भुइयाँ के सिंगार- पावस ऋतु अउ हम
जेठ के लकलकावत धाम म घरती दाई के कंठ सुखा जथे, खेत-खार दनगरा खात पियासे रहिथे, रुख-राई के डारा पाना-झुलस के मुरझा जथे। मनखे होवय ते जीव जनावर सबो के नजर अगास कोती निहारे ले धर लेथे। कब आही बरखा रानी-
अखाढ़ के छाँव पड़ते-अगास म धीरे-धीरे करिया-करिया बादर घुमड़ के आथे, पुरवाई के ठंड झकोरा देख चिरई-चिरगुन चहचहावत अपन-अपन खोंधरा (बसेरा) कोती लहुटे ले धरथे । कड़कड़ावत बादर गरजथे,,, बिजली लउकते,,,अउ-देखते ही देखत बरसा के पहिली बूंद - धरती दाई के कोरा म गिरथे... वो पहिली बारिस के बूंद संग सूखाय धरती दाई के चेहरा मुसकाय ले धर लेथे, माटी के सौंधी-सौंधी खुशबू चारो मुड़ा सराबोर हो जथे। अइसे लागथे जइसन अपन प्रिय संग बड़ दिन बाद भेंट होवत हे।
हमर भुइयाँ बर पावस-हमर मनौती के पूरा होय कस आय।मनखे के आस किसान के उम्मीद। खेत के हरियाली, जिनगी के खुशहाली ,,नवा उमंग लुकाय रहिथे, काबर इही नव सिरजन के बेरा तको होथे।अषाढ़ के पानी खेती किसानी बर अमृत बरोबर आय, ये पानी ले खेत सिजथे, बीजा अंकुरित होथे, धान ह पीका फेकथे,किसान के आँखी म फेर सपना चमके ले धरथे । काहन त पावस ऋतु हमर बर सिर्फ एक मौसम भर नोहय, ये हमर जिंनगी आय,हमर आधार हमर प्राण आय। गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के किष्किंधा कांड म घलो बड़ सुंदर ढंग ले कहे हे,
बरसा काल मेघ नभ छाए
गरजत लागत परम सुहाए
दादुर धुनि चहुँ दिशा सुहाई
वेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई
याने अगास म बादल गरजथे त अइसे लागथे जइसे प्रकृति अपन मया के गीत गावत हे, चारों कोती मेंढक दादुर के टर्र-टर्र के आवाज अइसे लागथे जइसे गुरुकुल म बटुक मन वेद पाठ करत हे।बरसा के ये बूंद मौसम भर म परिवर्तन नइ लावय बल्कि कवि ल अपन कविता गढ़े के प्रेरणा देथे।कतका अद्भुत जादू हे ये बरसा के जल म प्यासे धरती के कोरा म नव अंकुर फूटथे धरती महतारी चुकचुक ले श्रृंगार करे हरिहर चुनरी लहरावत रहिथे ।तब प्रेमी युगल के मन प्रेम गीत गुनगुनाय बर मचल उठथे।पुरवा के झोंका जब तन मन से टकराथे त अपन प्रियतम ले मिले के चाह अउ बाढ़ जथे। त साहित्यकार कहाँ पाछू रइही।साहित्यकार के कलम कागज म अपन शब्द ले सोनहा रचना रचे बर अइसे तैयार रहिथे जइसे अगास म इन्द्रधनुष पानी के बूँद अउ सूरज के रोशनी संग अठखेलि करत रंग बिखेरत हे।
याने बरसा जीव जन्तु पेड़ पौधा पूरा चराचर जगत बर खुशी के संदेशा लेके आथे।
बरसा के बिना अनाज उत्पन्न नइ हो सकय, अउ अनाज हमर जिनगी के सबले जरूरी जिनिस आय । तेखर सेती किसान बेसब्री ले बरसा के इंतजार करथे-ताकि फसल उगा सकय, अउ साल भर बर अनाज के सकेला कर सकय । फेर कहूँ वोला बरसात के पानी नइ मिलही त का होही,कभू बरसा जल्दी त कभू देरी,कभू जादा त कभू कम होथे, किसान हलाकान जरुर होथे फेर,,,
हिम्मत नइ हारय अउ फेर नवा उम्मीद संग बीजा बोथे कि ओखर फसल लहलहाही, जब हम अपन तीर तखार के नदिया नरवा, जंगल प्राकृतिक जगा ल-देखथन - त पावस के सुधरई के दृश्य- एकदम जीवंत हो उठथे-बस्तर के चित्रकोट, तीरथगढ़ जलप्रपात, सप्तधारा जलप्रपात ल बरखा म उफनावत झरझर-झरझर करत गिरत देखबे त अइसे लागथे - जइसे महादेव के जटा ले साक्षात गंगा मैया धरती म उतर गेहे। पहाड़ मन ल, बादर,, छुवत रेगथे, त जंगल खेत-खार, डीह-डोंगर सबो जगा हरियाली के चादर विछ जथे... तभे तो कहिथन न - नजर जिंहा तक जाय -धरा बस धानी लागय।
