Friday, 3 December 2021

रिपोर्ताज : छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस - 2021*



 

 मोहन मयारू: *सोनहा सुरता हमर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस कार्यक्रम के* 


हमर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के आयोजन हर बछर के तरह ही इहु बछर 28 नवंबर के गुरु घासीदास संग्रहालाय संस्कृति विभाग के सभागार मा होइस , वो कार्यक्रम के माई पहुना हमर छत्तीसगढ़ शासन के केबिनेट अउ संस्कृति मंत्री श्री अमरजीत भगत जी मन रिहिन अउ कार्यक्रम के खास पहुना श्री अन्बलगन साहब  (संस्कृति सचिव) मन संघरे रिहिन , कार्यक्रम म हमर प्रदेश भर के भर के वरिष्ठ साहित्यकार मन के संग हमर जइसन कतकोन युवा साहित्यकार संगवारी मन घलो कार्यक्रम मा बढ़ चढ़ के हिस्सा लीन हे , गरिमामयी कार्यक्रम के रौनकता हर देखते ही बनत रिहिस बड़ आनंद आवत रहिस । 


कार्यक्रम के शुरवात हमर सकलाय जम्मो अतिथि पहुना मन दीया जलाके अउ हमर छत्तीसगढ़ महतारी के आशीर्वाद लेके करिन हे अउ हमर राजगीत के संग कार्यक्रम के श्री गणेश होइस ।  तेखर बाद हमर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव बड़का भइया श्री डॉ. अनिल भतपहरी जी मन स्वागत भाषण के माध्यम ले कार्यक्रम मा जुरियाय जम्मो पहुना मन के संग प्रदेश भर के सकलाय साहित्यकार मन के कार्यक्रम का स्वागत करिन हे अपन गोठ बात ले । वोकर बाद कार्यक्रम मा जुरियाय हमर वरिष्ठ भाषाविद् साहित्यकार मन हा हमर छत्तीसगढ़ी भाखा के मानकीकरण संग हमर महतारी भाखा के बाढ़ अउ वोला शिक्षा के पाठ्यक्रम मा संघेरे के संग काम काज के भाखा बनाय जाय जइसन कई ठन बिषय  मन म अपन सब गोठ बात मन ला राखिन हे । 


सबो वक्ता मन के गोठ बात अउ विचार ला सुनके सिरतोन म अन्तस् गदगद होगे रिहिस हे , मोला तो अइसे लगत रिहिस हे मानो कार्यक्रम मा संघरना मोर सफल हो गीस । कार्यक्रम म हमर वरिष्ठ सियान साहित्यकार मन के सम्मान घलो होइस जेमे लगभग प्रदेश भर के 19 साहित्यकार मन ला हमर छत्तीसगढ़ी भाखा के संग साहित्य के सेवा मा देय उनकर योगदान खातिर हमर छत्तीसगढ़ शासन डहर ले सम्मानित करे गीस । कार्यक्रम मा माई पहुना अमरजीत भगत जी संस्कृति मंत्री के महतारी भाखा मा हंसी ठिठोली ले भरे उनकर भाषण सुनके अन्तस् गदगद होगे रिहिस , अउ एक ठन खास बात वो कार्यक्रम के जउन ला मँय कहिथँव त कार्यक्रम मा हमर जतेक संघरे साहित्यकार मन कभू नइ भुलावय वो रिहिस अन्बलगन साहब जी जउन मन साऊथ इंडीयन होय के बावजूद छत्तीसगढ़ी मा पढ़ के गोठियाय के कोशिश अउ अपन बात ला रखत उन अपन महतारी भाखा के परति श्रद्धा भक्ति संग आपार प्रेम ला बताइन


उन मन अपन बात ला रखत बताइन की उनकर लइका मन के पैदाइस हमर छत्तीसगढ़ ह हरय अउ उनकर लइका मन साऊथ इंडियन होय के बावजूद आज घर म ठेठ छत्तीसगढ़ी मा गोठियाथे , जउन ला सुनके सिरतोन मा हम छत्तीसगढ़िया मन के छाती हा फुलगे रिहिस ।

कार्यक्रम मा संचानालय के सचिव श्री विवेक आचार्य जी मन घलो संघरे रिहिन जउन मन घलो वो दिन हमर महतारी भाखा मा अपन बात ला राखे के कोशिश करिन हे । कार्यक्रम मा बड़ आनंद आवत रिहिस सबो वक्ता एक ले बढ़ के एक रहिस हे कउनो के गोठ सुनके नइ लगत रिहिस के हम कार्यक्रम मा असकटावत हन कहिके । कार्यक्रम मा सुग्घर भोजन के व्यवस्था हमर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले रखे रिहिन हे कार्यक्रम मा


 भात बासी खाय के बाद दूसर सत्र मा कवि सम्मेलन के आयोजन करे रिहिन हे जेमा प्रदेश भर ले सकलाय साहित्यकार मन हा महतारी भाखा मा लिखे रचना मन के पाठ करिन हे । कार्यक्रम मा गीत कविता मन के सुग्घर वर्षा होवत रहिस हे जउन हा रात कन लगभग पौने सात के आस पास सिराइस हे । कार्यक्रम मा हमर प्रदेश के चित परिचित सबो वरिष्ठ गुरूजन साहित्यकार मन के संग युवा साहित्यकार संगी संगवारी मन ले घलो मिलन भेट होइस जउन हा वो कार्यक्रम के खुशी ला अउ दुगना कर दे रिहिस आखिर के समापन के घोषणा हमर प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार श्री चोवाराम वर्मा "बादल" गुरूजी मन करिन ।


   *मयारू मोहन कुमार निषाद* 

    *गाँव - लमती , भाटापारा ,*

  *जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)*

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 28 नवम्बर 2021 इतवार के ऐतिहासिक दिन  छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के द्वारा संस्कृति अउ पुरातत्व संचनालय के सभागार मा छत्तीसगढ़ राजभाषा दिवस के यादगार आयोजन करेगे रहिस। ये आयोजन मा ट्रेन लेट होये के कारण कुछ देरी ले सहीं लगभग दोपहर 12:30 बजे   हमू ला सँघरे के सौभाग्य मिलिस।

     जब हम पहुँचेन त कार्यक्रम चालू होगे रहिस। हाल खचाखच भरगे रहिस तेकर सेती जगा बर नजर दँउड़ावत पाछू कोती जाय ला परिस फेर एहू हा यादगार होगे काबर के हमर छंद के छ परिवार अउ लोकाक्षर परिवार के बहुत झन सँगवारी मन ले जै जोहार होगे तहाँ ले एकदम पाछू के पंक्ति मा जगा मिलिस।परोसी रहिन श्री राजेंद्र झा जी अउ एम ए छत्तीसगढ़ी के मेरिटोरियस विद्यार्थी डा० हितेश तिवारी। जगा मिले के बाद जब मंच कोती ध्यान गिस ता उहाँ विद्वान साहित्यकार मन जिंकर सम्मान होना रहिस जेमा हमर प्रणम्य गुरुदेव श्री निगम जी(संस्थापक छंद के छ, एडमिन लोकाक्षर छत्तीसगढ़) तको  अतिथि मन संग विराजे रहिन। मंच मा राजभाषा आयोग के सचिव डा० अनिल भतपहरी जी अउ ऊँकर साथी मन के सक्रियता झलकत रहिस हे।  सुप्रसिद्ध रंगकर्मी साहित्यकार श्री विजय मिश्रा जी के निराला अउ सटीक मंच संचालन बार-बार ताली बटोर के आयोजन मा चार चाँद लगावत रहिस। ए बखत मा डा० बिहारी लाल साहू जी अउ सचिव अल्बगन जी के संबोधन बहुतेच प्रभावशाली अउ प्रेरणादायक रहिस। एक तमिल भाषी अधिकारी के हिंदी बोल अउ लिख लेना, छत्तीसगढ़ी भाखा ला समझ लेना वोकर दू झन लइका मन के छत्तीसगढ़ी बोल समझ लेना हिरदे मा छत्तीसगढ़िया गौरव ला जगावत रहिस। मुख्य अतिथि  मंत्री आद० भगत जी के संबोधन हा छत्तीसगढ़ी भाखा के उत्थान होही, वो कम से कम प्राथमिक शिक्षा तक पाठ्यक्रम मा शामिल होही अउ आगू चलके राजकाज के भाषा तको बनही के विश्वास जगावत रहिस।वक्ता मन के संबोधन मा छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के मुद्दा तको रखे गिस तहाँ ले वरिष्ठ साहित्यकार मन ला स्मृति चिन्ह भेंट करके सम्मानित करे गिस। गुरुदेव श्री निगम जी के सम्मान के बेरा बहुत झन के मोबाइल तको घेरी-बेरी आँखी झपकावत रहिस। सम्मान समारोह के बाद डा० भतपहरी जी हा भोजन अवकाश अउ वोकर पाछू काव्य गोष्ठी के घोषणा करिन।

      भोजन अवकाश मा छत्तीसगढ़ के कोना-कोना ले आये नवा-जुन्ना साहित्कार मन भेंट भलाई अउ जै जोहार करके फोटू खिंचवावत रहिन।

        जेवन-पानी के बाद फेर मंच सजिस। कुछ अउ संबोधन होइस तहाँ ले लगभग 4 बजे डा० भतपहरी जी हा सम्मानित होये साहित्यकार ,अतिथि, अधिकारी मन संग मुख्यमंत्री आवास चलदिन।

   अब कवि सम्मेलन सुप्रसिद्ध गीतकार श्री किशोर तिवारी जी के शानदार काव्यमय संचालन मा  प्रारंभ होइस। कविता पढ़े बर धिकतम तीन मिनट के समे दे गिस। ए सत्र के अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री चेतन भारती जी करिन। मातु शारदा अउ गुरुकृपा ले मंच मा भारती जी के संग हमू ला बइठे के सौभाग्य मिलिस। ए काव्यगोष्ठी मा काव्यानंद के शाम 7 बजे तक अनवरत वर्षा होइस। अंत मा अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद आयोग के तरफ ले मैं त्रुटि-फुटि भाखा मा धन्यवाद ज्ञापित करके अध्यक्ष जी के अनुमति ले कार्यक्रम समापन के घोषणा करेंव।

   कोरोना संकटकाल के बाद ये आयोजन उल्लेखनीय अउ शानदार रहिस फेर भोजन-पानी मा थोकुन अव्यवस्था दिखिस। काव्यगोष्ठी मा नइ रहिके मूर्धन्य वरिष्ठ साहित्यकार मन के अंते चल देना अच्छा नइ लागिस काबर के उन रहिंतिन ता उँखर सामने काव्यपाठ करके हमर जइसे कतको नवसिखिया रचनाकार मन ला बहुतेच प्रोत्साहन मिलतिस।

 कुल मिलाके ये आयोजन गरिमापूर्ण, यादगार अउ लाजवाब रहिस।

 राजभाषा आयोग ला बहुत बहुत बधाई अउ धन्यवाद।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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रिपोर्ताज : छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस - 2021*


छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर मा 28 नवम्बर 2021 के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, रायपुर अउ संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित संगोष्ठी, सम्मान समारोह अउ काव्यपाठ के कार्यक्रम, ठउर संस्कृति विभाग सभागार, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, रायपुर मा सफलतापूर्वक संपन्न होइस। कार्यक्रम के माई पहुना श्री अमरजीत भगत (संस्कृति मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन) अउ खास सगा श्री अन्बलगन पी. (सचिव, छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग) रहिन । 


*उपस्थिति*


आयोजन मा छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर वाट्सएप समूह के संस्थापक डॉ. सुधीर शर्मा सहित समूह के सम्मानीय सदस्य डॉ. सुरेश देशमुख, डॉ. जे.आर.सोनी, डॉ. शकुन्तला तरार, डॉ. बलदाऊराम साहू, डॉ. दीनदयाल साहू, डॉ. अनुसुइया अग्रवाल, डॉ. अनिल भटपहरी, डॉ. अशोक आकाश, श्री किशोर तिवारी, श्री भोलाराम सिन्हा, श्री चेतन भारती, श्री बलदेव भारती जी, छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर परिवार अउ छन्द के छ परिवार दुन्नो के सदस्य अरुण कुमार निगम, सर्व श्री अजय अमृतांशु, ईश्वर साहू आरुग, कौशल कुमार साहू (फरहदा), चोवाराम वर्मा बादल, जगदीश हीरा साहू, पोखनलाल साहू, मिलन मलरिहा, मोहनकुमार निषाद, राजेश कुमार निषाद, श्लेष चंद्राकर, हेमलाल साहू अउ छन्द के छ परिवार के सदस्य सर्वश्री दुष्यन्त कुमार साहू, राज निषाद, दिलीप कुमार पटेल, सुनील शर्मा नील, राकेश कुमार साहू के विशेष उपस्थिति दिखिस। (ये नाम छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर अउ छन्द के छ परिवार के सदस्य मन के आँय। अगर ककरो नाम भुलावत हँव त माफी देहू) एकर अलावा अनेक जिला के अनेक जिला संयोजक, साहित्यकार अउ प्रबुद्ध जन उपस्थित रहिन। संस्कृति विभाग के सभागार खचाखच भराये रहिस। स्थायी व्यवस्था के अलावा उपराहा कुर्सी के व्यवस्था तको करे गे रहिस। ये उपस्थिति आयोजन के सफलता के प्रमाण रहिस। 


*कार्यक्रम के श्रीगणेश अउ वक्तव्य*


कार्यक्रम में कुशल संचालन सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री विजय मिश्रा "अमित" जी करिन। औपचारिक शुरुवात पंथी नृत्य द्वारा होइस। कुछ लोक कलाकार मन छत्तीसगढ़ी गीत प्रस्तुत करिन। माई पहुना के आगमन के बाद छत्तीसगढ़ महतारी अउ सरस्वती दाई के फोटू के आगू दीप प्रज्ज्वलन होइस अउ छत्तीसगढ़ के राजगीत "अरपा पैरी के धार" के संग कार्यक्रम के विधिवत शुरुआत होइस। डॉ. अनिल भटपहरी (सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग) के स्वगात भाषण के बाद खास सगा श्री अन्बलगन पी. अउ श्री विवेक आचार्य

(संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व, छत्तीसगढ़ शासन) मन गैर छत्तीसगढ़ी भाषी होए के बावजूद अपन वक्तव्य के शुरुआत छत्तीसगढ़ी भाषा मा करिन। तेकर बाद डॉ. बिहारीलाल साहू, डॉ. सुरेश देशमुख, डॉ. अनुसुइया अग्रवाल अउ विद्वान वक्ता मन चर्चा गोष्ठी मा छत्तीसगढ़ी भाषा के बढ़ोतरी बर अपन बहुमूल्य विचार प्रस्तुत करिन। इही कड़ी मा महूँ अपन विचार प्रकट करेंव। 


