Thursday, 30 November 2023

राजभाषा के ओढ़ना ओढ़े मान पाय बर ताकत हे छत्तीसगढ़ी*

 **राजभाषा के ओढ़ना ओढ़े मान पाय बर ताकत हे छत्तीसगढ़ी*

       छत्तीसगढ़ अपन लोकसंस्कृति अउ परम्परा ले  जाने जाथे। अलगे राज के रूप म एकर निर्माण घलव इही लोक संस्कृति अउ लोक परम्परा के पहचान संग होइस। छत्तीसगढ़ ल राज बने २३ बछर होगे अउ छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दर्जा मिले १६ बछर। फेर छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के रूप म मान नइ मिल पाय हे। 

       अभी चुनई घरी सबो झन वोट माँगे बर छत्तीसगढ़ी के शरणागत रहिन। सियान-सियानिन मन तिर वोट के फसल काटे बर गुड़ म पागे बरोबर मीठ-मीठ छत्तीसगढ़ी गोठियाइन। रकम-रकम के गीत बजवा के प्रचार-प्रसार करिन। छत्तीसगढ़िया के जम्मो छत्तीसगढ़ियापन ल ओढ़े मुँहाटी-मुहाँटी किंजरिन हें। अइसन सिरिफ अभिन भर नइ पीछू चुनई म घलव करिन। जनता तिर जाके उँकर हितवा बने के कोनो मौका नइ छोड़िन। सबो दल देखावा करे के इहीच दल-दल म बोजाय हें। कोनो सहराय के लइक नइ हे। छत्तीसगढ़ी बर इँकर दाँत हाथी सहीं हे। खाय के आने अउ दिखाय के आने।

           वर्तमान सरकार छत्तीसगढ़ियावाद ल लेके अतेक बुता करिन कि लोक संस्कृति, लोक परब मन के प्रति लोगन के झुकाव फेर बाढ़े लगिस। अपन संस्कृति अउ परम्परा बर लोगन के स्वाभिमान जागिस। फेर सरकार लोकसंस्कृति लोक परब के संवर्धन बर जरूरी माध्यम कोति चेत नइ करिन। अपन वोट के खेती करत दिखिस। कोनो भी लोकजीवन के लोकसंस्कृति अउ लोकपरम्परा के संवाहक ओकर भाषा होथे। छत्तीसगढ़ी राजभाषा बने के पाछू उपेक्षित हे। राज-काज के भाषा १६ बछर म नइ बन पाइस। एकर बड़का कारण सरकार के इच्छा शक्ति आय। चाहे सरकार म कोनो दल राहय, जरूरी हे छत्तीसगढ़ी के प्रति उँकर समर्पण दिखय। छत्तीसगढ़ी ल मिले राजभाषा के दर्जा एक ठन कलगी बरोबर शोभायमान हे। ओकर संवर्धन होय अउ राज-काज के भाषा बनय ए दिशा म कोनो किसम के उदिम नइ करिन। आजकाल एक ठन नवा ट्रेण्ड दिखत हे नेता मंत्री मन के, जनता ले छत्तीसगढ़ी म गोठियाय के। 

           आज छत्तीसगढ़ी एम ए स्तर म पढ़ाय जावत हे। भाषाई दृष्टि ले एकर पढ़ई प्राथमिक कक्षा ले होना चाही, तब कहूँ छत्तीसगढ़ी के विकास सब दृष्टि ले हो पाही। स्कूली शिक्षा म नेंग छूटई पाठ्यक्रम रहे ले न रोजगार के अवसर मिल पावय अउ न ओकर बरोबर पढ़ई च हो पावय। जब तक जेन शिक्षा या विषय ले रोजगार के अवसर नइ मिलही, वो विषय म भला कोनो पढ़ के का करहीं? भाषाई शिक्षा म रोजगार के अवसर शिक्षा संस्थान म ही हो पाथे। आने क्षेत्र म रोजगार के अवसर सरकारी उपक्रम ले ही समझौता कर के बन पाथे। अइसन म जब तक सरकार ऊपर दबाव नइ बनही, तब तक छत्तीसगढ़ी राजभाषा के ओढ़ना ओढ़े मान पाय बर सरकार के मुँह ताकत रही। कहूँ कुर्सी खतरा म जनाही, अउ डूबत बर तिनका के सहारा सहीं छत्तीसगढ़ी उन ल तिनका जनाही, वो दिन नेता मन घलव एला थाम के अपन नैया पार लगाय म चिटिक देर नइ करँय। सरकार राज-काज दूनो बर छत्तीसगढ़ी के मोहताज होवय, वो दिन के अगोरा हे। बेवसाय ले जुड़े मनखे जिंकर घर भीतरी छत्तीसगढ़ी नइ चलय, ओमन घलव अपन व्यापार ल चलाय बर सुघर छत्तीसगढ़ी बोले बर सीख लेवत हें, फेर हम छत्तीसगढ़िया मन अपने बोली-भाखा म बोले ले हीन भाव समझे धर ले हन। अतका घलव नइ देखन कि अलगे भाषा के दू मनखे हमरे बीच अपन बोली-भाखा म कतका गर्व के संग गोठियाथें। जेन दिन छत्तीसगढ़ी बर हमर भीतर के स्वाभिमान जागही, तेन दिन तय हे सरकार अउ सरकारी तंत्र घलव छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के बरोबर मान दिहीं। यहू सुरता रखन कि छत्तीसगढ़ी चुनाव म प्रचार प्रसार के माध्यम हो सकथे, त राजकाज के काबर नइ हो सकय? ....झुकता है आसमान झुकाने वाला चाहिए। 




पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह(पलारी)

एकरूपता के आस म छत्तीसगढ़ी भाखा..

 एकरूपता के आस म छत्तीसगढ़ी भाखा.. 

    छत्तीसगढ़ी भाखा म साहित्य सिरजन तो सैकड़ों बछर ले होवत हे. आज हमर आगू म लोकसाहित्य मन के अथाह खजाना दिखथे, तेन ह वोकरे परसादे आय. फेर ए भाखा ल एकरूपता दिए खातिर उदिम थोर कमतिच दिखथे. एकरे सेती लोगन अपन-अपन सोच अउ उच्चारण के मुताबिक एला लिखत अउ बउरत रेहे हें, अभी घलो वइसने च बउरत हें.

     छत्तीसगढ़ी व्याकरण खातिर उदिम तो काव्योपाध्याय हीरालाल चंद्रनाहू जी के सन् 1885 म लिखे 'छत्तीसगढ़ी बोली का व्याकरण'  किताब ले देखे बर मिलत हे. एकर पाछू अउ कतकों विद्वान मन के घलो किताब आइस, फेर सर्वस्वीकारिता कोनो ल नइ मिलिस. सन् 2000 म अलग छत्तीसगढ़ राज के गठन के बाद ए बुता म अउ जादा गति देखे बर मिलिस. खास करके 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के गठन के बाद एक भरोसा जागिस के सरकारी मंच के माध्यम ले जेन निर्णय लिए जाही, तेला सबो एक सुर म मानहीं, अउ वोकरे मुताबिक छत्तीसगढ़ी के लेखन करहीं.

    राजभाषा आयोग के पहला अध्यक्ष श्यामलाल चतुर्वेदी जी संग ए संबंध म गोठ करे गिस, त उन कहिन- 'मोला लागथे, के अभी हमन ल मानकीकरण ले जादा साहित्य के लेखन डहार जादा जोर देना चाही. जादा ले जादा साहित्य लोगन के आगू म आही. सब एक-दूसर के रचना ल पढ़हीं. वोमा के अच्छा-अच्छा शब्द मनला बउरत जाहीं, तहाँ ले अपने-अपन मानकीकरण हो जाही. छत्तीसगढ़ी म एकरूपता दिखे बर लगही.

    राजभाषा आयोग के दूसरा अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा जी संग घलो ए विषय म गोठ करेन, त उन हाँ एकर ऊपर तो ठोस बुता होना चाही, कहिन अउ सिरतोन म ए रद्दा म पाॅंव घलो राखिन. एक दिन पूरा प्रदेश भर के पोठहा साहित्यकार, भाषाविद् मनला सकेल के आयोग के ही हाल म एकर ऊपर चर्चा करवाइन. ए चर्चा म सबो विद्वान मन डहार ले एक बात ऊभर के आइस, के देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण ल छत्तीसगढ़ी लेखन म बउरे जाना चाही, छत्तीसगढ़ी के लेखन म कहूँ दूसर भाखा के शब्द ल बउरथन त वोला जस के तस लेना चाही. वोमा कोनो किसम के टोर-फोर नइ करना चाही.अब शिक्षा के अंजोर के संग लोगन आने भाखा ले आने वाला शब्द मन के उच्चारण ल शुद्ध रूप म करथें, त लेखन म घलो शुद्ध रूप के ही उपयोग करना चाही.

