Friday, 5 March 2021

नारायण लाल परमार (भावानुवाद--चोवा राम 'बादल')



*गद्दार कौन*

नारायण लाल परमार

(भावानुवाद--चोवा राम 'बादल')


नवलगढ़ राज म ये रिवाज तइहा ले चलत आवत रहिस हे के दशहरा तिहार के दिन बहुत बड़े मेला भरावय। वो दिन राजमहल ल खूब सजाये जावय अउ प्रजा मन यथाशक्ति राजा ल भेंट देवयँ।  राजधानी मानिकपुरी म भारी उत्साह राहय।सचमुच नगर ह दुल्हिन जइसे सजे-धजे दिखय। दूरिहा-दूरिहा के नामी नाचा अउ संगीत मंडली मन सकलाकें कार्यक्रम देवयँ। रामलीला तो होबे करय। 

एक साल भेंट अतका चढ़िस के राजा रामशाह ह अचरज म परगे। वोकर राज पुरोहित पंडित रामभगत ह राजा के बहुतेच बड़ाई करत वोकर महिमा ल भगवान रामचंद्र जइसे बताये ल धरलिस। वो ह एहू कहे ल धरलिस के पूरा संसार म कोनो राज अइसे हे जिहाँ शेर अउ बकरी एके घाट म पानी पिथें त वो सिरिफ नवलगढ़ राज आय।

  राजा जी सुनके अबड़ेच खुश होइस। पंडित रामभगत ल वो अपन राजपुरोहित ले जादा दोस्त जइसे मानय। खुश होके राजा ह पंडित जी ल अबड़ कस सोन के मोहरा भेंट करिस।

  रतिहा पंडित जी ह घर म अपन पंडिताइन संग   गोठियावत कहिस--" ये तो मोर कमाल ये जेन ह राजा के जस ल चारों खूँट बगरा देंव। जिनगी ल पार पाये के बहुत कस रहस्य ल महीं ह राजा ल बताके सदमार्ग म चले ल सिखोये हँव तेकरे सेती वो मोर सब कहना ल मान लेथे अउ  प्रजा के भलाई म ध्यान देथे तेकरे सेती प्रजा घलो वोला चाहथे।

    ये सब गोठ ल सुनके पंडिताइन सिरतो म मानगे के वोकर पति ह बड़ गुनी अउ राजा के खासमखास हे।

 पंडित रामभगत ह समे-समे म  अपन एकलौता पुत्र रामचरण ल अपन विद्या के शिक्षा देवत राहय। वोला ये भरोसा रहिस के जब राजा के बेटा ह राजा बनही त मोर बेटा ह वोकर राजपुरोहित बनही। वोइसने होबो घलो करिस।  शिक्षा -दिक्षा के पाछू राजा के बेटा राजेंद्रशाह ह राजा बनिस अउ पंडित रामचरण ह वोकर पुरोहित। नवा उमर रहिस, नवा जोश। कभू-कभू नवा राजा अउ नवेरिया राजपुरोहित के विचार म अंतर पर जावय। राजेंद्रशाह ह अपन पिता ले उलट उद्दंड अउ विलासी रहिस भलुक पुरोहित पंडित रामचरण ह अपन पिता ले जादा ज्ञानी अउ सज्जन निकलिस।वो ह तर्कशास्त्र म पारंगत रहिस।

  अब तो रोज राज दरबार म नाच-गाना अउ बाजा-गाजा के महफिल जमय।राजा राजेंद्रशाह ह राग-रंग म डूबे राहय।राजपुरोहित कभू टोंकय त वोला झिड़क दय। हालत अजीब होगे। पंडित रामचरण ल अबड़ेच अपमान सहे ल परय तभो अपन कर्तव्य के पालन करय । फेर कब तक साहय? वो ह सोचय के कइसे करके राजा के ये आदत ल बदले जाय। एती राजा के भोग- विलास ह दिन दूना रात चौगुना बाढ़ते गिस अउ वोती खजाना ह तरिया के पानी कस अँउटत गिस। प्रजा के दुख बाढ़े लागिस। पंडित रामचरण ह समझाइस त राजेंद्रशाह ह वोकर राजपुरोहिती ल छिनलिस।

  पंडित रामचरण ह निराश नइ होइस भलुक जोर शोर ले  गाँव मन म जाके ज्ञान के अँजोर बगराये ल धरलिस। वोकर ये नेक काम ह राजा के खुशामद करइया कुछ दरबारी मन ल खटके लागिस। जइसे-जइसे पंडित जी के जस फइले ल धरलिस तइसे-तइसे राजा सो वोकर शिकायत तको जादा होये लागिस। एक दिन वोला प्रजा ल भड़काये के आरोप म पकड़के दरबार म खड़ा करे गिस।

   नवा बनाये गे राजपुरोहित ह जेन ह पंडित रामचरण ले बहुत जलनखोरी करय तेन ह कहिस--" प्रजा ल बगावत करे बर भड़काना सबले बड़े अपराध अउ पाप होथे। जेला ये ह करे हे।" चापलुस दरबारी मन तको हाँ म हाँ मिलाइन। बेचारा पंडित रामचरण ह का करय? वोकर अर्जी-बिनती ल कोनो नइ सुनिन।

 मौत के सजा सुनाये के पहिली राजा राजेंद्रशाह कहिस--" तोर कोनो आखिरी इच्छा होही त बता डर?"  सुनके अउ गुनके पंडित रामचरण ह कहिस- "महाराज मैं ह तोला बहुत अकन रहस्य के बात बताये हँव।मरे के पहिली एक ठन अउ मोती के फसल पैदा करे के रहस्य ल बताना चाहत हँव।"

 अतका ल सुनके राजा अउ दरबारी मन दंग होगें।कतको झन ल शंका होये ल धरलिस के कहूँ ये ह कुछु गुनतारा करके भाग झन जावय फेर राजा ह बिंसवास करके कहिस--" हम तोला मौका देवत हन।तैं ये विद्या मोला सिखो दे।" राजा ले आज्ञा लेके पंडितजी ये शर्त रखके के वो ह अपन काम चुपचाप करही।कोनो ह अड़ंगा झन डारहीं।तहाँ ले वो अपन काम म लगगे।  वो ह कुछ ईकड़ बढ़िया जमीन लिस। वोला जोंत-फाँद के गेहूँ बोंवा दिस।

