*करु भात*
(कहानी)
बुधारु अउ समारु सग भाई रिहिन।फेर का करबे।दस डिसमिल जमीन के झगरा हा दूनों झन ला बांटे भाई परोसी बना दिस।बुधारु अउ समारु दूनों झन मर खपगे।फेर आज ले दूनों परिवार के बीच गोठबात बंद हे।उंकर बेटा मन घलो उही दुश्मनी ला निभावत उमर पहात रिहिन।बुधारु के बेटी रमेसरी अउ समारु के बेटी निर्मला संगे मा खेलिन कूदिन अउ पढ़िन।समय के मुताबिक दूनों के बर बिहाव घला होगे।दूनों झन अपन अपन ससरार चलदिन।निर्मला ऊमर मा रमेसरी ले महिना भर के छोटे रिहिस।घात मया रिहिस दूनों के बीच।फेर का करबे।जमीन जयदाद के झगरा दूनों झन बर बैरी बनगे।
हर बच्छर तीजा के बेरा मा दूनों झन आवय।फेर भाई मन के डर में एके जघा नी संघरे।
कलेचुप मौका पावय त संगी सहेली मन घर अपन अपन मन के पीरा ला गोहरावय।
रमेसरी अउ निर्मला एसो घला तीजा आय हवै।फेर एसो के तीजा मा निर्मला कुछ ठान के आए रिहिस।ओहा अपन बड़े भाई संतोष ला कहिथे-भैय्या!हमर ऊमर हा खियात हे।कतेक दिन काकर जिनगानी रही।कोनो नी जानय।धन दोगानी आवत जावत रही।फेर बेरा नी लहुटे।तोर से बिनती हे भैय्या!!ए जिनगी ला दुश्मनी मा खुवार झन करौ। में हा एसो रमेसरी दीदी ला करु भात के नेवता देबर जाहूं।मना झन करहू काहत निर्मला ओकर गोड़ मा गिरगे।
निर्मला के गोठ ला सुनके संतोष के हिरदे पसीजगे।ओहा ओला उठाइस अउ हां कहत अपन सहमति दे देथे।
संझौती बेरा निर्मला हा रमेसरी तीर ओला बलाय बर जथे ता ओकर बड़का भैय्या ओला देखके अचरित मा पर जाथे।पांव परथे तभो मुंहू ले भाखा नइ निकलय।त निर्मला वहू ला उही बात कहिथे।जेन बात ला वो अपन सग भाई ला केहे रहिथे।
रमेसरी के आंखी ले निर्मला के गोठ ला सुनके तर तर आंसू बोहाय लगथे।रमेसरी के आंसू ला देखके भैय्या के आंखी घलो डबडबा जाथे।
निर्मला रमेसरी ला कहिथे-दीदी! मैं तोला करु भात खाए बर बलाए बर आए हंव!!
रमेसरी मुड़ ला हलावत निर्मला ला पोटार लेथे अउ अपन भैय्या कोती देखथे त ओहा मुड़ ला हलावत स्वीकृति दे देथे।संझौती बेरा दूनों बहिनी कई बच्छर बाद दूनों घर मा करु भात खाथे।एसो के करु भात उंकर बर थोरको करु नइ रिहिस बलुक अमरित बनगे रहय।
तीजा मनाए के बाद एसो दूनों बहिनी जोड़ा तीजा लुगरा धरके अपन भाई भतीजा ला आशीष देवत हाॅंसत गावत लहुटिन।
रीझे यादव टेंगनाबासा
छुरा
No comments:
Post a Comment