    ए बइठका के पाछू एक अउ बइठका कर के वोमा मानकीकरण खातिर अंतिम निर्णय लेबोन कहे गिस, फेर दूसरइया बइठका के आरो शर्मा जी के कार्यकाल के सिरावत ले नइ मिलिस.

    हाँ, दानेश्वर शर्मा जी के कार्यकाल म राजभाषा आयोग डहार ले सलाना जलसा के बेरा म एक स्मारिका छपवाए के उदिम घलो करे गिस. ए स्मारिका खातिर चार झन  साहित्यकार मन के संपादक मंडल बनाए गिस, जेमा- डाॅ. परदेशी राम वर्मा, जागेश्वर प्रसाद, रामेश्वर शर्मा अउ सुशील भोले ल संघारे गिस. वइसे तो संपादक मंडल म चार सदस्य रेहेन, फेर एकर जम्मो पोठहा बुता ल मोर जगा करवाए गे रिहिसे, तब मैं आयोग के अध्यक्ष, सचिव, जम्मो सदस्य अउ संपादक मंडल के सदस्य मन ले स्मारिका के भाखा ल मानकीकरण खातिर होए बैठक चर्चा के अन्तर्गत रखे जाय का? कहिके पूछे रेहेंव, तब कहे गे रिहिसे- जब तक मानकीकरण के बुता ह सर्वसम्मति ले पूरा नइ हो जाय, तब तक लोगन जइसे लिख के दिए हें, वइसने छापे जाय कहे गे रिहिसे.

    मानकीकरण ले रद्दा म राजभाषा आयोग के तीसरा अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक जी के कार्यकाल म पोठहा बुता होइस. 22 जुलाई 2018 के दिन बिलासपुर म डाॅ. विनोद कुमार वर्मा जी के संयोजन म आयोजित राज्यस्तरीय संगोष्ठी म सर्वसम्मति ले प्रस्ताव पारित करे गिस- "छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा 11 जुलाई 2018 के अधिसूचित राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 2007 (धारा 2) के संशोधन के अनुरूप छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण बर देवनागरी लिपि (वोकर 52 वर्ण मन) ल यथा-रूप अंगीकृत करे जाही, जेला केन्द्र शासन ह हिन्दी भाषा खातिर अंगीकृत करे हे.

    ए राज्यस्तरीय संगोष्ठी म छत्तीसगढ़ के जम्मो ठोसहा साहित्यकार अउ भाषाविद् मन संघरे रिहिन हें. ए पूरा कार्यक्रम के लेखाजोखा राजभाषा आयोग के कार्यवाही रजिस्टर म लिखाय हे, तभो ले खुद राजभाषा आयोग अउ वोकर ले जुड़े लोगन काबर वोकर पालन या अनुसरण अभी घलो नइ करत हें? 

    मन म एक बात इहू उठथे- का सत्ता म आए बदलाव के सेती पहिली के सरकार के बेरा म पारित प्रस्ताव ल घलो बदलगे हवय या वोला राजनीतिक प्रस्ताव जइसन कचरा के संदूक म झपा दिए गिस? जबकि होना तो ए रिहिस, के वो प्रस्ताव ल शासन प्रशासन के संगे-संग जतका भी ठीहा म छत्तीसगढ़ी भाखा ल कोनो न कोनो रूप म बउरे जावत हे, सबो म लागू करवाय के उदिम करे जाना रिहिसे. भरोसा हे, जिम्मेदार लोगन के ए मुड़ा चेत जाही. अउ एला एकरूपता के रूप म सबो डहार एक रूप म पढ़े लिखे बर मिलही. 

   मोर तो ए कहना हे, के हमन सिरिफ नागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण मनला ही अपन-अपन लेखन म सरलग बउरे लगीन, हिंदी या आने भाखा ले आने वाला शब्द मनला बरपेली छत्तीसगढ़ीकरण करे के नॉव म टोर-फोर करे के बलदा जस के तस लिखे ले धर लेईन तभो मानकीकरण के रूप म एकरूपता के आधा ले जादा समस्या उरक जाही.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

अगहन बिरस्पत कहानी 1

 अगहन बिरस्पत कहानी 1

  

   अन्न के करौ जतन.. 

          

     एक गाँव म साहूकार अउ साहूकारीन रहिन। बड़ मेहनती रहिन। स्वभाव ले दयालु सबके सुख -दुःख म खड़े होय। चीज -बस के कुछु कमी नइ रहिस। कोठी मन ले धान -पान उछलत रहय। धान के बड़ जतन होय फेर कोदो -कुटकी के पुछारी नइ रहय खेत -खलिहान, कोठार म परे रहय। ओखर भूर्री बारय।

        एक दिन के बात आय. अधरतिया के बेरा लक्ष्मी दाई मन बइठे गोठियावत रहए , कोदईया दाई कहीस -बहिनी हो इहाँ मोर बड़ अपमान होथे  रात-दिन मोला होरा भूंझत हें मोर देंह जरत हे हाथ -गोड़ कुटकुट ले पिराथे , लइका -बाला मोर ऊपर थूकथें -मूतथे। तुंहर तो अड़बड़ जतन होथे फेर मोर एक रत्ती  कदर नई हे। मैं अब इहाँ नई रहौं , इहाँ ले जाहूं। धनईया दाई कहिथे बहिनी सबले बड़े तहीं अस  तैं नई रहिबे त मैं का्य करहूं। आज जतन होत हे कोन जाने काली मोरो हाल तोरे असन होही। महूं नई रहंव तोरे संग जाहूं। दूनों के गोठ ल सोनईया दाई सुनत रहय उहू कहिस तुमन बड़े मन नइ रहू तो मैं काबर रहूँ महूं जाहूं तुहर संग , सोनईया दाई के बात ल सुन के रूपईया दाई कहिथे महीं अकेल्ला काय करहूं महूं जाहूं तुहर संग। चारों लछमी माई मन सुनता -सलाह होगें। 

    दूसर दिन अधरतिया जब सबे झन सुत गें चारों लछमी माई साहूकार के घर ले निकल गिन। चारों झन जात गिन रस्ता म जंगल आ गे , एकदम घनघोर , कोदईया दाई कहिथे जंगल अड़बड़ घना हे बहिनी आगू नइ जान कोनो बने असन जगा देख के रुक जथन। कुछ दूर म एक ठन दिया बरत दिखिस। चारों झन उही कोती चल दीन।  देखिन एक ठन नानकुन  झोपड़ी भर हे , आसपास अउ घर नई हे। इहाँ जंगल म कोन रहिथें ? 

  फेर आसरय तो चहिये , दरवाजा ल खटखटाईन आरो ल सुन के भीतरी ले एक सियान दाई कंडील धरे आइस  चारों माई ल देख के अकबका गे। यहा घना जंगल अधरतिया के बेरा अउ चार झन जवान -जवान सुंदर लकलक करत माई लोगिन देख के अकबका गे , फेर आधा डर -बल के पूछिस -काय बेटी हो।

    लक्षमी दाई मन पूछिस -अउ कोन-कोन रहिथे तोर संग। सियान कहिस -अकेल्ला रहीथों। 

लछमी दाई- दाई हमन ल आसरा चाही।

सियान थोरकन गुनिस फेर कहिथे मोर कुरिया तो नानकुन हे बेटी हो तुमन बड़े घर के लगथो , कइसे रहू इहाँ। 

लछमी दाई- ओखर फिकर झन कर हमन रहि जबो. इहाँ जंगल म अउ कहां जाबो।

सियान ल दया आगे. सिरतोन कहिथो बेटी कहां जाहु। आओ भीतरी म। 

भीतरी म लछमी दाई मन गिन। सियान ओमन ल बैठे बर खटिया ल दीस। पानी लान के दीस अउ कहिस बेटी हो मैं गरीबीन छेना थाप के अउ बेच के जिनगी चलाथों खाय बर पेज -पसिया मिलही। 