  जलनखोर बैरी मन ये सोचिन के ये पंडित के बच्चा भला का कर सकही।वो मन विघ्न- बाधा डारे के बहुत कोशिश करिन फेर गम नइ पाइन। समे म अंकुर फूटिस अउ पौधा बाढ़े लागिस।

 एक दिन बड़े बिहनिया जब कसके धुँधरा छाये रहिस ,पंडित रामचरण ह राजा अउ वोकर मंत्री-संत्री मन ल खेत म लेके गेइस। जम्मों गहूँ के पौधा मन ओस के बूँद म गुँथाये मोती असन चमकत राहयँ। पंडित जी ह सबो झन ल देखावत कहिस--" लेवव ये दे मोती के फसल हावय।" एक झन दरबारी ह जइसे वोला टोरे बर आगू बढ़िस,पंडित रामचरण ह चिल्लाके कहिस--" ठहर जा! ये ह मोती के पवित्र फसल आय।एला उही मनखे छू सकथे जेन ह कभू देश ले गद्दारी नइ करे होही।"

 सुनिन तहाँ ले सबके चेहरा सेटरागे। कुछ समे ले सबो झन एक दूसर ल देखे ल धरलिन। तहाँ ले सब टरक दिन।राजा भर बाँचिस । वो ला ज्ञान मिलगे। वोकर आँखी आत्मज्ञान ले चमके ल धरलिस। देखते-देखत वो ह पंडित रामचरण के गोड़ ल धरलिस।


चोवा राम "बादल"

हथबंद, छत्तीसगढ़

विमर्श के विषय--"छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन मा छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम अउ किताब के स्वरूप'*


*विमर्श के विषय--"छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन मा छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम अउ किताब के स्वरूप'*


संसार के जम्मों शिक्षाशास्त्री अउ मनोवैज्ञानिक मन के कहना हे कि छोटे बच्चा मन ल उँकर मातृभाषा म पढ़ाना-लिखाना सबले बढ़िया होथे काबर के मातृभाषा म पढ़ाये पाठ ल या देये ज्ञान ल वोमन सहजता ले समझ जथें। मातृभाषा ल छोड़ के आन भाषा ल समझना लइकामन बर कठिन अउ उबाऊ होथे। ऊँकर शब्द भंडार म आन भाषा के शब्द नहीं के बरोबर रहिथे।

   बहुत कस देश म अउ हमरो  देश के बहुत अकन प्रदेश म प्रायमरी शिक्षा मातृभाषा म दे जाथे जइसे उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात---आदि म।

 उच्च प्रायमरी अउ हाई स्कूल/हायर सेकेंडरी म त्रिभाषा फार्मूला भाषा शिक्षण म लागू हे जेन अच्छा हे काबर के आगू जीवन म समाजिक व्यवहार बर राष्ट्र भाषा हिंदी अउ अंग्रेजी ल जानना जरूरी हे।

   पाठ्यक्रम म उम्र अउ बच्चा के सिखे के क्षमता के अनुसार रचनात्मकता अउ शैक्षिक जरूरत ल ध्यान म राखके विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास बर अउ वोला एक अच्छा नागरिक बनाये बर सोच विचार के बने क्रमबद्ध रूप ले पाठ मन ल पुस्तक मा राखे जाथे।

   अब हम  पाठ्यक्रम के ऊपर बताये लक्षण ल देखत *छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन मा छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम अउ किताब के स्वरूप* मा विचार करन त मोटी मोटा ये बात दिखथे---

(क) भाषा के पुस्तक मन मा कक्षा पहिली ले लेके बारहवीं तक काम चलताऊ दू-चार पाठ छत्तीसगढ़ी भाषा के राखे गे हे।उही 15--20% जबकि प्रायमरी म 100% पाठ छत्तीसगढ़ी म रहना रहिसे। 

 विद्वान मन इही मेर कहिथे के छत्तीसगढ़ी के कोन रूप के पाठ रहना चाही त एकर हल हे के भाषायी संकीर्णता ल त्याग के छत्तीसगढ़ी के जेन रूप व्यापक हे ,जेला सब समझथे वोला अपनाना चाही।

(ख) भाषा के किताब ल छोड़के आन विषय जइसे समाजिक विज्ञान, भूगोल, गणित के किताब म एको पाठ छत्तीसगढ़ी म नइये जबकि अनिवार्य रूप ले प्रायमरी स्तर म सबो विषय के सबो पाठ छत्तीसगढ़ी म होना चाही।

 छत्तीसगढ़ी भाषा अतका समृद्ध हे के वो कोनो भी अवधारणा ल व्यक्त कर सकथे।

    तकनीकी शब्द मन ल हम पाठ मन म ओइसने के ओइसने बउर सकथन।

( ख) एक अच्छा पाठ्यक्रम के विशेषता ल ध्यान म रख के विषय अनुसार पाठ मन के चयन करना चाही। हमर पाठशाला मन के भाषा के किताब म जेन थोर-बहुत छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ शामिल करे गे हे वो खरा नइये।

    छत्तीसगढ़ के लेखक कवि मन ल जिम्मेदारी देके सबो विषय के बढ़िया उपयोगी, सार्थक अउ ज्ञानवर्धक पाठ तइयार करे जा सकथे। हमर पुरखा साहित्यकार मन के रचना मन ला तको लिये जा सकथे।


      कुल मिलाके इही कहे जा सकथे के हमर पाठशाला मन मा भाषा के किताब मन मा शामिल छत्तीसगढ़ी के पाठ ऊँट के मुँह मा जीरा बरोबर हे फेर ये सोच के संतोष करे जा सकथे के मातृभाषा मा शिक्षा के शुरुआत तो होये हे।अँधियारा छँटही अउ अँजोर होबे करही।