*सम्मान*


छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर मा छत्तीसगढ़ के 19 विभूति मन के सम्मान करे गिस। कार्यक्रम के माई पहुना श्री अमरजीत भगत जी सुरता-चिन्हा (मोमेन्टो) भेंट करके श्री बिहारीलाल साहू जी, श्री हरप्रसाद निडर जी, डॉ. अनुसुइया अग्रवाल जी, डॉ. सुरेश देशमुख जी, श्री पुनुराम साहू जी, अरुण निगम, डॉ. कुसुम माधुरी टोप्पो, श्री गिरवरदास मानिकपुरी जी, श्री रमेश विश्वहार जी, श्री बंधु राजेश्वर खरे जी, श्री श्याम वर्मा जी, श्री गुलाल वर्मा जी, डॉ. दीनदयाल साहू जी, श्री संदीप अखिल जी, श्री नवीन देवांगन जी, श्रीमती लता राठौर जी, डॉ. सुधीर पाठक जी, श्रीमती जयमती कश्यप जी अउ श्रीमती तृप्ति सोनी जी के सम्मान करिन। माई पहुना श्री अमरजीत भगत जी (संस्कृति मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन) ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज मा उपस्थित जन-समूह ला अपन सारगर्भित गोठ-बात द्वारा संबोधित करिन।


*काव्यगोष्ठी*


भोजन काल के बाद कविगोष्ठी के सफल संचालन मधुर युवा कवि श्री किशोर तिवारी जी करिन। ये कविगोष्ठी मा लगभग 15 जिला के 45 कवि मन छत्तीसगढ़ी भाषा मा सरस काव्यपाठ करिन। श्री चोवाराम "बादल" जी सबके आभार प्रदर्शन करिन अउ संझा के सवा छै बजे कविसम्मेलन के समापन होगे।


*माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा सम्मान*


छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मा सम्मान खातिर चयनित जम्मो उन्नीस विभूति मन के सम्मान साँझ के गरिमामय वातावरण मा मुख्यमंत्री-निवास मा होइस। मुख्यमंत्री निवास मा श्री भूपेश बघेल जी (माननीय मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़) गमछा अउ सम्मान-पत्र भेंट करके जम्मो उन्नीस विभूति मन ला सम्मानित करिन। मुख्यमंत्री-निवास मा घलो श्री विजय मिश्रा अमित जी संचालन के दायित्व ला कुशलतापूर्वक सम्हालिन। 


*व्यवस्था* 


(1) *निमंत्रण* - डॉ. अनिल भटपहरी (सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग) अउ जिला समन्वयक द्वारा व्यक्तिगत फोन द्वारा सभागार के क्षमता ला ध्यान मा रखके निमंत्रण दे गिस तभो ले क्षमता ले ज्यादा उपस्थिति रहिस। उपराहा कुर्सी लगाके सब झन के बइठे के सुग्घर व्यवस्था करे गिस।


(2) *फोल्डर* - प्रवेश दुवारी के आगू एक टेबल मा अवइया मन के नाम एक रजिस्टर मा अंकित करके फोल्डर प्रदान करे गिस।


(3) *सेनेटाइजर* - प्रवेश दुवारी मा सेनेटाइजर उपलब्ध रहिस।


 (4) *नाश्ता* - सभागार मा बइठे जम्मो साहित्यकार तीर जाके  नाश्ता बाँटे गिस।


(3) *पानी* - नाश्ता के संगेसंग सबो झन ला पानी के बोतल तको वितरित करे गिस। उपराहा पानी बर दुवारी के बाहर पानी के बोतल उपलब्ध रहिस।


(4) *चाय* - प्रवेश सवारी के किनारे फुल टाइम बर कंटेनर मा गरम चाय अउ डिस्पोजल कप उपलब्ध रहिस। 


(5) *भोजन* - आमंत्रित मन के संख्या के अनुसार भोजन उपलब्ध रहिस। आगंतुक के संख्या अनुमान ले ज्यादा बढ़े के कारण अतिरिक्त भोजन के व्यवस्था करे गे रहिस। 


(6) *वाहन* - मुख्यमंत्री निवास जाए बर आयोग अउ संस्कृति विभाग डहर ले वाहन के व्यवस्था करे गे रहिस। सम्मान होए के बाद हमन वही गाड़ी मा सभागार वापिस घलो आएन। 


(7) *ठहरे के व्यवस्था* - सम्मानित होवइया विभूति मन जेकर लहुटे के साधन नइ रहिस, वोमन ला ठहराए के व्यवस्था करे गे रहिस।


*ये जम्मो व्यवस्था अँखियन देखी आय। कोनो किसम के अव्यवस्था मोला नइ दिखिस।*


*एक बड़का आयोजन मा संतोष अउ असंतोष दुनों किसम के बात सुने बर मिलथे फेर आयोजक मन जानथें कि एक आयोजन बर कतका पहिली ले कतका किसम के व्यवस्था करे बर अनेक तनाव झेलना परथे। व्यक्तिगत आयोजन अलग बात हे फेर सार्वजनिक आयोजन मा आयोजक ला कोनो प्रकार के व्यक्तिगत फायदा नइ मिले।*


*मोर अनुभव के अनुसार छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के आयोजन सोला आना सफल रहिस। कोनो किसम के अव्यवस्था या कमी नइ रहिस। कोनो किसम के अप्रिय घटना नइ घटिस। अनेक जिला ले पधारे अनेक मयारुक साहित्यकार मन संग आत्मीय भेंट करे के सुअवसर मिलिस। सार्थक वक्तव्य सुने बर मिलिस। सरस कविगोष्ठी सुने बर मिलिस। सौहार्द्रपूर्ण वातावरण मिलिस।*


*छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर परिवार के उपलब्धि*


विशेष उल्लेखनीय हे कि आयोजक डॉ. अनिल भटपहरी (सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग) छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर के सदस्य आँय। 


सम्मानित होवइया डॉ. सुरेश देशमुख, डॉ. अनुसुइया अग्रवाल, डॉ. दीनदयाल साहू, एडमिन अरुण कुमार निगम, छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर के सदस्य आँय। 


कविगोष्ठी के संचालक श्री किशोर तिवारी छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर के सदस्य आँय। 


छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर अउ छन्द के छ के करीब 30 सदस्य मन ये आयोजन मा सम्मिलित रहिन। 


*ये सफल आयोजन बर डॉ. अनिल भटपहरी जी अउ उनकर आयोग के टीम, संस्कृति विभाग के सचिव, संचालक अउ उनकर टीम बधाई के पात्र हवँय। संगेसंग  उत्कृष्ट संचालन बर श्री विजय मिश्रा अमित जी अउ कविगोष्ठी के सफल संचालन बर श्री किशोर तिवारी जी बधाई के पात्र हवँय।*


*अरुण कुमार निगम*

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श्लेष चन्द्राकर 9: *मोर‌ अनुभव -*

‘छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर’ समूह के माध्यम ले‌ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित ‘28 नवम्बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस' के उपलक्ष्य मा “सम्मान समारोह अउ कवि सम्मेलन” के सूचना मिल गे रिहिस। मँय अपन‌ संकोची स्वभाव के सेती जावँव धुन नइ जावँव, सोचत-सोचत थोड़कुन‌ देर ले घर ले निकलेंव। अउ महंत घासीदास सभागार, रायपुर मा लमसम 12 बजे पहुँचेंव। पहुँच के देखथँव, सभागार खचाखच भरे रिहिस। बइठे बर घला जगा नइ रिहिस। तब मोला अहसास होइस मोला राज्यस्तरीय कार्यक्रम कार्यक्रम के पहिली सत्र उद्घाटन-सम्मान-संबोधन मा जल्दी आना रिहिस। अब्बड़ देर ले सभागार के दरवाजा तीर खड़े-खड़े‌ वक्तामन के उद्बोधन ला सुनत रहेंव। 

जइसे-तइसे मोला सभागार मा सीट मिलगे। सम्मान समारोह के बेरा डॉ॰ ब्यास नारायण दुबे जी, डॉ॰ बिहारीलाल साहू जी, श्री हरिप्रसाद निडर जी, डॉ॰ अनुसुईया अग्रवाल जी, डॉ॰ सुरेश देशमुख जी, श्री पुनुराम साहू जी, श्री अरुण निगम जी, डॉ॰ कुसुम माधुरी टोप्पो जी, श्री गिरवरदास मानिकपुरी जी, श्री रमेश विश्वहार जी, श्री बंधु राजेश्वर खरे जी, श्री श्याम वर्मा जी, श्री गुलाल वर्मा जी, डॉ॰ दीनदयाल साहू जी, श्री संदीप अखिल जी, श्री नवीन देवांगन जी, श्रीमती लता राठौर जी, डॉ॰ सुधीर पाठक जी, श्रीमती जयमती कश्यप जी अउ श्रीमती तृप्ति सोनी जी ला हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी सेवा करे बर अउ विकास मा अपन अतुलनीय योगदान देय बर सबोझन मन सम्मान झोंकिन येकर साक्षी बनेँव। 


भोजन के बाद कार्यक्रम के माई पहुना माननीय अमरजीत भगत जी(संस्कृति मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन), पगरइत माननीय कुंवर सिंह निषाद जी (संसदीय सचिव, छत्तीसगढ़ शासन), खास सगा श्री अन्बलगन पी.(सचिव, छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग) डॉ॰ अनिल भतपहरी(सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग), श्री विवेक आचार्य(संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग) अन्य विद्वान मन अउ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण, छ.ग. के सांस्कृतिक तत्व अउ लोकनायक मन के ऊपर लेखन, राज-काज मा छत्तीसगढ़ी, आठवीं अनुसूची मा छत्तीसगढ़ी, पाठ्यक्रम व छत्तीसगढ़ी के ऊपर बड़ सुग्घर-सुग्घर अउ तथ्यात्मक विचार सुने बर मिलिस। 

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग हा पहुना मन बर भोजन के व्यवस्था रखे रिहिस। ओखर घोषणा होइस ता लोगन मन भोजन भुला के पहिली अपन-अपन चिनपहिचान वाले मन ले मिले बर शुरू कर दिन अउ एक-दूसर के हालचाल जाने लागिन। आज के दिन ला यादगार बनाये सब सेल्फी ले बर अउ ग्रुप फोटो खिंचवाये लागिन। ये बीच मोला छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अउ नामी साहित्यकार मन ला तीर ले देखे बर मिलिस। कुछ झन ले नवा परिचय होइस। अउ मोला मोर संगी मन ले घलो मिले के मौका मिलिस। 


कार्यक्रम के दूसर ‘काव्य पाठ' सत्र मा छत्तीसगढ़ के जम्मों जिला ले आये प्रतिनिधि रचनाकार मन के कविता, गीत, छंद अउ ग़ज़ल सुने बर मिलिस। सबो रचनाकार मन के सबके प्रस्तुति जोरदार रिहिस। आदरणीय चोवाराम बादल जी, पोखन जायसवाल जी, सुशील शर्मा नील जी, मोहन निषाद मयारु जी, राजेश निषाद जी, हेमलाल साहू जी, राकेश कुमार साहू जी, अजय अमृतांशु जी, मिलन मलरिहा, जगदीश हीरा साहू जी, डिजेन्द्र कुर्रे जी, धनीराम नंद ‘मस्ताना’ जी, सुकमोती चौहान जी,  प्रेमचंद साव जी, मानकदास मानिकपुरी जी, डॉ॰ अनुसुईया अग्रवाल जी, बंधु राजेश्वर खरे जी, किशोर तिवारी जी आदि मन अपन प्रस्तुति ले श्रोता मन के मन मोह लिस। जिनकर मन के नाँव ला सुने रेहेंव या जिनकर रचना मन ला पत्र-पत्रिका या सोशल मीडिया के माध्यम ले पढ़े रेहेंव उँन मन के प्रस्तुति ला प्रत्यक्ष देखे के मौका मिलिस हे। बड़े रचनाकार मन के प्रस्तुति ले मोला जे-जे सीखे बर मिलिस ओ बस ला मँय सदा सुरता रखहूँ । राज्यस्तरीय मंच मा मँहू ला अपन रचना पाठ के अवसर मिलिस। ये मोर बर बड़े उपलब्धि रिहिस हे। ओ बखत ला मँय कभू नइ भुला सकँव।

अंत मा मँय अतके कहना चाहत हँव। कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के पबरित अवसर मा बड़ जोरदार आयोजन रिहिस हे। मंच संचालक मन के संचालन स्तरीय रिहिस। सबो चीज के सुग्घर व्यवस्था रिहिस हे। येमा मोला छत्तीसगढ़ी भाखा के के बारे मा नवा-नवा अउ उपयोगी जानकारी मिलिस हे। अइसने कार्यक्रम आगू बछर मा जब भी, जेन जगा आयोजित होही, ओमा मँय संघरे के खच्चित प्रयास करहूँ। 


*श्लेष चन्द्राकर*

खैरा बाड़ा, गुडरु पारा, 

महासमुंद (छत्तीसगढ़)

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सुरता// साहित्यकार मन के गिरौदपुरी धाम यात्रा..

 सुरता//

साहित्यकार मन के गिरौदपुरी धाम यात्रा..

    हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी म धर्म उपदेश देवत "मनखे-मनखे एक बरोबर" के जयघोष करइया गुरु घासीदास बाबा जी के जन्म भूमि, कर्म भूमि अउ तपो भूमि के दर्शन करे के अबड़ दिन के साध रिहिसे. फेर ए साध ह तब पूरा होइस, जब 2 अगस्त 2015 दिन इतवार के अखिल भारतीय गुरु घासीदास साहित्य अकादमी अउ मिनी माता फाउंडेशन द्वारा रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार मनला गिरौदपुरी के जन्म अउ कर्म भूमि,  तप भूमि छाता पहाड़ अउ पंचकुंड यात्रा के संगे-संग माता शबरी के धाम शिवरीनारायण के घलो एक संग दर्शन करवाए गिस. 

   साहित्यकार मन के ए आध्यात्मिक यात्रा म छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त साहित्यकार डाॅ. सुशील त्रिवेदी, सद्भावना दर्पण के संपादक साहित्यकार गिरीश पंकज, सृजन गाथा डाट काम के संपादक जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा, अजय किरण अवस्थी, सुशील भोले, प्रवीण गोधेजा, मुकेश वर्मा के संगे-संग यात्रा के आयोजन संस्था डहर ले डॉ. जे.आर. सोनी अउ रामस्वरूप टंडन जी शामिल रहिन. 