लछमी दाई- हमन ल परेम ले जेन खवाबे तेन ल खाबो , पेज -पसिया ल पीबो। एकठन बात हे - हमन इहाँ हन कोनो ल झन बताबे। खा- पी के सबो झन सुत गें। सियान मुधरहा ले उठ के गोबर बिनय अउ तहाँ ले छेना थोपय, बेरा उवय तो बस्ती म घूम -घूम के  छेना बेचय , बेचे से जेन पैसा मिलय तेखर खई -खजाना लेवय। रोज के ओखर यही नियम रहय। सियान भले गरीबीन रहीस फेर बहुत ईमानदार , दयालु अउ संतोसी रहीस हे।  वहु दिन सियान  मुंधरहा ले उठिस , ओखर संग संग लछमी दाई मन घलो उठ गें। 

पूछिन बाहिर -बट्टा केती बर जाबोन दाई। सियान गुनिस यहा जवान म जंगल भीतरी कहाँ जाही , सोच के कह दिस - इही तीर में निपट लो बेटी।

चारों झन झोपडी के चारों कोती बइठ गें। 

बेरा उवीस तो सियान के आंखी फटे के फटे रहीगीस , झोपड़ी के चारों कोती ल देख के। यहा का एक कोती कोदो के कुड़ही ,दूसर डहर धान , तो तीसर कोती रुपया -पैसा , अउ चौथइया कोती सोन -चांदी के ढेरी। सियान अकबका गे , सोच म परगे , कोनो जादू टोना तो नई करत हे , असिखिन -बही तो नो हे। लदलद कांपे लगीस। धाय भीतरी धाय बाहिर होय।

   लछमी -दाई मन सियान के भाव ल भांप लीन , ओला समझाईंन , दाई भगवान तोर मेहनत ल चिन्हिस अउ तोला दे हे , सकेल डर।

सियान के डर थोरकन कम होइस। मरता क्या न करता आधा डर-बल के सबे ल सकेलिस। दुसरया तिसरया दिन फेर वसनेहे होइस। सियान समझ गे एमन साधारण मनखे नई हे , हो न हो  साक्षत लछमी दाई ए।

सियान के दिन फिर गे। अब वो गोबर बीने ल , छेना बेचे ल नई जाय , झोपड़ी के जगह सुंदर महल बन गे। पूरा बस्ती म. दूर -दूर गांव म बात फ़इल गे। सियान सबके मदद घलो करेय , दान  -पून करय। सबो झन सियान ल घूमा -फिरा के , डरा -धमका के पूछय काय करेस के तोर दिन फिर गे। फेर सियान बताय नई।

        लछमी दाई मन ओला चेताय रहय। ओती साहूकार के घर धीरे -धीरे सबो धन -संपत्ति खतम होगे। कतकोन मेहनत करय खेत -खलिहान सूख्खा के सूख्खा ,धूर्रा उडियावत । मेहनत -मजदूरी करें के नवबत आगे। सियान के ख्याती साहूकार तक पहुंच गे। साहूकार ल शक होगे हो न हो लछमी दाई ओखरे घर गे हे। खोजत -खोजत साहूकार सियान के घर पहुंच गे। 

   सियान  साहूकार के सुंदर आवभगत करीस।

साहूकार धीरे ले सियान ल पूछिस , का करेय दाई के तोर दिन फिर गे। झोपड़ी ले महल हो गे।  सियान टस के मस नई होइस। साहूकार डराइस -धमकइस , पुचकारीस । 

सियान डेराय -डेराय भीतरी में गीस अउ  लछमी दाई मन ल कहीस , चलव बेटी हो साहूकार आय हे तुमन ल खोजत -खोजत। तुमन ल बलावत हे। बहुत जोजियाइस। आखिर म लछमी दाई मन मिले -बर हामी भरीन अउ बाहर आइन।  लछमी दाई मन ल देख के साहूकार उखर पांव तरी गीर गे , रोय-गाय लगीस , माफ़ी मांगीस। सबे  लछमी दाई मन पसीज गे , जाय-बर तइयार होगे। 

फेर कोदईया दाई  कहीस- तोर  घर म मोर बड़ अपमान होथे, नई जाव। साहूकार कहीस अब नई होय दाई , भूल हो गे माफ क़र  दे , तोर सखला-जतन करहू। आखिर म कोदईया दाई घलो मान गे  . सबे लछमी दाई मन सियान ल अड़बड़ आसिरवाद दीन अउ साहूकार के संग चल दीन। 

साहूकर के दिन फेर बहूर गे। साहूकार ल समझ आगे , घर म सबोझन  ल समझाइस, भगवान दे हे तेन सबे जिनीस के  सखला-जतन करना चाही।


प्रेम से बोलो लछमी महरानी के जय। 

"मोर कहानी पूरगे , दार- भात चूरगे। 


(प्रस्तुति : सुशील भोले) 

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राजभाषा दिवस के पखवाड़ा बेरा म गाड़ा गाड़ा बधाई

 राजभाषा दिवस के पखवाड़ा बेरा म गाड़ा गाड़ा बधाई  

नानकुन गोठ  -

लिखे के विचार आइस l गद्य विधा म बहुत अकन लिखें के काम होवत हे l अपन गोठ ल इही ढंग ले करे के  मोर प्रयास रही l l जउन कहना चाहत हँव लोक साहित्य -संस्कृति के वाचिक परम्परा ले जुड़े हे l लिखित म नई हे फेर बोल चाल अउ लोक व्यवहार म परम्पराअसन चले आवत हे l lपाँच पंचाईत के गोठ  सगा पहुना संग के गोठ रिस्ता नाता लागमानी के गोठ  अउ मुँह ओखरा परम्परा गत जीवन हे लोक साहित्य  संस्कृति के झलक हे जेमा मैनखे के सुख -दुख,हँसना -गाना,दया -मया

करूना  -सहानुभूति  सबो मिलही lओखर ले बहुत अकन गोठ -विचार निकल के आही l भाखा  के मरम ल जाने बर,समृद्ध करे बर,लिखित रूप दे बर ये उदिम ल उठावत हवं l

ओला बढ़िया हमन जानन -नेरवा काकर इहाँ गड़े हे?

छत्तीसगढ़  अउ छत्तीसगढ़ी के आत्मा  कइसे  अउ कहाँ लुकाये हे?  का उहू अब नंदा जाय? नंदावत जान दे?गुने ला पड़ही lहमर जीवन के गीता सार लोक परिपाटी लोक व्यवहार म घलो हे l  लिखें -लिखाये अउ पढ़े - पढ़ाये के बात होवत हे त जीवन मूल्य ला महत्व देवन l शिक्षा म  आचरण मूल्य जुड़ना जरूरी हे l  सब रिस्ता छूटत जात हे,टूटत जात हे lमूल्य रहित ज्ञान -शिक्षा बेकार हे l रूढ़िवादी नई बनना हे फेर नैतिक आचरण के खजाना ल तो खोजन l 

       रेट माइनर्स मतलब मुसवा जइसे खोदी मजदूर असन कीमती बिचार ला बाहिर कोती निकालन -लावन lछत्तीसगढ़ी बर नवा उदिम मान लुहूl अपन सुझाव अउ पदोंलीं घलो दुहू l