पहिली अउ अब म बेरा के संग - फरक आय हे- पहिली जब झमाझम पानी गिरय, तरिया -नरवा लबालब भरे राहय, नदिया पूरा आजय कई ठन गाँव तक पानी ठेलाय राहय- थोकन पानी गिरय त किसान मन के नांगर-बक्खर चालू हो जय, पानी बने गिरतीस तहाँ बिहिनिया ले संझा तक रोपा-बियासी के बुता म लगे राहय.खेत म चहल-पहल राहय कोनो ररर काहत त कोनो गाना गावत,हांसी ठिठोली करत रमे राहय।
सावन म घर-घर झूला बाँधय, नोनी - बाबू मन हाँसत खेलत झुलत राहय, माने संघरा खुशी मनावत राहय ।
आज समय बदल गेहे अब ट्रैक्टर ले खेती के काम होथे, मशीनी युग म काम बुता आसान जरूर होईस । फेर पहिली जइसन संघरा काम करे के एकता नइ दिखय, अपन सुख-दुख बाँटय, गीत गावय- वो सब अब दुरियावत जात हे।
आज देखबे त नरवा - तरिया बउली के पार म जगा जगा कांक्रीट के सड़क अउ मकान बनगे हे। जमीन के भीतर पानी सोखावय नही अब पानी गिरे ले जेन माटी के.सौंधी खुशबू आवय तेनो कमतीयावत जात हे।
मोबाइल,टी वी अउ कम्प्यूटर के समे म लइका मन सावन के -झूला, गेड़ी अउ गांव के खेल मन ल बिसरावत जात हे।
फेर अषाढ़ सावन के रिमझिम पानी म ,जेन वो बखत के सुरता हे, तेमे ओ बेरा के मनखे जरूर बुड़ जथे – काबर माटी संग जुड़ाव अउ मया कभू नइ बिसरावय
पावस हमर छत्तीसगढ़ संस्कृति ल जगाथे हमर तीज तिहार के अगवई करथे - काबर सावन म ही पहिली बड़े तिहार हरेली आथे-
ए-दिन किसान मन अपन खेती-किसानी के औजार, नाँगर गैती, रापा कुदारी, हँसिया, बसुला सबो खेती के काम अवइया औजार के पूजा करथे, ए तिहार हमर खेती किसानी, प्रकृति संग लोकजीवन के जुड़ाव के गहिर चिन्हारी आय ।नोनी-बाबू मन गेडी चढ़ते झूला झूलथे चारों कोती लोकगीत, लोकधुन के उछाह दिखथे, गुरहा चीला, फरा, बोबरा रोटी-पीठा के महक ले घर-अँगना महक जथे।
हमर संस्कृति म तिहार सिरिफ मनाय नइ जाय- जिये,,जाथे।
असाढ़ शुक्ल देवसुतनी एकादशी ले, कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी तक के समय ला चातुर्मास केहे जाथे ।
याने ये चार महिना पहिली के जमाना म आवागमन के जादा-सुविधा नइ रिहिस, सड़क नइ रिहिस, बरसा म एक गाँव ले दूसर गाँव जवई बड़ कठिन हो जय, नदिया खड़ भर चलत राहय पुल नइ रिहिस डोंगा सहारा राहय। तेखर सेती साधु संत, धर्मात्मा मन एके जगा रहिके साधना,पूजा पाठ अउ लोककल्याण के काम म समय बितावय। धीरे-धीरे ये चातुर्मास संयम, साधना अउ आत्मचिंतन के रूप म स्वीकारे गिस।काबर इही बेरा मौसम परिवर्तन के सेती कई ठन बीमारी तको झपावँय।त ये बेरा मनखे अपन खान पान, व्यवहार अउ दिनचर्या म संयम रखे के प्रयास करथे।
-प्रकृति चातुमार्स म इही संदेश देथे- कि जइसन पावस के पानी ले धरती दाई के धुर्रा - धोवा जथे अउ प्रकृति हरिया जथे ओइसने संयम साधना अउ आत्मचिंतन ले मनखे के भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार, धीरे-धीरे धोवा सकत हे ।बरसा धरती के प्यास बुझाथे, अउ चातुर्मास मनखे के भीतर के निरसता ल प्रेम, भक्ति अउ सदभाव ले जोड़थे।-