    ए बात ल तो आज सबो जानत हें, वर्णव्यवस्था अउ मूर्ति पूजा के नांव म ए देश म जब भेदभाव अउ अत्याचार अपन चरम म पहुंचत गिस, तब कतकों महात्मा अउ गुरु मन पीड़ित वर्ग के उत्थान खातिर जबर अभियान चलाए रिहिन हें. ए रद्दा म गौमत बुद्ध, गुरु नानक देव ले लेके कबीर दास जी जइसे महान विचारक अउ समाज सुधारक मन सामाजिक अउ धार्मिक जागरण कर के पीड़ित वर्ग के लोगन ल आध्यात्मिक अउ सामाजिक ताकत देइन. अइसने हमर छत्तीसगढ़ राज म गुरु घासीदास जी ह सतपुरुष के उपासना करत शोषित पीड़ित अउ उपेक्षित लोगन ल एकफेंट कर के सामाजिक उत्थान के जबर बुता करे रिहिन हें.

  गुरु घासीदास जी के जनम के संबंध म जेन जानकारी मिलथे, वोमा सबले जादा प्रमाणित शासकीय तौर म लिखे गजेटियर ल माने जाथे. सन् 1993 म लिखे गे रायपुर जिला के गजेटियर के अनुसार गुरु घासीदास जी के जनम अगहन पूर्णिमा दिन सोमवार 18 दिसंबर 1756 ई. के एक कृषक परिवार म ग्राम गिरौदपुरी जिला -रायपुर (अब बलौदाबाजार) म होए रिहिसे. घासीदास जी के पूर्वज पवित्र दास जी संपन्न किसान रिहिन. पवित्र दास ले मेदिनी दास, दुकालु दास, सगुन दास, मंहगु दास अउ फेर घासीदास जी होइन. घासीदास जी के पीढ़ी ल 1756 ले 1850 तक माने गे हे. घासीदास जी के बिहाव सिरपुर निवासी किसान अंजोरी दास जी के बेटी सफुरा संग नान्हेपन म होगे रिहिसे. उंकर चार बेटा अउ एक बेटी होइन. बेटा म अमरदास, बालकदास, आगरदास अउ अड़गढ़िया दास होइन. बेटी के नांव सुभद्रा बाई रिहिस, जेकर बिहाव बिलासपुर जिला के गाँव कुटेला म होए रिहिसे.

   हमन 2 अगस्त'15 के बिहनिया 9 बजे रायपुर ले निकलेन. डॉ. जे.आर. सोनी जी हमन ल रस्ता म जावत खानी बतावत रिहिन हें, रायपुर ले सीधा गिरौदपुरी जाबो. पहिली जन्मभूमि के दर्शन करबो, फेर कर्मभूमि जाबो. उहाँ कुतुबमीनार ले भी ऊंचा जेन जैतखाम बने हे, वो सबला देखत फेर दुसरइया जुवर बाबा जी के तपोभूमि छाता पहाड़ जाबो तहाँ ले उहिच डहर ले बार नवापारा अभ्यारण होवत  वापिस रायपुर आ जाबो.

    हमर मन के गिरौदपुरी के पहुंचत ले मंझनिया के 12 बजगे राहय. उहाँ गेन त पता चलिस के जन्मभूमि तक बड़का गाड़ी मन नइ जा सकय, तेकर सेती रेंगत जाए बर लागही. अगस्त के महीना माने पानी-बादर के दिन. रेंगत गेन त गली म पानी रेंगे के चिनहा दिखत राहय. जन्मभूमि जगा पहुंचेन, त वोकर आगू म एक चौंरा असन बने रिहिसे, जेमा एक जैतखाम अउ एक बोर्ड गड़े रिहिसे. बोर्ड म गुरु घासीदास जन्म स्थान लिखाय रिहिसे. हमन ल लागिस के इही जन्मस्थान आय. तब सोनी जी बताइन, ए ह जन्मस्थान वाले घर के बाहरी भाग आय. एदे जेन घर दिखत हे न वोकर अंदर हे जन्मस्थान ह. काहत हमन ल घर के भीतर लेगिन. उहाँ घर के भीतर एक झन नोनी भर राहय, जे ह जेवन बनावत राहय. हमन ल उहाँ आए देखिस त वो नोनी ह बाबाजी जिहां जन्म लिए हें, वो कुरिया म लेगिस. वो छोटे असन कुरिया म एक अखंड जोत जलत रिहिस. उही जगा एक कुर्सी म सादा कपड़ा ऊपर खड़ाऊ माढ़े रिहिसे. हमन वोकर दर्शन पैलगी करेन. तहाँ ले कर्मभूमि जाए खातिर निकल गेन.

    कर्मभूमि स्थल पहुंचेन, त लागिस, कोनो बड़का तीरथ-बरत म आगे हावन. जन्मभूमि अउ कर्मभूमि स्थल के विकास म अतेक अंतर कइसे हे? त सोनी जी बताइन, जन्मभूमि के देखरेख अउ सबो व्यवस्था ल उही घर वाला मन ही बिना ककरो सहयोग के खुदे करथें. जबकि इहाँ कर्मभूमि म एक ट्रस्ट हे जेन ह एकर देखभाल अउ विकास के काम करथे. तेकर सेती दूनों जगा के विकास म अतका अंतर दिखत हे. उन कहिन, फेर हमन कोशिश करत हवन के जन्मभूमि के देखभाल घलो एकाद समिति या ट्रस्ट के माध्यम ले हो जाय, तेमा उहू स्थान के गरिमामय विकास हो सकय. (ए लेख संग संलग्न जम्मो फोटो उही दिन के खींचे आय).

    सोनी जी के मार्गदर्शन म हमन कर्मभूमि ल अच्छा से देखेन-घूमेन, बाबा जी के आशीष लेन. तब फेर नवा-नवा बने विशाल जैतखंभ देखे बर गेन. तब वोकर विधिवत उद्घाटन नइ हो पाए रिहिसे, तेकर सेती उहाँ कोनो ल जाए के अनुमति नइ रिहिसे. तब सोनी जी उहाँ के व्यवस्था देखइया मन ल बताइन के, ए मन सब रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार आंय, हमन इनला विशेष रूप ले इहाँ के दर्शन कराए खातिर ही लाने हावन. त फेर सिरिफ हमन ल ही विशाल जैतखंभ म जावन दिन. जैतखंभ म ऊपर चढ़े खातिर लिफ्ट तो लगे रिहिसे, फेर उद्घाटन नइ होए के सेती वो ह चलत नइ रिहिसे. त फेर हमन दर्शन करे बर आए हावन त वोकर महत्व तो रेंगत जवई म ही हे, काहत रेंगत ही पूरा ऊपर तक चढ़ेन.

   जैतखंभ के नीचे उतरत ले बनेच बेरा होगे राहय, त सोनी जी कहिथें- चलौ पहिली कोनो जगा जेवन कर लिए जाय, तेकर पाछू फेर आगू के रद्दा धरबोन. वोमन बताइन के इहाँ ले बस थोरके दुरिहा म महानदी के पुलिया हे, जेन ह बलौदाबाजार अउ जांजगीर जिला ल जोड़थे, उही जगा बढ़िया असन ढाबा हे, तिहां चलथन. 

   ढाबा म जेवन करत बेरा पता चलिस के ए पुलिया के वो पार तो शिवरीनारायण हे. त डॉ. सुशील त्रिवेदी जी कहिन, अरे अतेक लकठा आगे हावन त चलौ शबरी माता के ठउर के घलो दर्शन कर लेथन. 

     सबो झन हां म हां मिलाएन तहां ले शिवरीनारायण चल दिएन. उंहो बने देखेन किंदरेन. मैं पहिली घलो उहाँ गे रेहेंव, फेर मंदिर के भीतर गर्भगृह म नइ जा पाए रेहेंव. इहू बखत जब हमन उहाँ गेन त उहाँ के पुजारी मन गर्भगृह के भीतर जाए के कोनो ल अनुमति नइहे किहिस. फेर जब उनला बताए गिस के एमन सब रायपुर के साहित्यकार आंय, संग म छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी घलो संग म हें, त फेर मुख्य पुजारी ह खुदे हमन ल भीतर लेगिस. उहाँ पहिली बार देखे बर मिलिस के भगवान शिवरीनारायण के पांव के नीचे म जलधारा प्रवाहित हे. पुजारी बताइस, के ए ह महानदी आय भगवान के चरण पखारे खातिर ए जगा स्वयं प्रकट होए हे.

   बेरा बनेच होए ले धर ले रिहिसे. सोनी जी कहिन के जल्दी चले बर लागही, काबर ते बाबा जी के तपोभूमि छाता पहाड़ ह बनेच दुरिहा हे. फेर उहाँ आप सबो साहित्यकार मन के आज के यात्रा अउ बाबा घासीदास जी के संबंध म वक्तव्य घलो लेना हे. असल म हमर मनके ए पूरा यात्रा के मिनीमाता फाउंडेशन द्वारा विडियो रिकार्डिंग करे जावत रिहिसे.

   हमन ल छाता पहाड़ के पहुंचत ले बनेच बेरा होगे रिहिसे, तभो बेरा बूड़े बर अभी बहुत जुवर बांचे रिहिसे. सोनाखान क्षेत्र के अंतर्गत अवइया ए ठउर म हमन ल आत्मिक शांति के अद्भुत अहसास होइस. छाता पहाड़ के दर्शन परिक्रमा करे के पाछू हमन वो पांच कुंड मनला देखे बर गेन, जेकर जल ल देके बाबाजी ह शारीरिक मानसिक असाध्य रोग ले ग्रसित लोगन ल उंकर ले मुक्ति देवावत रिहन हें. 

  मुंधियार होए असन होए ले धरिस, तब उही जगा के चातर जगा म हमन ल बइठार  के वो दिन के यात्रा अउ अनुभव के वक्तव्य रामशरण टंडन जी एंकर के रूप म लिन. सबो झन अपन- अपन अनुभव के बात बताइन. महूं अपन बात राखेंव, संग म मिनीमाता अउ छत्तीसगढ़ महतारी के बीच सामंजस्य स्थापित करत अपन एक गीत घलो सुनाएंव-

मोतियन चंउक पुराएंव जोहार दाई

डेहरी म दीया ल जलाएंव जोहार दाई

छत्तीसगढ़ महतारी परघाए बर

अंगना म आसन बिछाएंव...

   ए गाना ल सुने के बाद डॉ. त्रिवेदी जी मोला कहिन- सुशील आज के तो तैं ह मंच ल लूट लिए रे.

   दिन बुड़े ले धर ले रिहिसे तइसने हमन रायपुर वापसी खातिर निकलेन. आवत- आवत मन म ए चार लाईन गूंजे लागिस-

गुरु बाबा के कहना हे- मनखे-मनखे एक समान

सतमारग अउ सत बानी ले ही आही नवा बिहान

सब सिरजे हें एक जोति ले इहीच हमर पहचान

ऊंच नीच के भेद करत करथौ कइसे फेर अभिमान

(संस्मरण संग्रह "सुरता के संसार" ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

तुतारी चन्द्रहास साहू 8120578897

 तुतारी 

                                                     चन्द्रहास साहू

8120578897


      हा.. हा.. तो.. तो.. के  आरो के संग खेत जोतत हावय सियनहा हा । बइला मन घला आज अब्बड़ मेछराइस फेर सियनहा के हाथ के तुतारी हा कच्च ले बाखा म परे तब तरमरा के रेंगें। सियान के जी घला कउवागे आज। अगास ला देखे सादा करिया गुंगवा कस बादर हा रेंगत रहाय फेर भुइंया म नई गिरीस । चिरीरिरी फट्..... अब्बड़ आरो संग गरजिस घुमरिस बादर हा फेर बूंद भर नई बरसिस । कभू अगास कोती ला कभू नांगर कोती ला देखे अऊ नांगर के पड़की ला धर के कुंड म कुंड मिलाये परदेसी हा । फेर भुंइया मा बरोबर पानी दरपाये नई हावय तब कइसे नांगर हा गड़ही ...? बइला हा घला तुतारी के डर म रेंगे , सामरथ करे। बइला लाहकगे । 

अब्बड़ बिनती करिस परदेसी हा गिर जा गंगा मइया गिर जा। फेर.. पानी नई गिरिस। काया के पसीना हा गिरे लागिस तरतर - तरतर । परदेसी के नांगर फेर चभकगे । हला डोला के अटेसीस अऊ फेर चमकाइस बइला ला हर्रे ..हर्र.. तता ... तता...त त....। बाखा म फेर तुतारी मारिस। बइला बमियागे। ताकत नस नस मा दउड़े लागिस जइसे  दस हाथी के बल समागे । दुनो बइला संघरा ताकत लगाइस जुड़ा मा... फेर नागर तो टस ले मस नइ होइसअतका सामरथ मा।  फेर जुड़ा हा सुलरागे,नोई टूटगे अऊ बइला मन बारा हाथ आगू कोती दउड़े लागिस । परदेसी मुड़ी ला धर के बइठगे का करव भगवान पानी के बेवसथा कहा ले करव..? एक एक पइसा ला जोर के बोर खोदवाये हव। पानी घला हावय फेर बिन बिजली अभिरथा हावय। अब्बड़ दउड़े भागेव घला कतको झन साहब मन आइस गिस जम्मो कोई ला तो पइसा देये हव फेर बोर मा बिजली कनेकसन  नई खिचाइस। 

            परदेसी तरमराये लागिस का करव मेहा.. हफरगे । कुंदरा ले टूटहा साइकिल ला निकालिस अऊं डंडिल मा बांस के कमचील बांध के दुनो चक्का मा हवा भरिस । परदेसी के आरो ला पाके कलवा कुकुर हा घला आगे अऊ राख माटी मा घोण्डइया मारे लागिस । 

“ नानजात ”

 बखानत नानकून ढ़ेला मा फेक के मारिस परदेसी हा कुकुर ला । कु.कु... करत भागगे ओहा । लकड़ी के बोझा ला बोहो के आइस परदेसी के गोसाइन दमयंतीन हा

 “कहा जावत हस, मार तरमिर. तरमिर.....? "

बोझा ला पटकत किहिस । अऊ पसीना ला गुड़री मा पोछे लागिस ।

 "जात हव उही डाहर तहू जाबे ते चल ” परदेसी किहिस । गड़गड़ गड़गड़  एक लोटा पानी ला पियिस दमयंतीन हा अऊ नानकून पोटरी मा कुछू ला धरत साइकिल के केरियल मा बइठगे ।

       अब्बड़ सइमो सइमो करत रिहिस आफिस हा। आफिस के एक कोती बिगड़ाहा टासफारमर, तार केबल अऊ दुसर कोती पावर हाऊस बड़का बड़का बिजली खम्बा । संगमरमर लगे आफिस के डेरउठी ला जइसे खुंदिस कान मा आरो आइस 

“फरस ला मइलाहा झन कर डोकरा ।”

चपरासी आए तमकत रिहिस । परदेसी हा पनही ला हेरके खनखोरी म चपक लिस अऊ दुसर हाथ मा तुतारी ला धरे रिहिस । 

"बड़का साहेब ले भेंट करना हे बाबू ।"

परदेसी के गोठ ला सुनके चपरासी हा भभकत रिहिस। अंगरी देखा के बड़का साहब के कुरिया ला देखा दिस ।  

    “ राम राम साहेब”

 परदेसी किहिस । गोटारन कस आंखी ला चश्मा ले देखिस अऊ फेर फाइल मा गड़गे । 

"मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरके आ जाथो कोन जन के दिन के नहाये नइ हावस ते..? पसीना के बस्सई छीः छीः...।"

 साहब फुसफुसाइस अऊ मुहु ला करू करू करे लागिस । 

"स ..स.. साहेब मोर फारम  ?“

गोटारन कस आंखी वाला हा फेर देखिस दुनो  परानी ला अऊ फेर फाइल मा आंखी गडि़या दिस । दुनो परानी भुइया मा फसकराके बइठगे आगू के गद्दा वाला खुरसी मे बइठे के सामरथ नई करिस । 

“भागवत” 

साहब के आरो ला सुनके चपरासी आगे।

 “बरा भजिया अऊ चाहा लानबे  गरमा गरम जा’’

 ” हव "

चपरासी हुकारू दिस अऊ ठाड़े रिहिस।

 ” दे दे पइसा ताहन तोर फारम ला देखहू ।"

साहब किहिस । परदेसी अऊ गोसाइन एक दूसर ला देखे लागिस । सलूखा के खिसा ले चिपटी कस मुड़े पचास रूपिया ला दिस ।

“अतकी मा का होही डोकरा...!"