                      तुहरेंच

               मुरारी लाल साव

                कुम्हारी

Friday, 17 November 2023

लोककथा मन के संरक्षण बर बड़का उदिम आय लोककथा संग्रह - ठग अउ जग*

 *लोककथा मन के संरक्षण बर बड़का उदिम आय लोककथा संग्रह - ठग अउ जग*

           शहरी जिनगी एक-दूसर ले सरोकार कमती रखथे, नइ ते रखबे नइ करय। इँकर जुड़ाव म सामाजिकता कमती रहिथे। हाथ जरूर मिलथे फेर दिल नइ मिले। फार्मेलिटी निभाय के जुड़ाव होथे।लोकजीवन के समाव खोजे ल परथे। फेर गँवइहा जिनगी म लोकजीवन के दर्शन पल-पल म होथे। जे जादा कर के श्रमजीवी होथे। बेरा उवे के आरो संग काम बुता म लग जथे। चिरई-चिरगुन के सँघाती अपन डेरा छोड़ के खेत-खार, धनहा-डोली, बारी-बखरी कमाय बर जाथे। गाय-गरु मन के लहुटे पाछू बेरा ढरकत अपन डेरा लहुटथे। इही बीच खेत-खार अउ डोंगरी-पहाड़ म कमइया मन कतको किसम के गीत गाथें। जउन अंतस् ले निकलथे। एकर कोनो सिरजनहार नइ होवय। 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' सहीं तुक ले तुक मिलावत लोक के अंतस् ले निकले एक-एक डाँड़ मिलथे अउ गीत बन जथे। जउन ह लोक के अंतस् ल जुड़ोवत लोक म समा लोक ल आनंदित करथे। जेमा सिरिफ अंतस् के पीरा नइ रहय, उछाह घलव रहिथे। लोक के इही गीत मन लोकगीत हरें। ए लोकगीत मन उँकर थके मन ल थिराय म बड़ साहमत देथें। मन म उछाह अउ उमंग भरथें। हारे मन म नवा जोश भरथे। ए गीत मन ले एक-दूसर संग मन के पीरा कहे जाथे, त कभू मया रस म पागे गीत मन ले मयारुक तिर मया के संदेशा भेजे जाथे। मन नइ मिले अउ नराजगी रेहे, त ठेसरा घलव गीते च माध्यम ले दे जाथे। पिरोहिल ल मना घलव लेथे। करमा, सुआ, ददरिया गीत मन म एकर परछो मिलथे। उहें बिहाव, सोहर, फाग, पंथी, जसगीत जइसन गीत मन ले मन म उछाह अउ उमंग के ठिकाना नइ रहय। 

         दूसर कोती घर म घर रखवार के बुता घलव बाढ़े रहिथे। रँधनी खोली अउ अँगना बुता ल सम्हालत लइका मन के हियाव करना पड़थे। नान्हे लइका मन तब आज सहीं स्कूल नइ जा पावत रहिन। एकर पीछू गिने बर कतको वजह हे। ...तब घर म डोकरा बबा अउ डोकरी दाई मन कतको कथा कंथली सुनावँय। खासकर रतिहा बेरा। बहुत पहिली गुरुकुल राहय। जिहाँ नैतिक अउ मानवीय मूल्य ल सहेजे शिक्षा दे जावय। आम आदमी अपन लइका ल गुरुकुल पठोय नइ सकँय त घरे म कथा-कंथली ले पारिवारिक अउ सामाजिक जीवन के ज्ञान दे के उदिम जरूर करँय। दाई-ददा मन के बुता म भुलाय रेहे ले रतिहाकुन डोकरा बबा नइ ते डोकरी दाई मन कथा-कंथली के शुरुआत करँय। ए कहानी मन के मूल उद्देश्य तो मन बहलाव रहिन, मनोरंजन रहिन। रंधई-गढ़ई म बेरा होय ले भुलवारे के उदिम म कथा-कंथली चलय। इही ल सुनत लइका मन जागँय ...तभे तो खाय बर आरो मिलते साठ जम्मो कहानी के आखिर म इही काहय- 'दार भात चुर गे, मोर कहानी पुर गे।' फेर गुनान करे म इही समझ आथे कि आज के कहानी इही कथा-कंथली के नवा सरूप आय। मैं ए संग्रह के मुख पृष्ठ म लिखाय लोककथा ऊपर विचार करत इही सोच पाय रेहेंव। भीतरी म हिरदे के गोठ म वीरेन्द्र सरल लिखे हवय कि....लोककथा मन ल हमर आधुनिक कहानी के महतारी कहि सकथन। मैं उँकर ए गोठ ले सहमत हँव। इँकरे ले प्रेरित होके लिखे के शुरुआत होय हे कहे जा सकत हे। दूनो म एके फरक हे कथा कंथली वाचिक परम्परा ले कई पीढ़ी ल मनोरंजन के संग नैतिकता अउ मानवता के सीख दे म सक्षम रहिस। जेन आज के कहानी म दुर्लभ हे। आज के कहानी कालजयी नइ हो पावत हे। ए संग्रह के भूमिका म हरिहर वैष्णव दू ठन बढ़िया बात लिखे हवँय - एक, कथा-कंथली याने लोककथा लोक संस्कृति के अनमोल थाती आय। दूसर, लोककथा मन लोक साहित्य के रीढ़ के हड्डी आय।

          जन मन म छिटके बगरे लोककथा मन ल सिला सहीं सिल्हो वीरेन्द्र सरल ह लोककथा मन ल लिखित रूप म सहेजे के बड़का उदिम करे हे। काबर कि जम्मो लोककथा मन वाचिक परम्परा ले एक ले दूसर पीढ़ी ल मिले हे। फेर आज लिखना के जुग आय। अइसन म आगू घलव मुअँखरा रेहे ले, इँकर नँदाय के खतरा मँडरावत रहिस हे। लोककथा के संसार अगाध हे, जरूरत हे ओला सहेजे के। कतको कथा तो सहेजे च नइ गेहे अउ कम्प्यूटर अउ मोबाइल के आय ले सुनइया-कहइया दूनो चेत नइ करत हें। अइसन म वीरेन्द्र सरल के प्रयास स्तुत्य हे, बंदनीय हे। वीरेंद्र सरल के ए बुता एकरो सेती अउ स्तुत्य हे कि उन देश के स्थापित व्यंग्यकार होय के बावजूद ए कोति अपन योगदान दे हवँय।

         लोककथा मन के कथानक अउ प्रस्तुति ले ए कहे जा सकत हे कि ए हर आज के बालकहानी ले अलग नइ रहे हे। अइसे भी जम्मो कथा मन लइका मन ल साध (निशाना) के गढ़े गे हवय। जंगल-झाड़ी, पशु-पक्षी, छोटे-बड़े सबो जीव-जंतु, तरिया-नदिया, राजा-रानी जउन लइका के शब्द कोष म (जानबा) रहिथे, उही ह कथानक ल आगू बढ़ाय म मददगार दिखथे।

        बेरा के संग स्कूली शिक्षा म 'हितोपदेश अउ पंचतंत्र की कहानियाँ' सिरीज ले नैतिक मूल्य अउ मानवीय मूल्य शामिल करे गे रहिस। जेकर आज के पाठ्यक्रम म कमी दिखथे अउ एकर प्रभाव मनखे के बेवहार म घलव झलकथे। जिनगी म तनाव अउ परिवार म बिखराव एकर बड़े उदाहरण आय। मनखे म सबर करे के क्षमता ए नइ रहिगे हे। ऐन-केन प्रकारेण सब हासिल करना चाहथे। चाहे ओकर बर कुछु दाँव लग जय। ओकर संसो नइ हे। औपचारिक शिक्षा के संग हम दू अउ हमर दू के रुँधना म अनौपचारिक शिक्षा घलव सिमट गे हे। सुवारथ म सनाय हे। नान-नान बात म झगरा-लड़ई होवत हे। अपनापन अउ भाईचारा ह कोन खूँटी म टँगा गे हे ऊपरे वाला जानय। अइसन म लोगन के चारित्रिक निर्माण बर आज लोककथा मन के प्रासंगिकता बाढ़ गे हवय। 

         ऊपर कहि डरे हँव कि लोककथा मन बाल कहानी ले अलग नइ हे। लइकामन ल केन्द्र म रख के कथा गढ़े जाय। कल्पना के उड़ान घलव रखे जाय। अचम्भा गोठ जानबूझ के डारे जाय ताकि लइका मन रिझे राहय। कल्पना शक्ति के विकास होवय। लोककथा मन म कल्पनाशीलता बड़ गजब के मिलथे। अतिश्योक्तिपूर्ण कथन अउ घटना ले कथा म रोचकता बने रहिथे। बाल मनोविज्ञान तो साग म डारे नून सहीं रचे बसे हे। भले बाल पात्र नइ रही फेर कथा के प्रवाह अउ संवाद ह बालमन ल बाँधे रहिथे।

         अब किताब म शामिल कुछ लोककथा मन के गोठ कर लेवन।

         छत्तीसगढ़ के गँवइहापन म कुछ मनखे के बेवहार अउ हाव-भाव अइसे रहिथे जेन ल लेड़गा कहि दे जाथे। जेकर चलना-फिरना अउ गोठियई के लोगन हाँसी उड़ाथें। काबर कि लेड़गा सूझ-बूझ ले बुता नइ कर पावय। कर भी लेही त उल्टा-पुल्टा कर डारथे। दूसर के बुध म झटकुन आ जथे। चतुरा मन ओकर फायदा उठा लेथें। जेन ल अभिन के बेरा म कमती बुद्धि के लइका म गिने जाथे। हमर कथा-कंथली म लेड़गा के पात्र के चरित्र ल बढ़िया गढ़े गे हावय। जम्मो कथा मन म कभू उँकर हँसी नइ उड़ाय हे। भलुक ओकर मनोविज्ञान ल समझे के उदिम मिलथे। उन मन अनजाने म सहीं अपन सूझ-बूझ के आरो देवत समाज बर चेतलग बुता घलव कर डारथें। अइसन कथा मन ले लइका मन बड़ मजा मिलथे। फेर बड़का सीख घलव पाथें। एक तो उँकर जइसन नइ करना हे।

