*चाहा पानी के चक्कर*
( ब्यंग)
चाहा पानी पिये पियाय ले मनखे के मान सम्मान बाढ़थे। घर मा आए मेहमान ला बिना चाहा पानी के बिदा कर देय, माने चार जगा फजिहत होना तय हे बने बनाय इज्जत के भाजी भाँटा होना ही हे। आदर सम्मान के सँगे सँग एकर ले आलसीपन सुस्ती भागथे। एकर यहू प्रभाव हे कि बात आसामी चाय शक्कर दूध अउ रेड लेबल के होतिस तौ कोनो बात नइ होतिस। बात हरा गुलाबी पत्ती गाँधी छाप चाय के हे। ये चाहा समाज मा अइसे जगा पोगराय हे जइसे गाय गरू के देंह मा गोचरनी। स्थिति सम्मानजनक हे। काबर कि भ्रष्टाचार घूसखोरी केहे मा अभद्रता पना लगथे। अइसन सम्मान के साधन ला शिष्टाचार अउ लोकाचार के भाषा मा चाहा पानी ही कहना उचित हे। चुलहा के डबकल चाय मा पेट भरे ना पुरखा तरे। फेर जौन चाय एक जेब ले डबक के दूसर के जेब मा ढ़राथे, ओमा पेटो भरथे अउ पुरखा तरथे। हाले हाल तन मन मा उमंग भर देथे।
एक झन सादा सिधवा आदमी चाय के मतलब सीधा सहज चाय ही समझ पाय रिहिस, तेकर सेती चार महिना ले चालिस चक्कर सरकारी दफ्तर के लगा के थक गेय रिहिस। ओकर काम आगू बढ़बे नइ करे। कभू बाबू नइ मिले मिलबे करथे तौ वो फुरसत मा नइ रहय। भले भितरी मा फेसबुक मोबाईल वाट्सअप मा खुसरे रहय। अउ फेर ससुरारी फोन मा डेढ़ घंटा ले लग ही सकथे। उपर ले बाबू के बाबू मलखान सिंग माने चपरासी जी जेकर तिर तरस खाय के कोनों गुंजाइश नइ रहय। मँझोत मोहाटी मा यमदूत असन मेंछा टेंवत गुर्राथें, कि साहेब आज ब्यस्त हे जा काली आबे। अइसन साहेब मन के सटका ले तो भगवान बचाय। ये मन सब दया धरम सेवा परोपकार ला घर के खूँटी मा टाँग के आथें। चार महिना होगे बाबू चक्कर लगावत हवँ। बस अतके भर कहि दे वोमन समझ जाथें कि अब कुकरी हलाल होय बर तइयार हो जाही। अइसन मा चपरासी कड़क सिंग जी परोपकारी के मैली चादर ओढँके धीरे से कही, तोर काम तो हो जाही फेर चाहा पानी के लाने हस? चाहा पानी के सहज अरथ ला समझने वाला आदमी बहुत देर मा समझ पाथे कि चाहा पानी काला कथे। जेकर तिर सौदा बाजी भाव बियाना करे के गुंजाइश नइ रहय। जे कप बोल दिस वोला पियाना ही हे। चपरासी से लेके उप्पर नीचे वाले सब एके मेड़वार मा फँदे रथें। कभू कभू बरी पूट नून डारे के जरूरत नइ रहय। एक झन के हाथ मा केटली थम्हा दे, वो मन आपस मा समझ लेथें। अब के बेरा मा चाय पियाने वाले के घलो भीड़ देखे बर भिलथे। फेर जेकर चाहा मा जादा शक्कर गूड़ लगे रथे वोकर काम आगू निपटथे। यहू एकठन कायदा आय अइसन दसा मा अपन हैसियत ला तमड़ अउ बिना गूर शक्कर के चिंता के आगी मा डबकत रह। तोर बगोनी जरे चाहे पानी अँउटे, कोनो ला लेना देना नइहे। सरकारी गैर सरकारी थाना कछेरी पंच पटवारी साहेब चपरासी सब ला चाहा पानी के आदत परे हे।। ओइसे देखे जाय तौ ये काम के शुभारंभ हमरे कोती ले पहिली शुरू होय हे अइसे लागथे। लेव ना साहेब मोर काम ला जल्दी निपटा देवव भले चाहा पानी पी लेहू जी। बस वो दिन ले साहेब समझगे कि जतके काम लटकाबे ओतके चाहा पानी मिलही। तब फेर एक ठन परम्परा के चलन होगे शुरू । अनुभवी सलाहकार मितान मन समझाथें घलो कि, रोज रोज के चक्कर ले बाच जबे मितान, एको झन ला पकड़ के चाहा पानी के जुगाड़ कर। नइते जिनगी भर रेंगतेच रबे।