 चपरासी मुचकावत किहिस

 “पच्चीस पचास अऊ दे दे ”गोटारन कस आंखी ला रमजत साहब किहिस अऊ दमयंतीन हा पोलखा के खिसा ले पंदरा परत ले चिपटाये बीस रूपया ला हेर के दिस । 

“बिन पइसा के आ जाथो ” चपरासी हा फुसफुसावत किहिस अऊ रेंग दिस । अब साहब के नजर हा दमयंतीन के उपर ठाढ़े होगे झुंझी चुंदी मुड़ी ,बजरहा खिनवा फुली चिरहा लुगरा अऊ चिरहा पोलखा के ओ पार...। 

         टेबल मे परदेसी के फाइल माड़े रिहिस । बड़का बड़का कागज नकसा खसरा बी वन । परदेसी झटकुन चिन डारिस अपन अंगठा के चिन्हा अऊ संरपच के ठप्पा ला। चश्मा ला उठा उठाके अपन आंखी ला एक एक पन्ना मा गडि़याइस ,कभू करिया पेन मा कभू लाल  पेन मा कागजात मा चिन्हा लगाये लागिस अऊ अपन गुड़गुड़ी वाला खुरसी ला आगू तिरत साहब हा कहिथे

  ’’परदेसी तोर इस्टीमेट बने नई हे। टांसफारमर  ले तोर खेत हा सात पोल के दुरिहा हावय अऊ ऐमा पांच पोल देखावत हे ’’।

  “कोन जन साहेब नाप जोख तो तुमन ला आथे हमन तो अड़हा आवन ”परदेसी किहिस कभू नकसा खसरा बिगड़गे हावय किहिस तब कभू फारम मा संरपंच के दसकत नई हे किहिस अऊ आने साहब मन। कब बिजली लगही भगवान ..?

.परदेसी संसो करे लागिस । 

"तोर ले आगू वाला साहब ला चार हजार देये रेहेव। ओखर आगू वाला ला तो पंद्रा सौ देये रेहेव साहेब बछवा ला बेचके।" परदेसी अब हाथ जोड़ डारे रिहिस।

 ’’ये जस के बुता तोरे हाथ मा होही अइसे लागथे साहेब मोर बनौती बना दे । हाथ जोरत हव साहेब, मोर बनौती बना दे’’ दमयंतीन घला हाथ जोर के किहिस । 

"बन तो जाही परदेसी फेर तोला खरचा करे ला परही पचीस तीस हजार’’ साहेब हा जुड़ सांस लेवत किहिस अऊ बरा भजिया ला झड़के लागिस । 

‘कहा ले लानहू साहेब ’ परदेसी किहिस ।साहेब के आंखी दमयंतीन के बांहा के पहुची मा जामगे । 

"तोर घरवाली हा बाहा मा पहिरे हावय ते का गहना आए परदेसी...? "

दमयंतीन बाहा  ला अछरा मा तोपे लागिस

 “पहुची आए साहेब ”  ।

सुघ्घर दिखत रिहिस चांदी के चमकत जोखी भराये सांप कस सलमिल सलमिल करत हे , सुघ्घर  फुल छप्पा अऊ सोनार के कलाकारी घात सुघ्घर हे । 

"साहब मोर दाई हा चिन्हा देये हे अब्बड़ मया करे साहेब। एक दिन मलेरिया के बुखार होइस अऊ एके दिन मा ताला बेली होगे , पान परसाद घलो नई खवा सकेन । दमयंतीन ऐके सांस मा गोठियाइस ओखर आंखी जोगनी कस बरिस अऊ बुता घलागे आंखी के कोर के आंसू ला पोछिस दमयंतीन हा । 

   एक ठन उदीम हावय परदेसी तोला पइसा नई लागे ।

 “का साहेब’’ परदेसी अऊ तीर मा जाके पुछिस। 

"सरकार हा एक ठन योजना बनाये हावय जेखर लाभ देवाहू अऊ योजना कोती ले पइसा जमा हो जाही । तोला एको पइसा नइ लागे फेर ... । "

साहब  काहत काहत अतरगे । चाहा ला ढोक्कोम ढोक्कोम पीये लागिस ।

 "परदेसी मेंहा मोर घर मा छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती बनवाथव ओहा तोर गोसाइन के पहुची ला पहिरही तब सुघ्घर लागही सौहत छत्तीसगढ़ महतारी लागही अब जमाना घलो बदलगे कोनो नारी परानी अइसन गहना जेवर नइ पहिरे ....।"

 साहेब अपन चतुराई मा मुचकाये लागिस अऊ दुनो परानी एक दुसर के सिकल ला देखे लागिस । 

  ’’इनाम तो मांगत हव परदेसी , कतको किसान हा अंकाल मा मरत  हावय मेहा तोला बचाये के उदीम बतावत हावव । तोर बोर मा बिजली अमरही तभे तो भक्कम पानी निकलही अऊ अंकाल के मुहु ला नई देखस ...। 

“ देख ले परदेसी तोर गोसाइन के बाहा के पहुची हा मोर घर मा पहुचही तभे तोर खेत मा बिजली पहुचही परदेसी इमान से” साहेब हा किरिया  खाइस अऊ पान घला । 

’’इमान से मेहा घुस नई लेवत हव ,ओ तो छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती के सवांगा बर मांगत हव "

साहब अऊ आगू किहिस । 

 परदेसी के आंखी मा उज्जर भविस दिखे लागिस । दमयंतीन घला अंकाल के परछो ले  निकले के रद्दा देखे लागिस अऊ पहुची ला हेर के दे दिस । छाती म पथरा लदके सुल्हर डारिस पहुची ला । आँखी ले झर झर आंसू आवत रिहिस। अपन पहेलात नोनी ला गवाइस तब के दुख अऊ अब के दुख दुनो बरोबर रिहिस। कतको बड़का दुख आ जावय परदेसी ठाढ़े रहिथे पहार कस । कोनो आँधी धुंका झन आये अइसे । सिरतोन आज के धुंकी तो अधमरहा कर दिस दुनो कोई ला। साहब मुचकाये लागिस जइसे कुबेर के खजाना ला पोगरा डारिस अइसे । कोन जन  ओखर बोर के पानी कब बोहाही ते फेर दमयंतीन के आंखी ले पानी बोहाय लागिस । हाथ गोड़ टूटे कस लागिस । झिमझिमासी लागिस अऊ परदेसी के खांध ला धरके थामिस । 

“ए एक महीना पाछू आके आरो कर लिहू ” साहब किहिस अऊ खिड़की कोती ले पच्च ले पान के पीक ला थूकिस । 

चपरासी हा कोल्ड्रिक के गिलास धरके ठाढ़े रिहिस साहब झोकिस अऊ लेवव तहू मन पी लेव कोल्ड्रिक किहिस । "न ...नही साहेब, हमन ला नइ सहे आनी बानी के जिनिस हा ...। परदेसी के अंतस मा अंगरा बरत रिहिस फेर जुड़ाके किहिस । 

साइकिल के मुठा मा सामरथ फबे लागिस। नस नस मा लहू दउड़े लागिस। साइकिल उत्ता धुर्रा दउड़े लागिस । दमयंतीन केरियल मा बइठे रिहिस अऊ पोटरी के फुटे चना ला खवावत गिस परदेसी ला । फुटे चना के संग डुरू चना ला मसक डारिस परदेसी हा अऊ कभू कभू तो गोटी माटी ला घला खटरंग ले चाबिस। लीम के जुड़ छाव मा अतरके पानी पियिस अऊ फेर रेंगे लागिस अपन रद्दा। पेट के भभकत आगी ला कतका बुताइस चना ते उही जाने फेर कोनो डाहर आथे जाथे तब अइसना चना ला धर लेथे दमयंतीन हा ।

             बटकी भर बासी अऊ चुटकी भर नून के खवइया परदेसी हा कोनो जिनिस के लालच नई करिस फेर अगास ला देखथे तब संसो हो जाथे । सावन भादो मा आगी सुलगत सुरूज देवता अऊ अइलावत खेत के धान । पानी के मारे पियासे भुइया अऊ मरत मछरी कोतरी...। बटकी भर बासी के बेवसथा कइसे होही भगवान.....? तहू ठगत हावस का लबरा बादर ...? बिजली वाले साहब कस लबरा । दु महीना होगे आज ले बिजली के दउहा नई हावय,पइसा पहुची जम्मो गवागे । परदेसी बियाकुल होगे साइकिल ला निकालिस तुतारी ला धर के रेंग दिस आने गांव के रद्दा ... अकेला । 

            "कइसे साहेब मोर खेत मा बिजली कब लगही ...?अऊ लगही कि नही वहू ला बता ...? परदेसी बड़का साहब के कुरिया मा खुसरत किहिस।  ओखर आंखी मा लहू उतरे कस लाल रिहिस , चुन्दी छतराये , माथा मा लाल टीका अऊ हाथ मा तुतारी चिरहा सलूखा अऊ नानकुन पटका । कोठ मा टगाये भगवान  भोलेनाथ के रौद्र रूप देखे साहब हा तब परदेसी के बरन ला।

“ल लग जाही न परदेसी संसो झन कर ” साहब डर्रावत किहिस इही गोठ ला तो सुनत जोजन होगे साहेब फेर कब लगही ते ..? महू जानथव सुचना के अधिकार ,लोक सेवा गारंटी अधिनियम ला । जान डारेव तुहरे आफिस मा लगे सी0सी0 टी0वी0 केमरा के आगू मा मोर गोसाइन के पहुची ला नगाये हस तौन ला । सी0डी0 घला बनवा डारे हव इमानदार बाबू जेखर टरासफर करवाये हस तेखर ले मिलके’’परदेसी किहिस मेछा ला अइठत। 

    साहब थरथराये लागिस अऊ टेबल के तरी मा कही ला खोजे के उदीम करिस ।

’’साहेब कतका लबारी मारथस तौन ला अब घला जान डारेव । साहेब खेत जोतथन अऊ बइला मेछराये लागथे तब बाखा मा तुतारी परथे तब सोझिया जाथे ।"

 परदेसी फेंर किहिस ।

   परदेसी के हाथ के तुतारी ला देखे लागिस साहब हा डेढ़ दु हाथ के पातर लउठी अऊ आगू कोती खिला लगे सुचकी ....। कच्च ले गड़े कस लागिस साहब ला अऊ लाइनमेन ला बला के कागज मा दसकत करत बिजली खंभा तार अऊ आने जिनिस ले भरे ट्रक ला पठोय बर किहिस परदेसी संग। टेबल मा माड़हे पहुची ला धर लिस परदेसी हा अपन गोसाइन के अऊ गरेरा कस बाहर आगे । 

  साहब हा पसीना पोछे लागिस अड़हा परदेसी हा अब सब ला जानथे .......फुसफुसाइस  अपने अपन ...तुतारी लागे सही कच्च ले गडि़स साहब के..।        

                     

                            

चन्द्रहास साहू

  द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दा नगर धमतरी

जिला धमतरी (छ.ग.)

मो. नं 8120578897

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छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य गम्मत 

दुर्गा प्रसाद पारकर 

छत्तीसगढ़ म दू राज, जेमा अट्ठारा-अट्ठारा गढ़। दूनो राज ल मिल के छत्तीसगढ़ नाव परे हे। रतनपुर राज म- रतनपुर, मारो, विजयपुर, खरोद, कोटगढ़, नवागढ़, सौथी, ओखर, पडरभट्ठा, सेमरिया, चांपा, लाफा, छूरी, केड़ा, आतिन, उपरिया, पेंड्रा, फुरकुट्टी अऊ रायपुर राज म - रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, अमेरा, दुर्ग, सारड़ा, सिरसा, मोंहदी, खल्लारी, सिरपुर, राजिम, सिंगनगढ़, सुअरमाल, टेंगनागढ़ अऊ अकलवारा ह आवय। छत्तीसगढ़ म मध्यप्रदेश के दक्षिण पूर्वी जिला रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा, दुर्ग, राजनांदगांव अऊ बस्तर ह आथे। छत्तीसगढ़ी ह छत्तीसगढ़िया मन के चिन्हारी कराथे। इहें के प्रसिद्ध लोक कृति नाचा म छत्तीसगढ़ के झांकी देखे बर मिलथे। अइसे माने जाथे कि नाचा के पीकी गड़वा साज ले फूटीस होही। कोई कथे नाचा के शुरुवात चैंका ले होइस होही। जइसे भी हो। गड़वा साज ल गुदुम साज घलो भाखे जाथे। गाड़ा जात के मन दफड़ा, डमऊ (डमरु), मोंहरी, तासक, मंजीरा, गुदुम (सींघ) बजावय तेखरे सेती ए बाजा के नाव गड़वा बाजा परिस। अब गड़वा बाजा ल कोनो भी जात के मन बजाथे। तभे ए बाजा ल समाजिक बाजा के नाव ले जाने ल धर ले हे। गांव-गांव म बजनिया मन के साज रथे। छत्तीसगढ़ म प्रमुख रुप ले तीन साज हे- (1) गड़वा साज (2) खड़े साज (3) बइठक साज। गड़वा साज के चलते चलत खड़े साज (चिकारा, तबला, मंजीरा, परी अऊ मशालची) ह चलन म अइस होही। खड़े साज म मसाल (सीसी बोतल के) ले अंजोर के बेवस्था करय। जोक्कड़ ह तार म चेंदरी ल बांध के माटी तेल डार-डार के भपका बार-बार के कतको अकन खेल तमासा देखवत जनता जनारदन ल मोहे रहिथे। अब तो खड़े साज ल मसाल धर के खोजबे त ले दे के दुए चार ठन नेंग बर मिल जही। खड़े साज म खड़े-खड़े बजइया गवइया मन ओरी-पारी मंच म चघथे। देवी-देवता के वंदना करके कार्यक्रम के शरुआत करथे-