अँधा मामा ले काने मामा सहीं।


चोवा राम "बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन म छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम अउ किताब के स्वरूप* - एक विमर्श

 *छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन म छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम अउ किताब के स्वरूप* - एक विमर्श


        छत्तीसगढ़ के पाठशाला मन म छत्तीसगढ़ी भाषा के कोनो किताब चलन म नइ हे। राज बने २० बछर होगे हे। फेर छत्तीसगढ़ी म स्कूली किताब के दुकाल हे। अपन संस्कृति, परम्परा अउ भाषा ले अलग चिन्हारी रखइया राज म अपने भाषा म शिक्षा के कोनो सार्थक उदीम नइ दिखत हे। छत्तीसगढ़ी के प्रति शासन अउ प्रशासन कुंभकर्णी नींद भाँजत हे, कहे जा सकत हे। योजना-परियोजना के प्रचार-प्रसार बर इही मन आँखी रमजत छत्तीसगढ़ी के पाँव पलौटी करथे। छत्तीसगढ़ी के बिकास इहाँ के जनता अउ साहित्यकार , संस्कृति कर्मी अउ लोककलाकार मन के भरोसा हे। वहू म एमन उपेक्षा पूर्ण व्यवहार के संग जिनगी जियत हें। 

        दुनियाभर के शिक्षाविद् अउ शिक्षाशास्त्री मन घलव प्राथमिक शिक्षा ल मातृभाषा म दे के समर्थन करथें। मातृभाषा म शिक्षा ग्रहण सहज अउ सरल होथे माने हें। लइकामन बर मनोरंजन सही रहिथे। मुँहाचाही मुँहाचाही म पढ़े बर तियार होथे। खेल खेल म कतको जिनीस सीखे धर लेथे। इही शुरुआत ले पढ़ई म रुचि बाढ़े ले आने भाषा म शिक्षण घलव सुभीता होथे। शिक्षण सूत्र घलव हे, सरल ले कठिन के तरफ अउ ज्ञात ले अज्ञात के तरफ।  लइकामन स्कूल म भर्ती होथे त महतारी भाषा बस जानत रहिथे। आने भाषा के शब्द मनोवैज्ञानिक रूप ले कठिन होय ले पढ़ई म बाधा बनथे। एकर ले शाला त्यागी लइकामन के गिनती घलव बाढ़े लग जथे। अध्ययन के मुताबिक मातृभाषा म सीखे के दर घलव जादा देखे गेहे। फेर कोन जनी ? अइसे का अड़चन हे कि छत्तीसगढ़ के पाठशाला म छत्तीसगढ़ी म पाठ्यक्रम निर्धारित नइ करे जा सकत हे। पाठ्यक्रम के अभाव म किताब छपई संभव घलव नइ हो पात हे। भारत म ही आने राज मन अपन मातृभाषा म शिक्षा देथें, त हमर राज म काबर संभव नइ होही? छोटे कक्षा मन के पाठ्यक्रम के कोनो भी विषय के तकनीकी शब्द अइसे नइ होही जउन छत्तीसगढ़ी अनुवाद करे म कठिन होवय। 

        आज के बखत म प्रायमरी ले हाईस्कूल के पहुँचत ले सबो कक्षा म दू चार पाठ शामिल करे गेहे। बने रहितिस जम्मो पाठ के पुरती  प्रायमरी कक्षा म पाठ रख के छत्तीसगढ़ी म पढ़ाय जातिस। जइसे देश के अउ आने राज मन म पढ़ाय जाथे। छोटे लइका माटी के लोंदा होथे जउन साँचा म ढालबे तउन बन जथे। नैतिक शिक्षा अउ मानवीय मूल्य के समावेश अपने भाषा म रहे ले उत्तम होथे। इही हर जिनगी बर मजबूत नींव बनथे। लइकापन म सीखे के ललक ल धीर लगाके नवा शब्द मन ले जोड़त नवा दिशा दे जाय। हर उमर के लइका के रुचि अउ समय के माँग के अनुरूप पाठ्यक्रम बनाय के जरूरत हे। पाठ्यक्रम तियार करे के जिम्मा समाज के हर वर्ग के जम्मो विषय के विद्वान मन ल दिए जाय। मनोवैज्ञानिक मन के सलाह घलव लेना चाही। हाई स्कूल हायर सेकंडरी म उँखर भविष्य के आवश्यकता ल धियान रखत पाठ्यक्रम के बोझ जरूर कम करे बर गिनती के पाठ रखे जा सकत हे। जइसन अभी शामिल हवै।

       शिक्षा ल नौकरी अउ रोजगार मिले के साधन मान, इहें तक सीमित नइ रखना चाही। शिक्षा मनखे ल मनखे बना सकय एकर चिंता घलव होना चाही। यहू जिनीस के समावेश पाठ्यक्रम म होना चाही। हँ उच्च शिक्षा जरूर रोजगार मूलक होना चाही। लइका के सर्वांगीण विकास ल धियान रखत उच्च शिक्षा राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय भाषा म होय। आज पूरा समाज रीति-रिवाज अउ परम्परा के नाँव म दू फाड़ होगे हवै। संस्कार अउ रीति-रिवाज ल ढकोसला मानत पीढ़ी म नैतिक पतन देखे जा सकत हे। एकर कमी ले एक दूसर ले मन के जुड़ाव कमती होवत हे। बुढ़ापा के सहारा वैज्ञानिकता के चकाचौंध म कति लुकाय धर ले हे, पता नइ चलत हे। एकाकी जिनगी आज के वैज्ञानिक युग के बड़ेजान अभिशाप होगे हे। अपन मातृभाषा ले नइ जुड़े अउ मशीन के बीच रहत मनखे मशीन बरोबर जड़ होवत हे। भावना के अभाव दिखथे। अपन तीरतखार म देख के अंदाजा लगाय जा सकत हे,कि संयुक्त परिवार म रहइया या अपन मातृभाषा म पढ़इया लइकामन के मानवीय मूल्य तुलनात्मक रूप ले बने हे।  अँग्रेजी माध्यम म पढ़ई शुरू करवइया दाई-ददा रोज बेटा-बहू के नाँव म दू आँसू रोवत हें। मैं अँग्रेजी पढ़ई अउ वैज्ञानिकता के विरोधी नइ हँव। मैं अतका चाहथँव कि प्राथमिक शिक्षा अपन मातृभाषा म होना चाही। अपन लइका ले अपन भाषा म सरलग गोठबात होते राहय। तभे मन के पीरा ल लइका समझ पाहीं अउ आँसू पोंछही।

