाके  ले आइस ।अउ वोहर  खुद अपन हाथ ले भुवन ल चाय धरा दिस ।


        भुवन घलव हाँसत चाय ल धर लिस । जेठानी गायत्री तीर तो गंगा के धार हर पेले रहय...ले कल्पना अब अउ नरिहर लेबे। 

"चाय धराय त धराय सविता ,का तँय इंकर मुंहू  के पसीना ल पोंछे सकबे?" ये पईत ननद कल्पना के जगहा म जेठानी गायत्री ,छोटकी ल कहिस।             


           सविता कुछु नई कहिस फेर जेठ भुवन तीर म जाके अपन अँचरा ले वोकर मुहूं ल पोछ दिस। 

"दीदी,तँय काल गंवतरी जाय के बेर म तोर देवर के मुहूं ल बने दिखही कहत पोंछे रहय न अपन अँचरा म...। त अभी मंय मोर भइया के पसीना ल पोंछे बरोबर  सकहां ।"

        ननद कल्पना येला देखके एकघरी तो सकपका गे।फेर सँभलत कहिस- अब तोला जोड़ा नहीं एक बईला गाड़ी नरिहर लागही ...!"


       कल्पना तो एक पईत फेर हाँसत हाँसत  अकबका गय रहिस। 



*रामनाथ साहू*



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छत्तीसगढ़ी ला पोठ करे बर समाचार पत्र के भूमिका--*

 *छत्तीसगढ़ी ला पोठ करे बर समाचार पत्र पत्रिका मन के भूमिका--*


                मुँह ले हम कोनो बोली भाँखा ल कतको कहि सुन डरन, फेर जब तक वोला कलम शब्द नइ देय, तब  तक वो बोली- भाँखा साहित्य के रूप नइ ले सके। छत्तीसगढ़ी भाँखा के बारे म अपन विचार रखे के पहली कहूँ कि-जब हिंदी साहित्य के आधुनिक काल चालू होइस, अउ  अपन जुबान म बसे भाषा ल कलमकार मन पोथी म उतारिन ताहन का कहना , हिंदी के बढ़वार सतत होते गिस, अउ आज देखते हन हिंदी खूब फलत फूलत हे। हिंदी खड़ी बोली जब कागज म उतरिस त, वोला पढ़े बर कतको झन मन हिंदी सीखिन। उदाहरण बर सुरता आवत हे, देवकीनंदन खत्री के उपन्यास *चन्द्रकान्ता(1898),*  ये अतिक प्रसिद्ध अउ नामी होइस कि जउन मन हिंदी नइ जानत रिहिस तहू मन, वोला पढ़े बर हिंदी भाषा ल सीखे के उदिम करिन। भारतेंदु, राजा लक्ष्मण सिंह, जगन्नाथदास रत्नाकर,श्रीधर पाठक, अबिकाचरन गुप्त, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण दास,लाला भगवान दींन, -------जइसन कतको अउ मूर्धन्य साहित्यकार मन  हिंदी भाषा म खड़ी बोली ल स्थापित करे बर जी जान लगाके भाषा के सेवा करिन। ये सब साहित्यकार मन साहित्य के संगे संग हिंदी भाषा ल  सब तीरन पहुचाये खातिर पत्र पत्रिका घलो निकालिन, जेखर ले भाषा के बढ़वार दुगुना होय लगिस।  छत्तीसगढ़ी भाषा म घलो साहित्य के संगे संग पत्र पत्रिका बरोबर देखे बर मिलथे, हमर पुरखा साहित्यकार-भाषाविद  मन साहित्य रचे के संगे संग छत्तीसगढ़ी भाषा ल सब तीर सहज पहुँचाये बर पत्र पत्रिका के सहारा लिन, जेमा खबर, कहिनी, लेख, कविता अउ ज्ञान विज्ञान के बात समाहित रहय। अंचल के समाचार अउ कवि लेखक मनके विचार लेख, कविता ल जन जन तक पहुँचाये बर कतको हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के अखबार निकलिस, जेखर ले हमर छत्तीसगढ़ी भाँखा के विकास होइस अउ आजो घलो पत्र पत्रिका, साहित्य, रेडियो, टीवी, सम्मेलन आदि के माध्यम ले सतत होवत हे। 


