Saturday, 12 September 2026

लघुकथा ) बसंत के अगोरा

 (लघुकथा )


बसंत के अगोरा 

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परोस के सियान कका जेन हा रोज संझा अपन चौरा मा बइठे दिख जय वो हा चार -पाँच दिन होगे दिखत नइये।जब ले वोकर छोटे बेटा बसंत हा अपन बाई संग शहर मा रोजी मजूरी करत रहे ला धर लेहे तब ले कका हा जादेच कमजोर दिखे ला धर लेहे।मोला लागिस के हो सकथे तबियत खराब होही। अइसे भी वोकर उमर अस्सी बछर ले आगर होवत हे । 

 मन नइ माढ़ीस त कका -कका कहिके आरो देवत वोकर घर गेयेंव। भीतर परछी कोती ले कका के अवाज अइस --"आव बेटा आव। कोन मोहित अच गा।आव बइठ।"

हव कका कहिके पाँव परेंव अउ कुर्सी मा बइठत पूछेंव --"तबियत उबियत सब बने बने हे न कका। चार पाँच दिन होगे दिखत नइ रहे। गाँव गौँतरी चल दे रहे का?"

"कहाँ गाँव गौँतरी जाहूँ ग। अब तो सक नइ चलय। अउ तबियत के बात हे त अब का बने अउ का गिनहा।भगवान हा अब हम दूनो परानी ला लेग जतिस तेने बने हे।"

"नहीं नहीं अइसे मत काह कका तोर आशीर्वाद हमन ला मिलते राहय। का होगे तेमा अतेक उदास हस "--मैं पूछेंव।


"काला बताववँ बेटा -तैं तो सब जानते हस। दू दी औलाद रहिके तको हमन बेऔलाद बरोबर हाबन। बड़े बेटा बलकरण हा बीसो साल होगे जब ले अपन ससुरार मा जाके घरजवँई बने हे, एती हिरक के नइ निहारय। उहें के पुरता होगे। छोटे बेटा बसंत हा तको चार महीना होगे कानपुर कमाये-खाये ला गेहे। झन जा कहिके कतको बरजेन फेर नइ मानिच। वोला बरगलाये मा बहू के हाथ हे। हमन ला दू मूठा राँध के देये मा वोकरो अदरमा फाटगे।  बेटी बेचारी हा हप्ता पंदरही मा शोर संदेशा लेवत रहिथे। उही बिचारी हा का करही। वोकरो घर दुवार हे, लोग लइका हे, सास ससुर हे। हमन तो अब पाना डारा झरे पेंड़ कस ठुठवा -ठुठवी होगेन बेटा"--एक्के साँस मा हिरदे के पीरा ला कका हा बाहिर निकालत फफक डरिस।

मैं धीरज धरावत कहेंव -- तैं तो मोर बाप बरोबर हस कका । मैं भला का समझा सकहूँ फेर एक बात जरूर कहना चाहहूँ -- मौसम बदलत रहिथे कका। अभी पतझर हे त का होगे बसंत तको आही।"

"अब ये चला चली के बेरा मा बसंत ला अगोर के का करबो?पतझर ला नइ आना रहिसे"--भर्राये गला ले कका कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

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