        

   पोखन लाल जायसवाल

पलारी बलौदाबाजार

छत्तीसगढ़ के पाठ्यक्रम म छत्तीसगढ़ी-मथुरा प्रसाद वर्मा


छत्तीसगढ़ के पाठ्यक्रम म छत्तीसगढ़ी-मथुरा प्रसाद वर्मा

 आज के विषय ल महत्व ल समझ के अपन अल्पमति से अपन बात रखे के प्रयास करता हँव। मोर विचार से असहमति हो सकत हे। ज्यादातर विद्वान मन कहिथे कि जेन लइका स्कूल आथे वो माटी के कच्चा लोंदा होथे स्कूल अउ शिक्षक जइसे चाहथे वइसे बना सकथे। फेर मोर मानना एकर ले अलग हे।

       लइका जब स्कूल आथे तब खाली हाथ नइ आवय । वो अपन सँग आपन मातृ भाषा के शब्द भण्डार लेके आथे।वो शब्द सयोजन अउ वाक्य विन्यास के अहम जानकारी ले के आथे। लइका खाली हाथ नइ आवय बहुत अकन गीत, कविता, कथा कहानी आदि रूप म साहित्य घलो जानथे। भले लइका मन हमर कस साहित्यिक शब्द अउ वाक्य म अभिव्यक्ति नइ कर सकय फेर ओखर  बोल चाल के भाषा हमर ले बहुत कमजोर नइ रहय। 

              अउ दूसर बात लइका केवल शिक्षक अउ स्कूल ले नइ सिखय । वो अपन मा-बाप, घर-परिवार, अउ परिवेश ले घलो सीखथे। अउ जे अपन परिवेश ले सिखथे वोहू महत्वपूर्ण होथे । ये बात ला मानना चाही। अउ ओखर उपयोग स्कूली शिक्षा म होय ले शिक्षा सरल अउ सुगम हो जथे। दूसर भाषा ले पढ़ना लिखना सीखे के कारण सबले ज्यादा प्रभावित हमर अभिव्यक्ति क्षमता होथे । ते पाय के 12 वी पास करे के बाद भी हमर 80 प्रतिशत लइका अपन बात ल बोल अउ लिख के नइ रख पावय। जबकि नवा स्कूल अवइया लइका ल आपन भाखा म बोले के अवसर दे जाय त अपन बात रखे सिख जथे।

    कुछ विद्वान कहिथे के लइका अपन शुरुवात के पाँच सात साल म जतका शब्द सीखथे, अउ ओतके शब्द सीखे म बहुत साल लग जथे। वो लइका मन ला पढ़ना लिखना सिखाये के नाम ले दूसर भाषा सीखना काफी कठिन कार्य होथे। लइका अपन अपरिचित शब्द जेकर उपयोग ओखर दैनिक जीवन म नइ हे ओखर माध्यम ले पढ़ना लिखना सीखना बहुत मुश्किल होथे। जइसे हमन वर्णमाला सीखे के समय ईख, शलजम, कबूतर, से वर्ण परिचय छत्तीसगढ़िया लइका बर कठिन हो जथे। काबर कि वो इखर ले परिचित नहीं रहय । तेकर सेती लइका ला पढ़ना लिखना ओकर अपन भाषा मा सीखना अति आवश्यक हे। जइसे हर बंगाली, गुजराती, मराठी लइका मन ल हे, आप मन ल पता हे कि नही ये नइ जानव फेर हमारे राज्य म मुस्लिम लइका मन उर्दू म पढ़े लिखे सीखथे । पूरा परलकोट पखांजुर क्षेत्र म आज भी बंगला भाषा से प्राथमिक शिक्षा के माध्यम हरे। अउ तो अउ हजारो प्राथमिक शाला के भर्ती घलो बंगला पढ़ाए बर होय हे। फेर छत्तीसग़ढ म छत्तीसगढ़ी के साथ ऐसे नइ होवत हे त ये हमर सरकार मन के षड्यंत्र हरे। छत्तीसगढ़िया लइका मन ऊपर अत्याचार हरय।  अउ अपन आप ल छत्तीसगढ़ी के रक्षक अउ सेवक कही कही के अपन कद ऊँचा करैया मन के नाकामी हरय। हम सब सच्चा मन से प्रयास करतेन अपन स्वहित ले ज्यादा महतारी भाषा के मान बारे मे सोचतेन त स्थिति दूसर होतिस। 



🙏🏻मथुरा प्रसाद वर्मा

छत्तीसगढ़ी अउ पाठ्यक्रम -सरला शर्मा

 छत्तीसगढ़ी अउ पाठ्यक्रम -सरला शर्मा

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    पटल मं बुधियार लिखइया मन के विचार पढ़े बर मिलत हे जेकर से बहुत अकन नवा अउ अच्छा सुझाव घलाय के जानकारी होवत हे । पटल मं विमर्श होथे त पाठक ल ही नहीं लेखक ल भी फायदा होथे काबर के गद्य लेखन के अभ्यास होथे जेहर छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास बर जरूरी हे दूसर बात के लोकाक्षर के स्थापना के उद्देश्य भी इही हर आय । 

      मातृभाषा मं लइकन के पढ़ाई के सुरुआत बने बात आय एकर से लइकन के रुचि बढ़थे , पाठ्यवस्तु ल जल्दी अउ अच्छा से समझे सकथे । हमर छत्तीसगढ़ मं हल्बी , गोंड़ी , कुडुक , सादरी अउ कई ठन रुप छत्तीसगढ़ी के चलागत मं  हावय त प्राथमिक कक्षा के पाठ्यक्रम मं क्षेत्र के अनुसार मातृभाषा ल स्थान मिलना उचित होही फेर माध्यम के रूप मं नहीं एक विषय , एक भाषा के रुप मं स्थान मिलय । बाकी विषय के पढ़ाई हिंदी मं ही होना चाही । 