              छत्तीसगढ़ म पत्र पत्रिका के जनक के रूप म माधवराव सप्रे जी ल जाने जाथे, जे वामनराव लाखे अउ रामराव चिंचोलकर के सहयोग ले सन 1900 म, गौरेला पेंड्रा ले *छत्तीसगढ़ मित्र* नामक मासिक पत्रिका निकालिन। 1955 म मुक्तिबोध जी के सम्पादन म रायपुर ले *छत्तीसगढ़ी* नामक मासिक पत्रिका निकलिस।  रायपुर ले श्री सुशील वर्मा जी के सम्पादन म *मयारू माटी* अउ श्री रंजन लाल पाठक के सम्पादन म *छत्तीसगढ़ सहयोग* नामक पत्रिका जन जन तक पहुँचिस।  डाँ विनय कुमार पाठक जी के सम्पादन म बिलासपुर ले *भोजली, धान के कटोरा, चिंगारी के फूल* अउ सन 1998 म श्री नन्दकिशोर तिवारी जी के सम्पादन म *लोकाक्षर* जइसे लोकप्रिय समाचार पत्रिका हिंदी के संगे संग छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर समर्पित रिहिस। लक्ष्मण मस्तूरिहा के सम्पादन मा *माटी कहे कुम्हार से*  सुधा वर्मा जी के सम्पादन म *मड़ई*,  शकुंतला तरार जी के सम्पादन म *नारी सम्बल*, दुर्गाप्रसाद पारकर जी के संपादन म  *लोकमंजरी*, जयंत साहू जी के सम्पादन म  *अंजोर,* विश्वनाथ वैशम्पायन जी के सम्पादन म  *विचार समाचार*, तुकाराम कंसारी जी के सम्पादन म  *राजिम टाइम्स* जइसे अनेक मासिक, त्रैमासिक अउ साप्ताहिक समाचार पत्र पत्रिका लोकप्रिय होइस। श्याम वर्मा जी के संयोजन म  *मोर भुइयां* जइसे रेडियों पत्रिका घलो छत्तीसगढ़ी भाषा ल पोठ करे बर सतत लगे हे। 

                वर्तमान मा समाचार पत्र मन म घलो छत्तीसगढ़ी भाषा म एक साप्ताहिक कालम आथे। दैनिक भास्कर म सूर्यकांत द्विवेदी जी के सम्पादन म *संगवारी*, पत्रिका म गुलाल वर्मा जी के सम्पादन म  *पहट*, हरिभूमि म डाँ हिमांशू द्विवेदी जी अउ डाँ दीनदयाल साहू जी के सम्पादन म *चौपाल*, नवभारत म डाँ पालेश्वर शर्मा जी के सम्पादन म *गुड़ी के गोठ*, अमृतसन्देश म तुकाराम कंसारी जी के सम्पादन म  *अपन डेरा*, देशबन्धु म परमानंद वर्मा जी के सम्पादन म  *डहर चलती बेरा बेरा के बात*,  *चैनल इंडिया*  म डाँ स्वराज करुण जी के सम्पादन म साहित्य विशेष अंक पढ़े सीखे बर मिलथे। एखर आलावा *आरुग चौरा, लोकसदन, कान्यकुब्ज, महाकौशल, लोक वाणी, बस्तरिया* जइसे अउ कतको नवा जुन्ना आंचलिक पत्र पत्रिका निकलिस अउ कुछ निकलते हे, जे छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर प्रत्यक्ष अउ अपत्यक्ष रूप ले समर्पित हे। साहित्य के  धार जन जन तक इही सब पत्र पत्रिका के माध्यम ले पहुँचथे, जेखर ले भाषा बोली के संगे सँग मनखे अउ देश राज के घलो विकास होथे। 