गाइए हो गनपति जगबन्दन

स्ंाकर सुअन भवानी जी के नंदन

पति जगबंदन, पति जगबंदन

गाइए हो गनपति जगबंदन

छत्तीसगढ़ म मानदास टण्डन (सेमरिया) अऊ समे दास बंदे (डूडेंरा) के खड़े साज ह जादा प्रसिद्ध हे। जऊन मन ए साज ल जिंदा राखे हे। खड़े साज म एक झन गाथे तेन ला बाकि मन झोंकथे। खड़े साज म रास गीद के बानगी एदइसन हे-

ठगनी का नैना चमकाए

कद्दू काट मिरदंग बनाए 

लीमू कांट मंजीरा

पांच तरोई मिल मंगल गावें

नाचे बालम खीरा 

ठगनी का नैना चमकावै

गाना के सरा देवाते भार जोक्कड़ मन गम्मत ल नापे ल धरथे। खड़े साज ह बइठका साज (हारमोनियम, ढोलक, तबल, जोक्कड़, परी, जनाना, बेंजो क्लारनेट) म विस्तार पइस। नवा-नवा म बइठक साज ह देखनी हो गे रीहिस हे। बइठक साज बर गियास (पेट्रोमेक्स) ले अंजोर के बेवस्था होय ल धर लीस अऊ अब बिजली बत्ती ले। सन् 1952 के आसपास जंजगीरी (नैला), रिंगनी-रवेली पार्टी (मंदराजी मदन), दुरुग पार्टी (सीताराम) मन ह नामी नाच पार्टी रीहिन। बिजली अऊ रेडियो आय के बाद तो नाचा के रौनक बाढ़ गे। जिंहा बिजली के बेवस्था नइ राहय उहाँ बड़े पार्टी मन अपन संग जनरेटर घलो लेगत रीहिन हे। जऊन ह गांव-गंवई म देखनी हो जय। डाॅ, बल्देव कथे- “गम्मत नाचा ह छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य संस्कृति के निर्मल दरपन आय। एमा एक तनी देहाती जीवन के संघर्ष, जटिलता अऊ विसंगति मन के दुखद चित्रण रहिथे त दूसर तनी देहाती (ग्राम्य) जीवन के सरलता, सादगी, अल्हड़, सौंदर्य अऊ भोलापन के झांकी देखे बर मिलथे।“ इही झांकी के पहिचान हबीब तनवीर ह देस-बिदेस म करइस। नाचा कलाकार मदन निषाद, मदरा जी, ठाकुर राम, बुलवा अऊ फीता बाई ल छत्तीसगढ़ कभू नइ भूलावय। पहिली कलाकार मन संवाद ल किकिया-किकिया के बोलय। पोंगा रेडियो (लाऊडिस्पीकर) के उद्गरिस होए ले नाचा के प्रस्तुति म चार चांद लग गे। नाचा कोनो विधा नोहे बल्कि नाचा म कतनो विधा ह समाए हे। लोक रंजन अऊ लोक शिक्षण के माध्यम नाचा छत्तीसगढ़ के आत्मा हरे। नाचा ले जुड़े थोर बहुत जानबा एदइसन हे- 

बियाना - कोनो उत्सव के उपलक्ष्य म नाचा लगाए खातिर गांव म बइठक सेकलाथे। बइठक म ये तय करे जाथे के कतका बजट के नाचा लगाए जाय अऊ एखर बर कतका बरारे जाय। नाचा लगाए खातिर बइठक म दू-तीन झन मनखे जोंग के दू चार ठन मन पसंद नाचा पार्टी के नाम ल जना देथे। गांव के प्रतिनिधि बन के नाच पार्टी के मनिज्जर करा पहुंचथे। मनिज्जर ह बियाना (अनुबंध राशि) झोंके के पहिली एक बात के खुलासा कर लेथे के नाचा ह मोंजरा के होही के बिगन मोंजरा के। त का दू गम्मत के बाद मोंजरा लेवन देहू? कतको नाच पार्टी मन पहिली मोंजरा भर म घलो नाच देवत रीहिन हे। बिन मोंजरा के नाचा अऊ सार्वजनिक नाचा बर जादा भाव लेथे जबकि व्यक्तिगत अऊ मोंजरा वाले नाच बर थोकिन कम भाव म मान जथे। सीजन म नाच माहंगी रहीथे। पहिली समे म नाचा के भाव बियाना मुअखरी तय हो जय अऊ इन्कावन रुपिया बियाना दे के बात ल पक्का मन लेत रीहिन हें कतको जघा धोखा खाए के बाद अब नाचा पार्टी वाले मन लिखित म बियाना ल झोंकथे। कतको पार्टी वाले मन तो कार्यक्रम के दिन मंच के पहिली पूरा रुपिया झोंक लेथे। 

मंच - नाचे के पुरतीन जघा राहे अइसे अन्दाज के चार कोन्टा म गड्डा खान के लकड़ी नही ते बांस ल गड़िया के धांस दे। ऊपर म बांस बांध के चांदनी छा दे। सफेद कपड़ा म लाल रंग के कपड़ा लटकत रहिथे इही ल चांदनी (पाल) कहिथन। मंच के बीचो-बीच डग्गा माइक ल बांध दे अऊ लकड़ी के बने बाजुवट ल मंच के कोरियाति मढ़ा देथन। बाजुवट मढ़ाए के बेरा ए बात के खियाल रखे ल परथे के देखइया मन ल बाजुवट के सेती नाचा देखे बर अड़चन झन होवय। 

मेकअप - नाचा पार्टी के गांव म पहुंचते भार खुशी के लहर दऊंड जथे। ऊंखर बर मेकअप कुरिया दे जाथें मेकअप के तीन चैथाई सराजाम के बेवस्था पारटी वाला मन करथे। गम्मत के मुताबिक बड़े जिनीस (मोरा, खुमरी, चरिहा, झऊंहा, कुकरी, फूल कांछ के लोटा आदि) आयोजन मन ल दे बर परथे। मेकअप (सम्हरे बर) बर तेल पानी, मुरदार संख, घेरु, अभरक, छूही, गुलाल, लाली, काजर,कोइला आदि जिनीस के जरुरत परथे। नाचा पार्टी वाले मन जनाना अऊ परी मन बर माईलोगन सिंगार के बेवस्था कर के रेंगथे। माईलोगन के अभिनय ल बेटा जात के मन निपटाथे। ऊमन मेहला बानी के दिखे ल धर लेथे। लम्बा लम्बा चूंदी, चाल-ढाल, गोठ-बात ले जनाना (लोटिहारिन) ल चिन्हे जा सकत हें पहिली तो मेकअप रुम कोठा ल दे देत रीहिन फेर अब दसा ह थोकिन सुधर गे हे। 

नाचा के शुरुआत - दर्शक मन नाचा देखे बर सरकी, बोरा जठा के अपन-अपन बर जघा पोगरा लेथे। आन गांव के मन घलो नाचा देखे बर जुरियाथे। देर रात बाजा-गाजा के मंच म आते भार दार्शक मन के हिरदे ह कुहकी मारे ल धर लेथे। बजनिया मन पान चबा के बन ठन के मंच म पांव धरथे। मनिज्जर के मुताबिक तबला, ढोल, बेंजो वाले मन सुर मिलाथे। एक दू ठन भजन गाए के बाद नचकाीरन (परी) मन मंच (कुंज) म पहुंचथे। ताहन मंच ह गरु-गरु लागे ल धर लेथे। परी मन मंच म चघते भार वाघ यंत्र के पलागी करथे। टोनही टम्हानी के नजर डीठ झन लागे, सोच के पांव के धुर्रा ल मुड़ी म भारथे। ओइसे तो नाचा पार्टी के बइगा ह पहिलीच ले मंच ल बांध डरे रहिथे। परी मन सरसती दाई के बंदना करके नाचथे-

सरसती ने स्वर दिए

गुरु ने दिए गियान

मातु-पिता ने जनम दिए 

रुप दिए भगवान

म्ंाच म आए के बाद ओखर नाव के बखान करथे-


बड़ नीक लागिस हे मोला, बुधारु भइया के गोठ या

पास म बुला के दिस हे, मोला दू के नोट या 


बंदना के बाद नचकारिन मन एक-एक करके ओरी-पारी गीत गा के समा बांधथे। एक परी के मोंजरा झोंक के आवत ले दूसर परी ह मंच ल सम्हालथे। परी ह इसारा ल समझ के मोंजरा ठऊर म जाथे। गाना गा के नाचथे। ताहन खुश हो के मोंजरा देवइया ह रुपिया ल पोलखा नही ते खोपा म खोंच के फरमाइस घलो करथे। परी ह मोंजरा देवइया के नाव गांव ल पुछ लेथे--

  दू चार ठन गीत होय के बाद मनिज्जर जोक्कड़ धुन ल बजाथे। सुन के जोक्कड़ मन पांव म घुंघरु पहिर के छमक-छमक करत पहुंचथे। जोक्कड़ मन बंदना करके गम्मत के मुहतुर करथे। जोक्कड़ मन साखी बोल के गाना गा के नाचथे। नाचा म तो छत्तीसगढ़ ल झांखे जा सकत हे। 

 जोक्कड़ मन के पहिनावा एदइसन हे- धोती, गमछा, सलूखा, कुरता, बंगाली, जाकिट अउ गाहना म रेसम के करधन हाथ म चांदी ढरकौउवा (मोट्ठा के, बिर्रे मन पहिरथे) टोटा (गर) म सोना चांदी नही ते तांबा के ताबीज अउ अंगरी म मुंदरी पहिरे रहिथे। पात्र के मुताबिक पहिनावा बदलत रहिथे। साखी निपटे के बाद जनऊला पुछी के पुछा होथे। इही बीच गम्मत के हिसाब से नता-रिश्ता तय हो जथे। एक जोक्कड़ ह कहिथे (कस भइया भउजी ह दिख तनइ हे?) त दुसर जोक्कड़ ह हांक पार के- ”ए ओ.........आना ओ” कहि के बलाथे। भाखा ल ओरख के जनाना ह फूल कांच के लोटा ल बोही के गीत गावत आथे। जनाना गीद ह कृष्ण अऊ पति ऊपर जादा अधारित रथे-

 अई हो....................................

 नारी बर पति सेवा हे ओ दाई 

 नारी बर पति देवता हे न

 पुरुष मन बर लाखन देवता हे ओ दाई

 नारी बर पति देवता हे न......

फूल कांछ के लोटा ल मंच म मड़ा के परन ताल (गोल घुम के) म जब नाचथे ते सब देखते रहि जथे। आजादी के बाद चीनी गम्मत बहुत प्रसिद्धी पाय रीहिसें चीनी गम्मत ह राष्ट्रीय बिचार धारा ले मुड़सुद्धा नहाए रीहिस हे। येखर बाद मोसी दाई, चरन दास चोर कोमिक ह लोगन मन के हिरदे म बस गे। कोनो भी नाचा देवार गम्मत बिना अधुरा रहिथे। देवार गम्मत ल हांस्य गम्मत के रुप म जाने जाथे। देवार गम्मत म हांसत हांसत पेट फूल जथे। कट्ठल जबे। देवार गम्मत ल नाचा के आंखरी गम्मत के रुप म घलो जाने जाथे। आज जऊन स्थिति देवार मन के हे उही स्थिति नाचा म देवार देवार गम्मत के। जेहा नंदाय ल धर ले हे। सरांगी, गोदना अऊ सुरा के अटकर नइ लगय। नाचा पार्टी मन एक से एक गम्मत बनइस, देखइन, संदेश दिन फेर ओखर रचनाकार के नाव अभी तक कलमबद्ध नइ हो पाइस। बस नाचिन कुदीन अउ सिरागे। नाचा ल अब चाब-चाब के चीथ डरीस टी.वी. संस्कृति ह। दु अर्थी संवाद ह अलहन होत जात हे। येखर ले परहेज करे बर परही। तभे स्वस्थ मनोरंजन के रुप म नाचा के सेहत ह बने रही। अब छट्ठी बरही म डेड़ दू सौ म विडियो आ सकत हे त हजार दु हजार म नाचा करवाए के झंझट कोन उठाही। अतेक होय के बावजूद नाचा के अपन महत्व ह बरकरार हे।

दुर्गा प्रसाद पारकर 


3 दिसम्बर पुण्यतिथि म सुरता// क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी हरि ठाकुर


 

3 दिसम्बर पुण्यतिथि म सुरता//

क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी हरि ठाकुर 

    पुरखा साहित्यकार हरि ठाकुर जी के चिन्हारी आमतौर म एक मयारुक गीतकार के रूप म जादा हे, जेकर असल कारण आय, छत्तीसगढ़ी भाखा म बने दुसरइया फिलिम "घर द्वार" म लिखे उंकर गीत मन के अपार सफलता. फेर मैं उंकर एक इतिहासकार, पत्रकार के संगे-संग  क्रांतिकारी रूप के जादा प्रसंशक हंव. 

    उंकर संग मोर चिन्हारी सन् 1983 म तब होए रिहिसे जब हमन अग्रदूत प्रेस म नवा-नवा काम करत रेहेन. उहाँ पुरखा साहित्यकार अउ पत्रकार आदरणीय स्वराज प्रसाद त्रिवेदी जी तब सलाहकार संपादक रिहिन हें. उंकर संग मेल-भेंट करे बर आदरणीय हरि ठाकुर जी के संगे-संग अउ तमाम साहित्यकार मन आवंय. तब उंकर मन संग मोरो भेंट-चिन्हारी हो जावत रिहिसे. आगू चलके जब मैं साहित्यिक अउ सामाजिक गतिविधि के संगे-संग छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन म संघरेंव, तहाँ ले घनिष्ठता अउ बाढ़त गिस.

    उंकर जनम 16 अगस्त 1927 के रायपुर म होए रिहिसे. उंकर सियान ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी ल हम सब त्यागमूर्ति के संगे-संग लोकप्रिय महान श्रमिक नेता, आजादी के आन्दोलन के योद्धा, सहकारिता आन्दोलन के कर्मठ नेता, पत्रकार, विधायक अउ रायपुर नगर पालिका के तीन घांव रह चुके अध्यक्ष के रूप म जानथन. अपन सियान ले उन ला प्रेरणा मिले रिहिसे. एकरे सेती उन अपन छात्र जीवन म सन् 1942 म असहयोग आन्दोलन म शामिल होगे रिहिन हें. 1950 म छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर म उन छात्र संघ अध्यक्ष बनगे रिहिन हें. इहें ले उन कला अउ विधि म स्नातक के उपाधि पाके दस बछर अकन ले वकालत घलो करे रिहिन हें.