        'करम के नाँगर ल भूत जोंतय' म लेड़गा अपन महतारी के दे सात ठन मुठिया रोटी बर पीपर तरी बइठे चिचिया कहिथे - 'एक ल खाँव कि सातो ल खाँव। एक ल खाँव कि सातो ल खाँव। इही ल दुहराय त पीपर म रहइया सत बहनिया मन अपने आप ल समझत डर जावय। दूसर कोति ओकर ललचाहा मितान के करनी के भेद ए कथा म हे।

         'भाँचा के चतुराई अउ ममा के करलाई' लेड़गा के सूझ बूझ ले दिन बहुरे के कथा ए।

          'परबुधिया' म लेड़गा के चरित्र बिल्कुल लोकजीवन म प्रचलित चरित्र के जइसे हावय। जेन ह अभिन के बेरा म अविश्वसनीय हे। अइसन कहानी ल जस के तस आगू बढ़ाय ले नवा पीढ़ी अउ समाज ऊपर गलत छाप परही। परबुधिया अउ लेड़गा के कड़ही दूनो कथा महज मनोरंजन के लइक हे। 

            भांटा ऊपर कांटा पहेली बूझत हास्य कथा आय। उहें जानपाड़े लोककथा ए बताय म सक्षम हावय कि जान मुसीबत म फँसथे त सबो के दिमाग के ताला खुल जाथे। सब ल उपाय सूझथे।

           छत्तीसगढ़ लोकपरब के भुइँया आय। जिहाँ नारी परानी कतको किसम के उपास-धास रखथें। कमरछठ उपास इही म के आय जउन तइहा ले चले आवत हे। एकर महत्तम अउ मरम ल सरेखत छै ठन बढ़िया लोक कथा ए संग्रह म सकेले गे हे। ए विषय के एक दू लोककथा ल सरेखे के पाछू अउ दूसर किसम/विषय के लोककथा मन ल जघा दे जाय म छूटे अउ लोककथा ल नवा जीवन मिल पातिस।  नवा संग्रह बर एमा ले बाँचत अउ कथा ल दूसर संग्रह म शामिल करे ले ओकरो विविधता बने रहितिस। अइसे मोर मानना हे। खैर, ए लेखक के एकाधिकार आय कि का शामिल करय अउ का नइ?

         'मंत्री मन के घमंड'  जन-हितवा राजा मंत्री मन के घमंड कइसे टोरथे एकर परछो देथे। 

         आज दिनोंदिन मनखे नैतिकता ले गिरत पताल लोक म जावत जात हे, अपने ले आँखी नइ मिला सकत हे। अइसन म 'चोर के ईमानदारी' लोककथा मनखे के चारित्रिक उत्थान बर मील के पत्थर साबित होही। जेन म परिस्थितिवश एक राजा अपन छोटे बेटा ल कहिथे-...तैं चोरी करके जिनगी जीबे खाबे...फेर मोर ए बात ल हमेशा सुरता रखबे कि कभू कोनो दास, कंजूस अउ मित्र घर चोरी झन करबे,.. अउ एकरे संग असीस देथे- भगवान तोर भला करही। ददा राजा के दिए ए मंतर ल अपनाय चोर बेटा कइसे आने राज के राजकुमार बनिस एकर बढ़िया कहानी आय, चोर के ईमानदारी।

            जे पाय आँच, ते खाय पाँच लोककथा जिद म अड़े रहे ले मनखे के संग का अनीत घट सकथे, एमा बढ़िया समझे जा सकत हे। 

          ठग अउ जग ए बताथे कि कभू भी अपन आप ल हरदम श्रेष्ठ अउ जेष्ठ माने के नोहय। हमरो ले कोनो श्रेष्ठ हो सकत हे।

           'कुकरी के लइका' प्रेम अउ समर्पण के मिशाल दे म समरथ हे।

           जम्मो लोककथा मन के बारे म कहूँ थोर थोर गोठ लिख दे जाही त आप किताब कइसे पढ़हू। ठग अउ जग, बनकैना रानी, कुकरी के लइका, दसोमती रानी, महराज के बेटा, मनखे के भाई साँप, सूरजभान, फूलबासन,  राजा वीर देव, हाथी अउ कोलिहा सहित कुल ३२ कथा-कंथली अइसे ढंग ले सकला करे गे। जे मनखे के ३२ दाँत कोति घलव इशारा करथे। आखिर लोककथा दंतकथा तो हरेच भई। 

          ठग अउ जग लोककथा संग्रह लोक ल हाँसे के मौका देवत नैतिक मूल्य अउ मानवीय मूल्य ल अपन अंतस् म उतार मनखे बने रहे के सीख देथे। लिखना रूप म सिरजावत वीरेंद्र सरल के लेखन शैली सराहे के लइक हे। जेन प्रवाह के संग सुने हँव उही प्रवाह ए लोककथा मन म मिलथे। वीरेंद्र सरल के मँजे कलम ले ए संग्रह के जम्मो लोककथा मन ल आज के भागमभाग ले भरे जिनगी म अपन ठउर बनाही। एमा कोनो दू मत के गोठ नइ हे।

           लोककथा मन ल वाचिक परम्परा ले लिखना म सँघारे के उदिम आगू घलव होवत रहना चाही। बस अइसन करत बेरा ए बात के ख्याल रखे बर परही कि विशुद्ध मनोरंजन बर कहे कथा-कंथली के संग छत्तीसगढ़ के अस्मिता अउ स्वाभिमान ल नवा उचास देवय, उँकर सकला होवय। वीरेंद्र सरल के ए उदिम नवा-जुन्ना(नवोदित अउ स्थापित) दूनो लिखइया मन ल ए दिशा म बुता करे के प्रेरणा दिही, इही भरोसिल मन ले वीरेंद्र सरल ल पुरखौती जिनिस ल सहेजे के ए कारज बर बधाई देवत हँव।


लोककथा संग्रह: ठग अउ जग

लेखक: वीरेंद्र सरल

प्रकाशक: कल्पना प्रकाशन दिल्ली

प्रकाशन वर्ष : 2023

कापीराइट: लेखक

पृष्ठ : 224

मूल्य : 450


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह(पलारी)

जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग.

देवारी म जिमीकाॅंदा के साग...

 देवारी म जिमीकाॅंदा के साग... 

    वइसे तो हमर छत्तीसगढ़ म जिमीकाॅंदा के साग खाए बर बारों महीना मिल जाथे, फेर देवरिहा सुरहुत्ती के बिहान दिन, जे दिन गरुवा मनला खिचरी खवाए जाथे वो दिन अवस करके खाए बर मिल जाथे. ए परंपरा लगभग सबो घर देखे बर मिल जाथे. हमन मैदानी भाग म एला अन्नकूट के रूप म 'नवा खाई' घलो कहिथन. 

    घर के सियान ए दिन चुरे जिमीकांदा (कोचई अउ मखना मिंझरे) के साग अउ खिचरी ल घर के देवता म चढ़ाए के बाद गरुवा मनला खवाथे, तहाँ ले खुद घलो खाथे. लइका राहन त हमर बबा हमू मनला खाए बर देवय. पहिली तो छिनमिनावन. काला-काला खवाथे कहिके बिदके असन करन, तभो ले खाएच बर लागय, काबर ते ए दिन घर के जम्मो सदस्य खातिर जिमीकांदा के साग चुरे राहय. संग म दूसर साग घलो चुरे राहय, फेर जिमीकाॅंदा ल खाना अनिवार्य राहय.

    आज जब बड़े बाढ़ेन अउ जिमीकाॅंदा के आयुर्वेदिक महत्व ल जानेन त लागथे, के हमर पुरखा मन कतेक वैज्ञानिक सोच के रिहिन हें, जेन विविध परंपरा के नॉव म कतेक महत्वपूर्ण जिनिस मनला हमर स्वास्थ्य खातिर जोड़ दिए रिहिन हें.