अब उपर वाले ला पकड़े बर फेर कोनो दूसर ला पकड़, फेर ओकर बर चाहा पानी। कभू कभू अइसे लगथे कि ये चाहा पानी हर ही भ्रष्टाचार के जन्मदाता आय। ये नइ रतिस तौ काकर नाम लेके भ्रष्टाचार ला आगू बढ़ातिन। ऊँकर मजबूरी ये हे कि बिना चाहा पानी के चपरासी असन पद ला घलो हासिल नइ कर पाये हें। अउ जे मन चाहा पानी पियाके नौकरी लगे हें तेन मन का पिये बर छोड़ दिहीं। तोला अपन काम बनाना हे तौ तन चुरो खीसा डबका गहना बेच काम के हिसाब ले खेत गिरवी रख अउ बने लेवनाही गाय के दूध असन सुहाती चाय ढरका। थूँक चाँट चाँट के गिन गिन के सवाद लेही तब कहूँ जाके तोर मामला आगू बढ़ही। नही तौ कतको दरखास फाइल धुर्रा मा लदकाय हे ओमे एक ठन तोरो नाम के रही। ओइसे भी सरकार हर सबो दफ्तर मन मा नीला हरा डब्बा अउ झाड़ू देके रखे हे। आखिर सरहा कागज ला कब तक बोहे रहीं।
हम कथन अतका बड़े बाबू जेला सरकार झोरा भर भर के देवत हे वोला चाहा पानी के का जरूरत। फेर भइया ये हमर मान्यता प्राप्त परम्परा बन चुके हे तब तो निभाय ला परहीच। दूसर ये कि आज के मँहगाई के बेरा मा तनखा के पइसा होथे कतिक? बाई के जेवर गहना मँहगा कपड़ा मँहगा गाड़ी लइका बर मोबाईल फटफटी नइये अउ बड़का बँगला असन घर नइये माने बाबू के नौकरी पाना सरम के बात हे। ये अलग बात हे कि जतका खरचा मा इँकर कुकुर पलथे ओतका मा तोर दू झन लइका पढ़ई कर लिहीं। फेर इन मन सुक्खा तनखा भरोसा कुछ नइ कर सकय। ईमानदारी के काढ़ा पीबे तब उपर नीचे वाले बाबू मन बंगाला कस पिचक के टिकन नइ देवय। साल मा चार छगा ट्रांसफर तबादला के डर ले ये परम्परा के पालन करना घलो परथे। अउ ये नौकरी घलो बिना केटली ढरकाय मिले नइये। दू एकड़ खेती जे गिरवी हे वोला तो घलो छोड़ाना हे। तब भइया हो सबो के मद्देनजर चाहा पानी पीना पियाना जरूरी हो जथे।
सभ्य अउ उन्नत जीवन जिये बर हे तौ शक्कर के मात्रा बढ़ाके मुँहूँ खोलके माँग। जेन जतके जादा चाय पानी पीथे वोला वोतके जादा समाज के सफल अउ सभ्य मनखे माने जाथे। तौ सबले बढ़िया पी फूँक फूँक के पी थोर थोर किस्त मा पी। राष्ट्र निर्माण मा एकाद कनी ईमान डोल ही जाही तौ का हरजा हे। एकर ले आम आदमी ले संबंध तो बने रही। आज समाज अउ आदमी आशीर्वाद ग्रस्त हे कि तुम दवा पानी दारू पानी अउ चाहा पानी के चक्कर मा अपन पानी निचोवत भर रहव, बस।
("का के बधाई" ब्यंग संग्रह ले)
राजकुमार चौधरी "रौना"
टेड़ेसरा राजनांदगांव।
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