ये महिना हमन ल प्रकृति संग तालमेल बइठा के जीये के सीख देथे, बाहिर म बरखा धरती के प्यास बुझावत रहिथे-अउ भीतर के साधना ले मनखे के मन सींचत रहिथे । अउ जब हम अपन भीतर झाँकथन, त ये जल के बूंद-हमन ल जिनगी के कतको गहिर बात समझाथे। ये बरसा के एक-एक बूंद कोनो न कोनो संदेश ले के आथे।
थोकन सोंच के देखव, कहूँ बरसात नह होही त, धरती के जल स्तर सूखा जही , धरती म पीये के पानी नइ बाचही। हम सब मनखे, पेड़ पौधा, जीव-जंतु, पशु-पक्षी के का होही। पानी बिन जीवन संभव नइये केहे भी गेहे " बिन पानी सब सून
अउ दिन के दिन बाढ़त पानी के समस्या के एके निदान-- हे "पानी के बचत ।अगास तो पानी बरसाय म कोनो कमी नइ करत हे। जरूरत हे बस हम ला ओला सहेजे के पानी के हर बूंद कीमती हे। "जल ह जीवन ये’ अइसे हम काहत अउ सुनत-रहिथन, फेर मानथन कतका। का हम जीवन असन जल के रक्षा करथन- पानी अभी बरसा म कतेक भरे रहिथे- फेर व्यर्थ -बोहा जथे- अउ फेर गर्मी में इही समस्या । कहूँ अभी भी हम पानी ल नइ बचाबो त अवइया पीढ़ी एक-एक बूंद पानी बर तरसही। पानी ह जीवन के आधार ये,अउ वोला-बचाना हम सबो के नैतिक जिम्मेदारी ये।काबर" जल हे त कल-हे। पानी बिगर जिनगी के कल्पना नइ कर सकन त हम सब ला एखर बर अपन-अपन तरीका ले प्रयास करना हे, जतका जरूरत है ओतके पानी बउरन, घर के पानी ल घर म अउ खेत के पानी ल खेत म छेकन याने - वाटर हार्वेस्टिंग के निर्माण, या गड्डा सोखता बनवा सकत हन,हर मनखे एक पेड़ लगाय के नारा ल जिनगी के जरूरत समझ के पेड़ लगावन
पावस ऋतु तको इही गहिर सीख देथे -जिनगी म कतको समस्या आवय, फेर ओकर बाद सुख के बरसा जरूर होथे। बादर करिया-करिया आथे फेर ओकर कोरा म अमृत कस पानी रहिथे । रात अँधियारी होथे, फेर बिहिनिया उजास जरूर आथे
पानी के बूंद जब धरती म गिरथे, त ओ कभू भेदभाव नइ करय, राजा के खेत म घलो बरसरथे,गरीब के खेत म घलो। प्रकृति सब ल बराबर देथे।
सूरुज सब ला रोशनी देथे,
चंदा सब ला शीतलता बरसाथे।
प्रकृति के मया म, सबो प्राणी सुख पाथे।
धरती सबके बोझ सहिथे सब बर मया लुटाथे।
प्रकृति कखरो बर भेदभाव नइ करय सबो ल साँस देथे ।
जइसन धरती पानी ल अपन भीतर समो के अउ पूरा संसार के प्यास बुझाथे, ओइसने हमन ला घलो अपन जिनगी -म दूसरो के काम आवन अइसे भाव रखना चाही।
जइसे पावस म भुइयाँ जी उठथे, खेत खार मुसकाथे, नदिया नरवा गीत गुनगुनाथे, रुख-राई हरियाथे, किसान के आँखी म आस जागथे, अउ जिनगी म सबके खुशियाँ आथें।
समे बदल गेहे, खेती के तरीका बदल गेहे, जीवनशैली रहन सहन बदल गे है- फेर
माटी के मया आज घलो ओइसने हे।
बरसा के पानी आज घलो ओइसने हे।
अउ पावस संग हमर मन के नता आज घलो ओइसने गहिर हे।
त आवव ये पावस ऋतु म हमू मन एक संकलप लेवन
धरती दाई ल हरियर राखबो,रुख राई लगाबो, जलस्रोत ल बचाबो,अपन परंपरा संस्कृति ल संजोबो।
धरती हरियाही त जिनगी सबके मुसकाही।
पानी के हर बूँद सहेजे ले,अवइया पीढ़ी सुख पाही।
पावस ऋतु सिरिफ मौसम भर नोहय ये धरती ,,जीव जन्तु सब बर नव जीवन आय हमर संस्कृति के सुवास,हम मनखे के धड़कन आय।
संगीता वर्मा
अवधपुरी रिसाली भिलाई
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