    आज वैज्ञानिक शोध के माध्यम ले जानकारी पाएन, के जिमीकाॅंदा म फास्फोरस के गजबे मात्रा पाए जाथे. सिरिफ ए देवारी के दिन ही एके पइत जिमीकाॅंदा खा लेइन त हमर शरीर म कई महीना तक फास्फोरस के कमी नइ होही. ए ह बवासीर ले लेके कैंसर जइसन कतकों जबर रोग ले बचाके राखथे. एमा फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी 1 अउ फोलिक एसिड होथे. संगे-संग पोटैशियम, आयरन, मैग्नीशियम अउ कैल्शियम घलो पाए जाथे.

    संगी हो आजकल बजार म हाइब्रिड वाले जिमीकांदा घलो देखे बर मिलथे, फेर एमा आयुर्वेदिक तत्व के थोर कमी होथे. अच्छा हे, के देशी किसम के ही जिमीकाॅंदा के उपयोग करे जाय.

    हमर छत्तीसगढ़ म तो वइसे घरों घर जिमीकाॅंदा बोए अउ खाए जाथे. एकर कनसइया (पोंगा) के घलो कतकों झन साग रांध के खाथें. कतकों झन एकर ले बरी घलो बनाथें, जे ह 'लेड़गा बरी' के रूप म जगप्रसिद्ध हे. ए सबो ल खाना चाही. कभू-कभार मुंह खजवाए असन लागथे, फेर एकर ले डर्राना घबराना या छिनमिनाना नइ चाही.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

सोहाई* चन्‍द्रहास साहू

 *सोहाई*

                                    चन्‍द्रहास साहू

                                  मो 8120578897

बिहनिया ले उठगे आज ओ नोनी हा। काबर नइ उठही ? आज दुसरइया दिन आवय। जम्मो जीव-जिनावर भक्तिभाव मा बुड़े रहिथे। पहिली दिन जोरा-जारी, हियाव-नियाव, स्वागत-सत्कार मा निकल जाथे। बच्छर मा एक बेरा आथे कुवार नवराति हा।.. अउ संग मा आथे सौहत देबी हा…। जोत-जेवारा, डांग- डोरी धजा -पताका .. ।

रिकम-रिकम के बरन-बईगा- गुनिया, चेला-चंगुरी, डीही-डोंगर, देवी-देवता के। दरसन-परसन, सेवा-सटका करे बर। ओला तो आने गाॅंव जाना हावय आज। अपन कला देखाय बर , आदिवासी लोक नृत्य देखाये बर। ओखर दल बेरा परब मा नाचके, झुमके जम्मो दुख पीरा अउ जिनगी के थकासी ला बिसरा लेथे अपन गाॅंव मा। फेर आने गाॅव‌ के नेवता मा कला देखाये बर घला चल देथे।

             जम्मो लोकनृत्य मा भगवान आराध्य, इष्टदेव के महिमा, ओखर जस अउ ओला उछाह करे के गोठ रहिथे । चाहे करमा, सरहुल, गौरानृत्य, मांदरी, डंडा, रहस, पंथी, गेड़ी, राउत नृत्य होवय। लोकनृत्य घला भक्ति के माध्यम आय । शहर के ओन्हा ओढ़ईया कस्बा अउ बड़का शहर मा ये गाॅव‌ महुआटोला के नांव के सोर अब्बड़ हावय ।

            मन मंजूर अउ गोड़ मिरगा के होगे हे आज ओखर । भिनसरहा भईसा मुंधियार रिहिस तभो ले कतका बुता कर डारिस। गाय बछरू के जतन पानी । गोबर-कचरा, बरतन-बासा .. जम्मो बुता । बम्बर बारके परछी ला करिया मा, अउ लाल घेरू माटी मा कोठ ला खुंटिया डारिस । उपका डारिस काली के बाचे खोचे ला ..। माटी के घर खपरा वाला अउ छानी के टिप मा बइठे सोनचिरई ..। सिरतोन कुम्हार हा अभिन लान के मड़हा देय हावय अइसे लागत हावय। बढ़ई अभिन घर ला बनाये होही। सरई अउ बीजा लकड़ी के काड़-कगड़ी, खिड़की-कपाट, खइरपा तक हा सुघ्घर उज्जर नवां -नवां दिखत हावय । सुरुज नरायेन सोनहा अंजोर बगरावत हे ..। सीत बरसे ले सुघ्घर लागत हे। ससन भर देखिस अपन घर ला मुचकावत । सुरहीन गाय के गोबर ले लिपाये अंगना ला, खीरा कुंदरू के झूलत बारी ला। धोवाये बरतन के मइलाहा पानी ला आरमपपई म रिकोइस। कोवर-कोवर आमा पाना के ममहासी ला सूंघीस । कुम्हड़ा नार ला कोठा के छानी मा चड़ाइस। नहा के छाती बांधे – बांधे दरपन के आगू मा ठाड़े होइस तब सिरतोन उही लजागे अपन बरन ला देख के। सांवर गोरी झक्क दमकत सिकल । खीरा बीजा कस दांत । उल्हा-उल्हा कोवर सरई पत्ता कस होठ-गुलाबी । डोमी कस सुघ्घर बाल अउ कजरारी आँखी हा …।

         जादा तारीफ झन कर फुलगजरा अपने आप के । मनेमन ओहा फुसफुसाइस । चेथी मा चपत मारिस अउ महुआ झरे कस खनखनावत हाॅंसे लागिस।

        अब जान डारे होहु रूपषोडसी मोटियारी ला । महानदी के निरमल पानी ला कछोरा भिरके तौरे हे। परसा फूल के आगी मा तन ला सेके हे । झरत महुआ ला ओली मा झोंके हे । सरई-सइगोना, बर-पीपर के कोरा मा डंडा पचरेंगा खेलइया ये नोनी आय – फुलगजरा । रुप षोडसी मोटियारी फुलगजरा । चातर राज, बस्तर राज अउ उड़िया राज जिला धमतरी, जिला कांकेर कोंडागांव अउ जिला नवरंगपुर के लोक परब अउ संस्कृति के मिंझरा सियार आय ये गाॅंव – महुआटोला हा। जगन्नाथ भगवान ला पांव परके गजामूंग खा लेथे । पचहत्तर दिन के दसेरा मनावत सल्फी लांदा ला चुहक लेथे। तब गौ लछमी ला गोबरधन खुन्दाके, सोहाई पहिराके, खिचरी खवाथे । नगरी सिहावा के कर्णेश्वर मड़ई मा डांग-डोरी ला गिदबिद-गिदबिद नचा घला लेथे। अउ भाखा ग्यान …उड़िया छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, हल्बी, भतरी सब गोठिया लेथे अपन पीरा ला बताये बर।जइसन भेष तइसन भाखा ।

” तुई तो तियार होऊन गेली से रे फुलगजरा ? पूजा पाठ करतोर काजे शीतला दाई बले जावतोर आसे (तेहा तियार होगेस का फुलगजरा ? शीतलामाता मा पूजा करे बर घला जाये के हे ।”)

” हव री होऊन गेली । (हव , बस हो गेव।)”

हिरौदी, मानकुंवर, सुकारो, सुकधनिया, दुलारी आयतिन , रमौतीन, नीलम, रेखा अउ मधु जम्मो कोई आगे दोरदिर ले। जहुरिया मन के गोठ ला सुनके किहिस। माड़ी ले लाल लुगरा, फुग्गा पोलखा, रूपियामाला, सुता ,नागमोरी करधन, अइठी, बाहा भर चुरी , माथ मा कौड़ी के मथौड़ी, मोरपंखी खोपा …गजब सुघ्घर बरन। संगी मन देखते रहिगे।

दुलारी इतरावत किहिस

“आजी तो तुई हुंचो जीव च नेऊन जहुआस कसन आले! ” (तेहा तो मार डारबे आज !)

“को चो ? ” (कोन ला ?)

