(लघुकथा )
असहयोग
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सब झन जल्दी में हें। एनाउंस होगे हे। ट्रेन आने वाला हे। टिकट बाबू हा बार बार काहत हे- लाइन से आओ--लाइन से आओ फेर कोनो मानयँ तब न। एक झन नवजवान हा दू-चार झन ला धकियावत सुट ले आगू मा पहुँच के कहिस-- "एक टिकट रायपुर।"
टिकट बाबू हा कन्नेखी देखत कहिस-- "पंद्रह रुपिया दो।"
"ये दे सौ के नोट तो दे हँव ना"-- वो हा कहिस।
" मेरे पास चिलहर नहीं है।बहस करके टाइम खराब मत करो--हटो---दूसरे लोगों को टिकट लेने दो "--टिकट बाबू कहिस।
"वाह बिना टिकट लेये कइसे हट जहूँ। तोला चिलहर रखना चाही न"--वो नवजवान रोम्हीयावत कहिस।
"पढ़े लिखे जैसे दिखते हो और मूर्ख जैसे बहस कर रहे हो। सब बड़े बड़े नोट ही दोगे तो मैं कहाँ से छुट्टा लाऊँगा? असहयोग ही करोगे कि कभी सहयोग करना भी सीखोगे"- अतका कहिके वो फटरस ले खिड़की ला बंद कर देइस।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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