    पूर्व माध्यमिक के पाठ्यक्रम मं त्रिभाषा सूत्र लागू रहे ले लइका मन हिंदी , अंग्रेजी , संस्कृत पढ़हीं फेर हिंदी मं छत्तीसगढ़ी के पाठ बरोबर रहय जइसे दस पाठ हिंदी के त दस पाठ छत्तीसगढ़ी के ...ए उमर के लइका छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी के अंतर , समानता अउ उपयोगिता समझे लाइक हो जाथे । 

    माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम मं हिंदी के संग मातृ भाषा छत्तीसगढ़ी जरुर रहय फेर मानक छत्तीसगढ़ी के पाठ रहय । अंग्रेजी अउ संस्कृत भी रहय काबर के संस्कृत हर भारतीय भाषा के मूल आय जेहर मातृभाषा छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी दुनों ल समझे मं सहायक हे । अंग्रेजी जरुरी एकर बर हे के लइका रोजी रोजगार बर देश , विदेश कहूं  भी सुछंद जाये सकय ।

     उच्चतर माध्यमिक मं लइकन अपन रुचि अनुसार विषय ले के पढ़थें जेन हर उंकर भविष्य के पढ़ाई , रोजी रोजगार के आधार बनथे ते पाय के विषय चाहे आर्ट्स , साइंस , वाणिज्य जौन भी चुने जाथे तेकर पाठ्यक्रम बढ़ जाथे लइकन जादा ध्यान भी इही डहर देथें अइसन समय मं पाठ्यक्रम मं दू भाषा रहय पहिली राष्ट्रभाषा हिन्दी दूसर अंग्रेजी काबर के आजकल इही दुनों भाषा हर उदर भरण के भाषा बन  गए हे त दूसर बात के ये उमर के लइकन अपन मातृ भाषा छत्तीसगढ़ी ल बोले , समझे लाइक हो जाथें । 

    फेर सुरता कर लिन के छत्तीसगढ़ी ल माध्यम न बना के एक विषय के रुप मं पाठ्यक्रम मं स्थान मिलय । रहिस बात छत्तीसगढ़ी साहित्य के त साहित्यकार मन तो पहिली भी लिखत रहिन , अवइया दिन मं भी लिखहीं ...। छत्तीसगढ़ी पढ़े लिखे लइका मन तो अउ अच्छा लिखहीं कहि सकत हन छत्तीसगढ़ी साहित्य दिनों दिन जगर मगर करही ।

छत्तीसगढ़ के जनकवि :कोदूराम “दलित”*


 *5 मार्च को एक सौ ग्यारहवीं जयन्ती पर विशेष* :


{छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कहानीकार और वरिष्ठ साहित्यकार श्री परदेशीराम वर्मा जी द्वारा लिखित उनकी किताब – “अपने लोग” के प्रथम संस्करण २००१ से साभार संकलित}


*छत्तीसगढ़ के जनकवि :कोदूराम “दलित”*


*भुलाहू झन गा भइया*


पिछड़े और दलित जन अक्सर अन्चीन्हे रह जाते हैं | क्षेत्र, अंचल, जाति और संस्कृति तक पर यह सूत्र लागू है | पिछड़े क्षेत्र के लोग अपना वाजिब हक नहीं माँग पाते | हक पाने में अक्षम थे इसीलिये पिछड़ गये और जब पिछड़ गये तो भला हक पाने की पात्रता ही कहाँ रही | 


हमारा छत्तीसगढ़ भी एक ऐसा क्षेत्र है जिसे हक्कोहुकूक की समझ ही नहीं थी | परम श्रद्धालु, परोपकारी, मेहमान-नवाज, सेवाभावी यह छत्तीसगढ़ इसी सब सत्कर्मों के निर्वाह में मगन रह कर सब कुछ भूल जाता है | “मैंने उन्हें प्रणाम किया” यह भाव ही उसे संतोष देता है | जबकि प्रणाम करवाने में माहिर लोग उसकी स्थिति पर तरस ही खाते हैं | छत्तीसगढ़ी तो अपनी उपेक्षा पर जी भर रोने का अवकाश भी नहीं पाता | जागृत लोग ही अपनी उपेक्षा से बच्चन की तरह व्यथित होते हैं ....


‘मेरे पूजन आराधन को

मेरे सम्पूर्ण समर्पण को,

जब मेरी कमजोरी कहकर

मेरा पूजित पाषाण हँसा,

तब रोक न पाया मैं आँसू’


हमारे ऐसे परबुधिया अंचल के अत्यंत भावप्रवण कवि हैं स्वर्गीय कोदूराम “दलित” | ५ मार्च १९१० को दुर्ग जिले के टिकरी गाँव में जन्मे स्व.कोदूराम “दलित” का निधन २८ सितम्बर १९६७ को हुआ | ये गाँव की विशेषता लेकर शहर आये | यहाँ उन्होंने शिक्षक का कार्य किया | अपने परिचय में वे कहते हैं.... 