” हुनि ” (उही)।

“को हुनि ”(कोन उही)।

“अऊर को मोके चलासित, गहिरा लेका के ।” (अउ कोन , मोला चलाथस । गहिरा टूरा ला कहत हँव।)

फुलगजरा अब लजागे । बातिक बाता नइ कर सकिस।

हा… हा …खी.. खी.. के आरो आइस। शीतला दाई के अंगना घला गमकत हावय अब।

           फुलगजरा अपन टोली के मुखिया डांसर आवय। गहिरा टूरा बलराम हा मांदर बजाथे तब सब मात जाथे । आज टेक्टर मा जोरा के मांदरी नृत्य देखाये ला जावत हे गरियाबंद।

” सेठ पिला के फोन आये रिहिस। रायपुर बलात हावय। एलबम मा बुता दुहुं कहिथे । जतका पइसा कबे ओतका दुहुं कहत रिहिस। मेंहा तो जाहू मोला हीरोइन बनना हे। तहुं चल फुलगजरा ।”

मानकुंवर किहिस मुचकावत।

“ओ चतुरा मन के बुध मा झन आ बहिनी । न घर के रहिबे, न घाट के । सेठ-साहूकार आदिवासी, छत्तीसगढ़िया के भला करे हे…. ? हुसियार फुलगजरा समझाइस। ओखर आँखी अगियावत रिहिस।

          आज बलराम हा दुकान ले बिसाके लाये मोरपांख ला ओरियावत रिहिस। बबा ढेरा मा परसा डोरी ला आटत हावय। अउ बाबू हा, सोहाई के छोटकुन बंडल बनात हावय। 

“बलराम तेहां का करत हस ? प्रैक्टिकल कापी देना तोर ?”

बलराम देखते रहिगे फुलगजरा ला आज  अपन घर मा।

“बइहा देखते रहिबे कि कुछू बताबे।”

“सोहाई बनाथन फुलगजरा ! (सोहाई पशुधन के नरी मा बांधे जाथे जौन हा मोर पांख, परसा के डोरी ,छोटकुन रिकम-रिकम के कपड़ा ला सुघ्घर सजाके बनाथे । येहा मनमोहनी हार आय।) ये परसा के जड़ ला लान के कुचरथन। छालटी निकाल के एक-एक रेशा ला हेर के ढे़रा मा आटथन। ये सादा डोरी ला हर्रा अउ चिखला माटी मा चिभोर के करिया करथन। सादा करिया डोरी मोरपांख अउ नान नान कुटका चिकमिकी ओन्हा बांधके बना लेथन सोहाई।”

बलराम बताइस फुलगजरा मुचकावत रिहिस ।

“हा सुघ्घर बनाये हव रिकम-रिकम के।”


“हव ! येहा दुहर सोहाई आय । झक्क सादा । येला देबी-देवता, गोर्रैया, ठाकुर देव अउ नन्दी महराज मा, डीही-डोंगर अउ दुधारू गाय में बांधथे। पचेड़ी सोहाई आय पचरंगा । गाय भईस मा बाँधथन। ये करेलिया सोहाई पांच लर के। ये गोल्लर अउ बड़का गर वाला गौलछमी मा बँधाथे। मंजुरहा सोहाई मा जोरदरहा मोरपंखी डारके बनाथन दुधारू गाय बर। सुघ्घर मंजूरपंखी के चांदा ला देखत रिहिस फुलगजरा हा। 

गोल सादा सोहाई येला गईठा कहिथे येला बईला भईसा बछरू ला बाँधथे ।”

बलराम के ददा देखाये लागिस ओरी पारी ।

“अभी ले बनाबो बेटी ! तब देवारी बर पुर सकबो ओ ! गाॅव‌ भर के गौलछमी बर।”

“येला सोहाई काबर कहिथे बबा ? ”

फुलगजरा किहिस

“सोहाई माने शोभा बढ़ानेवाला । पशुधन के शोभा मुकुट पहिरे राजा कस बाढ़ जाथे। पसीना ओगरा के हमर किसानी कारज मा पंदोली देवइया गौलछमी अउ प्रकृति ला मान देथन। सोहाई के मंजूर पांख भगवान किशन अउ सादा डोरी ला राधारानी घला कहिथे।”

बलराम बतावत रिहिस ।

फुलगजरा देखत रिहिस ओखर सांवर बरन ,फडकत भुजा, चाकर छाती, नरी मा करिया रेशम ला …।

“मोरो घर के शोभा बढ़ाबे का मोर जिनगी मा आके ? सोहाई कस सतरंगी कर देबे का ? मोर रानी ..! मोर सोहाई…।”

बलराम के आँखी गोठियाये लागिस । फुलगजरा घला हुंकारु दिस पलक झपक के। सब बिसरागे रिहिस जात धरम, रीति रिवाज, चाल चलागन , गाॅंव समाज ला । चन्दा-सुरुज, नरवा -डोड़गा , ताल-तरिया, सरई, महुआ रुख तक भेद नइ करिस। तब मया मा का के भेद….?

मोर राजा.. मोर बलराम !

मोर रानी .. मोर सोहाई..!

आँखी गोठियावत रिहिस । मुक्का भाखा, मूक सम्प्रेषण फेर सब गोठिया डारिस दुनो कोई प्रेक्टिकल कापी के बहाना। दुनो कालेज मा हावय।

चिरई-चिरगुन नानकुन रहिथे घर के शोभा बढ़ाथे । अउ उड़ियाये लागथे तब डर समा जाथे । कोनो शिकारी झपट्टा झन मारे अइसे । फुलगजरा के दाई ददा ला संसो होये लागिस। मया तो गोरसी के आगी आय उप्पर ले बुताये कस अउ तरी-तरी धधकत रहिथे। मया तो स्प्रिंग घला आय जतका दबाबे ओतकी उछलथे। ….अउ कोनो उछलथे तब दुरिहा के शिकारी कइसे फांसथे, फंसइया ला आरो नइ होवय। 

                येहां जंगलिहा गाॅंव गवई आय जतका सुघ्घर हावय ओतकी भयानक घला। मीठ चार तेंदू के रुखवा मा कोन कोलिहा बईठे हावय..? महुआ मा कोन परेत हावय…? आमा अमली के बौर मा कोन राच्छत लुकाये हे ..? मूसली सतावर सर्पगंधा मा कोन सांप लपेटाये हे..? कोंन गली ले रायफल पिस्तौल लेके निकलही ..? कोन पैडग़री मा टिफिन बम होही .? कोन सड़क उखड़ जाही..? कोन रेलवाही छिही बिही हो जाही….? कोनो नइ जाने।

फुलगजरा अउ बलराम पढ़ई मा हुशियार रिहिस । अउ गोठ बात मा सब मोहा जाही..। फेर आज तो उही मन मोहागे हावय । जल जंगल जमीन आदिवासी के हित गोठियइया मीठ लबरा मन मा। अधरतिया के वर्दी पहिन के मइलाहा सोच के दल मा वहु मिंझर गेहे। लाल सलाम के झंडा बुलंद करत हावय।


मुरलीवाला किसन कन्हैया की ….जय !

राऊत भाई मन जयकारा बोलाइस।

अरा ररा रे…….

घर घर दीया जलाओ संगी, आगे देवारी तिहार रे।

मोर संहाड़ा देव बर राखे हव, नरियर फुलगजरा हार रे।।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……।

दफड़ा बाजा तान मारिस


राउत भाई मन दोहा पारिस अउ बजनिया मन लहस-लहस के बाजा बजाइस। टिमकी मोहरी सिंगबाजा दफड़ा गुदुम झांझ मंजीरा झुमका ।

      सुघ्घर सवांगा राउत मन के । माड़ी ले पीयर धोती, लाल छिटही सलूखा , मोरपंखी के कमर बाजूबंद , मुड़ी मा खुमरी, खुमरी मा खोसाये चंदैनी गोंदा । बंगला पान के लाली ले मुॅॅंहू रंगे। अब्बड़ सुघ्घर बरन हावय गहिरा टोली के। ठोमहा भर तेल पियाईया तेन्दुसार के चिकचिकावत लउठी अउ आनी बानी के रेशम सुत चिकमिकी मा सजाये लउठी ला उप्पर उठा-उठा के नाचत हावय। गाॅंव के गौटिया पारा जावत हावय सोहाई बांधे बर। पहिली गौटिया बेड़ा-बड़का मंझला, नान्हे गौटिया घर के गौलछमी ला सोहाई बाँधही ।

अरे हा… ,

नेवरिया घर घला बाँधही सोहाई ला। नेवरिया-नवा-नवा आये हे ये गाॅंव मा। चार पाॅंच बच्छर होवत हे फेर अतका धाक हावय गाॅंव मा …कि अब ये गाॅंव मा नेरवा गड़े सियान दाऊ के घला कुछु नइ चले । कोन जन का मोहनी मंतर जानथे ते …. लइका सियान जम्मो मोहा जाथे । जवनहा मन तो अपन दाई ददा के पांव भलुक नइ परे अउ ओखर आगू मा डंडा सरन हो जाथे। अइसे हावय नेवरिया हा। अड़गड़ा पल्ली बड़गड़ा … टार अइन्ते तइन्ते हो जाही । बिचित्तर नाव हे। महुं ल लेये ला नइ आवय ओखर नाव ला। ओखरे सेती नेवरिया कहिथो सोझहा।


राउत नाचा अउ गौरी गौरा के बाजा बजनिया के पइसा नेवरिया कोती ले रहिथे। गाॅंव समाज वाला मन ऐखरे सेती तो मिलाय हावय अपन गाॅंव समाज मा। अउ सोहाई …? पइसा वाला के पांव कोन नइ परे..?


