. *करु लागत हे रे! ....* (लघुकथा)
- डाॅ विनोद कुमार वर्मा
वोहा रात साढ़े आठ बजे काम ले थके-मांदे वापिस द्वारी के भीतरी कदम नि रखे पाय रहिस कि अम्मा के आवाज सुनाई परिस- ' बेटा, तोर बाबू पाछू के द्वारी मा बोतल ला धर के बइठे हे। कतको कहँथव फेर नि मानत हे। जा ओला थोरकुन चना-मुर्रा दे आ! '
पाछू कोती के द्वारी मेर गिस त ददा चिल्लावत रहे-' करु लागत हे रे.... करु लागत हे! थोरकिन चना-मुर्रा तो लान दे ..... '
तइसने जोरहा लात परिस त सीढिया ले नीचे गिरके पाँच फुट दूरिहा फेंका गे! - ' साला! ..... एही सिखाय बर चार ठिन लइका पैदा करे हस! '
ओती अम्मा के आवाज आइस- ' का गिर गे बेटा! '
' कुछु निही अम्मा! एक ठिन कुकुर ला लात मार के भगाय हँव! '
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