                    

‘लइका पढ़ई के सुघर, करत हववं मैं काम,

कोदूराम दलित हवय, मोर गवंइहा नाम |

मोर गवंइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया

जन हित खातिर गढ़े हववं मैं ये कुण्डलिया,

शउक मुहू ला घलो हवय कविता गढ़ई के

करथवं काम दुरूग मा मैं लइका पढ़ई के’ |


कोदूराम “दलित” का यह उपनाम भी महत्वपूर्ण है | वे महसूस करते थे कि वे ही नहीं अंचल भी दलित है | छत्तीसगढ़ी का यह कवि हिन्दी और कवियों से जगमग लोकप्रिय काव्य मंचों पर अपनी विशेष ठसक और रचनात्मक धमक के कारण मंचों का सिरमौर रहा | अपने जीवन काल में ही दलित जी ने स्पृहणीय मुकाम पा लिया था मगर अतिशय विनम्र और संस्कारशील होने के कारण यथोचित महत्त्व न मिलने पर भी वे कभी नहीं तड़फड़ाये |


शोषण की चक्की में पिस रहे दलितों के पक्ष में कलम चलने वाले कवि ने आर्थिक सहयोग देने वाले राजनेता दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त जी के सम्बन्ध में “सियानी गोठ” काव्य संग्रह में जो लिखा वह उनके चातुर्य और साहस को ही प्रदर्शित करता हऐ | “सियानी गोठ” के प्रकाशन के लिये दुर्ग के धान कुबेर दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त ने उन्हें मात्र पचास रुपया दिया | सविनय राशि स्वीकारते हुये संग्रह में दाऊ जी के चित्र को ही उन्होंने नहीं छापा, बाकायदा यह वाक्य भी लिख दिया .... 


“जानत हौ ये कोन ये

मनखे नोहय सोन ये”


यही दलित जी की विशेषता है |


“राजा मारय फूल म, त तरतर रोवासी आवय

ठुठवा मारय ठुस्स म, त गदगद हाँसी आवय”


यह कहावत है छत्तीसगढ़ में | कवि लेखक ठुठवा अर्थात कटे हाथों वाले लोग हैं |सत्ता, शक्ति से संचालित नहीं हैं लेखक के हाथ | इसीलिए वह ठुठवा है | और कमाल देखिये कि शक्ति संपन्न राजा जब फूल से भी मारता है तो मार भारी पड़ती है | मार खाने वाला बिलबिला कर रोने लगता है | लेकिन ठुठवा मारता है आहिस्ता और मार खाने वाला हँस पड़ता है क्योंकि चोट नहीं पड़ती | विरोध भी हो जाता है और सांघातिक चोट भी नहीं पड़ती | यह है कला की मार के सम्बन्ध में छत्तीसगढ़ का नजरिया | यह छत्तीसगढ़ी विशेषता है | दूसरे हमें फूल से छूते हैं तो हमें रोना आता है लेकिन हम दूसरों को मार भी दें तो वे आल्हादित होते हैं | यह प्रेम की जीत है | प्रेम का साधक किसी को मार ही नहीं सकता | छत्तीसगढ़ तो दूसरों को बचाता है स्वयं मिट कर | इसीलिए इसकी मार ऐसी होती है कि मार खाने वाले भी आनंद का अनुभव करते हैं |

 

छत्तीसगढ़ के लिए जो आंदोलन चला विगत पचीस बरस से, उसे आंदोलन के आदि पुरुष डॉ.खूब चंद बघेल ने अपने दम पर चलाया | छत्तीसगढ़ भातृ संघ के झंडे टेल संकल्प लेने वाले लाखों लोगों ने अपने खून से हस्ताक्षर कर उनके साथ जीने-मरने का संकल्प लिया | लेकिन छत्तीसगढ़ ने कभी तोड़-फोड़, मार -काट को नहीं अपनाया | जबकि दूसरे इलाकों में बात-बात में खून बह जाता है और लोग गर्वित भी होते हैं कि हमारे क्षेत्र में तो बात-बात में चल जाती है बन्दूक | हमें इस पर गर्व नहीं होता | हम तो गर्वित होते हैं कि हम सहिष्णु हैं | प्रेमी हैं | शांतिप्रिय और हितैषी हैं | इसीलिए कोदूराम दलित जैसा कवि हमारे बीच जन्म लेता है | और दान दाता धन कुबेर का सम्मान रखते हुए अपनी प्रतिपक्षी भूमिका भी पूरे गरिमा के साथ निभा ले जाता है …..


“जानत हौ ये कोन ये,

मनखे नोहय सोन ये”


यह मनुष्य नहीं सोना है | मनुष्य होता तो अरबों की संपत्ति का स्वामी साहित्य सेवक को मात्र पचास रुपया ही क्यों देता | व्यंग्य यह है | मगर पूरी मर्यादा के साथ | 


दलित जी ने छत्तीसगढ़ी कविता को एक आयाम ही नहीं दिया , उसे वे जनता तक ले जाने में सफल हुए | वे छत्तीसगढ़ी कुंडलियों के रचनाकार के रूप में विख्यात हुए | बेहद प्रभावी और बहु आयामी कुंडलियों को लेकर वे मंच पर अवतरित हुए | आजादी मिली | जनतंत्र में कागज़ के पुर्जे से राजा बनाने की प्रक्रिया चुनाव के माध्यम से शुरू हुई | इसे दलित जी ने कुछ इस तरह वर्णित किया......


'अब जनता राजा बनिस करिस देश मा राज,

अउ तमाम राजा मनन बनगे जनता आज |

बनगे जनता आज, भूप मंत्री पद मांगे,

ये पद ला पाए बर, घर-घर जाय सवांगे

बनय सदस्य कहूँ जनता मन दया करिन तब

डारयँ कागद पेटी ले निकरय राजा अब ||


दलित जी आधुनिक चेतना संपन्न एक ऐसे कवि थे जिन्होंने विज्ञान के लाभकारी प्रभाव को अपनी कविता का विषय बनाया | उनके समकालीन कवियों में यह दृष्टि बहुत कम दीख पड़ती है …


तार मनन मा ताम के, बिजली रेंगत जाय

बुगुर बुगुर सुग्घर बरय,सब लट्टू मा आय

सब लट्टू मा आय ,चलावय इनजन मन ला

रंग-रंग के दे अँजोर  ये हर सब झन ला

लेवय प्रान लगय झटका,जब एकर तन मा

बिजली रेंगत जाय, ताम के तार मनन मा ||


चाय, सिनेमा, घड़ी, नल, परिवार नियोजन, नशा, जुआ, पंचशील, अणु, विज्ञान, बम, पञ्चवर्षीय योजना, अल्प बचत योजना, चरखा, पंचायती राज आदि विषयों पर दलित जी ने कुंडलियों का सृजन किया है | अपनी धरती का मुग्ध भाव से उन्होंने यश गान किया ….