    देश ल आजादी मिले के बाद सन् 1955 म पुर्तगाली शासन के विरुद्ध गोवा मुक्ति आन्दोलन म घलो संघरे रिहिन हें. सन् 1956 म डा. खूबचंद बघेल के संयोजन म राजनांदगाँव म होए "छत्तीसगढ़ी महासभा" घलो म उन संघरे रिहिन हें, जिहां उन ला ए संगठन के संयुक्त सचिव बनाए गे रिहिसे. ए छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन रूपी यज्ञ म फेर वो जीवन भर आहुति देवत रिहिन हें. मैं उंकर इही रूप के सबले जादा प्रसंशक रेहेंव. काबर ते ए आन्दोलन म महूं एक नान्हे सिपाही के रूप म जुड़े रेहेंव, अउ आजो वो अस्मिता आधारित राज निर्माण के कल्पना म संघरेच हावन. काबर ते अभी घलो अस्मिता आधारित राज निर्माण के सपना ह सिध नइ पर पाए हे. हमन ल एक अलग राज के रूप म चिन्हारी तो मिलगे हवय, फेर अभी घलो इहाँ के भाखा अउ संस्कृति ह स्वतंत्र पहिचान खातिर आंसू ढारत हावय. अभी तक छत्तीसगढ़ी ह शिक्षा अउ राजकाज के भाखा नइ बन पाए हे, उहें इहाँ के आध्यात्मिक संस्कृति के सबले जादा दुर्दशा देखे बर मिलत हे. 

     राज आन्दोलन के बखत ठाकुर साहब इहाँ के राजनेता मन के दु-मुंहिया गोठ ले घलो भारी नाराज राहंय. एक डहार तो ए नेता मन हमर मन जगा राज आन्दोलन के समर्थन के गोठ करंय, अउ जब दिल्ली-भोपाल म अपन आका मन के आगू म जावंय, त कोंदा-लेडग़ा होगे हावंय तइसे कस मुसवा बरोबर खुसरे असन राहंय. उंकर मन के इही चाल देख के उन नाराज राहंय. मोला सुरता हे, छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के जलसा, जेन इहाँ मठपारा के दूधाधारी सत्संग भवन म होवत रिहिसे, उहाँ उन मंच ले कहे रिहिन हें-"ए नेता मन माटी पुत्र नहीं, भलुक माटी के पुतला आंय". छत्तीसगढ़ राज निर्माण के बाद घलो उन कहे रिहिन हें, जब तक इहाँ के भाखा अउ संस्कृति के स्वतंत्र चिन्हारी नइ बन जाही, तब तक ए राज निर्माण के अवधारणा ह अधूरा रइही. एकर बर मैं इहाँ के जम्मो कलमकार अउ छत्तीसगढ़ी अस्मिता के हितवा मनला आव्हान करत हंव, उन ए बुता म चेत करंय.

    हरि ठाकुर जी हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म सरलग लिखिन. महूं घलो अपन संपादन म वो बखत रहे छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका "मयारू माटी" म घलो उन ला लगातार छापत रेहेंव. तब हमन छत्तीसगढ़ी म गद्य रचना मन के जादा ले जादा प्रकाशन के पक्ष म राहन. ठाकुर साहब काहयं घलो-हम ला छत्तीसगढ़ी के बढ़वार खातिर गद्य रचना मन डहार जादा चेत करना चाही.

   आवव, उंकर सन् 1979 म छपे छत्तीसगढ़ी रचना के संकलन "सुरता के चंदन" जेला वो मन देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू" अउ श्यामलाल चतुर्वेदी जी ल भेंट करे हें. उंकर कुछ अंश ला झांक लेइन-

कतका दुख सहे आदमी, बादर घलो दगा देथे

उमड़-घुमड़ के आथे अउ बिन बरसे कहाँ परा जाथे

जरत भाग के होले ला अउ बार बार बगरा जाथे

सपना खंड़हर होत, करम के अक्षर घलो दगा देथे

कतका दुख ला सहे आदमी, बादर घलो दगा देथे.

* * * * *

अटकन मटकन दही चटाकन

लउहा लाटा करै गगन

फुगड़ी खेलत हवय पवन


चौक पुराए असन घाम हर

खोर खोर म बगरे हे

जुन्ना पाना झरय

उल्होवै नावा पाना सनन सनन

फुगड़ी खेलत हवय पवन...

* * * * *


गहरी हे नदिया के धार बैरी

जिनगी परे हे निराधार बैरी

लहरा बने हे पतवार बैरी

बिजली के तने तलवार बैरी


डोंगी हवै बिच मझधार बैरी

लदे हवै पीरा के पहार बैरी

चारो कोती हवै अंधियार बैरी

सपना के होगे तार तार बैरी.

* * * * * 


खुडुवा खेलत हवै गगन भर

मंझन भर चितकबरा बादर

अउर सांझ कुन हंफरत हावै

जीभ लमाए झबरा बादर


आज बरसही काल बरसही

कहिके भुइयां जोहत हावै

टुहूं देखा के आनी-बानी

कइसन मन ला मोहत हावै

माते हाथी अस उमड़त हे

भरे न तब ले लबरा बादर

खुडुवा खेलत हवै गगन भर

मंझन भर चितकबरा बादर..

* * * * *

   सन् 1956 म छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन के नेंव रचे के संग ले जुड़े रेहे हरि ठाकुर जी 1 नवंबर 2000 के बने नवा छत्तीसगढ़ राज के नवा रूप ल तो देखिन, फेर सिरिफ कुछ महीना भर ही अपन पूरा होए सपना ल देखे पाइन अउ 3 दिसंबर 2001 के ए दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. उंकर सरग सिधारे के पाछू सन् 2011 म अनामिका पाल जी ह "हरि ठाकुर के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना" विषय म पं. रविशंकर विश्वविद्यालय ले पीएचडी करे हावय, जेकर माध्यम ले आदरणीय हरि ठाकुर जी के जम्मो कारज ल एके जगा जाने अउ पढ़े जा सकथे.

   उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी...🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

3 दिसंबर हरि ठाकुर जी के पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष:-

 



3 दिसंबर हरि ठाकुर जी के पुण्यतिथि के अवसर पर

विशेष:-


क्रांति प्रेम अउ श्रृंगार के कवि हरि ठाकुर 

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डाँ. बलदेव


             सुराज के बाद छत्तीसगढ़ के काव्य - कानन म जे कवि कोकिल मन के पहिली पहिली कंठ फूटिस उनमा पंचम सूर रहिस हरि ठाकुर के । उन्कर पहिली कविता भौं माधुरी म छपिस । फेर देस के बड़े - बड़े पतरीका म वो छपिन , इहां तक पन्नालाल पुन्नालाल बख्शी सरस्वती जइसे महत्वपूर्ण पतरीका म हरि ठाकुर ल छापिन । हरि ठाकुर गद्य - पद्य हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म पाछू चालीस बरिस के ऊपर ले लिखत आत हें । वो दू बार छत्तीसगढ़ी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्छ पद ल सुसोभित कर चुके हैं । स्वतंत्रता आन्दोलन अउ गोवा मुक्ति आंदोलन में भी उन कूद परे रहिन । हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ केशरी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के तीसर पुत्र आय । अइसन सपूत बर कोन छत्तीसगढ़िया गरब नई करहीं ।


                            ( 1 ) 

      गीतों के शिलालेख , नये विश्वास के बादल , लोहे के नगर , पौरुष नये संदर्भ जइसन कविता किताब हिन्दी म , गीत अउ कविता , जय छत्तीसगढ़ , अउ सुरता के चंदन इकर छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह प्रकासित हो चुके हे अउ एक दरजन ले किताब विध विसय म छप चुके है । इकर कविता म एक डहर तो परेम के गुच्छा गुच्छा महकत फूल हवय त दूसर ओर करांती के मसाल । अइसने म सहृदय अउ कर्मठ पुरुस के हाथ ले नव निरमान के काम होथय ।


         छत्तीसगढ़ म घलो नई कविता अउ समकालीन कविता के जानदार कवि हांवय , फेर आलोचक मन नेंग टारे कस उन्कर चरचा करथें हरि ठाकुर हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि होय के बाद घलो अपन बोली म अपन भाखा म कविता लिखथें । अइ चाल शेषनाथ शर्मा शील अउ नारायन लाल परमार के हे । असल म जेकर मन म अपन माटी के महक होथे कसक होथे वो अपन जुबान म कविता लिखथे । महाकवि विद्यापति घलो कहे हांवय देसिल बयना सब जग मिट्ठा हरि ठाकुर वोही नीत के कवि आंय । उन्कर कविता परेम , सिंगार , विरह - वेदना , अउ अनाचारी सोसक के ऊपर गुस्सा अउ हुंकार ले भरे हे । हरि ठाकुर के मन म देस ल छत्तीसगढ़ ल नवा करम ले सिरजाय के कुलुक हे हुमक हे , साध है । उंकर सपना हे -


 टोनही अस झूपत हे बिरबिट रतिहा घलो पहा जाही   

 आही गुरुज सजे दुल्हा कस अउ दिन के मुंह ल  

                                                            उजराही 


   सुरुज के आंखी म झूलत हे सपना नवा बिहान बेरा नव निरमान के । टोनही अस झूपत हे बिरबिट रतिहा जइसन लाइन म पटन्तर के ऊपर पटन्तर हवय देखिहा रतिहा ओहू बिरबिट माने सूची भेद्य अंधेरा अ वो रात के टोनही जइसन झूपना गरीबी अउ अज्ञानता के प्रतीक आय अ सुरुज सुराज के । जेकर अंजोर छत्तीसगढ़ के देहात म पहुंच नइ पाय हे । पहुंचे के पहिलीच ले वो चोरी हो गय है । कोन चोराइस ए अंजोर ल एकर हमला गियान नइये । हम सिरिफ अपन दुख के रोना रोवत हन -


हमर झोपड़ी वाला मन के मरन हवे जी बिना मरन के भीतरे भीतर चुरत हवन जी हम चांउर जइसे अंधन के


            अंधन के चाँउर जइसे चूरना माने दुख सहना अउ चुप रहना । कवि के सोंच अउ संसो एही ठउर ले सुरू होथे - कवि ए चुप्पी ल टोरना चाहथे । वो दुख म ओघात आदमी ल जगा के कुदारी अउ रांपा ल धरे के मंतर बताथे , काबर एकरेच देखे टोनही कांपथे । हरि ठाकुर सोसित जनता के नेता के रूप म हमर सामने आथे । उंकर पृथक छत्तीसगढ़ के आंदोलन सुरू करे के पाछू एही कारन रहिस हे अउ मोर हिसाब ले आजो हे | हरि ठाकुर के सलाह हे -- 


कन्हिया कसके बढ़े चलो खुद भाग अपन तुम गढ़े      

                                                             चलो 

सोसन अन्याय गरीबी के सब जुरमिल अब लड़े 

                                                            चलो ।


               मनखे अपन भाग के गढ़इया खुदे आय । छत्तीसगढ़ के किसान के बीच वो जयप्रकाशनरायन जइसे समाजवादी के दरसन रखथे । उंकर कहना हे जेखर जांगर ओकर नांगर , जेकर नांकर ओकरे भुइंया । कवि श्रम के प्रतिस्ठा करथे । ओकर हिसाब म सुराज तुलसी के बिरवा आय मुंड़ म नरियर चढ़ा चढ़ा के ओकर रक्छा करना है । हरि ठाकुर बर छत्तीसगढ़ के माटी ओकर माथा के चंदन आय । महानदी के पानी दूध के धार आय जे पोटरीयान म चढ़के सोनहा बाली बन जाथे । धान के अइ मंजरी म छत्तीसगढ़ी महतारी के सिंगार होथय । जय छत्तीसगढ़ गीत के दू ठन डांड़ देखा -


     दूध असन छलकत जावत हे महानदी के धार    

     छत्तीसगढ़ के माटी ओखरे सेती करे सिगार 


                     हरि ठाकुर के खून म विद्रोह अउ प्रेम हर टहलत रथे । जेतका बेर जेकर ओसरी आ जाए । हिन्दी के अवसर हर छोटकन होके ओसरी बन जाथे । हरि ठाकुर ल रोनाही सूरत नीक नइ लागय उंकर गीत मा नवजवानी के रंग हे उमंग हे रस ऊउ गंध है । देखा-


              सुन सुन रसिया 

              तोर आंखी के काजर लागय हंसिया 

              चंदा ल रोकेव सूरज ल रोकेव 

              रोकेव कइसे उमर ल 

              चुरुवा भर - भर पियेंव ससन भर 

              गुरतुर तोर नजर ल ।


          लोकधुन म बंधे ए गीत म लिंग भेंद नइये , ए छत्तीसगढ़ी के विसेसता आय । एला दुरा - टुरी दूनों गा सकत हैं । अइसन मउका म हरि ठाकुर के गीत पर्दा म घलो फिल्माय जाथे - 


      गोंदा फूलगे मोर राजा गोंदा फूलगे मोर बैरी

      छाती म लागय बान ..... 


