Sunday, 13 September 2026

छत्तीसगढ़ी-व्यंग अजी----------।

 छत्तीसगढ़ी-व्यंग

    अजी----------।

रेडियो म एक ठन धारावाहिक देथे अजी सुनिये।सुनबे तेमे मन गदगद हो जथे।अजी सुनिये। कोनो मन लगाके गोठियाथे ताहन ते जान जा कोनो न कोनो खुशखबरी नहीं ते बुता जरूर हे।

          हमर घरवाली मुचकात -मुचकात किहिस अजी सुनिये,अजी सुनिये।मे अकचकागेंव आज सुरुजनरायण कदे डहर ले उवत हे भगवान। महूं कहेंव बोलो कहिये।वो न आज बड़ खुशी के दिन आय। घरवाली कहिथे वो न घर में आज एकोठन काकरोच नइ हे। महूं ह ठट्ठा दिल्लगी करत कहेंव थोड़ा बहुत समाचार,वमाचार, सोसल मिडिया देखेकर हो सकत हे जंतर-मंतर पहुंच गिस होही।ये हो घलो सकथे भई जब अमेरिका ले काकरोच आ सकत हे त हमर घर के घला जा सकत हे। फेर जंतर-मंतर के छोड़ दूसर जगा जाय बर एलर्जी हे। घरवाली अकबकागे कथे अई टार दई तहूं कईसे गोठियाथस ओसनो भला हो सकत हे।नाली ले किचन, किचन ले नाली इंकर ठऊर आय। काकरोच के दऊंड़ नाली तक।

            मे घरवाली ल समझावत कहेंव तहूं ह कुंआ के मेचका कस होगे हस जी।ये बेंदरा मन अब मनखे ल नी डरराय तईसे ये काकरोच मन हो गेहे।सब अपन- अपन बर लड़थे तईसे यहू मन लड़त हे।अऊ अपन हक बर लड़ना चाही।वह खुन कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं।देश के कोना -कोना ले काकरोच सकलाय हे। कतनो मन ल देखबे ते अईसे लागथे कोनो फ़ैशन शो के प्रतियोगीता चलत हे।फैशन शो के रिकार्ड ल इही मन टोरत हे।हमर परोसी पढ़ें लिखे लईका फुहरे फुहर गारी देत राहय मे कहेंव कुछु लाज सरम हे? तैं तो काकरोच मन ले गे गुजरे हस। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय। संस्कार घलो जरुरी हे।

          

              घरवाली कहिथे हमन तुंहर बर तीन -तीन दिन ले तीजा उपास रहिथन थोड़को हियाव चिंता नी करो जी। महूं कहेंव रात के बारा बजत ले करूभात अऊ फरहरी म दमोर के घलो खाथो जी। फेर तुमन काकरोच के आगू म फेल हो।ऐमन तो महिना भर झेल देथे।

सोंचथों ओकर घरवाली के उमर कतिक लम्बा होही।उंकर देखा सीखी मे घरवाली मन आमरन अनसन झिन कर दे आज ले तीजा के उपवास पतिमन करही। हमको चाहिए आजादी, हम सबको चाहिए आजादी,हम लेकर रहेंगे आजादी?


        घरवाली फेर चिल्लाय लगिस अजी सुनिये, अजी सुनते हो। महूं मसका लगात कहेंव बोलो कहिये? घरवाली कहिथे तब तो न आज ले हमर घर हिट स्प्रे के पईसा बांचही।उही पईसा ल थोड़िक- थोड़िक सकेल पुरो के लईका ल डाक्टर बनाबो।गोठ तो बने गोठियावत हस फेर हम लईका ल काकरोच असन डाक्टर नी बनान।जेमे संस्कार नाम के कोनो गुन नइ हे।जिंकर खाय के दांत अलग अऊ देखाय के दांत अलग।जे विरोध के आंड़ मे देश के मान सम्मान ल गिराय। विरोध करई अऊ विद्रोह करई अलग अलग बात आय।वो तो अच्छा हे हमर देश म बोले के आजादी हे।अऊ बोले के मतलब ये नई हे कुछ भी बोलो।

फ़ालतू बस नो बकवास।


       फकीर प्रसाद 

        साहू फक्कड़ 

           सुरगी ✍️ 🙏

No comments:

Post a Comment