            हमर महतारी भाँखा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर हमर पुरखा मन खूब महिनत करिन, अब हमर बारी हे। आज  के समय म नवा नवा  साहित्य तो छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर जरूरी हे ही, संगे संग पत्र पत्रिका के घलो अहम भूमिका हे। समाचार पत्र मन म ज्यादातर देखे बर मिलथे कि साहित्य विशेष पृष्ठ भर छत्तीसगढ़ी भाषा म होथे, बाकि पेज नही। संगे संग आज के समय अनुसार मानक छत्तीसगढ़ी रूप के घलो अभाव दिखथे। विकृत अउ अपभ्रंश शब्द के मोह अभो नजर आथे। छत्तीसगढ़ी भाषा सिरिफ  गीत कविता परोसे ले समृद्ध नइ होय, चिंतन, मनन,खेल कूद अउ ज्ञान विज्ञान के समायोजन घलो जरूरी हे। साहित्य म सबे विधा के संगे संग साहित्य के स्तर ऊपर सम्पादक मंडल अउ साहित्यकार दुनो ल धियान देना पड़ही। आज ई पत्रिका के समय हे, जेला सालों साल सहजे जा सकत हे, जे सोसल मीडिया म लगातार छाये रहिथे, अइसन म छत्तीसगढ़ी म समाचार ल बढ़ाये अउ सिरजाय के जरूरत हे। *वइसे तो हिंदी ल हर छत्तीसगढिया पढ़ के समझ जाथन, तभो जब अपन महतारी भाषा के बात आथे त, निरवा छत्तीसगढ़ी म  समाचार के आवश्यकता मससूस होथे।* यदि छत्तीसगढ़ी म समाचार सिरजाये जाही त छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार मनके माँग बढ़ही, अउ जब मनखे के माँग बढ़ही त, भाषा के घलो बढ़वार होही। *समर्पण कहिके कतको चिल्ला डरन, एक-दू-तीन- चार समर्पित आदमी जरूर मिल जही, जे छत्तीसगढ़ी बर निःस्वार्थ लगे हे, फेर जब तक छत्तीसगढ़ी रोजगार म नइ जुड़ही लोगन के रुझान बढ़ नइ सके।*  *अंग्रेजी म अवसर हे, रोजगार हे ,तेखर सेती ओखर बोलइयाँ, जनइयाँ बढ़ते जावत हे।* अपन राज म छत्तीसगढ़ी के महत्ता ल बढ़ाके महतारी भाषा के मान अउ माँग बढ़ाये जा सकत हे। आज के युग म संचार क्रांति अउ ज्ञान विज्ञान के बढ़वार के सेती, मनखें मन बहुभाषी होवत हे, अइसन म छत्तीसगढ़ के रोजगार, पत्र पत्रिका, पढ़ई लिखई छत्तीसगढ़ी म होय। *अपन राज म छत्तीसगढ़ी, भारत भ्रमण बर हिंदी अउ विश्व के बात करन त अंग्रेजी ये त्रिफार्मूला म चिंतन करना पड़ही।*


                  ज्यादातर देखे बर मिलथे, पत्र पत्रिका म कोनो साहित्यकार के लेख, कविता छ्पथे त वो पेज ओखरे बर महत्व के होथे, बाकी मन पढ़े घलो नही, यहू चिंतनीय हे। साहित्य म सा-हित के क्षमता होय, सबके मन ल लुभाय, सबके ज्ञान बढ़ाये, ये दिशा म चितंन अउ काम करना पड़ही। छत्तीसगढ़ी म छपत समाचार पत्र पत्रिका मन ल सरकारो ल बढ़ावा देना चाहिये। जइसे हिंदी अन्ग्रेजी म शब्द शुद्धता अउ एकरूपता दिखथे, वइसने छत्तीसगढ़ी म घलो जरूरी हे। मानकता भाषा के विकास बर आवश्यक हे। पत्र पत्रिका मनके लोकप्रियता बने रहय ये दिशा म प्रयास जरूरी हे। कतको पत्रिका पूरा के पूरा छत्तीसगढ़ी भाषा म घलो निकलथे, फेर आज ओखर माँग नइ हो पावत हे, सम्पादक मंडल खर्चा ल वहन नइ कर पावत हे। अइसन म समर्पण के दिन तक रही? आखिर म एके रद्दा बचथे-कलेचुप बैठ जाना। माँग के हिसाब ले उपज काम आथे, माँगे नइ रही त उपज ल का करबों, अउ कहूँ छत्तीसगढ़ म  ही छत्तीसगढ़ी के माँग नइ रही त, भला अउ कहाँ रही। छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर वइसे तो मनखें संग पत्र पत्रिका ल घलो निःस्वार्थ काम करना चाही, फेर आज के समय म बिना कुछ अर्जन के सम्भव नइ हे। नाना प्रकार के संचार क्रांति के चलते प्रतियोगिता  के दौर आगे हे, अइसन म कोन पत्र पत्रिका रही कोन नइ रही, यहू कह पाना मुश्किल हे। कतको इही सब के कारण बन्द होगे, कतको ले देके छपत घलो हे। एक जमाना रिहिस जब पत्र पत्रिका पढ़े बर दुकान या ठेला म अपन बारी जोहे बर पड़त रिहिस, इही क्रांति पैदा करत रिहिस, फेर आज नवा जमाना म, पत्र पत्रिका खुदे अधर म हे। तभो स्थापित अउ जम्मो पत्र पत्रिका ल छत्तीसगढ़ी भाषा के बढ़वार बर छपे साहित्य अउ कोनो ज्ञान विज्ञान के बात के स्तर, शुद्धता अउ मॉनकता ऊपर धियान देना चाही। साहित्यकार ले बढ़के सम्पादक होथे। साहित्यकार लिख दिस अउ सम्पादक जस के तस छाप दिस यहू सबे लेख, कविता म नइ होना चाही।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)