                   फेर ए बोली ठोली म का मजा , असली मजा तो घर गिरस्ती म हे फूल के बाद फरे म सुख हे । दूज के चंदा उए हे । दही बरोबर अंजोर बगरे हे । नवा बहुरिया तुलसी के चौरा म दिया बारत हे घर आंगन पट पर हो जात हे । कविता संस्कृति म कइसे रुपान्तरित होथे ए बात ल एकदम लकठा ल देखा-


 न बहुरिया के भारी पांव । दिया धरे अंचरा के छांव । एक जोत मुह म लहराय । कोख म दूसर जोत लुकाय । 

       पांव भारी बड़ सुघ्घर मुहावरा आय दिया के जोत बहुरिया के मुँह म लहरात हे दूसर कोख म लुकात हे । कइसन सुघ्घर बिम्ब अ कइसन सुघ्घर भाव । अइसन जोत बाहिर - भीतर जलत रतीस त न ? फेर ए हर छिन भर के उजियाला आय , जुग जुगान्तर के अधियार तो छिटके हे । गरीब मनखे के आधू वो कभू सूर्पनखा जइसे खड़े हे त , कभू रक्सा कस बंढ़त हे त कभू टोनही कस झूपत हे देवारी म गरीबी के करलई देखा -


  कइसे बारव दिया बतावव , नइय तेल अउ बाती    

  सांस के आरी जिनगी चीरथे गुगवावत हे छाती


       गुंगवाना माने भंग ले नइ बरै , कुहरात कुहरात अपन - अपन अनि ल सिरा देना , खतम कर देना । अइसने मठका म लइका फटक्का मांग देही त कउन मेहतारी के छाती हर नइ फाट जाही । छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता म एही रकम के अब्बड़ चित्र भरे हैं । 


                               (2 )


         छत्तीसगढ़ी काव्य - भाखा के प्रस्न ल लेके हरि ठाकुर के बहाना म कई उन सारथक बातचीत करे जा सकते हे । कारन उंकार लेखनी मज चुके है , अउ विचार म प्रउढ़ता आ चुके हैं ।


                   अपन कमजोरी ल जे कौम हर छिपाथे , कमजोरी ल अपन सक्ति समझथे , ते हर खुद भटकथे अउ आन कोनो ल भटकाये । भाखा के अपेक्षा बोली म अभिव्यंजना के बड़ सक्ति होथे । बात - बात में लक्षणा अठ व्यंजना के दरसन होथे । फेर ओकर परयोग म सावचेती के जरूरत हे , नहीं त अर्थ के अनर्थ हो जाही । कोनो नवा साहित्यकार ल लेके ए बात करिहौ तौ अही हर छत्तीसगढ़ी के असली दुस्मन आय समझही । राजनीतिक दाव - पेंच म भाषा के आंदोलन कमजोर हो जाथय । एकरे बर हरि ठाकुर ल सामने रख के करे हौं । काबर उन अपन ल खुद ठोक ठठा के तियार कर हे . छत्तीसगढ़ी भाखा के विकास म बड़ सावचेत हें , ऐतके , नहीं उन वो कसौटी के मतलब समझथें , ओकर ताप म निखर के चमके के सामरथ रखथे । मोला विस्वास हे उन न तो मोम असन टघल के निराकार हो जाही अउ न टीन असन जल के खोइला बन जाहीं उंकर रच रचाव हर।

             सुरता के चंदन हरि ठाकुर के कविता के ही नहीं छत्तीसगढ़ी कविता के महत्वपूर्ण संग्रह आय हरि ठाकुर के कल्पना सक्ति अउ सब्द स्फीति क्षमता अउ अक्षमता , सबलता अउ सिथिलता सब्बेच के दरसन . सुरता के चंदन म मिल जाथे ।

                   आदमी सक भर , ताकत भर अन्याय ले सोसन ले , समाज अ अपन आप ले लड़थे , फेर एक समे अइसन आये के ओकर सांस भर जाथे , वो थक जाथे । जब जिनगी ले बड़े जिनगी के दुख हो जाथे , त वो थिराय चाहथे , छहहां खोजथे , अउ ओहर मिलथे प्रकृति के सौंदर्य म , नारी के परेम म , ओकर सुरता म वोकर ले ओला प्रेरना मिलथे सक्ति मिलथे । सुरता जे चन्दन कस सीतल अउ सुगंधित हे , जेकर भीतर बिरहा के आगी हे । ए दाह अउ वो सीतलता के कन ल कवि बीनत हे पछोरत हे , मन कलेचुप मुड़मिसनी माटी कस घुरत हे , सरीर टूटत हे । अइसन बीत म जिनगानी पहार हो गए हे गिनती के सांस बचे हे , एला कवि ओही ल बहोरत हे , जे हर पीरा ल देहे हे । आदमी जब निरास अउ असहाय हो जाथे , जिनगी ले जब बिट्टा जाथे , तम्भेच बहोरे , लौटाय या वापिस करे के बात उठथे । वो कउन आंय जे एतेक बड़ पीरा के थाथी सौंप के कवि ल अकेल्ला छोड़ के लुका गए हैं , भुला गय हैं । कवि के जीवन म घटिस के नइ घटिस हमला एकर सोर नइये , फेर कविता म जउन घटत हे वोहर घटे ले कम नोहय । कवि के रचना - संसार म कहूं - कहूं वो अपन रूप ल देखा देथे ओकर रूप रवनिया , माने अगहन पूस के धूप असन हे आंखीं भेद भरे हे , गाल म मया के गेरू रचे हे , होठ बिहनिया कस , कपार के टिकली सरग दुवार के चंदा कस मांग नंदिया के कछार कस दीखत हे । रूप - रवनिया शीर्षक कविता म बड़ सुघ्घर लय हे । कविता के तीसर अउ चौथा डांड़ मन म रवनिया , गुनिया , बिहनिया , नंदिया जइसन सब्द आय हे , एही सुर म अइसनो प्रयोग हे- गुरतुर बोली , आरुग हांसी हर हरमुनिया असन लगत हे । ए उपमा म कउन से परभाव- साम्य हे , रूप के गुन में समझ नई आवत हे । मोर विचार ले हंसी के मधुरता व्यक्त करे बर हरमुनिया सब्द हर वो बिम्ब नइ उपजात हे , जउन कवि के इष्टं आय । कवि अपन पिरोहिल के तुलसी के चंवरा , खोपा के मोंगरा आँखी के काजर मांग के सेंदुर इहां तक उजराय पिंवराय बर अंग के हरदी बन जाय के सउख करत हे , फेर ए डांड़ हर कउन सौंदर्य ल व्यक्त करत हे , अर्थ ल कतेक वैचित्र्य प्रदान करत हे ए सोचे के बात आय-


    कभू नयन काजर छाती म चंद्रकलस धंवरा बन    

                                                        जातेव । 


            कहूं इहां चंद्रकलस के आसय सूता या सूतवां ( हार - बिसेस ) ले हे त कलस के जगा कला होना चाही अउ कलस हे त उन्कर मतलब उरोज ले हे , त वोकर उजराई संस्कृत काव्य म फैले हुए हैं , उपमा फीट हे फेर चंद्रमा के संग धंवरा अतकिहा परयोग आए । चंद्रमा तो उज्जरे रइही , दूसर धंवरा पुरुष ध्वनि युक्त हावय , वोकर उजराई परगट कम होवत हे । धंवरा पेड़ , धंवरा बइला उपयुक्त परयोग आय , धंवरा बादर , धंवरा आदमी , धंवरा कपड़ा , धंवरा चंद्रकलस मोर विचार म वो प्रभाव ग्रहन नइ करत हे , जउन कवि के आंखी - आंखी म झूलते हे । अब उजरईच के बात करना हे- डार  पात म किरन उतरगै , जुगर जुगर जोगनी बरत हे । नंदिया पिया मिलन बर दउरे , दूध असन , चांदनी बगरगे , खोखमा फूले हवै गगन म , फूलकांस के चरू जइसन गीत डांड़ मन म जगा जगा जल थल अउ आगास म उजियारी फरिआय हे , फेर ढिलागे मन - बछरू जइसन डांड़ म क्रिया के कठोर ध्वनि हर मन के कोमलता के बड़ हानि करत हे । वोइसने नदिया के पंवतरिया बइठे परवत उंकरू म कवि के आसय हनुमान बैठकी ले हे , जे हर उंकरू जइसन सब्द के सेती आन के तान चित्र खड़ा कर देथे बोइसने सरग निसेनी ओरमाय म ओरमाय हर उतारू भाव व्यक्त करथे । जइसे मुंह ओरमाना ए मेर लमाय सब्द हर जादा उपयुक्त आय अउ प्रेमानुभूति हर मरम ल छुए बिना नइ रहय । एक दू डांड़ देखा -

               काबर सुरता हर आ आके

               हिरदय ल मोर निचोरत हे

               कौन फूल फूले हे कोन गंध मोहत हे     

               मुरझावत बिरवा ल कोन ह उल्होवत हे -


     सुरता के बंसी बजथे त कवि बिआकुल वृन्दावन बन जायें ए मन ल छूने वाला गीत आय भजन आय सुरता के चंदन म प्रकृति सौंदर्य अ प्रेम एक दूसर के पूरक आय प्रकृति म ओ पिरीहिल के रूप हर सब्बेच जगा देखाऊ देथे । सीत रीतु के बरनन म कवि के कलम के कमाल है । अनजाने म उन्कर कविता म उज्जवल रस बरस परे हे । देखा फरियात हे गगन अउ धरती नहात हे , उत्ती के दिसा पंग - पंगावत हे , बारत हे दिया कतकहिन मन तरिया म अंजोर ओरियात हे । फूलत हे कोन कोती गोंदा मंजरी अस् सपना मउरावत हे । फरियाना माने निरमल होना , स्वच्छ होना , पंग पंगावत माने उजेला होना जइसन क्रिया अउ गोंदा तथा मंजरी जइसन संज्ञा म जउन पिंवराई हे , ओ सुरता के चंदन म बाहिर - भीतर झलकत सब्द म अउ अरथ म श्रीमद् भागतव के दसम स्कंध के रास - प्रसंग अउ गीत गोविंद म जगा जगा उज्जवल रस के गंध बगरे हे । छत्तीसगढ़ी म घलो संस्कृत भाखा जइसन अर्थ व्यक्ति या पारदर्सिता हावय तभे तो अइसन डांड़ लिखे जा सकत हे-


      छावत हे मोर भीतर कोन गंध 

      चंदन अस सांस महमहावत हे


    महामहावत हर महमह करना क्रिया के छत्तीसगढ़ी रूप आए । वोइसे संज्ञा ल क्रिया के रूप देहे म हरि ठाकुर ( हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म घलो ) माहिर है , अरुण ले अरुनावत , प्रवाह ले प्रवाहित , मधुर ले मधुराथे , उंकरे बिसेस परयोग आय । ए बात के प्रसंसा पं . मुकुटधर पांडेय घलो करे हैं । सुरता के चंदन म जगा - जगा सपना हे मिलन अउ बिछुड़न के ए समे सुरुज ओला चिलके अउ चंदा अगियाय लागथे वो रेसामही सपना ल घरिया चाहत है । आंसू भरे दर्दा म सपना कांछ कस फूटत हे , तभ्भो ले कवि जिनगी ले निरास नइ होवै , सपना म जउन रूप फूल बनके मन ल उजरात हे , मन भितरी जे भोर बनके उतरते हे , वो सुरता के कामधेनु आय। ये पीरा ल कवि हीरा बनाके हमर सामने पेस करथे ।


                              ( 3 ) 

         गांव गंवई म जड़कल्ला के अलग सेवाद हावय - गोरसी ( जेमा गोरस अऊंटाय जाथे ) तापे घलो म हाथ - गोड़ कांपत हे,रूख राई ठिठुरत हे, दांत कुटरत हे , पानी करा जइसन लागत हे , एकर बीच म देखा कतका सुघ्घर उपमा दिए गए हे , सीत अऊर धसत हे बरछी कस , जाड़ परत हे , फरसा कस , बेल असन लटके हे सुरुज हर ताड़ म जड़कल्ला म सुरुज के सपटना , घाम के पेड़ म अरझना , चिरई चुरगुन के घाम म पांखी ल सेकना छत्तीसगढ़ी काव्य - भाखा के सक्ति - मत्ता ल व्यक्त करत हे , फेर कोनो कोनो जगा तत्सम तद्भव अभिजात्य अउ ग्राम्य परयोग के साना घाटा म सुघ्घर चित्र घलो प्रभावहीन हो गय हे , देखा-


        ताम - कलस अस बाल सुरुज हर 

        क्षितिज ऊपर मड़ियात हे

        फरिका मन जम्हावत हे

        बरू मन रम्भावत हे । 


                  ऊपर के दू डांड़ म तो आधा शब्द अउ बिम्ब संस्कृत के आय अउ आधा ठेठ छत्तीसगढ़ी के। मड़ियात माने माड़ी के भार बइठे के कोसिस करना , एमा असमर्थता , अस्सख होय के भाव व्यक्त होथे , जइसे बइला मड़ियावत हे । अउ जदि मड़ियावत सब्द के परयोग होय होही त ओकर मतलब आनंदअउ उन्माद म उछलना - कूदना - भागना जइसे भैंसा मड़ियावत हे । दूनों भाव सुरुज बर ठीक नई होवत हे । बोइसने बछरू के रम्भाना चिन्त्य प्रयोग आय । गाय रम्भाथे अउ बछरू नरियाथे । अइसन हम सुने हावन । कहूं अंचल बिसेस म अइसन परयोग होवत होही त एक प्रस्न के उत्तर अपने - आप निकल जाही , प्रस्न आय परिनिष्ठित छत्तीसगढ़ी के । छत्तीसगढ़ में हलबी , भरती , खैरागढ़ी , रतनपुरी , जसपुरी ( सादरी ) अउ सरगुजिया छत्तीसगढ़ीच के रूप आय , अउ अंचल बिसेस के मिठास अम्मट म बदल जाही , सेवाद बिगसा जाही , कहूं हम बर पेली परिनिस्ठित छत्तीसगढ़ी के परयोग म परबो त , दूसर , भासा के विकास म बड़ रुकावट आ जाही ।


        बसन्त रितु म हरि ठाकुर के गीत गंध अउ पराग म सने हे नसा करे अस लागत हावय ये धुर्रा भरे हवा फागुन के , होल्ले बकइया भंवरा के संगत करत हे हवा । कभू रस्ता छेंकत हे , त कभू गम्मत करत हे अउ कभू • फुगड़ी खेलत हे । सब्बेच जगा फगुनाहट म हवा के बरचस्व हवय । आमा के संग मन घलो मउरत हावय । खेत खार - दइहन - खोर सब फागुन म माते हैं । तरिया म मोटियारी मन हांसत - गोठियात हें बोली- ठोली मारत हें- गदरावत हे नवा लिमउवा | विज्ञानिक जुग म लिमठवा कभू गदरा सकत हे , फेर गेदराना म दू ठन भाव छिपे हे पहिली तो पिंवराना दूसर गुदा वाला फर म रस भरना । जाम ( बीही ) के गेदराना , आमा म मउर आना , चिरईजाम के करियाना अउ लिमउ के डोहर होना , या रस ढरना परसिद्ध आय , चढ़त जेवानी के अरथ घलो गेदराय म विस्तार पाथे ।

    

      हरि भइय्या अपन छत्तीसगढ़ी कविता म धड़ाधड़ संस्कृत के सब्द मन के परयोग करथे का एकर ले उंकर काव्य - भाखा जादा पारदर्सी होथय ? मोर विचार ले उन्कर चिंता छत्तीसगढ़ी भाखा के सब्द भंडार के बढ़ोत्तरी कती हावै । अइसन नइ होतिस त वो छांट - छांट के नंदात छत्तीसगढ़ी सब्द मन ल कविता म फीट नइ करतीन एमा उंकर तियाग अउ तपस्या के भाव व्यक्त होवत है , अपन आप ल मिटा के अपन प्रतिभा ल कला के बलदा भाखा के संबर्धन अउ संरक्षण म लगा देना जादा महत्व के बात आय । ' फागुन बैरी ' जइसन एकेच उन गीत म सुरभि , हृदय , कुसुमायुध , चांदनी , मलय - पवन , मनसिज गगन , नयन जइसे सब्द आय है , वोइसने फागुन के मस्त पवन के मानवीकरन म उंकर कल्पना के कारयित्री प्रतिभा के सक्ति ल देखा फागुन कइसे अप्पत होगे अप्पत बिना पत के या निर्लज्ज ले जादा भाव हठ या जिद्दीपन के व्यक्त करत हे चार डांड़ अउ देखा है -