देवारी के दिन दाऊ बेड़ा मा । जेठाऊनी के दिन बीच पारा के किसान मन घर अउ पुन्नी के दिन आबादी पारा के नान्हे किसान मजदूर के गौलछमी मा सोहाई बाँधथे। 

"अभी सोहाई बांधे के पाछू काछन निकलही जल्दी करो गहिरा भाई मन ।"

गाॅंव के सियान मन किहिस।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……डंग। दफड़ा बाजा ताल दिस।

अरा ररा रे…….

जय महामाई रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल।

चौसठ जोगनी पुरखा के, बइहा मा होबे सहाय।।

बड़े दाऊ घर गिस सोहाई बांधे बर सुमिरन करत राउत टोली हा। गाॅंववाला मन उछाह मा रिहिस अउ गौलछमी.. वहू मन अब्बड़ गमकत हावय।

अरा ररा रे…….

मन मैला तन उजला , बगुले जैसा भेष हो।

इन सब ले कागा भला, भीतर बाहर एक हो।।


गहिरा मन दोहा पारिस नाचत कूदत । अउ गाॅंव के निकलती मसान घाट जाए के रस्दा, जंगल ले लगे झुंझकुरहा खेत मा बसे नेवरिया घर कोती रेंगे लागिस।

चार आँखी सब ला देखत रिहिस । जंगल मा हुआ-हुआ करइया आज गाॅंव आये हे। करिया बरन ला हेर के उज्जर बरन धर के। राउत मन तो जइसे कौआ अउ बगुला बर नही ..ऐखरे बर दोहा पारिस। आज दुनो एक दुसर के हाथ ला धरके मसकत रिहिस। आदिवासी के हित के गोठ करइया मन, जल जंगल जमीन बर न्याय के गोठ करइया मीठलबरा मन के कथनी अउ करनी ला जान डारे रिहिस। सड़क पुल पुलिया बिजली स्कूल कालेज बर बाधा बनइया ला जान डारिस।….असल गोठ ला जान डारिस।

           हमर संगठन हा पातर होवत हावय । अपन संगी संगवारी मन ला दल में जोर। पुलिस प्रशासन हमर कुनबा ला नाश करत हावय। घर लहुटे अभियान लोन वर्राटू हा कनिहा ला मुरकेट डारे हावय। लोगन मन घला अब नइ डर्रावय। नाच गान दल ले प्रमोशन होगे तुंहर । परीक्षा के घड़ी आवय । अब गाॅंववाला मन के बीच एसो के देवारी मा अइसे फटाका फोड़ कि रायपुर भोपाल दिल्ली अउ देश के कोना कोना तक आरो जाना चाही। इही तुंहर परीक्षा आवय । इही तुंहर  टास्क आवय।

              अइसना तो केहे रिहिस ओखर आंका हा। ओखरे सेती अइसे बम धरे हावय लुका के, कि काछन देखइया , गोबर्धन खुन्दवइया गाॅंव भर दहल जाही। हाहाकार मच जाही। ये चार आँखी बलराम अउ फुलगजरा के आय।

               सिरिफ बलराम अउ फुलगजरा भर नइ आये हे आज । ओखर संग आये हे सोमारू, आयतु, मड़का, श्रीनिवास, वेंकटेश, कुमारलू देवारी मनाये बर। लाखो करोड़ो इनाम हे ऐखर मन उप्पर प्रशासन डाहर ले। नेवरिया आय न नेवता देये हे, देवारी के कांदा कोचई खाये बर। देवारीच देखे बर नइ आये हे ऐमन। बम के धमाका सुने बर घला आये हावय। राउत मन नाचत हे फेर उछाह सब के सिकल मा हावय। बुढ़वा-जवान, लइका-पिचका, जीव-जिनावर सब मगन हावय। सब गमकत हावय। फटाका बर बिटोवत लइका। मंद महुआ पीके भकवाय कका, खोड़खोड़ी खेलइया टुरा मन, ठेठरी खुरमी बनावत दीदी मन । हाथा देवइया राउताईन मन ,पान खा के इतरावत नाती बबा…..।


सब मर जाही … ? सिरतोन सब मर जाही…? सब जुच्छा हो जाही …? सब सुन हो जाही… ? सब मरे ले आदिवासी ला अधिकार अउ न्याय मिल जाही..? ये गाॅंव के सिधवा मन के का कसूर …? फूल कस लइका काही नइ जाने…ओखर का होही….?


फुलगजरा अउ बलराम ला ओखर नान्हेंपन सुरता आगे । जम्मो कोई नत्ता गोत्ता लरा जरा लागत हावय कका काकी दाई महतारी दीदी बहिनी …। …गुने लागिस । ….जी कांप गे। रुआ ठाड़े होगे।


बाजा बाजत रिहिस। राउत मन नेवरिया घर तीर अमरगे।


“फोड़ो रे फटाका मोर बैरी बड़का दाऊ के कान फूटना चाहिये। बीच बस्ती ला घला जानबा होना चाही नेवरिया घर के सोहाई बँधागे अइसे।”

नेवरिया आय। अपन अंगना मा राउत मन ला नचवाये लागिस। सौ सौ के गड्डी ल फेकिस अउ कोठार के कुंदरा कोती चल दिस । सोमारू आयतु मड़का श्री….. जम्मो के उहिन्चे डेरा रिहिस। बलराम अउ फुलगजरा घला गिस टिफिन ला धरके । दुनो के हाथ मा रिहिस टिफिन, अउ टिफिन मा रिहिस देवारी के कलेवा कांदा कोचई बरा सोहारी सलगा बरा ठेठरी खुरमी ……।

राउत मन बिधुन होके नाचत हे अउ दोहा घला पारत हावय ।


अरा ररा रे…….

सोहाई बनायेव अचरी पचरी, गांठ दियो हर्रेइया।

जउन सोहाई ला छाटही, ओला लपेट लागे गोर्रैइया ।।


बलराम आय दोहा परइया। वहू तो आय गहिरा टूरा। सुकधनिया (सूपा मा धान दीया अउ सोहाई मड़ाये रहिथे ।)मा माड़े धान मा गोबर के लोई ला लोटाइस अउ कोठी मा सुघ्घर छपाये हाथा के बीच मा थोपिस। सोहाई ला निकाल के करिया गाय ला सोहाई बाँधत पारिस दोहा।

फट फट फट फट …..धड़ाम…। नेवरिया के दुवारी मा फटाका फूटत रिहिस फेर…. सब कोई देखे लागिस कुंदरा कोती ला। जतका फटाका फूटत रिहिस ओखर ले लाख गुना जादा आरो ले कोठार के कुंदरा मा फुटिस …फटाका… बमफटाका। चीख चित्कार करलई के आरो आइस सोमारू आयतु श्री …….सब्बो कोई के ।

ये बड़का फटाका सही जगह मा फूटे हावय आज । 


फुलगजरा मुचकावत रिहिस। ओखर सिकल मा गरब रिहिस कर्तव्य के परीक्षा मा पास होये के। चाक्कर छाती मा गुमान रिहिस बलराम ला गाॅंव लहुटे के।


दुनो के नजर अटकगे करिया गाय मा। कतका सुघ्घर लागत हावय …चपर-चपर दूध पियत बछरू …। पीठ ला चटर-चटर चाटत गाय …अउ गाय के गर मा बंधाये सुघ्घर दिखत सोहाई….। सोहाई मा साजे चाक्कर मोर पंखी…अउ मोर पंखी मा सतरंगी ….चांदा । अउ चांदा मा दुनो के …..गमकत सोहाई कस सपना। अउ सपना मा….।


-चन्द्रहास साहू

(द्वारा श्री राजेश चौरसिया)

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