छत्तीसगढ़  पैदा  करय,  अड़बड़  चाँउर डार,

हवयँ लोग मन इहाँ के, सिधवा अऊ उदार

सिधवा अऊ उदार हवयँ दिनरात कमावयँ

दे दूसर ला मान, अपन मन बासी खावयँ

ठगथयँ ये बपुरा मन ला बंचक मन अड़बड़

पिछड़े हवय अतेक, इही कारण छत्तीसगढ़ |


पिछड़े छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रादुर्भाव एवं उसके महत्त्व को कवि ने खूब रेखांकित किया है | वे एक चैतन्य कवि थे | उनकी चौकन्न आँखों ने अँधेरे उजले पक्षों को बखूबी देखा | भिलाई पर कवि की प्रतिक्रिया देखें …..


बनिस भिलाई हिन्द के, नवा तिरिथ अब एक

चरयँ गाय-गरुवा तिहाँ, बसगे लोग अनेक

बसगे लोग अनेक ,रोज आगी संग खेलें

लोहा ढलई के दुःख ला हँस-हँस के झेलें

रइथयँ मिल के रूसी- हिन्दी भाई-भाई

हमर देश के नवा तिरिथ अब बनिस भिलाई |


दलित जी अपने समकालीन कवियों में सर्वाधिक लोकप्रिय हुए | उनके सुयोग्य शिष्य के रूप में श्री दानेश्वर शर्मा आज उनकी परम्परा को और पुख्ता कर रहे हैं | श्री दानेश्वर शर्मा चौथी हिन्दी की कक्षा में उनके शिष्य थे | तब से ही लेखन और मंच के प्रति उनमें दलित जी ने संस्कार डालने का सफल यत्न किया | दलित जी छत्तीसगढ़ की परम्पराओं पर मुग्ध थे तो आधुनिक दुनिया के साथ कदम मिला कर चलने की कोशिश कर रहे छत्तीसगढ़ के प्रशंसक भी थे | उन्होंने राउत नाच इत्यादि के लिए भी अवसर आने पर दोहों का लेखन किया | यहाँ भी उनकी प्रतिबद्धता एवं दृष्टि का परिचय हमें मिलता है | 


गांधी जी के छेरी भइया दिन भर में-में नारियाय रे

ओखर दूध ला पी के भइया, बुढ़वा जवान हो जाय रे |


दलित जी परतंत्र भारत में जन्मे | उन्हें भारत की आजादी का जश्न देखने का अवसर लगा | भला उस यादगार दृश्य को वे क्योंकर न शब्दों में बाँधते ? उनका चित्रांकन जहाँ रंगारंग है वहीं अनोखेपन के कारण अविस्मरणीय भी ….............


आइस हमर लोक तंत्र के, बड़े तिहार देवारी

ओरी-ओरी दिया बार दे, नोनी के महतारी


विनोदी स्वभाव के दलित जी हास्य-व्यंग्य के अप्रतिम कवि सिद्ध हुए | भाषा और व्याकरण के जानकार दलित जी काव्यानुशासन को लेकर सतर्क रहते थे | जहाँ कहीं उन्हें रचना में अनुशासनहीनता दिखती वे सविनय रोकने से बाज नहीं आते | टोका-टोकी का उनका अंदाज अलबत्ता बहुत सुरुचिपूर्ण होता | टोके जाने पर भी व्यक्ति मुस्कुरा कर अपनी गलती स्वीकारता ही नहीं, सदा के लिए उनका मुरीद हो जाता | समाज में आर्थिक विषमता के कारण उत्पन्न कठिनाइयों का वर्णन उनकी रचनाओं में है | महत्वपूर्ण यह है कि वे अपनी रचनाओं के प्रतीक भी जीवनण और उससे जुड़ी अनिवार्य संगति से संदर्भित करते हुए उठाते हैं | इसीलिए दलित जी का व्यंग्य अपने अनोखेपन में उनके समकालीनों से एकदम अलग लगता है | यहाँ हम देख सकते हैं, उनकी विलक्षणता को.....


'मूषक वाहन बड़हर मन, हम ला

चपके हें मुसुवा साहीं

चूसीं रसा हमार अउर अब

हाड़ा -गोड़ा ला खाहीं |

हे गजानन ! दू गज भुइयाँ

नइ हे हमर करा

भुइयाँ देबो-देबो कहिथे हमला 

कतको झन मिठलबरा


शोषण के कारण बेजार जन का ऐसा चित्रण वे ही कर सकते थे | अमीरों ने खून तो चूस लिया लेकिन अब वे हमारी हड्डियाँ भी चबाएँगे, यह भविष्य वाणी आजादी के पचास वर्षों में कितनी ठीक उतर गई इसे हम बेहतर समझ पा रहे हैं | वे हिन्दी में भी रचना करते रहे | एक लंबे समय से छत्तीसगढ़ में तरह-तरह के रचनाकारों की साधना चलाती आ रही है | एक वे जो यहाँ का हवा, पानी अन्न-जल ग्रहण करते हुए छत्तीसगढ़ी नहीं जानने के कारण हिन्दी में लिखने को मजबूर थे | दूसरी तरह के कलमकार वे हैं  जिनके लिए छत्तीसगढ़ी दुदूदाई की बोली तो थी मगर वे उसमें रचना नहीं कर सके | उनका हिन्दीमय यशस्वी जीवन छत्तीसगढ़ी का कुछ भी भला नहीं कर सका | इसके अतिरिक्त ऐसे रचनाकार भी हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ में लेखन कर अपना स्थान बनाया और छत्तीसगढ़ी का गौरव भी बढ़ाया लेकिन सर्वाधिक कठिन साधना उनकी है जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों में ही सामान रूप से लिखने का जिम्मा सम्हाल रहे हैं | कोदूराम जी भी इसी परम्परा के कवि थे | यद्यपि सामान रूप से दोनों ही भाषाओं में या सभी विधाओं में महत्त्व प्राय: नहीं मिलता | दलित जी भी छत्तीसगढ़ी के कवि माने जाते हैं | चूंकि उनका काव्य वैभव छत्तीसगढ़ी में भी पूरे प्रभाव के साथ उपस्थित रहा | कल भी और आज भी उसका प्रभाव हमें दिखता है | इसीलिए उन्हें छत्तीसगढ़ी का संसार अपना प्रमुख कवि स्वीकारता है | लेकिन उनकी हिन्दी की रचनाएँ भी बहुत महत्वपूर्ण हैं |


काम और उससे उत्पन्न नाम ही महत्वपूर्ण है शेष काल के गाल में समा जाता है, इस भाव पर बहुत सारी रचनाएँ हम पढाते हैं | यहाँ देखें कुंडली कुशल दलित जी का काव्य वैभव उनकी हिन्दी कविता के माध्यम से....