  मोर उप्पर गुलाल छींटय , मोर उप्पर डारय रंग ल

  मुह लु चुचवात हे महुवा , छोड़ते नइये मोरे संग ल


         एहर बिहारी के ए पंक्ति के टक्टर के कविता है यहाँ से -

     रनित भृंग घंटावली झरत दान मधु नीर 

     मंथर गति आवत चल्योकुं जर कुंज समीर


     उन्कर दार्सनिक भाव के एक ठन अउ डांड़ देखा-


   जुन्ना पाना झरय , उल्होवै नावा पाना सनन सनन


               ए डांड ल पढ़त समे टेनीसन अउ पन्त के सुरता आ जाथे द्रुत झरो जगत के जीर्ण - पत्र माने छत्तीसगढ़ी घलो म वोही ताकत हे अभिव्यंजना के जउन अंगरेजी या हिन्दी म हे फेर अइसन चटक रंग अउ तीखा गंध अभिजात्य भाखा मन म बहुत कम हे , देखा -


  ' धुर्रा दऊरत हे गरेर कस पिंउराये धरती कनेर कस     

    बैरागी मन म होवत हे , ए कईसन अनुराग हवन


        हरि ठाकुर के काव्य - भासा म अप्रचिलत सब्द घलो हर असली अरथ ल परगट कर देथे गर्रा ( धूंकर ) के रूप आय। अइसने दू ठन अउ अप्रचलित सब्द के कमाल देखा-


         चिमट चिमट के हवा पराथे 

         सुख के दिन खरहा अस सपटे हे

         कोरा म पाले अउ भुरिया दे 


          इहां पराथे माने भागना आय , परा हर पला के बदले रूप आय , र अउ ल दूनों के जनम स्थान एके आय । मुहावरा हे पला तान के भागना , भुरिया दे माने सहला दे होही । अप्रस्तुत विधान म कवि जइसन चित्र खींचना चाहत हे वोइसने खीचाथे । बसंते जइसन ग्रीस्म रितु घलो के परभावसाली चित्र सुरता के चंदन म मिलथे उंकर ग्रीष्म बरनन हर कवि सेनपति के एक डांड़ के सुरता करा देथे वृष को तरनि तेज सहसा किरन करि , ज्वालन के ज्वाल बरसत हे - देखा - सुरूज बिहनहे , ले आगी उछरत हे , उछरन माने उल्टी करना । वो धरती ल आवा कस उसनत है । ढक्कन बंद करके उबालना हर उफने के भाव ल व्यक्त कर सकत है । गाय गरु , कोला बारी म सपटे , सलिहा के पिला टुकुर - टुकुर देखत हे । अइ मेर बिरहा के आगी कवि ल सुन्ना पाके बियाकुल करथे । वो ओकर ले मुक्ति चाहत हे-


     बिरहा के चिता रचे बइठे हे जीव मोर 

    आ जावे चढ़ के तैं बादर के डोला म 


           चउमासा के बरनन म हरि ठाकुर के कल्पना , उपमा कालिदासस्य जइसन कहावत ल साकार करत लागथे , देखा - बादर गंजागे रूई के पहार कस , अब्बड़ डकारत हे संकर के सांड असन , बादर म परगे हे आगी के डांड़ असन , झड़ी लागिस चासनी के तार असन पानी के टिपिर टिपिर , रद रद रद रद , टिप - टिप टिप - टिप म असाढ़ , सावन - भादो अउ कुंवार के बरसा अलग अलग स्पस्ट हो जात हे । चउमासा म गांव के सुघ्घर चित्र हे - पानी गिरत हे , लइका मेछरात हे , कउंवा गिदगिद ले फिले हे , घर सिग सिग ले दीखत है । मोटियारी झूला झूलत हे , रेमटा टूरा मन वोमन ल बिजरात हे । बिजराना माने चिढ़ाना किसान संस्कृति के चित्रन बरतो हरि ठाकुर मास्टरआय धरती नयन उधारिस अउ माटी गाभिन हो गय , ए टू वाक्य म छत्तीसगढ़ के संस्कृति व्यक्त हो जात हे , गागर म सागर भरना अइला कथे । छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के रूप हर , रंग हर , गंध हर ए कविता म तो संपूरन रूप ले उतर आय हे- आखरी डांड़ देखा  


          भौजी के कोरा म नानुक 

          निक नोनी कस पुलकत हे

          सघन मेघ मा सेंध फोर के 

          किरन सुजी अस बुलकत हे 


     अइ हर कवि हरि ठाकुर के अराधना आय , जे एक महीन जाल बुनके जीवन के आसा , उछाह अउ बिस्वास ल बिसेस अरथ देतहे । एकर ले हरि ठाकुर भर के नहीं छत्तीसगढ़ी भासा के सक्ति अउ संभावना के पता चलथे । हरि भइय्या बैसठ बसंत पार कर गय हैं , उन अपन काव्य कानन के सीतल छांव म नवा पीढ़ी ल बईठा के कुहके बर , मसाल जइसे जले बर प्रेरना देवै , भगवान ले एही प्रार्थना हाबय । 


                       ( मयारू माटी साल। अंक 10-11)


प्रस्तुति :- बसन्त राघव, पंचवटी नगर ,बोईरदादर,

रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो.नं.8319939396

पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा





 4 दिसंबर पुण्यतिथि म सुरता// 

पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा

      आज के नवा छत्तीसगढ़ म पंडवानी गायन ल एक बड़का विधा के रूप म देखे जाथे, माने जाथे अउ गाये घलोक जाथे। एकरे सेती आज एकर गायक-गायिका मनला पद्मश्री ले लेके कतकों अकन राष्ट्रीय अउ राज्य स्तर के सम्मान मिलत रहिथे। फेर ये बात ल कतका झन जानथें के ये विधा के जनमदाता कोन आय, ए विधा ल गावत कतका बछर बीत गये हे?


     आप मनला ये जान के सुखद आश्चर्य होही के नवा बने जिला बलौदाबाजार के गांव झीपन (रावन) के किसान मुडिय़ा राम वर्मा के  सुपुत्र के रूप म जनमे नारायण प्रसाद वर्मा ला ये पंडवानी विधा के जनमदाता होय के गौरव प्राप्त हे। वोमन गीता प्रेस गोरखपुर ले छपे सबल सिंह चौहान के किताब ले प्रेरित होके वोला इहां के लोकगीत मन संग संझार-मिंझार के पंडवानी के रूप म विकसित करीन।


    मोला नारायण प्रसाद जी के झीपन वाला घर म जाये अउ उंकर चौथा पीढ़ी के सदस्य संतोष अउ नीलेश के संगे-संग एक झन गुरुजी ईनू राम वर्मा के संग गोठबात करे के अवसर मिले हे। ईनू राम जी ह नारायण प्रसाद जी के जम्मो लेखा-सरेखा ल सकेले के बड़ सुघ्घर बुता करत हवय। संग म गांव के आने सियान मन संग घलोक मोर भेंट होइस, जे मन नारायण प्रसाद जी ल, उंकर कार्यक्रम ल देखे-सुने हवयं। उन बताइन के धारमिक प्रवृत्ति के नारायण प्रसाद जी सबल सिंह चौहान के संगे-संग अउ आने लेखक मन के किताब मनके घलोक खूब अध्ययन करयं, अउ उन सबके निचोड़ ल लेके वोला अपन पंडवानी के प्रस्तुति म संघारंय।


    पंडवानी शब्द के प्रचलन

नारायण प्रसाद जी ल लोगन भजनहा कहंय, ये हा ये बात के परमान आय के वो बखत तक पंडवानी शब्द के प्रचलन नइ हो पाये रिहिस हे।  पंडवानी शब्द के प्रचलन उंकर मन के बाद म चालू होय होही। काबर के आज तो अइसन जम्मो गायक-गायिका मनला पंडवानी गायक के संगे-संग अलग-अलग शाखा के गायक-गायिका के रूप म चिन्हारी करे जाथे। जइसे कापालिक शैली के या फेर वेदमती शाखा के गायक-गायिका के रूप म।


    नारायण प्रसाद जी अपन संग म एक सहयोगी घलोक राखयं, जेला आज हमन रागी के रूप म जानथन। रागी के रूप म उंकरेच गांव के भुवन सिंह वर्मा जी उंकर संग म राहंय, जउन खंजेरी बजा के उनला संग देवयं। अउ नारायण प्रसाद जी तबूंरा अउ करताल बजा के पंडवानी के गायन करंय। उंकर कार्यक्रम ल देख के अउ कतकों मनखे वइसने गाये के उदिम करंय, एमा सरसेनी गांव के रामचंद वर्मा के नांव ल प्रमुखता के साथ बताये जाथे। फेर उनला वो लोकप्रियता नइ मिल पाइस जेन नारायण प्रसाद जी ला मिलिस।


    रतिहा म गाये बर प्रतिबंध

नारायण प्रसाद जी के लोकप्रियता अतका जादा बाढग़े रिहिस हवय के उनला देखे-सुने खातिर लोगन दुरिहा-दुरिहा ले आवंय। जिहां उंकर कार्यक्रम होवय आसपास के गांव मन म खलप उजर जावय। एकरे सेती चोरी-हारी करइया मन के चांदी हो जावय। जेन रतिहा उंकर कार्यक्रम होवय वो रतिहा वो गांव म या आसपास के गांव म चोरी-हारी जरूर होवय। एकरे सेती उनला रतिहा म कार्यक्रम दे खातिर प्रतिबंध के सामना घलोक करना परीस। एकरे सेती उन पुलिस वाला मनके कहे म सिरिफ दिन म कार्यक्रम दे बर लागिन।


     एक मजेदार घटना के सुरता गांव वाले मन आजो करथें। बताथें के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र म उंकर कार्यक्रम चलत रिहिसे। उहों ले चोरी-हारी के शिकायत मिले लागिस। अंगरेज शासन के पुलिस वाले मन उनला ये कहिके थाना लेगें के वो ह कार्यक्रम के आड़ म खुद चोरी करवावत हे। बाद म असलियत ल जाने के बाद उनला छोड़ दिये गेइस। उन 18 दिन तक जेल (थाना) म रहिन, अउ पूरा 18 दिन उहाँ पंडवानी सुनाइन. तहाँ ले उनला छोड़ दिए गिस. जानबा राहय के उंकर पंडवानी के कार्यक्रम ह चारोंमुड़ा होवय, उन सबो डहर जावयं।


    प्रशासनिक क्षमता

नारायण प्रसाद जी एक उच्चकोटि के कलाकार अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम  के पुरोधा होय के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता रखने वाला मनखे घलोक रिहिन हें। उन अपन जिनगी के अखिरी सांस तक गांव पटेल के जि मेदारी ल निभावत रिहिन हें। एकर संगे-संग गांव म अउ कुछु भी बुता होवय त अगुवा के रूप म उन हमेशा आगू रहंय।


     लगातार 18 दिन तक कथापाठ

अइसे कहे जाथे के पंडवानी या महाभारत के कथा ल लगातार 18 दिन तक नइ करे जाय। एला जीवन के आखिरी घटना के संग जोड़े जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी ये धारणा ल झूठलावत अपन जिनगी म दू पइत ले 18-18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन हें। एक पइत जब उन शारीरिक रूप ले बने सांगर-मोंगर रिहिन हें, तब पूरा बाजा-गाजा के संग करे रिहिन हें, अउ दूसरइया बखत जब उंकर शरीर उमर के संग कमजोर परे ले धर लिये रिहिस हे, तब बिना संगीत के सिरिफ एकर वाचन भर करे रिहिन हें।


     अइसे बताये जाथे के पहिली बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करे रिहिन हवयं तब ये अफवाह फैल गे रिहिस हावय के ये 18 दिन के गायन के तुरते बाद उन समाधि ले लेहीं, एकरे सेती उन 18 दिन तक गायन करत हावंय। काबर ते अइसन गायन ल जीवन के अंतिम समय के घटना संग जोड़े के बात जनमानस म रिहिस हे। एकरे सेती उनला देखे के नाम से चारोंमुड़ा ले जनसैलाब उमड़ परे रिहिस हे।  दूसरइया बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन तेकर बाद उन खुदेच जादा दिन तक जी नइ पाइन, कुछ दिन के बाद ही उन ये नश्वर दुनिया ल छोड़ के सरग सिधार देइन।


   मठ अउ जनआस्था

हमर समाज म अइसे चलन हवय के घर-गिरहस्ती के जिनगी जीने वाला मनके देंह छोंड़े के बाद उनला मरघट्टी म  लेग के आखिरी क्रिया-करम कर दिये जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी के संग अइसन नइ होइस । उनला मरघट्टी  लेगे के बदला गांव के तरिया पार म मठ बना के ठउर दे गइस। अउ सिरिफ अतकेच भर नहीं उनला आने गांव-देंवता मन संग संघार लिये गइस। अब गांव म जब कभू तिहार-बार होथे त गांंव वाले मन आने देवी-देवता मन के संग म उंकरो मठ म दीया-बत्ती करथें, अउ उंकर ले गांव अउ घर खातिर सुख-समृद्धि मांगथें। अइसे कहे जाथे के सन् 1974 म 4 दिसंबर के जब उन सरग सिधारीन तब उंकर उमर करीब 80 बछर के रिहिस हवय। सियान मन बताथें के तिंवरा लुवई के बखत उन सरग लोक वासी होइन.


पारिवारिक स्थिति

नारायण प्रसाद जी के वंशवृक्ष के संबंध म जेन जानकारी मिले हे तेकर मुताबिक उंकर सियान के नांव मुडिय़ा राम वर्मा रिहिस हे। फेर नारायण प्रसाद जी, नारायण जी के बेटा होइस घनश्याम जी, अउ घनश्याम जी के बेटा होइस पदुम जी। पदुम जी के दू झन बेटा हवयं संतोष अउ निलेश जउन मन अभी घर के देखरेख करत हवंय।


इहां ये बताना जरूरी लागथे के नारायण प्रसाद जी के बेटा घनश्याम घलोक ह अपन सियान सहीं कथा वाचन करे के कोशिश करयं, फेर उन बिना संगीत के अइसन करंय। उंकर बाद के पीढ़ी म पंडवानी गायन या वाचन डहर कोनो किसम के झुकाव देखे ले नइ मिलिस। आज उंकर चौथा पीढ़ी के रूप म संतोष अउ निलेश हवंय, फेर इंकर पूरा बेरा सिरिफ खेती किसानी तक ही सीमित हे। एकरे सेती हमला नारायण प्रसाद जी के संबंध म वतका जानकारी नइ मिल पाइस, जतका मिलना रिहिस हे। कहूं उंकर वारिस मन घलोक ये रस्ता के रेंगइया रहितीन या लिखने-पढऩे वाला होतीन त पंडवानी के ये आदिगुरु आज लोगन के बीच अनचिन्हार बरोबर नइ रहितीन, पूरा देश-दुनिया म उंकर सोर-खबर रहितीस।


सुशील भोले 

म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,

संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)