'रह जाना है नाम ही, इस दुनियाँ में यार

अत: सभी का कार भला, है इसमें ही सार

है इसमें ही सार, यार तू तज दे स्वार्थ

अमर रहेगा नाम, किया कर तू परमारथ

काया रूपी महल एक दिन ढह जाना है

किन्तु सुनाम सदा दुनियाँ में रह जाना है |


*आलेख - डॉ. परदेशीराम वर्मा*

गुनान -सरला शर्मा


 

गुनान -सरला शर्मा

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   " मोला कोनो वाद छुअय झन राम 

     अलगे रहि के लिखत रहंव निहकाम । " 

शेषनाथ शर्मा " शील " लिखे हंवय ..। त पढ़ लेंव ...कुछु काहीं पढ़े के बान पर गए हे जेहर अब ए उम्मर मं छूटही तइसे तो लगत नइहे । गुनत हंव काबर अइसना लिखे रहिन होहीं ? 

वाद के मतलब तो छायावाद , प्रगतिवाद , प्रयोगवाद ही होइस न ? नहीं ..एमेरन वाद के इशारा कोनों विशेष धरन के लिखाई होइस । 

अलगे रहिके लिखना माने तो कोन काय लिखत हे तेला देख के नइ लिखना अपन मन के भाव ल लिखना होइस त  कोनों संग संघर के  नइ लिखना  भी तो होइस न ? दूसर बात के कोनो मोर लिखे के अनुकरण करत हें के नहीं , मोर लिखे संग सहमत हें या नहीं तेकर संसो करे बिना अपन विचार ल सुछंद लिखना घलाय तो होइस । 

   फेर निहकाम लिखना ...इही मेर तो मोर कलम ठाड़ होगिस ...गुनत हंव निहकाम माने तो जस -अपजस , लाभ- हानि से परे  लिखना होइस फेर मैं तो चार आखऱ लिखते साठ कोनो पत्र पत्रिका मं छपे बर उतियाइल हो जाथंव सम्पादक के सरन परथंव । आजकल तो सोशल मीडिया के सरन परे हर सहज उपाय बन परे हे तुरते फल घलाय मिल जाथे ...मुलाजा मं नहीं त बलदा मं लोगन मोर लिखे ल ...वाह ...वाह ..बढ़िया हे , सुग्घर रचना कहि देथें फेर का पूछना हे मोर कलम उत्ता धुर्रा चले लगथे , देंह मन विचार सब मोटाये सुरु कर देथे । 

एकरे ले बांचे बर शील जी लिखे रहिन होंही निहकाम लिखे के बात ...सिरतो तो आय नांव जस के लोभ मं पर के मन के सुख शांति काबर खतम करना ? दुनिया मं आजतक कतको भाषा मं जाने कतका झन लिखत आवत हें ..उनमन के रचना उंकर जियत जागत ले संतोष , मान सनमान जौन दिस जतका दिस उन देखिन सुनिन फेर उंकर जाए ले उंकर रचना ल कोन पढ़त हे , नइ पढ़त हे , कोन सराहत हे , कोन आलोचना करत हे तेला देखे , सुने तो उनमन आवयं नहीं ....त छपास रोग काबर पालना ? दूसर बात के निहकाम लिखे ले " मैं " के भाव घुंचही ...नहीं त उम्मर भर मैं ये लिखें , मैं एकर ओकर ले अतकिहा लिखें , बढ़िया लिखें । 

मैं ऐ विधा मं पहिली लिखें , मैं सबो विधा मं कलम चलाएं ....मैं , मैं अउ सिरिफ मैं ....काबर भाई ? त इही मैं ले उबरे बर शील जी निहकाम लिखे के बात कहिन होहीं ...। 

  अतेकन किताब विनय पत्रिका , कवितावली , गीतावली , राम लाल नहछू , पार्वती मंगल अउ कई ठन किताब लिखइया तुलसीदास रामचरित मानस लिखे धरिन त मैं ले  दुरिहाये बर लिखे रहिन "  स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ..। " माने ..भाई मन जेकर मन लगय पढ़व ...। 

गीतांजलि असन विश्व प्रसिद्ध किताब के लिखइया गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर लिखिन ...मोर विचार ल , लिखे ल पढ़ के मोर संग चलिहव त ठीक नइ चलिहव तभो ठीक हे ...बल्कि चेताइन घलाय " जदि तोर डाक शोने केउ ना आसे , तबे एकला चलो रे ...। " गुरुदेव इही मेरन " मैं " ले उबर गए रहिन ...।  

    फेर मैं सरला शर्मा तो उबरे नइ सके हंव जी ...इही देखव न ..लोकाक्षर मं लिखत हंव अउ गुनत हंव कतका झन मोर लिखे ल पढ़हीं , कोन कोन लिखहीं सुग्घर , बढ़िया हे आउ कुछु काहीं ..जेला पढ़ के मोर भीतरी मं आसन मार के बइठे " मैं " हर फूलही , फरही , हरियाही ....।

मैं कभू निहकाम लिखे सकिहंव , कभू एकला चले सकिहंव , कोनो दिन स्वान्तः सुखाय लिखे पाहंव ??? 

    सरला शर्मा